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Operation Khanpi: मणिपुर में सेना का बड़ा अभियान, प्रतिबंधित यूनाइटेड कुकी नेशनल आर्मी के चार आतंकी ढेर

Operation Khanpi

Operation Khanpi: मणिपुर के चुराचांदपुर जिले के खानपी-हेंगलेप क्षेत्र में सुरक्षा बलों ने एक बड़ी कार्रवाई में प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन यूनाइटेड कुकी नेशनल आर्मी (यूकेएनए) के चार सशस्त्र कैडरों को मार गिराया। यह कार्रवाई 4 नवंबर की सुबह खुफिया जानकारी के आधार पर चलाई गई थी।

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अधिकारियों के मुताबिक, यूकेएनए हाल के दिनों में हिंसा और जबरन वसूली की कई घटनाओं में शामिल रहा है। संगठन ने हेंगलेप इलाके में एक ग्राम प्रधान की हत्या की थी और स्थानीय लोगों, स्कूलों व वित्तीय संस्थानों से 5 से 50 लाख रुपये तक की वसूली की कोशिश की थी। यूकेएनए उन कुकी और जोमी गुटों में शामिल नहीं है जो केंद्र और राज्य सरकार के साथ शांति समझौते में हैं।

सेना और असम राइफल्स की संयुक्त टीम ने सुबह करीब साढ़े पांच बजे सशस्त्र उग्रवादियों की गतिविधि का पता लगाया और उन्हें आत्मसमर्पण के लिए कहा। लेकिन जवाब में यूकेएनए के कैडरों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें सुरक्षा बलों के तीन जवान घायल हुए। जवाबी कार्रवाई में चार उग्रवादी मारे गए।

सुरक्षा बलों ने मौके से एक 7.62 मिमी सेल्फ-लोडिंग राइफल, एक एके-56, एक एमए4 एमके-II राइफल, एक अंडर-बैरल ग्रेनेड लॉन्चर, गोला-बारूद और अन्य हथियार बरामद किए। तलाशी अभियान के दौरान असम राइफल्स की एक टुकड़ी ने यूकेएनए का एक अस्थाई कैंप भी नष्ट किया, जहां से बुलेटप्रूफ जैकेट, कम्यूनिकेशन इक्विपमेंट और काफी संख्या में हथियार भी बरामद हुए।

Ex Trishul-Poorvi Prachand Prahar: टू फ्रंट वॉर की तैयारी! पूर्वी मोर्चे पर ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ और पश्चिम में ‘त्रिशूल’, दो मोर्चों से भारत ने दिया बड़ा संदेश

Ex Trishul-Poorvi Prachand Prahar

Ex Trishul-Poorvi Prachand Prahar: भारतीय सेनाएं एक बार फिर अपनी जॉइंटनेस का प्रदर्शन करने के लिए तैयार हैं। अरुणाचल प्रदेश के मेचुका क्षेत्र में 11 नवंबर से तीनों सेनाओं का एक बड़ा संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ शुरू हो रहा है। यह अभ्यास 15 नवंबर तक चलेगा और इसमें भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना एक साथ हिस्सा ले रहे रही हैं।

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यह कवायद ऐसे समय में हो रही है जब पश्चिमी सीमा पर राजस्थान और गुजरात के इलाकों में ट्राई सर्विस एक्सरसइज ‘त्रिशूल’ जारी है। इसमें भी तीनों सेनाएं एक साथ हिस्सा ले रही हैं। इन दोनों अभ्यासों का उद्देश्य भारत की मिलिट्री ‘थिएटर कमांड’ के कॉन्सेप्ट को जमीन पर उतारना और दोनों मोर्चों चीन और पाकिस्तान को एक स्पष्ट रणनीतिक संदेश देना है कि भारत अब किसी भी स्थिति के लिए तैयार है। ये अभ्यास ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना की इंटीग्रेटेड ट्राई सर्विस क्षमताओं को मजबूत करने के लिए उठाए गए हैं।

एक्सरसाइज पूर्वी प्रचंड प्रहार: चीन को ललकार

अरुणाचल प्रदेश का मेचुका इलाका जो वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से मात्र 30 किलोमीटर दूर है, हमेशा से चीन की नजरों में रहा है। बीजिंग द्वारा ‘दक्षिण तिब्बत’ का दावा करने वाले इस क्षेत्र में आसापिला, लोंगजू, बिसा, मझा, तुलुंग-ला और यांग्त्से जैसे छह विवादित क्षेत्र हैं, जबकि फिशटेल 1 और 2, थाग ला और डिचू जैसे चार बेहद संवेदनशील जोन हैं। 1962 की जंग के बाद से यह इलाका रणनीतिक तौर पर बेहद अहम है। चीन इस पूरे राज्य अरुणाचल प्रदेश को अपना इलाका बताता है और इसे “दक्षिणी तिब्बत यानी जांगनान कहता है।

इस इलाके में ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ एक्सरसाइज शुरू होने जा रही है जो 11-15 नवंबर तक चलेगी। इस अभ्यास में भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना एक साथ मिलकर ऊंचाई वाले इलाकों में लॉजिस्टिक चेन, सिचुएशनल अवेयरनेस और नेटवर्क्ड कमांड एंड कंट्रोल का परीक्षण करेंगे। अभ्यास में लॉन्ग-रेंज मैरीटाइम रिकॉनिसेंस एयरक्राफ्ट, आर्म्ड हेलीकॉप्टर, यूएवी (अनमैन्ड एरियल व्हीकल्स), लॉयटरिंग म्यूनिशंस और स्पेस-बेस्ड एसेट्स का इस्तेमाल किया जाएगा। यह अभ्यास 2023 के ‘भाला प्रहार’ और 2024 के ‘पूर्वी प्रहार’ का विस्तार है।

ईस्टर्न कमांड के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कर्नल महेंद्र रावत के अनुसार, यह अभ्यास भारत की तीनों सेनाओं के बीच ऑपरेशनल तालमेल, मल्टी-डोमेन वॉरफेयर और इंटीग्रेटेड ज्वॉइंट ऑपरेशन की क्षमता को परखने के लिए आयोजित किया जा रहा है। इस अभ्यास का मुख्य फोकस जमीन, हवा और समुद्र तीनों क्षेत्रों में एक साथ काम करने की तैयारियों को जांचना है।

रावत के अनुसार, इस अभ्यास में स्पेशल फोर्सेज, मार्कोस, अनमैन्ड प्लेटफॉर्म्स, प्रिसिजन वेपन्स और नेटवर्क्ड ऑपरेशन सेंटर्स का इस्तेमाल किया जाएगा। यह सब कुछ हाई एल्टीट्यूड वाले कठिन इलाकों में किया जाएगा, ताकि वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में सेनाओं की क्षमता की परख हो सके।

चीन सीमा पर भारत की तैयारी

‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ को भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत चीन सीमा पर सर्विलांस, मोबिलिटी और डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर को लगातार मजबूत किया जा रहा है।

हाल के महीनों में चीन ने एलएसी के पार ल्हुंजे एयरबेस में 36 एयरक्राफ्ट शेल्टर्स, नए प्रशासनिक ब्लॉक्स और रनवे डेवलप किए हैं, जो भारत के लिए चिंता का विषय हैं। पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ (सेवानिवृत्त) ने कहा था कि इन निर्माणों से साफ है कि चीन भविष्य के किसी भी टकराव में अपने लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टर वहीं से ऑपरेट करेगा।

एक्सरसाइज त्रिशूल: पाकिस्तान को चेतावनी

पूर्वी मोर्चे के साथ-साथ, भारतीय सेनाओं ने पश्चिमी सीमा पर ‘त्रिशूल’ सैन्य अभ्यास की शुरुआत की है। ‘त्रिशूल 2025’ अभ्यास 30 अक्टूबर से 10 नवंबर तक राजस्थान और गुजरात की सीमाओं पर चल रहा है। नौसेना की अगुवाई में थलसेना और वायुसेना के साथ मिलकर यह अभ्यास सर क्रीक क्षेत्र के पास हो रहा है, जहां पाकिस्तान ने हाल ही में तेल-गैस भंडारों की खोज के दावों के साथ गतिविधियां बढ़ाई हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में सर क्रीक में किसी भी साहसिक कदम के खिलाफ कड़ी चेतावनी दी थी, और यह अभ्यास उसी का परिणाम है।

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इस अभ्यास में टी-90 बैटल टैंक्स, ब्रह्मोस और आकाश मिसाइल सिस्टम्स, प्रचंड अटैक हेलीकॉप्टर, राफेल जेट्स, सुखोई-30 एमकेआई, मिग-29के और आर्टिलरी यूनिट्स शामिल हैं। 28,000 फीट ऊंचे कॉरिडोर में ‘शूट-एंड-स्कूट’ स्ट्राइक्स का अभ्यास हो रहा है, जो पाकिस्तानी रडार की नजर में है।

रक्षा मंत्रालय ने बताया कि यह अभ्यास तीनों सेनाओं के बीच ऑपरेशनल प्रोसीजर, कमांड एंड कंट्रोल, और नेटवर्क इंटीग्रेशन को बेहतर बनाने के लिए किया जा रहा है। इस दौरान सेनाएं लाइव फायरिंग ड्रिल्स, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम्स और संयुक्त संचार प्रणालियों का परीक्षण कर रही हैं।

नौसेना संचालन महानिदेशक वाइस एडमिरल एएन प्रमोद ने बताया कि त्रिशूल अभ्यास का मुख्य उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच इंटर-सर्विस कोऑर्डिनेशन और टेक्नोलॉजिकल इंटीग्रेशन को मजबूत करना है। उन्होंने इसे एक मल्टी-डोमेन ऑपरेशन बताया, जिसमें साइबर और स्पेस वारफेयर भी शामिल है।

वहीं, पाकिस्तान ने भी अरब सागर में फायरिंग ड्रिल्स के लिए नोटाम और नेवेरिया चेतावनियां जारी की हैं, जो आंशिक रूप से ‘त्रिशूल’ से ओवरलैप करती हैं।

थिएटर कमांड का ट्रायल!

‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ थिएटर कमांड व्यवस्था को लागू करने की दिशा में एक अहम अभ्यास माना जा रहा है। इस व्यवस्था के तहत, एक ही कमांड के तहत सेना, नौसेना और वायुसेना के यूनिट्स एक साथ किसी विशेष क्षेत्र या ऑपरेशन में काम करेंगे।

इस अभ्यास के जरिए यह जांचा जा रहा है कि तीनों सेनाएं एक साथ कितनी सहजता और सटीकता से संयुक्त कार्रवाई कर सकती हैं। इसमें कमांड और कंट्रोल स्ट्रक्चर, कम्युनिकेशन नेटवर्क, और हथियार प्रणालियों की कार्यक्षमता की भी समीक्षा होगी। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह अभ्यास भारत की सेनाओं की ‘जॉइंटनेस’ और इंटरऑपरेबिलिटी को और मजबूत करेगा।

दो मोर्चों पर रणनीतिक संदेश

‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ और ‘त्रिशूल’ दोनों ही अभ्यास ऑपरेशन सिंदूर के बाद आयोजित किए जा रहे हैं। इस साल मई में भारत ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान और पीओके में मौजूद नौ आतंकी ठिकानों पर सटीक हवाई हमले किए थे। उस ऑपरेशन ने भारतीय सेनाओं ने दुनिया के सामने साबित किया और यह दिखाया कि भारत किसी भी खतरे का जवाब देने के लिए अब देर नहीं करता। अब ये दोनों अभ्यास उस तैयारी का विस्तार हैं, एक पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान के खिलाफ और दूसरा पूर्वी मोर्चे पर चीन के खिलाफ।

भारत के इन दोनों सैन्य अभ्यासों ‘त्रिशूल’ और ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ को एक साथ आयोजित करने का साफ मतलब है कि भारत अब दो फ्रंट वॉर की स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। पूर्व में चीन के बढ़ते सैन्य निर्माण और पश्चिम में पाकिस्तान की गतिविधियों को देखते हुए यह तैयारी भारत की रणनीतिक सोच का हिस्सा है। भारतीय सेनाओं का यह संयुक्त अभ्यास न केवल पड़ोसी देशों को संदेश देता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि भारत की सैन्य नीति अब “रिएक्टिव” नहीं, बल्कि “प्रोएक्टिव” हो चुकी है।

Swayam Raksha Kavach: DRDO ने शुरू किया तेजस Mk1A के लिए ‘स्वयं रक्षा कवच’ का फ्लाइट ट्रायल, नए 97 जेट्स में होगा इंटीग्रेट

Tejas Mk1A Delivery
File Photo

Swayam Raksha Kavach: स्वदेशी तेजस एमके-1ए फाइटर जेट के लिए नए एयरबोर्न इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम का सफल उड़ान परीक्षण शुरू कर दिया है। इस सिस्टम को ‘स्वयं रक्षा कवच’ नाम दिया गया है, जिसे डीआरडीओ ने डेवलप किया है। यह सिस्टम भारतीय वायुसेना के आने वाले तेजस एमके-1ए विमानों में लगाया जाएगा, जो आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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डीआरडीओ ने ‘समन्वय 2025’ इंडस्ट्री समिट के दौरान जानकारी दी कि ‘स्वयं रक्षा कवच’ का डेवलपमेंट 2021 में शुरू हुआ था और फिलहाल इसका परीक्षण एक तेजस एमके-1ए विमान पर किया जा रहा है। परीक्षणों को 2026 के मध्य तक पूरा किया जााना है और इसे वर्ष 2026 के आखिर तक वायुसेना में शामिल किया जाएगा। डीआरडीओ के सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स (सीएबीएस) द्वारा विकसित यह सूट आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर की चुनौतियों का सामना करने के लिए डिजाइन किया गया है।

‘स्वयं रक्षा कवच’ सिस्टम तेजस विमान को दुश्मन के रडार, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक हमलों से बचाने में मदद करेगा। इस सिस्टम में रडार वार्निंग रिसीवर, चाफ और फ्लेयर डिस्पेंसर सिस्टम और जैमर पॉड लगे हैं, जो दुश्मन के रडार सिग्नल को पहचान कर उन्हें जाम कर सकते हैं। यह नया सूट इस साल सितंबर में दिए गए 97 तेजस एमके1ए में लगाया जाएगा।

डीआरडीओ के अधिकारी ने बताया कि यह सिस्टम पहले से मौजूद डी-29 ईडब्ल्यू सूट का एडवांस वर्जन है, जिसे पहले मिग-29 विमानों के लिए बनाया गया था। यह सूट तेजस एमके-1ए के मौजूदा इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम को अपग्रेड करेगा, जिसमें पहले से ही डिफेंस एवियोनिक्स रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (डेयर) द्वारा डेवलप यूनिफाइड इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट (यूईडब्ल्यूएस) शामिल है। यूईडब्ल्यूएस में इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमेजर्स (ईसीएम) और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटरमेजर्स (ईसीसीएम) क्षमताएं पहले से मौजूद हैं, लेकिन एसआरके इनकी क्षमताओं को डिजिटल रेडियो फ्रीक्वेंसी मेमोरी आधारित जामिंग और डिसेप्शन तकनीकों से मजबूत बनाएगा।

नया एसआरके सिस्टम ज्यादा ताकतवर और तेज है। इसमें डिजिटल रेडियो फ्रीक्वेंसी मेमोरी जैसी एडवांस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है, जो दुश्मन के सिग्नल ट्रैकिंग सिस्टम को कन्फ्यूज कर सकती है।

हालांकि स्वयं रक्षा कवच को अभी तक फुल सर्टिफिकेशन (फुल प्रोडक्शन क्लियरेंस) नहीं मिला है। यह सूट अभी फ्लाइट ट्रायल्स की स्टेज में है, जो नवंबर 2025 से शुरू हुए हैं। सेंटर फॉर मिलिट्री एयरवर्थिनेस एंड सर्टिफिकेशन (सेमीलैक) अभी इनकी क्वालिफिकेशन टेस्टिंग कर रही है, और प्रोडक्शन क्लियरेंस की अगले साल जून तक मिलने की उम्मीद है। सूत्रों का कहना है कि स्वयं रक्षा कवच के प्रमुख कंपोनेंट लाइन रिप्लेसेबल यूनिट्स (एलआरयू) की क्वालिफिकेशन टेस्टिंग पूरी होने के बाद ही प्रोडक्शन क्लियरेंस का रास्ता खुलेगा।

सूत्रों का कहना है कि सर्टिफिकेशन में देरी के चलते एचएएल पहले बैच के तेजस एमके-1ए में ‘स्वयं रक्षा कवच’ को इंटीग्रेट नहीं कर पाया। जिसके चलते एचएएल को इजरायली एल्टा-2052 रडार और स्कॉर्पियस ईडब्ल्यू पॉड को चुनना पड़ा। सर्टिफेकशन न होने की वजह से तेजस की डिलीवरी में देरी हुई।

एचएएल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण यह था कि वायुसेना को तय समय पर विमान मिले। जब तक स्वदेशी सिस्टम पूरी तरह प्रमाणित नहीं होते, हम डिलीवरी नहीं कर सकते थे।” वहीं, डीआरडीओ सूत्रों का कहना है कि डीआरडीओ को पुराने तेजस विमानों तक सीमित पहुंच थी, जबकि विदेशी मैन्युफैक्चरर्स को एमके1ए के प्रोटोटाइप्स मिले थे। जिसके चलते वे टेस्टिंग नहीं कर पाए। उनका कहना है कि एचएएल ने “प्रूवन टेक्नोलॉजी” को प्राथमिकता दी।

Theatre Command: CDS चौहान ने कहा- ऑपरेशन सिंदूर से मिले पाठ थिएटराइजेशन में होंगे शामिल, एयर चीफ बोले- विचार-विमर्श के बाद ही बढ़ें आगे

Theatre Command
CDS Gen Anil Chauhan and IAF chief AP Singh at the India Defence Conclave organised by BharatShakti

Theatre Command: चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर से भारतीय सेनाओं को कई अहम सबक मिले हैं, जिन्हें थिएटराइजेशन मॉडल में शामिल किया जाएगा। उन्होंने इंडिया डिफेंस कॉन्क्लेव में बताया कि यह अनुभव थिएटर कमांड का स्ट्रक्चर बनाने में काम आएगा। वहीं, भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह कहना है कि भारतीय वायुसेना को थिएटर कमांड के गठन से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इसे पर्याप्त विचार-विमर्श के बाद ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

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कार्यक्रम में जनरल चौहान ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने यह दिखाया कि इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस को दुश्मन की सीमा के पार भी प्रभावी तरीके से तैनात किया जाना चाहिए और यह अब न्यू नॉर्मल होना चाहिए। सीडीएस ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने यह भी सिखाया कि सर्विस चीफ्स की भूमिका अहम है और चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी की भूमिका को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि जॉइंट कमांडर कॉन्क्लेव से मिले अनुभवों को मिलाकर एक ऐसा आर्गेनाइजेशनल स्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है जो हर परिस्थिति के लिए काम आएगा।

थिएटराइजेशन योजना के तहत देश को कई संयुक्त थिएटर कमांड्स में बांटा जाएगा, जिनमें थलसेना, नौसेना और वायुसेना की यूनिटें एक साथ काम करेंगी। ये कमांड अपने-अपने भौगोलिक इलाकों की सुरक्षा और रणनीतिक अभियानों के लिए जिम्मेदार होंगी।

जनरल चौहान ने हंसते हुए कहा, “ऑपरेशन सिंदूर के बाद सबसे बड़ी चुनौती यह है कि चारों शीर्ष अधिकारी तीनों सेनाओं के प्रमुख और सीडीएस को एक साथ दिल्ली में मिलना मुश्किल हो गया है।”

जनरल चौहान ने आगे कहा कि नए मॉडल में एयर डिफेंस, काउंटर-यूएएस और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर को अहम जगह दी जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि भविष्य में मोबाइल टारगेट्स से निपटना भी जरूरी होगा और तकनीकी रूप से दुश्मन से आगे रहने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि थिएटराइजेशन से हर क्षेत्र के लिए अलग-अलग कमांड नहीं बल्कि एक कोआर्डिनेटेड कमांड मिलेगी, जहां थल, नौ और वायु सेनाएं एक साथ काम करेंगी।

सीडीएस ने बताया कि उरी, बालाकोट, गलवान और डोकलाम से मिली सीखों से मिले अनुभव नया आर्गेनाइजेशनल मॉडल तय करने में मदद करेंगे। उन्होंने यह भी बताया कि अब चौथे स्तरीय मुद्दा यह है कि शीर्ष नेतृत्व के साथ कैसे संवाद और रणनीतिक फैसले लिए जाएं, इस पर भी काम किया जा रहा है।

IAF Chief on Drones: वायुसेना प्रमुख बोले- युद्ध में जीत नहीं दिला सकते ड्रोन, पारंपरिक फाइटर जेट्स की बनी रहेगी अहमियत

वहीं, इसी कार्यक्रम में वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि वायुसेना नई मिलिट्री फॉर्मेशंस बनाने के विरोध में नहीं है, लेकिन इसे पूरी चर्चा के बाद ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि थिएटर कमांड जैसे स्ट्रक्चर तभी कारगर होंगं, जब वे भारत की जरूरतों के अनुरूप हों और विदेश के किसी मॉडल की नकल न हों। एयर चीफ ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने ट्राई-सर्विसेज सिनर्जी को दिखाया, पर औपचारिक स्ट्रक्चर से यह कॉर्डिनेशन और मजबूत होगा।

उन्होंने कहा कि तीनों सेनाओं थलसेना, वायुसेना और नौसेना के बीच बेहतर तालमेल के लिए एक जॉइंट स्ट्रक्चर बनाया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह सुझाव दिया कि इस स्ट्रक्चर में पैरामिलिट्री फोर्सेज और सिविल एजेंसियों को भी शामिल किया जाए।

उन्होंने आगे कहा कि हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि तीनों सेनाएँ एकजुट होकर कितनी प्रभावी कार्रवाई कर सकती हैं। “शायद इस बार हमारे व्यक्तिगत तालमेल से यह संभव हुआ, लेकिन भविष्य में मतभेद भी हो सकते हैं। इसलिए अगर कोई फॉर्मल स्ट्रक्चर होगा, तो यह हमारे लिए सहायक होगा।”

सितंबर में एयर चीफ मार्शल सिंह ने थिएटर कमांड योजना पर विचार-विमर्श की जरूरत पर बल देते हुए कहा था कि जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि दिल्ली में एक संयुक्त योजना और समन्वय केंद्र बनाया जाए, जिससे तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय हो सके।

वायु प्रमुख ने आत्मनिर्भरता पर कहा कि देश सही दिशा में बढ़ रहा है पर रफ्तार बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने रेगुलेटरी एंड पॉलिसी अकोमोडेशंस का जिक्र करते हुए कहा कि निजी उद्योग और छोटे उद्यम भी रक्षा क्षेत्र में सक्रिय रूप से जुड़ सकें। एयर चीफ ने जोर दिया कि जहां देश की विशेषज्ञता कम है, वहां सही साझेदारी करके क्षमता बढ़ाई जानी चाहिए।

IAF Chief on Drones: वायुसेना प्रमुख बोले- युद्ध में जीत नहीं दिला सकते ड्रोन, पारंपरिक फाइटर जेट्स की बनी रहेगी अहमियत

IAF Chief on Drones
IAF chief AP Singh at the India Defence Conclave organised by BharatShakti

IAF Chief on Drones: भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने मंगलवार को कहा कि ड्रोन की आजकल हर कोई चर्चा कर रहा है, लेकिन केवल ड्रोन के दम पर युद्ध नहीं जीता जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि मानव चलित पारंपरिक एयरक्राफ्ट आने वाले समय में भी बेहद जरूरी रहेंगे।

Tejas MK1A Delivery Delay: बिना तेजस की डिलीवरी के सूनी रही IAF की दीपावली, HAL ने फिर तोड़ा वादा, ये है वजह

भारत शक्ति द्वारा आयोजित इंडिया डिफेंस कॉन्क्लेव में एयर चीफ सिंह ने कहा कि “ड्रोन नई तकनीक हैं और ये युद्ध के दौरान भ्रम पैदा कर सकते हैं या मदद कर सकते हैं, लेकिन असली लड़ाई जीतने के लिए अब भी ऐसे हथियारों की जरूरत होती है जो दुश्मन के अंदर तक जाकर सटीक हमला करें। फिलहाल ड्रोन अभी उस स्तर पर नहीं पहुंचे हैं।”

उन्होंने आगे कहा कि “अगर किसी लक्ष्य को पूरी तरह नष्ट करना है या दुश्मन की सीमा के भीतर गहराई तक वार करना है, तो इसके लिए भारी हथियारों से लैस विमान की जरूरत होती है। भविष्य में भी इंसान की भूमिका खत्म नहीं होगी, क्योंकि मुश्किल हालात में हमेशा ‘मैन इन द लूप’ यानी इंसानी कंट्रोल जरूरी होता है।”

एयर चीफ सिंह ने बताया कि दुनिया के कई देश इस समय छठी पीढ़ी के विमान बना रहे हैं, जो मैन्ड और बिना पायलट वाले विमानों के मिश्रण पर आधारित हैं। उन्होंने कहा, “इससे साफ है कि मैनड एयरक्राफ्ट कहीं नहीं जा रहे।”

वहीं, जब उनसे पूछा गया कि क्या लंबी दूरी के मिसाइलें ही भविष्य हैं, तो उन्होंने कहा कि यह हालात और टारगेट पर निर्भर करता है। “हर हालात में लंबी दूरी का हथियार जरूरी नहीं होता। कुछ जगहों पर कम नुकसान वाला हथियार चाहिए होता है। इसलिए हमें हर तरह के हथियारों का मिश्रण चाहिए यानी हर बीमारी की दवा पैरासिटामोल नहीं हो सकती।”

देश में आत्मनिर्भरता के प्रयासों पर बात करते हुए एयर चीफ ने कहा कि भारत रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में सही दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन रफ्तार बढ़ाने की जरूरत है। “हम अंधेरे में नहीं टटोल रहे, पर हमें और तेजी से काम करना होगा। नीतियों और नियमों को इस दिशा में लाया जा रहा है कि निजी क्षेत्र को अधिक मौके मिलें।”

उन्होंने यह भी कहा कि भारत को सब कुछ अकेले करने की जिद नहीं रखनी चाहिए। “जहां हमें विशेषज्ञता की कमी है, वहां हमें साझेदारी करनी चाहिए। अच्छी तकनीक के लिए सही भागीदारों के साथ काम करने से ही हम आत्मनिर्भर बन सकते हैं।”

ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए एयर चीफ मार्शल सिंह ने कहा कि दुनिया को इससे यह सीख लेनी चाहिए कि संघर्ष को सही समय पर खत्म करना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा, “दुनिया भर में कई जगह लक्ष्य तय कर लिए जाते हैं, लेकिन समय के साथ लोग यह भूल जाते हैं कि उन्होंने किस मकसद से लड़ाई शुरू की थी। इसके बाद युद्ध केवल अहंकार या राजनीतिक बयानबाजी का रूप ले लेता है।”

उन्होंने कहा कि कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के पहले ही दिन अपने लक्ष्य हासिल कर लिए थे, लेकिन पाकिस्तान युद्ध को बढ़ाना चाहता था। उन्होंने कहा, “जब भी दुश्मन ने युद्ध विराम की बात की, भारत ने उसे स्वीकार किया, और यह बिल्कुल सही फैसला था।”

जिस Project Yojak के तहत बनी रोहतांग अटल टनल, पूरे हुए उसके पांच साल, BRO ने मनाया स्थापना दिवसr

Project Yojak 5th Raising Day
Project Yojak 5th Raising Day

Project Yojak: भारतीय सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने अपने प्रोजेक्ट योजक का पांचवां स्थापना दिवस हिमाचल प्रदेश के सोलंग वैली में मनाया। इस मौके पर संगठन ने पिछले चार वर्षों की अपनी प्रमुख उपलब्धियों को साझा किया, जिनमें सड़कों, पुलों और टनलों का निर्माण शामिल है जो देश की सामरिक और सामाजिक दृष्टि से बेहद अहम हैं।

BRO Project Arunank: बीआरओ ने अरुणाचल प्रदेश में मनाया प्रोजेक्ट अरुणांक का 18वां स्थापना दिवस

प्रोजेक्ट योजक ने बीते चार वर्षों में 351.45 किलोमीटर सड़कें, 295.88 मीटर लंबे प्रमुख पुल, और 171 मीटर टनल का निर्माण किया है। ये सभी प्रोजेक्ट देश के सबसे दुर्गम और ऊंचाई वाले इलाकों में पूरे किए गए हैं। इन निर्माण कार्यों ने न केवल सीमावर्ती इलाकों को देश से जोड़ने में मदद की है, बल्कि स्थानीय लोगों के जीवन को भी आसान बनाया है।

इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी उपलब्धियों में अटल टनल, रोहतांग का निर्माण शामिल है, जो दुनिया की सबसे ऊंचाई पर बनी टनल मानी जाती है। इसके अलावा, निम्मू–पदम–दर्चा रोड पर 26 मार्च 2024 को कनेक्टिविटी बना कर इस प्रोजेक्ट ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 जुलाई 2024 को शिंकुन ला टनल की आधारशिला रखी, जो बनने के बाद दुनिया की सबसे ऊंची टनल होगी।

Project Yojak 5th Raising Day
Project Yojak 5th Raising Day

इसका अलावा प्रोजेक्ट योजक के तहत पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी बीआरओ ने सराहनीय कदम उठाए हैं। “एक पेड़ मां के नाम” अभियान के तहत हिमाचल प्रदेश के कई इलाकों में 550 पौधे लगाए गए। संगठन का उद्देश्य निर्माण कार्यों से होने वाले पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना और हरियाली को बढ़ावा देना है।

Project Yojak 5th Raising Day
Project Yojak 5th Raising Day

बीआरओ ने अपने कैजुअल पेड लेबरर्स के लिए भी कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं, जिनमें बेहतर आवास, गर्म कपड़े, स्वास्थ्य शिविर और बच्चों की शिक्षा की सुविधा शामिल हैं।

बीआरओ के प्रोजेक्ट योजक की शुरुआत 4 मार्च 2010 को प्रोजेक्ट रोहतांग टनल के तौर पर हुई थी। अटल टनल के सफल निर्माण के बाद इसे 4 नवंबर 2021 को “प्रोजेक्ट योजक” नाम दिया गया।

Indian Army Sports Conclave 2025: भारतीय सेना ने मिशन ओलंपिक 2036 के लिए कसी कमर, अब झोली भर-भर कर आएंगे मेडल

Indian Army Sports Conclave 2025

Indian Army Sports Conclave 2025: भारतीय सेना ने सोमवार को राजधानी दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में आर्मी स्पोर्ट्स कॉन्क्लेव 2025 का आयोजन किया। यह कार्यक्रम भारत के खेल इतिहास में एक अहम कदम माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य मिशन ओलंपिक 2036 को आगे बढ़ाना है।

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कार्यक्रम की शुरुआत में डायरेक्टर जनरल इंटीग्रेटेड ट्रेनिंग लेफ्टिनेंट जनरल अजय रामदेव ने कहा कि यह कॉन्क्लेव “उद्देश्य और जुनून का संगम” है, जहां सेना के खिलाड़ी देश की खेल महत्वाकांक्षाओं को साकार करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने मिशन ओलंपिक विंग और पैराअथलीट्स की सराहना की और वैज्ञानिक व डेटा-बेस्ड ट्रेनिंग पर जोर दिया।

कार्यक्रम में खेल मंत्रालय में सचिव हरि रंजन रावने कहा कि भारतीय सेना विश्वस्तरीय खिलाड़ियों को तैयार करने में लगातार योगदान दे रही है। उन्होंने टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम, खेलो इंडिया और स्पोर्ट्स साइंस इंटीग्रेशन जैसी सरकारी योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि देश को ओलंपिक 2036 के लिए दीर्घकालिक योजना पर काम करना होगा और इसके लिए सभी स्टेकहोल्डर्स में सामंजस्य बनाने की जरूरत है।

वहीं, कार्यक्रम में डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (इंफॉर्मेशन सिस्टम्स एंड ट्रेनिंग) लेफ्टिनेंट जनरल राकेश कपूर ने अपने विचार रखते हुए कहा कि सेना और खेलों का रिश्ता फिटनेस, अनुशासन और टीमवर्क पर आधारित है। उन्होंने सेना की प्रमुख खेल पहलों पर प्रकाश डाला और कहा कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तैयार ट्रेनिंग ही सफलता की कुंजी है। उन्होंने सेना, भारतीय खेल प्राधिकरण, निजी क्षेत्र और शिक्षा जगत के बीच तालमेल का आग्रह करते हुए भारत के ओलंपिक मिशन 2036 के लिए सामूहिक संकल्प का आह्वान किया।

इस कॉन्क्लेव में दो मुख्य विषयों “इंस्टीट्यूशनल सिनर्जी” और “एथलीट 360” पर चर्चा की गई, जिनका उद्देश्य खिलाड़ियों के समग्र विकास और संस्थागत सहयोग को मजबूत करना था।

Indian Army Sports Conclave 2025
Indian Army Hosts Army Sports Conclave 2025 to Drive India’s Olympic Mission 2036

कार्यक्रम में तीन दिग्गज खिलाड़ियों को आर्मी स्पोर्ट्स लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इनमें कर्नल (से.नि.) बलबीर सिंह कुल्लर (ओलंपिक ब्रॉन्ज, हॉकी 1968), मुरलीकांत पेटकर (पैरालंपिक गोल्ड 1972) और ऑनरी कैप्टन विजय कुमार शर्मा (ओलंपिक सिल्वर, शूटिंग 2012) शामिल रहे।

सम्मान समारोह का आयोजन दक्षिण ब्लॉक में किया गया, जहां सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने इन खिलाड़ियों को सम्मानित किया। कार्यक्रम का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि भारतीय सेना देश को ओलंपिक मिशन 2036 के लिए और मजबूत बनाएगी, ताकि भारत खेलों में विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना सके।

Indian Army Drone Capability Drive: आत्मनिर्भर भारत के तहत भारतीय सेना की ड्रोन क्षमता में बड़ी छलांग

Indian Army Drone Capability Drive

Indian Army Drone Capability Drive: भारतीय सेना ने आत्मनिर्भर भारत के विजन को साकार करते हुए अपनी ड्रोन क्षमता को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। साउदर्न कमांड ने “Eagle on Every Arm” के मंत्र के साथ एक स्वदेशी इकोसिस्टम तैयार किया है, जो कॉम्बैट-रेडी ड्रोन के डिजाइन, निर्माण और बड़े पैमाने पर उत्पादन करेगाा।

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इस पहल में सेना के कॉर्प्स ऑफ ईएमई और देश के एमएसएमई सेक्टर की कंपनियों की भागीदारी है। ये ड्रोन हब्स आधुनिक अनमैन्ड एरियल सिस्टम तैयार कर रहे हैं, जिनका इस्तेमाल निगरानी, सटीक हमलों और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसी भूमिकाओं में किया जाएगा।

हाल ही में ये स्वदेशी ड्रोन एक्सरसाइज त्रिशूल के दौरान सफलतापूर्वक परखे गए, जहां उन्होंने कठिन युद्ध परिस्थितियों में अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया। इन ड्रोन का प्रदर्शन भारतीय सेना के लिए एक अहम उपलब्धि माना जा रहा है।

भारतीय सेना की यह पहल न केवल तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि यह दर्शाती है कि देश की सेना अब भविष्य की युद्ध स्थितियों के लिए पूरी तरह तैयार हो रही है। साउदर्न कमांड इस बदलाव के अग्रणी मोर्चे पर खड़ी है और इनोवेशन, स्वदेशी उद्योग सहयोग तथा सामरिक तैयारी को एक साथ जोड़ रही है।

AMCA Project के लिए लार्सन एंड टूब्रो और BEL ने डायनामाइट टेक्नोलॉजीज बनाया एक्सक्लूसिव पार्टनर

AMCA Fighter Jet India
AMCA Fighter Jet India (File Photo)

AMCA Project: भारत के 5वीं पीढ़ी के फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोजेक्ट AMCA को लेकर लार्सन एंड टूब्रो और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के गठबंधन में अब एक नया नाम जुड़ गया है। दोनों ने डायनामाइट टेक्नोलॉजीज को इस प्रोजेक्ट का एक्सक्लूसिव पार्टनर बनाया है।

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एल एंड टी की तरफ से जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक यह सहयोग भारत के एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। डायनामाइट टेक्नोलॉजीज की एयरोस्ट्रक्चर और सब-सिस्टम मैन्युफैक्चरिंग में विशेषज्ञता है, वहीं लार्सन एंड टूब्रो की इंजीनियरिंग क्षमता और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड की एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स टेक्नोलॉजी, इन तीनों की ताकत अब एक साथ मिलकर एएमसीए के डेवलपमेंट में योगदान देगी।

लार्सन एंड टूब्रो के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और हेड, प्रिसिशन इंजीनियरिंग एंड सिस्टम्स, अरुण रामचंदानी ने कहा, “डायनामाइट टेक्नोलॉजीज के जुड़ने से हमारी टीम में एक नई ऊर्जा आई है। यह साझेदारी सिर्फ अगली पीढ़ी का फाइटर जेट बनाने का मिशन नहीं, बल्कि भारतीय एयरोस्पेस इंडस्ट्री को नए स्तर पर ले जाने का कदम है।”

वहीं, डायनामाइट टेक्नोलॉजीज के सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर उदयंत मल्होत्रा ने कहा, “हम तीन दशकों से सुपरसोनिक एयरक्राफ्ट स्ट्रक्चर बनाने के अग्रणी रहे हैं। अब लार्सन एंड टूब्रो और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के साथ जुड़कर भारत के 5वीं पीढ़ी के फाइटर विमान के निर्माण में योगदान देना हमारे लिए गर्व की बात है।”

एएमसीए प्रोजेक्ट भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य एक ऐसा फाइटर जेट तैयार करना है जो स्टेल्थ टेक्नोलॉजी, सुपरक्रूज क्षमता, एडवांस एवियोनिक्स सिस्टम, और नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर के मुताबिक हो।

वहीं, इस साझेदारी से भारत में एडवांस एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी, फाइटर जेट कंपोनेंट डिजाइन, और हाई-प्रिसिशन मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

Trump Pakistan Nuclear Bluff: ट्रंप हर बार फंस जाते हैं पाकिस्तान के परमाणु झांसे में, पीएम मोदी तो पहले ही कर चुके हैं बेनकाब

Trump Pakistan Nuclear Bluff

Trump Pakistan Nuclear Bluff: अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सीबीएस (CBS) इंटरव्यू में किए गए दावों से फिर एक बार यह संकेत मिलता है कि वाशिंगटन अभी भी पाकिस्तान की परमाणु रणनीति से प्रभावित है। ट्रंप ने दावा किया कि भारत और पाकिस्तान मई 2025 में एक परमाणु युद्ध के बहुत करीब पहुंच गए थे और उन्होंने खुद हस्तक्षेप करके इसे टाल दिया था। उनका कहना था कि उन्होंने दोनों देशों को चेतावनी दी कि अगर वे तुरंत नहीं रुके तो अमेरिका उनके साथ व्यापार संबंधों को खत्म कर देगा।

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लेकिन इस दावे ने भारत और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं क्योंकि वे इसे पाकिस्तान के परमाणु ब्लैकमेल की रणनीति का हिस्सा मानते हैं। उनका कहना है कि ट्रंप ने उस रणनीति को वैधता दे दी है, जिसे भारत पहले ही कई बार उजागर कर चुका है।

Trump Pakistan Nuclear Bluff: क्या कहा ट्रंप ने इंटरव्यू में

इंटरव्यू दौरान ट्रंप ने एक कागज की शीट पढ़ते हुए अपनी उपलब्धियों का जिक्र किया, जिसमें पाकिस्तान और भारत को आठवां पॉइंट बताया। उन्होंने कहा, “मैंने आठ युद्धों को रोका। भारत और पाकिस्तान वाला तो ‘ब्यूटी’ था। वे न्यूक्लियर युद्ध के कगार पर थे। हवाई जहाजों को इधर-उधर गिराया जा रहा था। मैंने दोनों को फोन किया– नरेंद्र मोदी और शहबाज शरीफ को और कहा, ‘अगर आप नहीं रुके, तो अमेरिका के साथ कोई व्यापार नहीं होगा।'” ट्रंप ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शरीफ का हवाला देते हुए जोड़ा, “उन्होंने कहा कि अगर डोनाल्ड ट्रंप न शामिल होते, तो लाखों लोग मर चुके होते।”

ट्रंप ने दावा करते हुए कि रूस, चीन, उत्तर कोरिया और पाकिस्तान गुप्त रूप से अंडरग्राउंड परमाणु टेस्ट कर रहे हैं। “हम इकलौते देश हैं जो टेस्ट नहीं करते। पाकिस्तान टेस्ट कर रहा है, लेकिन कोई बात नहीं करता।”

Trump Pakistan Nuclear Bluff: पाकिस्तान की परमाणु ‘डर’ की रणनीति

लंबे समय से पाकिस्तान अपने परमाणु हथियारों की धमकी का इस्तेमाल राजनीतिक और रणनीतिक दबाव बनाने के लिए करता रहा है। इस रणनीति के तहत हर बार जब भारत सीमा क्षेत्र में कार्रवाई करता है, पाकिस्तान परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की चेतावनी देता है। इस तरह के बयान अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को समर्थन दिलाते हैं और अमेरिका जैसे देशों को दखल देने के लिए प्रेरित करते हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका इस तरह के परमाणु डराने वाले बयान से कई बार फंसा है और संतुलन बनाने की कोशिश में रहा है। वह भारत को नियंत्रित रखना चाहता है और पाकिस्तान को किसी बड़े संघर्ष में नहीं पड़ने देना चाहता है। ट्रंप का हालिया बयान उसी सोच को दर्शाता है जिसमें अमेरिका ने भारत को “आक्रामक” और पाकिस्तान को “संवेदनशील परमाणु शक्ति” बताया है।

पीएम मोदी ने पहले ही पाकिस्तानी ब्लफ को किया बेनकाब

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कई बार यह दिखा दिया है कि पाकिस्तान का परमाणु खतरा असल में खोखली बयानबाजी है। कारगिल युभारत द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक 2016, बालाकोट एयरस्ट्राइक 2019 और ऑपरेशन सिंदूर 2025 के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि पाकिस्तान ने अपनी परमाणु चेतावनियों को आगे बढ़ाने का साहस नहीं दिखाया। वहीं, भारत अब पाकिस्तान की “न्यूक्लियर ब्लैकमेल डिप्लोमेसी” से बाहर निकल चुका है।

इस तरह भारत ने यह संदेश दिया कि वह डर या धमकी के आधार पर पीछे नहीं हटेगा। इसके उलट, पाकिस्तान की रणनीति नियमित रूप से परमाणु हथियारों को राजनीतिक बयानबाजी के तौर पर इस्तेमाल करती आई है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद 12 मई को प्रधानमंत्री मोदी ने अपने राष्ट्रीय संबोधन में कहा था, “भारत किसी भी परमाणु ब्लैकमेल को बर्दाश्त नहीं करेगा। हम आतंकवाद और उसके संरक्षक पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई करते हुए किसी धमकी से नहीं डरेंगे।”

इसके बाद इसके बाद 15 अगस्त 2025 को लाल किला से स्वतंत्रता दिवस के भाषण में मोदी ने कहा, “भारत ने तय कर लिया है कि अब परमाणु धमकियों के आगे नहीं झुकेगा। हमारी सेनाओं ने आतंक के आकाओं को ऐसी सजा दी है जो वे कभी सोच भी नहीं सकते थे। खून और पानी साथ नहीं बह सकते।”

वहीं, 29 जुलाई को लोकसभा में प्रधानमंत्री ने फिर दोहराया, “पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान ने परमाणु धमकियां शुरू कीं, लेकिन अब कोई ब्लैकमेल काम नहीं करेगा। हम आतंक समर्थक सरकारों और उनके नेताओं में भेद नहीं करेंगे।”

Trump Pakistan Nuclear Bluff: आज भी पुरानी सोच में उलझा हुआ है अमेरिका

भारत ने हमेशा से स्पष्ट किया है कि वह सैन्य कार्रवाई पर भरोसा करता है और आतंकवाद तथा सीमावर्ती चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार है, अमेरिका की नीति आज भी पाकिस्तान की परमाणु रणनीति से प्रभावित नजर आती है। अमेरिकी रणनीति में अब भी यह धारणा है कि पाकिस्तान “एक अस्थिर परमाणु शक्ति” है और उसे संतुलित रखना दक्षिण एशिया की शांति के लिए जरूरी है।

ट्रंप ने इस धारणा को अपने बयान में दोहराया, उन्होंने कहा कि अगर भारत और पाकिस्तान ने नियंत्रण नहीं किया तो अमेरिका को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। इस तरह का कथन यह संकेत देता है कि अमेरिका आज भी पाकिस्तान द्वारा पेश की जाने वाली परमाणु धमकी को गंभीरता से ले रहा है और उसकी नीति उसी जोखिम का सामना नहीं कर पा रही है जिसे भारत ने बेहतर तरह से मैनेज किया है।

भारत के रक्षा विश्लेषक एवं रणनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने ट्रंप के इस बयान को “राजनीतिक प्रदर्शन” कहा है। उनका मानना है कि अमेरिका बार-बार पाकिस्तान की परमाणु बयानबाजी में फंस जाता रहा है, जबकि भारत ने उस बयानबाजी को सफलता पूर्वक चुनौती दी है।

विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप का बयान न सिर्फ भारत के रणनीतिक दृष्टिकोण को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है बल्कि पाकिस्तान को राजनीतिक लाभ भी देता है क्योंकि वह फिर से अपनी परमाणु रणनीति को वैश्विक मंच पर हावी कर पाता है।

संयुक्त राष्ट्र समर्थित संस्था सीटीबी के रिकॉर्ड ट्रंप के इस दावे का समर्थन नहीं करते। सीटीबीटी की रिपोर्ट के अनुसार, 1996 में इस संधि के लागू होने के बाद से दुनिया में दस से भी कम आधिकारिक परमाणु परीक्षण हुए हैं। इनमें केवल उत्तर कोरिया को छोड़कर किसी अन्य देश रूस, चीन या पाकिस्तान ने कोई नया परीक्षण नहीं किया है।

सीटीबीटी का मुख्यालय वियना में है और यह संस्था दुनिया में परमाणु परीक्षणों की निगरानी के लिए बनाई गई है। इसका इंटरनेशनल मॉनिटरिंग सिस्टम दुनिया का सबसे एडवांस सिस्टम है। इस सिस्टम में 337 मॉनिटरिंग स्टेशन और 16 विशेष प्रयोगशालाएं शामिल हैं, जो धरती के हर कोने में स्थापित हैं। यह नेटवर्क परमाणु विस्फोटों के बेहद छोटे संकेतों को भी पकड़ सकता है।

कैसे काम करता है इंटरनेशनल मॉनिटरिंग सिस्टम

इंटरनेशनल मॉनिटरिंग सिस्टम में कई तकनीकी सेंसर और डिटेक्टर शामिल हैं। इसका एयर-टेस्टिंग स्टेशन, जो वातावरण में रेडियोएक्टिव तत्वों की मामूली मात्रा का पता लगाते हैं। जबकि अंडरवॉटर हाइड्रो-अकॉस्टिक स्टेशन, समुद्र के नीचे हुए विस्फोटों की ध्वनि तरंगें पकड़ते हैं। वहीं, इंफ्रासाउंड डिटेक्टर, जो वायुमंडल में हुए बड़े धमाकों की कम आवृत्ति वाली गूंज को भी रिकॉर्ड करते हैं। सीस्मोमीटर भूमिगत परमाणु परीक्षणों से उत्पन्न झटकों को मापते हैं। ये सभी उपकरण मिलकर धरती पर कहीं भी होने वाले परमाणु विस्फोटों के संकेत पहचान सकते हैं।

हाल ही में प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार, जब किसी परमाणु विस्फोट के कंपन किसी भूकंप की तरंगों से मिल जाते हैं, तो उन्हें पहचानना कठिन हो जाता है। 1.7 टन के भूमिगत विस्फोट को 97 फीसदी सटीकता से पहचाना जा सकता है, लेकिन यदि यह किसी भूकंप की तरंगों के भीतर छिप जाए, तो सफलता दर घटकर 37 फीसदी रह जाती है।

इसके बावजूद, सीटीबीटी का कहना है कि उनका निगरानी सिस्टम इतना संवेदनशील है कि वह किसी भी “गंभीर” परमाणु विस्फोट को पहचान सकती है, और हाल के सालों में पाकिस्तान या चीन से कोई ऐसा संकेत नहीं मिला है।

चीन ने किया खंडन, पाकिस्तान खामोश

ट्रंप के दावे के बाद चीन ने तुरंत प्रतिक्रिया दी और इन आरोपों को बेसलेस और इररेस्पॉन्सिबल बताया। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा, “चीन ने हमेशा परमाणु परीक्षणों पर रोक का पालन किया है और वैश्विक प्रतिबंधों का सख्ती से समर्थन करता है।”

दूसरी ओर, पाकिस्तान ने इस पूरे विवाद पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। केवल विदेश मंत्रालय की  वेबसाइट पर एक बयान डाला है, “पाकिस्तान, भले ही व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि पर हस्ताक्षर करने वाला देश नहीं है, लेकिन वह इस संधि के उद्देश्यों और सिद्धांतों का समर्थन करता है। वह दक्षिण एशिया में स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। हमने परीक्षणों पर मोराटोरियम घोषित किया है और यह प्रतिबद्धता जारी रहेगी। हम क्षेत्र में परमाणु परीक्षण फिर से शुरू करने वाले पहले देश नहीं होंगे।”

हालांकि इस्लामाबाद की इस चुप्पी को लेकर रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान इस विषय पर सीधे जवाब देने से बच रहा है, क्योंकि उसके पास ऐसे परीक्षणों के किसी भी प्रमाण का अभाव है। इसलिए वह जानबूझ कर खामोश है क्योंकि उसके बोलते ही न्यूक्लियर ब्लफ वाला पिटारा खुल जाएगा।