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Tri-Services Reform: डिफेंस रिफॉर्म्स की रफ्तार तेज, थिएटर कमांडर्स को मिली नई जिम्मेदारी, अब कमांडर ही लेंगे डिसिप्लिनरी एक्शन

Tri-Services Reform: Theatre Commanders Get Disciplinary Powers
CDS Anil Chauhan

Tri-services Reform: रक्षा मंत्रालय ने एक बड़ा फैसला लिया है। अब थिएटर कमांड जैसे ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशंस के कमांडरों को अपने अधीन काम करने वाले सैनिकों और अधिकारियों पर अनुशासन और प्रशासन से जुड़ी शक्तियां मिलेंगी। ये नए नियम 27 मई, 2025 से लागू हो गए हैं। इनका मकसद सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच बेहतर तालमेल बनाना और ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशंस को और मजबूत करना है। यह कदम रक्षा क्षेत्र में सुधारों की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, खासकर तब जब देश में थिएटर कमांड की घोषणा जल्द होने की उम्मीद है।

रक्षा मंत्रालय ने कहा, “इंटर-सर्विसेज ऑर्गनाइजेशन (कमांड, कंट्रोल और डिसिप्लिन) अधिनियम, 2023 के तहत बनाए गए नियमों को राजपत्र में प्रकाशित किया गया है। ये नियम 27 मई, 2025 से लागू हैं।” ये नियम ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशंस, जैसे थिएटर कमांड, को बेहतर ढंग से चलाने में मदद करेंगे। थिएटर कमांड में तीनों सेनाओं के जवान और अधिकारी एक साथ एक कमांडर के नेतृत्व में काम करते हैं।

पिछले साल मई में यह अधिनियम बनाया गया था, और अब इसके नियम लागू किए गए हैं। इन नियमों के तहत कमांडरों को अपने अधीन काम करने वाले सैनिकों पर अनुशासन और प्रशासन से जुड़े फैसले लेने का अधिकार मिलेगा। इससे पहले कमांडरों के पास ऐसी शक्तियां नहीं थीं।

Tri-services Reform: थिएटर कमांड क्या है?

थिएटर कमांड एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें सेना, नौसेना और वायुसेना के जवान एक ही कमांडर के नेतृत्व में काम करते हैं। इस कदम का उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल और संयुक्त रणनीति को बढ़ावा देना है, ताकि युद्ध या अन्य रक्षा चुनौतियों में अधिक प्रभावी ढंग से कार्रवाई की जा सके। जल्द ही भारत में थिएटर कमांड की घोषणा होने की उम्मीद है।

रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “यह सुधार लंबे समय से प्रतीक्षित था, खासकर तब जब से चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) की नियुक्ति हुई है।” CDS का पद 2019 में बनाया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच समन्वय स्थापित करना और रक्षा सुधारों को लागू करना था। इस दिशा में अगस्त 2023 में लोकसभा और राज्यसभा ने इस अधिनियम को पारित किया था, जिसे राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिली थी।

पहले क्या समस्या थी?

अभी तक ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशंस, जैसे अंडमान और निकोबार कमांड या स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड, में कमांडरों के पास अपने अधीन सैनिकों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार नहीं था। अगर किसी सैनिक या अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करनी होती थी, तो उसे उसकी मूल सेवा (सेना, नौसेना या वायुसेना) में वापस भेजा जाता था। इससे समय और संसाधनों की बर्बादी होती थी।

उदाहरण के लिए, अंडमान और निकोबार कमांड, जो भारत का पहला ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशन है और 2001 में बनाया गया था, उसमें भी यही दिक्कत थी। अब नए नियमों से कमांडरों को यह शक्ति मिलेगी कि वे अपने संगठन में ही अनुशासन से जुड़े फैसले ले सकें।

नियमों का क्या फायदा होगा?

ये नियम ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशंस को और मजबूत करेंगे। अब कमांडर अपने अधीन सैनिकों पर वही अनुशासनात्मक और प्रशासनिक शक्तियां इस्तेमाल कर सकेंगे, जो सेना, नौसेना और वायुसेना के अपने-अपने अधिनियमों में हैं। इसका मतलब है कि अगर कोई सैनिक गलती करता है, तो उसे उसकी मूल सेवा में वापस भेजने की जरूरत नहीं पड़ेगी। कमांडर खुद कार्रवाई कर सकेंगे।

हालांकि, यह भी सुनिश्चित किया गया है कि सेना, नौसेना और वायुसेना की अपनी-अपनी खासियत और नियम-कायदे बरकरार रहेंगे। इससे तीनों सेनाओं की अलग-अलग पहचान और परंपराएं सुरक्षित रहेंगी।

यह शक्तियां मौजूदा सेना अधिनियम, 1950, नौसेना अधिनियम, 1957, और वायुसेना अधिनियम, 1950 के तहत दी गई अनुशासनात्मक और प्रशासनिक शक्तियों के समान होंगी। हालांकि, यह सुनिश्चित किया गया है कि प्रत्येक सेवा की विशिष्ट सेवा शर्तों में कोई बदलाव नहीं होगा।

वर्तमान में, ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशंस में सेवारत कर्मियों पर उनके संबंधित सेवा अधिनियम लागू होते हैं। उदाहरण के लिए, भारतीय सेना के जवान सेना अधिनियम, 1950 के तहत आते हैं, जबकि नौसेना और वायुसेना के कर्मी क्रमशः नौसेना अधिनियम, 1957 और वायुसेना अधिनियम, 1950 के तहत शासित होते हैं। नए नियमों के तहत, ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशंस के प्रमुखों को इन अधिनियमों के तहत सभी अनुशासनात्मक और प्रशासनिक शक्तियां दी जाएंगी, जिससे उन्हें अपने संगठन में सेवारत कर्मियों पर कार्रवाई करने का अधिकार मिलेगा।

थिएटर कमांड का एलान जल्द

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि थिएटर कमांड की घोषणा जल्द ही हो सकती है। ये कमांड क्षेत्रीय स्तर पर बनाए जाएंगे, जैसे कि उत्तरी सीमा, पश्चिमी सीमा या समुद्री क्षेत्र के लिए अलग-अलग कमांड। प्रत्येक कमांड में तीनों सेनाओं के जवान और अधिकारी एक कमांडर के नेतृत्व में काम करेंगे। यह न केवल रणनीतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग और तुरंत फैसले लेने में भी मदद मिलेगी।

भारत ने 2001 में अंडमान और निकोबार कमांड के साथ ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशन की शुरुआत की थी। यह कमांड हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके बाद, स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड जैसे अन्य संगठन बनाए गए, जो परमाणु हथियारों और अन्य रणनीतिक संपत्तियों के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार हैं। हालांकि, इन संगठनों में अनुशासनात्मक और प्रशासनिक शक्तियों की कमी एक बड़ी बाधा थी, जिसे अब नए नियमों के माध्यम से दूर किया जा रहा है।

भारत में अभी कुछ ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशंस हैं, जैसे-

  • अंडमान और निकोबार कमांड 2001 में बना, जो हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत करता है।
  • स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड: परमाणु हथियारों और रणनीतिक संपत्तियों का प्रबंधन करता है।
  • सैन्य मामलों का विभाग: चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के नेतृत्व में काम करता है।

नए नियमों के लागू होने से ट्राय सर्विसेज ऑर्गेनाइजेशंस की कार्यक्षमता में सुधार होगा। यह कदम न केवल सशस्त्र बलों के बीच बेहतर तालमेल सुनिश्चित करेगा, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को भी मजबूत करेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि थिएटर कमांड की स्थापना और इन नियमों का लागू होना भारत को आधुनिक युद्ध की चुनौतियों के लिए बेहतर ढंग से तैयार करेगा।

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रक्षा मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन नियमों का उद्देश्य प्रत्येक सेवा की विशिष्ट पहचान और परंपराओं को बनाए रखना है, ताकि सशस्त्र बलों की अनूठी संस्कृति और कार्यप्रणाली पर कोई असर न पड़े। यह कदम भारत की सैन्य रणनीति में एक नया अध्याय जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

DefExpo 2026: अगले साल रांची में होगा देश की 13वीं सबसे बड़ी रक्षा प्रदर्शनी का आयोजन! भारत की ताकत दिखाने की तैयारी

DefExpo 2026: Ranchi to Host India's 13th Mega Defence Exhibition, Showcasing Nation’s Strength
Credit: Defence Production of India

DefExpo 2026: झारखंड की राजधानी रांची अगले साल डिफएक्सपो 2026 (DefExpo 2026) की मेजबानी करने के लिए तैयार है। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, भारत की रक्षा और आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी उपलब्धियों को प्रदर्शित करने वाली इस अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी का 13वां संस्करण रांची में आयोजित होने की संभावना है। यह पांच दिवसीय आयोजन न केवल भारत की रक्षा तकनीकों को दुनिया के सामने लाएगा, बल्कि झारखंड को वैश्विक मंच पर चमकाने का मौका भी देगा।

रांची रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ का लोकसभा क्षेत्र भी है, माना जा रहा है कि रांची को इसी वजह से इस मेगा इवेंट की मेजबानी के लिए चुना गया है। सूत्रों का कहना है कि इस आयोजन के लिए रांची को चुनने को लेकर कई हाई लेवल मीटिंग्स हो चुकी हैं। डिफएक्सपो (DefExpo 2026) में थल, नौसेना और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े सिस्टम्स की प्रदर्शनी होगी, जिसमें स्वदेशी और वैश्विक रक्षा कंपनियां अपनी तकनीकों का प्रदर्शन करेंगी।

हर दो साल में होता है DefExpo 2026

डिफएक्सपो (DefExpo 2026) भारत की एक प्रमुख रक्षा प्रदर्शनी है, जो हर दो साल में आयोजित होती है। यह प्रदर्शनी रक्षा क्षेत्र में भारत की बढ़ती ताकत और स्वदेशी तकनीकों को दुनिया के सामने लाने का मंच प्रदान करती है। इससे पहले 2022 में 12वां डिफएक्सपो (DefExpo 2026) गुजरात के गांधीनगर में हुआ था, जबकि 2020 में 11वां संस्करण लखनऊ में आयोजित किया गया था, जो रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का गृह क्षेत्र है। 2018 में यह आयोजन तमिलनाडु और 2016 में गोवा में हुआ था। 2016 से पहले डिफएक्सपो (DefExpo 2026) दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित होता था, क्योंकि इस आयोजन के लिए बड़े स्थान और मजबूत बुनियादी ढांचे की जरूरत होती है।

2022 का डिफएक्सपो (DefExpo 2026) खास था, क्योंकि यह पहली बार पूरी तरह से भारतीय कंपनियों को समर्पित था। इसमें भारतीय कंपनियों के साथ-साथ विदेशी मूल उपकरण निर्माताओं (OEMs) की भारतीय इकाइयों, भारत में रजिस्टर्ड कंपनियों के डिवीजनों और भारतीय फर्मों के साथ संयुक्त उद्यमों ने हिस्सा लिया था। इस आयोजन में 75 देशों ने भाग लिया था और सात नई रक्षा कंपनियों ने पहली बार अपनी उपस्थिति दर्ज की थी, जो पहले ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड का हिस्सा थीं।

रांची में सूर्या किरण का जलवा

रांची के लिए बड़े आयोजनों की मेजबानी कोई नई बात नहीं है। हाल ही में 19 अप्रैल को भारतीय वायुसेना की सूर्या किरण एरोबेटिक टीम ने रांची के नमकुम में आर्मी ग्राउंड, खोजाटोली में हजारों दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। नौ हॉक एमके-132 जेट विमानों ने नीले आकाश में तिरंगे की छटा बिखेरी और शानदार फॉर्मेशन के साथ प्रदर्शन किया। यह रांची के लिए पहला ऐसा अनुभव था। इस टीम ने 22 और 23 अप्रैल को पटना में “शौर्य दिवस” के मौके पर 1857 के स्वतंत्रता सेनानी बाबू वीर कुंवर सिंह की जयंती पर भी प्रदर्शन किया था।

क्यों खास होगा DefExpo 2026?

रांची में होने वाला डिफएक्सपो 2026 (DefExpo 2026) भारत की रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और कदम होगा। यह आयोजन न केवल स्वदेशी रक्षा तकनीकों को प्रदर्शित करेगा, बल्कि वैश्विक रक्षा कंपनियों के साथ सहयोग को भी बढ़ावा देगा। रांची जैसे शहर में इस आयोजन का होना स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन को भी गति देगा। सूत्रों का कहना है कि यह आयोजन फरवरी या मार्च 2026 (DefExpo 2026) में हो सकता है, हालांकि 2022 में वैश्विक रक्षा निर्माताओं की लॉजिस्टिक चुनौतियों के कारण इसे अक्टूबर तक टालना पड़ा था।

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डिफएक्सपो 2026 (DefExpo 2026) के साथ भारत एक बार फिर दुनिया को अपनी रक्षा ताकत और तकनीकी नवाचार दिखाने को तैयार है। रांची में इस आयोजन की मेजबानी न केवल झारखंड के लिए गर्व का मौका है, बल्कि यह भारत के ‘आत्मनिर्भर भारत’ मिशन को भी मजबूती देगा। इस मेले में स्वदेशी हथियारों, तकनीकों और रक्षा प्रणालियों का प्रदर्शन भारत की बढ़ती रक्षा क्षमता को रेखांकित करेगा।

QTRC: DRDO ने दिल्ली में शुरू किया क्वांटम टेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर, अल्ट्रा-स्मॉल एटॉमिक क्लॉक समेत कई तकनीकों पर होगा काम

QTRC: DRDO Unveils Quantum Technology Research Centre in Delhi, to Advance Atomic Clocks
Credit: DRDO

QTRC: भारत ने अपनी रक्षा और रणनीतिक क्षमताओं को और मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने आज दिल्ली के मेटकाफ हाउस में क्वांटम टेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर (QTRC) का उद्घाटन किया। इस अत्याधुनिक सुविधा का उद्घाटन DRDO के चेयरमैन और रक्षा अनुसंधान व विकास विभाग के सचिव डॉ. समीर वी. कामत ने किया। इसका मकसद स्वदेशी क्वांटम तकनीकों को बढ़ावा देना और रक्षा क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाना है।

क्या है QTRC की खासियत?

QTRC भविष्य की तकनीकों का एक ऐसा केंद्र है, जो क्वांटम विज्ञान के क्षेत्र में क्रांतिकारी शोध को बढ़ावा देगा। यह सेंटर अत्याधुनिक उपकरणों से लैस है, जो रक्षा और रणनीतिक जरूरतों को पूरा करने के लिए कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम करेगा। यहां वर्टिकल-कैविटी सरफेस-एमिटिंग लेजर (VCSEL) और डिस्ट्रीब्यूटेड फीडबैक लेजर (DFB) जैसी एडवांस लेजर तकनीकों का अध्ययन होगा, जो क्वांटम संचार और सेंसर प्रणालियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। इसके अलावा, सेंटर क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (QKD) तकनीक पर काम करेगा, जो हैकिंग से पूरी तरह सुरक्षित कम्यूनिकेशन सिस्टम डेवलप करेगा। यह तकनीक पोस्ट-क्वांटम युग में राष्ट्रीय सुरक्षा को अभेद्य बनाने में मदद करेगी।

सॉलिड स्टेट फिजिक्स लेबोरेटरी (SSPL) के नेतृत्व में यह सेंटर सिंगल फोटोन सोर्सेज के मूल्यांकन के लिए टेस्ट-बेड्स और क्षारीय वाष्प सेल (Alkali Vapor Cell) की विशेषताओं का अध्ययन करेगा। ये तकनीकें क्वांटम संचार और क्रिप्टोग्राफी के लिए आधार तैयार करेंगी। इसके साथ ही, QTRC अल्ट्रा-स्मॉल एटॉमिक क्लॉक पर काम करेगा, जो उन क्षेत्रों में सटीक समय मापन सुनिश्चित करेगा, जहां ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) उपलब्ध नहीं है। यह रक्षा मिशनों के लिए बेहद उपयोगी साबित होगा। सेंटर में अति-संवेदनशील एटॉमिक मैग्नेटोमीटर भी विकसित किए जाएंगे, जो चुंबकीय क्षेत्रों का सटीक पता लगाने में मदद करेंगे। साथ ही, अत्याधुनिक सॉलिड-स्टेट क्वांटम उपकरणों और सामग्रियों पर शोध इस सेंटर की प्राथमिकता रहेगी।

QTRC: DRDO Unveils Quantum Technology Research Centre in Delhi, to Advance Atomic Clocks
Credit: QTRC

स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा

DRDO का यह कदम भारत को क्वांटम तकनीक के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अग्रणी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। QTRC क्वांटम सेंसिंग, सुरक्षित संचार और पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी जैसे क्षेत्रों में भारत की क्षमताओं को बढ़ाएगा। यह सेंटर राष्ट्रीय क्वांटम मिशन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसके तहत भारत स्वदेशी क्वांटम तकनीकों को विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

QTRC के उद्घाटन समारोह में डायरेक्टर जनरल (माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज, कम्प्यूटेशनल सिस्टम्स एंड साइबर सिस्टम्स) सुमा वरगीज मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थीं। उनकी दूरदर्शिता और नेतृत्व ने इस सेंटर को हकीकत में बदलने में अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा, डीजी (रिसोर्स एंड मैनेजमेंट) डॉ. मनु कोरुल्ला, SSPL और साइंटिफिक एनालिसिस ग्रुप (SAG) के निदेशक, वरिष्ठ वैज्ञानिक और अन्य गणमान्य व्यक्ति भी समारोह में शामिल हुए।

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क्वांटम टेक्नोलॉजी भविष्य की रक्षा और रणनीतिक जरूरतों के लिए एक गेम-चेंजर हो सकती है। यह सेंटर न केवल भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करेगा, बल्कि स्वदेशी नवाचार को बढ़ावा देकर भारत को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सेंटर भारत को वैश्विक क्वांटम दौड़ में आगे ले जाएगा, जिससे देश की रणनीतिक ताकत और बढ़ेगी।

Navika Sagar Parikrama II: इंडियन नेवी की दो महिला अफसरों ने रचा इतिहास, पूरी की विश्व परिक्रमा, 29 को गोवा में होगा भव्य स्वागत

Navika Sagar Parikrama II: Navy's Women Officers End Global Sail, Goa Welcome May 29
Credit: Indian Navy

Navika Sagar Parikrama II: भारतीय नौसेना एक बार फिर गर्व के पल का साक्षी बनने जा रही है। नाविका सागर परिक्रमा II (Navika Sagar Parikrama II) अभियान को सफलतापूर्वक पूरा करने वाली दो महिला नौसेना अधिकारियों, लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा ए. और लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना के. का 29 मई 2025 को गोवा के तट पर भव्य स्वागत होने वाला है। यह ऐतिहासिक अभियान 2 अक्टूबर 2024 को गोवा के नेवल ओशन सेलिंग नोड से शुरू हुआ था, और अब आठ महीने बाद यह अपनी मंजिल पर पहुंचने जा रहा है।

Navika Sagar Parikrama II: डबल-हैंडेड मोड में पूरी की परिक्रमा

नाविका सागर परिक्रमा II (Navika Sagar Parikrama II) भारतीय नौसेना का एक ऐसा अभियान है, जिसमें दो महिला अधिकारियों ने भारतीय नौसेना के सेलिंग वेसल तारिणी पर सवार होकर विश्व की परिक्रमा की। यह परिक्रमा डबल-हैंडेड मोड में पूरी की गई, यानी सिर्फ दो लोगों ने मिलकर इस विशाल समुद्री यात्रा को अंजाम दिया। इस दौरान उन्होंने चार महाद्वीपों, तीन महासागरों और तीन महान केप्स को पार किया। कुल 25,400 नॉटिकल मील (लगभग 50,000 किलोमीटर) की यह यात्रा अपने आप में एक मिसाल है। इस अभियान ने न केवल भारत की समुद्री ताकत को दर्शाया, बल्कि नारी शक्ति को भी एक नई पहचान दी।

Navika Sagar Parikrama II: Navy's Women Officers End Global Sail, Goa Welcome May 29
Lt Cdr Roopa A and Lt Cdr Dilna K (Credit: Indian Navy)

मुश्किलों से भरा रहा सफर

रूपा और दिलना, जिन्हें प्यार से #DilRoo कहा जाता है, ने इस यात्रा में कई चुनौतियों का सामना किया। उन्होंने 50 नॉट्स (93 किलोमीटर प्रति घंटा) तक की तेज हवाओं, तूफानी मौसम और बेहद ठंडे तापमान का डटकर मुकाबला किया। इस दौरान वे पूरी तरह से पाल और हवा की शक्ति पर निर्भर रहीं। खास तौर पर यात्रा का तीसरा चरण, जो न्यूजीलैंड के लिटलटन से फॉकलैंड द्वीप के पोर्ट स्टैनली तक था, सबसे मुश्किल रहा। इस चरण में उन्हें तीन चक्रवातों का सामना करना पड़ा और ड्रेक पैसेज जैसी खतरनाक जगह से गुजरना पड़ा। इसके अलावा, उन्होंने केप हॉर्न को भी पार किया, जिसे समुद्री यात्राओं में सबसे कठिन माना जाता है।

इन दोनों महिला अधिकारियों ने अपनी हिम्मत, लगन और समुद्री कौशल से हर मुश्किल को पार किया। उनकी इस उपलब्धि ने न केवल भारतीय नौसेना बल्कि पूरे देश को गर्व का मौका दिया है। यह अभियान भारत की समुद्री परंपराओं और नौसेना की पेशेवरता का एक शानदार उदाहरण है।

पूरी दुनिया ने सराहा

इस यात्रा के दौरान रूपा और दिलना ने कई देशों में रुककर वहां के लोगों से मुलाकात की। उन्होंने फ्रेमेंटल (ऑस्ट्रेलिया), लिटलटन (न्यूजीलैंड), पोर्ट स्टैनली (फॉकलैंड द्वीप) और केप टाउन (दक्षिण अफ्रीका) में रुककर वहां के स्थानीय लोगों, भारतीय समुदाय, स्कूली बच्चों, नौसेना कैडेट्स और विश्वविद्यालय के शिक्षकों से बातचीत की। उनकी इस यात्रा को हर जगह सराहा गया। पश्चिमी ऑस्ट्रेलियाई संसद में उन्हें विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया, जो उनके लिए एक बड़ा सम्मान था।

दुनियाभर के समुद्री संगठनों, स्थानीय समुदायों और विदेशी संसदों ने उनकी उपलब्धियों की तारीफ की। यह अभियान नारी सशक्तिकरण, समुद्री उत्कृष्टता और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बन गया। इसने दुनियाभर में भारत की छवि को और मजबूत किया।

Navika Sagar Parikrama II: Navy's Women Officers End Global Sail, Goa Welcome May 29
Lt Cdr Roopa A and Lt Cdr Dilna K (Credit: Indian Navy)

रक्षा मंत्री और नौसेना प्रमुख ने की तारीफ

इस यात्रा के दौरान, दोनों महिला अफसरों को देश के बड़े नेताओं से भी प्रोत्साहन मिला। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर, माननीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उनसे बातचीत की। उन्होंने इस उल्लेखनीय उपलब्धि के लिए उनकी सराहना की और राष्ट्रीय सुरक्षा में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत रक्षा क्षेत्र में महिलाओं के लिए और अधिक अवसर बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।

वहीं, नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने भी कई मौकों पर इन दोनों अधिकारियों से बात की। उन्होंने उनकी शानदार स्किल्स, पेशेवर रवैये, आपसी सहयोग और टीमवर्क की जमकर तारीफ की। नौसेना प्रमुख ने कहा कि यह अभियान भारतीय नौसेना की प्रतिबद्धता और उत्कृष्टता का प्रतीक है।

कायम की एक नई मिसाल

नाविका सागर परिक्रमा II (Navika Sagar Parikrama II) भारतीय नौसेना के इतिहास में एक नया अध्याय बन गया है। इस अभियान ने न केवल समुद्री खोज की भावना को जिंदा रखा, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत के समुद्री कौशल को भी प्रदर्शित किया। यह यात्रा सशक्तिकरण, इनोवेशन और भारत की समुद्री विरासत के प्रति प्रतिबद्धता की मिसाल है। इसने भविष्य के लिए एक उज्जवल और सशक्त रास्ता तैयार किया है।

स्वागत की तैयारियां जोरों पर

अब जब यह ऐतिहासिक अभियान अपने अंतिम पड़ाव पर है, तो पूरे देश की नजरें गोवा पर टिकी हैं। 29 मई को गोवा के मोरमुगाओ पोर्ट पर एक भव्य समारोह का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मुख्य अतिथि होंगे। इस समारोह में दोनों अधिकारियों का औपचारिक स्वागत किया जाएगा। यह समारोह न केवल इन दोनों बहादुर महिलाओं की उपलब्धि का उत्सव होगा, बल्कि भारतीय नौसेना की समुद्री ताकत और नारी शक्ति का भी प्रतीक होगा।

नारी शक्ति की जीत

रूपा और दिलना ने इस अभियान के जरिए नारी शक्ति को एक नई पहचान दी है। उन्होंने दिखा दिया कि अगर हिम्मत और लगन हो, तो कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती। उनकी यह यात्रा न केवल समुद्री इतिहास में एक सुनहरा पन्ना जोड़ती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनेगी।

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इस अभियान ने भारत की समुद्री विरासत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है और यह संदेश दिया है कि भारतीय नौसेना हर चुनौती को पार करने में सक्षम है। अब, जैसे ही यह अभियान अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच रहा है, पूरा देश इन दो बहादुर महिला अधिकारियों का स्वागत करने के लिए तैयार है। यह पल न केवल भारतीय नौसेना के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का पल है।

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AMCA Explained: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोग्राम के लिए प्रोटोटाइप मॉडल को मंजूरी दे दी है। यह भारत का पहला स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट होगा, जिसका प्रोटोटाइप 2026-27 तक तैयार होने की उम्मीद है और 2028 तक पहली उड़ान भर सकता है। AMCA तैयार होने के बाद भारत उन चुनिंदा देशों (अमेरिका, चीन, रूस) की सूची में शामिल हो जाएगा, जिनके पास पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं। वर्तमान में अमेरिका के पास F-22 रैप्टर और F-35 लाइटनिंग II, चीन के पास J-20, और रूस के पास सुखोई-57 जैसे विमान हैं।

AMCA क्या है और क्यों है खास?

एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) भारत का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है, जिसे रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के तहत एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) डेवलप कर रही है। यह एक पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है, जो मॉडर्न वॉरफेयर की जरूरतों को पूरा करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

AMCA कार्यक्रम की शुरुआत 2010 में हुई थी, जिसे पहले मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (MCA) के नाम से जाना जाता था। यह भारत-रूस के संयुक्त FGFA (Fifth Generation Fighter Aircraft) कार्यक्रम के समानांतर शुरू हुआ था, लेकिन बाद में भारत ने FGFA से हटकर AMCA को प्राथमिकता दी। अक्टूबर 2010 में, रक्षा मंत्रालय ने फिजिबिलिटी स्टडी के लिए 90 करोड़ रुपये आवंटित किए। नवंबर 2010 में, ADA ने दो टेक्नोलॉजी डेमोंस्टेटर्स और सात प्रोटोटाइप के लिए 9,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त फंडिंग मांगी।

2013-2014 के बीच, AMCA के 9 डिज़ाइन कॉन्फ़िगरेशन्स (3B-01 से 3B-09) की स्टडी हुई, जिसमें CAD, विंड टनल टेस्टिंग, और रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) टेस्टिंग शामिल थी। 2014 तक, 3B-09 कॉन्फ़िगरेशन को अंतिम रूप दिया गया। 2015 में, Aero India में AMCA का बेसिक डिज़ाइन फाइनल हुआ। 2023 में डिज़ाइन का काम पूरा हुआ, और मार्च 2024 में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने प्रोटोटाइप विकास के लिए ₹15,000 करोड़ की मंजूरी दी।

AMCA की कुछ प्रमुख विशेषताएं

AMCA एक 25 टन का ट्विन-इंजन जेट होगा, जो IAF के बाकी फाइटर्स से बड़ा होगा। शुरुआत में इसमें 75% स्वदेशी कंटेंट होगा, जो बाद में 85% तक बढ़ेगा।

एडवांस्ड स्टील्थ फीचर्स

AMCA में एडवांस्ड स्टील्थ फीचर्स होंगे, जो इसे रडार से छुपाने में मदद करेंगे। इसका लो इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक सिग्नेचर रडार के लिए इसे डिटेक्ट करना मुश्किल बनाएगा। जेट की सतह पर खास मटेरियल यूज होगा, जो रडार सिग्नल को रिफ्लेक्ट करने की बजाय डायवर्ट करेगा। डायवर्टरलेस सुपरसोनिक इनलेट और सर्पेंटाइन एयर इनटेक डक्ट इंजनों को रडार से बचाएंगे।

6.5 टन का बड़ा इंटरनल फ्यूल टैंक

AMCA में 6.5 टन का बड़ा इंटरनल फ्यूल टैंक होगा, जो इसे लंबी दूरी के मिशंस के लिए फिट बनाएगा। इसका इंटरनल वेपन्स बे 1,500 किलो तक का पेलोड ले जा सकता है, जिसमें चार लॉन्ग-रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल्स और कई प्रिसीजन-गाइडेड हथियार शामिल होंगे। इंटरनल वेपन्स बे और फ्यूल टैंक रडार सिग्नेचर को कम करते हैं, जो बाहर लगे हथियारों या टैंक्स के साथ मुमकिन नहीं है।

इंजन

AMCA का Mk1 वर्जन अमेरिकी GE F414 इंजन (98 किलोन्यूटन) के साथ उड़ेगा, जिसका प्रोडक्शन हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के साथ भारत में शुरू हो चुका है। Mk2 वर्जन में DRDO का गैस टरबाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) 110 किलोन्यूटन का देसी इंजन डेवलप करेगा। भारत फ्रांस की सैफरान SA कंपनी के साथ इस इंजन के लिए बातचीत कर रहा है।

AMCA में इंटीग्रेटेड व्हीकल हेल्थ मैनेजमेंट (IVHM) सिस्टम होगा, जो रियल-टाइम में जेट की कंडीशन चेक करेगा। ये सिस्टम मेंटेनेंस टाइम को कम करेगा और जेट को ज्यादा वक्त तक यूज करने में मदद करेगा। साथ ही, AMCA में एडवांस सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम होगा, जो दुश्मन के विमानों का पता लगाने और उन्हें नष्ट करने में सक्षम होगा।

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भारत के लिए AMCA क्यों जरूरी है?

भारत का स्ट्रेटेजिक सिनारियो बेहद चुनौतीपूर्ण है। पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देशों के साथ तनाव और उनकी बढ़ती सैन्य क्षमता भारत के लिए बड़ा खतरा है। भारतीय वायुसेना (IAF) को 41 स्क्वाड्रन की जरूरत है, लेकिन वर्तमान में केवल 29 स्क्वाड्रन ही सक्रिय हैं। खासकर तब जब पाकिस्तान अपनी वायुसेना को आधुनिक बना रहा है और चीन से J-10 औऱ J-20 स्टील्थ फाइटर जेट और एडवांस विपंस सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है औऱ LAC पर भारत के लिए चुनौती पेश कर रहा है।

AMCA का डेवलपमेंट इन चुनौतियों का जवाब है। यह न केवल भारतीय वायुसेना की कमी को पूरा करेगा, बल्कि इसे आधुनिक युद्ध की जरूरतों के लिए तैयार करेगा। AMCA अपने स्टील्थ फीचर्स, एडवांस्ड एवियोनिक्स और लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के साथ इस गैप को भर सकता है। स्टील्थ का मतलब है कि ये जेट दुश्मन के रडार से बच सकता है, जो आज के युद्ध में बहुत बड़ा फायदा है।

पाकिस्तान अपनी वायुसेना को चीन की मदद से अपग्रेड कर रहा है, जिसमें J-20 जैसे स्टील्थ फाइटर भी शामिल हैं। दूसरी तरफ, चीन की वायुसेना पहले से ही पांचवीं पीढ़ी के जेट्स के साथ बहुत ताकतवर है। अगर AMCA सक्सेसफुल होता है, तो ये दोनों पड़ोसियों के खिलाफ भारत को बराबरी का मौका दे सकता है।

AMCA की टाइमलाइन

AMCA प्रोग्राम को अप्रैल 2024 में सरकार की मंजूरी मिली थी, और अब रक्षा मंत्री द्वारा प्रोटोटाइप मॉडल को हरी झंडी दिखाई गई है। इसकी टाइमलाइन इस तरह रहेगी:

  • 2026-27: पहला प्रोटोटाइप तैयार होगा।
  • 2028: पहली उड़ान की उम्मीद।
  • 2032: विमान का सर्टिफिकेशन पूरा होगा।
  • 2034: भारतीय वायुसेना में शामिल होने की योजना।

ADA जल्द ही एक एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI) जारी करेगी, जिसमें सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कंपनियों को विकास प्रक्रिया में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाएगा। यह एक प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया होगी, जिसमें केवल भारतीय कंपनियां ही हिस्सा ले सकेंगी। यह कदम भारत के आत्मनिर्भर भारत अभियान को मजबूत करेगा।

AMCA का डेवलपमेंट दो चरणों में होगा:

  • पहला चरण: 75% स्वदेशी सामग्री के साथ शुरुआती मॉडल।
  • दूसरा चरण: 85% स्वदेशी सामग्री के साथ एडवांस मॉडल।

GE F414 इंजन का प्रोडक्शन HAL के साथ भारत में शुरू हो चुका है, जो AMCA के लिए समय पर इंजन सप्लाई सुनिश्चित करेगा।

क्या हैं चुनौतियां?

AMCA का रास्ता आसान नहीं है। भारत के स्वदेशी डिफेंस प्रोजेक्ट्स का इतिहास, जैसे तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट, देरी और कॉस्ट ओवररन से भरा है। AMCA, जो फिफ्थ-जेनरेशन जेट है, DRDO, ADA और इंडस्ट्री पार्टनर्स के लिए और भी बड़ा टेस्ट होगा। स्टील्थ टेक्नोलॉजी, एडवांस्ड इंजन्स और एवियोनिक्स बनाने के लिए ढेर सारा पैसा, टेक्निकल स्किल्स और टाइम चाहिए।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, AMCA का प्रोटोटाइप 2026-27 तक तैयार हो सकता है और पहली फ्लाइट 2028 में हो सकती है। लेकिन डिफेंस मिनिस्ट्री का लेटेस्ट स्टेटमेंट साफ टाइमलाइन नहीं देता, जो चैलेंजेस को दिखाता है। सर्टिफिकेशन 2032 तक और IAF में इंडक्शन 2034 तक प्लान्ड है।

IAF की तुरंत जरूरतें भी चिंता का सबब हैं। सिर्फ 29 स्क्वाड्रनों के साथ, वायुसेना पहले से दबाव में है। AMCA को सर्विस में आने में कई साल लगेंगे। तब तक, भारत को राफेल या एक्स्ट्रा तेजस जेट्स जैसे ऑप्शंस पर भरोसा करना होगा। AMCA की सक्सेस पॉलिटिकल सपोर्ट, फंडिंग और DRDO, ADA और प्राइवेट इंडस्ट्री के बीच स्मूथ कोऑर्डिनेशन पर टिकी है।

क्यों चाहिए स्वदेशी फाइटर जेट?

भारत के पास विकल्प था कि वह अमेरिका का F-35 या रूस का Su-57 खरीद ले। ये दोनों विश्व स्तरीय फाइटर जेट्स हैं, लेकिन इनसे जुड़ी कई समस्याएं हैं। विदेशी जेट्स खरीदना बहुत महंगा है। साथ ही, उनके मेंटेनेंस और स्पेयर पार्ट्स के लिए हमेशा विदेशी सप्लायर्स पर निर्भर रहना पड़ता है। युद्ध के समय अगर सप्लाई चेन में रुकावट आती है, तो ये भारत के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। इसके अलावा, विदेशी जेट्स में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर पाबंदियां होती हैं, यानी हम उन्हें अपनी जरूरतों के हिसाब से बदल नहीं सकते।

AMCA को भारत में ही बनाना ‘आत्मनिर्भर भारत’ मिशन का हिस्सा है। AMCA प्रोजेक्ट से नौकरियां बढ़ेंगी, टेक्निकल नॉलेज बढ़ेगा और भारत का एयरोस्पेस इकोसिस्टम मजबूत होगा। रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि ADA जल्द ही इंडस्ट्री पार्टनर्स के साथ एक एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI) इश्यू करेगी। ये पार्टनरशिप इनोवेशन को तेज करेगी और AMCA को भारत की खास जरूरतों, जैसे हिमालय में हाई-एल्टिट्यूड फाइटिंग या इंडियन ओशन में मैरिटाइम ऑपरेशंस के लिए तैयार करेगी।

AMCA का सबसे बड़ा फायदा ये है कि ये 85 फीसदी स्वदेशी होगा। विदेशी जेट्स में अक्सर “ब्लैक बॉक्स” सिस्टम्स होते हैं या क्रिटिकल पार्ट्स की एक्सेस लिमिटेड होती है। लेकिन AMCA के साथ भारत को टेक्नोलॉजी पर फुल कंट्रोल मिलेगा। इससे स्वदेशी हथियार, सेंसर्स और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम्स को आसानी से फिट किया जा सकेगा। मिसाल के तौर पर, AMCA में भारत की बनी मिसाइलें और एडवांस्ड रडार सिस्टम्स लगाए जा सकते हैं, जो इसे IAF की जरूरतों के लिए परफेक्ट बनाएंगे।

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क्या AMCA बन सकता है डिटरेंट?

AMCA के तैयार होते ही पाकिस्तान और चीन को बड़ी चुनौती मिलेगी। इसके स्टील्थ फीचर्स, एडवांस्ड सेंसर्स और वेपन्स IAF को एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड मिशंस में बड़ा एज देंगे। पाकिस्तान के खिलाफ, AMCA मॉडर्नाइज्ड जेट्स और एयर डिफेंस सिस्टम्स को न्यूट्रलाइज कर सकता है। यह चीन के खिलाफ J-20 को तगड़ा जवाब दे सकता है, जिससे भारत को लद्दाख या अरुणाचल जैसे इलाकों में रणनीतिक बढ़त हासिल होगी।

Book Review: ‘एवरेस्ट की दूसरी ओर’! हिमालय की ऊंचाइयों से तिब्बत की गहराइयों तक, आईएएस अफसर रवींद्र कुमार के जुनून की कहानी

Book Review: 'The Other Side of Everest' – An IAS Officer's Thrilling Journey from Himalayan Heights to Tibetan Depths

Book Review: ‘एवरेस्ट की दूसरी ओर’ रवींद्र कुमार की एक ऐसी किताब है, जो पाठकों को दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की सैर कराती है और साथ ही जीवन की चुनौतियों को जीतने की प्रेरणा देती है। रवींद्र कुमार एक आईएएस अधिकारी हैं, जो पर्वतारोहण का भी शौक रखते हैं। इस किताब में उन्होंने अपनी एवरेस्ट चढ़ाई और तिब्बत की सांस्कृतिक-अध्यात्मिक यात्रा का रोचक वर्णन किया है। खास तौर पर जोखांग मठ का जिक्र इस किताब को और खास बनाता है।

Book Review: उत्तरी दिशा से एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचे

रवींद्र कुमार एक साधारण परिवार से आते हैं। मेहनत और लगन से वे पहले आईएएस अधिकारी बने और फिर एवरेस्ट जैसे मुश्किल पर्वत को फतह करने का सपना देखा। किताब की शुरुआत में वे बताते हैं कि कैसे उन्होंने 2013 में एवरेस्ट पर चढ़ने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे। यह असफलता उनके लिए हार नहीं थी। कई साल की मेहनत, शारीरिक और मानसिक तैयारी के बाद 2017 में वे तिब्बत की उत्तरी दिशा से एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचे। तिब्बत में एवरेस्ट को चोमोलंगमा कहते हैं, तो नेपाल में इसे सागरमाथा कहा जाता है। नेपाल की तरफ के मुकाबले तिब्बत की तरफ से चढ़ना बेहद मुश्किल माना जाता है और बेहद चुनिंद लोग ही तिब्बत की तरफ से समिट पूरा कर पाते हैं।

किताब का नाम ‘एवरेस्ट की दूसरी ओर’ सिर्फ पर्वत की दूसरी दिशा को नहीं दिखाता, बल्कि यह जीवन के उन पहलुओं की बात करता है, जहां इंसान अपनी कमजोरियों को हराकर कुछ बड़ा हासिल करता है। लेखक कहते हैं, “एवरेस्ट सिर्फ एक पर्वत नहीं, यह जीवन की हर बड़ी चुनौती का प्रतीक है।”

तिब्बत और जोखांग मठ का जादू

इस किताब का एक खास हिस्सा तिब्बत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक झलक है। जब लेखक ल्हासा, जो तिब्बत की राजधानी है, पहुंचे, तो वे जोखांग मठ गए। यह मठ तिब्बती बौद्ध धर्म का बहुत महत्वपूर्ण केंद्र है। लेखक इसे “शांति और ऊर्जा का स्थान” कहते हैं। उनके शब्दों में, मठ में कदम रखते ही उन्हें एक अनोखी शांति मिली, जैसे सारी चिंताएं गायब हो गईं।

जोखांग मठ का निर्माण 7वीं सदी में राजा सोंगत्सेन गम्पो ने करवाया था। यह तिब्बती कला और वास्तुकला का शानदार नमूना है। लेखक बताते हैं कि 1966 में सांस्कृतिक क्रांति के दौरान इस मठ को काफी नुकसान हुआ था, लेकिन 1972 से 1980 तक इसे फिर से बनाया गया। आज यह मठ तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

लेखक लिखते हैं, “मठ के आसपास तीर्थयात्रियों की भीड़ और उनकी आस्था को देखकर मुझे अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिली। यह अनुभव किसी ध्यान साधना जैसा था।” यह वर्णन पाठकों को तिब्बत की संस्कृति और आध्यात्मिकता के करीब ले जाता है। यह किताब को सिर्फ पर्वतारोहण की कहानी से कहीं ज्यादा बनाता है।

दिल को छू लेती है किताब

रवींद्र कुमार की लेखन शैली बहुत आसान और दिल को छूने वाली है। पर्वतारोहण जैसे जटिल विषय को भी उन्होंने इतने सरल तरीके से लिखा है कि कोई भी आम पाठक इसे समझ सकता है। उनकी लेखनी में हिमालय की बर्फीली चोटियां, ठंडी हवाएं और मुश्किल रास्ते जैसे जीवंत हो उठते हैं। पाठक को ऐसा लगता है जैसे वह खुद एवरेस्ट की चढ़ाई कर रहा हो।

लेखक ने सिर्फ पर्वतारोहण की बातें ही नहीं लिखीं, बल्कि अपने डर, अकेलापन और आत्मविश्वास की कमी जैसे मानसिक संघर्षों को भी खुलकर बताया है। वे लिखते हैं कि कैसे उन्होंने इन कमजोरियों को हराकर खुद को मजबूत किया। यह किताब सिर्फ शारीरिक मेहनत की कहानी नहीं, बल्कि मन की ताकत और आत्मविश्वास की जीत की कहानी है।

‘एवरेस्ट की दूसरी ओर’ एक ऐसी किताब है, जो हर पाठक को प्रेरित करती है। लेखक का मानना है कि असफलता कोई अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। उनकी 2013 की नाकाम कोशिश और फिर 2017 में मिली सफलता इस बात का सबूत है। वे कहते हैं कि अगर आपके पास साहस, मेहनत और धैर्य है, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं।

यह किताब खास तौर पर उन युवाओं के लिए है, जो असफलता से डरकर अपने सपने छोड़ देते हैं। लेखक का यह अनुभव बताता है कि मेहनत और लगन से हर शिखर को छुआ जा सकता है। चाहे वह एवरेस्ट की चोटी हो या जीवन का कोई और बड़ा लक्ष्य। लेखक का यह संदेश है कि अगर आपने ठान लिया, तो कोई भी मुश्किल आपको रोक नहीं सकती।

किताब का हर पन्ना देता है नई प्रेरणा और उत्साह

यह किताब हर तरह के पाठकों के लिए है। जो लोग साहसिक कहानियां पसंद करते हैं, उनके लिए इसमें एवरेस्ट की चढ़ाई का रोमांच है। जो लोग संस्कृति और आध्यात्मिकता में रुचि रखते हैं, उनके लिए तिब्बत और जोखांग मठ का वर्णन एक अनमोल अनुभव है। और जो लोग जीवन में प्रेरणा ढूंढ रहे हैं, उनके लिए यह किताब एक मार्गदर्शक है। लेखक ने अपनी कहानी को इतने रोचक तरीके से लिखा है कि पाठक इसे एक बार शुरू करने के बाद खत्म किए बिना नहीं रह सकता। किताब का हर पन्ना नई प्रेरणा और उत्साह देता है।

‘एवरेस्ट की दूसरी ओर’ एक ऐसी किताब है, जो रोमांच, आध्यात्मिकता और प्रेरणा का मिश्रण है। रवींद्र कुमार ने अपनी इस किताब में न सिर्फ अपनी एवरेस्ट यात्रा को साझा किया, बल्कि तिब्बत की संस्कृति और जोखांग मठ की आध्यात्मिकता को भी खूबसूरती से पेश किया। यह किताब सिर्फ एक पर्वतारोही की कहानी नहीं, बल्कि हर उस इंसान की कहानी है, जो अपने सपनों को सच करना चाहता है।

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यह किताब हर उस व्यक्ति को पढ़नी चाहिए, जो अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता है। यह न केवल एक यात्रा की कहानी है, बल्कि आत्म-खोज और आत्मविश्वास की एक प्रेरक गाथा है। रवींद्र कुमार की यह किताब हमें सिखाती है कि अगर मन में ठान लिया जाए, तो कोई भी शिखर दूर नहीं।

इस बार हिंडन हिंडन एयरबेस पर होगा Air Force Day 2025, ऑपरेशन सिंदूर की कामयाबी के बाद भारत दिखाएगा आसमान में दम!

Air Force Day 2025 at Hindon: India to Showcase Power Post Operation Sindoor
Credit: IAF

Air Force Day 2025: भारतीय वायुसेना (IAF) का सबसे बड़ा आयोजन, वायुसेना दिवस, इस बार फिर से गाजियाबाद के हिंडन एयरफोर्स स्टेशन पर होने जा रहा है। हर साल 8 अक्टूबर को मनाया जाने वाला यह दिन वायुसेना के जवानों की बहादुरी और समर्पण को सम्मान देने का मौका होता है। इस बार यह आयोजन इसलिए भी खास है, क्योंकि यह हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर की शानदार सफलता के बाद हो रहा है। सूत्रों के मुताबिक, हिंडन एयरबेस पर इस समारोह को भव्य बनाने की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं।

Air Force Day 2025: हिंडन पर वापसी क्यों है खास?

हिंडन एयरबेस लंबे समय तक वायुसेना दिवस का मुख्य केंद्र रहा है। साल 2021 तक यह आयोजन हर साल यहीं होता था, लेकिन 2022 से इसे देश के अलग-अलग हिस्सों में आयोजित करने का फैसला लिया गया। इसका मकसद था कि ज्यादा से ज्यादा लोग इस आयोजन से जुड़ सकें और वायुसेना की ताकत को करीब से देख सकें। 2022 में चंडीगढ़, 2023 में प्रयागराज और 2024 में चेन्नई में यह समारोह हुआ। इस बदलाव के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सुझाव था कि सेना और अर्धसैनिक बलों के बड़े आयोजन देश के अलग-अलग हिस्सों में हों, ताकि हर क्षेत्र के लोग इसे देख सकें और गर्व महसूस करें।

लेकिन इस बार वायुसेना दिवस की हिंडन में वापसी अपने आप में एक बड़ा संदेश है। हिंडन एयरबेस वायुसेना के इतिहास और गौरव का प्रतीक है। साथ ही, हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर में इस एयरबेस की अहम भूमिका ने इसे फिर से सुर्खियों में ला दिया है। इसीलिए इस बार हिंडन को चुना गया है, ताकि देश और दुनिया को भारत की ताकत का एक बार फिर अहसास हो सके।

ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बाद बड़ा आयोजन

इस साल का वायुसेना दिवस इसलिए भी खास है, क्योंकि यह ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बाद पहला बड़ा आयोजन होगा। 7 मई 2025 को भारत ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जवाब देने के लिए ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था। इस हमले में 26 लोग मारे गए थे, जिसमें ज्यादातर पर्यटक थे। इसके जवाब में भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में आतंकियों के 9 ठिकानों पर सटीक हमले किए। इन ठिकानों में लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठनों के बड़े शिविर शामिल थे।

ऑपरेशन सिंदूर में हिंडन एयरबेस ने अहम भूमिका निभाई। यहां से विमानों को भेजा गया और पूरी रणनीति को अंजाम दिया गया। इस दौरान हिंडन के सिविल टर्मिनल से कमर्शियल उड़ानों को रोक दिया गया था, ताकि कोई जोखिम न हो। अधिकारियों ने बताया कि यह कदम सुरक्षा के लिए उठाया गया था, क्योंकि यह टर्मिनल मिलिट्री एयरबेस के अंदर ही है। अभी यहां से 16 उड़ानें चलती हैं, जो बड़े शहरों को जोड़ती हैं, और एयर इंडिया एक्सप्रेस मुख्य एयरलाइन है।

पाकिस्तान ने इस हमले का जवाब देने की कोशिश की और भारतीय सैन्य ठिकानों पर ड्रोन और गोलीबारी से हमला किया। लेकिन भारतीय वायुसेना ने इसका करारा जवाब दिया। 9 और 10 मई की रात को वायुसेना ने पाकिस्तान के 11 बड़े एयरबेस को निशाना बनाया, जिसमें नूर खान एयरबेस भी शामिल था। इन हमलों में ब्रह्मोस मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया, जिन्होंने पाकिस्तानी ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया। पाकिस्तान ने दावा किया कि उसने भारत के आदमपुर एयरबेस और वहां तैनात S-400 एयर डिफेंस सिस्टम को नुकसान पहुंचाया, लेकिन 13 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद आदमपुर पहुंचे और इन दावों को झूठा साबित कर दिया। पीएम मोदी C-130J सुपर हरक्यूलस विमान से आदमपुर के रनवे पर उतरे, जहां S-400 सिस्टम को लॉन्च करते हुए दिखाया गया। इस घटना ने भारत की ताकत को दुनिया के सामने ला दिया।

वायुसेना दिवस में क्या होगा खास?

8 अक्टूबर को होने वाले वायुसेना दिवस के समारोह में कई शानदार प्रदर्शन देखने को मिलेंगे। इस दिन हिंडन एयरबेस पर फ्लाईपास्ट का आयोजन होगा, जिसमें वायुसेना अपनी ताकत का प्रदर्शन करेगी। फाइटर जेट्स जैसे सुखोई-30 MKI, मिग-29 और तेजस हवा में अलग-अलग फॉर्मेशन में उड़ान भरेंगे। इसके अलावा ट्रांसपोर्ट विमान जैसे C-17 ग्लोबमास्टर और C-130J सुपर हरक्यूलस भी अपनी ताकत दिखाएंगे।

इस बार का फ्लाईपास्ट इसलिए भी खास होगा, क्योंकि इसमें ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल हुए विमानों और हथियारों का प्रदर्शन भी हो सकता है। सूत्रों के मुताबिक, इस समारोह में ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम और सुखोई-30 MKI विमानों को खास तौर पर दिखाया जा सकता है, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर में बड़ी भूमिका निभाई। साथ ही, वायुसेना के जवान हवा में हैरतअंगेज करतब दिखाएंगे, जो दर्शकों को रोमांचित कर देंगे।

इस आयोजन में वायुसेना के इतिहास और इसकी उपलब्धियों को भी दिखाया जाएगा। एक खास प्रदर्शनी का आयोजन होगा, जिसमें वायुसेना के पुराने विमानों, हथियारों और तकनीक की झलक देखने को मिलेगी। साथ ही, ऑपरेशन सिंदूर की सफलता को एक वीडियो के जरिए दिखाया जाएगा, जिसमें इस ऑपरेशन की पूरी कहानी को समझाया जाएगा।

देशभर से लोग होंगे शामिल

वायुसेना दिवस का यह समारोह न सिर्फ वायुसेना के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का पल होगा। हिंडन में होने की वजह से दिल्ली-एनसीआर के आसपास के लोग आसानी से इस आयोजन का हिस्सा बन सकेंगे। साथ ही, इस बार इसे ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए इसका सीधा प्रसारण भी किया जाएगा। दूरदर्शन और कई न्यूज चैनल इस समारोह को लाइव दिखाएंगे, ताकि देश के कोने-कोने में बैठे लोग इसे देख सकें।

इसके अलावा, स्कूलों और कॉलेजों के छात्रों को खास तौर पर आमंत्रित किया जाएगा, ताकि वे वायुसेना की ताकत को देख सकें और उनमें देशभक्ति की भावना जागे। वायुसेना के अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के आयोजन नई पीढ़ी को सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित करते हैं।

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हिंडन एयरबेस दिल्ली-एनसीआर में स्थित है और देश की राजधानी के करीब होने की वजह से रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। कई बड़े ऑपरेशनों में हिंडन ने अहम भूमिका निभाई है, जिसमें ऑपरेशन सिंदूर भी शामिल है। इस एयरबेस की वापसी वायुसेना के लिए एक तरह से घर वापसी जैसी है, जो इसके गौरव को और बढ़ा रही है।

Galwan Visit: नॉर्दन कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा क्यों गए गलवान और देपसांग, क्या वहां इंडिया गेट बनाने की है तैयारी?

Galwan Visit: Northern Commander Lt Gen Prateek Sharma Visits Galwan and Depsang

Galwan Visit: भारतीय सेना की नॉर्दन कमांड के नए कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा ने हाल ही में गलवान और देपसांग का दौरा किया। नॉर्दन कमांड का कार्यभार संभालने के बाद लेह में स्थित 14 कोर में यह उनका पहला आधिकारिक दौरा था, जिसमें उन्होंने फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स की यूनिट्स और फॉर्मेशन्स के साथ मुलाकात की और इलाके की सुरक्षा स्थिति का जायजा लिया। इस दौरे की खास बात यह रही कि वह गलवान घाटी भी गए, जहां 15 जून 2020 की देर रात भारत औऱ चीनी सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प में भारतीय सेना के 20 जवान शहीद हो गए थे। वहीं गलवान को अगले महीने पर्यटकों के लिए भी खोला जाना है।

Galwan Visit: गलवान घाटी क्यों गए कमांडर?

लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा ने 30 अप्रैल 2025 को ऑपरेशन सिंदूर के दौरान नॉर्दन आर्मी कमांडर का पदभार संभाला था। वे लेफ्टिनेंट जनरल एमवी सुचिंद्र कुमार की जगह पर नियुक्त हुए हैं, जो 30 अप्रैल को ही रिटायर हो गए। 22 मई 2025 को लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा ने गलवान घाटी और आसपास के इलाकों का दौरा किया। कमांडर बनने के बाद यहां उनका यह पहला आधिकारिक दौरा था। यह इलाका लद्दाख में तैनात त्रिशूल डिविजन का हिस्सा है। इस दौरान उन्होंने लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) के पास तैनात जवानों से मुलाकात की और उनकी तैयारियों का जायजा लिया।

नॉर्दन कमांड के आधिकारिक एक्स हैंडल से साझा की गई तस्वीरों में लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा को सैनिकों के साथ बातचीत करते और इलाके की स्थिति को समझते देखा जा सकता है। वहीं दूसरी फोटो में लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा देपसांग बुल्ज में रॉक क्लांइबिंग इक्विपमेंट्स पहने जवानों की हौसला अफजाई करते दिख रहे हैं।

नॉर्दन कमांड ने अपनी पोस्ट में लिखा है, “सैनिकों की लगन की सराहना
लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा, सेना कमांडर, #नॉर्दर्नकमांड ने #फायरफ्यूरीकॉर्प्स के तहत संरचनाओं और इकाइयों का दौरा किया ताकि परिचालन तैयारियों और सुरक्षा उपायों की समीक्षा की जा सके।
सेना कमांडर ने सैनिकों की लगन और समर्पण की तारीफ की और उन्हें परिचालन प्रभावशीलता और पेशेवरता के उच्चतम मानकों को बनाए रखने के लिए प्रेरित किया।”

रिटायर्ड मेजर जनरल सुधाकर जी, जो महार रेजिमेंट के पूर्व कर्नल और पूर्वी लद्दाख में 3 डिवीजन के कमांडर रह चुके हैं, उन्होंने कहा कि यह साइकोलॉजिकल वारफेयर का हिस्सा है। उन्होंने बताया कि कोई भी नया कमांडर उन क्षेत्रों में अवश्य जाता है, जहां तनाव या गतिरोध हो। यह सेना का रणनीतिक तौर-तरीका है। नॉर्दन कमांडर जैसे वरिष्ठ सैन्य अधिकारी इस इलाके का दौरा इसलिए करते हैं ताकि वे खुद वहां की स्थिति को समझ सकें और सैनिकों की तैयारियों का जायजा ले सकें।

क्या भव्य मेमोरियल बनाने की है तैयारी?

नॉर्दन कमांड के आधिकारिक एक्स हैंडल से साझा की गई तस्वीरों में लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा अपने गलवान दौरे के दौरान वहां बने मेमोरियल भी गए। गलवान घाटी में गलवान नदी के किनारे शहीद स्मारक (मेमोरियल) का निर्माण 15 जून 2021 को पूरा हुआ था। यह स्मारक 15-16 जून 2020 को गलवान घाटी में भारत-चीन सैन्य झड़प में शहीद हुए 20 भारतीय सैनिकों की स्मृति में बनाया गया है। वहीं लगता है कि अब इस स्मारक को रेजांग-ला वॉर मेमोरियल की तरह भव्य बनाने की तैयारी है।

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नॉर्दन कमांड की तरफ से जारी एक फोटो में वॉर मेमोरियल के मॉडल को दिखाया गया है। जिसे देख कर अनुमान लगाया जा रहा है कि सरकार वहां शहीदों की याद में बड़ा मेमोरियल बनाने की तैयारी कर रही है। फोटो दो प्रोटोटाइप दिखाई दे रहे हैं। वहीं दूसरा प्रोटोटाइप कुछ खास दिखाई दे रहा हैं। उसमें इंडिया गेट बना हुआ दिखाई दे रहा है। संभव है कि वहां जाने वाले पर्यटकों को इंडिया गेट गलवान में भी देखने को मिल सकता है। वहीं लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा के साथ फायर एंड फ्यूरी यानी 14 कोर के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल हितेश भल्ला भी पीछे खड़े दिखाई दे रहे हैं।

15 जून से खुलेगाा गलवान!

भारतीय थलसेना दिवस पर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने ‘भारत रणभूमि दर्शन’ नाम का एक खास प्रोग्राम शुरू किया था। इस प्रोग्राम का मकसद रणक्षेत्र टूरिज्म को बढ़ावा देना है, ताकि लोग ऐतिहासिक युद्ध स्थलों को देख सकें और शहीदों की वीरता को जान सकें। इसके लिए एक वेबसाइट भी बनाई गई है, जिसका नाम ‘भारत रणभूमि दर्शन’ ही रखा गया है।

सेना से जुड़े सूत्रों ने बताया कि पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी को 15 जून 2025 से पर्यटकों के लिए खोलने की योजना है। यह क्षेत्र, जो वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास है, अभी यहां जाना प्रतिबंधित है। उन्होंने बताया कि मार्च में तापमान -5 डिग्री तक पहुंचने पर काम शुरू होगा, और मई के अंत तक पर्यटकों के लिए व्यवस्था तैयार हो जाएगी। गलवान घाटी में शहीद हुए सैनिकों की याद में एक मेमोरियल बनाया गया है। यह मेमोरियल दुर्बुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी (DSDBO) रोड पर श्योक गांव से करीब 100 किलोमीटर दूर है। DSDBO रोड, जो 256 किलोमीटर लंबी है, पर गलवान वॉर मेमोरियल KM 120 पोस्ट के पास स्थित है। अभी तक इस सड़क पर सिर्फ श्योक गांव तक ही आम लोगों को जाने की इजाजत थी। 2020 के बाद से इस इलाके में स्थानीय लोगों और सेना के अलावा किसी को भी आने की अनुमति नहीं दी गई थी। अब इस प्रोग्राम के जरिए लोग इन जगहों को देख सकेंगे और शहीदों को श्रद्धांजलि दे सकेंगे।

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इस रास्ते में अभी रहने-खाने की सुविधा नहीं है, लेकिन मौसम अनुकूल होने पर अस्थायी स्ट्रक्चर, कैफेटेरिया, गेस्ट हाउस और व्यू पॉइंट बनाए जाएंगे। स्थानीय लोग होम स्टे शुरू करने के इच्छुक हैं, और सिविल प्रशासन इस दिशा में काम कर रहा है। मेमोरियल को भी रिनोवेट किया जा रहा है। अभी गलवान जाने के लिए इनर लाइन परमिट जरूरी है, लेकिन पर्यटन शुरू होने पर इसे हटा दिया जाएगा, हालांकि रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होगा। 15,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित गलवान के लिए 6 दिन का एक्लेमटाइजेशन जरूरी होगा, जिसकी पालना चेक पॉइंट्स पर सुनिश्चित की जाएगी।

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गलवान में तैनात सैनिकों को बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। ऊंचाई पर स्थित यह इलाका ठंडा और दुर्गम है, जहां ऑक्सीजन की कमी और कठोर मौसम सैनिकों के लिए रोज की चुनौती है। ऐसे में कमांडर का दौरा सैनिकों के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन होता है। यह दौरे यह भी सुनिश्चित करते हैं कि सैनिकों के पास जरूरी संसाधन, हथियार और तकनीक मौजूद हों, ताकि वे किसी भी स्थिति से निपट सकें।

Indian Parliamentary Delegation: भारत 32 देशों में ही क्यों भेज रहा सभी दलों के सांसदों का प्रतिनिधिमंडल? इससे पीएम मोदी की ग्लोबल इमेज को होगा क्या फायदा?

Indian Parliamentary Delegation: Why India is Sending All-Party MPs to 32 Nations and How It Boosts PM Modi's Global Image
Credit: India in Japan on X

Indian Parliamentary Delegation: 22 अप्रैल को पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत ने पहले तो ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों ध्वस्त किया, उसके बाद पाकिस्तानी सेना की जवाबी कार्रवाई का भी मुंहतोड़ जवाब दिया। वहीं पाकिस्तान को डिप्लोमेटिक स्तर पर घेरने की तैयारी है। जिसके तहत भारत ने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक समर्थन जुटाने और आतंकवाद के प्रति अपनी जीरो टॉलरेंस नीति को मजबूत करने के लिए सात सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल 32 देशों की यात्रा पर भेजा है। इनमें से तीन प्रतिनिधिमंडल अपनी यात्रा शुरू भी कर चुके हैं। इस मुहिम में 59 सांसद शामिल हैं, जिनमें से 31 सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और 20 विपक्षी दलों से हैं। प्रत्येक प्रतिनिधिमंडल के साथ कम से कम एक पूर्व डिप्लोमेट भी शामिल है, जो डिप्लोमेटिक डायलॉग और स्ट्रेटेजिक कम्यूनिकेशन में मदद करेंगे।

Indian Parliamentary Delegation: बनाए सात प्रतिनिधिमंडल

इन सात प्रतिनिधिमंडलों का नेतृत्व देश के प्रमुख राजनेता कर रहे हैं। पहला समूह भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बैजयंत जय पांडा के नेतृत्व में है, जबकि दूसरा समूह बीजेपी के ही रविशंकर प्रसाद के नेतृत्व में काम करेगा। तीसरे समूह की कमान जनता दल (यूनाइटेड) के संजय झा संभाल रहे हैं, और चौथे समूह का नेतृत्व शिवसेना के श्रीकांत शिंदे करेंगे। पांचवें समूह की अगुवाई कांग्रेस सांसद शशि थरूर को सौंपी गई है, जबकि छठा समूह द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) की सांसद कनिमोई करुणानिधि के नेतृत्व में है। सातवें और अंतिम समूह का नेतृत्व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) की नेता सुप्रिया सुले कर रही हैं।

इन देशों की करेंगे यात्रा

यह कूटनीतिक अभियान भारत के लिए कई मायनों में अहम है। इसका मुख्य उद्देश्य लश्कर के मुखौटा संगठन द रजिस्टेंस फ्रंट यानी TRF को UNSC की 1267 सेंक्शन्स कमेटी के तहत आतंकवादी संगठन घोषित करवाना है। पहलगाम आतंकी हमले में 26 पर्यटक मारे गए थे, और पहले उसकी जिम्मेदारी TRF ने ली थी, लेकिन बाद में खुद पर एक साइबर अटैक की बात कह कर अपनी बात से पलट गया था।

ये प्रतिनिधिमंडल 32 देशों और क्षेत्रों की यात्रा करेंगे, जिनका चयन खास रणनीति के तहत किया गया है। मध्य पूर्व में सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और कतर जैसे देश शामिल हैं। यूरोप में यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, इटली, डेनमार्क, यूरोपीय संघ, स्पेन, ग्रीस, स्लोवेनिया और लातविया इस अभियान का हिस्सा हैं। एशिया में इंडोनेशिया, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, जापान और सिंगापुर जैसे देशों को चुना गया है। अफ्रीका से अल्जीरिया, लाइबेरिया, कांगो, सिएरा लियोन, इथियोपिया और दक्षिण अफ्रीका इस सूची में शामिल हैं। अमेरिका महाद्वीप से संयुक्त राज्य अमेरिका, पनामा, गुयाना, ब्राजील और कोलंबिया का चयन किया गया है। इसके अलावा, रूस भी इस सूची में शामिल है। इन देशों का चयन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये या तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के वर्तमान या भविष्य के सदस्य हैं या फिर भारत के प्रमुख रणनीतिक और व्यापारिक साझेदार हैं।

क्या है पूर्व राजनयिकों की राय

इन देशों के चयन के रणनीतिक महत्व को लेकर पूर्व राजनयिक प्रभु दयाल (रिटायर्ड), “भारत 32 देशों में संसदीय प्रतिनिधिमंडल भेज रहा है। इसका कारण यह है कि ये सभी देश निर्णय लेने की प्रक्रिया में बहुत महत्वपूर्ण हैं। ये देश या तो वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के सदस्य हैं या अगले साल या 2027 में इसके सदस्य बनेंगे।” प्रभु दयाल इससे पहले संयुक्त राज्य अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र, पाकिस्तान, मिस्र और ईरान जैसे देशों में सेवाएं दे चुके हैं।

उन्होंने आगे कहा, “ये सभी देश इस साल, 2026 या 2027 में UNSC में डिसिजन मेकर के तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। आतंकवाद के मामले में इनका रुख हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये देश इस मुद्दे पर निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।”

चीन क्यों नहीं भेजा डेलीगेशन?

चीन UNSC का स्थायी सदस्य है, जबकि पाकिस्तान इसके 10 गैर-स्थायी सदस्यों में से एक है। फिर भी, भारत ने बीजिंग या इस्लामाबाद में कोई प्रतिनिधिमंडल नहीं भेजा। 25 अप्रैल को, पाकिस्तान और चीन ने UNSC पर दबाव बनाकर द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF) को प्रेस स्टेटमेंट से हटवाया, जबकि भारत ने इसका कड़ा विरोध किया था।

भारत TRF को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 सेंक्शन्स कमेटी के तहत आतंकवादी संगठन घोषित करवाने के लिए सक्रिय रूप से अभियान चला रहा है। इसके लिए भारत ने न्यूयॉर्क में एक टेक्निकल टीम भेजी थी, जो 1267 सेंक्शन्स कमेटी के मॉनिटरिंग टीम और संयुक्त राष्ट्र के सहयोगी देशों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र कार्यालय काउंटर-टेरेरिज्म (UNOCT) और काउंटर-टेरेरिज्म कमेटी एक्जीक्यूटिव डायरेक्टरेट (CTED) के साथ बैठकें कर चुकी है।

UNSC चीन और पाकिस्तान का विरोध

पूर्व राजनयिक अनिल त्रिगुणायत (रिटायर्ड) ने बताया कि UNSC में 15 सदस्य हैं, और भारत के प्रतिनिधिमंडल इनमें से चीन और पाकिस्तान को छोड़कर बाकी सभी देशों की यात्रा कर रहे हैं। उन्होंने बताया, “ये प्रतिनिधिमंडल उन देशों में जा रहे हैं, जो हमारे रणनीतिक और व्यापारिक साझेदार हैं। TRF को आतंकवादी संगठन घोषित करने का मामला संयुक्त राष्ट्र में जाएगा, जहां पाकिस्तान इसका विरोध करेगा और चीन तकनीकी रूप से इसे रोकने की कोशिश करेगा। ऐसे में यह भारत के लिए महत्वपूर्ण है कि इन देशों को अपने पक्ष में लाया जाए, ताकि पाकिस्तान का असली चेहरा सामने आए।”

प्रभु दयाल ने आगे कहा, “पाकिस्तान से प्रायोजित आतंकवादी गतिविधियां हमारे लिए एक बड़ा मुद्दा बन रही हैं। हम इसे UNSC में मजबूती से उठाना चाहते हैं। इसलिए हम उन देशों तक पहुंच रहे हैं, जो या तो स्थायी सदस्य हैं या इस साल, अगले साल या 2027 में गैर-स्थायी सदस्य होंगे।” उन्होंने यह भी जोड़ा, “इस पहल का मुख्य उद्देश्य इन देशों को हमारी चिंताओं के प्रति जागरूक करना और आतंकवाद के मुद्दे पर निर्णय लेने में उन्हें अपने पक्ष में लाना है।”

UNSC के मौजूदा सदस्य

P5 देशों (अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम) के अलावा, UNSC के 10 नॉन परमानेंट मेंबर्स में अल्जीरिया, डेनमार्क, ग्रीस, गुयाना, पाकिस्तान, पनामा, दक्षिण कोरिया, सिएरा लियोन, स्लोवेनिया और सोमालिया शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 6 जून 2024 को हुए मतदान में 2026-2027 के लिए सुरक्षा परिषद के पांच नए गैर-स्थायी सदस्यों का चयन किया है। ये देश हैं- कनाडा, जर्मनी, थाईलैंड, उगांडा, और वेनेजुएला। इनका कार्यकाल 1 जनवरी 2026 से शुरू होकर 31 दिसंबर 2027 तक चलेगा।

सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं, जिनमें 5 स्थायी (चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन, और अमेरिका) और 10 गैर-स्थायी सदस्य शामिल हैं। गैर-स्थायी सदस्यों का चुनाव हर साल पांच सीटों के लिए होता है, ताकि दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व हो सके। इस बार कनाडा और जर्मनी पश्चिमी यूरोप और अन्य क्षेत्र से, थाईलैंड एशिया-प्रशांत से, उगांडा अफ्रीका से, और वेनेजुएला लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र से चुने गए हैं।

ये नए सदस्य अल्जीरिया, गुयाना, दक्षिण कोरिया, सिएरा लियोन, और स्लोवेनिया की जगह लेंगे, जिनका कार्यकाल 31 दिसंबर 2025 को खत्म होगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए अहम फैसले लेती है, और इन नए सदस्यों की भूमिका अगले दो सालों में महत्वपूर्ण होगी।

क्या यह कदम पीएम मोदी की छवि को और मजबूत करेगा?

सरकार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस अभियान का मकसद साफ है, पाकिस्तान के आतंकवाद प्रायोजन को वैश्विक मंच पर उजागर करना और TRF को UNSC की 1267 सेंक्शन्स कमेटी के तहत आतंकवादी संगठन घोषित करवाना। लेकिन इस अभियान का एक और बड़ी खूबी है, जो राजनीतिक और कूटनीतिक दोनों रूप से महत्वपूर्ण है। वह है विपक्षी नेताओं की भागीदारी।

विपक्षी नेताओं का इस अभियान में शामिल होना भारत के आतंकवाद विरोधी रुख में एकता का प्रतीक है। शशि थरूर, कनिमोई करुणानिधि, और सुप्रिया सुले जैसे प्रमुख विपक्षी चेहरों का नेतृत्व वैश्विक समुदाय को यह संदेश देता है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत का राजनीतिक वर्ग एकजुट है। इससे न केवल भारत की कूटनीतिक ताकत बढ़ती है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस छवि को भी मजबूत करती है, जिसमें वे सभी दलों को साथ लेकर चलने वाले नेता के रूप में दिखते हैं।

सूत्रों के मुताबिक, इस अभियान से मोदी की छवि को कई तरह से फायदा हो सकता है। सबसे पहले, यह वैश्विक मंच पर भारत को एक मजबूत और एकजुट राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करता है, जहां सत्तारूढ़ और विपक्षी दल एक संवेदनशील मुद्दे पर कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। यह संदेश उन देशों के लिए खासा प्रभावी है, जो भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को महत्व देते हैं। दूसरा, यह मोदी की कूटनीतिक रणनीति को और मजबूत करता है, जिसमें वे न केवल भारत की आवाज को वैश्विक मंच पर बुलंद करते हैं, बल्कि विपक्ष को भी राष्ट्रीय हितों के लिए साथ लाते हैं।

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इसके अलावा, यह अभियान मोदी सरकार की आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस नीति को और मजबूत करता है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद विपक्षी नेताओं को इस अभियान में शामिल करना यह दर्शाता है कि भारत का यह कदम केवल एक सरकार का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का है। यह पूरी दुनिया को यह भरोसा होगा कि भारत आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई में पूरी तरह प्रतिबद्ध और एकजुट है।

Army Air Defence: ऑपरेशन सिंदूर में जब दो महिला कमांडिंग ऑफिसर्स बनीं ‘काली माता’, हवा में पस्त हुए पाकिस्तान के ड्रोन और मिसाइल

Army Air Defence: Women COs Crush Pak Drones in Operation Sindoor
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Army Air Defence: ऑपरेशन सिंदूर के जरिए भारत ने न केवल पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को कड़ा जवाब दिया, बल्कि इस ऑपरेशन ने दुनियाभर के सामने भारत की अचूक सैन्य ताकत का भी लोहा मनवाया। इस ऑपरेशन में जहां कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह दुनिया के सामने भारतीय सेनाओं का प्रमुख चेहरा थीं, तो पर्दे के पीछे भी महिला सैनिक अफसरों की भूमिका कम नहीं थी। एक ऐसी ही कहानी दो महिला कर्नल की है, जिन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता से पाकिस्तान को धूल चटाई। हालांकि दोनों महिला कमांडिंग ऑफिसर्स के लिए यह पहला युद्ध था, लेकिन बावजूद इसके उन्होंने अपनी यूनिट को कमांड किया और पाकिस्तान के हमलों को भरपूर जवाब दिया।

Army Air Defence: 6-7 मई की रात को शुरू हुआ था ऑपरेशन सिंदूर

इन दोनों महिला कमांडिंग ऑफिसर्स ने भारतीय सेना की एयर डिफेंस यूनिट्स का नेतृत्व करते हुए पाकिस्तान के मिसाइल और ड्रोन हमलों को नाकाम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत 7 मई की सुबह हुई, जब भारतीय सेना और भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में नौ आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए। इन हमलों में 100 से अधिक आतंकवादी मारे गए। यह ऑपरेशन पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जवाब था, जिसके बाद दोनों देशों के बीच चार दिनों तक जबरदस्त सैन्य टकराव देखा गया। इस दौरान लड़ाकू विमानों, मिसाइलों, ड्रोनों, लॉॉन्ग रेंज आर्टिलरी और भारी हथियारों का इस्तेमाल हुआ। 10 मई को दोनों पक्षों के बीच समझौता होने के बाद युद्धविराम लागू हुआ।

इस दौरान पाकिस्तान ने भारत के उत्तरी और पश्चिमी हिस्सों में कई स्थानों, जैसे अवंतिपुरा, श्रीनगर, जम्मू, चंडीगढ़, पठानकोट, अमृतसर, कपूरथला, जालंधर, लुधियाना, आदमपुर, बठिंडा, सूरतगढ़, नल, फलोदी, उत्तरलाई और भुज पर हमले करने की कोशिश की। लेकिन भारत के मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम ने इन सभी हमलों को विफल कर दिया। इस ऑपरेशन में दो महिला कर्नलों ने अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवाया।

पठानकोट और सूरतगढ़ में पाक हमलों को रोका

ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना की 25 एयर डिफेंस यूनिट्स में से दो का नेतृत्व दो महिला कर्नलों ने किया। एक कर्नल ने पंजाब के पठानकोट में और दूसरी ने राजस्थान के सूरतगढ़ में अपनी यूनिट की अगुवाई की। ये दोनों स्थान पाकिस्तानी हमलों के प्रमुख निशाने पर थे, लेकिन इन महिला अधिकारियों ने अपनी सूझबूझ और साहस से दुश्मन के इरादों को नाकाम कर दिया।

इन दोनों महिला कर्नलों ने लगभग दो साल पहले अपनी यूनिट की कमान संभाली थी। प्रत्येक यूनिट में करीब 800 जवान हैं, और ये दोनों एकमात्र महिला कमांडिंग ऑफिसर हैं। सूत्रों के अनुसार, इन अधिकारियों ने युद्ध के दौरान असाधारण नेतृत्व का प्रदर्शन किया। उनकी यूनिट्स ने सैन्य और नागरिक क्षेत्रों, यहां तक कि धार्मिक स्थलों को निशाना बनाने वाले पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइल हमलों को नेस्तानाबूद कर दिया।

120 महिलाएं भारतीय सेना में कमांडिंग ऑफिसर

भारतीय सेना ने 2023 में एक स्पेशल सिलेक्शन बोर्ड के जरिए 108 महिला अधिकारियों को कर्नल के पद पर प्रमोट किया था। यह कदम जेंडर इक्वलिटी को बढ़ावा देने और महिलाओं को कमांड की भूमिकाएं सौंपने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल थी। वर्तमान में, लगभग 120 महिलाएं भारतीय सेना में कमांडिंग ऑफिसर के रूप में सेवा दे रही हैं, जिनमें से 60 फीसदी उत्तरी और पूर्वी कमांड जैसे संवेदनशील इलाकों में तैनात हैं, जो भारत की सीमाओं की सुरक्षा कर रही हैं।

महिलाओं को सेना में केवल मिलिट्री पुलिस कोर में अग्निवीर के तौर पर शामिल किया जाता है। लेकिन कर्नल रैंक तक पहुंचने वाली इन महिला अधिकारियों ने यह साबित कर दिया कि वे किसी भी चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में पुरुषों के बराबर प्रदर्शन कर सकती हैं। ऑपरेशन सिंदूर में इन दो महिला कर्नलों का नेतृत्व इसका जीताजागता उदाहरण है।

अग्निवीरों का भी शानदार प्रदर्शन

ऑपरेशन सिंदूर में अग्निवीरों ने भी जमकर अपनी बहादुरी दिखाई। लगभग 3,000 अग्निवीर, जिनकी उम्र करीब 20 वर्ष है और जिन्हें पिछले दो वर्षों में भर्ती किया गया था, ने एयर डिफेंस सिस्टम को ऑपरेट करने में अहम भूमिका निभाई। अग्निपथ योजना के तहत भर्ती इन सैनिकों ने युद्ध के दौरान कई तरह की जिम्मेदारियां दी गई थीं।

Pakistan Air Defence: पाक एयर डिफेंस की 2022 की चूक बनी भारत की जीत का हथियार! ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस के आगे क्यों फेल हुआ पाकिस्तान का सुरक्षा कवच?

जून 2022 में शुरू अग्निपथ योजना के तहत सैनिकों को चार साल के लिए भर्ती किया जाता है, जिसमें से 25% को नियमित सेवा में 15 साल के लिए बनाए रखने का प्रावधान है। ऑपरेशन सिंदूर में अग्निवीरों ने स्वदेशी एयर डिफेंस कंट्रोल और रिपोर्टिंग सिस्टम, आकाशतीर, को ऑपरेट करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस सिस्टम ने पाकिस्तानी मिसाइलों और ड्रोनों का पता लगाने, उनकी पहचान करने और उन्हें नष्ट करने में अहम भूमिका निभाई।