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Jamat-ul-Mominat: सामने आया जैश सरगना मसूद अजहर का नया ऑडियो, महिलाओं को आतंकी ट्रेनिंग देने साजिश हुई बेनकाब

Jamat-ul-Mominat

Jamat-ul-Mominat: पाकिस्तान में सक्रिय आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर की एक नई ऑडियो रिकॉर्डिंग सामने आई है, जिसमें वह महिलाओं को आतंकवादी गतिविधियों में शामिल करने की योजना का खुलासा करता है। लगभग 21 मिनट की यह रिकॉर्डिंग पाकिस्तान के बहावलपुर स्थित मार्कज उसमान ओ अली में दिए गए एक भाषण की बताई जा रही है। इसमें अजहर “जमात-उल-मोमिनात” नाम से एक नई महिला युनिट शुरू करने की बात करता है।

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ऑडियो में अजहर इस नई युनिट को जैश-ए-मोहम्मद की महिलाओं की ब्रिगेड बताता है और दावा करता है कि अब महिलाएं भी आतंकी ट्रेनिंग लेंगी। वह कहता है कि जैसे पुरुषों के लिए 15 दिन का “दौरा-ए-तर्बियत” नाम का प्रशिक्षण कार्यक्रम चलता है, वैसे ही महिलाओं के लिए “दौरा-ए-तसकिया” नाम का नया कोर्स शुरू किया जाएगा। यह ट्रेनिंग बहावलपुर में ही दी जाएगी, जो जैश का पुराना अड्डा है। ऑडियो में अजहर कहता है कि इस कोर्स के बाद महिला आतंकियों को “दौरा-आयात-उल-निसा” का कोर्स कराया जाएगा, जिसमें महिलाओं को धार्मिक ग्रंथों के जरिए जिहाद करना सिखाया जाएगा।

ऑडियो में मसूद अजहर कहता है कि जो भी महिला जमात-उल-मोमिनात (Jamat-ul-Mominat) से जुड़ेगी, उसकी शहादत के बाद सीधे जन्नत जाने का वादा है। उन्होंने यह भी कहा कि जमात के पुरुष मुजाहिद उनके साथ खड़े रहेंगे और यह महिला आतंकी संगठन “इस्लाम को दुनिया भर में फैलाएगा।” ऑडियो में अजहर यह भी कहता है कि जैश के विरोधियों ने हिंदू महिलाओं को सेना में शामिल कर लिया है और महिला पत्रकारों को भी उसके खिलाफ खड़ा कर दिया गया है, इसलिए वह भी महिलाओं का आतंकी संगठन बना रहा है।

वह कहता है कि “जमात-उल-मोमिनात” (Jamat-ul-Mominat) की महिलाएं कथित तौर पर “इस्लाम को फैलाने” के मिशन में शामिल होंगी। ऑडियो मे आतंकी मसूद अजहर कह रहा है कि जमात-उल-मोमिनात की शाखाएं पाकिस्तान के हर जिले में बनाई जाएंगी। हर जिले की शाखा की अगुवाई के लिए एक जिला मुंतजिमा तय की जाएगी जो महिलाओं की भर्ती और संचालन का काम करेगी। अजहर ने महिलाओं से यह भी कहा है कि ब्रिगेड में शामिल महिलाएं किसी अनजान पुरुष से फोन या मैसेंजर पर बात नहीं करेंगी, केवल अपने पति या नजदीकी परिवार से बात करने की इजाजत होगी।

रक्षा समाचार डॉट कॉम ने पहले अपनी रिपोर्ट में बताया था कि आतंकी मसूद अजहर ने अपनी बहन सादिया अजहर को महिला ब्रिगेड (Jamat-ul-Mominat) का प्रमुख नियुक्त किया है। उनकी दूसरी बहन समैरा अजहर और पुलवामा हमले के जिम्मे उमर फारूक की विधवा आफिरा फारूक को भी नेतृत्व में जगह दी गई है। इन महिलाओं को ऑनलाइन सेशंस करवाने की जिम्मेदारी दी गई है ताकि वे नई ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को आतंकी संगठन में शामिल होने के लिए प्रेरित कर सकें।

Jamat-ul-Mominat

जैश ए मोहम्मद के एक नए पोस्टर में उम्मे मसूद (असल नाम समैरा अजहर) को ऑनलाइन क्लासेज की ट्रेनर बताया गया है। ये क्लासेज 25 अक्टूबर से हफ्ते में पांच दिन आयोजित की जा रही हैं। ऑडियो में अजहर कहता है कि इस संगठन (Jamat-ul-Mominat) में कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जिनके पति या भाई भारतीय सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए थे। इन महिलाओं का इस्तेमाल नए सदस्यों को उकसाने और भर्ती बढ़ाने के लिए किया जाएगा। और उन्हें “शोबा-ए-दावत” कैंपेन के तहत इस्तेमाल किया जाएगा। मसूद अजहर महिलाओं से अपनी लिखी किताब “ए मुसलमान बहना” पढ़ने को भी कह रहा है, ताकि वे कट्टर जिहादी बन सकें।

ऑडियो में वह यह भी दावा करता है कि “ऑपरेशन सिंदूर” में उसके कई रिश्तेदार मारे गए, जिनमें यूसुफ अजहर, जमील अहमद, हमजा जमील और हुजैफा अजहर शामिल हैं। ऑडियो में वह अपनी बहन हवा बीबी की मौत का हवाला देता है और कहता है कि महिला ब्रिगेड (Jamat-ul-Mominat) की योजना उसने उन्हीं के साथ मिलकर बनाई थी।

इस रिकॉर्डिंग से यह साफ होता है कि पाकिस्तान में प्रतिबंधित संगठन खुले तौर पर आईएसआई के इशारे पर नई भर्ती और प्रशिक्षण गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं। पाकिस्तान सरकार आधिकारिक रूप से ऐसे संगठनों पर पाबंदी की बात करती है, लेकिन जमीन पर इन्हें सुरक्षा एजेंसियों की आंखों के सामने काम करने की छूट मिली हुई है।

Indian Navy LPD Project: आत्मनिर्भर भारत के तहत भारतीय नौसेना के लिए युद्धपोत बनाएंगे मझगांव डॉक और स्वॉन डिफेंस

Indian Navy LPD Project: MDL and Swan Defence join hands to build amphibious warships under Atmanirbhar Bharat
Indian Navy LPD Project: MDL and Swan Defence join hands to build amphibious warships under Atmanirbhar Bharat

Indian Navy LPD Project: लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक (एलपीडी) बनाने को लेकर मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड और स्वान डिफेंस एंड हेवी इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने साझेदारी की है। दोनों कंपनियों ने यह साझेदारी “आत्मनिर्भर भारत” योजना के तहत की है।

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यह समझौता मुंबई में आयोजित इंडिया मैरीटाइम वीक 2025 के दौरान हुआ। यह करार भारतीय नौसेना के लिए बेहद अहम है क्योंकि इससे देश में पहली बार इतने बड़े स्तर पर एम्फीबियस वॉरशिप का निर्माण किया जाएगा।

समझौते के तहत एमडीएल अपनी विशेषज्ञता डिजाइन, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट और सिस्टम इंटीग्रेशन में देगी, जबकि स्वान डिफेंस अपने शिपबिल्डिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल करेगी। यह परियोजना गुजरात के पिपावाव शिपयार्ड में पूरी की जाएगी, जहां वॉरशिप्स का निर्माण और रिसर्च दोनों एक साथ होंगे।

एमडीएल ने कहा कि यह साझेदारी दोनों कंपनियों की तकनीकी और वित्तीय क्षमता को एकजुट कर भारतीय नौसेना के लिए बेहतरीन समाधान देने के उद्देश्य से की गई है। इस सहयोग से सरकार की पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप नीति को मजबूती मिलेगी।

एमडीएल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर कैप्टन जगमोहन ने कहा, “यह साझेदारी भारतीय शिपबिल्डिंग उद्योग के लिए एक नया अध्याय है। लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक्स भारतीय नौसेना की समुद्री ताकत को और बढ़ाएंगे। हमारा लक्ष्य है भारत में बने, भारत के लिए विश्वस्तरीय जहाज तैयार करना।”

वहीं स्वॉन डिफेंस के डायरेक्टर विवेक मर्चेंट ने कहा कि एमडीएल के अनुभव के साथ हम तकनीकी रूप से एडवांस और ग्लोबल लेवल के वॉरशिप्स बनाने के लिए तैयार हैं। यह साझेदारी आत्मनिर्भर भारत की भावना को मजबूत करेगी और भारत को एक ग्लोबल शिपबिल्डिंग हब बनाने की दिशा में आगे बढ़ाएगी।”

बता दें कि हाल ही में डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल ने नौसेना के लिए चार लैंडिंग डॉक शिप के अधिग्रहण को मंजूरी दी थी। इन जहाजों की कुल लागत करीब 33,000 करोड़ रुपयेबताई गई है। इनका इस्तेमाल भारत की समुद्री सीमा की सुरक्षा, एम्फीबियस ऑपरेशन (समुद्र और तट दोनों पर अभियान) और मानवीय सहायता व आपदा राहत मिशनों के लिए किया जाएगा।

इन जहाजों के बन जाने से भारतीय नौसेना की “ब्लू-वॉटर कैपेबिलिटी” यानी गहरे समुद्र में ताकत दिखाने की क्षमता और बढ़ेगी। इससे भारत अपने तटीय इलाकों से बाहर भी राहत और रक्षा अभियान चला सकेगा।

समझौते के बाद स्वॉन डिफेंस के शेयर में तेजी देखने को मिली और यह 5 फीसदी के अपर सर्किट पर पहुंच गया। वहीं, एमडीएल के शेयर में मामूली गिरावट दर्ज की गई, लेकिन कंपनी की ऑर्डर बुक मजबूत बनी हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह करार दोनों कंपनियों के लिए लंबी अवधि में फायदेमंद साबित हो सकता है क्योंकि भारत में रक्षा उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है।

Indo-Pacific Regional Dialogue 2025: नौसेना प्रमुख बोले- 2025 में वैश्विक समुद्री व्यापार में आ सकती है गिरावट, रेड सी संकट ने बढ़ाई लागत

Indo-Pacific Regional Dialogue 2025
Navy Chief Admiral Dinesh K Tripathy

Indo-Pacific Regional Dialogue 2025: भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी का कहना है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र का भविष्य केवल सामूहिक सहयोग, संवाद और विश्वास से ही सुरक्षित रह सकता है। उन्होंने कहा कि समुद्र सिर्फ व्यापार और संस्कृति के मार्ग नहीं हैं, बल्कि यह पूरी मानवता की साझा विरासत और अस्तित्व की नींव हैं।

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नई दिल्ली में आयोजित इंडो-पैसिफिक रीजनल डायलॉग 2025 में बोलते हुए नौसेना प्रमुख ने कहा कि इस वर्ष डायलॉग की थीम है समग्र समुद्री सुरक्षा और विकास को बढ़ावा देना: क्षेत्रीय क्षमता निर्माण और सामूहिक शक्ति वृद्धि। उन्होंने कहा कि यह आयोजन भारत के नए समुद्री विजन “महासागर” (म्यूचुअल एंड होलिस्टिक एडवांसमेंट फॉर सिक्युरिटी एंड ग्रोथ अक्रोस रीजंस) के तहत किया गया है। यह विजन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “सागर” नीति (सिक्युरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन) का विस्तार है, जो अब पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सामूहिक सुरक्षा और विकास पर केंद्रित है।

“डायनैक्सिक चुनौती” बन रही खतरा

नौसेना प्रमुख ने कहा कि समुद्रों ने व्यापार, संस्कृति और जिज्ञासा के जरिए सदियों से देशों को आपस में जोड़ा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस कथन का उल्लेख किया जिसमें कहा गया है कि “किसी भी राष्ट्र की समृद्धि और समुद्र की शांति एक-दूसरे से जुड़ी हैं।” उन्होंने कहा कि अब समुद्री सुरक्षा को केवल खतरे की तरह नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसे एक “डायनैक्सिक चुनौती” के तौर पर समझने की आवश्यकता है, यानी ऐसी चुनौती जो गतिशील और जटिल दोनों है।

तीन प्रमुख चुनौतियों का किया जिक्र

नौसेना प्रमुख ने अपने संबोधन में तीन प्रमुख चुनौतियों का भी जिक्र किया जो मौजूदा वैश्विक समुद्री परिदृश्य को प्रभावित कर रही हैं। पहली चुनौती व्यापारिक अवरोध है। उन्होंने कहा कि 2025 में वैश्विक समुद्री व्यापार में गिरावट की संभावना है, जो 2024 के 2.2 फीसदी से घटकर सिर्फ 0.5 फीसदी रह सकती है। यह केवल आर्थिक मंदी नहीं बल्कि रणनीतिक कमजोरी का संकेत है। रेड सी संकट ने दिखाया कि कैसे एक समुद्री मार्ग बंद होने से पूरी दुनिया में शिपिंग कॉस्ट, बीमा प्रीमियम और खाद्य कीमतों पर असर पड़ सकता है।

Indo-Pacific Regional Dialogue 2025

अवैध मछली पकड़ने से 23 अरब डॉलर का घाटा

दूसरी चुनौती अंतरराष्ट्रीय अशांति है। उन्होंने कहा कि समुद्रों में अवैध गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं। इनमें अवैध तरीके से मछली पकड़ना, समुद्री डकैती, हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी, और मानव तस्करी शामिल हैं। ये सब समुद्री क्षेत्र के बड़े तनाव पैदा करने वाले कारक बन गए हैं। संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार, हर साल गैरकानूनी, बिना रिपोर्ट और नियम तोड़कर मछली पकड़ने से 1.1 से 2.6 करोड़ टन मछली बर्बाद हो जाती है। जिससे 10 से 23 अरब डॉलर का नुकसान होता है।

उन्होंने कहा कि तस्करी करने वाले गिरोह समुद्र के उन इलाकों का फायदा उठा रहे हैं जहां कोई सरकारों का कोई नियंत्रण नहीं है या कानून कमजोर हैं। वे ड्रग्स, हथियार और यहां तक कि प्रतिबंधित सामान भी ले जा रहे हैं। इससे आतंकवादी संगठनों को पैसा मिलता है और जमीन पर अशांति बढ़ती है। उन्होंने आगे कहा कि समुद्र का बढ़ता जलस्तर, तूफान और समुद्र में गंदगी ये सब नई मुसीबतें ला रहे हैं। इससे लोगों की जान और रोजगार दोनों खतरे में हैं। खासकर छोटे द्वीप वाले विकासशील देशों (के लिए ये बहुत बड़ा खतरा है।

Indo-Pacific Regional Dialogue 2025

तेजी से बदलती तकनीक बनी चुनौती

वहीं, तीसरी चुनौती उन्होंने तेजी से बदलती तकनीक को बताया। नौसेना प्रमुख ने कहा कि नई तकनीकें पुरानी सीमाओं को तोड़ रही हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोट शिप, और कमर्शियल सैटेलाइट अब समुद्र की निगरानी और जवाबी कार्रवाई को पूरी तरह बदल रहे हैं। वहीं, इसके साथ साइबर हमले, सिग्नल स्पूफिंग और इलेक्ट्रॉनिक इंटरफेरेंस जैसी नई समस्याएं भी बढ़ी हैं। उन्होंने हिंद महासागर क्षेत्र का जिक्र करते हुए कहा कि हाल की IFC-IOR रिपोर्ट्स के मुताबिक हर रोज जीपीएस जैमिंग और इलेक्ट्रॉनिक बाधाओं के मामले बढ़ रहे हैं।

समुद्री सुरक्षा और समुद्री विकास एक जहाज के दो प्रोपेलर

नेवी चीफ एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि हमें याद दिलाया जाता है कि समुद्री सुरक्षा और समुद्री विकास दो अलग रास्ते नहीं हैं। बल्कि एक जहाज के दो प्रोपेलर हैं, जो हमें शांति और समृद्धि की ओर ले जाते हैं। उन्होंने कहा कि भारत का लक्ष्य “संपूर्ण समुद्री सुरक्षा” सुनिश्चित करना है, जिसमें हर देश की भूमिका और जिम्मेदारी समान हो।

उन्होंने बताया कि भारतीय नौसेना इस दृष्टिकोण पर काम कर रही है और हाल में नौ अफ्रीकी देशों के साथ अफ्रीका-इंडिया की मैरीटाइम एंगेजमेंट (आइकेमे) अभ्यास इसी दिशा में उठाया गया कदम है। इसके अलावा, गुरुग्राम में स्थित इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर– इंडियन ओशन रीजन (एएफसी-एओआर) को अंतरराष्ट्रीय सूचना केंद्र के तौर पर तैयार किया गया है। यह केंद्र अब समुद्री सूचनाओं को साझा करने का एक बड़ा प्लेटफॉर्म बन चुका है। यहां इस समय 15 अंतरराष्ट्रीय लायजन अधिकारी काम कर रहे हैं और 2028 तक यह संख्या 50 तक पहुंचाने का लक्ष्य है।

नौसेना प्रमुख ने कहा कि समुद्री क्षमता सिर्फ जहाजों या बदरगाहों की संख्या नहीं है, बल्कि यह एक साझा क्षेत्रीय शक्ति का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि हाल ही में भारतीय नौसेना ने क्षेत्रीय सहयोग की दिशा में अहम कदम उठाते हुए पैसिफिक रीच एक्सरसाइज में विदेशी पनडुब्बियों के साथ सफलतापूर्वक अभ्यास भी किया था।

साथ ही, भारतीय नौसेना ने निशार-मित्र टर्मिनल्स भी तैयार किए हैं, जो मित्र देशों के साथ सूचना साझा करने में मदद करेंगे। उन्होंने बताया कि भारत अब “महासागर” विजन के तहत अपने डिफेंस-इंडस्ट्रीयल को-ऑपरेशन को सीमाओं से बाहर ले जा रहा है, ताकि मित्र देशों को स्वदेशी तकनीक और सस्ते सिस्टम्स के जरिए मजबूत किया जा सके।

नई चुनौतियों के लिए नई रणनीतियां जरूरी

नौसेना प्रमुख ने कहा कि किसी भी देश की वास्तविक क्षमता उसके जहाजों या इक्विपमेंट्स में नहीं, बल्कि उनकी सोच, सिद्धांत और प्रशिक्षण में होती है। उन्होंने “पर्पज-सेंट्रिक थिंकिंग” की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि नई चुनौतियों के लिए नई रणनीतियां जरूरी हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि भारतीय नौसेना ने हाल ही में इंडियन ओशन शिप (आईओएस) सागर को दक्षिण-पश्चिम हिंद महासागर क्षेत्र में तैनात किया, जिसमें एतिहासिक तौर पर नौ देशों के 44 अधिकारी संयुक्त रूप से शामिल हुए।

वहीं, कार्यक्रम की शुरुआत में भारतीय नौसेना के पूर्व प्रमुख एडमिरल करमबीर सिंह ने कहा कि आज दुनिया के समुद्रों में अस्थिरता बढ़ रही है। बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा, गैर-राज्यीय संगठनों की गतिविधियां और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां समुद्री क्षेत्र को जटिल बना रही हैं। उन्होंने कहा कि इन समस्याओं से निपटने के लिए सभी देशों को मिलकर एक सहयोगी समुद्री ढांचा बनाना चाहिए।

इंडो-पैसिफिक रीजनल डायलॉग 2025 में 19 देश शामिल

इस साल के इंडो-पैसिफिक रीजनल डायलॉग 2025 में 19 देशों से आए 40 विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
इस कार्यक्रम का आयोजन भारतीय नौसेना और नेशनल मेरीटाइम फाउंडेशन के सहयोग से किया गया। यह इस वार्षिक कार्यक्रम का सातवां संस्करण है। इसे भारतीय नौसेना हर साल अपने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों, रणनीतिक विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं के साथ मिलकर आयोजित करती है। इसका उद्देश्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग, संवाद और सुरक्षा को मजबूत करना है।

Software Defined Radios: भारतीय सेना अब करेगी इस खास एंटी-जैमिंग प्रूफ रेडियो सिस्टम का इस्तेमाल, बिना टॉवर के होगा कनेक्ट, बातचीत रहेगी सुरक्षित

Software Defined Radios
Software Defined Radios (representation Image)

Software Defined Radios: भारतीय सेना ने देश में बने अपने पहले सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो सिस्टम की खरीद के लिए कॉन्ट्रैक्ट किया है। यह रेडियो पूरी तरह से भारत में ही डिजाइन और मैन्युफैक्चर किया गया है। जिसे डीआरडीओ ने डेवलप किया है और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ने तैयार किया है। नए एसडीआर सिस्टम से सेना की सुरक्षित, हाई-स्पीड और रीयल-टाइम कम्युनिकेशन क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।

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Software Defined Radios: साझेदारी में तैयार हुआ हाई-टेक एसडीआर सिस्टम

सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो पारंपरिक रेडियो की तुलना में कई गुना एडवांस टेक्नोलॉजी पर आधारित है। पुराने रेडियो उपकरणों में फ्रीक्वेंसी और चैनल बदलने के लिए हार्डवेयर बदलना पड़ता था, जबकि एसडीआर में यह सब सॉफ्टवेयर से ही किया जा सकता है। इस सिस्टम को डीआरडीओ की तीन प्रमुख लैब्स ने मिलकर विकसित किया है। वहीं इसका प्रोडक्शन बीईएल बेंगलुरु करेगा।

The Indian Army procures its first indigenously designed Software Defined Radios
The Indian Army procures its first indigenously designed Software Defined Radios

सेना ने इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत एसडीआर-टैक्टिकल सिस्टम खरीदा है, जिसे मैदान में, वाहनों में और एयरबोर्न प्लेटफॉर्म पर भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। बीईएल का कहना है कि यह सिस्टम 95 फीसदी से अधिक स्वदेशी तकनीक पर आधारित है और भारत की संचार सुरक्षा नीति के तहत पूरी तरह सर्टिफाइड है।

कैसे करेगा काम एसडीआर सिस्टम

यह एसडीआर सिस्टम भारतीय सेना को नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध के लिए तैयार करेगा। इसमें हाई डेटा रेट और मोबाइल एड-हॉक नेटवर्क (MANET) जैसी खूबियां हैं। यानी यह सिस्टम अपने आप नेटवर्क बनाता है, और जवानों को किसी फिक्स्ड इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत नहीं होती।

इसके जरिए सैनिक, टैंक और ड्रोन बिना किसी टावर के एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं और वीडियो, वॉइस और डेटा को रीयल टाइम में ट्रांसमिट कर सकते हैं। इसका डेटा रेट 100 एमबीपीएस से अधिक है और इसमें एईएस-256 लेवल एन्क्रिप्शन का इस्तेमाल किया गया है, जिससे यह पूरी तरह सुरक्षित और एंटी-जैमिंग बना रहता है।

सेना के लिए क्या बदलेगा

भारतीय सेना ने पिछले कुछ सालों में अपने पुराने रेडियो सिस्टम्स, जैसे कि टीआरसी-3110 को बदलने का फैसला किया था। क्योंकि इनके सिस्टम जामिंग और इंटरसेप्शन का खतरा रहता था। वहीं, एसडीआर सिस्टम की तैनाती के बाद, एलएसी और एलओसी जैसे इलाकों में सैनिकों को लगातार सुरक्षित कनेक्शन मिलेगा।

एसडीआर की मदद से अब एक सैनिक फील्ड में रहते हुए ही कमांड सेंटर से सीधे बात कर सकेगा, ड्रोन से मिली तस्वीरें भेज सकेगा और मिशन डेटा साझा कर सकेगा। पहले जहां सिग्नल टूट जाते थे, अब मोबाइल एड-हॉक नेटवर्क तकनीक से नेटवर्क अपने आप री-कॉन्फिगर हो जाएगा।

सेना के लिए तीन तरह के सिस्टम

एसडीआर सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह 24 घंटे लगातार काम कर सकता है और इसका पावर मैनेजमेंट आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित है।

सेना के लिए एसडीआर सिस्टम तीन तरह के वर्जन में तैयार किया गया है। पहला, मैनपैक वर्जन, जिसे सैनिक पीठ पर ले जा सकते हैं और जिसकी रेंज लगभग 10 किलोमीटर है। वहीं, दूसरा, हैंडहेल्ड वर्जन है, जो हल्का है और नजदीकी संचार के लिए इस्तेमाल होता है। जबकि तीसरा, व्हीकल-माउंटेड वर्जन है, जिसे टैंकों और बख्तरबंद वाहनों में लगाया जाता है।

इनके अलावा, नौसेना और वायुसेना के लिए भी एयरबोर्न और शिप-बोर्ड वेरिएंट डेवलप किए जा रहे हैं। इससे सभी सेनाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी सुनिश्चित की जाएगी। वहीं भविष्य में इसके अपदग्रेडेड वर्जन भी आएंगे। 2027 में एआई फीचर वाला एसडीआर, 2028 में सैटेलाइट लिंक, और 2030 तक 5जी मिलिट्री नेटवर्क तैयार हो जाएगा।

सिक्योरिटी और एन्क्रिप्शन फीचर

एसडीआर सिस्टम में एन्क्रिप्शन और एंटी-जैमिंग प्रूफ बनाया गया है। अगर दुश्मन किसी फ्रीक्वेंसी को ब्लॉक करने की कोशिश करता है, तो एसडीआर अपने आप फ्रीक्वेंसी बदल लेता है। इसके अलावा, यह सिस्टम “फ्रेंडली यूनिट्स” को अपने आप पहचान लेता है, जिससे किसी प्रकार का गलत सिग्नल इंटरसेप्शन नहीं होता। इसमें डिजिटल रेडियो फ्रीक्वेंसी मेमोरी तकनीक का भी इस्तेमाल हुआ है, जो दुश्मन के रडार सिग्नल को कॉपी कर उसे कन्फ्यूज कर देती है।

पाकिस्तान के पास तुर्की, चीन और फ्रांस के एसडीआर

जहां भारत का एसडीआर पूरी तरह स्वदेशी है, तो पाकिस्तान अब भी विदेशी सिस्टम्स पर निर्भर है। पाकिस्तान के एसडीआर तुर्की, चीन और फ्रांस जैसे देशों से खरीदे गए हैं। पाकिस्तानी सेना के पास एसडीआर सिस्टम तुर्की की असेलसान कंपनी, चीन की हुवावे/जेडटीई कंपनियों और फ्रांस की थेल्स कंपनी से खरीदे गए हैं। पाकिस्तान की असेलसान एसडीआर सीरीज तुर्की पर निर्भर है। 2022 में हुए तुर्की-पाक समझौते के बाद लगभग 500 एसडीआर यूनिट्स डिलीवर की गईं। इसके अलावा पाकिस्तान ने चीन से वी/यूएचएफ बैंड वाले एसडीआर खरीदे हैं, जो सीमावर्ती इलाकों में इस्तेमाल होते हैं। लेकिन इनकी एन्क्रिप्शन सिक्योरिटी पर कई बार सवाल उठ चुके हैं।

पाकिस्तान की स्पेशल फोर्सेज के पास फ्रांस की थेल्स MBITR रेडियो सीरीज है, लेकिन इनकी संख्या बहुत कम है। पाकिस्तान की हैली इंडस्ट्रीज तक्षिला एसडीआर प्रोटोटाइप पर काम कर रही है, लेकिन यह भी चीनी तकनीक पर आधारित है और अभी ट्रायल फेज में है।

Ayni Air Base: 25 साल बाद भारत ने क्यों खाली किया ताजिकिस्तान में बना यह खास एयर बेस, यह है वजह

Ayni Air Base, IAF, Tajikistan
Ayni Air Base, IAF, Tajikistan

Ayni Air Base: भारत ने ताजिकिस्तान में स्थित अपने पहले विदेशी एयर बेस अयनी को खाली कर दिया है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारतीय वायुसेना ने वहां मौजूद अपने मिलिट्री स्टाफ और उपकरणों को हटा दिया है। लगभग 25 सालों की मौजूदगी के बाद भारत ने यह उठाया है। अयनी एयर बेस ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे से लगभग 15 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है और भारत की रणनीतिक पहुंच का एक अहम हिस्सा माना जाता था।

IAF Training: वायुसेना प्रमुख बोले- बदलते समय के साथ एयरफोर्स ट्रेनिंग को बनाना होगा आधुनिक, प्रशिक्षण में बड़े बदलाव की जरूरत

Ayni Air Base: आईएएफ ने किया पूरा ऑपरेशन क्लोजडाउन

डिफेंस कैपिटल की रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार के दो वरिष्ठ अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की कि भारतीय वायुसेना ने अयनी एयर बेस से पूरी तरह खाली कर दिया है। एक अधिकारी ने कहा, “हमने अयनी बेस खाली कर दिया है। अब वहां भारत की कोई सैन्य मौजूदगी नहीं है।”

Ayni Air Base, IAF, Tajikistan
SU-30MKI at Ayni Air Base, IAF, Tajikistan

सूत्रों के मुताबिक, ताजिकिस्तान सरकार ने कुछ महीनों पहले भारत से कहा था कि वह अपनी सैन्य गतिविधियां बंद करे और बेस से हट जाए। हालांकि इस फैसले की आधिकारिक वजह अभी तक सामने नहीं आई है।

बेअसर रही सुखोई जेट्स की पेशकश

भारत ने कुछ समय पहले ताजिकिस्तान को अपने कुछ सुखोई-30 लड़ाकू विमानों की पेशकश की थी। ये विमान हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा नासिक स्थित प्लांट में बनाए गए थे। लेकिन सूत्रों के अनुसार, ताजिकिस्तान ने भारत के इस प्रस्ताव में खास रुचि नहीं दिखाई।

अयनी एयर बेस पर भारतीय मौजूदगी की शुरुआत 2000 के दशक की शुरुआत में हुई थी। भारत ने इस बेस को अपग्रेड करने और इसे ऑपरेशनल बनाने में लगभग 70 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश किया था। 2010 में यहां 3,200 मीटर लंबा रनवे तैयार किया गया, ताकि लड़ाकू विमानों की आवाजाही संभव हो सके।

भारत की रणनीतिक चौकी

अयनी एयर बेस को भारत की पहली विदेशी मिलिट्री आउटपोस्ट या सैन्य चौकी कहा जाता था। इस बेस से भारत को पाकिस्तान और अफगानिस्तान पर रणनीतिक नजर रखने में मदद मिलती थी। इसके अलावा यह बेस चीन की पश्चिमी सीमा (शिंजियांग प्रांत) के नजदीक होने के चलते भी सामरिक तौर से महत्वपूर्ण था।

2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ताजिकिस्तान की यात्रा के दौरान इस बेस को देखने की इच्छा जताई थी। बताया जाता है कि इसके बाद भारत ने यहां सीमित संख्या में सुखोई और मिग सीरीज के विमान रखे थे।

Ayni Air Base, IAF, Tajikistan

ऑपरेशन सिंदूर के समय एक्टिव नहीं था बेस

सूत्रों का कहना है कि मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, जब भारत ने पाकिस्तान में आतंकवादी ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई की थी, उस समय अयनी बेस एक्टिव नहीं था। संभव है कि भारत ने बेस को पहले ही खाली कर दिया था।

यह वही बेस था, जिसने 2021 में अफगानिस्तान से भारतीय नागरिकों की निकासी में अहम भूमिका निभाई थी। काबुल से निकाले गए भारतीयों को सड़क मार्ग से ताजिकिस्तान की सीमा तक लाया गया था और फिर उन्हें अयनी से भारत एयरलिफ्ट किया गया था।

क्या रूस और चीन का दबाव?

कई कूटनीतिक सूत्रों का मानना है कि रूस और चीन के दबाव के चलते ताजिकिस्तान ने भारत से बेस खाली करने को कहा था। रूस ताजिकिस्तान में पहले से अपनी 201वीं मोटराइज्ड डिवीजन को तैनात रखता है, वह नहीं चाहता था कि कोई अन्य देश खासकर गैर-क्षेत्रीय शक्ति वहां सैन्य मौजूदगी बनाए रखे।

चीन के लिए भी भारत की मौजूदगी संवेदनशील मानी जाती थी, क्योंकि ताजिकिस्तान और चीन की सीमा करीब 470 किलोमीटर लंबी है। चीन ने पिछले कुछ वर्षों में ताजिकिस्तान में बुनियादी ढांचे और सुरक्षा सहयोग में भारी निवेश किया है।

जारी रहेंगे भारत-ताजिकिस्तान के रिश्ते

हालांकि भारत और ताजिकिस्तान दोनों ने कभी अयनी बेस को “सैन्य ठिकाना” होने का औपचारिक एलान नहीं किया था। दोनों देशों ने इसे हमेशा “लॉजिस्टिक और ट्रेनिंग फैसिलिटी” बताया।

भारत ने 2018 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की ताजिकिस्तान यात्रा के दौरान इस बेस का जिक्र किया था। उस दौरे में उन्होंने ताजिक राष्ट्रपति इमोमाली रहमान से सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी सहयोग पर चर्चा की थी।

इसके अलावा, भारत अब भी ताजिकिस्तान के फरखोर में एक मिलिट्री अस्पताल चला रहा है। यहीं अफगान नेता अहमद शाह मसूद का इलाज हुआ था। फरखोर एयर बेस ताजिकिस्तान के दक्षिणी हिस्से में फरखोर शहर के पास स्थित एक सैन्य हवाई अड्डा है। यह दुशांबे (राजधानी) से लगभग 130 किमी दक्षिण-पूर्व में है और अफगानिस्तान की सीमा के करीब है। यह भारत का पहला और एकमात्र पूर्ण विदेशी सैन्य बेस है, जिसे भारतीय वायुसेना और ताजिक एयर फोर्स संयुक्त तौर पर ऑपरेट करते हैं। यह बेस एशिया में भारत की रणनीतिक उपस्थिति देता है, जिससे अफगानिस्तान, पाकिस्तान और चीन के खिलाफ “स्ट्रैटेजिक डेप्थ” मिलती है।

Ayni Air Base, IAF, Tajikistan
Ayni Air Base, IAF, Tajikistan

अयनी क्यों था महत्वपूर्ण

अयनी एयर बेस की भौगोलिक स्थिति भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी। दुशांबे से पश्चिम की ओर स्थित यह एयरफील्ड भारत को मध्य एशिया तक पहुंच देता था। यह पाकिस्तान के लिए “बैकडोर प्रेशर पॉइंट” कहा जाता था। विश्लेषकों के अनुसार, भारत इस बेस के जरिए पाकिस्तान पर एक रणनीतिक दबाव बनाए रख सकता था, क्योंकि यह अफगानिस्तान के उत्तर से केवल कुछ सौ किलोमीटर की दूरी पर था।

अभी तक आधिकारिक बयान नहीं

अब तक भारत सरकार या ताजिकिस्तान सरकार की ओर से इस बारे में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। न ही भारतीय वायुसेना ने अयनी बेस से हटने की तारीख बताई है। हालांकि रक्षा सूत्रों ने पुष्टि की है कि वहां तैनात भारतीय कर्मियों और उपकरणों को पूरी तरह भारत वापस लाया जा चुका है।

SJ-100 Aircraft: 37 साल बाद भारत में फिर बनेगा पैसेंजर विमान, HAL और रूस की UAC ने किया घरेलू विमान बनाने का समझौता

SJ-100 Aircraft
SJ-100 Aircraft

SJ-100 Aircraft: भारतीय एयरोस्पेस कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और रूस की पब्लिक जॉइंट स्टॉक कंपनी यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन ने मॉस्को में सिविल कम्यूटर एयरक्राफ्ट एसजे-100 के प्रोडक्शन के लिए एक एमओयू पर दस्तखत किए हैं। यह पहली बार होगा जब भारत में एक फुल पैसेंजर विमान का निर्माण किया जाएगा। इससे पहले एचएएल ने एवरो विमान बनाया था।

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SJ-100 Aircraft: 37 साल बाद भारत में बनेगा पैसेंजर विमान

इस समझौते के बाद देश में ही पैसेंजर विमान बनाए जाएंगे। जिससे सिविल एविएशन इंडस्ट्री को जबरदस्त बूम मिलेगा। इससे पहले एचएएल ने एवरो एचएस-748 विमान का उत्पादन 1961 से 1988 के बीच किया था। वहीं, एसजे-100 के निर्माण से भारत फिर से यात्री विमान निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश करेगा। यह विमान देश की उड़ान योजना (उड़े देश के आम नागरिक) के तहत क्षेत्रीय हवाई संपर्क को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएगा।

SJ-100 Aircraft
HAL and Public Joint Stock Company United Aircraft Corporation (PJSC-UAC) Russia signed an MoU for production of civil commuter aircraft SJ-100 in Moscow

इस समझौते पर दस्तखत एचएएल की ओर से प्रभात रंजन और यूएसी की ओर से ओलेग बोगोमोलोव ने किए। इस मौके पर एचएएल के चेयरमैन डॉ. डीके सुनील और यूएसी के डायरेक्टर जनरल वाडिम बाडेखा मौजूद थे।

वहीं, एचएएल अब यूएसी के साथ मिलकर इस एमओयू को आगे बढ़ाकर एक जॉइंट वेंचर समझौते में बदलने पर विचार कर रही है। यह प्रोजेक्ट एचएएल को डिफेंस एयरक्राफ्ट्स के अलावा सिविल एविएशन प्रोडक्शन के क्षेत्र में भी नई पहचान देगा।

SJ-100 Aircraft की खासियत

एसजे-100 एक ट्विन-इंजन नैरो बॉडी सिविल एयरक्राफ्ट है, जिसमें लगभग 100 यात्रियों के बैठने की क्षमता है।
रूस में अब तक इस विमान के 200 से अधिक यूनिट्स बनाई जा चुकी हैं, जिन्हें 16 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस ऑपरेट कर रही हैं। भारत में इसका निर्माण एचएएल की बेंगलुरु या नासिक फैसिलिटी में किया जाएगा। इस समझौते के तहत एचएएल को घरेलू ग्राहकों के लिए एसजे-100 बनाने का अधिकार दिया गया है।

हालांकि एचएएल और रूस ने पहले भी कई सैन्य विमान प्रोजेक्ट्स पर साझेदारी की थी। वहीं, अब यह साझेदारी सिविल एविएशन सेक्टर तक पहुंच चुकी है। यूएसी की तरफ से यह कदम रूस के एमसी-21 और एसजे-100 प्रोग्राम्स के तहत भारत के साथ तकनीकी सहयोग बढ़ाने का हिस्सा है।

SJ-100 Aircraft
HAL and Public Joint Stock Company United Aircraft Corporation (PJSC-UAC) Russia signed an MoU for production of civil commuter aircraft SJ-100 in Moscow

यूएसी ने हाल ही में एसजे-100 के नई पीढ़ी वाले रूसी इंजन पीडी-8 के साथ टेस्ट फ्लाइट पूरी की थी। वर्तमान में रूस में 24 नए एसजे-100 यूनिट्स प्रोडक्शन में हैं, जिन्हें आने वाले महीनों में सर्टिफिकेशन के बाद डिलीवर किया जाएगा।

विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले दस सालों में भारत को 200 से अधिक रीजनल जेट्स की जरूरत होगी। इसके अलावा, हिंद महासागर क्षेत्र और आसपास के अंतरराष्ट्रीय रूट्स के लिए 350 अतिरिक्त विमानों की मांग भी देखी जा रही है। ऐसे में एसजे-100 का प्रोडक्शन भारतीय एविएशन सेक्टर के लिए बड़ा कदम साबित हो सकता है।

Mid-air Refuelling Aircraft Deal: जल्द खत्म होगा भारतीय वायुसेना का 15 सालों का लंबा इंतजार, सुखोई-30 और तेजस को जल्द मिलेगी हवा में रिफ्यूलिंग!

Mid-air Refuelling Aircraft Deal

Mid-air Refuelling Aircraft Deal: भारतीय वायुसेना अपने पुराने रिफ्यूलिंग विमानों की जगह नए और आधुनिक टैंकर विमान खरीदने की तैयारी कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, लगभग 8,000 करोड़ रुपये की यह बड़ी डिफेंस डील अब इजरायल की सरकारी कंपनी इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज को मिल सकती है। पिछले 15 सालों में भारतीय वायुसेना ने कई बार मिड-एयर रिफ्यूलिंग टैंकर खरीदने की कोशिश की, लेकिन हर बार यह योजना अधर में रह गई।

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न्यूज एजेंसी एनआई की रिपोर्ट के अनुसार, इस डील के तहत वायुसेना के लिए छह नए मिड-एयर रिफ्यूलिंग विमान खरीदे जाएंगे, जिन्हें इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज पुराने बोइंग 767 पैसेंजर प्लेनों को अपग्रेड करके बनाएगी। इन विमानों का इस्तेमाल हवा में ही लड़ाकू विमानों को ईंधन भरने के लिए किया जाएगा।

Mid-air Refuelling Aircraft Deal: डील जल्द हो सकती है फाइनल

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि इस बोली में कई विदेशी कंपनियों ने हिस्सा लिया था, लेकिन इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज ही वायुसेना की शर्तों को पूरा कर सकी। इस डील में खास तौर पर 3 से 30 फीसदी तक स्वदेशी हिस्सेदारी की जरूरी शर्त रखी गई थी, जिसे कंपनी ने मान लिया।

रूस और यूरोप की कंपनियां भी इस बोली में शामिल थीं, लेकिन वे निर्धारित मानकों और ऑफसेट नियमों को पूरा नहीं कर सकीं। अब रक्षा मंत्रालय की मंजूरी के बाद इस सौदे को अंतिम रूप दिए जा सकता है।

कैसे होंगे नए टैंकर विमान

यह छह विमान बोइंग 767 कमर्शियल एयरक्राफ्ट के पुराने मॉडलों से बनाए जाएंगे। इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज इन्हें पूरी तरह से बदलकर एरियल टैंकर में बदल देगी, जो हवा में ही दूसरे लड़ाकू या ट्रांसपोर्ट विमानों में ईंधन भर सकेंगे। सूत्रों के अनुसार, इन विमानों की कीमत और उनका ऑपरेशनल खर्च अन्य देशों के समान टैंकर विमानों की तुलना में काफी कम होगा।

ये टैंकर वायुसेना के राफेल, सुखोई-30, तेजस, और नेवी के मिग-29के जैसे विमानों को हवा में ईंधन देने में मदद करेंगे। इसके अलावा, ये विमान लंबी दूरी की उड़ान और हाई-एल्टीट्यूड ऑपरेशंस में उपयोगी साबित होंगे।

वायुसेना के पास फिलहाल कितने हैं टैंकर

वर्तमान में भारतीय वायुसेना के पास 6 रूसी Il-78 टैंकर विमान हैं, जो आगरा बेस पर तैनात हैं। इन्हें 2003 से 2004 के बीच खरीदा गया था। ये टैंकर फाइटर जेट्स और ट्रांसपोर्ट विमानों को सपोर्ट करते हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इनकी सर्विसेबिलिटी पर सवाल उठे हैं। कई बार तकनीकी खराबी और स्पेयर पार्ट्स की कमी के कारण ये विमान लंबे समय तक ग्राउंडेड रहे हैं।

वायुसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, “नई पीढ़ी के लड़ाकू विमान जैसे राफेल और तेजस को लंबे ऑपरेशंस के लिए मिड-एयर रिफ्यूलिंग की जरूरत होती है। फिलहाल हमारे पास पर्याप्त टैंकर नहीं हैं, इसलिए इस डील से क्षमता में बड़ा सुधार आएगा।”

यह डील लगभग 950 मिलियन अमेरिका डॉलर (लगभग 8,000 करोड़ रुपये) की है। इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज द्वारा कन्वर्ट किए गए ये विमान 2026 से डिलीवर होने शुरू होंगे और अगले दो से तीन वर्षों में सभी छह विमान भारतीय वायुसेना को मिल जाएंगे।

डील के तहत इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज को भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी में काम करना होगा, ताकि इसमें स्वदेशी कंटेंट बढ़ाया जा सके। इसके लिए हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड और अन्य भारतीय एयरोस्पेस कंपनियां सहयोग करेंगी।

2007 में एयरबस की ए330 एमआरटीटी को चुना गया था, लेकिन इवैल्यूएशन में विवाद और जांच के चलते वह डील रद्द कर दी गई। 2016 से 2020 के बीच रूस और यूरोप की कंपनियों से बातचीत भी चली, परंतु इंडिजिनस कंटेंट और मेंटेनेंस लागत पर सहमति नहीं बन सकी।

2024 में फिर से नया प्रस्ताव लाया गया, जिसके लिए इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज के नाम पर अंतिम मुहर लग सकती है। इस डील को रक्षा मंत्रालय की डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) की मंजूरी मिलते ही लागू किया जाएगा।

भारत और इजरायल के बीच कई सालों से मजबूत रक्षा सहयोग रहा है। इजरायल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज पहले से ही भारत को हेरोन ड्रोन, स्पायडर मिसाइल सिस्टम और रडार तकनीक उपलब्ध करा चुकी है।

क्यों जरूरी है मिड-एयर रिफ्यूलिंग विमान

मिड-एयर रिफ्यूलिंग विमान आधुनिक वायुसेनाओं के लिए “फोर्स मल्टीप्लायर” माने जाते हैं। इनके होने से फाइटर जेट्स हवा में ही ईंधन भर सकते हैं, जिससे उनकी रेंज और मिशन समय बढ़ जाता है। भारतीय वायुसेना के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का भौगोलिक विस्तार बहुत बड़ा है और उसे पश्चिम से लेकर पूर्वी सीमाओं तक तेजी से जवाब देने की जरूरत होती है।

नई डील से वायुसेना की ऑपरेशनल रीच और स्ट्रैटेजिक फ्लेक्सिबिलिटी बढ़ेगी। इससे भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भी लंबी दूरी के अभियानों को ऑपरेट कर सकेगा।

China PL-15 missiles: बड़ा खुलासा! यूएई की मदद से चीन ने अपनी मिसाइलों को किया अपग्रेड, अमेरिकी जासूसों का दावा

China PL-15 missiles

China PL-15 missiles: अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसियों ने दावा किया है कि चीन ने संयुक्त अरब अमिरात की एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनी की मदद से अपनी एयर-टू-एयर मिसाइलों को अपग्रेड किया। इसी तकनीकी सहयोग के चलते चीन को अपनी मिसाइलों की रेंज बढ़ाने में मदद मिली।

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ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट में अमेरिकी जासूसी एजेंसियों के हवाले से बताया गया है कि यह मामला 2022 का है जब बाइडेन प्रशासन के दौरान अमेरिकी खुफिया विभागों ने यह पता लगाया कि यूएई की प्रमुख एआई कंपनी जी42 ने चीन की हुवावे कंपनी को एक ऐसा सॉफ्टवेयर उपलब्ध कराया था, जिसका इस्तेमाल चीन ने अपनी पीएल-15 और पीएल-17 मिसाइलों की फ्लाइट कंट्रोल और टारगेटिंग सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए किया।

इन मिसाइलों को चीन के जे-20 स्टेल्थ फाइटर जेट्स में लगाया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस अपग्रेड के बाद इन जेट्स की रेंज और सटीकता अमेरिकी एफ-15 और एप-18 विमानों से ज्यादा हो गई है। यह रिपोर्ट अमेरिकी प्रशासन के छह अधिकारियों के हवाले से प्रकाशित की गई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि यूएई से ट्रांसफर की गई तकनीक में मशीन लर्निंग मॉड्यूल और डिजिटल सिग्नल प्रोसेसर शामिल थे, जो मिसाइल को उड़ान के दौरान अपनी डायरेक्शन और स्पीड को ऑटो एडजस्ट करने में मदद करते हैं। इससे मिसाइल दुश्मन की काउंटर-मेजर तकनीक से बचकर लंबी दूरी तक जा सकती है।

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इस तकनीक का कुछ हिस्सा फ्रांस और ब्रिटेन में बनी मिसाइलों जैसे मीका और असराम से डेवलप किया गया था, जिन्हें यूएई ने पहले आयात किया था। अमेरिकी एजेंसियों का कहना है कि यही तकनीकी बाद में चीन तक पहुंची।

सिविल एआई प्रोजेक्ट के बहाने ट्रांसफर

रिपोर्ट के मुताबिक, हुवावे को यह तकनीक सिविल इस्तेमाल के बहाने दी गई, लेकिन वास्तव में इसका इस्तेमाल सैन्य उद्देश्यों के लिए किया गया। बता दें कि जी42 अबू धाबी स्थित यूएई की प्रमुख एआई कंपनी है, जिसके चेयरमैन शेख ताहनून बिन जायद अल नाहयान हैं। वे यूएई के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी हैं।

कंपनी का कहना है कि उसने किसी भी सैन्य तकनीक का ट्रांसफर नहीं किया और वह केवल “अंतरराष्ट्रीय मानकों के तहत” काम करती है। जी42 के प्रवक्ता का कहना है कि “हम किसी भी ऐसी गतिविधि से अनजान हैं।”

क्या यूएई को सजा देंगे ट्रंप?

इस खुलासे के बाद वाशिंगटन में बहस शुरू हो गई कि क्या अमेरिका को यूएई जैसे सहयोगी देश को दंडित करना चाहिए। कुछ अधिकारियों का मानना था कि यूएई चीन के प्रभाव में जा रहा है, जबकि कुछ अन्य अधिकारी यह तर्क दे रहे थे कि यूएई अमेरिका का पुराना रणनीतिक साझेदार है और वहां अमेरिकी बेस भी मौजूद हैं।

व्हाइट हाउस के अंदर इस पर चर्चा हुई कि क्या जी42 पर प्रतिबंध लगाया जाए या नहीं। हालांकि, सहमति इस पर बनी कि ईरान के खिलाफ यूएई की रणनीतिक अहमियत है, और इतनी बड़ी है कि उस पर कठोर कदम उठाना उचित नहीं होगा।

हालांकि अमेरिकी कांग्रेस के रिपब्लिकन सांसद जॉन मोलिनार ने इस रिपोर्ट पर चिंता जताते हुए कहा, “यूएई और चीन के बीच बढ़ते संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं।” पूर्व सीआईए विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए “टेक्नोलॉजिकल अलर्ट” है।

मिसाइल अपग्रेड से चीन को क्या मिला?

रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की पीएल-15 और पीएल-17 मिसाइलें पहले से ही 200–400 किलोमीटर रेंज की थीं, लेकिन इस तकनीकी सुधार के बाद उनकी रेंज और टारगेटिंग और सटीक हो गई। पूर्व सीआईए अधिकारियों ने कहा कि चीन की मिसाइलें पहले से ही अमेरिका की एआईएम-120 अमराम मिसाइल से ज्यादा ताकवर थीं, लेकिन अब इस अपग्रेड से यह अंतर और बढ़ गया है।

यूएई ने पिछले कुछ सालों में चीन के साथ तकनीकी और आर्थिक रिश्ते मजबूत किए हैं। उसने हुवावे को अपने 5जी नेटवर्क के लिए चुना, जबकि अमेरिका इसके विरोध में था। 2023 में, जी42 ने हालांकि हुवावे से अपने संबंध खत्म कर माइक्रोसॉफ्ट के साथ साझेदारी की, लेकिन अमेरिकी एजेंसियों का कहना है कि यह कदम उस समय उठाया गया जब तकनीकी ट्रांसफर पहले ही हो चुका था। 2025 की शुरुआत में यूएई अधिकारियों ने चीन का दौरा भी किया था, जिससे पता चलता है कि दोनों देशों के बीच रिश्ते और गहरे हुए है।

पाकिस्तान ने मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन से मिली पीएल-15 मिसाइलों का इस्तेमाल किया था। उस दौरान पाकिस्तान के फाइटर्स जेट्स ने पीएल-15 दागी थीं, लेकिन भारतीय वायुसेना के इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम्स ने इन्हें जाम कर दिया था। जिससे ये टारगेट तक नहीं पहुंच सकीं और रास्ता भटक कर भारतीय सीमा में ही गिर गईं।

INS Ikshak commissioning: भारतीय नौसेना में शामिल होगा तीसरा स्वदेशी सर्वे जहाज ‘इक्षक’, समंदर में बनेगा ‘मार्गदर्शक’

INS Ikshak commissioning: Indian Navy to induct third Made-in-India hydrographic survey ship on November 6

INS Ikshak commissioning: भारतीय नौसेना स्वदेशी सर्वे वेसल आईएनएस इक्षक को 6 नवंबर को कोच्चि नौसैनिक अड्डे पर आधिकारिक रूप से कमीशन करने जा रही है। इक्षक नौसेना के सर्वे वेसल (लॉर्ज) कैटेगरी का तीसरा जहाज है, जो पूरी तरह से भारत में डिजाइन और निर्मित किया गया है। इससे देश को हाइड्रोग्राफी सेक्टर में मजबूती मिलेगी।

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आईएनएस इक्षक को कोलकाता के गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स ने भारतीय नौसेना के डायरेक्टरेट ऑफ शिप प्रोडक्शन और वॉरशिप ओवरसीइंग टीम की निगरानी में तैयार किया है। इसमें 85 फीसदी से ज्यादा स्वदेशी सामग्री और तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।

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समुद्री सर्वे से लेकर आपदा राहत तक सक्षम इक्षक

आईएनएस इक्षक का मुख्य काम समुद्री मानचित्रण, समुद्र की गहराई मापना, नौवहन मार्ग सुरक्षा और तटीय इलाकों के लिए रियल-टाइम डेटा संग्रह करना है। इसके अलावा यह जहाज आपातकालीन स्थिति में ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ (एचएडीआर) और हॉस्टिपल शिप के तौर पर भी काम कर सकता है।

इक्षक को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया गया है। इसमें मल्टी-बीम इको साउंडर, ऑटोमेटेड सर्वे सिस्टम, एयूवी लॉन्च क्षमता और पर्यावरण-अनुकूल प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है।

खास बात यह है कि यह जहाज नौसेना का पहला सर्वे वेसल है जिसमें महिलाओं के लिए अलग और आधुनिक आवास व्यवस्था है।

क्या है ‘इक्षक’ का मतलब

‘इक्षक’ का मतलब है “मार्गदर्शक” या “द गाइड”। इस जहाज का उद्देश्य भी यही है। समुद्र की अनजानी राहों को मापना, सुरक्षित नौवहन सुनिश्चित करना और भारत की समुद्री शक्ति को मजबूती देना।

इक्षक से पहले, इसी वर्ग के दो अन्य जहाज आईएनएस संदेश (2021) और आईएनएस निर्देशक (2024) पहले ही भारतीय नौसेना में शामिल हो चुके हैं। इक्षक के जुड़ने के बाद भारत की हाइड्रोग्राफी क्षमता 100 फीसदी स्वदेशी हो जाएगी।

Defence Production: रक्षा मंत्री की उद्योग जगत से अपील- डिफेंस प्रोडक्शन में बढ़ाएं योगदान, ऑपरेशन सिंदूर में स्वदेशी रक्षा उपकरणों से बढ़ी भारत की साख

Defence Production- Rajnath SIngh
Raksha Mantri Rajnath Singh addressed the SIDM Annual Session 2025 in New Delhi.

Defence Production: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिस तरह से भारतीय सेनाओं ने प्रभावी ढंग से ‘मेक इन इंडिया’ डिफेंस इक्विपमेंट्स का इस्तेमाल किया उससे क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठता मजबूत हुई है। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दुनिया ने भारत की आकाश मिसाइल प्रणाली, ब्रह्मोस मिसाइल और आकाशतीर एयर डिफेंस कंट्रोल सिस्टम जैसी स्वदेशी तकनीकों की क्षमताओं को देखा है।

Rajnath Singh Jaisalmer Visit: रक्षा मंत्री ने देखा सेना के भैरव कमांडोज और अश्नि प्लाटून का जलवा, बोले- शत्रु को कभी कम न आंकें

नई दिल्ली में आयोजित सोसाइटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स के वार्षिक सम्मेलन में बोलते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि इन उपकरणों की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि भारत अब केवल उपयोगकर्ता नहीं, बल्कि एक उत्पादक देश बन चुका है। उन्होंने कहा कि यह सफलता भारतीय सशस्त्र बलों के साथ-साथ देश के डिफेंस इंडस्ट्री वॉरियर्स की भी है, जिन्होंने इनोवेशन, डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग में अग्रणी भूमिका निभाई है।

Defence Production- Rajnath SIngh

रक्षा उत्पादन में अपना योगदान बढ़ाए उद्योग जगत

राजनाथ सिंह ने कहा कि 2014 से पहले भारत अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर था। लेकिन अब देश में 1.51 लाख करोड़ रुपये का डिफेंस प्रोडक्शन हो रहा है, जिसमें से 33,000 करोड़ रुपये का योगदान निजी क्षेत्र से है।

उन्होंने बताया कि रक्षा निर्यात भी ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच चुका है। 10 साल पहले जहां यह 1,000 करोड़ रुपये से कम था, वहीं अब यह 24,000 करोड़ रुपये के करीब पहुंच गया है और मार्च 2026 तक 30,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है।

रक्षा मंत्री ने उद्योग जगत से अपील करते हुए कहा कि वे रक्षा उत्पादन में अपने योगदान को मौजूदा 25 फीसदी से बढ़ाकर 50 फीसदी तक पहुंचाने की योजना पर काम करें।

‘हमारी मिट्टी, हमारी ढाल’

राजनाथ सिंह ने कहा कि जब भारत किसी विदेशी डिफेंस इक्विपमेंट को खरीदता है तो उसके रखरखाव और स्पेयर पार्ट्स की लागत बहुत अधिक होती है। उन्होंने उद्योग जगत से आग्रह किया कि वे सबसिस्टम्स और कंपोनेंट्स के स्वदेशी निर्माण पर ध्यान दें, ताकि सप्लाई और रिपेयमेंट में भारत आत्मनिर्भर बन सके। उन्होंने कहा कि भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि ‘हमारी मिट्टी, हमारी ढाल’ उसकी पहली पसंद बने।

रक्षा मंत्री ने कहा कि आईडेक्स और अदिति जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए युवाओं और उद्योगों को नई तकनीक विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में भारत को पूरी तरह स्वदेशी रक्षा तकनीक वाले उत्पाद विकसित करने होंगे ताकि देश की सुरक्षा सेल्फ सर्पोटिंग बन सके।