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Future Wars: हाइब्रिड थ्रेट्स और ड्रोन वारफेयर से निपटने को तैयार हो रही भारतीय इन्फैंट्री, मॉर्डनाइजेशन में केवल हथियारों का अपग्रेडेशन काफी नहीं

Future Wars: Field Marshal KM Cariappa Memorial Seminar

Future Wars: लखनऊ में आयोजित एक सेमिनार में डायरेक्टर जनरल ऑफ इन्फैंट्री लेफ्टिनेंट जनरल अजय कुमार ने कहा कि इन्फैंट्री को आधुनिक बनाने की दिशा में केवल हथियारों का अपग्रेडेशन काफी नहीं है। इसके लिए नई तकनीकों का समावेश, थ्योरीज का रिफाइनमेंट और हर स्तर पर ऑपरेशनल रेडीनेस को बढ़ाना जरूरी है। सेमिनार में इस पर भी जोर दिया गया आधुनिक युद्ध केवल बंदूक और टैंक तक सीमित नहीं रह गए हैं। बल्कि आज हाइब्रिड थ्रेट्स, ड्रोन वारफेयर, साइबर कॉन्फ्लिक्ट और मल्टी-डोमेन ऑपरेशन्स युद्ध की नई हकीकत हैं।

Ran Samwad 2025 Training Reforms: भारतीय सेना में बड़े बदलाव की तैयारी, अब ट्रेनिंग में ड्रोन और साइबर वॉरफेयर होंगे शामिल

29 सितंबर 2025 को लखनऊ स्थित मुख्यालय सेंट्रल कमांड में फील्ड मार्शल केएम करियप्पा मेमोरियल सेमिनार का आयोजन किया गया। यह आयोजन डायरेक्टरेट जनरल ऑफ इन्फैंट्री और सेंटर फॉर लैंड वारफेयर स्टडीज (CLAWS) के सहयोग से हुआ। कार्यक्रम का मुख्य विषय था – “मॉडर्नाइजेशन ऑफ इन्फैंट्री सोल्जर टू फाइट कंटपरेरी एंड फ्यूचर वॉर्स”। इसमें स्वतंत्र भारत के पहले कमांडर-इन-चीफ फील्ड मार्शल केएम करिअप्पा की स्मृति को नमन करते हुए भारतीय इन्फैंट्री को भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप तैयार करने की रणनीति पर मंथन किया गया।

कार्यक्रम का उद्घाटन डायरेक्टर जनरल ऑफ इन्फैंट्री लेफ्टिनेंट जनरल अजय कुमार ने किया। उन्होंने कहा कि इन्फैंट्री को आधुनिक बनाने की दिशा में केवल हथियारों का अपग्रेडेशन काफी नहीं है। उनका जोर इस बात पर था कि नई तकनीकों को अपनाने, सिद्धांतों में बदलाव लाने और हर स्तर पर कॉम्बैट रेडीनेस को बेहतर करने की आवश्यकता है।

सेंट्रल कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल अनिंद्य सेनगुप्ता ने कहा कि इन्फैंट्री का आधुनिकीकरण कोई विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता है। सेनगुप्ता ने सैनिकों की फुर्ती, अनुकूलन क्षमता और तकनीक-आधारित ट्रेनिंग को भविष्य के जटिल युद्धों में जीत का आधार बताया। उन्होंने कहा कि सेना, शिक्षा जगत और उद्योग को मिलकर काम करना होगा ताकि इन्फैंट्री को हाइब्रिड थ्रेट्स, ड्रोन वारफेयर, साइबर कॉन्फ्लिक्ट और मल्टी-डोमेन ऑपरेशन्स जैसी चुनौतियों के लिए तैयार किया जा सके। सेनगुप्ता ने सैनिकों में फुर्ती, अनुकूलन क्षमता और टेक्नोलॉजी-आधारित ट्रेनिंग को आवश्यक बताया। उनका कहना था कि बदलते युद्धक्षेत्र में केवल हथियार नहीं, बल्कि सैनिकों का माइंडसेट भी आधुनिक होना चाहिए।

Future Wars- Field Marshal KM Cariappa Memorial Seminar

सेमिनार में विशेषज्ञों ने आधुनिक युद्ध की बदलती तस्वीर पर जोर दिया। मेजर जनरल विवेक सेहगल (सेवानिवृत्त) ने कहा कि ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर ने पारंपरिक रणनीतियों को अप्रासंगिक बना दिया है। मेजर जनरल पंकज सक्सेना (सेवानिवृत्त) ने बताया कि यूएएस और काउंटर-ड्रोन तकनीक युद्ध की दिशा तय कर रही हैं। वहीं, सेमिनार में लेफ्टिनेंट जनरल डी.पी. पांडे (सेवानिवृत्त) ने कहा कि भारतीय इन्फैंट्री को केवल पैदल सैनिक के तौर पर नहीं देखा जा सकता। अब उसे तकनीकी रूप से प्रशिक्षित, अनुकूलनशील और बहु-क्षेत्रीय ऑपरेशन्स में सक्षम बनाना होगा।

मेजर जनरल विवेक सेहगल (सेवानिवृत्त) ने कहा कि युद्धक्षेत्र लगातार बदल रहा है। ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे नए खतरों ने पारंपरिक रणनीतियों को अप्रासंगिक बना दिया है। उन्होंने कहा कि भारत को आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ते हुए स्वदेशी तकनीकों का इस्तेमाल करना होगा। इससे न केवल भारतीय सेना की क्षमताएँ बढ़ेंगी बल्कि विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता भी कम होगी।

सेमिनार के समापन पर सेंट्रल कमांड के चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल नवीन सचदेवा ने कहा कि इन्फैंट्री का आधुनिकीकरण केवल हथियारों तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसके लिए डेटा-आधारित फैसले, रियलिस्टिक ट्रेनिंग और उद्योग-शैक्षणिक संस्थानों के साथ साझेदारी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सेना को ऐसी यूनिट्स तैयार करनी होंगी जो हर क्षेत्र में बिना रुकावट और तेजी से काम कर सकें।

सेमिनार में लगातार इस बात पर जोर दिया गया कि आधुनिक युद्ध केवल बंदूक और टैंक तक सीमित नहीं रह गए हैं। आज हाइब्रिड थ्रेट्स, ड्रोन वारफेयर, साइबर कॉन्फ्लिक्ट और मल्टी-डोमेन ऑपरेशन्स युद्ध की नई हकीकत हैं। इन हालात में भारतीय इन्फैंट्री को केवल उपकरणों से ही नहीं बल्कि मानसिकता और प्रशिक्षण के स्तर पर भी आधुनिक बनाना होगा।

Kenya Navy Commander India Visit: भारत यात्रा पर केन्या नेवी कमांडर, भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी से की मुलाकात

Kenya Navy Commander India Visit

Kenya Navy Commander India Visit: केन्या नेवी के कमांडर मेजर जनरल पॉल ओवुओर ओटिएनो इन दिनों भारत यात्रा पर हैं। सोमवार को मेजर जनरल ओटिएनो ने भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी से मुलाकात की। इस अवसर पर उन्हें औपचारिक गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया गया। बैठक के दौरान दोनों देशों के बीच समुद्री सहयोग से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा हुई, जिनमें ऑपरेशनल एंगेजमेंट, प्रशिक्षण, हाइड्रोग्राफिक सहयोग और मल्टीलेचरल एक्सरसाइज शामिल थे। इसके अलावा, दोनों देशों के बीच ‘बहारी’ मैरिटाइम विजन को भी मजबूत करने पर सहमति बनी।

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28 सितंबर से 2 अक्टूबर 2025 तक भारत की आधिकारिक यात्रा पर पहुंचे केन्या नेवी के कमांडर मेजर जनरल पॉल ओवुओर ओटिएनो ने नई दिल्ली स्थित नेशनल वॉर मेमोरियल पर शहीद सैनिकों को पुष्पांजलि अर्पित की। उनकी इस यात्रा का उद्देश्य भारत और केन्या के बीच नौसैनिक सहयोग और द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करना है।

अपने इस दौरे के दौरान मेजर जनरल ओटिएनो गुरुग्राम स्थित इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर–इंडियन ओशन रीजन का दौरा करेंगे। इसके अलावा, वे भारतीय नौसेना के सदर्न नेवल कमांड, कोच्चि में मौजूद प्रशिक्षण केंद्रों का भी निरीक्षण करेंगे। इस दौरे का उद्देश्य प्रशिक्षण सहयोग को गहराना और भविष्य में साझा अभ्यासों को और व्यापक बनाना है।

केन्या नौसेना को भारतीय महासागर क्षेत्र में एक अहम साझेदार माना जाता है। उसने लगातार एक्सरसाइज AIKEYME, इंडियन ओशन नेवल सिम्पोजियम (IONS), गोवा मैरिटाइम कॉन्क्लेव और जिबूती कोड ऑफ कंडक्ट–जेद्दा अमेंडमेंट (DCoC-JA) जैसे मंचों में सक्रिय भागीदारी की है। इस यात्रा से दोनों देशों की साझेदारी को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।

भारत-केन्या नौसैनिक संबंधों की झलक उस समय भी देखने को मिली जब भारतीय नौसेना के पहले प्रशिक्षण स्क्वाड्रन के जहाज आईएनएस तीर, आईएनएस सुजाता, आईएनएस शार्दुल और आईसीजीएस सारथी ने केन्या के मोंबासा बंदरगाह का दौरा किया। इस दौरान द्विपक्षीय समुद्री सहयोग और गहरा हुआ।

भारत और केन्या के बीच ‘BAHARI Maritime Vision’ साझेदारी का एक अहम हिस्सा है। इसका उद्देश्य समुद्री क्षेत्र में सहयोग को नई ऊंचाइयों तक ले जाना और भारतीय महासागर क्षेत्र में साझा सुरक्षा सुनिश्चित करना है। मेजर जनरल ओटिएनो की यह यात्रा इस विजन को आगे बढ़ाने में मील का पत्थर साबित हो रही है।

Ladakh Protest: सज्जाद कारगिली बोले, लद्दाख के लोगों को ‘देश विरोधी’ बताकर दबाना गलत, लेह एपेक्स बॉडी का केंद्र से बातचीत से इंकार

Ladakh Protest: Sajjad Kargili Ladakh:
Atul Sati and Sajjad Kargili on Sonam Wangchuk arrest

Ladakh Protest: लद्दाख की राजनीति और आंदोलन इस समय राष्ट्रीय सुर्खियों में है। कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस और लेह एपेक्स बॉडी ने संयुक्त रूप से आंदोलन का नेतृत्व करते हुए केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि लद्दाख की जनता की संवैधानिक मांगों को नजरअंदाज कर सरकार उन्हें “अलग-थलग” करने की कोशिश कर रही है। वहीं, उत्तराखंड की जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक अतुल सती ने कहा कि 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती पर राष्ट्रव्यापी बंद का आह्वान किया है। यह बंद पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और उनके साथियों की तत्काल और बिना शर्त रिहाई की मांग को लेकर किया जा रहा है।

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24 सितंबर को लेह में हुए प्रदर्शन पर गोलीबारी, चार नागरिकों की मौत और 80 से अधिक लोगों के घायल होने के बाद हालात और बिगड़ गए हैं। इसी के साथ प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को नेशनल सिक्योरिटी एक्ट के तहत गिरफ्तार कर जोधपुर जेल भेज दिया गया।

दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के वरिष्ठ नेता सज्जाद कारगिली ने कहा कि सोनम वांगचुक और अन्य युवाओं की तुरंत और बिना शर्त रिहाई होनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार और लद्दाख की यूनियन टेरिटरी एडमिनिस्ट्रेशन ने हालात को संभालने में पूरी तरह असफल साबित हुए हैं।

कारगिली ने कहा, “जो गोलीबारी हुई, जिन लोगों की जान गई और जो घायल हुए, उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। यह घटना इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि लद्दाख में लोकतंत्र क्यों जरूरी है।” उन्होंने सवाल उठाया कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनिया भर में कहते हैं कि लोकतंत्र भारतीय डीएनए में है, तो लद्दाखियों को यह लोकतांत्रिक अधिकार क्यों नहीं दिया जा रहा।

कारगिली ने स्वीकार किया कि सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी ने लद्दाख के मुद्दों को पूरे देश में सामने ला दिया है। उन्होंने कहा, “बहुत कम लोग लद्दाख के संघर्ष को जानते थे। लेकिन अब वांगचुक की गिरफ्तारी के बाद यह आंदोलन हर घर में चर्चा का विषय बन गया है।” उन्होंने यह भी कहा कि अब यह विरोध सिर्फ लद्दाख तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग आवाज उठाएंगे।

लेह एपेक्स बॉडी का केंद्र से बातचीत से इंकार

लेह एपेक्स बॉडी ने साफ कहा है कि जब तक शांति बहाल नहीं होती और न्यायिक जांच की घोषणा नहीं होती, वे केंद्र सरकार से बातचीत में हिस्सा नहीं लेंगे। लेह एपेक्स बॉडी के अध्यक्ष थुपस्तान छेवांग ने कहा, “लद्दाखियों को ‘देश विरोधी’ बताना और पाकिस्तान से जोड़ना बेहद शर्मनाक है। हम तब तक बातचीत नहीं करेंगे जब तक केंद्र माफी नहीं मांगता और गोलीबारी की न्यायिक जांच का आदेश नहीं देता।”

सज्जाद कारगिली ने कहा कि लद्दाख बेहद संवेदनशील इलाका है। एक ओर चीन के साथ एलएसी है और दूसरी ओर पाकिस्तान के साथ एलओसी। ऐसे में लद्दाख की जनता को लोकतंत्र से वंचित करना खतरनाक है। उन्होंने कहा कि जिस तरह भारत के अन्य राज्यों में संघीय ढांचा लागू है, उसी तरह लद्दाख में भी लोकतंत्र की बुनियाद रखी जानी चाहिए।

सज्जाद कारगिली ने याद दिलाया कि लद्दाख का आंदोलन हमेशा शांतिपूर्ण रहा है। चाहे दिल्ली बॉर्डर पर गिरफ्तारी हो या माइनस डिग्री में लेह की सड़कों पर प्रदर्शन, जनता ने लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांग रखी है। लेकिन हर बार सरकार ने तब ही बातचीत की है जब आंदोलन ने जोर पकड़ा।

उन्होंने कहा, “हमारी चुप्पी में कभी कोई अधिकारी हाल पूछने नहीं आता। जब हम आवाज उठाते हैं और लोग सड़कों पर उतरते हैं, तभी बैठकें तय होती हैं। यह दर्शाता है कि सरकार जनता के दबाव में ही बात करती है।”

24 सितंबर को हुई हिंसा पर सवाल उठाते हुए कारगिली ने कहा कि प्रशासन के पास पहले से जानकारी थी कि हालात बिगड़ सकते हैं, लेकिन कोई तैयारी नहीं की गई। न तो बैरिकेडिंग की गई, न ही वाटर कैनन लगाए गए। सीधे गोलीबारी क्यों की गई?

कारगिली ने इसे 2019 में अनुच्छेद 370 हटाने से जोड़ा। उन्होंने कहा, “जब कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाया गया, तब सरकार ने पूरा इलाका सील कर दिया था। अगर लद्दाख में भी जानकारी थी, तो पहले से एहतियाती कदम क्यों नहीं उठाए गए?”

उन्होंने कहा कि इस घटना के बाद लद्दाख के लोग पहले से ज्यादा आहत महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है कि उन्हें हमेशा देश की रक्षा के लिए सीमा पर खड़ा किया गया, कारगिल युद्ध हो या गलवान घाटी का संघर्ष, लद्दाखियों ने अपनी शहादत दी। लेकिन अब उन्हें “देश विरोधी” बताना गलत है।

सज्जाद कारगिली ने देश के सामने चार मुख्य मांगें रखी हैं। इनमें पहली मांग है – लद्दाख को राज्य का दर्जा दिया जाए। उनका कहना है कि केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद लद्दाख की जनता को लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया है। यहां नौकरशाह केंद्र सरकार से नियुक्त होते हैं और लोगों की आवाज को दरकिनार किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि लद्दाख की दूसरी बड़ी मांग है छठी अनुसूची में शामिल किया जाना। यह मांग 2019 के लोकसभा चुनाव और 2020 के लेह हिल काउंसिल चुनाव में भाजपा ने भी वादा किया था। सज्जाद कारगिली ने कहा कि 90 फीसदी से ज्यादा आबादी आदिवासी है और जलवायु परिवर्तन के खतरों से यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील है। छठी अनुसूची से ही यहां की सांस्कृतिक पहचान, जमीन और पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित हो पाएगी।

तीसरी मांग को लेकर बोलते हुए उन्होंने कहा कि लद्दाख के युवाओं के लिए सबसे अहम मुद्दा रोजगार है। पिछले छह साल में लद्दाख को न तो पब्लिक सर्विस कमीशन मिला, न ही किसी भी तरह की भर्ती हुई। प्रशासनिक और पुलिस सेवाओं में एक भी स्थानीय युवक की भर्ती न होना बड़ी चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि बेरोजगारी से युवाओं में आक्रोश और निराशा बढ़ रही है।

चौथी मांग रखते हुए सज्जाद कारगिली ने कहा कि लद्दाख देश का सबसे बड़ा संसदीय क्षेत्र है। सज्जाद कारगिली ने बताया कि यह इलाका जम्मू-कश्मीर से भी तीन गुना बड़ा है। इसलिए लेह और कारगिल को अलग-अलग प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उनका कहना है कि एक सांसद पूरे क्षेत्र की सही तरह से देखभाल नहीं कर सकता।

सज्जाद कारगिली ने कहा कि पिछले तीन साल से लद्दाख की जनता सर्दियों की बर्फीली रातों से लेकर दिल्ली की गर्म सड़कों तक शांतिपूर्ण विरोध कर रही है। लद्दाख का आंदोलन पूरी तरह अहिंसक और लोकतांत्रिक रहा है। लेह, जम्मू, दिल्ली और अन्य जगहों पर प्रदर्शन हुए। यहां तक कि माइनस डिग्री तापमान में भी लोग अपने अधिकारों की मांग के लिए जुटे रहे।

सज्जाद कारगिली ने लद्दाख के इकोसिस्टम पर भी बात की। उन्होंने कहा कि लद्दाख का मुद्दा केवल लोकतंत्र का नहीं, बल्कि जलवायु संकट से भी जुड़ा हुआ है। 2025 की मानसून आपदाओं में उत्तरकाशी, मंडी, जोशीमठ, लद्दाख और सिक्किम जैसे इलाकों में भूस्खलन और बाढ़ की तबाही हुई। यह सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि लापरवाह विकास मॉडल और जंगलों की कटाई का नतीजा है। उन्होंने कहा कि चारधाम रोड प्रोजेक्ट जैसी योजनाओं ने पहाड़ों की नाजुक संरचना को और कमजोर किया है। पर्यावरणीय सुरक्षा जैसे कानूनों को कमजोर करने से हिमालयी क्षेत्र पर आपदा का खतरा बढ़ गया है।

Zorawar Light Tank में लगेगा स्वदेशी ‘दिल’, अमेरिकी कमिंस इंजन की होगी विदाई, भारतीय सेना को सर्दियों में डिलीवर होंगे दो टैंक

Zorawar Light Tank: Indian Light Tank Makes History with Accurate Firing in Ladakh! Airlift Nyoma via IAF IL-76 plane

Zorawar Light Tank: भारतीय सेना को जल्द ही अपना पहला स्वदेशी जोरावर टैंक मिलने जा रहा है। यह लाइट टैंक सर्दियों तक सेना को सौंप दिया जाएगा। योजना के मुताबिक इसे साल की शुरुआत में ही सौंपा जाना था, लेकिन शुरुआती ट्रायल्स के बाद इसमें कुछ तकनीकी सुधार की जरूरत बताई गई। अब सुधारों के बाद यह पूरी तरह से तैयार है। सूत्रों का कहना है कि एक टैंक तैयार हो चुका है और दूसरा निर्माणाधीन है। सेना को सर्दियों में दो यूनिट दी जाएंगी, जिन्हें फिर मुश्किल हालात में यूजर ट्रायल के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

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लगाई जाएगी नाग मिसाइल

जोरावर में केवल गन ही नहीं बल्कि मिसाइल सिस्टम भी लगाया जाएगा। इसमें नाग मार्क-2 मिसाइल फिट होगी, जिसे भी डीआरडीओ ने ही डेवलप किया है। नाग मिसाइल का फील्ड ट्रायल पहले ही सफल रहा है और यह “फायर एंड फॉरगेट” एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल है। इससे टैंक की मारक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।

25 टन वजन वाले जोरावर में मेन गन, मिसाइल और ड्रोन इंटीग्रेशन की सुविधा होगी। ड्रोन का लाइव फीड सीधे टैंक कमांडर को मिलेगा, जिससे दुश्मन पर रियल-टाइम निगरानी रखी जा सकेगी। सेना भविष्य में लगभग 350 लाइट टैंकों की खरीदारी की योजना बना रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि Zorawar Light Tank की सबसे बड़ी जरूरत चीन बॉर्डर पर है। चीन के पास पहले भी से ही लाइट और मीडियम टैंक हैं। 2020 में गलवान और पैंगोंग झील क्षेत्र में हुए गतिरोध के बाद भारत ने यह महसूस किया कि ऊंचाई वाले इलाकों में भारी टैंक उतारना चुनौतीपूर्ण है।

उस दौरान भारतीय सेना ने टी-72 और टी-90 टैंक ऊंचाई पर तैनात कर चीन को चौंकाया जरूर, लेकिन इन टैंकों की सीमाएं भी सामने आईं। यही अनुभव दिखाता है कि भारतीय सेना को विशेष रूप से ऊंचाई और द्वीपीय क्षेत्रों के लिए हल्के लेकिन घातक टैंक की जरूरत है।

जोरावर का नाम डोगरा जनरल जोरावर सिंह के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने हिमालयी इलाकों में अपनी वीरता का परचम लहराया था।

Zorawar Light Tank के निर्माण को “मेक इन इंडिया” पहल के तहत मंजूरी अप्रैल 2023 में दी गई थी। इसका निर्माण डीआरडीओ की कॉम्बैट व्हीकल्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट इस्टैब्लिशमेंट और लार्सन एंड टुब्रो ने मिलकर किया है।

शुरुआती प्रोटोटाइप अमेरिकी इंजन कमिन्स वीटीए903ई-टी760 से चल रहे हैं, यह 760 हॉर्सपावर (570 किलोवाट) का वी8 डीजल इंजन है। लेकिन भविष्य में इन्हें पूरी तरह स्वदेशी 800एचपी इंजन से लैस किया जाएगा। यह नया इंजन अशोक लेलेंड के सहयोग से विकसित 600एपी इंजन का अपग्रेडेड वर्जन होगा। 600 हॉर्सपावर वाला इंजन पहले से ही व्हील्ड आर्मर्ड प्लेटफॉर्म (व्हैप) 8×8 जैसे वाहनों पर टेस्टिंग के लिए तैयार किया जा चुका है। इसे एक बेसिक टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर माना जा रहा है।

अब इसका एडवांस 800 हॉर्सपावर वाला वेरिएंट खास तौर पर 25 से 30 टन वजन वाले ट्रैक्ड कॉम्बैट व्हीकल्स (जैसे आने वाले जोरावर टैंक) के लिए डिजाइन किया गया है। यह हाई-एल्टीट्यूड (ऊँचाई वाले इलाकों) में बेहतर परफॉर्मेंस देगा। नया पावरपैक न केवल ज्यादा ताकतवर होगा बल्कि इसमें “कोल्ड स्टार्ट” जैसी सुविधाएं होंगी, जिससे माइनस तापमान में भी टैंक बिना दिक्कत के चल सकेगा।

अभी तक के प्रोटोटाइप अमेरिकी रेनक अमेरिका एचएमपीटी-800 हाइड्रोस्टैटिक/मैकेनिकल कंटीन्यूअसली ट्रांसमिशन पर आधारित हैं। यह अमेरिकी पावरपैक अमेरिकी आर्मर्ड मल्टी-पर्पस व्हीकल और ब्रैडली ए4 जैसे हथियारबंद वाहनों में इस्तेमाल होते हैं। इसे इसलिए अपनाया गया क्योंकि जर्मनी की कंपनी एमटीयू (जो रोल्स-रॉयस की सब्सिडियरी है) से 800 हॉर्सपावर का इंजन कड़े एक्सपोर्ट कंट्रोल के चलते समय पर नहीं मिल पाया। हालांकि कमिंस इंजन भरोसेमंद है, लेकिन भविष्य में इसकी सप्लाई चेन की दिक्कत आ सकती है और भारत के टैंक पूरी तरह से स्वदेशी नहीं रह पाते। यही वजह है कि डीआरडीओ ने अब पूरी तरह भारतीय इंजन और ट्रांसमिशन विकसित करने पर जोर देना शुरू किया है।

वहीं, Zorawar Light Tank के आने वाले बैच पूरी तरह स्वदेशी ट्रांसमिशन से लैस होंगे। इसका मतलब है कि भविष्य में भारत को न तो स्पेयर पार्ट्स के लिए विदेश पर निर्भर रहना पड़ेगा और न ही सप्लाई चेन में बाधा आएगी।

MiG-21 Farewell: अमेठी के स्क्वाड्रन लीडर सुबोध दीक्षित ने लिखी थी मिग-21 के फेयरवेल की पटकथा, रिटायरमेंट के बाद वायुसेना ने खासतौर पर किया था याद

MiG-21 Farewell: Squadron Leader Subodh Dixit Designed Final Airshow Tribute
MiG-21 Farewell: Squadron Leader Subodh Dixit Designed Final Airshow Tribute

MiG-21 Farewell: चंडीगढ़ एयरबेस पर 26 सितंबर 2025 का दिन भारतीय वायुसेना के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया। 62 वर्षों तक भारत के आसमान की सुरक्षा करने वाले MiG-21 फाइटर जेट्स को भावुक विदाई दी गई। वहीं, इस समारोह की पूरी रूपरेखा अमेठी निवासी और हाल ही में रिटायर हुए स्क्वाड्रन लीडर सुबोध दीक्षित ने तैयार की थी। वे इससे पहले भी कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय एयरशो आयोजित कर चुके हैं, जिसके बाद भारतीय वायुसेना ने उन्हें इस विशेष मौके के लिए खासतौर पर आमंत्रित किया था।

MiG-21 retirement: 62 साल बाद ‘बर्ड ऑफ ऑल सीजन्स’ को मिली सम्मानजनक विदाई, रक्षा मंत्री बोले- साहस, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक था मिग-21

जगुआर और तेजस को किया शामिल

अमेठी के कोरवा आयुधपुरम निवासी स्क्वाड्रन लीडर सुबोध दीक्षित के रिटायर होने के बाद भी वायुसेना ने उनके अनुभवों का सम्मान करते हुए मिग-21 के फेयरवेल एयरशो को यादगार बनाने के लिए उन्हें यह खास जिम्मेदारी सौंपी। स्क्वाड्रन लीडर सुबोध दीक्षित ने MiG-21 Farewell के साथ-साथ जगुआर बॉम्बर और लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस के करतबों को भी एयरशो में शामिल किया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमरप्रीत सिंह और पश्चिमी वायु कमान के वरिष्ठ अधिकारियों समेत देश-विदेश से आए गणमान्य अतिथियों के सामने यह कार्यक्रम शानदार ढंग से आयोजित किया गया।

मिग-21 दुनिया के सबसे प्रसिद्ध जेट विमानों में से एक रहा है। सोवियत संघ में निर्मित इस सुपरसोनिक फाइटर जेट ने 1955 में पहली उड़ान भरी और 1985 तक इसके 10,000 से अधिक विमान बनाए गए। पश्चिमी देशों ने इसे “फिशबेड” नाम दिया था। भारत ने 1963 में इसे शामिल किया और तब से यह पाकिस्तान के खिलाफ कई युद्धों और संघर्षों में निर्णायक साबित हुआ।

62 साल की सेवा में इस विमान ने न सिर्फ भारत की सीमाओं की रक्षा की बल्कि कई बार दुश्मनों को धूल चटाई। 1971 के युद्ध से लेकर कारगिल और बालाकोट एयर स्ट्राइक औऱ हाल में हुए ऑपरेशन सिंदूर में भी MiG-21 ने हर मिशन में तिरंगे को गर्व से उड़ाया।

आखिरी 23 स्क्वाड्रन का रहे हिस्सा

सुबोध दीक्षित MiG-21 Farewell की आखिरी बची 23 स्क्वाड्रन का हिस्सा रहे। वे बताते हैं कि राजस्थान की भीषण गर्मी में भी वे रनवे के किनारे खड़े होकर मिग-21 की टेकऑफ देखना पसंद करते थे। इस विमान की बारीकियों को समझने और उसके ऑपरेशन को देखना उनके लिए गर्व की बात थी और MiG-21 Farewell अब जल्द ही होने वाली है।

ट्रैफिक कंट्रोल ऑफिसर के तौर पर भी उन्हें 2019 और 2023 में वायु कमान मेंटेनेंस कमांड नागपुर और सेंट्रल एयर कमांड प्रयागराज से प्रशस्ति पत्र भी मिला। एयर मार्शल अर्जन सिंह से लिखित प्रशंसा पत्र पाना उनके करियर का खास पल रहा। 25 मई 2024 को उत्तर प्रदेश की राज्यपाल ने भी उनकी लेखन कला और पुस्तकों को सराहा।

सुबोध दीक्षित को तीनों सेनाओं के वरिष्ठ अधिकारियों से 20 से अधिक प्रशंसा पत्र मिले हैं। वे मानते हैं कि धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए ईश्वर किसी योग्य व्यक्ति को चुनकर उसका मार्गदर्शन करता है। उनकी यह यात्रा युवाओं के लिए प्रेरणा है। वे यह संदेश देते हैं कि रिटायर हुआ सैनिक किसी काम का नहीं होता, बल्कि अपने अनुभव और सेवा से समाज और राष्ट्रहित में योगदान देता रहता है।

वहीं, स्क्वाड्रन लीडर सुबोध दीक्षित का यह योगदान अमेठी ही नहीं, पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। MiG-21 के विदाई समारोह में उनकी भूमिका ने यह साबित किया कि भारतीय वायुसेना अपने दिग्गजों को हमेशा सम्मान देती है और उनके अनुभव को राष्ट्रहित में जोड़ती है और अब MiG-21 Farewell हो रही है।

Anant Shastra: क्या है भारतीय सेना का “अनंत शस्त्र” हथियार, और क्यों है खास? जारी किया 30,000 करोड़ का टेंडर

Anant Shastra air defence missile systems

भारतीय सेना ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड को लगभग 30,000 करोड़ रुपये का टेंडर जारी किया है। इस टेंडर के तहत सेना को 5 से 6 रेजिमेंट अनंत शस्त्र एयर डिफेंस सिस्टम की सप्लाई की जाएगी। डीआरडीओ द्वारा बनाए इस सिस्टम को पहले क्विक रिएक्शन सरफेस-टू-एयर मिसाइल (QRSAM) के नाम से जाना जाता था।

Indian Army Drone Shield: ऑपरेशन सिंदूर की तरह अब पाकिस्तान नहीं कर पाएगा भारत के खिलाफ ड्रोन वॉर, भारतीय सेना करने जा रही है यह बड़ा अपग्रेड

क्या है Anant Shastra

Anant Shastra भारत में विकसित एक एडवांस एयर डिफेंस सिस्टम है, जिसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन के विमानों, ड्रोन और मिसाइलों से भारतीय सेना की सुरक्षा करना है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी मोबिलिटी और क्विक रेस्पॉन्स क्षमता है। यह प्रणाली चलते-फिरते लक्ष्यों को ट्रैक कर सकती है और बेहद कम समय में फायर करने की क्षमता रखती है।

यह प्रणाली पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक पर आधारित है। इसमें उत्तम एईएसए रडार और एडवांस सेंसर लगे हैं, जो दिन और रात दोनों परिस्थितियों में लक्ष्य को पहचानकर उसे नष्ट करने में सक्षम हैं।

मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने चीनी ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल किया था। उस समय भारतीय सेना की एयर डिफेंस य़ूनिट्स ने एल-70 और ज़ू-23 गनों से कई ड्रोन गिराए थे। साथ ही, आकाश और एमआर-एसएएम सिस्टम ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस कार्रवाई ने दिखा दिया कि भारतीय सेना को छोटे और मध्यम रेंज के और ज्यादा एडवांस सिस्टम की जरूरत है। जिसके बाद अनंत शस्त्र के प्रोजेक्ट पर फोकस किया गया।

Anant Shastra air defence missile systems

करीब 30,000 करोड़ रुपये की इस परियोजना के तहत बीईएल भारतीय सेना को अनंत शस्त्र प्रणाली उपलब्ध कराएगी। बताया गया है कि इस प्रणाली की तैनाती पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर किया जाएगी, ताकि पाकिस्तान और चीन से आने वाले हवाई खतरों का मुकाबला किया जा सके।

इसकी रेंज लगभग 30 किलोमीटर है, जो पहले से मौजूद आकाश और मीडियम रेंज सरफेस टू एय़र मिसाइल MRSAM जैसी सिस्टम के साथ काम करेगी।

Anant Shastra प्रणाली का कई बार सफल परीक्षण किया जा चुका है। इन ट्रायल्स में इसे दिन और रात दोनों परिस्थितियों में परखा गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसने हर बार अपने लक्ष्यों को सटीकता से भेदा। इसके मोबाइल लॉन्चर सिस्टम की वजह से इसे फटाफट तैनात किया जा सकता है।

भारतीय सेना की आर्मी एयर डिफेंस वर्तमान में आकाश और मीडियम रेंज सरफेस टू एय़र मिसाइल और दूसरे छोटे एयर डिफेंस सिस्टम्स का इस्तेमाल करती है। यह भारतीय वायुसेना के साथ मिलकर हवाई खतरों से सुरक्षा देती है। इसके अलावा सेना को नए रडार, जामर और लेजर-आधारित सिस्टम भी मिलने वाले हैं, ताकि पाकिस्तान और चीन से आने वाले आधुनिक ड्रोन खतरों से निपटा जा सके।

Anant Shastra प्रणाली  पूरी तरह से डीआरडीओ ने तैयार की है। और बीईएल इसकी सप्लाई के लिए जिम्मेदार होगी। इस प्रोजेक्ट में लगभग 105 भारतीय कंपनियां कंपोनेंट्स के निर्माण में शामिल हैं। इससे भारत का एयरोस्पेस और रक्षा उद्योग मजबूत होगा और बड़ी संख्या में रोजगार भी पैदा होंगे। अनुमान है कि हर साल करीब 11,750 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार इस प्रोजेक्ट से जुड़े रहेंगे।

Lashkar-e-Taiba in KPK: ऑपरेशन सिंदूर के बाद लश्कर ने बदला आतंकी ठिकाना, ISI की मदद से खैबर पख्तूनख्वा से ऑपरेट करेगा ‘जान-ए-फिदाई’

Lashkar-e-Taiba in KPK
After JeM and Hizbul Mujahideen, the Emergence of Under Construction Lashkar-e-Taiba Training Centre in Khyber Pakhtunkhwa

Lashkar-e-Taiba in KPK: भारतीय सेना के ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तानी आतंकी संगठनों ने अपने ठिकाने बदलने शुरू कर दिए हैं। पहले यह कैंप पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर पीओके और पंजाब में चलते थे, लेकिन अब इन्हें खैबर पख्तूनख्वा यानी केपीके में शिफ्ट किया जा रहा है। इटेंलिजेंस सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, पाकिस्तान का सबसे बड़ा राज्य-प्रायोजित और संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा अब केपीके लोअर दिर जिले में नया ट्रेनिंग और रेजिडेंशियल सेंटर बना रहा है और Lashkar-e-Taiba in KPK का मुद्दा लगातार चर्चा का टॉपिक बन गया है।

Lashkar-e-Taiba in KPK
After JeM and Hizbul Mujahideen, the Emergence of Under
Construction Lashkar-e-Taiba Training Centre in Khyber Pakhtunkhwa

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मरकज जिहाद-ए-अक्सा है नया ठिकाना

22 सितंबर 2025 को सामने आई तस्वीरों और वीडियोज से पुष्टि हुई कि लश्कर-ए-तैयबा लोअर दिर के कुम्बन मैदान इलाके में लगभग 4,643 वर्ग फुट भूमि पर नया सेंटर बना रहा है। इसे मरकज जिहाद-ए-अक्सा नाम दिया गया है। यह जगह अफगान सीमा से महज 47 किलोमीटर दूर है। जुलाई 2025 से निर्माण शुरू हुआ और सितंबर तक इसकी पहली मंजिल का फ्रेम तैयार हो चुका है। आरसीसी छत डालने का काम भी तेजी से चल रहा है।

Lashkar-e-Taiba in KPK
Visual shows steady flow of materials and labor, consistent with a deliberate plan to reconstitute

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धार्मिक संस्थानों के सहारे आतंकी ढांचा

Lashkar-e-Taiba in KPK हमेशा से धार्मिक संस्थानों की आड़ में अपने आतंकी ठिकाने बनाता रहा है। नया ट्रेनिंग भी इसके पास बनी जामिया अहले सुन्नत मस्जिद के बगल में बनाया जा रहा है। इस रणनीति का उद्देश्य आतंकियों की आवाजाही और भर्ती को धार्मिक गतिविधियों की आड़ में छिपाना है।

Lashkar-e-Taiba in KPK

वहीं, खास बात यह है कि लोअर दिर में लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिद्दीन के नए निर्माणाधीन कैंपों के बीच की दूरी केवल 4 किलोमीटर है, जिससे अंदेशा लगाया जा रहा है कि दोनों आतंकी संगठन आपसी तेलमेल के जरिए आतंकी घटनाओं को अंजाम दे सकते हैं।

आतंकी नेताओं को मिली जिम्मेदारियां

नए कैंप की कमान कुख्यात आतंकी नसर जावेद को दी गई है, जो 2006 हैदराबाद बम धमाके का सह-साजिशकर्ता रहा है। वह 2004 से 2015 तक पीओके के दुलई प्रशिक्षण कैंप को चलाता था और वर्तमान में लश्कर की फंडिंग संस्था खिदमत-ए-खल्क से जुड़ा है। इसके अलावा मुहम्मद यासीन उर्फ बिलाल भाई को जिहादी विचारधारा सिखाने की जिम्मेदारी मिली है, जबकि हथियारों की ट्रेनिंग अनसुल्लाह खान देख रहा है, जिसे 2016 में गरही हबीबुल्लाह कैंप में ट्रेनिंग दी गई थी।

Lashkar-e-Taiba in KPK

दाऊरा-ए-खास और दाऊरा-ए-लश्कर की तैयारी

एक बार यह ठिकाना तैयार हो जाने पर यहां दो मुख्य ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाए जाएंगे – दाऊरा-ए-खास और दाऊरा-ए-लश्कर। यह केंद्र लश्कर के जान-ए-फिदाई फिदायीन यूनिट का नया ठिकाना बनेगा। पहले यह यूनिट भिम्बर-बर्नाला स्थित मरकज अहले हदीस से चलती थी, जिसे 7 मई को भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ध्वस्त कर दिया था।

Lashkar-e-Taiba in KPK

इंटेलिजेंस सूत्र बताते हैं कि इस पूरी शिफ्टिंग के पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का स्पेशल ऑपरेशंस डायरेक्टरेट है। इसके जरिए आतंकियों की गतिविधियों को भारतीय निगरानी से दूर रखने की कोशिश की जा रही है। इसके साथ ही हिजबुल मुजाहिद्दीन और जैश-ए-मोहम्मद ने भी अपने नए ठिकाने केपीके में शिफ्ट कर लिए हैं।

दिसंबर 2025 तक पूरा होने की उम्मीद

सूत्रों ने बताया कि लश्कर-ए-तैयबा के नए ट्रेनिंग सेंटर का काम दिसंबर 2025 तक पूरा होने की उम्मीद है, आने वाले समय में बड़े स्तर का खतरा बन सकता है। अभी यह निर्माणाधीन है, लेकिन पहले से ही इसे भर्ती, कट्टरपंथ फैलाने और बड़े पैमाने पर आतंकी प्रशिक्षण का नया अड्डा माना जाने लगा है। खास बात यह है कि इसके बगल में बन रहा मरकज़ जामिया अहले सुन्नत अभी केवल 80 फीसदी ही तैयार हुआ है, लेकिन उसे अधूरा छोड़कर लश्कर-ए-तैयबा ने अपनी पूरी ताकत, संसाधन और पैसा जिहाद-ए-अक्सा ट्रेनिंग सेंटर बनाने में झोंक दिया है।

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पाकिस्तानी सेना ने टीटीपी पर चलाई क्लीनअप ड्राइव

लोअर दिर ऐतिहासिक रूप से भारत-विरोधी आतंकी गतिविधियों का गढ़ रहा है, जहां अल-बदर जैसे संगठन सक्रिय रहे। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर से पहले यहां लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिद्दीन की कोई मौजूदगी नहीं थी। अल-बदर के अलावा, यह इलाका लंबे समय तक तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का मजबूत ऑपरेशनल बेस रहा। हालांकि, दोनों संगठनों की विचारधारा में फर्क है। टीटीपी देवबंदी सोच रखता है और पाकिस्तान विरोधी है, जबकि लश्कर अहले हदीस विचारधारा को मानता है और पाकिस्तान समर्थक है। इसी वजह से लोअर दिर में टीटीपी के आतंकियों ने लश्कर कमांडरों की कई बार टारगेटेड हत्याएं कीं।

साल 2011 में, जब लश्कर ने यहां अस्थायी ट्रेनिंग सेंटर बनाया, तो टीटीपी ने एक आत्मघाती हमला किया। यह हमला एक लश्कर कमांडर के जनाजे में हुआ था, जिसमें 20 लोगों की मौत हो गई। माना जाता है कि लश्कर की गतिविधियों को सुरक्षित रखने और ट्रेनिंग बिना बाधा जारी रखने के लिए पाकिस्तानी सेना ने जून 2025 में लोअर दिर में एक “क्लीनअप ड्राइव” शुरू की। इसमें टीटीपी के आतंकियों को निशाना बनाया गया। इस अभियान में दो दर्जन से ज्यादा टीटीपी आतंकी मारे गए और इसके बाद सिर्फ एक महीने के भीतर लश्कर ने अपना नया आतंकी केंद्र बनाना शुरू कर दिया।

केपीके में पाक सेना कर रही हमले

पाकिस्तानी सेना और एयरफोर्स ने जून 2025 से अब तक केपीके में 40 से अधिक नागरिकों की हत्या की है। आधिकारिक बयान में कहा गया कि ये अभियान “टेरर-फ्री” करने के लिए हैं, लेकिन असल में इसका उद्देश्य पाकिस्तान विरोधी आतंकियों को खत्म करना और भारत विरोधी संगठनों को सुरक्षित माहौल देना है।

पाकिस्तान की यह दस साल से चली आ रही नीति को वहां के मुख्यमंत्री अली अमीन गांधापुर ने अगस्त 2025 की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुद स्वीकार किया था। खास बात यह है कि पाकिस्तान जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद-रोधी अभियान के लिए मदद मांगता है, तो मिली हुई राशि का बड़ा हिस्सा आम नागरिकों की हत्या या फिर सरकार-विरोधी आतंकियों को खत्म करने में लगा देता है। इससे नतीजा यह निकलता है कि सरकार-समर्थित आतंकी संगठनों के लिए सुरक्षित माहौल तैयार हो जाता है।

लोअर दिर में लश्कर का यह नया प्रशिक्षण केंद्र दिसंबर 2025 तक तैयार हो सकता है। यह न केवल भर्ती और वैचारिक ब्रेनवॉश का केंद्र बनेगा बल्कि हथियारों और बड़े ऑपरेशनों की ट्रेनिंग भी यहां दी जाएगी। आशंका है कि अब आगे इसी सेंटर के जरिए भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को चलाने की कोशिशें की जाएंगी

 

MiG-21 Last Sortie: भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने इस तरह दी मिग-21 को विदाई, सौंपा फॉर्म-700 डॉक्यूमेंट

MiG-21 Last Sortie

MiG-21 Last Sortie: भारतीय वायुसेना के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले मिग-21 लड़ाकू विमानों ने आखिरकार शुक्रवार को औपचारिक विदाई दे दी गई। इस मौके को और यादगार बनाने के लिए भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने खुद ‘बादल 3’ कॉल साइन के साथ मिग-21 की आखिरी सॉर्टी यानी उड़ान भरी। उनके साथ स्क्वॉड्रन लीडर प्रिया शर्माने भी उड़ान भरी। दोनों ने इससे पहले पिछले महीने राजस्थान के नाल एयरबेस पर मिग-21 बाइसन पर सोलो कॉम्बैट सॉर्टी की थी। उस फॉर्मेशन की अगुवाई स्क्वॉड्रन लीडर प्रिया शर्मा ने की थी।

MiG-21 retirement: 62 साल बाद ‘बर्ड ऑफ ऑल सीजन्स’ को मिली सम्मानजनक विदाई, रक्षा मंत्री बोले- साहस, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक था मिग-21

यह उड़ान सिर्फ एक सैन्य परंपरा का हिस्सा नहीं थी, बल्कि यह उस पूरे दौर को सलाम थी, जिसने भारत की हवाई शक्ति को दशकों तक मजबूती दी। एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने MiG-21 का नेतृत्व करते हुए जो फ्लाईपास्ट किया, मिग-21 के प्रति अपनी गहरी आस्था और सम्मान को प्रदर्शित किया।

चंडीगढ़ एयरबेस पर हुए इस समारोह में एक बेहद प्रतीकात्मक फ्लाईपास्ट किया गया। इसमें MiG-21 बाइसन और स्वदेशी एलसीए तेजस ने साथ उड़ान भरी। यह दृश्य पुराने और नए युग का मिलन थास जहां सोवियत दौर का ‘बाइसन’ अपने कंधों पर गौरव का इतिहास लिए विदा हो रहा था और स्वदेशी तेजस भविष्य की दिशा दिखा रहा था।

इसके बाद छह मिग-21 विमानों ने अपनी अंतिम उड़ान पूरी की और रक्षा मंत्री, सेना प्रमुखों और सभी वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में औपचारिक रूप से अलविदा कह दिया गया।

इस विदाई कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी और नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी मौजूद थे। रक्षा मंत्री ने इस अवसर पर कहा कि मिग-21 भारतीय वायुसेना का “बर्ड ऑफ ऑल सीजन्स” रहा है और इसकी भूमिका को कभी भुलाया नहीं जा सकता और MiG-21 Last Sortie यादगार है।

समारोह के दौरान एयरफोर्स के अफसरों और 28 स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर ने फॉर्म-700 डॉक्यूमेंट वायुसेना प्रमुख को सौंपा। यह दस्तावेज किसी विमान की आधिकारिक सेवा समाप्ति का प्रतीक माना जाता है।

विदाई को यादगार बनाने के लिए रक्षा मंत्री ने एक विशेष डाक टिकट और डे कवर भी जारी किया। इसे भारतीय वायुसेना के लंबे और गौरवशाली इतिहास में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

इस कार्यक्रम में सिर्फ उड़ान ही नहीं, बल्कि वायुसेना की कई विशेष टीमों ने अपने कौशल का प्रदर्शन भी किया। आकाश गंगा स्काईडाइविंग टीम ने शानदार छलांग लगाई, जबकि एयर वारियर ड्रिल टीम ने सटीक और अनुशासित मूवमेंट्स के जरिए दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

इसके अलावा सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम ने आकाश में खास प्रस्तुति की। समारोह के दौरान जगुआर और MiG-21 विमानों ने मिलकर एक प्रतीकात्मक फ्लाईपास्ट भी किया, जिसने 1971 और कारगिल जैसे ऐतिहासिक अभियानों की याद ताजा कर दी और अब  MiG-21 Last Sortie को सब देख रहे है।

मिग-21 भारतीय वायुसेना में 1963 से शामिल हुआ और तब से अब तक इसने हर बड़े युद्ध और ऑपरेशन में अपनी क्षमता साबित की। चाहे वह 1971 का युद्ध हो, कारगिल संघर्ष हो या 2019 का बालाकोट एयरस्ट्राइक, इस विमान ने हमेशा भारतीय तिरंगे को गर्व से ऊंचा रखा।

वर्षों तक इसे लगातार अपग्रेड किया गया और इसका बाइसन वैरिएंट वायुसेना के लिए सबसे विश्वसनीय इंटरसेप्टर साबित हुआ। लेकिन तकनीकी विकास और नए विमानों के आने के बाद अब MiG-21 Last Sortie सम्मानजनक विदाई दी गई है।

MiG-21 retirement: 62 साल बाद ‘बर्ड ऑफ ऑल सीजन्स’ को मिली सम्मानजनक विदाई, रक्षा मंत्री बोले- साहस, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक था मिग-21

MiG-21 retirement

MiG-21 retirement: भारतीय वायुसेना का सबसे पुराना और भरोसेमंद लड़ाकू विमान मिग-21 अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। 62 साल तक आसमान में भारतीय तिरंगे की शान बढ़ाने वाले इस विमान को शुक्रवार को औपचारिक रूप से विदाई दी गई। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे “बर्ड ऑफ ऑल सीजन्स” कहते हुए श्रद्धांजलि दी और कहा कि इसने हर भूमिका में भारतीय वायुसेना का सिर ऊंचा किया और पीढ़ियों के पायलटों को तैयार किया।

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MiG-21 की आखिरी पीढ़ी बाइसन को चंडीगढ़ एयरबेस पर 28 स्कवॉड्रन पर आखिरी विदाई दी गई। मिग-21 के विदाई समारोह में राजनाथ सिंह ने भावुक शब्दों में कहा कि मिग-21 पर सवार होकर पीढ़ियों के पायलटों ने उड़ान सीखी, कठिन परिस्थितियों में जीत हासिल की। उन्होंने कहा कि यही वह प्लेटफॉर्म था जिसने भारतीय वायुसेना की रणनीति को दशकों तक दिशा दी। उन्होंने कहा, “मिग-21 केवल एक विमान नहीं था, बल्कि साहस, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक था। इसी विमान ने हमें आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया और आज हम एलसीए तेजस और एएमसीए जैसे स्वदेशी विमानों की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।”

रक्षा मंत्री ने कहा, कोई भी ऐतिहासिक मिशन हो, हर बार मिग-21 ने तिरंगे का सम्मान किया। इसलिए यह विदाई, हमारी सामूहिक स्मृतियों का भी है, हमारे राष्ट्रीय गौरव का भी है, और उस यात्रा का भी है, जिसमें साहस, बलिदान और उत्कृष्टता की कहानी लिखी गई है

MiG-21 की कहानी 1963 में भारतीय वायुसेना में इसके शामिल होने से शुरू होती है। सोवियत मूल के इस विमान को भारत ने समय-समय पर अपग्रेड किया और आखिरी वैरिएंट को मिग-21 बाइसन के नाम से जाना गया। यह दुनिया में सबसे ज्यादा बनाए गए लड़ाकू विमानों में शामिल है। करीब 11,500 मिग-21 तैयार किए गए थे, जिनमें से लगभग 850 ने भारत की वायुसेना की सेवा की।

रक्षा मंत्री राजनाथ ने कहा, 62 साल की लंबी यात्रा में मिग-21 ने भारत के लगभग हर बड़े युद्ध और अभियान में अपनी ताकत दिखाई। 1971 के भारत-पाक युद्ध में इसने ढाका के गवर्नर हाउस पर हमला किया और भारत की जीत सुनिश्चित की। कारगिल युद्ध 1999 में यह दुर्गम पहाड़ी इलाकों में दुश्मन की चौकियों पर सटीक हमलों के लिए इस्तेमाल हुआ। बालाकोट एयरस्ट्राइक 2019 में भी इसकी मौजूदगी रही, जब विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान ने इसी विमान से पाकिस्तान के एफ-16 को मार गिराया और इतिहास रचा। हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर 2025 में भी इस विमान को अग्रिम मोर्चे पर तैनात किया गया था, जहां इसने भारतीय पायलटों को हवाई बढ़त दिलाई।

इस दौरान MiG-21 को लगातार अपग्रेड भी किया गया। रक्षा मंत्री ने समारोह में साफ किया कि सेवा में बने रहे विमान अधिकतम 40 साल पुराने थे, जो कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक सामान्य उम्र है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने इसे हमेशा तकनीकी रूप से प्रासंगिक बनाए रखने के लिए आधुनिक राडार, एवियोनिक्स और बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल जैसी क्षमताओं से लैस किया। इन्हीं अपग्रेड्स की वजह से इसे “बाइसन” कहा जाने लगा। वहीं, मिग-21 को भारतीय वायुसेना में कई नामों से पुकारा गया, त्रिशूल, विक्रम, बादल और बाइसन। हर नाम इसकी क्षमताओं और बदलाव की एक नई कहानी कहता है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, भारतीय वायुसेना के लिए यह विमान केवल एक फाइटर जेट नहीं बल्कि “ट्रेनिंग स्कूल” था, जिसने हजारों पायलटों को तैयार किया। और इस जहाज ट्रेनिंग लेकर बाद में सुखोई-30I और राफेल जैसे आधुनिक विमानों को उड़ाने में भी सक्षम बने। राजनाथ सिंह ने कहा कि आज हमारे जो भी कुशल पायलट हैं, उनकी नींव मिग-21 पर रखी गई थी। यही वजह है कि यह विमान भारतीय वायुसेना के इतिहास में अमर रहेगा।

शुक्रवार को जब MiG-21 ने अपनी आखिरी ऑपरेशनल उड़ान भरी, तो भारतीय वायुसेना का एक सुनहरा अध्याय समाप्त हो गया। विदाई समारोह में वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी, पूर्व पायलट और एचएएल के इंजीनियर मौजूद थे, जिन्होंने इस एतिहासिक पल को अपनी आंखों से देखा।

एचएएल की भूमिका को भी विशेष रूप से सराहा गया। लगातार मरम्मत और अपग्रेड की वजह से यह विमान छह दशक तक हवा में मजबूती से खड़ा रहा। राजनाथ सिंह ने एचएएल के इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की मेहनत को सलाम करते हुए कहा कि उनकी कोशिशों ने ही इस विमान को इतना लंबा जीवन दिया।

विदाई के इस मौके पर राजनाथ सिंह ने कहा कि इस विमान को अलविदा कहना केवल एक सैन्य परंपरा नहीं है, बल्कि यह भारत की सभ्यता और विरासत का हिस्सा है। मिग-21 अब भले ही सक्रिय सेवा से बाहर हो गया हो, लेकिन इसके साहस और योगदान की गूंज आने वाली पीढ़ियों तक सुनाई देती रहेगी।

Pinaka MBRL: ड्रोन या FPV अटैक से बचाने के लिए सेना ने पिनाका रॉकेट लॉन्चर पर लगाया यह खास ‘जुगाड़’, ऑपरेशन सिंदूर के बाद उठाया यह कदम

Pinaka MBRL Cope Cage
Pinaka MBRL Cope Cage

Pinaka MBRL: भारतीय सेना पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम को ड्रोन खतरों से सुरक्षित रखने के लिए एक नया कदम उठाया है। अब इन रॉकेट लॉन्चरों पर कोप केज लगाया जा रहा है। हाल ही में इसकी एक फोटो सामने आई जिसमें पिनाका सिस्टम के ऊपर कोप केज लगा हुआ है। सेना ने यह कदम रूस-यूक्रेन और इजराइल-हमास युद्धों से मिली सीख के बाद उठाया है। जहां ड्रोन ने पारंपरिक भारी हथियारों को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद इसे बड़े पैमाने पर अपनाना शुरू किया है। हालांकि इस ऑपरेशन में पिनाका का इस्तेमाल नहीं हुआ था।

Pinaka Rocket System: नेवी और एयरफोर्स भी यूज कर सकेंगी पिनाका, DRDO बना रहा है 300 किमी रेंज वाला वर्जन, अमेरिकी ATACMS को देगा टक्कर

पिनाका भारत का स्वदेशी मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर जिसे डीआरडीओ ने बनाया है। यह सिस्टम 90 किमी तक की मारक क्षमता वाली मिसाइलें दाग सकता है। वहीं, आधुनिक युद्ध में छोटे, सस्ते और तेजी से तैनात होने वाले ड्रोन यानी यूएवी और एफपीवी फर्स्ट पर्सन व्यू टाइप ड्रोन से बड़े हथियारों बड़ा नुकसान देखने को मिल रहा है। इन चुनौतियों के देखते हुए भारतीय सेना ने पिनाका और अन्य आर्टिलरी सिस्टम पर ‘कोप केज’ लगाने का फैसला किया है।

कोप केज एक सस्ता और सरल जुगाड़ है, जो टैंक, रॉकेट लॉन्चर, और अन्य सैन्य उपकरणों के ऊपरी हिस्से पर लगाया जाता है। यह जालीदार स्ट्रक्चर ड्रोन से गिराए गए विस्फोटकों, लॉयटरिंग म्यूनिशन (जैसे कामिकेज़ ड्रोन), और टॉप-अटैक एंटी-टैंक मिसाइलों को रोकने में मदद करता है। यह हथियारों को सीधे टकराने से पहले विस्फोट को ट्रिगर करता है, जिससे नुकसान कम होता है और चालक दल सुरक्षित रहते हैं। भारत में इसे स्वदेशी रूप से बनाया जा रहा है, जो लागत को और कम करता है। भारतीय सेना ने यह तकनीक यूक्रेन-रशिया युद्ध और इजराइल-हमास संघर्ष से मिली सीख के बाद अपनाई है, क्योंकि इन संघर्षों में कोप-स्टाइल प्रोटेक्शन ने कई मौकों पर बड़े नुकसान होने से बचाया है।

भारतीय सेनाओं ने 2023 से कोप केज का इस्तेमाल शुरू किया और ऑपरेशन सिंदूर के बाद इसकी तैनाती में तेजी देखी गई है। सैन्य सूत्र बताते हैं कि कोप केज को पहले कुछ प्रमुख प्लेटफॉर्म्स पर आजमाया गया, फिर बड़े पैमाने पर रोल-आउट किया गया। पिनाका बैटरियों, मोबाइल रॉकेट सिस्टम, कुछ बख्तरबंद वाहनों और लॉजिस्टिक्स काफिलों पर यह स्ट्रक्चर लगाया जा रहा है ताकि सीमाओं पर होने वाले ड्रोन हमलों का सामना बेहतर तरीके से किया जा सके।

एक बड़े फायदे के तौर पर कोप केज को सस्ता और फटाफट लगाये जाने वाला सिस्टम माना जा रहा है। इसे मौजूदा वाहनों और सिस्टम पर बिना किसी बड़े मैकेनिकल परिवर्तन के लगाया जा सकता है, जिससे लागत और समय दोनों बचते हैं। सैनिक कारवाईयों में कम-लागत जुगाड़ों की जरूरत उस समय देखने को मिली जब सस्ते ड्रोनों ने महंगे हथियारों को भी निशाना बनाना शुरू किया।

क्यों लगाया पिनाका पर?

ऑपरेशन सिंदूर में पिनाका का सीधा इस्तेमाल तो नहीं हुआ। हां, अग्रिम मोर्चों पर यह सिस्टम तैनात जरूर किया गया था और उसे रिजर्व में रखा गया था ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत काम में लिया जा सके। रक्षा सूत्रों का कहना है कि अगर पिनाका को सक्रिय रूप से उपयोग में लाया जाता तो विरोधी को मौजूदा नुकसान से कहीं ज्यादा झेलना पड़ता। सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान को इसका अंदेशा लग गया था, इसीलिए उसने पिनाका की मूवमेंट पर नजर रखने के लिए निगरानी ड्रोन भेजे थे, जिन्हें भारतीय सुरक्षा बलों ने मार गिराया।

पिनाका फील्ड में तेज प्लट-आउट और शूट-एंड-स्कूट कैपेबिलिटी देता है। सूत्रों के मुताबिक, 2025 तक पिनाका की कुछ रेजिमेंटें ऑपरेशनल हैं और आगे बढ़ते हुए और बैटरियां तैनात की जा रही हैं। फिलहाल पिनाका की 6 रेजिमेंट ऑपरेशनल हैं, जो कुल 18 बैटरी बनाती हैं। वहीं, 2025 के अंत तक 8 रेजिमेंट (24 बैटरी) और 2026 के मध्य तक 10 रेजिमेंट (30 बैटरी) ऑपरेशनल करने की योजना है। वहीं, पिनाका पर कोप केज लगाने का फैसला उन्हीं रेजिमेंट्स और बैटरी के ऑपरेशनल सुरक्षा स्तर को और बढ़ाने के मकसद से लिया गया है।

पिनाका की एक बैटरी में छह लॉन्चर होते हैं और हर लॉन्चर में बारह रॉकेट लगे रहते हैं, यानी कुल मिलाकर एक बैटरी में 72 रॉकेट होते हैं। सूत्रों के अनुसार 72 रॉकेट लगभग 44 सेकंड में फायर किए जा सकते हैं। एक पूरी बैटरी की कटिंग-पॉवर लगभग 0.8 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को प्रभावी ढंग से तबाह कर सकती है और इसके जरिए एक बार में लगभग 7.2 टन विस्फोटक टारगेट को निशाना बना सकता है।

किन हथियारों पर हो रहा इस्तेमाल

भारतीय सेना ने कोप केज को विभिन्न बख्तरबंद वाहनों, आर्टिलरी सिस्टम, और लॉजिस्टिक इक्विपमेंट्स पर तैनात किया है। भारतीय सेना का मुख्य युद्धक टैंक टी-90 भीष्म अब टॉप-अटैक प्रोटेक्शन केज (TAPC) से लैस है। यह टरेट के ऊपर लगाया गया है ताकि ड्रोन और मिसाइल हमलों से ऊपरी कवच की रक्षा हो सके। इसकी शुरुआत 2023 में पश्चिमी कमांड (पाकिस्तान सीमा) पर हुई।

Pinaka MBRL Cope Cage
T-90 Tank with Cope Cage

वहीं, मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री यूनिट्स में इस्तेमाल होने वाला बीएमपी-2 सरथ इन्फैंट्री फाइटिंग व्हीकल (IFV) भी अब कोप केज से लैस है। 2025 में पहली बार इसकी पूरी फ्लीट पर यह जाली लगाई गई, ताकि FPV (फर्स्ट-पर्सन व्यू) ड्रोन्स से होने वाले हमलों से बचा जा सके।

इसके अलावा बीएम-21 रॉकेट लॉन्चर जो वज्र कोर का हिस्सा है। 2025 में इस पर कोप केज लगाए गए ताकि ड्रोन हमलों से लॉन्चर और क्रू की सुरक्षा हो।

साथ ही, लंबी दूरी के बीएम-30 स्मर्च रॉकेट लॉन्चर को भी 2025 में कोप केज से अपग्रेड किया गया है। यह आर्टिलरी रेजिमेंट्स में तैनात है और टॉप-अटैक ड्रोंस से बचाव के लिए इसका इस्तेमाल हो रहा है। यह सिस्टम 90 किमी तक मार कर सकता है।

105 एमएम इंडियन फील्ड गन पर भी अगस्त 2025 से कोप केज लगाया गया है। यह आर्टिलरी गन क्रू और ब्रेच एरिया को एफपीवी ड्रोंस और लॉयटरिंग म्यूनिशन से बचाता है।

इसके अलावा सीमा पर लॉजिस्टिक सप्लाई के लिए इस्तेमाल होने वाले अशोक लेलैंड स्टैलियन ट्रकों पर 16 फीट×9 फीट का वायर मेश केज लगाया गया। जून 2025 से यह बॉर्डर कन्वॉय में ड्रोन हमलों से सामान की सुरक्षा करता है।

हाल के मिलिट्री अभ्यासों में कोप केज वाले प्लेटफ़ॉर्म ने अच्छा प्रदर्शन दिखाया है। सैनिकों और इकाइयों से मिले फीडबैक में यह बात सामने आई कि यह उपाय कारगर है। फील्ड-इंस्पेक्शन्स और रन-ऑफ-ऑपरेशन टेस्ट के बाद कर्नल स्तर के कमांडरों ने इसे सीमाओं पर तैनात करने की सिफारिशें दी हैं। साथ ही टेक्निकल प्रयोगशालाओं में इसके डिजाइन में सुधार के सुझाव भी उठाए जा रहे हैं ताकि वजन कम करके और अधिक असरदार बनाया जा सके।