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Chicken Neck Corridor: मोहम्मद यूनुस को पाकिस्तानी जनरल शमशाद मिर्जा को किताब गिफ्ट करना पड़ा भारी! भारत ने चिकन नेक पर कसी ‘नकेल’

Chicken Neck Corridor
1. General Sahir Shamshad Mirza, paid a courtesy call on Chief Adviser Professor Muhammad Yunus at the State Guest House Jamuna late Saturday. 2. Mehmet Akif Yılmaz, Member of the Turkish Parliament and Chairperson of the Türkiye-Bangladesh Parliamentary Friendship Group, called on Chief Adviser Professor Muhammad Yunus at the State Guest House Jamuna on Monday

Chicken Neck Corridor: हाल ही में भारत ने बांग्लादेश सीमा से सटे कुछ संवेदनशील भारतीय इलाकों में तीन नए सैन्य ठिकाने बनाए हैं। ये नए सैन्य ठिकाने बांद्रा-धुबरी के पास बामुनी, बिहार के किशनगंज और पश्चिम बंगाल के चोप्रा जिले के पास बनाए गए हैं। इन स्थानों को चुना गया है क्योंकि इन्हें सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील माना गया है और ये सिलिगुड़ी कॉरिडोर, जिसे आम बोलचाल में “चिकन-नेक” (Chicken Neck Corridor) कहा जाता है, उसके नजदीक स्थित हैं। यह कॉरिडोर ही वह रास्ता है जिसके जरिए भारत अपने पूर्वोत्तर राज्यों असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और सिक्किम से जुड़ा हुआ है।

Chicken Neck Corridor: चिकन नेक के आसपास बढ़ाया ऑपरेशनल कंट्रोल

सरकारी और खुफिया सूत्रों के मुताबिक, इन तीनों इलाकों को भारत की सीमा सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता था। अब इन इलाकों में सेना की मौजूदगी बढ़ने से भारत की सीमा सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत होगी। इस कदम को केवल सामरिक नहीं, बल्कि रणनीतिक स्तर पर भी एक बड़ा संकेत माना जा रहा है। इस कदम के तहत भारतीय सेनाओं ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास लगभग 60 किलोमीटर तक अपना ऑपरेशनल कंट्रोल बढ़ा दिया है।

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सरकारी सूत्रों ने कहा कि इन नए सैन्य ठिकाने का मुख्य मकसद सीमावर्ती इलाकों में निगरानी बढ़ाना और जरूरी होने पर तुरंत जवाबी कार्रवाई करना है। सिलिगुड़ी कॉरिडोर (Chicken Neck Corridor) बेहद ही संकरा कॉरिडोर है, जो भारत को नौ उत्तर-पूर्वी राज्यों से जोड़ता है। इस कॉरिडोर की चौड़ाई कुछ स्थानों पर मात्र 22 किलोमीटर है और इसलिए इसे रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील माना जाता है। उसी को ध्यान में रख कर सुरक्षा व्यवस्थाओं को और मजबूत किया जा रहा है।

अगर इस क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है तो भारत का पूर्वोत्तर देश के बाकी हिस्से से कट सकता है। इसलिए, भारत ने इस क्षेत्र में सैन्य ढांचे को मजबूत करने और लगातार निगरानी बढ़ाने का फैसला लिया है।

Chicken Neck Corridor: ढाका में विवादास्पद घटना के बाद भारत का कदम

भारत का यह फैसला उस घटना के बाद आया है, जब 25 अक्टूबर को ढाका में एक बैठक के दौरान बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस पाकिस्तान के जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटी के चेयरमैन जनरल साहिर शमशाद मिर्जा को एक किताब भेंट की थी। जिसमें भारत के पूर्वोत्तर हिस्से को “ग्रेटर बांग्लादेश” का हिस्सा दिखाया गया था। यह घटना भारत के लिए एक साफ राजनीतिक संदेश मानी गई और नई दिल्ली ने इसे उकसावे की कार्रवाई बताया।

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सरकारी सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान द्वारा “ग्रेटर बांग्लादेश” जैसे विचारों को बढ़ावा देना दक्षिण एशिया में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश है। भारत ने इस पर संयम बरतते हुए भी अपने इस नए इंफ्रास्ट्रक्चर (Chicken Neck Corridor) को एक्टिव कर दिया है।

हालांकि केंद्र सरकार का रुख अभी भी संवाद और क्षेत्रीय सहयोग की ओर है, लेकिन उसे यह साफ भी बताया गया है कि देश की संप्रभुता पर हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

बांग्लादेश में हुई इस घटना के बाद से भारत में कई वर्गों में निराशा और चिंता है। भारत ने 1971 में बांग्लादेश की आजादी में अहम भूमिका निभाई थी और तब से दोनों देशों के बीच एतिहासिक मित्रता रही है। लेकिन हालिया घटनाओं को इस रिश्ते में दरार डालने वाला माना जा रहा है। भारत में इस बात पर भी नाराजगी है कि पाकिस्तान की भूमिका इस पूरे विवाद में फिर से उभरकर सामने आई है।

सरकारी और खुफिया सूत्रों ने बताया कि इन तीन नये सैन्य ठिकानों (Chicken Neck Corridor) में रोटेशनल टुकड़ियां, इलाके की निगरानी के आधुनिक संसाधन, कॉन्वॉय मॉनिटरिंग सिस्टम और लोकल लायजन यूनिट्स शामिल होंगी। ये स्थानीय सिविल प्रशासन और सीमा बलों के साथ मिलकर काम करेंगे ताकि सीमापार गतिविधियों पर सटीक जानकारी मिले और किसी भी असामान्य गतिविधि का समय पर जवाब दिया जा सके।

तीनों नए ठिकानों से भारतीय सेना को सीमावर्ती इलाकों में रियल-टाइम निगरानी और रैपिड रिस्पॉन्स क्षमता मिलेगी। अब अगर किसी भी सीमा पार गतिविधि का संकेत मिलता है, तो भारतीय बल तुरंत कार्रवाई कर सकेंगे। इन ठिकानों से ड्रोन नेटवर्क, इंटेलिजेंस यूनिट्स और रडार सिस्टम्स को भी जोड़ा गया है।

सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम भारत की कम्प्रिहेंसिव बॉर्डर स्ट्रैटेजी (Chicken Neck Corridor) का हिस्सा है। इसके तहत सरकार डिप्लोमेसी, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और मिलिट्री प्रिपेयर्डनेस तीनों को एक साथ जोड़ रही है, ताकि सीमाओं पर हर प्रकार के खतरे का प्रभावी जवाब दिया जा सके।

IAF Medium Transport Aircraft: भारतीय वायुसेना खरीदेगी 80 नए ट्रांसपोर्ट विमान, अमेरिका, ब्राजील और यूरोप की कंपनियों में कांटे की टक्कर

IAF Medium Transport Aircraft

IAF Medium Transport Aircraft: रक्षा मंत्रालय जल्द ही भारतीय वायुसेना के लिए मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (एमटीए) की खरीद प्रक्रिया शुरू करने जा रहा है। इसके तहत वायुसेना को 18 से 30 टन तक का वजन ढोने वाले 80 तक नए ट्रांसपोर्ट विमान मिल सकते हैं। इस बड़े रक्षा सौदे की दौड़ में तीन अंतरराष्ट्रीय कंपनियां शामिल हैं। जिनमें अमेरिका की लॉकहीड मार्टिन, ब्राजील की एम्ब्रेयर और यूरोप की एयरबस डिफेंस एंड स्पेस हैं।

सूत्रों के अनुसार, डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल इस प्रपोजल को दिसंबर के आखिर तक एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी (एओएन) मंजूरी दे सकती है। बता दें कि यह किसी भी डिफेंस सौदे की खरीद की पहली औपचारिक मंजूरी होती है। मंजूरी के बाद 2026 की शुरुआत में टेंडर जारी किए जाएंगे।

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रक्षा सूत्रों के मुताबिक, इन 80 विमानों (IAF Medium Transport Aircraft) की खरीद “मेक इन इंडिया” योजना के तहत की जाएगी। यानी जिस भी कंपनी के साथ यह डील साइन होगी, उसे भारत में ही इन विमानों की असेंबली और प्रोडक्शन लाइन तैयार करनी होगी। इससे देश में रक्षा उत्पादन और तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा।

भारतीय वायुसेना के पास वर्तमान में 12 सी-130जे सुपर हरक्यूलिस एयरक्राफ्ट हैं, जिनका इस्तेमाल कार्गो, सैनिकों और राहत सामग्री के लिए किया जाता है। लॉकहीड मार्टिन कंपनी का कहना है कि भारत में पहले से ही इन विमानों के मेंटेनेंस और ट्रेनिंग के लिए पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है, जिससे तुरंत डिलीवरी देने में मदद मिलेगी।

कंपनी का कहना है, “भारतीय वायुसेना हमारे एयरक्राफ्ट (IAF Medium Transport Aircraft) के परफॉरमेंस से संतुष्ट है। हम भारत में अपनी साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।” लॉकहीड मार्टिन ने इस प्रोजेक्ट के लिए टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड के साथ साझेदारी की है। वहीं, ब्राजील की एम्ब्रेयर ने हाल ही में महिंद्रा ग्रुप के साथ करार किया है। एयरबस ने अभी तक अपने भारतीय पार्टनर के नाम का एलान नहीं किया है।

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एयरबस अपना एटलस ए400एम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (IAF Medium Transport Aircraft) ऑफर कर रही है, जिसकी पेलोड कैपेसिटी 40 टन तक है। वहीं एयरबस भारत में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, इंडिजिनाइजेशन और प्रोडक्शन लाइन सेटअप पर फोकस कर रही है। साथ ही एयरबस ने रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन का जवाब दिया है और लोकल मैन्युफैक्चरिंग की पेशकश भी की है।

वहीं, बाकी दोनों कंपनियों की तुलना में एयरबस एटलस ए400एम की पेलोड कैपेसिटी 40 टन, जबकि लॉकहीड मार्टिन के सी-130जे की कैपेसिटी 20 टन और एम्ब्रेयर केसी-390 मिलेनियम की कैपेसिटी 26 टन है। वहीं एटलस ए400एम 25 टन के जोरावर लाइट टैंक को आसानी से ढो सकता है।

रक्षा मंत्रालय ने करीब तीन साल पहले इन ट्रांसपोर्ट विमानों (IAF Medium Transport Aircraft) की जरूरत को लेकर कई विदेशी कंपनियों से आरएफआई मांगी थी। भारत ने उनसे यह भी पूछा था कि वे कितनी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर देने को तैयार हैं और देश में कितना इंडिजिनाइजेशन कर सकते हैं। इसमें यह भी शामिल था कि क्या भारत को इस क्षेत्र में रीजनल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाया जा सकता है।

लॉकहीड मार्टिन और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स बेंगलुरु में एक एमआरओ (मेंटेनेंस, रिपेयर एंड ओवरहॉल) सेंटर तैयार कर रहे हैं, जो 2027 तक काम करना शुरू करेगा। यह सेंटर भारत के मौजूदा सी-130जे फ्लीट की देखभाल करेगा।

इसके अलावा रूस भी यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन का नया आईएल-276 (IAF Medium Transport Aircraft) भी ऑफर कर रहा है। जिसकी पेलोड कैपेसिटी करीब 20 टन है। रूस इसे एचएएल के साथ मिलकर पेश करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन मौजूदा जियोपॉलिटिकल हालात के चलते इसके साथ साझेदारी करना मुश्किल माना जा रहा है। हालांकि अभी हाल ही में यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन यानी यूएसी ने एचएएल के साथ मिल कर सिविल कम्यूटर एयरक्राफ्ट एसजे-100 के प्रोडक्शन के लिए एक एमओयू पर दस्तखत किए हैं।

वहीं, एयरबस कंपनी पहले से ही भारत में एक बड़ा डिफेंस प्रोजेक्ट चला रही है। कंपनी भारतीय वायुसेना को 56 सी-295 ट्रांसपोर्ट विमान उपलब्ध करा रही है। यह प्रोजेक्ट 21,935 करोड़ रुपये का है और इसे भी टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स के साथ मिलकर किया जा रहा है।

ब्राजील की एम्ब्रेयर (IAF Medium Transport Aircraft) भी भारत से जुड़ी हुई है। उसने पहले ही देश को आठ विमान सप्लाई किए हैं, जिनका इस्तेमाल वीवीआईपी यात्रा और एयरबोर्न अर्ली वार्निंग मिशनों के लिए किया जाता है। रक्षा सूत्रों का कहना है कि नए ट्रांसपोर्ट विमानों की खरीद से भारतीय वायुसेना की एयरलिफ्ट क्षमता में बड़ा इजाफा होगा। यह विमान सैनिकों, उपकरणों, और राहत सामग्रियों की तेजी से ले सकेंगे।

भारतीय वायुसेना लंबे समय अपने लिए मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (IAF Medium Transport Aircraft) तलाश रही है, जिसका मकसद पुराने एंटोनोव एएन-32 और इल्यूशिन आईएल-76 जैसे सोवियत युग के ट्रांसपोर्ट विमानों को रिप्लेस करना हैं। भारत के पास लगभग 100 एन-32 एयरक्राफ्ट हैं जबकि 17 के आसपास आईएल-76 हैं। पुराने होने के चलते इनका मेंटेनेंस खर्च काफी बढ़ गया है। इसलिए वायुसेना अपनी एयरलिफ्ट कैपेसिटी को आधुनिक बनाना चाहता है।

एमटीए प्रोग्राम (IAF Medium Transport Aircraft) के तहत भारत को 18 से 30 टन पेलोड कैपेसिटी वाले विमानों की जरूरत है। जिसके तहत 40 से 80 विमान खरीदे जाने हैं। यह विमान न केवल सैनिकों और उपकरणों के ट्रांसपोर्टेशन के लिए इस्तेमाल होंगे, बल्कि इन्हें लद्दाख जैसे हाई-ऑल्टिट्यूड इलाकों और शॉर्ट रनवे से ऑपरेट करने के लिए डिजाइन किया जाएगा। इनकी क्षमता इतनी होगी कि ये 25 टन वजनी जोरावर लाइट टैंकतक को भी एयरलिफ्ट कर सकें। साथ ही, इन विमानों में एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग, रैपिड ट्रूप डिप्लॉयमेंटऔर आपातकालीन राहत कार्य की क्षमता भी होगी।

यह पूरा प्रोजेक्ट (IAF Medium Transport Aircraft) मेक इन इंडिया पहल के तहत लागू किया जाएगा। इसके तहत भारत में ही मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और कम से कम 50 प्रतिशत स्वदेशी कंटेंट का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके साथ ही एक एमआरओ हब भी बनाया जाएगा, ताकि रखरखाव और मरम्मत के लिए विदेशों पर निर्भरता कम हो। रक्षा मंत्रालय ने इस प्रोग्राम के लिए दिसंबर 2022 में आरएफआई जारी किया था और अब तक सभी कंपनियों के जवाब मिल चुके हैं। अब जल्द ही इसका आरएफपी जारी किया जाएगा।

Tughril vs Nilgiri Class: पाक नेवी में चीन की ‘स्विस आर्मी नाइफ’ फ्रिगेट्स, तुघरिल के सामने भारत का नीलगिरी, कौन है ज्यादा ताकतवर?

Tughril vs Nilgiri Class
Tughril vs Nilgiri Class

Tughril vs Nilgiri Class: चीन से मिली टाइप 054ए/पी क्लास की जंगी तुघरिल क्लास फ्रिगेट्स को पाकिस्तान की नौसेना ने अपने बेड़े में शामिल किया है। पाकिस्तान नौसेना के प्रमुख एडमिरल नविद अशरफ ने इसे चीन के साथ रक्षा सहयोग के इतिहास में एक “महत्वपूर्ण उपलब्धि” बताया है। उन्होंने कहा कि इन जहाजों के शामिल होने से पाकिस्तान नौसेना की मल्टी-मिशन क्षमताएं खास तौर पर एयर डिफेंस, एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और समुद्री निगरानी—काफी मजबूत हुई हैं।

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बीजिंग स्थित सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में एडमिरल अशरफ ने कहा कि पाकिस्तान नौसेना को 2026 तक चीन से आठ नई हैंगोर क्लास पनडुब्बियां मिलने वाली हैं। साथ ही उन्होंने यह संकेत भी दिया कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग सिर्फ जहाजों या पनडुब्बियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में यह संबंध और गहरे होंगे।

Tughril vs Nilgiri Class: पाकिस्तान के लिए रणनीतिक बढ़त

इन फ्रिगेट्स का इस्तेमाल पाकिस्तान नौसेना उत्तर अरब सागर और हिंद महासागर क्षेत्र में गश्त और निगरानी के लिए कर रही है। पाकिस्तान ने 2017 में चीन से चार ऐसी फ्रिगेट्स का ऑर्डर दिया था। इनमें से पहली ‘तुघरिल’ फ्रिगेट नवंबर 2021 में पाकिस्तान को मिली। ये सभी जहाज चीन की चाइना स्टेट शिपबिल्डिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड ने बनाए हैं। अब तक पाकिस्तान को चार तुघरिल क्लास फ्रिगेट्स मिल चुकी हैं जिनमें पीएनएस तुघरिल, पीएनएस तैमूर, पीएनएस टिप्पू सुल्तान और पीएनएस शाहजहां शामिल हैं।

PNS Tughril Class
PNS Tughril Class

पाकिस्तान नौसेना ने इन जहाजों को “तुघरिल क्लास” नाम दिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ये फ्रिगेट्स लो-रडार डिजाइन वाली हैं और विशेष रूप से एंटी-सबमरीन वॉरफेयर के लिए कस्टमाइज की गई हैं। अब तक पाकिस्तान को चार जहाज मिल चुके हैं और आने वाले सालों में चार और की डिलीवरी की योजना है।

Tughril vs Nilgiri Class: चीन का भरोसेमंद ‘मल्टी-रोल’ वॉरशिप

चीन की नौसेना ने पहली टाइप 054ए फ्रिगेट वर्ष 2008 में सेवा में शामिल की थी। कहा जाता है कि इसका डिजाइन फ्रांस की ला फयेते-क्लास फ्रिगेट से प्रेरित है। नाटो में इस जहाज को जियांगकाई-II नाम से पहचाना जाता है। 2023 तक चीन की नौसेना के पास ऐसी 30 से ज्यादा फ्रिगेट्स थीं, जिससे साफ है कि इस जहाज पर चीन को काफी भरोसा है।

विशेषज्ञ इसे “स्विस आर्मी नाइफ” जैसी मल्टीपर्पज शिप कहते हैं, क्योंकि यह एक साथ कई मिशन जैसे कि पेट्रोलिंग, एस्कॉर्ट, एंटी पायरेसी और नॉन कॉम्बैट मिशन पूरे कर सकता है। चीन ने पहली बार इसी जहाज का इस्तेमाल 2011 में लीबिया से अपने नागरिकों को निकालने के लिए किया था।

क्या फायदा होगाा पाकिस्तान की नौसेना को

इन टाइप 054ए/पी जहाजों की लंबाई 134 मीटर और चौड़ाई 16 मीटर है। ये चार शांक्सी 16पीए6 एटीसी डीजल इंजनों से चलती हैं, जो 5700 किलोवॉट की ताकत देती हैं। जहाज की अधिकतम रफ्तार 27 नॉट्स यानी करीब 50 किलोमीटर प्रति घंटा है और यह 8,000 नौटिकल मील तक सफर कर सकता है।

हथियारों की बात करें तो यह फ्रिगेट एक मल्टी-रोल प्लेटफॉर्म है। एयर डिफेंस के लिए इसमें 32-सेल वर्टिकल लॉन्च सिस्टम (वीएलएस) लगा है, जो एलवाई-80एन सरफेस-टू-एयर मिसाइलें दाग सकता है। सतह से सतह पर हमला करने के लिए इसमें सीएम-302 एंटी-शिप मिसाइलें लगी हैं। पनडुब्बियों से निपटने के लिए इसमें टाइप 87 रॉकेट लॉन्चर और यू-7 टॉरपीडो लॉन्चर मौजूद हैं।

करीबी लड़ाई के लिए इस जहाज में 76 मिमी का मरीन कैनन एच/पीजे-26 और दो टाइप 1130 क्लोज-इन वेपन सिस्टम लगे हैं, जो आने वाली किसी भी मिसाइलों को रास्ते में ही नष्ट कर सकते हैं। साथ ही इसमें दो टाइप 726-4 डिकॉय लॉन्चर भी हैं जो गाइडेड मिसाइलों को भी कन्फ्यूज कर सकते हैं।

एडमिरल नविद अशरफ ने कहा कि इन आधुनिक जहाजों के आने से पाकिस्तान नौसेना को नई तकनीकी ताकत मिली है। चीन और पाकिस्तान के बीच यह सहयोग रक्षा उत्पादन में गहराई तक पहुंच चुका है। पाकिस्तान ने हाल के वर्षों में चीन से सिर्फ युद्धपोत ही नहीं, बल्कि ड्रोन, मिसाइल और रडार सिस्टम जैसी तकनीकें भी हासिल की हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान को एक फ्रिगेट की कीमत लगभग 348 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी करीब 2,900 करोड़ रुपये पड़ी है। चीन के लिए भी यह उसकी अब तक की सबसे बड़ी मरीन एक्सपोर्ट डील मानी जा रही है।

भारत का नीलगिरी क्लास स्टील्थ फ्रिगेट्स

हिंद महासागर क्षेत्र में भारत और पाकिस्तान की नौसेनाओं के बीच संतुलन बनाए रखना हमेशा रणनीतिक महत्व का विषय रहा है। पाकिस्तान को चीन से मिलने वाले ये जहाज भारतीय नौसेना के लिए नई चुनौती साबित हो सकते हैं। वहीं, भारत ने भी नौसेना के आधुनिकीकरण के तहत प्रोजेक्ट 17ए शुरू किया है, जिसके तहत नीलगिरी क्लास स्टील्थ फ्रिगेट्स तैयार की जा रही हैं।

INS Nilgiri Class
INS Nilgiri Class

इनका निर्माण मुंबई की मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड और कोलकाता की गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स कर रहे हैं। 2025 तक चार जहाज आईएनएस नीलगिरी, आईएनएस हिमगिरी, आईएनएस उदयगिरी और आईएनएस तारागिरी भारतीय नौसेना में शामिल हो चुके हैं।

इन जहाजों का वजन लगभग 6,500 टन है, यानी यह पाकिस्तान की तुघरिल क्लास से करीब 60 फीसदी भारी हैं। इनमें 75 फीसदी से अधिक स्वदेशी तकनीक का उपयोग किया गया है। निलगिरी क्लास जहाज स्टील्थ डिजाइन पर आधारित हैं, जिससे रडार पर इनका पता लगाना बेहद मुश्किल होता है।

इनमें बराक-8 मिसाइल सिस्टम, ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइलें और वरुणास्त्र टॉरपीडो जैसे आधुनिक हथियार शामिल हैं। ये जहाज एमएफ-स्टार रडार सिस्टम से लैस हैं, जो एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है और मिसाइल गाइडेंस देता है।

भारत के पास एमएच-60आर मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर भी हैं, जो समुद्र में पनडुब्बियों की पहचान और उन्हें नष्ट करने में सक्षम हैं। नीलगिरी क्लास की गति लगभग 30 नॉट्स (55 किमी/घंटा) और रेंज 8,000 नौटिकल माइल्स तक है।

Tughril vs Nilgiri Class: तुघरिल Vs नीलगिरी

अगर सीधी तुलना की जाए तो भारत की नीलगिरी क्लास फ्रिगेट्स तकनीक, मारक क्षमता और सेंसर सिस्टम के मामले में पाकिस्तान की तुघरिल क्लास से कहीं आगे हैं।

तुघरिल क्लास में सीएम-302 मिसाइलें हैं जिनकी रेंज लगभग 250 किलोमीटर है, जबकि नीलगिरी क्लास की ब्रह्मोस मिसाइलें 300 किलोमीटर से अधिक दूरी तक लक्ष्य भेद सकती हैं और तीन गुना तेज मैक 3 की रफ्तार से उड़ती हैं।

पाकिस्तान की फ्रिगेट्स में टाइप 382 3डी रडार है, जबकि भारत की निलगिरी क्लास में एमएफ-स्टार एईएसए रडार लगा है, जो ज्यादा सटीक और लंबी दूरी तक टारगेट को ट्रैक कर सकता है।

एंटी-सबमरीन वॉरफेयर में भी भारत को बढ़त हासिल है। निलगिरी क्लास में वरुणास्त्र टॉरपीडो, एडवांस सोनार सिस्टम और एमएच-60आर हेलीकॉप्टर शामिल हैं, जबकि पाकिस्तान की फ्रिगेट्स अभी भी चीन की पारंपरिक तकनीक पर निर्भर हैं।

2025 में भारतीय नौसेना ने 10 से अधिक जहाज कमीशन

भारत की नौसेना अब “बिल्डर नेवी” बन चुकी है। 2025 में ही भारतीय नौसेना ने 10 से अधिक जहाज कमीशन किए हैं। भारत का लक्ष्य 2030 तक 175 से अधिक जहाजों का बेड़ा तैयार करना है।

भारत की प्रोजेक्ट 17बी योजना के तहत नई पीढ़ी की स्टील्थ फ्रिगेट्स बनाई जा रही हैं, जिनमें 75 फीसदी से ज्यादा स्वदेशी तकनीक होगी। इसके अलावा, नौसेना में राफेल-एम लड़ाकू विमान, टेडबीएफ और कलवरी क्लास पनडुब्बियां शामिल हो रही हैं।

Su-57 Stealth Fighter: सुखोई-57 अब ‘मेड इन इंडिया’ के रास्ते पर! रूस की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

Su-57 fighter jet India
Su-57 Stealth Fighter

Su-57 Stealth Fighter: एसयू-57 स्टेल्थ फाइटर जेट को लेकर रूस की एक तकनीकी टीम ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को सौपी गई रिपोर्ट में कहा है कि कंपनी के पास पहले से ही लगभग 50 फीसदी क्षमता मौजूद है, जिससे भारत में इस एडवांस फाइटर जेट का निर्माण किया जा सकता है।

India Su-57 Fighter Jets: ऑपरेशन सिंदूर में वायुसेना को हुई थी ये दिक्कत, इसलिए चाहिए Su-57 फाइटर जेट्स, 2026 तक आएगा S-400

यह रिपोर्ट पिछले महीने सौपी गई थी, ठीक उस समय जब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दिसंबर की शुरुआत में भारत यात्रा की तैयारी चल रही थी। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर भारत और रूस आगे बढ़ने का फैसला करते हैं, तो एचएएल के लिए एसयू-57ई (एक्सपोर्ट वैरिएंट) के लोकल प्रोडक्शन का रास्ता खुल सकता है।

Su-57 Stealth Fighter: सितंबर में रूसी टीम ने किया था दौरा

रूस की सुखोई डिजाइन ब्यूरो और दूसरे डिफेंस आर्गेनाइजेशन की टीम ने इस साल सितंबर में एचएएल की कई फैसिलटीज का दौरा किया था। ताकि भारत में इस अत्याधुनिक स्टेल्थ विमान के निर्माण के लिए तकनीकी तैयारी, मशीनरी और इंफ्रास्ट्रक्चर की तैयारियां देखी जा सकें।

रूसी टीम ने नासिक डिवीजन का निरीक्षण किया, जहां सुखोई-30 लड़ाकू विमानों की फाइनल असेंबली लाइन मौजूद है। इसके अलावा कोरापुट (ओडिशा) में एचएएल का इंजन डिवीजन भी देखा गया, जहां एएल-31एफपी टर्बोफैन इंजन का निर्माण और ओवरहॉल किया जाता है। साथ ही केरल में कासरगोड की स्ट्रैटेजिक इलेक्ट्रॉनिक्स फैक्ट्री का दौरा किया, जहां जहाज के लिए जरूरी इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, एवियोनिक्स, डिस्प्ले प्रोसेसर और ऑनबोर्ड कंप्यूटर बनाए जाते हैं।

जिसके बाद रूसी एक्सपर्ट्स ने निष्कर्ष निकाला कि भारत के पास पहले से ही 50 फीसदी उत्पादन क्षमता मौजूद है। भविष्य में निवेश, अपग्रेडेशन और ट्रेनिंग के बाद सुखोई-57 (Su-57 Stealth Fighter) का पूर्ण उत्पादन भारत में किया जा सकता है।

वहीं, रूस की रिपोर्ट के बाद अब एचएएल अपनी रिपोर्ट तैयार कर रहा है, जिसमें यह बताया जाएगा कि भारत में सुखोई-57 बनाने के लिए कहां अतिरिक्त निवेश की जरूरत होगी। इसमें इंफ्रास्ट्रक्चर, एडवांस टेक्नोलॉजी, रिसर्च एंड डेवलपमेंट, ह्यूमन रिसोर्स और सप्लाई चेन का जिक्र होगा।

सूत्रों के मुताबिक, यह रिपोर्ट इस महीने के अंत तक रक्षा मंत्रालय को सौंपी जाएगी। इस रिपोर्ट के बाद भारत और रूस के बीच इस प्रोजेक्ट पर कोई बड़ा फैसला लिया जा सकता है।

Su-57 Stealth Fighter: दिसंबर में पुतिन की भारत यात्रा से पहले अहम तैयारी

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 5-6 दिसंबर को भारत आने वाले हैं। इस दौरान होने वाली 23वीं भारत-रूस वार्षिक शिखर वार्ता में इस पर भी चर्चा हो सकती है।

सुखोई-57 फाइटर जेट (Su-57 Stealth Fighter) को रूस के कोम्सोमोल्स्क-ऑन-अमुर एविएशन प्लांट में बनाया जाता है। इस साल एरो इंडिया में पहली बार सुखोई-57 की पहली झलक देखने को मिली थी। उस समय रूस ने एसयू-57ई मॉडल को भारत के लिए पेश किया था। वहीं, अमेरिका ने उसी शो में अपना एफ-35 स्टेल्थ फाइटर भी शोकेस किया था।

Su-57 Stealth Fighter: भारत के एएमसीए प्रोजेक्ट से जुड़ने की पेशकश

रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव ने हाल ही में यह कहा था कि मॉस्को भारत के एएमसीए प्रोजेक्ट में भी तकनीकी सहयोग देने को तैयार है। उन्होंने 16 अक्टूबर को कहा था कि यह साझेदारी अब सिर्फ सौदे तक सीमित नहीं है, बल्कि अब यह को-डेवलपमेंट, को-प्रोडक्शन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के नए स्तर तक पहुंच चुकी है।

अलीपोव ने यह भी बताया कि दोनों देशों के बीच एंटी-ड्रोन सिस्टम, एडवांस्ड रडार तकनीक और प्रिसिशन स्ट्राइक क्षमताओं पर भी बातचीत चल रही है। उम्मीद जताई गई कि पुतिन की यात्रा के दौरान इन विषयों पर कुछ नए समझौते हो सकते हैं।

एसयू-57 रूस (Su-57 Stealth Fighter) का सबसे एडवांस फिफ्थ जनरेशन मल्टी-रोल स्टेल्थ फाइटर जेट है, जो तेज रफ्तार, रडार-एवेजन और लंबी दूरी की अटैक क्षमता के लिए जाना जाता है। यह विमान न केवल एयर-टू-एयर, बल्कि एयर-टू-ग्राउंड मिशनों में भी सक्षम है।

INS Ikshak Indian Navy: नौसेना में शामिल हुआ स्वदेशी सर्वे शिप ‘इक्षक’, देश की समुद्री सीमाओं की करेगा निगरानी

INS Ikshak Indian Navy
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INS Ikshak Indian Navy: भारतीय नौसेना ने आज कोच्चि के नेवल बेस में आयोजित भव्य समारोह में नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी की मौजूदगी में आईएनएस इक्षक को औपचारिक रूप से भारतीय नौसेना में शामिल किया गया। यह सर्वे वेसल (लार्ज) क्लास का तीसरा जहाज है और इसे दक्षिणी नौसेना कमान कोच्चि में तैनात किया गया है। इस मौके पर नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी ने कहा कि यह जहाज न केवल भारतीय नौसेना की क्षमता बढ़ाएगा, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की भावना का भी जीवंत उदाहरण है।

INS Ikshak commissioning: भारतीय नौसेना में शामिल होगा तीसरा स्वदेशी सर्वे जहाज ‘इक्षक’, समंदर में बनेगा मार्गदर्शक 

एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी ने कोच्चि स्थित सदर्न नेवल कमांड के नौसैनिक अड्डे पर आयोजित समारोह में कहा, “आईएनएस इक्षक हमारे देश की तकनीकी उत्कृष्टता, स्वदेशी जहाज निर्माण क्षमता और समुद्री दृष्टि का प्रतीक है। यह जहाज भारत की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर हमारी विश्वसनीयता को भी मजबूत करेगा।”

INS Ikshak Indian Navy: भारत के समुद्री परिवर्तन का प्रतीक

एडमिरल त्रिपाठी ने अपने संबोधन में कहा कि आज दुनिया का समुद्री क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। तकनीक, भू-राजनीति और रणनीति के नए समीकरण समुद्रों को नई दिशा दे रहे हैं। उन्होंने कहा, “आज समुद्री क्षेत्र संसाधनों, प्रभाव और कनेक्टिविटी की प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गया है। ऐसे समय में हमें स्थिरता और दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ना होगा।”

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों को उद्धृत करते हुए कहा, “जब वैश्विक समुद्र अशांत हों, तो दुनिया एक स्थिर प्रकाशस्तंभ की तलाश करती है। भारत आज उस भूमिका को निभाने के लिए पूरी तरह तैयार है।”

नौसेना प्रमुख ने कहा कि भारतीय नौसेना इस दृष्टि की मूर्त रूप है, एक ऐसी शक्ति जो समुद्रों पर विश्वास, साझेदारी और सामूहिक हितों की रक्षा करती है।

एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय नौसेना की सर्वे जहाजों ने पिछले एक साल में मॉरीशस, म्यांमार और वियतनाम को हाइड्रोग्राफिक मदद दी है। यह भारत की साझा समुद्री समृद्धि के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि आईएनएस संधायक जैसे जहाज हाल ही में सिंगापुर, इंडोनेशिया और मलेशिया तक की यात्राएं पूरी कर चुकी हैं, जो भारत की ‘महासागर’ विजन की सच्ची झलक है।

हाइड्रोग्राफिक डेटा अब रणनीतिक जरूरत

एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि इक्षक, संधायक और निर्देशक जैसी सर्वे वेसल्स नौसेना और वाणिज्यिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा, “ये जहाज समुद्र को समझने योग्य और सुरक्षित बनाते हैं। ये हर सर्वे मिशन के साथ समुद्री मार्गों को और सटीक बनाते हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि जलवायु परिवर्तन और समुद्री खनिजों की खोज जैसे नए क्षेत्रों में सटीक हाइड्रोग्राफिक डेटा अब रणनीतिक आवश्यकता बन गया है।

उन्होंने कहा, “इक्षक जैसी जहाजें केवल सर्वे प्लेटफॉर्म नहीं हैं, बल्कि ये समुद्री सुरक्षा, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सहयोग की महत्वपूर्ण कड़ी हैं।”

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‘आत्मनिर्भरता’ को नई दिशा देने वाला जहाज

एडमिरल त्रिपाठी ने गर्व के साथ बताया कि इक्षक जैसे शिप 80 फीसदी से अधिक स्वदेशी सामग्री से बने हैं। उन्होंने कहा, “हर नए जहाज के साथ नौसेना ‘खरीदने वाली नौसेना’ से ‘निर्माण करने वाली नौसेना’ बन चुकी है। यह आत्मनिर्भर भारत की सच्ची भावना का प्रतीक है।”

उन्होंने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के हालिया बयान का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारतीय नौसेना देश की आत्मनिर्भरता, नवाचार और औद्योगिक विकास की अग्रणी शक्ति बन चुकी है।

एडमिरल ने बताया कि इक्षक जैसी जहाजों में महिला अधिकारियों और नाविकों के लिए विशेष आवासीय डिजाइन सुधार किए गए हैं, जो नौसेना की प्रगतिशील सोच को दर्शाते हैं।

GRSE और नौसेना की तारीफ

नौसेना प्रमुख ने गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड, कोलकाता की टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा, “सीएमडी कमोडोर पीआर हरी और उनकी पूरी टीम ने न केवल एक विश्वस्तरीय जहाज तैयार किया है, बल्कि भारतीय जहाज निर्माण में उत्कृष्टता का नया मानक स्थापित किया है।”

उन्होंने डिजाइनरों, तकनीकी विशेषज्ञों और सभी सहयोगियों की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनकी मेहनत ने जहाज के परीक्षण और डिलीवरी को समय पर पूरा करने में बड़ी भूमिका निभाई है।

एडमिरल त्रिपाठी ने इक्षक के कमांडिंग ऑफिसर कैप्टन टी.वी. सिंह और उनकी टीम को संबोधित करते हुए कहा, “अब यह जहाज आपके हाथों में है। आपको इसमें जान डालनी है, परंपराएं बनानी हैं और इसका चरित्र गढ़ना है। यह आपका कर्तव्य है कि आप ‘निर्भय वीर पथ प्रदर्शक’ के मूलमंत्र पर खरे उतरें।”

उन्होंने कहा कि नौसेना को उम्मीद है कि इक्षक की टीम अपनी लगन और साहस से इसे गर्व का प्रतीक बनाएगी। “यह जहाज केवल स्टील और सिस्टम का मेल नहीं, बल्कि इसे आपके जज्बे से आत्मा मिलेगी।”

क्या है ‘इक्षक’ का मतलब

‘इक्षक’ का संस्कृत में अर्थ होता है, “मार्गदर्शक”, और यह नाम अपने उद्देश्य के बिल्कुल अनुरूप है। यह जहाज समुद्र में नए रास्ते खोजने, नेविगेशन के लिए नक्शे बनाने और भारत की समुद्री सीमाओं की निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

आईएनएस इक्षक को कोलकाता की गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेडने (जीआरएसई) ने बनाया है। इसमें 80 प्रतिशत से अधिक कंपोनेंट्स और टेक्नोलॉजी भारत में ही तैयार किए गए हैं।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, ‘इक्षक’ का निर्माण आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया अभियान के तहत किया गया है। इस प्रोजेक्ट में भारतीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) का भी बड़ा योगदान रहा है।

‘इक्षक’ को चार सर्वे जहाजों के उस कॉन्ट्रैक्ट के तहत बनाया गया है। यह सौदा रक्षा मंत्रालय और जीआरएसई के बीच 30 अक्टूबर 2018 को हुआ था। जिसकी लागत 2,435 करोड़ रुपये थी। इस प्रोजेक्ट का पहला जहाज आईएनएस संध्याक दिसंबर 2021 में नौसेना में शामिल हुआ था।

INS Ikshak Indian Navy: आईएनएस इक्षक में क्या हैं खूबियां

आईएनएस इक्षक (INS Ikshak Indian Navy) 110 मीटर लंबा और 3,300 टन वजनी है और यह जहाज आधुनिक तकनीक से लैस है। इसमें हाई-रिजॉल्यूशन मल्टी-बीम इको साउंडर, ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल, रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल और चार सर्वे मोटर बोट लगाई गई हैं।

यह इक्विपमेंट्स समुद्र की गहराई मापने, समुद्री नक्शे बनाने और नौवहन मार्ग तय करने में इस्तेमाल किए जाएंगे। इसके अलावा, जहाज में एक हेलिकॉप्टर डेक भी है, जिससे यह मल्टी-डोमेन मिशन भी पूरा कर सकता है।

इक्षक तटीय और गहरे समुद्री क्षेत्रों में हाइड्रोग्राफिक सर्वे करेगा। यानी यह समुद्र की सतह और तल के भूगोल का अध्ययन कर बंदरगाहों, जलमार्गों और नौवहन चैनलों की सटीक जानकारी जुटाएगा।

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समुद्री सुरक्षा को मिलेगी नई ताकत

इक्षक के जरिए भारतीय नौसेना अब समुद्र में भौगोलिक और मैरीटाइम लिमिट्स का सर्वे भी कर सकेगी। यह जहाज एक्सक्लूसिव इकॉनमिक जोन और एक्सटेंडेड कॉन्टिनेंटल शेल्व तक के इलाकों का सर्वे करने में सक्षम है।

यह न सिर्फ समुद्री नक्शे तैयार करेगा, बल्कि समुद्री सुरक्षा को भी मजबूत करेगा। इस जहाज से मिलने वाले आंकड़े नौवहन, समुद्री यातायात नियंत्रण और रक्षा अनुसंधान के लिए बेहद उपयोगी होंगे।

मल्टीपर्पज रोल निभाएगा आईएनएस इक्षक

यह जहाज सर्वे और हाइड्रोग्राफिक स्टडी के अलावा, आपात स्थिति में सर्च एंड रेस्क्यू, चिकित्सा सहायता और अल्पकालिक हॉस्पिटल शिप के रूप में भी काम कर सकेगा। इसके अलावा, यह जहाज समुद्र में जियोफिजिकल और ओशनोग्राफिक डेटा भी जुटाएगा, जो डिफेंस रिसर्च और स्ट्रेटेजी के लिए बेहद जरूरी है।

‘इक्षक’ (INS Ikshak Indian Navy) के शामिल होने से भारतीय नौसेना की सर्वे और चार्टिंग क्षमता और भी मजबूत हो गई है। रक्षा मंत्रालय ने 2023 में नेक्स्ट जेनरेशन सर्वे वेसल्स की खरीद को मंजूरी दी थी, जो भविष्य में इस नेटवर्क को और व्यापक बनाएंगे। वहीं, भारत अब समुद्री सर्वे तकनीक में भी आत्मनिर्भर बन रहा है और विदेशी तकनीक पर अपनी निर्भरता लगातार घटा रहा है।

Intelligence Inputs: ऑपरेशन सिंदूर के छह महीने बाद आतंकी रच रहे नई साजिश, लश्कर-ए-तैयबा और जैश फिर एक्टिव

Intelligence Inputs
Six Months After the Strike, New Terror Threat Emerges from Lashkar and Jaish in Jammu and Kashmir

Intelligence Inputs: भारत के ऑपरेशन सिंदूर के छह महीने बाद पाकिस्तानी आतंक संगठनों ने जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर से आतंकी गतिविधियां तेज कर दी हैं। ताजा खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने सीमापार से घुसपैठ और नई हमलों की योजना तैयार कर ली है।

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खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस और स्पेशल सर्विस ग्रुप ने इन संगठनों की मदद से जम्मू-कश्मीर में सक्रिय नेटवर्क को दोबारा खड़ा करना शुरू कर दिया है। आतंकियों के कई ग्रुप लाइन ऑफ कंट्रोल के रास्ते घाटी में दाखिल हो चुके हैं और वे ड्रोन के जरिए इलाके की निगरानी कर रहे हैं।

खुफिया सूत्रों के अनुसार, लश्कर के आतंकी शमशेर की अगुवाई में एक ग्रुप ने हाल ही में ड्रोन से एलओसी के कमजोर हिस्सों की मैपिंग की, ताकि वहां से फिदायीन हमले या हथियार गिराने की कार्रवाई की जा सके।

Intelligence Inputs: पाकिस्तान में हुई गई गुप्त मीटिंग

इंटेलिजेंस एजेंसियों के सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में अक्टूबर 2025 के दौरान कई गुप्त बैठकें हुईं हैं। इनमें जमात-ए-इस्लामी, हिज्बुल मुजाहिदीन, और आईएसआई के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। इन बैठकों में आतंकियों के निष्क्रिय सेल्स को फिर से सक्रिय करने और पुराने कमांडरों को मासिक भत्ता देने की योजना तैयार की गई।

सूत्रों के अनुसार, आईएसआई ने अपने हैंडलरों को निर्देश दिया है कि वे भारतीय सुरक्षा बलों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नागरिकों को निशाना बनाते हुए “बदले की कार्रवाई” शुरू करें। इसके लिए पाकिस्तान में मौजूद बॉर्डर एक्शन टीम्स, जो पूर्व एसएसजी सैनिकों और प्रशिक्षित आतंकियों से बनी हैं, उन्हें फिर से सक्रिय किया गया है।

नशे और हथियारों के जरिए आतंकी फंडिंग

खुफिया एजेंसियों का कहना है कि लश्कर और जैश ने घाटी में अपने पुराने समर्थकों को फिर से सक्रिय करना शुरू कर दिया है। आतंकियों के ह्यूमन नेटवर्क को अब फिर से खड़ा किया जा रहा है। इस नेटवर्क को भारत ने पहले खत्म कर दिया था। इसके साथ ही, नार्को-टेरर नेटवर्क यानी नशे और हथियारों की तस्करी के जरिए आतंक को फंड करने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं।

पंजाब और राजस्थान में हाल ही में पकड़ी गई हथियारों की खेपों में पाकिस्तान से भेजे गए ड्रोन की भूमिका सामने आई थी। अब वही पैटर्न जम्मू-कश्मीर में भी देखने को मिल रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की नई चाल

भारत ने अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर चलाया था। इसमें भारतीय सेना ने सटीक एयर स्ट्राइक्स और ग्राउंड ऑपरेशंस के जरिए कई आतंकी मॉड्यूल्स को खत्म किया था। इस अभियान में लश्कर-ए-तैयबा और द रेजिस्टेंस फ्रंट को भारी नुकसान हुआ था।

लेकिन अब पाकिस्तान की कोशिश है कि वह उस हार का बदला ले। भारत की काउंटर-टेरर स्ट्राइक से बुरी तरह बौखलाए आतंक संगठनों को फिर से हथियार, प्रशिक्षण और धन मुहैया कराया जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली और राजनीतिक अस्थिरता ने उसकी सेना और आईएसआई को भारत विरोधी गतिविधियों पर और निर्भर बना दिया है।

सरकार और सेना हाई अलर्ट पर

नई दिल्ली में सुरक्षा एजेंसियों ने इन खुफिया रिपोर्टों को “गंभीर चेतावनी” के तौर पर लिया है। सेना और खुफिया इकाइयों को उत्तरी कमान के सभी सेक्टरों में अलर्ट कर दिया गया है। सूत्रों ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के तहत जिन इलाकों में पहले आतंक खत्म किया गया था, वहां फिर से निगरानी बढ़ा दी गई है। इस बीच भारत की तीनों सेनाएं पश्चिमी सीमाओं पर त्रिशूल ट्राई-सर्विस एक्सरसाइज कर रही हैं।

जम्मू-कश्मीर में इस समय स्थानीय चुनावों और पर्यटन की बहाली के चलते एक शांति दिखाई दे रही है। लेकिन खुफिया एजेंसियों का मानना है कि आईएसआई इस माहौल को बिगाड़ने की कोशिश कर रही है।

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में हुई हाल की बैठकों का मकसद घाटी में आतंक की पुरानी मशीनरी को फिर से एक्टिव करना है। आईएसआई अब भी पुराने कमांडरों को पैसा मुहैया कराा रही है ताकि वे नए भर्तियां शुरू कर सकें।

सूत्रों का कहना है कि भारतीय सेना किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। लाइन ऑफ कंट्रोल पर निगरानी बढ़ा दी गई है और तकनीकी इंटेलिजेंस के जरिए हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है।

इस बीच पाकिस्तान की तरफ से हो रहे ड्रोन मूवमेंट्स और रेडियो इंटरसेप्शन की जांच भी तेज कर दी गई है। सुरक्षा बलों ने घाटी में संवेदनशील इलाकों में ऑपरेशंस को और सख्त कर दिया है ताकि किसी नई साजिश को जमीन पर उतरने से पहले ही नाकाम किया जा सके।

GPS Spoofing at IGI Airport: देश के सबसे सुरक्षित इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर जीपीएस स्पूफिंग का खतरा, कई उड़ानें प्रभावित, कई जहाज जयपुर डायवर्ट

GPS Spoofing at IGI Airport
GPS Spoofing at IGI Airport

GPS Spoofing at IGI Airport: देश की राजधानी दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर पिछले दो-तीन दिनों से जीपीएस स्पूफिंग का मामला सामने आया है। इसके चलते कई उड़ानें प्रभावित हुई हैं। इस तकनीकी दिक्कत के चलते मंगलवार रात कम से कम सात विमानों को जयपुर डायवर्ट करना पड़ा। इनमें इंडिगो और एयर इंडिया के विमान शामिल थे।

एविएशन अधिकारियों के मुताबिक, यह दिल्ली में जीपीएस स्पूफिंग का पहला मामला है। अब तक ऐसी घटनाएं ज्यादातर सीमावर्ती इलाकों में देखी जाती रही हैं, लेकिन पहली बार यह देश की राजधानी के सबसे व्यस्त हवाईअड्डे पर दर्ज हुई है। खास बाात यह है कि दिल्ली बॉर्डर एरिया से कई सौ किमी दूर है और यह भारत की राजधानी दिल्ली है। यहां से रोजाना 1,550 उड़ानें होती हैं और लाखों यात्री दुनिया के सबसे व्यस्त एयरपोर्ट से उड़ान भरते हैं। वहीं, राजधानी जैसे सुरक्षित क्षेत्र में जीपीएस स्पूफिंग राष्ट्रीय सुरक्षा का सीधा खतरा है।

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GPS Spoofing at IGI Airport: क्या है जीपीएस स्पूफिंग?

जीपीएस स्पूफिंग एक ऐसी तकनीक है, जिसमें नकली सैटेलाइट सिग्नल भेजे जाते हैं। ये सिग्नल असली ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम यानी जीपीएस सिग्नल को कन्फ्यूज कर देते हैं, जिससे विमान के नेविगेशन सिस्टम को अपनी असली स्थिति गलत दिखाई देने लगती है।

सरल शब्दों में कहें तो, यह ऐसा है जैसे कोई नकली नक्शा दिखाकर पायलट को गलत दिशा में भेज दे। इस वजह से विमान को यह पता नहीं चल पाता कि वह वास्तव में कहां है, जिससे लैंडिंग और टेक-ऑफ के दौरान स्थिति भयावह बन सकती है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीपीएस स्पूफिंग की घटनाएं आमतौर पर ब्लैक सी, तुर्की, यूक्रेन और पश्चिम एशिया जैसे युद्ध क्षेत्रों में होती रही हैं। लेकिन दिल्ली जैसे शहरी और सुरक्षित इलाके में इसका असर दिखना बेहद चिंता का विषय है।

कैसे हुआ असर एयरपोर्ट पर

टीओआई की रिपोर्ट के मुताबिक इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे का मुख्य रनवे 10/28, जो लंबे समय से इस्तेमाल में है, फिलहाल इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (आईएलएस) के अपग्रेडेशन के लिए बंद है। आईएलएस के बंद होने के बाद विमान ‘रिक्वायर्ड नेविगेशन परफॉर्मेंस (आरएनपी) तकनीक के जरिए उतरते हैं, जो पूरी तरह जीपीएस पर निर्भर होती है।

लेकिन जब जीपीएस सिग्नल में गड़बड़ी आती है, तो इसका असर आरएनपी सिस्टम पर भी पड़ता है। यही वजह है कि दिल्ली एयरपोर्ट पर जीपीएस स्पूफिंग की शुरुआत होते ही मुख्य रनवे पर फ्लाइट ऑपरेशन में दिक्कतें होने लगीं।

जानकारी के अनुसार, यह समस्या तब ज्यादा बढ़ जाती है जब हवा पूर्व दिशा से चलती है। ऐसे में विमान द्वारका की दिशा से उतरते हैं और वसंत कुंज की ओर उड़ान भरते हैं, इस दौरान जीपीएस सिग्नल सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।

फ्लाइट्स पर पड़ा असर, सात विमान जयपुर डायवर्ट

मंगलवार की रात को इंडिगो के पांच और एयर इंडिया के दो विमान, दिल्ली में सुरक्षित लैंडिंग नहीं कर पाए और उन्हें जयपुर भेजना पड़ा। दिल्ली एयरपोर्ट की आटोमैटिक टर्मिनल इन्फॉर्मेशन सर्विस (एटीआईएस) ने सभी पायलटों को अलर्ट किया है और कहा है कि वे दिल्ली के एयरस्पेस में एंट्री करते समय सावधानी बरतें।

एक अधिकारी ने बताया, “यह सुरक्षा से जुड़ा संवेदनशील मामला है। हमें यह जानने की जरूरत नहीं कि स्पूफिंग क्यों हो रही है, बल्कि जरूरी यह है कि रनवे 10/28 पर आईएलएस सिस्टम को जल्द से जल्द चालू किया जाए।”

GPS Spoofing at IGI Airport: कितना बड़ा खतरा है यह

एविएशन एक्सपर्ट्स का कहना है कि जीपीएस स्पूफिंग का सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह विमान के पायलट को गलत स्थिति की जानकारी देता है। कभी-कभी यह गड़बड़ी 2,000 से 2,500 किलोमीटर तक की दूरी तक गलत दिशा दिखा सकती है। यहां कि जीपीएस स्पूफिंग से दो विमान आपस में भी टकरा सकते हैं।

इससे न सिर्फ पायलट भ्रमित होते हैं, बल्कि लैंडिंग के दौरान गलत लोकेशन पर उतरने का खतरा भी बढ़ जाता है। खासतौर पर बॉर्डर एरिया में जहाज दुश्मन देश में भी लैंड कर सकते हैं।

दुनिया में कई देशों ने पहले भी ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, लेकिन वहां यह युद्ध या मिलिट्री वजहों से होती हैं। उदाहरण के लिए, रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष के दौरान कई बार सिग्नल जैमिंग और स्पूफिंग की घटनाएं दर्ज की गई थीं। जियो-पॉलिटिकल साइबर वारफेयर की आशंका को भी जन्म देती है।

ईरान ने 2011 में एक अमेरिकी आरक्यू-170 ड्रोन को जीपीएस स्पूफिंग के जरिए गिराने का दावा किया था। इसी तरह, 2023 और 2024 में इराक, तुर्की, यूक्रेन और ब्लैक सी क्षेत्र में कई बार जीपीएस स्पूफिंग की घटनाएं दर्ज की गईं।

क्या कर रहे हैं अधिकारी और एयरलाइंस

एविएशन अथॉरिटी (GPS Spoofing at IGI Airport) और एयरलाइंस दोनों ने इस स्थिति से निपटने के लिए तात्कालिक कदम उठाए हैं। एयरलाइंस अपने पायलटों को पहले से अलर्ट कर रही हैं कि वे दिल्ली की ओर आने से पहले जीपीएस की गड़बड़ी की संभावना को ध्यान में रखें।

पायलटों को सलाह दी गई है कि वे वैकल्पिक नेविगेशन सिस्टम्स जैसे पारंपरिक रेडियो बीकन और ऑनबोर्ड नेविगेशन का इस्तेमाल करें। दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड का कहना है कि मुख्य रनवे 10/28 पर नया आईएलएस सिस्टम 27 नवंबर तक एक्टिव करने की तैयारी चल रही है।

इंडिगो एयरलाइन ने हाल ही में इस रनवे पर ट्रायल फ्लाइट भी की थी, ताकि अपग्रेडेड सिस्टम की परफॉरमेंस को जांचा जा सके। जिसकी रिपोर्ट डीजीसीए को सौंपी जा चुकी है।

क्यों होती है GPS जामिंग या स्पूफिंग

सामान्य तौर पर, जीपीएस जामिंग (GPS Spoofing at IGI Airport) सेना द्वारा किसी इलाके में अपने ठिकाने या हथियारों की लोकेशन छिपाने के लिए की जाती है। वहीं, जीपीएस स्पूफिंग का इस्तेमाल ऐसे लोग करते हैं जो जानबूझकर गलत सिग्नल भेजकर विमान या जहाजों को कन्फ्यूज करना चाहते हैं।

यह मॉडर्न टेक्नोलॉजी वॉरफेयर का एक हिस्सा है, लेकिन इसका असर अगर नागरिक हवाईअड्डों पर दिखने लगे, तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

घटना के बाद सुरक्षा एजेंसियों और डीजीसीए ने जांच शुरू कर दी है। एयरपोर्ट पर सभी रडार सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल की निगरानी बढ़ा दी गई है। सिग्नल की जियो-लोकेशन ट्रैकिंग चल रही है। अधिकारियों ने बताया कि फिलहाल यह तकनीकी या बाहरी सिग्नल इंटरफेरेंस का मामला हो सकता है।

इस साल भारत में स्पूफिंग के 465 मामले

इस साल (GPS Spoofing at IGI Airport) केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि नवंबर 2023 से फरवरी 2025 के बीच अमृतसर और जम्मू के हवाई क्षेत्र में जीपीएस इंटरफेरेंस और स्पूफिंग के 465 मामले दर्ज किए गए हैं। इन घटनाओं में कई एयरलाइनों ने रिपोर्ट किया कि उनके विमान उड़ान के दौरान गलत लोकेशन डेटा दिखा रहे थे। नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल ने लोकसभा में लिखित जवाब में बताया था कि यह घटनाएं मुख्य रूप से भारत-पाकिस्तान सीमा के नजदीकी इलाकों खासकर अमृतसर और जम्मू में हुईं।

यह घटनाएं तब ज्यादा देखी गईं जब विमान भारत-पाकिस्तान सीमा के पास से गुजरते हैं। एयरलाइंस ने बताया कि पायलटों को अचानक गलत दिशा, दूरी और ऊंचाई की जानकारी मिलने लगी, जिससे उन्हें वैकल्पिक नेविगेशन सिस्टम का सहारा लेना पड़ा।

मुरलीधर मोहोल ने बताया कि एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया नेविगेशन और सर्विलांस सिस्टम को अपग्रेड कर रही है ताकि हवाई यातायात बढ़ने के बावजूद सुरक्षा बनी रहे। उन्होंने कहा कि भारत में अब कई बड़े एयरपोर्ट्स पर अत्याधुनिक रेडियो नेविगेशन और सैटेलाइट ट्रैकिंग सिस्टम लगाए जा रहे हैं, जिससे जीपीएस पर पूरी तरह निर्भरता कम हो सके।

GPS Spoofing at IGI Airport: भारतीय वायुसेना के विमान हुए थे स्पूफिंग के शिकार

यह घटना (GPS Spoofing at IGI Airport) इस साल 29 मार्च को हुई थी, जब भारतीय वायुसेना का सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान म्यांमार में भूकंप के बाद ऑपरेशन ब्रह्मा के तहत मानवीय सहायता लेकर रवाना हुआ था। उड़ान के दौरान विमान के जीपीएस सिग्नल से छेड़छाड़ की गई, जिससे विमान का नेविगेशन सिस्टम गलत लोकेशन डेटा दिखाने लगा। बाद में राहत सामग्री लेकर भेजे गए वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर-III विमानों को भी इसी तरह की जीपीएस स्पूफिंग का सामना करना पड़ा। जिसके बाद वायुसेना के पायलटों ने तुरंत इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल कर सुरक्षित उड़ान भरी। यह सिस्टम जीपीएस से अलग होता है और गाइरोस्कोप और एक्सीलरोमीटर की मदद से विमान की रफ्तार, दिशा और ऊंचाई को अपने सेंसरों से ट्रैक करता है।

IAF World Record: 32,000 फीट की ऊंचाई से जंप कर वायुसेना ने ‘अनजाने’ में बना दिया वर्ल्ड रिकॉर्ड! DRDO के मिलिट्री पैराशूट से लगाई थी छलांग

Highest Military Parachute Deployment
Wing Commander Vishal Lakhesh, VM (G) Team Lead, High Altitude Parachute Trials DRDO

IAF World Record: वायुसेना और डीआरडीओ ने पिछले दिनों कुछ ऐसा कारनामा कर दिया जिसकी खुद उन्हें भी उम्मीद नहीं थी। 15 अक्टूबर को भारतीय वायुसेना ने 32,000 फीट की ऊंचाई से सफलतापूर्वक मिलिट्री पैराशूट से छलांग लगाई थी। इस खास मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम डीआरडीओ ने स्वदेश में ही तैयार किया गया है। लेकिन जंप के दौरान किसी को अंदाजा नहीं था कि यह वर्ल्ड रिकॉर्ड बन सकता है।

Military Combat Parachute System: डीआरडीओ ने रचा इतिहास, 32,000 फीट से किया स्वदेशी मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट का सफल परीक्षण

इस ऐतिहासिक मिशन का नेतृत्व भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर विशाल लखेश, वीएम (जी) ने किया। यह जंप भारत में ही बने स्वदेशी मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम (MCPS) का इस्तेमाल करते हुए की गई थी। 32,000 फीट की ऊंचाई से भारतीय वायुसेना के टेस्ट जम्पर्स ने इस पैराशूट के जरिए ऊंचाई से फ्रीफॉल जम्प किया था। उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि यह जंप वर्ल्ड रिकॉर्ड बनने जा रही है।

जंप के बाद विंग कमांडर विशाल लखेश को अहसास हुआ कि अभी तक किसी भी देश ने 30 हजार फीट की ऊंचाई पर मिलिट्री पैराशूट के जरिए जंप नहीं किया है। यहां तक कि भारतीय सेनाओं में भी इतनी उंचाई से जंप करने का कोई रिकॉर्ड नहीं है।

IAF World Record: कैसे बना यह ऐतिहासिक मिशन

इस हाई-ऑल्टिट्यूड जंप को विशेष परिस्थितियों में अंजाम दिया गया था। वायुसेना के एक विशेष विमान से 32,000 फीट की ऊंचाई पर से टीम ने छलांग लगाई। यह जंप किसी “स्काइडाइविंग रिकॉर्ड” के लिए नहीं थी बल्कि यह एक कॉम्बैट फ्रीफॉल मिशन था, जिसे युद्ध जैसी परिस्थितियों में टेस्ट के तौर पर डिजाइन किया गया था। पैराशूट को 30,000 फीट की ऊंचाई पर खोला गया, जो अब तक का सबसे ऊंचा मिलिट्री पैराशूट डिप्लॉयमेंट माना जा रहा है।

Highest Military Parachute Deployment
Data From Altimeters

इस मिशन में तीन अनुभवी टेस्ट जम्पर शामिल थे, विंग कमांडर विशाल लखेश, मास्टर वारंट ऑफिसर आरजे सिंह और विवेक तिवारी। यह कॉम्बैट फ्रीफॉल जंप था, जिसमें 150 किलो लोड (सैनिक+गियर) के साथ 40 किमी ग्लाइड रेंज और जीपीएस/नाविक नेविगेशन था। तीनों ने सुरक्षित लैंडिंग की और मिशन को 100 फीसदी सफलता के साथ पूरा किया।

वहीं अब विंग कमांडर विशाल लखेश ने रक्षा मंत्रालय को पत्र लिखकर इस उपलब्धि को वर्ल्ड रिकॉर्ड के तौर पर दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू करने का अनुरोध किया है। उन्होंने कहा कि “भारत अब दुनिया का पहला देश है जिसने 30,000 फीट पर लाइव मैनड मिलिट्री पैराशूट डिप्लॉयमेंट किया है।” इस रिकॉर्ड की पुष्टि के लिए डीआरडीओ को गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स और वर्ल्ड एयर स्पोर्ट्स फेडरेशन (एफएआई) को तकनीकी डेटा, फ्लाइट लॉग और वीडियो सबूत सौंपने होंगे।

क्या है मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम

यह पैराशूट सिस्टम डीआरडीओ की दो प्रमुख प्रयोगशालाओं आगरा की एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट और बेंगलुरु की डिफेंस बायोइंजीनियरिंग एंड इलेक्ट्रोमेडिकल लेबोरेटरी ने मिलकर डेवलप किया है।

यह सिस्टम रैम-एयर कैनोपी डिजाइन पर बेस्ड है, जो इसे हवा में बहुत अधिक दूरी तय करने की क्षमता देता है। यह पैराशूट जवान और उसके इक्विपमेंट सहित लगभग 150 किलो वजन संभाल सकता है और लगभग 4 से 6 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से नीचे उतरता है।

इसमें ऑक्सीजन सिस्टम, जीपीएस नेविगेशन, और -45°C तक के तापमान में काम करने की क्षमता है। सिस्टम को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह सैनिकों को दुश्मन की सीमा के अंदर 40 किलोमीटर तक ग्लाइड करने की क्षमता देता है, यानी वे बिना दुश्मन के रडार में आए दूर तक प्रवेश कर सकते हैं।

3,000 से 6,000 फीट की ऊंचाई पर खुलते हैं पैराशूट

दुनिया के अधिकांश देशों की सेनाएं हेलो (हाई एल्टीट्यूड लो ओपनिंग) और हाहो (हाई एल्टीट्यूड हाई ओपनिंग) तकनीक का इस्तेमाल करती हैं। आमतौर पर, सैनिक 25,000 से 35,000 फीट की ऊंचाई से जंप करते हैं, लेकिन पैराशूट को केवल 3,000 से 6,000 फीट की ऊंचाई पर खोला जाता है ताकि दुश्मन के रडार से बचा जा सके।

लेकिन भारत का यह मिशन अलग है, इसमें पैराशूट को 30,000 फीट पर खोला गया, जो अब तक किसी भी देश ने नहीं किया। इस ऊंचाई पर हवा बहुत पतली होती है, तापमान -45°C तक गिर जाता है और ऑक्सीजन की मात्रा बेहद कम हो जाती है। ऐसे में पैराशूट का स्थिर खुलना और सुरक्षित रूप से नीचे आना एक बहुत बड़ी तकनीकी चुनौती थी। डीआरडीओ ने इसके लिए एडवांस ऑक्सीजन प्री-ब्रीदर सिस्टम बनाया है जो 20,000 फीट से ऊपर जंपर को 30 मिनट तक ऑक्सीजन देता है।

साथ ही, एमसीपीएस पैराशूट में एक खास डिजिटल रेडियो फ्रीक्वेंसी मेमोरी तकनीक लगाई गई है, जो सिग्नल इंटरफेरेंस को कम करती है और हवा में स्थिरता बनाए रखती है। वहीं, बेंगलुरु की डिफेंस बायोइंजीनियरिंग ने बायो-सूट्स बनाया है, जो पैरा जंपर को ठंड और “डी-कंप्रेशन” जैसी समस्याओं से बचाते हैं।

IAF World Record: ये हैं रिकॉर्ड

अमेरिकी वायुसेना के जो किटिंगर ने 1960 में 102,800 फीट की ऊंचाई से छलांग लगाई थी, लेकिन उनका पैराशूट लगभग 18,000 फीट पर खुला था। इसी तरह 2014 में एलन यूस्टेस और 2012 में फेलिक्स बॉमगार्टनर ने भी हाई एल्टीट्यूड से छलांग लगाई थी, लेकिन उनकी डिप्लॉयमेंट 8,000 से 18,000 फीट के बीच हुई थी।

Special Family Pension: 1965 के वार वेटरन की पत्नी को मिलेगी स्पेशल फैमिली पेंशन, केंद्र सरकार ने अदालत में किया था विरोध

Special Family Pension
Special Family Pension: 1965 War Veteran Widow Wins Special Family Pension as High Court Rejects Govt’s Objection

Special Family Pension: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक आदेश में 1965 के भारत-पाक युद्ध के सैनिक की पत्नी को विशेष पारिवारिक पेंशन देने का फैसला बरकरार रखा है। मामला हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के रहने वाले स्वर्गीय चंद्रमणि से जुड़ा है। वे 1964 में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे, लेकिन 1965 के युद्ध में लगी शारीरिक और मानसिक चोटों के चलते उन्हें 1968 में “सर्विस नो लॉन्जर रिक्वायर्ड” (सेवा की अब जरूरत नहीं) कहकर समय से पहले ही सेना से हटा दिया गया था। गंभीर चोटों और मानसिक तनाव के चलते 24 मार्च 1987 को उनका निधन हो गया।

Commutation of Pension: 15 साल की रिकवरी पॉलिसी के खिलाफ एकजुट हुए पूर्व सैनिक, पेंशन कम्यूटेशन के नियमों पर फिर से हो विचार

उनकी पत्नी मिन्नी देवी (उर्फ मुन्नी) ने अपने दिवंगत पति के लिए विकलांगता पेंशन और उसके बाद परिवारिक पेंशन का दावा किया था। जुलाई 2023 में चंडीगढ़ की आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल ने मिन्नी देवी को सामान्य पारिवारिक पेंशन (आर्डिनरी फैमिली पेंशन) देने का आदेश दिया था। लेकिन केंद्र सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए दलील दी कि यह दावा “बहुत देर से” किया गया है, क्योंकि जवान की मौत कई साल पहले ही हो चुकी थी।

Special Family Pension: “सरकार का दायित्व है कि वह अधिकार दे, न कि छीने”

मामला पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के सामने गया। जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस विकास सूरी ने केंद्र सरकार की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि चंद्रमणि को 1965 के युद्ध में लगी चोटों के चलते ही नौकरी से हटाया गया था, इसलिए उन्हें विकलांगता पेंशन मिलनी चाहिए थी।

अदालत ने कहा, “यह स्पष्ट है कि मिन्नी देवी के पति की रिहाई 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान लगी चोटों की वजह से हुई थी। इसलिए उनकी मृत्यु के बाद पत्नी को विशेष पारिवारिक पेंशन दी जानी चाहिए थी।” अदालत ने यह भी कहा कि ट्रिब्यूनल ने गलती से सामान्य पेंशन दी, जबकि उन्हें विशेष पेंशन का हक था।

नौकरी से हटाने की प्रक्रिया पर भी उठे सवाल

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सैनिक को “सर्विस नो लॉन्जर रिक्वायर्ड” लिखकर हटा देना मनमाना और अनुचित कदम था। यह स्पष्ट था कि वह अपनी ड्यूटी करने में असमर्थ थे क्योंकि उन्होंने देश की रक्षा करते हुए गंभीर चोटें झेली थीं।

बेंच ने कहा कि ऐसे मामले में यह सरकार का नैतिक और कानूनी दायित्व बनता है कि वह सैनिक और उसके परिवार को सभी हकदार लाभ दे।

अदालत ने कहा कि “सामान्य पेंशन केवल उन सैनिकों को मिलती है जो बिना विकलांगता के सेवा से सेवानिवृत्त होते हैं, जबकि चंद्रमणि को 1965 के युद्ध में शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की चोटें आई थीं। ऐसे में उनके परिवार को विशेष पारिवारिक पेंशन पूरी तरह उचित है।”

कब दी जाती स्पेशल फैमिली पेंशन

  • यदि सैनिक की मौत सेवा के दौरान हुई हो, जैसे दुश्मन की कार्रवाई, आतंकवादी हमला, एंटी-टेरर ऑपरेशन, युद्ध, माइन-क्लियरिंग मिशन या किसी शांति मिशन में।
  • यदि सैनिक की मौत सेवा से जुड़ी दुर्घटना, चोट या बीमारी के कारण हुई हो। इसमें प्रशिक्षण के दौरान हुई घटनाएं, वाहन दुर्घटनाएं या प्राकृतिक आपदाएं भी शामिल हैं।
  • यदि सैनिक की मौत रिटायरमेंट के बाद होती है, लेकिन वह चोट या विकलांगता सेवा के दौरान लगी थी, तो पत्नी या परिवार को स्पेशल फैमिली पेंशन का अधिकार मिलता है।

हालांकि अगर मौत पूरी तरह सेवा-असंबंधित कारणों से हुई है, जैसे सामान्य बीमारी या प्राकृतिक कारण, तो केवल सामान्य फैमिली पेंशन दी जाती है।

स्पेशल फैमिली पेंशन का लाभ सैनिक के आश्रित परिवार को दिया जाता है। पात्रता का क्रम निम्न प्रकार से होता है —

  • सबसे पहले विधवा या विधुर को पेंशन दी जाती है, जो जीवनभर या पुनर्विवाह होने तक जारी रहती है।
  • अगर विधवा नहीं है, तो बच्चे (बेटा या बेटी) पात्र होते हैं। बच्चों को 25 वर्ष की आयु तक या शादी/आय शुरू होने तक यह पेंशन मिलती है।
  • अगर बच्चे भी नहीं हैं, तो माता-पिता को पेंशन दी जाती है, बशर्ते वे सैनिक पर निर्भर हों और उनकी मासिक आय 2,550 रुपये से कम हो।इसके अलावा, कुछ मामलों में निर्भर भाई-बहन को भी 25 वर्ष की आयु तक पेंशन दी जा सकती है।

पेंशन की राशि कितनी होती है

  • स्पेशल फैमिली पेंशन की दर अंतिम प्राप्त वेतन का 60 फीसदी होती है। वर्तमान नियमों के अनुसार, न्यूनतम 9,000 रुपये प्रति माह पेंशन दी जाती है और अधिकतम की कोई सीमा नहीं है।
  • इसके अलावा, डियरनेस रिलीफ भी जोड़ा जाता है, जो मुद्रास्फीति के अनुसार समय-समय पर बढ़ता है।
  • पेंशनधारकों को वन रैंक वन पेंशन योजना के तहत समान रैंक और सेवा अवधि के अनुसार समान पेंशन दी जाती है, जिसे हर 5 साल में संशोधित किया जाता है।
  • विशेष मामलों में, जैसे युद्ध या अत्यधिक जोखिम वाले इलाकों में हुई मृत्यु, लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन भी दी जाती है, जो 60 से 100 प्रतिशत तक हो सकती है।

Pakistan Nankana Sahib: ननकाना साहिब यात्रा पर गए हिंदुओं को पाकिस्तान ने लौटाया, बोला- सिर्फ सिखों को मिलेगी एंट्री

Pakistan Nankana Sahib
Pakistan Denies Entry to Indian Hindus Visiting Nankana Sahib with Sikh Jatha

Pakistan Nankana Sahib: गुरु नानक देव जी के जन्मोत्सव पर पाकिस्तान का दोहरा रवैया सामने आया है। पाकिस्तान ने 12 हिंदू श्रद्धालुओं को सीमा से ही वापस लौटा दिया। ये सभी श्रद्धालु सिख जत्थे के साथ ननकाना साहिब गुरुद्वारे में माथा टेकने जा रहे थे। भारतीय श्रद्धालुओं ने आरोप लगाया है कि उनके पास सभी वैध दस्तावेज मौजूद थे, फिर भी पाकिस्तानी अधिकारियों ने उन्हें सीमा पार नहीं करने दी।

Trump Pakistan Nuclear Bluff: ट्रंप हर बार फंस जाते हैं पाकिस्तान के परमाणु झांसे में, पीएम मोदी तो पहले ही कर चुके हैं बेनकाब

यह घटना उस समय हुई जब भारत-पाकिस्तान के बीच कुछ महीनों पहले हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बना हुआ है। इस जत्थे को भारत सरकार ने विशेष अनुमति दी थी ताकि श्रद्धालु गुरु नानक देव जी के 556वें प्रकाश पर्व पर पाकिस्तान जाकर दर्शन कर सकें। यह पहला जत्था था जिसे ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान भेजा गया।

Pakistan Nankana Sahib: सिर्फ सिखों को मिली इजाजत

मिली जानकारी के अनुसार, करीब 2,100 भारतीय श्रद्धालुओं को यात्रा की अनुमति दी गई थी, जिनमें से लगभग 1,900 लोग वाघा बॉर्डर के रास्ते पाकिस्तान में दाखिल हुए। लेकिन जैसे ही ये जत्था पाकिस्तानी इमिग्रेशन काउंटर पर पहुंचा, अधिकारियों ने 12 श्रद्धालुओं को रोक लिया। इनमें सभी हिंदू थे और वे दिल्ली और लखनऊ से आए थे।

दिल्ली के निवासी अमर चंद अपने परिवार के साथ यात्रा पर थे, उन्होंने बताया, “हम सिख जत्थे के साथ दर्शन के लिए जा रहे थे। हमारे पास सभी कागजात थे, लेकिन पाकिस्तानी अधिकारी ने कहा– ‘आप हिंदू हैं, इस जत्थे में क्या कर रहे हैं?’ फिर हमें वापस भेज दिया गया।”

श्रद्धालुओं का कहना है कि न केवल उन्हें यात्रा से रोका गया बल्कि उन्होंने जो बस किराया दिया था, उसका पैसा भी नहीं लौटाया गया। एक भारतीय खुफिया अधिकारी ने बताया कि पाकिस्तान का यह कदम पूरी तरह से “अभूतपूर्व” है और भविष्य में ऐसा करतारपुर कॉरिडोर के श्रद्धालुओं के साथ भी हो सकता है।

Pakistan Nankana Sahib
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पाकिस्तान का यह रवैया गलत

भारत सरकार ने पाकिस्तान के इस व्यवहार पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। सरकारी सूत्रों ने कहा, “जब कोई देश विदेशी श्रद्धालुओं की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाता, तो इस तरह की यात्राएं व्यर्थ हो जाती हैं।” अधिकारियों ने कहा कि जिन लोगों को लौटाया गया, वे सामान्य नागरिक और श्रद्धालु थे, न कि किसी राजनीतिक दल से जुड़े लोग।

सूत्रों ने बताया, “इन लोगों को बिना किसी वजह के परेशान किया गया और अपमानित किया गया। यह मानवीय संवेदनशीलता के खिलाफ है और दोनों देशों के बीच लोगों के आपसी संबंधों की भावना को कमजोर करता है।”

ननकाना साहिब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित वह पवित्र स्थान है जहां सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ था। हर साल भारत से हजारों श्रद्धालु वहां जाते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान का रवैया लगातार खराब हो रहा है।

भारत की बार-बार की अपील के बावजूद पाकिस्तान करतारपुर कॉरिडोर से जाने वाले हर भारतीय श्रद्धालु से 20 अमेरिकी डॉलर की फीस वसूलता है। स्थानीय श्रद्धालुओं से यह शुल्क नहीं लिया जाता। इस नीति की भारत ने कई बार निंदा की है।

2018 में भी भारत ने अपने राजनयिक अधिकारियों के साथ हुए दुर्व्यवहार पर कड़ा विरोध जताया था। उस समय भारत के दूतावास के अधिकारियों को गुरुद्वारा ननकाना साहिब और सच्चा सौदा में प्रवेश नहीं दिया गया था, जबकि उन्हें पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय से अनुमति मिली हुई थी।

भारत ने कई बार पाकिस्तान पर आरोप लगाया है कि वह धार्मिक यात्राओं के नाम पर राजनीतिक और सांप्रदायिक एजेंडा चलाने की कोशिश करता है। भारतीय अधिकारियों ने कहा कि पाकिस्तान अक्सर सिख यात्राओं के दौरान प्रो-खालिस्तान बैनर लगाता है और भारत विरोधी नारेबाजी को बढ़ावा देता है।

इस बार भी पाकिस्तान का यह फैसला जानबूझकर हिंदू समुदाय को अपमानित करने और भारत के भीतर सांप्रदायिक असहमति पैदा करने का प्रयास माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान इस तरह की घटनाओं से धार्मिक एकता को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है, जबकि दोनों देशों के लोग धार्मिक स्थलों को शांति और सम्मान का प्रतीक मानते हैं।

भारत-पाक संबंधों में बढ़ा तनाव

यह घटना ऐसे समय हुई है जब भारत और पाकिस्तान के बीच राजनयिक संपर्क पहले से ही सीमित हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने कई बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ बयान दिए हैं। वहीं, भारत ने आतंकवाद और सीमा पार हिंसा को लेकर पाकिस्तान की कड़ी आलोचना की है।

भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि पाकिस्तान का यह व्यवहार “न केवल अस्वीकार्य है बल्कि यह द्विपक्षीय संबंधों की भावना के खिलाफ है।” भारत ने मांग की है कि भविष्य में इस तरह की घटनाएं न हों और श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

स्पष्टीकरण: जिन 14 लोगों को पाकिस्तान में प्रवेश नहीं करने दिया गया, वे सभी पाकिस्तानी मूल के हिंदू थे। पाकिस्तान ने भारत से गए हिंदू तीर्थयात्रियों को ननकाना साहिब जाने की अनुमति दी है, लेकिन पाकिस्तानी मूल के हिंदुओं, जिन्होंने अब भारतीय पासपोर्ट ले लिया है, उन्हें सीमा पार करने की अनुमति नहीं दी गई।

With agency inputs.