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Defence Ministry Advisory: रक्षा मंत्रालय की सख्त चेतावनी; सीनियर अफसरों और उनके परिवारों की प्राइवेसी का सम्मान करे मीडिया!

Defence Ministry Advisory: Strict Warning to Media to Respect Privacy of Senior Officers and Families

Defence Ministry Advisory: रक्षा मंत्रालय ने एक महत्वपूर्ण एडवाइजरी जारी करते हुए सभी मीडिया संस्थानों से आर्म्ड फोर्सेज के वरिष्ठ अधिकारियों और उनके परिवारों की निजता का सम्मान करने की अपील की है। यह एडवाइजरी ऐसे समय में आई है, जब हाल के दिनों में ऑपरेशन सिंदूर जैसे सैन्य अभियानों के दौरान वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और उनके परिवारों की निजी जिंदगी में मीडिया की बढ़ती दखलअंदाजी को देखते हुए उठाया गया है। मंत्रालय ने सभी मीडिया संगठनों से इस एडवाइजरी का सख्ती से पालन करने का आग्रह किया है, ताकि सैन्य कर्मियों की गरिमा, गोपनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

Defence Ministry Advisory: मीडिया की भूमिका को सराहा, लेकिन जिम्मेदारी की याद दिलाई

रक्षा मंत्रालय ने अपने एडवाइजरी में सबसे पहले मीडिया की भूमिका की सराहना की है। मंत्रालय ने कहा कि भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की गतिविधियों, उपलब्धियों और बलिदानों को जनता तक पहुंचाने में मीडिया ने हमेशा अहम भूमिका निभाई है। मीडिया ने न केवल सैन्य बलों के शौर्य को उजागर किया है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर जनता को जागरूक करने में भी योगदान दिया है। लेकिन इसके साथ ही मंत्रालय ने यह भी कहा कि मीडिया को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी, खासकर तब जब बात सैन्य अधिकारियों और उनके परिवारों की निजता की हो।

एडवाइजरी में साफ कहा गया है कि यह सक्षम प्राधिकरण की मंजूरी के साथ जारी की गई है और इसे तत्काल प्रभाव से लागू करने के निर्देश दिए गए हैं।

इंटरव्यू के लिए न करें संपर्क

रक्षा मंत्रालय के जनसंपर्क निदेशालय (डीपीआर) की तरफ से इस एडवाइजरी में चार मुख्य बिंदुओं पर जोर दिया गया है। पहला, मीडिया को आर्म्ड फोर्सेज के सेवारत या सेवानिवृत्त कर्मियों के निजी आवासों पर जाने या उनके परिवारों से व्यक्तिगत कहानियों या साक्षात्कार के लिए संपर्क करने से बचने के लिए कहा गया है। मंत्रालय ने साफ किया है कि ऐसा तभी किया जा सकता है, जब आधिकारिक चैनलों के माध्यम से अनुमति दी गई हो। दूसरा, मीडिया को सैन्य कर्मियों के परिवारों के निजी विवरण, जैसे आवासीय पते, पारिवारिक सदस्यों की तस्वीरें, या अन्य गैर-ऑपरेशनल जानकारी को प्रकाशित करने या प्रसारित करने से रोकने का निर्देश दिया गया है। तीसरा, मीडिया से अपील की गई है कि वे अपनी कवरेज को आर्म्ड फोर्सेज की पेशेवर और ऑपरेशनल गतिविधियों तक सीमित रखें और निजी जिंदगी के बारे में अनुमानित या दखलअंदाजी वाली खबरों से बचें। चौथा, सक्रिय अभियानों या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील समय के दौरान गोपनीयता और ऑपरेशनल गोपनीयता की सीमाओं का सम्मान करने पर जोर दिया गया है। खास तौर पर सक्रिय सैन्य अभियानों या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील समय में गोपनीयता और निजता का विशेष ध्यान रखना होगा। मंत्रालय ने कहा कि ऐसे समय में छोटी सी चूक भी बड़ा खतरा बन सकती है।

निजता पर बढ़ता खतरा

एडवाइजरी में खास तौर पर ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र किया गया है। इस अभियान के दौरान कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने अपनी नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन किया, जिसके चलते वे जनता और मीडिया की नजरों में आ गए। लेकिन मंत्रालय ने चिंता जताई कि इस बढ़ते ध्यान ने अधिकारियों और उनके परिवारों की निजता को खतरे में डाल दिया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ मीडिया कर्मियों ने सैन्य अधिकारियों के घरों तक पहुंचने की कोशिश की और उनके परिवार के सदस्यों से संपर्क करने की कोशिश की। कई बार उनके निजी जीवन से जुड़ी ऐसी जानकारियां प्रकाशित की गईं, जो न तो जनता के हित में थीं और न ही जरूरी थीं। मंत्रालय ने इसे बेहद अनुचित और संभावित रूप से खतरनाक बताया। एडवाइजरी में कहा गया कि ऐसे कदम न केवल अधिकारियों और उनके परिवारों की सुरक्षा को खतरे में डालते हैं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी असर डाल सकते हैं।

प्राइवेसी का सम्मान सभी की जिम्मेदारी

रक्षा मंत्रालय ने इस परामर्श में साफ किया है कि आर्म्ड फोर्सेस के सीनियर अफसर भले ही सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हों, लेकिन उनके परिवार निजी नागरिक हैं और उनकी गोपनीयता का सम्मान करना सभी की जिम्मेदारी है। मंत्रालय ने कहा, “हम मीडिया की भूमिका की सराहना करते हैं, जो सशस्त्र बलों की गतिविधियों, उपलब्धियों और बलिदानों को जनता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान देता है। लेकिन यह भी जरूरी है कि इस प्रक्रिया में सैन्य कर्मियों और उनके परिवारों की गरिमा और निजता का ख्याल रखा जाए।”

इस परामर्श को लेकर सैन्य विशेषज्ञों और पत्रकारों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। रिटायर्ड मेजर जनरल अजय शर्मा ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा, “यह एक जरूरी और स्वागतयोग्य कदम है। सैन्य कर्मी अपनी जान जोखिम में डालकर देश की सेवा करते हैं। ऐसे में उनकी निजी जिंदगी को सुर्खियों में लाना न केवल अनुचित है, बल्कि उनकी सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा कर सकता है। मीडिया को यह समझना होगा कि सैन्य सेवा की अपनी सीमाएं और गोपनीयता होती है।”

एक सीनियर अफसर ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “हमारी सेना के जवान देश की रक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं। उनके परिवार पहले से ही बहुत तनाव में रहते हैं। ऐसे में अगर मीडिया उनके निजी जीवन में दखल देगा, तो यह उनके लिए और मुश्किलें खड़ी कर देगा।”

मीडिया की स्वतंत्रता पर पाबंदी

वहीं, कुछ पत्रकारों का मानना है कि यह परामर्श मीडिया की स्वतंत्रता पर एक तरह की पाबंदी है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हमें सैन्य कर्मियों की निजता का सम्मान करना चाहिए, लेकिन कई बार उनकी व्यक्तिगत कहानियां जनता को प्रेरित करती हैं। अगर हम पूरी तरह से निजी जिंदगी को कवर करने से रोक दिए गए, तो यह हमारी पत्रकारिता की आजादी पर भी सवाल खड़ा करता है।”

एक प्रमुख समाचार चैनल के संपादक ने कहा, “हम रक्षा मंत्रालय के इस कदम का स्वागत करते हैं। यह सही है कि हमें सैन्य बलों की निजता का सम्मान करना चाहिए। हम अपनी कवरेज को पेशेवर रखने की पूरी कोशिश करेंगे।” वहीं, कुछ पत्रकारों ने इस पर चिंता भी जताई कि इससे सैन्य गतिविधियों पर खबरें प्रकाशित करने में मुश्किलें आ सकती हैं। लेकिन मंत्रालय ने भरोसा दिलाया है कि वह जरूरी सूचनाएं उपलब्ध कराने में कोई कमी नहीं करेगा।

सोशल मीडिया पर भी इस एडवाइजरी को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। कई नागरिकों ने इसे सही कदम बताया है। एक यूजर ने लिखा, “हमारे सैनिक देश के लिए इतना कुछ करते हैं। कम से कम उनकी निजता तो बरकरार रहनी चाहिए। मीडिया को थोड़ा संवेदनशील होना चाहिए।” वहीं, कुछ लोगों ने कहा कि मीडिया को भी अपनी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, लेकिन यह स्वतंत्रता निजता को भंग करने की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।

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यह पहली बार नहीं है जब रक्षा मंत्रालय को इस तरह का कदम उठाना पड़ा है। अतीत में भी कई बार सैन्य अभियानों के दौरान मीडिया की अति उत्साहपूर्ण कवरेज को लेकर चिंताएं जताई गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह परामर्श सही दिशा में एक कदम है, लेकिन इसके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए मीडिया और मंत्रालय के बीच बेहतर संवाद की जरूरत होगी।

IHI XF9-1 Engine for AMCA: जापान ने भारत के AMCA प्रोग्राम के लिए पेश किया अपना IHI XF9-1 इंजन, 6th जनरेशन फाइटर जेट्स में भी हो सकेगा इस्तेमाल

Indian AMCA fighter jet: Indian firms submit bids with DRDO to build 5th-gen fighter aircraft

IHI XF9-1 Engine for AMCA: भारत के महत्वाकांक्षी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोग्राम को लेकर एक नई खबर सामने आई है। जापान ने भारत को उसके AMCA प्रोग्राम के लिए अपने अत्याधुनिक IHI XF9-1 इंजन की पेशकश की है। यह इंजन भारतीय वायुसेना (IAF) के अगले 5.5-जेनरेशन स्टील्थ फाइटर जेट को पॉवर दे सकता है। जापान ने इस इंजन के जॉइंट डेवलपमेंट और भारत में ही प्रोडक्शन करने का प्रस्ताव दिया है। इस पेशकश के साथ जापान AMCA के इंजन डेवलपमेंट में सहयोग करने वाला चौथा देश बन गया है।

IHI XF9-1 Engine for AMCA: क्या है AMCA प्रोग्राम?

AMCA भारत का पहला स्वदेशी स्टील्थ फाइटर जेट प्रोग्राम है, जिसे डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) मिलकर डेवलप कर रहे हैं। इसका मकसद भारतीय वायुसेना के पुराने विमानों, जैसे मिग-21 और जगुआर, को रिप्लेस करना है। AMCA एक 5.5-जेनरेशन फाइटर जेट होगा, जो स्टील्थ (रडार से बचने की क्षमता), सुपरक्रूज़ (बिना आफ्टरबर्नर के सुपरसोनिक स्पीड), और मल्टी-रोल मिशन (हवा से हवा और हवा से जमीन पर हमला) करने में सक्षम होगा। इस जेट को 2035 तक पूरी तरह से तैयार करने का लक्ष्य है, और इसके प्रोटोटाइप 2028 तक उड़ान भर सकते हैं।

लेकिन इस प्रोग्राम की सबसे बड़ी चुनौती है एक ऐसा पावरफुल इंजन ढूंढना है, जो AMCA की जरूरतों को पूरा कर सके। अभी तक AMCA के प्रोटोटाइप में जनरल इलेक्ट्रिक F414 इंजन का इस्तेमाल करने की योजना है, जो 98 kN थ्रस्ट देता है। लेकिन यह एक अस्थायी समाधान है। AMCA के फाइनल वर्जन के लिए भारत को 110-130 kN थ्रस्ट वाले इंजन की जरूरत है, जो सुपरक्रूज़ और स्टील्थ फीचर्स को सपोर्ट कर सके।

जापान का IHI XF9-1 इंजन: क्या है खास?

जापान ने भारत को अपने IHI XF9-1 इंजन की पेशकश की है, जो एक लो-बायपास आफ्टरबर्निंग टर्बोफैन इंजन है। इसे जापान की IHI कॉरपोरेशन और जापान की एक्विजिशन, टेक्नोलॉजी एंड लॉजिस्टिक्स एजेंसी (ATLA) ने मिलकर बनाया है। इस इंजन का प्रोटोटाइप 2018 में तैयार हुआ था और यह 11 टन (107 kN) का ड्राई थ्रस्ट और 15 टन (147 kN) का थ्रस्ट आफ्टरबर्नर के साथ देता है। खास बात यह है कि इस इंजन को और बेहतर बनाया जा सकता है, जिससे यह 20 टन (196 kN) तक का थ्रस्ट दे सके। यह इसे न केवल 5.5-जेनरेशन जेट्स के लिए, बल्कि भविष्य के सिक्स्थ जेनरेशन फाइटर जेट्स के लिए भी इस्तेमाल हो सकता है।

भारत की गैस टरबाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) AMCA के लिए ऐसा इंजन चाहती है जो 120 kN का थ्रस्ट और 73-75 kN का ड्राई थ्रस्ट दे सके, ताकि सुपरक्रूज संभव हो सके। IHI XF9-1 का ड्राई थ्रस्ट 110 kN के करीब है, जो GTRE की जरूरत से ज्यादा है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इस इंजन को मॉडिफाई करके भारत की जरूरतों के हिसाब से ड्राई थ्रस्ट को कम किया जा सकता है। वहीं, इसका डिज़ाइन ऐसा है कि यह कम हीट सिग्नेचर (इन्फ्रारेड सिग्नल) छोड़ता है, जो स्टील्थ जेट्स के लिए बहुत जरूरी है। यह इंजन जापान ने अपने अगले-जेनरेशन फाइटर प्रोग्राम के लिए बनाया गया था, लेकिन अब जापान इसे भारत के साथ साझा करने को तैयार है।

जापान का ऑफर: भारत के लिए क्यों खास?

जापान ने यह ऑफर ऐसे समय पर दिया है, जब भारत AMCA के लिए इंजन की खोज में कई देशों से बातचीत कर रहा है। जापान से पहले अमेरिका (GE F414 और F110), फ्रांस (साफरान M88), और ब्रिटेन (रॉल्स-रॉयस) ने भी अपने इंजन ऑफर किए थे। जापान ने कहा है कि वह भारत में इस इंजन का प्रोडक्शन करने और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करने को तैयार है। यह भारत की मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत पहल के अनुरूप है। इससे भारत को न सिर्फ इंजन मिलेगा, बल्कि उसे बनाने की तकनीक भी सीखने का मौका मिलेगा।

वहीं, XF9-1 का डिज़ाइन इतना एडवांस्ड है कि यह भविष्य में 6ठी-जेनरेशन फाइटर जेट्स के लिए भी काम आ सकता है। यानी यह एक ऐसा निवेश है, जो भारत को लंबे समय तक फायदा देगा। भारत और जापान पहले से ही इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में साझा हित साझा करते हैं। दोनों देश चीन की बढ़ती ताकत को संतुलित करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। यह सहयोग रक्षा क्षेत्र में दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूत करेगा।

AMCA प्रोग्राम में अब तक क्या हुआ?

AMCA प्रोग्राम की शुरुआत 2010 में हुई थी। शुरू में इसे 20 टन कैटेगरी का जेट माना गया था, लेकिन अब यह 25 टन कैटेगरी का फाइटर जेट है। 2024 में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने इस प्रोजेक्ट के लिए 15,000 करोड़ रुपये की मंजूरी दी थी। डिजाइन का काम 2023 में पूरा हो चुका है, और पहला प्रोटोटाइप 2028 तक तैयार होने की उम्मीद है। बड़े पैमाने पर उत्पादन 2035 तक शुरू होने की संभावना है।

कावेरी इंजन का हाल

भारत ने अपने स्वदेशी कावेरी इंजन प्रोग्राम पर कई सालों से काम किया है, जिसे गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (GTRE) लीड कर रहा है। लेकिन यह प्रोग्राम अभी तक पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है। कावेरी इंजन जरूरी थ्रस्ट लेवल हासिल नहीं कर पाया, और इसे AMCA जैसे हाई-परफॉर्मेंस जेट के लिए इस्तेमाल करना मुश्किल है। इस वजह से भारत को विदेशी सहयोग की जरूरत पड़ रही है। जापान के साथ सहयोग से भारत को नई तकनीक सीखने का मौका मिलेगा, जो भविष्य में कावेरी प्रोग्राम को भी बेहतर करने में मदद कर सकता है।

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हालांकि जापान का ऑफर भले ही आकर्षक हो, लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं। जापान की रक्षा तकनीक पर सख्त निर्यात नियम हैं, क्योंकि वह शांति का पक्षधर है। हालांकि, खासकर चीन की बढ़ती सैन्य मौजूदगी को देखते हुए हाल के सालों में जापान ने इन नियमों में ढील दी है। जापान पहले से ही यूके और इटली के साथ ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम (GCAP) में शामिल है। अगर भारत और जापान इस डील को अंतिम रूप दे देते हैं, तो यह दोनों देशों के बीच एक नई साझेदारी की शुरुआत होगी।

Explained: यूक्रेन का Operation Spider Web क्यों है भारत के लिए बड़ा सबक? पढ़ें ‘ट्रोजन हॉर्स’ अटैक की पूरी कहानी

Why Ukraine's 'Operation Spider Web' is a Big Lesson for India? Read the Full Story of the 'Trojan Horse' Attack
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Operation Spider Web: यूक्रेन और रूस के बीच पिछले तीन साल तीन महीने से युद्ध चल रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत 24 फरवरी 2022 को हुई थी, जब रूस ने यूक्रेन पर बड़े पैमाने पर हमला शुरू किया। हालांकि दोनों देशों के बीच तनाव 2014 से ही चल रहा था, जब रूस ने क्रीमिया पर कब्जा कर लिया था और डोनबास क्षेत्र में संघर्ष शुरू हुआ था। कुल मिला कर दोनों के बीच पिछले 11 साल से तनाव जारी है। शांति विराम को लेकर दोनों पक्षों के बीच 2025 में अब तक दो प्रत्यक्ष (16 मई और 2 जून) बैठकें हो चुकी हैं। लेकिन युद्ध बंद करने को लेकर कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। वहीं, दो जून की बैठक से ठीक पहले यूक्रेन ने रूस में ड्रोन से एक बड़ा हमला किया, जिसमें रूस के लगभग 41 स्ट्रैटेजिक बॉम्बर्स को खड़े-खड़े नष्ट कर दिया। इसे नाम दिया गया ऑपरेशन स्पाइडर वेब। इस ऑपरेशन ने न केवल रूस की सैन्य ताकत को बड़ा झटका दिया, बल्कि यह भी दिखाया कि आधुनिक युद्ध में छोटी और सस्ती तकनीकें कितनी प्रभावी हो सकती हैं। आइए, समझते हैं कि कैसे यूक्रेन ने रूस के एक तिहाई स्ट्रैटेजिक बॉम्बर विमानों को निशाना बनाया।

क्या था Operation Spider Web?

ऑपरेशन स्पाइडर वेब (Operation Spider Web) यूक्रेन की एक ऐसी सैन्य रणनीति थी, जिसमें छोटे-छोटे ड्रोन का इस्तेमाल करके रूस के सैन्य ठिकानों पर हमला किया गया। ये ड्रोन इतने छोटे और सस्ते थे कि इन्हें आसानी से छिपाया जा सकता था, लेकिन इनकी ताकत इतनी थी कि ये रूस के बड़े-बड़े स्ट्रैटेजिक बॉम्बर विमानों को नष्ट करने में सक्षम थे। अनुमान के मुताबिक एक ड्रोन की कीमत करीब 50000 रुपये है। यूक्रेन ने अपने 40,000 ड्रोन सैनिकों में से कुछ को इस मिशन के लिए चुना।

इस ऑपरेशन की सबसे खास बात यह थी कि इन ड्रोनों को रूस की सीमा के अंदर छिपाकर ले जाया गया और फिर वहां से हमला किया गया। यहां कि फ्रंटलाइन से 4000 किमी दूर साइबेरिया में मौजूद रूसी एयरबेस पर भी जहाजों को निशाना बनाया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूक्रेन ने दावा किया कि इस हमले में रूस के 117 ड्रोन और 117 ऑपरेटर शामिल थे, जिन्होंने मिलकर 41 रूसी विमानों को तबाह कर दिया। इससे रूस के रणनीतिक बमवर्षकों के बेड़े का लगभग एक-तिहाई हिस्सा नष्ट हो गया। इन सैनिकों ने रूस की सीमा में घुसकर ड्रोनों को छिपाने और लॉन्च करने का काम किया। इस ऑपरेशन में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने भी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कहा, “यह हमारी सबसे बड़ी सफलता है। हमने दिखा दिया कि छोटे हथियार भी बड़े नुकसान पहुंचा सकते हैं।”

ऑपरेशन का पहला चरण: ड्रोनों को रूस में भेजना

ऑपरेशन (Operation Spider Web) की शुरुआत यूक्रेन के सैनिकों ने रूस की सीमा में घुसकर की। इसके लिए यूक्रेन ने खास तरह के ड्रोन इस्तेमाल किए, जिन्हें फर्स्ट-पर्सन व्यू (FPV) ड्रोन कहा जाता है। ये ड्रोन कैमरे से लैस होते हैं, जिससे ऑपरेटर दूर बैठकर ड्रोन को कंट्रोल कर सकता है और सीधे निशाना साध सकता है। इन ड्रोनों को रूस की सीमा में ले जाने के लिए यूक्रेन ने ट्रकों का इस्तेमाल किया।

इन ट्रकों को रूस की सीमा के पास ले जाया गया, जहां से सैनिकों ने ड्रोनों को छिपाने का काम शुरू किया। ड्रोनों को रूस के सैन्य ठिकानों के पास जंगलों, गांवों और छोटे-छोटे घरों में छिपाया गया। इस काम में स्थानीय लोगों की मदद भी ली गई, जो रूस के खिलाफ थे और यूक्रेन का समर्थन कर रहे थे। एक बार ड्रोन छिप जाने के बाद, सैनिकों ने इन्हें मोबाइल नेटवर्क के जरिए कंट्रोल करने की तैयारी शुरू की।

ऑपरेशन का दूसरा चरण: हमले की तैयारी

ड्रोनों को छिपाने के बाद यूक्रेन के सैनिकों ने रूस के सैन्य ठिकानों की सही जानकारी जुटाई। इसके लिए सैटेलाइट तस्वीरों और जासूसी का सहारा लिया गया। रूस के जो स्ट्रैटेजिक बॉम्बर विमान इस ऑपरेशन के निशाने पर थे, वे मुख्य रूप से पांच हवाई ठिकानों पर मौजूद थे जिनमें मुरमांस्क, इवानोवो, रियाज़ान, अमूर और इरकुत्स्क शामिल थे।

इन ठिकानों पर रूस के 41 विमान मौजूद थे, जिनमें से ज्यादातर स्ट्रैटेजिक बॉम्बर थे। ये विमान लंबी दूरी तक मिसाइल दागने में सक्षम थे और यूक्रेन के लिए बड़ा खतरा थे। यूक्रेन की रणनीति थी कि इन विमानों को नष्ट करके रूस की हवाई ताकत को कमजोर किया जाए। ड्रोन हमले में रूस के 57 अरब डॉलर के सैन्य विमानों को नष्ट कर दिया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक रूस के जो 41 एयरक्राफ्ट नष्ट हुए उनमें ए-50 अर्ली वार्निंग प्लेंस, TU-23M3, TU-95 जैसे स्ट्रैटेजिक बॉम्बर्स भी थे। रूस के पास अब 100 से कम स्ट्रैटेजिक बॉम्बर्स बचे हैं। यह रूस के स्ट्रैटेजिक बॉम्बर बेड़े का 34% हिस्सा था।

ड्रोनों को इन ठिकानों तक पहुंचाने के लिए यूक्रेन ने रात का समय चुना। सैनिकों ने ट्रकों के जरिए ड्रोनों को ठिकानों के पास पहुंचाया और फिर वहां से ड्रोनों को लॉन्च किया। ड्रोन इतने छोटे थे कि रूस के रडार सिस्टम इन्हें पकड़ नहीं सके। जैसे ही ट्रक लक्ष्य के पास पहुंचे, उनकी छत खुली और ड्रोन बाहर निकलकर एक साथ एयरबेस पर टूट पड़े। इन हमलों में छोटे-छोटे FPV ड्रोन इस्तेमाल हुए, जिनकी कीमत मात्र 40,000 से 50,000 रुपये के बीच थी, लेकिन असर टैंक या मिसाइल जितना था।

ऑपरेशन का तीसरा चरण: हमला और नुकसान

जब ड्रोन रूस के हवाई ठिकानों तक पहुंचे, तो उन्होंने एक साथ हमला शुरू कर दिया। ये सभी ड्रोन विस्फोटकों से लैस थे, जो विमानों को नष्ट करने के लिए काफी थे। यूक्रेन के सैनिकों ने 117 ड्रोनों का इस्तेमाल किया, जिसमें से हर ड्रोन ने एक विमान को निशाना बनाया।

हमले में रूस के 41 विमानों को नुकसान पहुंचा, जिसमें से कई पूरी तरह से नष्ट हो गए। रूस की वायु सेना और सुरक्षा बल इस हमले से हैरान रह गए, क्योंकि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि इतने छोटे ड्रोन इतना बड़ा नुकसान कर सकते हैं। इस हमले में रूस के एक तिहाई स्ट्रैटेजिक बॉम्बर विमानों को नुकसान पहुंचा, जो रूस के लिए एक बड़ा झटका था।

ऑपरेशन की सफलता के पीछे क्या था?

इस ऑपरेशन (Operation Spider Web) की सफलता के पीछे कई कारण थे। पहला, यूक्रेन ने सस्ते और छोटे ड्रोनों का इस्तेमाल किया, जिन्हें रूस के रडार सिस्टम पकड़ नहीं सके। दूसरा, यूक्रेन ने रूस की सीमा के अंदर अपनी जासूसी और स्थानीय लोगों की मदद से सही जानकारी जुटाई। तीसरा, इस ऑपरेशन में यूक्रेन के सैनिकों ने बहुत साहस और समझदारी दिखाई। इस हमले की खास बात यह थी कि ड्रोन ट्रकों के अंदर छिपाकर रूस के अंदर भेजे गए थे। ये ट्रक रूस में सामान्य नागरिक ट्रकों की तरह चलाए जा रहे थे। अंदर छिपे ड्रोन को मोबाइल नेटवर्क के जरिए ऑपरेटर कंट्रोल कर रहे थे।

यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने कहा, “यह ऑपरेशन (Operation Spider Web) हमारी तकनीक और साहस का प्रतीक है। हमने दिखा दिया कि युद्ध में ताकत ही सब कुछ नहीं होती, रणनीति भी बहुत मायने रखती है।”

रूस के नुकसान का आकलन

यूक्रेन के जासूसी विभाग SBU के प्रमुख ने कहा कि “रूसी विमानों को बम सहित नष्ट किया गया।” रूस की सेना ने माना कि उनके रडार सिस्टम और एयर डिफेंस सिस्टम छोटे ड्रोनों को पकड़ने में नाकाम रहा। रूस के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि वे अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करेंगे और भविष्य में ऐसे हमलों को रोकने के लिए नए कदम उठाएंगे।

हालांकि, इस हमले से रूस को बड़ा नुकसान हुआ। रूस के स्ट्रैटेजिक बॉम्बर विमान लंबी दूरी तक हमला करने में सक्षम थे, और इनका नष्ट होना रूस की सैन्य ताकत के लिए एक बड़ा झटका था। विशेषज्ञों का कहना है कि रूस को इन विमानों को दोबारा बनाने में कई साल लग सकते हैं, क्योंकि ये विमान बहुत महंगे और जटिल होते हैं।

आधुनिक युद्ध में ड्रोन गेम-चेंजर

ऑपरेशन सिंदूर में (Operation Spider Web) जिस तरह से पाकिस्तान ने भारत पर हमला करने के लिए सस्ते ड्रोनों का इस्तेमाल किया औऱ जिस तरह से यूक्रेन ने रूस के बॉम्बर्स नष्ट किए, उसने यह साबित कर दिया कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन एक गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं। ये ड्रोन न केवल सस्ते होते हैं, बल्कि इन्हें कहीं भी छिपाकर हमला करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इस ऑपरेशन ने दुनिया भर की सेनाओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि वे अपनी सुरक्षा व्यवस्था को कैसे बेहतर करें।

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस ऑपरेशन (Operation Spider Web) ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले युद्धों में ड्रोन और ‘छल’ (Trojan Horse) जैसे हमले निर्णायक भूमिका निभाएंगे। यूक्रेन के इस प्रयोग ने युद्ध की परिभाषा ही बदल दी है। उनका कहना है कि भविष्य में ड्रोन युद्ध और बढ़ेगा। छोटे और सस्ते ड्रोन बड़े हथियारों को नष्ट करने में सक्षम होंगे, जिससे युद्ध की रणनीति पूरी तरह से बदल जाएगी। यूक्रेन ने इस ऑपरेशन के जरिए यह दिखा दिया कि तकनीक और रणनीति का सही इस्तेमाल किसी भी सेना को मजबूत बना सकता है, चाहे वह कितनी भी छोटी क्यों न हो।

भारत में ड्रोन टेक्नोलॉजी

भारत ने हाल के वर्षों में ड्रोन तकनीक पर काफी ध्यान दिया है। भारतीय सेना ने DRDO के जरिए स्वदेशी ड्रोन विकसित किए हैं, जैसे कि रुस्तम-2 और घटक। इसके अलावा, भारत ने इजरायल और अमेरिका से ड्रोन खरीदे हैं, जैसे कि हैरन और प्रेडेटर ड्रोन। 2023 में भारत ने ड्रोन नियमों को आसान बनाया, जिसके बाद निजी कंपनियां भी ड्रोन बनाने में सक्रिय हो गई हैं।

Pakistani propaganda: जब TRF पर मंडराया खतरा तो घबराया पाकिस्तान, कश्मीर में बनाया नया आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान कश्मीर!

हालांकि, भारत को अभी भी बड़े पैमाने पर ड्रोन ऑपरेशन और सस्ते FPV ड्रोनों के इस्तेमाल में काफी काम करने की जरूरत है। यूक्रेन का यह ऑपरेशन भारत को एक रोडमैप देता है कि कैसे सस्ते ड्रोन का इस्तेमाल बड़े दुश्मन के खिलाफ किया जा सकता है।

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Pakistani propaganda: जम्मू-कश्मीर में एक नए आतंकी संगठन का नाम सामने आया है। तहरीक-ए-तालिबान कश्मीर (TTK) तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) का एक हिस्सा होने का दावा करता है और हाल ही में पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) के रावलाकोट के पास हुसैन कोट में हुए एक हमले की जिम्मेदारी भी ले चुका है। लेकिन खास बात यह है कि इस संगठन ने भारत और पाकिस्तान दोनों को कश्मीर पर “कब्जा करने वाला” बताते हुए जिहाद का एलान किया है।

Pakistani propaganda: TTK का बयान: भारत पर निशाना, पाकिस्तान को राहत

तहरीक-ए-तालिबान कश्मीर (TTK) ने हाल ही में एक बयान जारी किया, जिसमें उसने जम्मू-कश्मीर को भारत और पाकिस्तान दोनों के “कब्जे” से मुक्त कराने की बात कही। संगठन के प्रवक्ता मुफ्ती मेहबूब बट सोपोर ने कहा कि उनका मकसद जम्मू-कश्मीर में इस्लामी कानून लागू करना और पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाओं को फैलाना है। उन्होंने यह भी कहा कि उनका जिहाद सिर्फ कश्मीर तक सीमित रहेगा और इसके निशाने पर भारतीय सेना, उसके मुखबिर और सहयोगी होंगे।

अपने बयान में 2004 के बाद से पाकिस्तानी सेना पर जिहादी समूहों और कश्मीर में विद्रोह को दबाने का आरोप लगाया गया। TTK ने इस बात का सबूत देने के लिए “द स्पाई क्रॉनिकल्स” नाम की किताब का हवाला दिया, जिसमें भारत और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों के बीच सहयोग की बात कही गई है। हालांकि, संगठन ने पाकिस्तानी लोगों की कश्मीर के लिए कुर्बानियों की तारीफ की और कहा कि वह लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) को नहीं मानता।

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि TTK ने हाल के पहलगाम हमले को भारतीय सेना का “झूठा ऑपरेशन” करार दिया। उसने दावा किया कि यह हमला बीजेपी और आरएसएस की सियासी साजिश थी, ताकि जम्मू-कश्मीर में जमीन हड़पने और वहां की आबादी को बदलने की कोशिश की जा सके।

क्या है TTK का असली मकसद?

कई जानकार मानते हैं कि यह संगठन असली नहीं है, बल्कि पाकिस्तान की गहरी साजिश का हिस्सा है। उनका कहना है कि TTK ने भले ही भारत और पाकिस्तान दोनों को कश्मीर पर कब्जा करने वाला कहा हो, लेकिन उसका असली निशाना सिर्फ भारत है। पाकिस्तान की आलोचना बस दिखावे की है। उसने पाकिस्तानी सेना पर जिहादी समूहों को दबाने का आरोप लगाया, जो कि पाकिस्तान पहले से ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कहता रहा है, ताकि वह फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) जैसे संगठनों को गुमराह कर सके।

वहीं, TTK ने अपने बयान में बीजेपी और आरएसएस का नाम लिया, जो ठीक वही शब्द हैं, जो पाकिस्तान की विदेश नीति में इस्तेमाल होते हैं। एक नए आतंकी संगठन का इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना सवाल खड़े करता है कि क्या यह संगठन वाकई नया आतंकी संगठन है, या इसके पीछे पाकिस्तान का हाथ है?

इसके अलावा TTK का यह कहना कि पाकिस्तानी सेना जिहाद के खिलाफ है, दरअसल पाकिस्तान को आतंकवाद से जोड़े जाने की जिम्मेदारी से बचाने की कोशिश है। इससे पाकिस्तान यह दिखा सकता है कि वह आतंकवाद का शिकार है, न कि उसका समर्थक। वहीं, TTK ने पहलगाम हमले को भारत की साजिश बताया, जो कि पाकिस्तान की पुरानी रणनीति है। इस तरह के दावे करके पाकिस्तान अपनी जिम्मेदारी से बचता है और भारत पर हमले को स्टेज करने का इल्जाम लगाता है।

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अपने बयान में TTK ने पाकिस्तानी सेना के खिलाफ कुछ भी ठोस कार्रवाई की बात नहीं की। उसका पूरा फोकस भारत पर है, जो यह दिखाता है कि यह संगठन शायद पाकिस्तान की निगरानी में काम कर रहा है। इसके अलावा TTK ने LoC को न मानने की बात कही है। इससे भविष्य में जब यह संगठन भारत में घुसपैठ करता है, तो पाकिस्तान यह कहकर बच सकता है कि यह उसके नियंत्रण से बाहर का संगठन है।

क्या यह पाकिस्तान की साजिश है?

TTK के इस बयान को लेकर कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह पाकिस्तान की गहरी साजिश का हिस्सा है। ऐसा लगता है कि रावलपिंडी में बैठे कुछ लोग इस संगठन को चलाने की स्क्रिप्ट लिख रहे हैं। पहले एक छोटा सा हमला करवाया गया, फिर एक बयान जारी किया गया, जिसमें पाकिस्तान को जिहाद का विरोधी दिखाया गया। इससे पाकिस्तान एक तरफ तो यह दिखाता है कि वह आतंकवाद का शिकार है, और दूसरी तरफ LoC के पार होने वाली गतिविधियों से अपना पल्ला झाड़ लेता है।

हालांकि पाकिस्तान की यह रणनीति नई नहीं है। पाकिस्तान पहले भी कई बार ऐसे संगठनों को सामने लाकर भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियां चलाता रहा है। TTK का बयान और उसकी हरकतें इस बात की ओर इशारा करती हैं कि यह एक तरह का पीआर कैंपेन है, जिसका मकसद भारत को बदनाम करना और पाकिस्तान को बचाना है।

PoJK के हुसैन कोट में एक हमले की ली जिम्मेदारी

TTK ने हाल ही में PoJK के हुसैन कोट में एक हमले की जिम्मेदारी ली थी। लेकिन इस संगठन के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। यह संगठन पहली बार 10 मई, 2025 को सामने आया, जब इसने रावलाकोट के पास हमले की बात कही। इसके बाद अब यह बयान आया है, जिसमें उसने भारत के खिलाफ जिहाद की बात कही। संगठन का दावा है कि वह TTP का हिस्सा है, लेकिन TTP ने अभी तक इसकी पुष्टि नहीं की है।

पहलगाम हमले को बताया साजिश

TTK ने अपने बयान में पहलगाम हमले को भारतीय सेना की साजिश बताया। अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए इस हमले में कई लोग मारे गए थे, जिसके बाद भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया था। भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान समर्थित आतंकियों को जिम्मेदार ठहराया था। लेकिन TTK का यह कहना कि यह हमला भारत ने खुद करवाया। यह पाकिस्तान की पुरानी रणनीति का हिस्सा है।

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पाकिस्तान पहले भी कई बार ऐसे दावे कर चुका है। 2019 के पुलवामा हमले के बाद भी उसने कहा था कि यह भारत की साजिश थी। लेकिन बाद में जांच में साफ हुआ कि हमला जैश-ए-मोहम्मद ने किया था। TTK का यह दावा उसी तरह की रणनीति का हिस्सा लगता है, जिससे पाकिस्तान अपनी जिम्मेदारी से बच सके।

Russia Su-57E India offer: रूस का भारत को बड़ा ऑफर, Su-57E में लगा सकेंगे सुपर-30 वाले कॉन्फिगरेशन, पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर की कमी होगी पूरी

Su-57 fighter jet India
Su-57 Stealth Fighter

Russia Su-57E India offer: फाइटर जेट्स की कमी से जूझ रहे भारत को रूस ने अपनी पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट Su-57E देने का एक नया और आकर्षक प्रस्ताव सामने रखा है। इस बार रूस ने वादा किया है कि इस जेट में भारत की अपनी तकनीक और हथियार सिस्टम को शामिल किया जाएगा। रूस की सरकारी रक्षा कंपनी रोस्टेक के सूत्रों के मुताबिक, Su-57E में भारत के सुपर-30 जेट्स के लिए बनाई जा रही तकनीक, जैसे GaN-बेस्ड AESA रडार और भारत में बना मिशन कंप्यूटर, डाला जाएगा। इससे भारतीय वायुसेना (IAF) इस जेट में अपने स्वदेशी हथियार, जैसे एस्ट्रा मिसाइल और सटीक निशाने वाले हथियारों का इस्तेमाल कर सकेगी।

Russia Su-57E India offer: Su-57E और सुपर-30 का कनेक्शन

Su-57E का यह प्रस्ताव भारतीय वायुसेना के मौजूदा Su-30MKI जेट्स के अपग्रेड प्रोग्राम, जिसे सुपर-30 कहा जा रहा है, उससे जुड़ा है। सुपर-30 में GaN-बेस्ड एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड ऐरे (AESA) रडार और भारत में बनाए मिशन कंप्यूटर जैसे एडवांस सिस्टम लगाए जा रहे हैं। रूस ने कहा है कि Su-57E में भी यही तकनीक इस्तेमाल की जाएगी, ताकि दोनों जेट्स में समानता रहे। इससे न सिर्फ रखरखाव आसान होगा, बल्कि भारतीय वायुसेना को अपने हथियारों, जैसे एस्ट्रा मिसाइल और प्रेसिजन-गाइडेड हथियारों, को Su-57E में आसानी से इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी।

रोस्टेक सूत्रों ने बताया, “Su-57E भारत के लिए एक ऐसा प्लेटफॉर्म हो सकता है, जिसमें सुपर-30 के लिए बनाए गए सिस्टम का इस्तेमाल हो। यह भारत की अपनी तकनीक को युद्ध के लिए तैयार करने में मदद करेगा, साथ ही पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट भी देगा।” यह रणनीति भारत को एडवांस एवियोनिक्स और विपन सिस्टम को जोड़ने में मदद देगी, जो भविष्य में भारत के अपने प्रोग्राम, जैसे AMCA, के लिए फायदेमंद होगा।

HAL नासिक में होगा प्रोडक्शन

रूस ने Su-57E के प्रोडक्शन के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के नासिक प्लांट को चुना है। यह वही प्लांट है, जहां 220 से ज्यादा Su-30MKI जेट्स बनाए जा चुके हैं। नासिक में पहले से मशीनरी और इक्विपमेंट्स मौजूद होने से इसके बनाने में लागत भी कम आएगी। लेकिन, भारत की तकनीक को इस जेट में जोड़ने और इसे पूरी तरह तैयार करने में 3-4 साल का वक्त लग सकता है।

इस बीच, रूस ने तुरंत 20-30 Su-57E जेट्स देने का प्रस्ताव रखा है। इससे भारतीय वायुसेना को तुरंत पांचवीं पीढ़ी का जेट मिलेगा, जो उसकी मौजूदा कमी को पूरा करेगा। साथ ही, नासिक में प्रोडक्शन शुरू होने से भारत में नौकरियां बढ़ेंगी और एयरोस्पेस इंडस्ट्री को बढ़ावा मिलेगा, जिससे ‘आत्मनिर्भर भारत’ को बढ़ावा मिलेगा।

फाइटर जेट्स की कमी

भारतीय वायुसेना इस समय फाइटर जेट्स की कमी से जूझ रही है। पुराने मिग-21 जेट्स रिटायर हो रहे हैं, और स्वदेशी तेजस जेट की डिलीवरी में देरी हो रही है। वायुसेना को 42 स्क्वाड्रन चाहिए, लेकिन अभी केवल 31 हैं। दूसरी तरफ, चीन और पाकिस्तान अपनी हवाई ताकत बढ़ा रहे हैं। चीन का J-20 फाइटर जेट पहले से सर्विस में है, और पाकिस्तान 2029 तक J-31 हासिल करने की योजना बना रहा है।

ऐसे में Su-57E तुरंत एक फायदे का सौदा हो सकता है। यह जेट स्टील्थ (रडार से बचने की क्षमता), सुपरमैन्यूवरेबिलिटी (जेट की तेज गति और चपलता), और एडवांस रडार सिस्टम के साथ आता है। हालांकि, इसकी स्टील्थ क्षमता अमेरिका के F-35 से कम मानी जाती है, लेकिन यह हाइपरसोनिक हथियार ले जाने और 360-डिग्री थ्रस्ट वेक्टरिंग (जेट को किसी भी दिशा में तेजी से मोड़ने की क्षमता) जैसी खूबियों से लैस है। वहीं, जब तक भारत का अपना AMCA जेट तैयार नहीं हो जाता, यह भारतीय वायुसेना के लिए एक ताकतवर हथियार साबित हो सकता है।

AMCA की चुनौतियां

भारत का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट, एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA), एक स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट है। लेकिन इसका पहली टेस्ट उड़ान 2029 में होगी, और प्रोडक्शन 2034-35 से पहले शुरू नहीं होगा। इस लंबी समयसीमा के कारण भारतीय वायुसेना को एक अंतरिम जेट की जरूरत है, और Su-57E इस कमी को पूरा कर सकता है।

Su-57E की खासियतें

Su-57E एक ताकतवर फाइटर जेट है, जो अपनी खास विशेषताओं के लिए जाना जाता है। इसका स्टील्थ डिजाइन रडार से बचने की अच्छी क्षमता देता है, हालांकि यह अमेरिका के F-35 से थोड़ा कम है। इसकी 360-डिग्री थ्रस्ट वेक्टरिंग तकनीक सुपरमैन्यूवरेबिलिटी प्रदान करती है, जिससे यह हवा में तेजी से दिशा बदल सकता है। साथ ही, यह हाइपरसोनिक मिसाइलों और भारी हथियार ले जाने में सक्षम है। इसका GaN-बेस्ड AESA रडार दुश्मन के विमानों और मिसाइलों को दूर से ही पकड़ लेता है। भारत के अपने सिस्टम, जैसे एस्ट्रा मिसाइल और मिशन कंप्यूटर, इसे और ताकतवर बनाएंगे। सुपर-30 जेट्स के साथ समानता होने से रखरखाव और ट्रेनिंग भी आसान होगी।

Su-57E को लेकर यह हैं चुनौतियां

हालांकि रोस्टेक का यह प्रस्ताव आकर्षक है, लेकिन इसमें कुछ चुनौतियां भी हैं। पहली, भारत में Su-57E को पूरी तरह तैयार करने में 3-4 साल लगेंगे। इस दौरान वायुसेना को रूस से खरीदे गए जेट्स पर निर्भर रहना होगा। दूसरी, Su-57E की स्टील्थ क्षमता और इसके नए AL-51 इंजन की तैयारियों को लेकर कुछ सवाल हैं, क्योंकि यह इंजन अभी पूरी तरह डेवलप नहीं हुआ है।

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तीसरे इसके साथ भू-राजनीतिक जोखिम भी हैं। अमेरिका का CAATSA कानून रूस से हथियार खरीदने वाले देशों पर प्रतिबंध लगा सकता है, जो भारत के लिए समस्या बन सकता है। इसके अलावा, Su-30MKI प्रोग्राम में भारत को स्पेयर पार्ट्स और रखरखाव में कुछ दिक्कतें आई थीं, जो Su-57E डील में भी सामने आ सकती हैं। इन सब मुद्दों को हल करना होगा।

CDS on Op Sindoor: सीडीएस चौहान ने मानी फाइटर जेट गिरने की बात, कहा- ऑपरेशन सिंदूर में हुईं गलतियों को समझा, सुधारा और दोबारा हमला किया

CDS on Op Sindoor: Chauhan Admits Fighter Jet Loss, Says Mistakes Fixed and Strikes Repeated
CDS General Anil Chauhan

CDS on Op Sindoor: भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना को कुछ लड़ाकू विमानों का नुकसान हुआ। सिंगापुर में आयोजित शांगरी-ला डायलॉग के दौरान ब्लूमबर्ग टीवी को दिए साक्षात्कार में जनरल चौहान ने कहा, “महत्वपूर्ण यह नहीं कि विमान गिरे, बल्कि यह है कि वे क्यों गिरे। हमने अपनी गलतियों को समझा, उन्हें सुधारा और दो दिन बाद फिर से अपने विमानों को उड़ाकर पाकिस्तान के ठिकानों पर सटीक हमले किए।”

22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए एक आतंकी हमले के जवाब में भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था। पहलगाम हमले में 26 नागरिक, जिनमें ज्यादातर पर्यटक थे, मारे गए। भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों को जिम्मेदार ठहराया। पाकिस्तान ने इन आरोपों से इनकार किया और स्वतंत्र जांच की मांग की। इस हमले ने दोनों देशों के बीच तनाव को बढ़ा दिया, जिसके परिणामस्वरूप भारत ने 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया।

इस अभियान में भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में नौ आतंकी ठिकानों को नष्ट किया, जिसमें कम से कम 100 आतंकवादी मारे गए। इसके बाद चार दिनों तक दोनों देशों के बीच हवाई, ड्रोन, मिसाइल और आर्टिलरी फायर हुए। 9-10 मई की रात को भारतीय वायुसेना ने जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तान के 13 सैन्य ठिकानों और हवाई अड्डों पर हमला किया। इन हमलों में लंबी दूरी की ब्रह्मोस मिसाइलों का उपयोग हुआ। 10 मई को दोनों देशों के बीच समझौते के बाद युद्धविराम हो गया।

CDS on Op Sindoor: पाकिस्तान के दावे को किया खारिज

शांगरी-ला डायलॉग में जनरल चौहान (CDS on Op Sindoor) ने स्पष्ट किया कि 7 मई को ऑपरेशन के पहले दिन भारतीय वायुसेना को कुछ विमानों का नुकसान हुआ। हालांकि, उन्होंने पाकिस्तान के उस दावे को खारिज किया जिसमें कहा गया था कि उसने छह भारतीय विमान, जिनमें चार राफेल शामिल थे, मार गिराए। जनरल चौहान ने कहा, “संख्या महत्वपूर्ण नहीं है। यह समझना जरूरी है कि नुकसान क्यों हुआ। हमने अपनी टैक्टिकल गलतियों को जल्दी समझा, उन्हें ठीक किया और दो दिन बाद फिर से अपने सभी विमानों को उड़ाकर पाकिस्तान के ठिकानों पर सटीक हमले किए।”

उन्होंने बताया कि भारतीय सेना ने 8 और 10 मई को फिर से हमले किए, जिसमें पाकिस्तान के अंदर 300 किलोमीटर गहराई तक भारी हवाई रक्षा वाले ठिकानों को निशाना बनाया गया। “हमने एक मीटर की सटीकता के साथ हमले किए, जिससे पाकिस्तान का डिफेंस सिस्टम बेकार साबित हुआ।”

परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि इस संघर्ष में परमाणु युद्ध का खतरा था और अमेरिका ने इसे टाला। जनरल चौहान (CDS on Op Sindoor) ने इसे “निरर्थक” करार दिया। उन्होंने कहा, “सैन्य कार्रवाइयों और परमाणु हथियारों के इस्तेमाल में बहुत अंतर है। भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत के रास्ते हमेशा खुले रहे, जिसने हालात को संभालने में मदद की।”

उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों की सेनाओं ने इस युद्ध में संयम और तर्कसंगत व्यवहार दिखाया। जनरल चौहान ने स्पष्ट किया, “सेना से जुड़े लोग युद्ध के परिणामों को समझते हैं और इसीलिए वे सोच-समझकर निर्णय लेते हैं। ऑपरेशन सिंदूर में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने की कोई संभावना नहीं थी।”

ताली दोनों हाथों से बजती है

जनरल चौहान (CDS on Op Sindoor) ने स्पष्ट किया कि भारत ने पाकिस्तान के लिए “स्पष्ट रेखाएं” खींच दी हैं। “हमारी भविष्य की कार्रवाइयां इस बात पर निर्भर करेंगी कि पाकिस्तान का व्यवहार कैसा रहता है। अगर भविष्य में कोई और आतंकी हमला हुआ, तो भारत का जवाब तेज और निर्णायक होगा।”

उन्होंने 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नवाज शरीफ को आमंत्रित करने का उदाहरण देते हुए कहा, “हमने कई बार दोस्ती का हाथ बढ़ाया, लेकिन ताली दोनों हाथों से बजती है। अगर जवाब में केवल शत्रुता मिले, तो दूरी बनाए रखना ही बेहतर है।”

बेकार साबित हुए चीन के हथियार

जनरल चौहान (CDS on Op Sindoor) ने पाकिस्तान के उस दावे को भी खारिज किया जिसमें कहा गया था कि चीन और अन्य देशों से मिले हथियार काफी प्रभावी थे। भारत के रक्षा मंत्रालय के एक रिसर्च ग्रुप ने बताया था कि चीन ने पाकिस्तान को एयर डिफेंस और सैटेलाइट सपोर्ट दिया था। लेकिन जनरल चौहान ने कहा, “चीन के हथियार काम नहीं आए। हमारी वायुसेना ने उनकी डिफेंस सिस्टम को भेदकर सटीक हमले किए।”

उन्होंने भारत की स्वदेशी डिफेंस सिस्टम्स जैसे आकाश मिसाइल सिस्टम की तारीफ की। उन्होंने यह भी कहा कि उत्तरी सीमा पर चीन की ओर से कोई असामान्य गतिविधि नहीं देखी गई, जिससे यह साफ हुआ कि चीन ने इस युद्ध में प्रत्यक्ष सैन्य मदद नहीं दी है।

फर्जी खबरों को रोकने में लगी मेहनत

ऑपरेशन सिंदूर (CDS on Op Sindoor) के दौरान सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी गलत सूचनाओं (डिसइन्फॉर्मेशन) का सामना करना। जनरल चौहान ने बताया कि भारतीय सेना ने अपने संसाधनों का 15% हिस्सा फर्जी खबरों को रोकने में लगाया। उन्होंने कहा, “हमारी संचार रणनीति सोची-समझी थी। हमने जल्दबाजी में जवाब देने के बजाय तथ्यों पर आधारित रुख अपनाया। गलत सूचनाएं ऐसी परिस्थितियों में जनता की धारणा को जल्दी बिगाड़ सकती हैं।”

उन्होंने यह भी बताया कि अभियान के शुरुआती दिनों में दो महिला अधिकारियों ने सेना की ओर से प्रवक्ता की भूमिका निभाई, क्योंकि सैन्य नेतृत्व तेजी से चल रहे अभियानों में व्यस्त था। यह रणनीति गलत सूचनाओं को रोकने में प्रभावी रही।

स्वदेशी डिफेंस सिस्टम पर दिया जोर

जनरल चौहान (CDS on Op Sindoor) ने शांगरी-ला डायलॉग में मॉडर्न वारफेयर पर कहा, “आज का युद्ध केवल भूमि, समुद्र और हवा तक सीमित नहीं है। इसमें साइबर और अंतरिक्ष जैसे नए क्षेत्र शामिल हो गए हैं।” उन्होंने भारत के स्वदेशी डिफेंस सिस्टम पर जोर दिया और कहा कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में अपनी तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन किया। उन्होंने भारत की तकनीकी प्रगति पर गर्व जताते हुए कहा, “हमारे पास दुनिया में सबसे ज्यादा STEM स्नातक हैं। हमारे 20 से अधिक IIT हैं। अगर हमें कोई रक्षा समस्या दी जाए, तो हमारे लोग उसका समाधान निकाल सकते हैं।”

वायुसेना सूत्रों ने कही ये बात

वहीं, वायुसेना से जुड़े आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि सीडीएस चौहान (CDS on Op Sindoor) ने ब्लूमबर्ग टीवी पर कहा कि ऑपरेशंस दो दिन के लिए रुक गए थे। लेकिन असलियत कुछ और है। पर्दे के पीछे हमेशा रणनीति के बदलाव होते रहते हैं। इस दौरान एयरफील्ड की पूरी निगरानी और सुरक्षा बनी रही, और जरूरत पड़ने पर सभी गतिविधियां भी चलती रहीं। उन्होंने कहा कि अगर सचमुच फाइटर जेट्स को रोक दिया गया होता, जैसा कि कुछ लोग कह रहे थे, तो जमीन पर हालात बहुत अलग होते। आप सब जानते हैं कि इन रणनीति के फैसलों की छोटी-छोटी बातें सबके साथ शेयर नहीं की जा सकतीं।

कांग्रेस ने मांगा सरकार से जवाब

जनरल चौहान (CDS on Op Sindoor) के बयान के बाद कांग्रेस पार्टी ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, “सीडीएस के बयान ने कई सवाल खड़े किए हैं। सरकार को संसद का विशेष सत्र बुलाकर जवाब देना चाहिए।” तेलंगाना सरकार में मंत्री और पूर्व वायुसेना पायलट उत्तम कुमार रेड्डी ने कहा, “जब राहुल गांधी ने विमानों के नुकसान का सवाल उठाया था, तो उन्हें राष्ट्रविरोधी कहा गया। अब जब सीडीएस ने यह बात स्वीकार की है, तो सरकार को इसे छिपाना बंद करना चाहिए।” उन्होंने पूरे मामले की समीक्षा के लिए एक समिति गठन की मांग की।

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कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने 1999 के कारगिल युद्ध के बाद गठित कारगिल समीक्षा समिति का उदाहरण देते हुए कहा कि ऑपरेशन सिंदूर की समीक्षा के लिए भी ऐसी ही समिति बननी चाहिए। उन्होंने पूछा, “क्या सरकार अब पारदर्शिता दिखाएगी?”

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Pakistan Cyber Attack: Scientist Claims Ability to Hack and Destroy Indian Dams with Missiles

Pakistan cyber attack: पाकिस्तान के नामी परमाणु वैज्ञानिक डॉ. समर मुबारकमंद ने एक ऐसा बयान दिया है, जिसने भारत-पाकिस्तान के बीच पहले से तनावपूर्ण रिश्तों में आग में घी डालने का काम किया है। डॉ. मुबारकमंद को 1998 में चगाई में किए गए पाकिस्तान के परमाणु परीक्षणों और शाहीन मिसाइल कार्यक्रम में अहम योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने दावा किया है कि पाकिस्तान के पास भारत के बांधों, जैसे चिनाब नदी पर बने बगलिहार और सलाल बांधों के कंप्यूटर सिस्टम को हैक करने की तकनीकी क्षमता है। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि अगर भारत ने सिंधु नदी का प्रवाह रोका, तो पाकिस्तान अपनी शाहीन-दो और शाहीन-तीन मिसाइलों से इन बांधों को नष्ट कर सकता है।

Pakistan cyber attack: बस 3 बटन और सिस्टम हैक

29 मई, 2025 को एक यूट्यूब को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “बस 3 बटन… अगर भारत ने पाकिस्तान का पानी रोका तो? मुबारकमंद ने कहा, “अगर भारत हमारे पानी को रोकता है, तो हम साइबर हमले के जरिए बांधों के गेट खोल सकते हैं।” उन्होंने पाकिस्तान की साइबर तकनीकी क्षमताओं पर जोर देते हुए कहा कि उनके पास भारत के रन-ऑफ-द-रिवर बांधों के सिस्टम में सेंध लगाने की ताकत है। इसके साथ ही, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर जरूरत पड़ी, तो पाकिस्तान वायुसेना (PAF) शाहीन-दो (रेंज: 1,500–2,000 किमी) और शाहीन-तीन (रेंज: 2,750 किमी) मिसाइलों का इस्तेमाल करके बगलिहार (900 मेगावाट) और सलाल (690 मेगावाट) जैसे बांधों को नष्ट कर सकती है।

अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने 1960 की सिंधु जल संधि (IWT) को निलंबित कर दिया था। इस संधि के तहत, चिनाब, झेलम और सिंधु नदियों का पानी भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारा होता है। भारत ने निलंबन के बाद चिनाब नदी पर बने बगलिहार और सलाल बांधों के गेट बंद कर दिए, जिसे उसने डिसिल्टिंग और रिफिलिंग का हवाला देकर जरूरी कदम बताया।

पाकिस्तान में खेती पर संकट

पाकिस्तान की इंडस रिवर सिस्टम अथॉरिटी (IRSA) के मुताबिक, मई 2025 के पहले हफ्ते में पाकिस्तान के मराला हेडवर्क्स में पानी का प्रवाह 31,000 क्यूसेक से घटकर 3,100 क्यूसेक रह गया, यानी 90% की कमी दर्ज की गई। चिनाब नदी पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के लिए लाइफलाइन है, जो वहां की 80% कृषि सिंचाई को सपोर्ट करती है। इससे पाकिस्तान में खेती पर संकट छा गया है। पाकिस्तान काउंसिल ऑफ रिसर्च इन वॉटर रिसोर्सेज ने पहले ही चेतावनी दी थी कि 2025 तक देश में पानी की भारी कमी हो सकती है।

डॉ. मुबारकमंद के दावों का सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जमकर मजाक उड़ाया गया है। यूजर्स ने इसे “पाकिस्तान की ख्याली दुनिया” और “हास्यास्पद दावा” करार दिया। कई यूजर्स ने तंज कसते हुए कहा कि अगर पाकिस्तान के पास इतनी एडवांस साइबर तकनीक होती, तो वह अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर करने में इसका इस्तेमाल करता। एक यूजर ने लिखा, “पाकिस्तान को पहले अपनी बिजली और इंटरनेट की समस्या सुलझानी चाहिए, फिर बांध हैक करने की बात करे।”

साइबर हमले का दावा अव्यावहारिक

भारत के रक्षा विशेषज्ञों ने भी इस बयान को गंभीरता से नहीं लिया है। रक्षा विश्लेषक मेजर जनरल (रिटायर्ड) राजीव शर्मा ने कहा, “भारत के बांधों के साइबर सिस्टम अत्यधिक सुरक्षित हैं। इनमें कई परतों वाली सिक्योरिटी और ऑफलाइन बैकअप सिस्टम हैं। साइबर हमले का दावा अव्यावहारिक है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि मिसाइल हमले की धमकी “युद्ध को आमंत्रित करने” जैसी है, जो पाकिस्तान के लिए भारी पड़ सकता है।

पाकिस्तान में पानी की कमी एक गंभीर मुद्दा है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां पानी की उपलब्धता प्रति व्यक्ति सबसे कम है। चिनाब और झेलम नदियां पाकिस्तान की कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। भारत का बांधों पर नियंत्रण और संधि का निलंबन पाकिस्तान के लिए खतरे की घंटी है।

पाकिस्तान के कुछ विशेषज्ञों ने भी इस बयान पर सवाल उठाए हैं। इस्लामाबाद के एक साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञ हसन अली ने कहा, “भारत के बांधों के सिस्टम को हैक करना आसान नहीं। ये सिस्टम जटिल और सुरक्षित हैं। बिना ठोस सबूत के ऐसा दावा करना गैर-जिम्मेदाराना है।”

सेंध लगाना आसान नहीं

भारत के साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत के बांधों के नियंत्रण सिस्टम में सेंध लगाना आसान नहीं। बगलिहार और सलाल जैसे बांधों के गेट्स का ऑपरेशन डिजिटल और मैनुअल दोनों तरह से ऑपरेट होता है। साइबर हमले से बचने के लिए इनमें कई लेयर की सिक्योरिटी होती है, जिसमें एयर-गैप्ड सिस्टम (इंटरनेट से पूरी तरह अलग) शामिल हैं।

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जहां तक मिसाइल हमले की बात है, शाहीन-दो और शाहीन-तीन मिसाइलें निश्चित रूप से लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम हैं। लेकिन भारत की मिसाइल रक्षा प्रणाली, जैसे S-400, और मजबूत हवाई रक्षा तंत्र ऐसे हमलों को नाकाम कर सकते हैं। इसके अलावा, बांधों पर हमला युद्ध के हालात पैदा कर सकता है, जिसके परिणाम दोनों देशों के लिए विनाशकारी हो सकते हैं।

The Sacred Sound Path किताब में खोला राज: स्वर में है संजीवनी, श्री गणपति सचिदानंद स्वामीजी के संगीत से आत्मा का उपचार

The Sacred Sound Path: Healing the Soul Through Swami Ji’s Music

The Sacred Sound Path: संगीत केवल सुरों और तालों का मेल नहीं होता, वह आत्मा की भाषा भी हो सकता है, यह भाव स्पष्ट रूप से झलकता है भारत के पूर्व महालेखा परीक्षक (CAG) के महानिदेशक पी. सेश कुमार की नई पुस्तक The Sacred Sound Path में। यह पुस्तक आध्यात्मिक संत श्री गणपति सचिदानंद स्वामीजी के दिव्य संगीत पर आधारित है, जिसमें बताया गया है कि कैसे संगीत आत्मा और मन को न केवल छू सकता है बल्कि उसे उपचार और परिवर्तन के मार्ग पर भी ले जा सकता है।

The Sacred Sound Path: स्वर नहीं, ऊर्जा का संचार

The Sacred Sound Path में लेखक पी. सेश कुमार बताते हैं कि श्री स्वामीजी का संगीत सिर्फ एक भक्तिपूर्ण या कलात्मक प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह एक नाद ब्रह्म एक कंपनात्मक शक्ति है, जो सीधे श्रोता की चेतना को छूती है। यह संगीत भारतीय वेदों और योग परंपरा में वर्णित नाद चिकित्सा पर आधारित है, जिसमें विशेष रागों का उपयोग कर मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक संतुलन साधा जाता है। यह संगीत केवल रागों और तालों का मिश्रण नहीं, बल्कि एक ऐसी ऊर्जा है जो मानव चेतना को शुद्ध और संतुलित करती है।

शब्दों से परे एक अनुभूति

लेखक के अनुसार, श्री स्वामीजी के संगीत में जो कंपन होता है, वह केवल कानों से सुना नहीं जाता, बल्कि यह शरीर और आत्मा के हर कोने में प्रवेश करता है। यह कोई सामान्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक उपचार प्रक्रिया है। यह दुख, चिंता और मानसिक बोझ को बिना किसी शब्द के ही पिघला देता है। यही वजह है कि इसे गुरु की कृपा का सजीव रूप “श्रव्य करुणा” (Audible Compassion) कहा गया है।

योगिक ज्ञान से उत्पन्न संगीत

पुस्तक में नाद चिकित्सा की प्राचीन अवधारणा को विस्तार से समझाया गया है। नाद चिकित्सा योग और वेदों की वह परंपरा है, जिसमें विशेष रागों और ध्वनियों का उपयोग मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए किया जाता है। श्री स्वामीजी अपने संगीत के माध्यम से इन रागों को इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि वे श्रोताओं के भावनात्मक और मानसिक स्तर पर गहरा प्रभाव डालते हैं। उदाहरण के लिए, राग भैरवी शांति और स्थिरता प्रदान करता है, जबकि राग दरबारी कनारा मानसिक तनाव को कम करने में सहायक होता है।

दिलचस्प बात यह है कि श्री स्वामीजी को संगीत की पारंपरिक शिक्षा नहीं मिली थी। वेदों और राग-रागिनी विद्या का जो ज्ञान उन्होंने प्राप्त किया है, वह साधारण नहीं बल्कि गहन ध्यान, तपस्या और आत्मिक अनुभूति का परिणाम है। वे अपने अंदर उत्पन्न मौन की ध्वनि को संसार में साझा करते हैं-यह उनकी आत्मा की भाषा है।

Raga Sagara: सामूहिक ध्यान और उपचार

लेखक बताते हैं कि स्वामीजी के संगीत समारोह, जिन्हें Raga Sagara के नाम से जाना जाता है, बल्कि सामूहिक ऊर्जा उपचार सत्र होते हैं। इन आयोजनों में स्वामीजी विभिन्न वाद्य यंत्रों जैसे वीणा, तबला, और सिंथेसाइज़र का उपयोग करते हैं, जिससे एक ऐसी ध्वनि उत्पन्न होती है जो श्रोता के मन को शांत करती है। इन आयोजनों में पैदा होने वाली ध्वनि तरंगें न केवल व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि पूरे वातावरण को प्रभावित करती हैं। वहां मौजूद हर व्यक्ति, चाहे उसकी भाषा या संस्कृति कुछ भी हो, मानसिक शांति, आंतरिक स्पष्टता और आध्यात्मिक जागरूकता के रूप में उस कंपन को महसूस करता है। इन समारोहों में उपस्थित लोग भाषा, संस्कृति या पृष्ठभूमि की सीमाओं से परे एक सामूहिक आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करते हैं।

पुस्तक में एक उदाहरण दिया गया है, जिसमें एक विदेशी श्रोता ने बताया कि Raga Sagara में शामिल होने के बाद उन्हें अपने पुराने मानसिक तनाव से मुक्ति मिली। यह अनुभव केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि वहां मौजूद सभी लोगों ने एक सामूहिक शांति और उत्थान का अनुभव किया।

आधुनिक विज्ञान और प्राचीन अनुभव का संगम

The Sacred Sound Path में पी. सेश कुमार ने स्वामीजी के संगीत को आधुनिक न्यूरोसाइंस के साथ जोड़ा है। वे बताते हैं कि जहां वैज्ञानिक जैसे डैनियल लेविटिन ने संगीत के मस्तिष्क पर प्रभाव को सिद्ध किया है, वहीं श्री स्वामीजी ने इस ज्ञान को बिना किसी वैज्ञानिक उपकरण के, केवल अपनी साधना और संगीत के माध्यम से जनमानस तक पहुंचाया है।

उदाहरण के लिए, संगीत में मौजूद ताल और ध्वनियां मस्तिष्क में डोपामाइन और सेरोटोनिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर को प्रभावित करती हैं, जो तनाव कम करने और मानसिक शांति बढ़ाने में मदद करते हैं। स्वामीजी के संगीत में यह प्रभाव और भी गहरा होता है, क्योंकि यह केवल शारीरिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि आत्मिक स्तर पर भी काम करता है। श्री स्वामीजी का संगीत आधुनिक न्यूरोसाइंस और ध्यान विज्ञान के बीच एक सेतु का काम करता है।

संगीत: गुरु की कृपा का श्रव्य स्वरूप

लेखक पी. सेश कुमार स्वामीजी के संगीत को गुरु की करुणा का श्रव्य स्वरूप मानते हैं। वह लिखते हैं कि यह संगीत केवल सुनने के लिए नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा माध्यम है, जो श्रोता को अपनी आत्मा के गहरे स्तर तक ले जाता है। यह संगीत मन को शांत करता है, दुख को कम करता है, और आत्मिक जागरूकता को बढ़ाता है।

पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि स्वामीजी का संगीत एक दर्पण की तरह है, जो श्रोता को उसकी अपनी आत्मा का साक्षात्कार कराता है। यह एक ऐसा सेतु है, जो मानव को अनंत की ओर ले जाता है। यह संगीत न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि यह एक दर्शन है, जो जीवन के गहरे सवालों का जवाब देता है।

आधुनिक युग में प्राचीन ज्ञान का पुनर्जागरण

आज के तनावपूर्ण और भागदौड़ भरे जीवन में, स्वामीजी का संगीत एक ऐसी रोशनी है, जो हमें अपने भीतर की शांति और आनंद की खोज करने के लिए प्रेरित करता है। The Sacred Sound Path इस यात्रा का एक नक्शा है, जो हमें यह सिखाता है कि संगीत केवल ध्वनि नहीं, बल्कि एक दिव्य शक्ति है, जो हमें अपने सच्चे स्वरूप से जोड़ सकती है।

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यह पुस्तक और स्वामीजी का संगीत हमें एक ही संदेश देता है: “संगीत वह भाषा है, जो आत्मा से आत्मा तक पहुंचती है।” यह न केवल एक कला है, बल्कि जीवन को समझने और जीने का एक तरीका है।

Explained: लद्दाख में क्यों तैनात की गई 72 Infantry Division? क्या है भारतीय सेना की चीन से निपटने की नई रणनीति

72 Infantry Division in Ladakh: India’s New Military Strategy to Counter China at the LAC – Explained

72 Infantry Division: भारतीय सेना अपने ऑर्डर ऑफ बैटल (ORBAT) में बड़ा बदलाव कर रही है। इसके लिए भारतीय सेना ने पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर लंबे समय तक सैन्य तैनाती के लिए एक नई डिवीजन 72 इन्फैंट्री डिवीजन (72 Infantry Division) बनाने का फैसला किया है। 72 इन्फैंट्री डिवीजन को लेह स्थित 14 फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स के तहत रखा जाएगा। इस कॉर्प्स को 1999 के कारगिल युद्ध के बाद बनाया गया था। यह कॉर्प्स सियाचिन से लेकर पूर्वी लद्दाख की सुरक्षा करती है।

भारतीय सेना 1999 के कारगिल युद्ध से पहले से ही पूर्वी लद्दाख के लिए एक अतिरिक्त डिवीजन मांग रही थी, लेकिन किसी भी सरकार (BJP या कांग्रेस) ने इस पर ध्यान नहीं दिया। माउंटेन स्ट्राइक कॉर्प्स बनाने को लेकर मंजूरी तो मिली, लेकिन बजट की कमी के कारण यह पूरी नहीं हुई। वहीं, 72 इन्फैंट्री डिवीजन उसी कॉर्प्स का हिस्सा है, जिसे अब नए इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप (IBG) के तहत बदला जा रहा है।

72 इन्फैंट्री डिवीजन को बनाने का फैसला 2017 में लिया गया था। उस समय इसे 17 माउंटेन स्ट्राइक कॉर्प्स (MSC) का हिस्सा बनाना था, जिसका मुख्यालय पानागढ़, पश्चिम बंगाल में है। लेकिन 2020 में गलवान घटना के बाद सेना ने अपनी रणनीति बदली। अब इस डिवीजन को 14 कॉर्प्स के तहत लद्दाख में तैनात किया जा रहा है। इसका मुख्यालय लेह में बनाया जा रहा है, जिसमें 25 अफसर, 30 जूनियर कमीशंड अफसर (JCOs) और 112 जवान होंगे।

72 Infantry Division में कोई नई भर्ती नहीं

72 इन्फैंट्री डिवीजन (72 Infantry Division) में 10,000 से 15,000 जवान होंगे। इसका नेतृत्व एक मेजर जनरल करेंगे। इस डिवीजन का गठन नए सैनिकों की भर्ती के बिना किया जा रहा है। इसके बजाय, सेना मौजूदा ब्रिगेड्स को फिर से संगठित कर रही है। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद, सेना ने बरेली से 6 माउंटेन ब्रिगेड और मथुरा स्थित 1 स्ट्राइक कॉर्प्स के कुछ रिसोर्सेज को लद्दाख में ट्रांसफर किया था। इनमें आर्मर्ड व्हीकल्स, इन्फैंट्री फाइटिंग व्हीकल्स और सैनिक शामिल थे। अब इन यूनिट्स को 72 इन्फैंट्री डिवीजन में शामिल किया जाएगा।

इस डिवीजन में तीन से चार ब्रिगेड्स होंगी, जिनमें से प्रत्येक का नेतृत्व एक ब्रिगेडियर करेगा। इसका मुख्यालय पूर्वी लद्दाख में बनाया जा रहा है। एक ब्रिगेड मुख्यालय पहले ही काम शुरू कर चुका है, जबकि बाकी यूनिट्स पश्चिमी भारत में हाई एल्टीट्यूड वारफेयर की ट्रेनिंग ले रही हैं। यह डिवीजन 14 कॉर्प्स का हिस्सा होगी, जिसके पास 832 किलोमीटर लंबी LAC, द्रास-कारगिल-बटालिक सेक्टर में LoC, और सियाचिन ग्लेशियर की जिम्मेदारी है।

क्यों बनाई 72 Infantry Division?

72 इन्फैंट्री डिवीजन (72 Infantry Division) के गठन का फैसला 2020 के गलवान संघर्ष के बाद शुरू हुए सैन्य तनाव के बाद लिया गया। उस समय, सेना ने तत्कालीन जरूरतों को देखते हुए अस्थायी तौर पर काउंटर इंसर्जेंसी फोर्स (CIF) “यूनिफॉर्म फोर्स” को गलवान घाटी और उसके आसपास के महत्वपूर्ण क्षेत्रों की जिम्मेदारी संभालने के लिए पूर्वी लद्दाख में तैनात किया था। 72 डिवीजन की तैनाती पूरी होने के बाद CIF यूनिफॉर्म 16वीं कोर जम्मू के रियासी में अपनी पुरानी जगह पर वापस लौट जाएगी। यह डिवीजन 14 कॉर्प्स की बाकी दो डिवीजन 8 माउंटेन डिवीजन (LoC के लिए) और 3 इन्फैंट्री डिवीजन (LAC के लिए) के साथ मिलकर काम करेगी।

क्या बदलेगा इस डिवीजन से?

72 इन्फैंट्री डिवीजन (72 Infantry Division) के आने से लद्दाख में सेना की तैनाती में बड़ा बदलाव आएगा। सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि सेना LAC पर ज्यादा तेजी से जवाब दे सकेगी। पहले से मौजूद ब्रिगेड्स को इस डिवीजन के तहत नए सिरे से सिस्टेमैटिक किया जाएगा, जिससे कमांड सिस्टम बेहतर होगा। यह डिवीजन ऊंचाई वाले इलाकों में काम करने के लिए तैयार की जा रही है। लद्दाख में मौसम बहुत ठंडा रहता है और ऑक्सीजन की कमी होती है। इसके लिए सैनिकों को खास ट्रेनिंग दी जा रही है, ताकि वे इन हालातों में काम कर सकें। इस डिवीजन में टैंक और बख्तरबंद गाड़ियां भी होंगी, जो जरूरत पड़ने पर दुश्मन पर हमला करने में मदद करेंगी।

सेना की दूसरी सबसे बड़ी रिस्ट्रक्चरिंग

यह 2020 में चीन के साथ तनाव शुरू होने के बाद सेना की दूसरी सबसे बड़ी रिस्ट्रक्चरिंग है। अक्टूबर 2021 में, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में 545 किमी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) को लखनऊ स्थित सेंट्रल कमांड के कंट्रोल में लाया गया था। बरेली में स्थित ‘उत्तर-भारत’ क्षेत्र को इन दो पहाड़ी राज्यों में LAC की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई, और वेस्टर्न कमांड की एक महत्वपूर्ण स्ट्राइक डिवीजन को सेंट्रल कमांड को सौंपा गया। पहले, हिमाचल में LAC की सुरक्षा का जिम्मा चंडीमंदिर स्थित वेस्टर्न कमांड के पास था।

वहीं, वेस्टर्न कमांड के तीन मुख्य कॉर्प्स 2 स्ट्राइक कॉर्प्स (अंबाला), 11 कॉर्प्स (जालंधर), और 9 कॉर्प्स (योल, हिमाचल) का अब केवल फोकस “पश्चिम की ओर” रहेगा। इसका मतलब है कि इन तीनों कॉर्प्स का पूरा फोकस अब पाकिस्तान की ओर होगा।

2 स्ट्राइक कॉर्प्स (अंबाला, हरियाणा) में तैनात है, जिसका मुख्य काम हमला करना है। यह कॉर्प्स जरूरत पड़ने पर दुश्मन के इलाके में जाकर हमला करने के लिए तैयार रहती है। इसका मुख्यालय अंबाला में है और यह हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के कुछ हिस्सों में सक्रिय है। इस कॉर्प्स में टैंक, बख्तरबंद गाड़ियां और हमलावर सैनिक होते हैं, जो तेजी से हमला कर सकते हैं।

11 कॉर्प्स का मुख्यालय जालंधर में है। यह कॉर्प्स पंजाब के इलाके में पाकिस्तान से लगने वाली सीमा की सुरक्षा करती है। इसका काम रक्षा करना और दुश्मन को रोकना है। यह कॉर्प्स जालंधर, अमृतसर, गुरदासपुर जैसे इलाकों में तैनात है।

9 कॉर्प्स का मुख्यालय योल (हिमाचल प्रदेश) में है। यह कॉर्प्स हिमाचल और जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों में सक्रिय है। इसका काम रक्षा करना और पहाड़ी इलाकों में सीमा की सुरक्षा करना है। यह कॉर्प्स खास तौर पर ऊंचाई वाले इलाकों में काम करने के लिए तैयार की गई है।

LAC पर चीन बना रहा इंफ्रास्ट्रक्चर

चीन ने LAC पर अपनी सैन्य मौजूदगी को लगातार मजबूत किया है। उसने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश, खासकर तवांग, में सड़कें, शिविर, और दोहरे उपयोग (सैन्य और नागरिक) वाले गांव बनाए हैं। हाल ही में, पांगोंग त्सो झील के पास 400 मीटर लंबा एक पुल बनाया गया, जो खासतौर पर चीनी सेना की मोबिलिटी देने के लिए बनाया गया है। इसके अलावा, चीन ने कच्ची सड़कों को पक्का करने के अलावा और सर्विलांस सिस्टम को बढ़ाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप किया है।

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अक्टूबर 2024 से शुरू हुआ बातचीत का दौर

गलवान संघर्ष के बाद, भारत और चीन ने कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक बातचीत की। 2021 में पांगोंग त्सो, गोगरा, और हॉट स्प्रिंग्स जैसे क्षेत्रों में डिसएंगेजमेंट पर सहमति बनी, लेकिन डेपसांग और डेमचोक जैसे क्षेत्रों में समस्याएं बनी रहीं। वहीं, 2024 के अंत में, भारत और चीन ने डेपसांग और डेमचोक में सैनिकों की वापसी पर सहमति जताई। अक्टूबर 2024 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात की और बातचीत को फिर से शुरू करने को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल और विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने भी चीनी अधिकारियों के साथ चर्चा की। भारत का रुख स्पष्ट है: सीमा पर शांति स्थापित किए बिना संबंध सामान्य नहीं हो सकते।

Xenon Gas: अगर आप भी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने की रखते हैं तमन्ना, तो पूरी हो सकती है आपकी ख्वाहिश, बस लगेगा एक हफ्ता!

Xenon Gas Explained: Climbing Mount Everest in Just 7 Days? Is It a Miracle or a Menace?
Credit: Sandro Gromen

Xenon Gas: हाल ही में चार ब्रिटिश पर्वतारोहियों ने माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान जीनॉन गैस का इस्तेमाल करके इतिहास रच दिया। उन्होंने इस गैस की मदद से महज कुछ दिनों में एवरेस्ट की चढ़ाई पूरी कर ली, जो आमतौर पर हफ्तों लेती है। लेकिन इस नए तरीके ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या जीनॉन गैस माउंटेनियरिंग का भविष्य है, या इससे आने वाले खतरों को नजरअंदाज कर रहे हैं? आइए, इस गैस के बारे में विस्तार से जानते हैं, इसके फायदे, नुकसान, और माउंटेनियरिंग में इसके इस्तेमाल पर हो रही बहस को समझते हैं।

क्या है Xenon Gas?

जीनॉन (Xenon) एक रंगहीन, गंधहीन, और स्वादहीन नोबल गैस है, जो पृथ्वी के वायुमंडल में बहुत कम मात्रा में मौजूद होती है। यह उन छह नोबल गैसों में से एक है जो रासायनिक रूप से बहुत कम प्रतिक्रिया करती हैं। इसका मतलब है कि यह आसानी से किसी अन्य तत्व के साथ मिलकर यौगिक नहीं बनाती। जीनॉन का रासायनिक प्रतीक Xe है और इसका परमाणु क्रमांक 54 है। यह गैस हवा से निकाली जाती है, जिसमें यह लगभग 0.000009% (90 पार्ट्स पर बिलियन) की मात्रा में पाई जाती है।

Xenon Gas Explained: Climbing Mount Everest in Just 7 Days? Is It a Miracle or a Menace?
Credit: Sandro Gromen

जीनॉन (Xenon Gas) का सबसे ज्यादा इस्तेमाल औद्योगिक और चिकित्सा क्षेत्र में होता है। मसलन, यह हाई-इंटेंसिटी लैंप (जैसे कि कार की हेडलाइट्स और सिनेमा प्रोजेक्टर्स), लेजर तकनीक, और अंतरिक्ष यान के इंजनों में इस्तेमाल की जाती है। चिकित्सा में, जीनॉन का उपयोग एनेस्थीसिया (बेहोशी की दवा) के रूप में किया जाता है, क्योंकि यह तेजी से काम करती है और मरीज के शरीर से जल्दी बाहर निकल जाती है। लेकिन अब इसका इस्तेमाल माउंटेनियरिंग में होने लगा है, जिसने सबका ध्यान खींचा है।

Xenon Gas कैसे काम करती है?

जब हम ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ते हैं, जैसे कि माउंट एवरेस्ट, तो हवा में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। इसे हाइपोक्सिया कहते हैं, यानी शरीर को जरूरी ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। इससे सिरदर्द, थकान, चक्कर, और गंभीर मामलों में मौत भी हो सकती है। पर्वतारोही आमतौर पर इस कमी को पूरा करने के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन जीनॉन गैस एक नया विकल्प बनकर सामने आई है।

जीनॉन गैस (Xenon Gas) का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह शरीर में हाइपोक्सिया-इंड्यूस्ड फैक्टर (HIF) नामक प्रोटीन को सक्रिय कर देती है। यह प्रोटीन शरीर को कम ऑक्सीजन वाले माहौल में भी बेहतर ढंग से काम करने में मदद करता है। आसान भाषा में कहें, तो जीनॉन शरीर को यह सिखा देती है कि कम ऑक्सीजन में भी सांस लेना और काम करना कैसे है। इसके चलते पर्वतारोही तेजी से ऊंचाई पर अनुकूलन कर पाते हैं, जिसे आमतौर पर “एक्लिमटाइजेशन” कहा जाता है।

इसके अलावा, जीनॉन गैस (Xenon Gas) का कोई साइड इफेक्ट नहीं माना जाता, क्योंकि यह शरीर में रासायनिक प्रतिक्रिया नहीं करती और जल्दी बाहर निकल जाती है। लेकिन इसका असर कितना सुरक्षित है, इस पर अभी और रिसर्च की जरूरत है।

माउंट एवरेस्ट पर Xenon Gas का इस्तेमाल

माउंट एवरेस्ट, जो दुनिया की सबसे ऊंची चोटी (8,848 मीटर) है, पर चढ़ाई करना हर पर्वतारोही का सपना होता है। लेकिन यह बेहद मुश्किल और खतरनाक है। आमतौर पर पर्वतारोहियों को इस चढ़ाई के लिए हफ्तों की तैयारी करनी पड़ती है। वे धीरे-धीरे ऊंचाई बढ़ाते हैं ताकि उनका शरीर कम ऑक्सीजन वाले माहौल में ढल सके। इस प्रक्रिया में बेस कैंप से लेकर शिखर तक पहुंचने और वापस आने में 6 से 8 हफ्ते लग सकते हैं।

लेकिन हाल ही में चार ब्रिटिश पर्वतारोहियों ने जीनॉन गैस (Xenon Gas) का इस्तेमाल करके बेहद कम समय में चढ़ाई पूरी कर ली। उन्होंने लंदन से अपनी यात्रा शुरू की और एक हफ्ते से भी कम समय में एवरेस्ट की चढ़ाई पूरी कर ली। उन्होंने गैस को सांस के जरिए लिया और इसका असर इतना तेज था कि उनका शरीर जल्दी ही ऊंचाई पर ढल गया। यह एक रिकॉर्ड तोड़ उपलब्धि थी, लेकिन इसने कई सवाल भी खड़े किए।

महीनों की ट्रेनिंग, हाइपोक्सिक चैंबर सेशंस और जीनॉन गैस ट्रीटमेंट के बाद, चार ब्रिटिश आर्मी वेटरन्स ने लंदन से दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक की सबसे तेज चढ़ाई को सफलतापूर्वक पूरा किया। फर्टेनबाख एडवेंचर्स के मालिक लुकास फर्टेनबाख ने पुष्टि की कि चार वेटरन्स-मेजर गार्थ मिलर, कर्नल एलिस्टेयर स्कॉट कार्न्स, एंथनी जेम्स स्टैजिकर और केविन फ्रांसिस गॉडलिंगटन ने 21 मई को सुबह करीब 7:15 बजे स्थानीय समय पर माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचे। लुकास ने कहा, “हमारे पर्वतारोही अपने लक्ष्य को हासिल करने की राह पर हैं: लंदन से दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक और वापस, सबसे तेज चढ़ाई।” टीम ने 16 मई की दोपहर को लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट से उड़ान भरी और काठमांडू पहुंचकर अपनी ‘एवरेस्ट इन जस्ट 7 डेज’ expedition शुरू किया। वे 17 मई को दोपहर तक एवरेस्ट बेस कैंप पहुंच गए और 20 मई को रात 10:30 बजे अपनी चोटी की चढ़ाई शुरू की

Xenon Gas के फायदे

जीनॉन गैस (Xenon Gas) का इस्तेमाल माउंटेनियरिंग में कई तरह से फायदेमंद हो सकता है। जीनॉन गैस शरीर को कम ऑक्सीजन में जल्दी ढाल देती है। इससे पर्वतारोहियों को हाइपोक्सिया से होने वाली समस्याओं, जैसे सिरदर्द और थकान, से बचने में मदद मिलती है।

वहीं, पारंपरिक तरीके से चढ़ाई में हफ्तों लगते हैं, लेकिन जीनॉन की मदद से यह समय कुछ दिनों तक सिमट सकता है। इससे पर्वतारोहियों को मौसम की मार से बचने में भी मदद मिलती है। हाई एल्टटीट्यूड पर ज्यादा समय बिताने से हिमस्खलन, हाइपोथर्मिया (शरीर का तापमान गिरना), और गिरने का खतरा बढ़ता है। जीनॉन की वजह से कम समय में चढ़ाई पूरी होने से ये जोखिम कम हो सकते हैं। साथ ही, एवरेस्ट पर चढ़ाई में शेरपा गाइड्स की मदद ली जाती है, जो पर्वतारोहियों के लिए सामान ढोते हैं और रास्ता दिखाते हैं। कम समय में चढ़ाई होने से शेरपाओं को भी कम समय तक जोखिम में रहना पड़ता है।

Xenon Gas के नुकसान और खतरे

जीनॉन गैस (Xenon Gas) के फायदों के साथ-साथ इसके कुछ नुकसान और खतरे भी हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिकों का कहना है कि जीनॉन का शरीर पर लंबे समय तक असर अभी पूरी तरह समझा नहीं गया है। हाइपोक्सिया-इंड्यूस्ड फैक्टर को सक्रिय करने से शरीर में कई बदलाव होते हैं, जो बाद में नुकसानदायक हो सकते हैं। वहीं, कई पर्वतारोही मानते हैं कि एवरेस्ट पर चढ़ाई सिर्फ शारीरिक चुनौती नहीं, बल्कि एक मानसिक और आध्यात्मिक अनुभव भी है। जीनॉन का इस्तेमाल इस अनुभव को “छोटा” कर देता है, क्योंकि यह चढ़ाई को आसान बना देता है।

नेपाल सरकार का कहना है कि जीनॉन का इस्तेमाल माउंटेनियरिंग की नैतिकता के खिलाफ है। इससे पहाड़ों पर भीड़ बढ़ सकती है, जिससे कचरे और प्रदूषण की समस्या और गंभीर हो सकती है। वगीं, अगर जीनॉन की वजह से चढ़ाई का समय कम हो जाता है, तो शेरपाओं और स्थानीय गाइड्स की कमाई पर असर पड़ सकता है, क्योंकि उनकी सेवाओं की जरूरत कम हो जाएगी।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

जीनॉन गैस (Xenon Gas) के इस्तेमाल पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। मॉन्टगोमरी कॉलेज यूनिवर्सिटी, लंदन के प्रोफेसर ह्यू मॉन्टगोमरी, जो खुद एक पर्वतारोही भी हैं, कहते हैं कि जीनॉन शरीर में हाइपोक्सिया को सक्रिय करने का काम करती है, लेकिन इसके लंबे प्रभावों का अभी और अध्ययन करना बाकी है। उन्होंने कहा, “हमें यह समझना होगा कि यह गैस कैसे काम करती है और क्या यह वाकई सुरक्षित है।”

वहीं, नेपाल टूरिज्म डिपार्टमेंट से जुड़े हिमाल गौतम इसे गलत मानते हैं। उनका कहना है कि इससे न केवल पहाड़ों पर प्रदूषण बढ़ेगा, बल्कि शेरपाओं की आजीविका पर भी असर पड़ेगा। दूसरी तरफ, इस अभियान में शामिल एक ब्रिटिश पर्वतारोही लुकास फर्टेनबाख का कहना है, “जीनॉन ने दिखा दिया कि यह काम कर सकती है। यह माउंटेनियरिंग को आसान और सुरक्षित बनाती है।”

नैतिकता का सवाल

जीनॉन गैस (Xenon Gas) का इस्तेमाल माउंटेनियरिंग में एक नैतिक सवाल भी खड़ा करता है। माउंटेनियरिंग को हमेशा से एक चुनौतीपूर्ण खेल माना गया है, जिसमें शारीरिक और मानसिक ताकत की जरूरत होती है। लेकिन अगर जीनॉन जैसी गैस से यह आसान हो जाए, तो क्या यह इस खेल की मूल भावना को खत्म नहीं कर देगा?

कई पर्वतारोही मानते हैं कि एवरेस्ट पर चढ़ाई का असली मजा उसकी कठिनाई में है। अगर हर कोई जीनॉन लेकर कुछ दिनों में चढ़ाई कर लेगा, तो इस उपलब्धि का मूल्य कम हो जाएगा। इसके अलावा, यह भी सवाल है कि क्या जीनॉन का इस्तेमाल खेल में “डोपिंग” की तरह तो नहीं है? जैसे ओलंपिक में प्रदर्शन बढ़ाने वाली दवाओं पर बैन है, वैसे ही माउंटेनियरिंग में भी ऐसे नियम बनाए जाने चाहिए या नहीं?

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जीनॉन गैस (Xenon Gas) का माउंटेनियरिंग में इस्तेमाल अभी शुरुआती दौर में है। इसके फायदे और नुकसान को देखते हुए यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह भविष्य है या नहीं। लेकिन यह साफ है कि इसके इस्तेमाल से माउंटेनियरिंग की दुनिया में एक नई बहस छिड़ गई है। अगर जीनॉन का इस्तेमाल बढ़ता है, तो हो सकता है कि भविष्य में ज्यादा लोग एवरेस्ट और अन्य ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ने की हिम्मत करेंगे। इससे माउंटेनियरिंग को बढ़ावा मिल सकता है। लेकिन इसके साथ ही, सुरक्षा, पर्यावरण, और नैतिकता से जुड़े सवालों का जवाब ढूंढना भी जरूरी है। नेपाल सरकार और अंतरराष्ट्रीय माउंटेनियरिंग संगठनों को इस पर सख्त नियम बनाने की जरूरत होगी, ताकि इस गैस का सही और जिम्मेदारीपूर्ण इस्तेमाल हो।