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Su-57 Stealth Fighter: सुखोई-57 अब ‘मेड इन इंडिया’ के रास्ते पर! रूस की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

Su-57 fighter jet India
Su-57 Stealth Fighter

Su-57 Stealth Fighter: एसयू-57 स्टेल्थ फाइटर जेट को लेकर रूस की एक तकनीकी टीम ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को सौपी गई रिपोर्ट में कहा है कि कंपनी के पास पहले से ही लगभग 50 फीसदी क्षमता मौजूद है, जिससे भारत में इस एडवांस फाइटर जेट का निर्माण किया जा सकता है।

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यह रिपोर्ट पिछले महीने सौपी गई थी, ठीक उस समय जब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दिसंबर की शुरुआत में भारत यात्रा की तैयारी चल रही थी। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर भारत और रूस आगे बढ़ने का फैसला करते हैं, तो एचएएल के लिए एसयू-57ई (एक्सपोर्ट वैरिएंट) के लोकल प्रोडक्शन का रास्ता खुल सकता है।

Su-57 Stealth Fighter: सितंबर में रूसी टीम ने किया था दौरा

रूस की सुखोई डिजाइन ब्यूरो और दूसरे डिफेंस आर्गेनाइजेशन की टीम ने इस साल सितंबर में एचएएल की कई फैसिलटीज का दौरा किया था। ताकि भारत में इस अत्याधुनिक स्टेल्थ विमान के निर्माण के लिए तकनीकी तैयारी, मशीनरी और इंफ्रास्ट्रक्चर की तैयारियां देखी जा सकें।

रूसी टीम ने नासिक डिवीजन का निरीक्षण किया, जहां सुखोई-30 लड़ाकू विमानों की फाइनल असेंबली लाइन मौजूद है। इसके अलावा कोरापुट (ओडिशा) में एचएएल का इंजन डिवीजन भी देखा गया, जहां एएल-31एफपी टर्बोफैन इंजन का निर्माण और ओवरहॉल किया जाता है। साथ ही केरल में कासरगोड की स्ट्रैटेजिक इलेक्ट्रॉनिक्स फैक्ट्री का दौरा किया, जहां जहाज के लिए जरूरी इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, एवियोनिक्स, डिस्प्ले प्रोसेसर और ऑनबोर्ड कंप्यूटर बनाए जाते हैं।

जिसके बाद रूसी एक्सपर्ट्स ने निष्कर्ष निकाला कि भारत के पास पहले से ही 50 फीसदी उत्पादन क्षमता मौजूद है। भविष्य में निवेश, अपग्रेडेशन और ट्रेनिंग के बाद सुखोई-57 (Su-57 Stealth Fighter) का पूर्ण उत्पादन भारत में किया जा सकता है।

वहीं, रूस की रिपोर्ट के बाद अब एचएएल अपनी रिपोर्ट तैयार कर रहा है, जिसमें यह बताया जाएगा कि भारत में सुखोई-57 बनाने के लिए कहां अतिरिक्त निवेश की जरूरत होगी। इसमें इंफ्रास्ट्रक्चर, एडवांस टेक्नोलॉजी, रिसर्च एंड डेवलपमेंट, ह्यूमन रिसोर्स और सप्लाई चेन का जिक्र होगा।

सूत्रों के मुताबिक, यह रिपोर्ट इस महीने के अंत तक रक्षा मंत्रालय को सौंपी जाएगी। इस रिपोर्ट के बाद भारत और रूस के बीच इस प्रोजेक्ट पर कोई बड़ा फैसला लिया जा सकता है।

Su-57 Stealth Fighter: दिसंबर में पुतिन की भारत यात्रा से पहले अहम तैयारी

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 5-6 दिसंबर को भारत आने वाले हैं। इस दौरान होने वाली 23वीं भारत-रूस वार्षिक शिखर वार्ता में इस पर भी चर्चा हो सकती है।

सुखोई-57 फाइटर जेट (Su-57 Stealth Fighter) को रूस के कोम्सोमोल्स्क-ऑन-अमुर एविएशन प्लांट में बनाया जाता है। इस साल एरो इंडिया में पहली बार सुखोई-57 की पहली झलक देखने को मिली थी। उस समय रूस ने एसयू-57ई मॉडल को भारत के लिए पेश किया था। वहीं, अमेरिका ने उसी शो में अपना एफ-35 स्टेल्थ फाइटर भी शोकेस किया था।

Su-57 Stealth Fighter: भारत के एएमसीए प्रोजेक्ट से जुड़ने की पेशकश

रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव ने हाल ही में यह कहा था कि मॉस्को भारत के एएमसीए प्रोजेक्ट में भी तकनीकी सहयोग देने को तैयार है। उन्होंने 16 अक्टूबर को कहा था कि यह साझेदारी अब सिर्फ सौदे तक सीमित नहीं है, बल्कि अब यह को-डेवलपमेंट, को-प्रोडक्शन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के नए स्तर तक पहुंच चुकी है।

अलीपोव ने यह भी बताया कि दोनों देशों के बीच एंटी-ड्रोन सिस्टम, एडवांस्ड रडार तकनीक और प्रिसिशन स्ट्राइक क्षमताओं पर भी बातचीत चल रही है। उम्मीद जताई गई कि पुतिन की यात्रा के दौरान इन विषयों पर कुछ नए समझौते हो सकते हैं।

एसयू-57 रूस (Su-57 Stealth Fighter) का सबसे एडवांस फिफ्थ जनरेशन मल्टी-रोल स्टेल्थ फाइटर जेट है, जो तेज रफ्तार, रडार-एवेजन और लंबी दूरी की अटैक क्षमता के लिए जाना जाता है। यह विमान न केवल एयर-टू-एयर, बल्कि एयर-टू-ग्राउंड मिशनों में भी सक्षम है।

INS Ikshak Indian Navy: नौसेना में शामिल हुआ स्वदेशी सर्वे शिप ‘इक्षक’, देश की समुद्री सीमाओं की करेगा निगरानी

INS Ikshak Indian Navy
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INS Ikshak Indian Navy: भारतीय नौसेना ने आज कोच्चि के नेवल बेस में आयोजित भव्य समारोह में नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी की मौजूदगी में आईएनएस इक्षक को औपचारिक रूप से भारतीय नौसेना में शामिल किया गया। यह सर्वे वेसल (लार्ज) क्लास का तीसरा जहाज है और इसे दक्षिणी नौसेना कमान कोच्चि में तैनात किया गया है। इस मौके पर नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी ने कहा कि यह जहाज न केवल भारतीय नौसेना की क्षमता बढ़ाएगा, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की भावना का भी जीवंत उदाहरण है।

INS Ikshak commissioning: भारतीय नौसेना में शामिल होगा तीसरा स्वदेशी सर्वे जहाज ‘इक्षक’, समंदर में बनेगा मार्गदर्शक 

एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी ने कोच्चि स्थित सदर्न नेवल कमांड के नौसैनिक अड्डे पर आयोजित समारोह में कहा, “आईएनएस इक्षक हमारे देश की तकनीकी उत्कृष्टता, स्वदेशी जहाज निर्माण क्षमता और समुद्री दृष्टि का प्रतीक है। यह जहाज भारत की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर हमारी विश्वसनीयता को भी मजबूत करेगा।”

INS Ikshak Indian Navy: भारत के समुद्री परिवर्तन का प्रतीक

एडमिरल त्रिपाठी ने अपने संबोधन में कहा कि आज दुनिया का समुद्री क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। तकनीक, भू-राजनीति और रणनीति के नए समीकरण समुद्रों को नई दिशा दे रहे हैं। उन्होंने कहा, “आज समुद्री क्षेत्र संसाधनों, प्रभाव और कनेक्टिविटी की प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गया है। ऐसे समय में हमें स्थिरता और दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ना होगा।”

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों को उद्धृत करते हुए कहा, “जब वैश्विक समुद्र अशांत हों, तो दुनिया एक स्थिर प्रकाशस्तंभ की तलाश करती है। भारत आज उस भूमिका को निभाने के लिए पूरी तरह तैयार है।”

नौसेना प्रमुख ने कहा कि भारतीय नौसेना इस दृष्टि की मूर्त रूप है, एक ऐसी शक्ति जो समुद्रों पर विश्वास, साझेदारी और सामूहिक हितों की रक्षा करती है।

एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय नौसेना की सर्वे जहाजों ने पिछले एक साल में मॉरीशस, म्यांमार और वियतनाम को हाइड्रोग्राफिक मदद दी है। यह भारत की साझा समुद्री समृद्धि के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि आईएनएस संधायक जैसे जहाज हाल ही में सिंगापुर, इंडोनेशिया और मलेशिया तक की यात्राएं पूरी कर चुकी हैं, जो भारत की ‘महासागर’ विजन की सच्ची झलक है।

हाइड्रोग्राफिक डेटा अब रणनीतिक जरूरत

एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि इक्षक, संधायक और निर्देशक जैसी सर्वे वेसल्स नौसेना और वाणिज्यिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा, “ये जहाज समुद्र को समझने योग्य और सुरक्षित बनाते हैं। ये हर सर्वे मिशन के साथ समुद्री मार्गों को और सटीक बनाते हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि जलवायु परिवर्तन और समुद्री खनिजों की खोज जैसे नए क्षेत्रों में सटीक हाइड्रोग्राफिक डेटा अब रणनीतिक आवश्यकता बन गया है।

उन्होंने कहा, “इक्षक जैसी जहाजें केवल सर्वे प्लेटफॉर्म नहीं हैं, बल्कि ये समुद्री सुरक्षा, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सहयोग की महत्वपूर्ण कड़ी हैं।”

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‘आत्मनिर्भरता’ को नई दिशा देने वाला जहाज

एडमिरल त्रिपाठी ने गर्व के साथ बताया कि इक्षक जैसे शिप 80 फीसदी से अधिक स्वदेशी सामग्री से बने हैं। उन्होंने कहा, “हर नए जहाज के साथ नौसेना ‘खरीदने वाली नौसेना’ से ‘निर्माण करने वाली नौसेना’ बन चुकी है। यह आत्मनिर्भर भारत की सच्ची भावना का प्रतीक है।”

उन्होंने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के हालिया बयान का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारतीय नौसेना देश की आत्मनिर्भरता, नवाचार और औद्योगिक विकास की अग्रणी शक्ति बन चुकी है।

एडमिरल ने बताया कि इक्षक जैसी जहाजों में महिला अधिकारियों और नाविकों के लिए विशेष आवासीय डिजाइन सुधार किए गए हैं, जो नौसेना की प्रगतिशील सोच को दर्शाते हैं।

GRSE और नौसेना की तारीफ

नौसेना प्रमुख ने गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड, कोलकाता की टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा, “सीएमडी कमोडोर पीआर हरी और उनकी पूरी टीम ने न केवल एक विश्वस्तरीय जहाज तैयार किया है, बल्कि भारतीय जहाज निर्माण में उत्कृष्टता का नया मानक स्थापित किया है।”

उन्होंने डिजाइनरों, तकनीकी विशेषज्ञों और सभी सहयोगियों की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनकी मेहनत ने जहाज के परीक्षण और डिलीवरी को समय पर पूरा करने में बड़ी भूमिका निभाई है।

एडमिरल त्रिपाठी ने इक्षक के कमांडिंग ऑफिसर कैप्टन टी.वी. सिंह और उनकी टीम को संबोधित करते हुए कहा, “अब यह जहाज आपके हाथों में है। आपको इसमें जान डालनी है, परंपराएं बनानी हैं और इसका चरित्र गढ़ना है। यह आपका कर्तव्य है कि आप ‘निर्भय वीर पथ प्रदर्शक’ के मूलमंत्र पर खरे उतरें।”

उन्होंने कहा कि नौसेना को उम्मीद है कि इक्षक की टीम अपनी लगन और साहस से इसे गर्व का प्रतीक बनाएगी। “यह जहाज केवल स्टील और सिस्टम का मेल नहीं, बल्कि इसे आपके जज्बे से आत्मा मिलेगी।”

क्या है ‘इक्षक’ का मतलब

‘इक्षक’ का संस्कृत में अर्थ होता है, “मार्गदर्शक”, और यह नाम अपने उद्देश्य के बिल्कुल अनुरूप है। यह जहाज समुद्र में नए रास्ते खोजने, नेविगेशन के लिए नक्शे बनाने और भारत की समुद्री सीमाओं की निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

आईएनएस इक्षक को कोलकाता की गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेडने (जीआरएसई) ने बनाया है। इसमें 80 प्रतिशत से अधिक कंपोनेंट्स और टेक्नोलॉजी भारत में ही तैयार किए गए हैं।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, ‘इक्षक’ का निर्माण आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया अभियान के तहत किया गया है। इस प्रोजेक्ट में भारतीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) का भी बड़ा योगदान रहा है।

‘इक्षक’ को चार सर्वे जहाजों के उस कॉन्ट्रैक्ट के तहत बनाया गया है। यह सौदा रक्षा मंत्रालय और जीआरएसई के बीच 30 अक्टूबर 2018 को हुआ था। जिसकी लागत 2,435 करोड़ रुपये थी। इस प्रोजेक्ट का पहला जहाज आईएनएस संध्याक दिसंबर 2021 में नौसेना में शामिल हुआ था।

INS Ikshak Indian Navy: आईएनएस इक्षक में क्या हैं खूबियां

आईएनएस इक्षक (INS Ikshak Indian Navy) 110 मीटर लंबा और 3,300 टन वजनी है और यह जहाज आधुनिक तकनीक से लैस है। इसमें हाई-रिजॉल्यूशन मल्टी-बीम इको साउंडर, ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल, रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल और चार सर्वे मोटर बोट लगाई गई हैं।

यह इक्विपमेंट्स समुद्र की गहराई मापने, समुद्री नक्शे बनाने और नौवहन मार्ग तय करने में इस्तेमाल किए जाएंगे। इसके अलावा, जहाज में एक हेलिकॉप्टर डेक भी है, जिससे यह मल्टी-डोमेन मिशन भी पूरा कर सकता है।

इक्षक तटीय और गहरे समुद्री क्षेत्रों में हाइड्रोग्राफिक सर्वे करेगा। यानी यह समुद्र की सतह और तल के भूगोल का अध्ययन कर बंदरगाहों, जलमार्गों और नौवहन चैनलों की सटीक जानकारी जुटाएगा।

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समुद्री सुरक्षा को मिलेगी नई ताकत

इक्षक के जरिए भारतीय नौसेना अब समुद्र में भौगोलिक और मैरीटाइम लिमिट्स का सर्वे भी कर सकेगी। यह जहाज एक्सक्लूसिव इकॉनमिक जोन और एक्सटेंडेड कॉन्टिनेंटल शेल्व तक के इलाकों का सर्वे करने में सक्षम है।

यह न सिर्फ समुद्री नक्शे तैयार करेगा, बल्कि समुद्री सुरक्षा को भी मजबूत करेगा। इस जहाज से मिलने वाले आंकड़े नौवहन, समुद्री यातायात नियंत्रण और रक्षा अनुसंधान के लिए बेहद उपयोगी होंगे।

मल्टीपर्पज रोल निभाएगा आईएनएस इक्षक

यह जहाज सर्वे और हाइड्रोग्राफिक स्टडी के अलावा, आपात स्थिति में सर्च एंड रेस्क्यू, चिकित्सा सहायता और अल्पकालिक हॉस्पिटल शिप के रूप में भी काम कर सकेगा। इसके अलावा, यह जहाज समुद्र में जियोफिजिकल और ओशनोग्राफिक डेटा भी जुटाएगा, जो डिफेंस रिसर्च और स्ट्रेटेजी के लिए बेहद जरूरी है।

‘इक्षक’ (INS Ikshak Indian Navy) के शामिल होने से भारतीय नौसेना की सर्वे और चार्टिंग क्षमता और भी मजबूत हो गई है। रक्षा मंत्रालय ने 2023 में नेक्स्ट जेनरेशन सर्वे वेसल्स की खरीद को मंजूरी दी थी, जो भविष्य में इस नेटवर्क को और व्यापक बनाएंगे। वहीं, भारत अब समुद्री सर्वे तकनीक में भी आत्मनिर्भर बन रहा है और विदेशी तकनीक पर अपनी निर्भरता लगातार घटा रहा है।

Intelligence Inputs: ऑपरेशन सिंदूर के छह महीने बाद आतंकी रच रहे नई साजिश, लश्कर-ए-तैयबा और जैश फिर एक्टिव

Intelligence Inputs
Six Months After the Strike, New Terror Threat Emerges from Lashkar and Jaish in Jammu and Kashmir

Intelligence Inputs: भारत के ऑपरेशन सिंदूर के छह महीने बाद पाकिस्तानी आतंक संगठनों ने जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर से आतंकी गतिविधियां तेज कर दी हैं। ताजा खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने सीमापार से घुसपैठ और नई हमलों की योजना तैयार कर ली है।

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खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस और स्पेशल सर्विस ग्रुप ने इन संगठनों की मदद से जम्मू-कश्मीर में सक्रिय नेटवर्क को दोबारा खड़ा करना शुरू कर दिया है। आतंकियों के कई ग्रुप लाइन ऑफ कंट्रोल के रास्ते घाटी में दाखिल हो चुके हैं और वे ड्रोन के जरिए इलाके की निगरानी कर रहे हैं।

खुफिया सूत्रों के अनुसार, लश्कर के आतंकी शमशेर की अगुवाई में एक ग्रुप ने हाल ही में ड्रोन से एलओसी के कमजोर हिस्सों की मैपिंग की, ताकि वहां से फिदायीन हमले या हथियार गिराने की कार्रवाई की जा सके।

Intelligence Inputs: पाकिस्तान में हुई गई गुप्त मीटिंग

इंटेलिजेंस एजेंसियों के सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में अक्टूबर 2025 के दौरान कई गुप्त बैठकें हुईं हैं। इनमें जमात-ए-इस्लामी, हिज्बुल मुजाहिदीन, और आईएसआई के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। इन बैठकों में आतंकियों के निष्क्रिय सेल्स को फिर से सक्रिय करने और पुराने कमांडरों को मासिक भत्ता देने की योजना तैयार की गई।

सूत्रों के अनुसार, आईएसआई ने अपने हैंडलरों को निर्देश दिया है कि वे भारतीय सुरक्षा बलों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नागरिकों को निशाना बनाते हुए “बदले की कार्रवाई” शुरू करें। इसके लिए पाकिस्तान में मौजूद बॉर्डर एक्शन टीम्स, जो पूर्व एसएसजी सैनिकों और प्रशिक्षित आतंकियों से बनी हैं, उन्हें फिर से सक्रिय किया गया है।

नशे और हथियारों के जरिए आतंकी फंडिंग

खुफिया एजेंसियों का कहना है कि लश्कर और जैश ने घाटी में अपने पुराने समर्थकों को फिर से सक्रिय करना शुरू कर दिया है। आतंकियों के ह्यूमन नेटवर्क को अब फिर से खड़ा किया जा रहा है। इस नेटवर्क को भारत ने पहले खत्म कर दिया था। इसके साथ ही, नार्को-टेरर नेटवर्क यानी नशे और हथियारों की तस्करी के जरिए आतंक को फंड करने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं।

पंजाब और राजस्थान में हाल ही में पकड़ी गई हथियारों की खेपों में पाकिस्तान से भेजे गए ड्रोन की भूमिका सामने आई थी। अब वही पैटर्न जम्मू-कश्मीर में भी देखने को मिल रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की नई चाल

भारत ने अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर चलाया था। इसमें भारतीय सेना ने सटीक एयर स्ट्राइक्स और ग्राउंड ऑपरेशंस के जरिए कई आतंकी मॉड्यूल्स को खत्म किया था। इस अभियान में लश्कर-ए-तैयबा और द रेजिस्टेंस फ्रंट को भारी नुकसान हुआ था।

लेकिन अब पाकिस्तान की कोशिश है कि वह उस हार का बदला ले। भारत की काउंटर-टेरर स्ट्राइक से बुरी तरह बौखलाए आतंक संगठनों को फिर से हथियार, प्रशिक्षण और धन मुहैया कराया जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली और राजनीतिक अस्थिरता ने उसकी सेना और आईएसआई को भारत विरोधी गतिविधियों पर और निर्भर बना दिया है।

सरकार और सेना हाई अलर्ट पर

नई दिल्ली में सुरक्षा एजेंसियों ने इन खुफिया रिपोर्टों को “गंभीर चेतावनी” के तौर पर लिया है। सेना और खुफिया इकाइयों को उत्तरी कमान के सभी सेक्टरों में अलर्ट कर दिया गया है। सूत्रों ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के तहत जिन इलाकों में पहले आतंक खत्म किया गया था, वहां फिर से निगरानी बढ़ा दी गई है। इस बीच भारत की तीनों सेनाएं पश्चिमी सीमाओं पर त्रिशूल ट्राई-सर्विस एक्सरसाइज कर रही हैं।

जम्मू-कश्मीर में इस समय स्थानीय चुनावों और पर्यटन की बहाली के चलते एक शांति दिखाई दे रही है। लेकिन खुफिया एजेंसियों का मानना है कि आईएसआई इस माहौल को बिगाड़ने की कोशिश कर रही है।

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में हुई हाल की बैठकों का मकसद घाटी में आतंक की पुरानी मशीनरी को फिर से एक्टिव करना है। आईएसआई अब भी पुराने कमांडरों को पैसा मुहैया कराा रही है ताकि वे नए भर्तियां शुरू कर सकें।

सूत्रों का कहना है कि भारतीय सेना किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। लाइन ऑफ कंट्रोल पर निगरानी बढ़ा दी गई है और तकनीकी इंटेलिजेंस के जरिए हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है।

इस बीच पाकिस्तान की तरफ से हो रहे ड्रोन मूवमेंट्स और रेडियो इंटरसेप्शन की जांच भी तेज कर दी गई है। सुरक्षा बलों ने घाटी में संवेदनशील इलाकों में ऑपरेशंस को और सख्त कर दिया है ताकि किसी नई साजिश को जमीन पर उतरने से पहले ही नाकाम किया जा सके।

GPS Spoofing at IGI Airport: देश के सबसे सुरक्षित इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर जीपीएस स्पूफिंग का खतरा, कई उड़ानें प्रभावित, कई जहाज जयपुर डायवर्ट

GPS Spoofing at IGI Airport
GPS Spoofing at IGI Airport

GPS Spoofing at IGI Airport: देश की राजधानी दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर पिछले दो-तीन दिनों से जीपीएस स्पूफिंग का मामला सामने आया है। इसके चलते कई उड़ानें प्रभावित हुई हैं। इस तकनीकी दिक्कत के चलते मंगलवार रात कम से कम सात विमानों को जयपुर डायवर्ट करना पड़ा। इनमें इंडिगो और एयर इंडिया के विमान शामिल थे।

एविएशन अधिकारियों के मुताबिक, यह दिल्ली में जीपीएस स्पूफिंग का पहला मामला है। अब तक ऐसी घटनाएं ज्यादातर सीमावर्ती इलाकों में देखी जाती रही हैं, लेकिन पहली बार यह देश की राजधानी के सबसे व्यस्त हवाईअड्डे पर दर्ज हुई है। खास बाात यह है कि दिल्ली बॉर्डर एरिया से कई सौ किमी दूर है और यह भारत की राजधानी दिल्ली है। यहां से रोजाना 1,550 उड़ानें होती हैं और लाखों यात्री दुनिया के सबसे व्यस्त एयरपोर्ट से उड़ान भरते हैं। वहीं, राजधानी जैसे सुरक्षित क्षेत्र में जीपीएस स्पूफिंग राष्ट्रीय सुरक्षा का सीधा खतरा है।

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GPS Spoofing at IGI Airport: क्या है जीपीएस स्पूफिंग?

जीपीएस स्पूफिंग एक ऐसी तकनीक है, जिसमें नकली सैटेलाइट सिग्नल भेजे जाते हैं। ये सिग्नल असली ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम यानी जीपीएस सिग्नल को कन्फ्यूज कर देते हैं, जिससे विमान के नेविगेशन सिस्टम को अपनी असली स्थिति गलत दिखाई देने लगती है।

सरल शब्दों में कहें तो, यह ऐसा है जैसे कोई नकली नक्शा दिखाकर पायलट को गलत दिशा में भेज दे। इस वजह से विमान को यह पता नहीं चल पाता कि वह वास्तव में कहां है, जिससे लैंडिंग और टेक-ऑफ के दौरान स्थिति भयावह बन सकती है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीपीएस स्पूफिंग की घटनाएं आमतौर पर ब्लैक सी, तुर्की, यूक्रेन और पश्चिम एशिया जैसे युद्ध क्षेत्रों में होती रही हैं। लेकिन दिल्ली जैसे शहरी और सुरक्षित इलाके में इसका असर दिखना बेहद चिंता का विषय है।

कैसे हुआ असर एयरपोर्ट पर

टीओआई की रिपोर्ट के मुताबिक इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे का मुख्य रनवे 10/28, जो लंबे समय से इस्तेमाल में है, फिलहाल इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (आईएलएस) के अपग्रेडेशन के लिए बंद है। आईएलएस के बंद होने के बाद विमान ‘रिक्वायर्ड नेविगेशन परफॉर्मेंस (आरएनपी) तकनीक के जरिए उतरते हैं, जो पूरी तरह जीपीएस पर निर्भर होती है।

लेकिन जब जीपीएस सिग्नल में गड़बड़ी आती है, तो इसका असर आरएनपी सिस्टम पर भी पड़ता है। यही वजह है कि दिल्ली एयरपोर्ट पर जीपीएस स्पूफिंग की शुरुआत होते ही मुख्य रनवे पर फ्लाइट ऑपरेशन में दिक्कतें होने लगीं।

जानकारी के अनुसार, यह समस्या तब ज्यादा बढ़ जाती है जब हवा पूर्व दिशा से चलती है। ऐसे में विमान द्वारका की दिशा से उतरते हैं और वसंत कुंज की ओर उड़ान भरते हैं, इस दौरान जीपीएस सिग्नल सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।

फ्लाइट्स पर पड़ा असर, सात विमान जयपुर डायवर्ट

मंगलवार की रात को इंडिगो के पांच और एयर इंडिया के दो विमान, दिल्ली में सुरक्षित लैंडिंग नहीं कर पाए और उन्हें जयपुर भेजना पड़ा। दिल्ली एयरपोर्ट की आटोमैटिक टर्मिनल इन्फॉर्मेशन सर्विस (एटीआईएस) ने सभी पायलटों को अलर्ट किया है और कहा है कि वे दिल्ली के एयरस्पेस में एंट्री करते समय सावधानी बरतें।

एक अधिकारी ने बताया, “यह सुरक्षा से जुड़ा संवेदनशील मामला है। हमें यह जानने की जरूरत नहीं कि स्पूफिंग क्यों हो रही है, बल्कि जरूरी यह है कि रनवे 10/28 पर आईएलएस सिस्टम को जल्द से जल्द चालू किया जाए।”

GPS Spoofing at IGI Airport: कितना बड़ा खतरा है यह

एविएशन एक्सपर्ट्स का कहना है कि जीपीएस स्पूफिंग का सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह विमान के पायलट को गलत स्थिति की जानकारी देता है। कभी-कभी यह गड़बड़ी 2,000 से 2,500 किलोमीटर तक की दूरी तक गलत दिशा दिखा सकती है। यहां कि जीपीएस स्पूफिंग से दो विमान आपस में भी टकरा सकते हैं।

इससे न सिर्फ पायलट भ्रमित होते हैं, बल्कि लैंडिंग के दौरान गलत लोकेशन पर उतरने का खतरा भी बढ़ जाता है। खासतौर पर बॉर्डर एरिया में जहाज दुश्मन देश में भी लैंड कर सकते हैं।

दुनिया में कई देशों ने पहले भी ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, लेकिन वहां यह युद्ध या मिलिट्री वजहों से होती हैं। उदाहरण के लिए, रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष के दौरान कई बार सिग्नल जैमिंग और स्पूफिंग की घटनाएं दर्ज की गई थीं। जियो-पॉलिटिकल साइबर वारफेयर की आशंका को भी जन्म देती है।

ईरान ने 2011 में एक अमेरिकी आरक्यू-170 ड्रोन को जीपीएस स्पूफिंग के जरिए गिराने का दावा किया था। इसी तरह, 2023 और 2024 में इराक, तुर्की, यूक्रेन और ब्लैक सी क्षेत्र में कई बार जीपीएस स्पूफिंग की घटनाएं दर्ज की गईं।

क्या कर रहे हैं अधिकारी और एयरलाइंस

एविएशन अथॉरिटी (GPS Spoofing at IGI Airport) और एयरलाइंस दोनों ने इस स्थिति से निपटने के लिए तात्कालिक कदम उठाए हैं। एयरलाइंस अपने पायलटों को पहले से अलर्ट कर रही हैं कि वे दिल्ली की ओर आने से पहले जीपीएस की गड़बड़ी की संभावना को ध्यान में रखें।

पायलटों को सलाह दी गई है कि वे वैकल्पिक नेविगेशन सिस्टम्स जैसे पारंपरिक रेडियो बीकन और ऑनबोर्ड नेविगेशन का इस्तेमाल करें। दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड का कहना है कि मुख्य रनवे 10/28 पर नया आईएलएस सिस्टम 27 नवंबर तक एक्टिव करने की तैयारी चल रही है।

इंडिगो एयरलाइन ने हाल ही में इस रनवे पर ट्रायल फ्लाइट भी की थी, ताकि अपग्रेडेड सिस्टम की परफॉरमेंस को जांचा जा सके। जिसकी रिपोर्ट डीजीसीए को सौंपी जा चुकी है।

क्यों होती है GPS जामिंग या स्पूफिंग

सामान्य तौर पर, जीपीएस जामिंग (GPS Spoofing at IGI Airport) सेना द्वारा किसी इलाके में अपने ठिकाने या हथियारों की लोकेशन छिपाने के लिए की जाती है। वहीं, जीपीएस स्पूफिंग का इस्तेमाल ऐसे लोग करते हैं जो जानबूझकर गलत सिग्नल भेजकर विमान या जहाजों को कन्फ्यूज करना चाहते हैं।

यह मॉडर्न टेक्नोलॉजी वॉरफेयर का एक हिस्सा है, लेकिन इसका असर अगर नागरिक हवाईअड्डों पर दिखने लगे, तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

घटना के बाद सुरक्षा एजेंसियों और डीजीसीए ने जांच शुरू कर दी है। एयरपोर्ट पर सभी रडार सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल की निगरानी बढ़ा दी गई है। सिग्नल की जियो-लोकेशन ट्रैकिंग चल रही है। अधिकारियों ने बताया कि फिलहाल यह तकनीकी या बाहरी सिग्नल इंटरफेरेंस का मामला हो सकता है।

इस साल भारत में स्पूफिंग के 465 मामले

इस साल (GPS Spoofing at IGI Airport) केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि नवंबर 2023 से फरवरी 2025 के बीच अमृतसर और जम्मू के हवाई क्षेत्र में जीपीएस इंटरफेरेंस और स्पूफिंग के 465 मामले दर्ज किए गए हैं। इन घटनाओं में कई एयरलाइनों ने रिपोर्ट किया कि उनके विमान उड़ान के दौरान गलत लोकेशन डेटा दिखा रहे थे। नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल ने लोकसभा में लिखित जवाब में बताया था कि यह घटनाएं मुख्य रूप से भारत-पाकिस्तान सीमा के नजदीकी इलाकों खासकर अमृतसर और जम्मू में हुईं।

यह घटनाएं तब ज्यादा देखी गईं जब विमान भारत-पाकिस्तान सीमा के पास से गुजरते हैं। एयरलाइंस ने बताया कि पायलटों को अचानक गलत दिशा, दूरी और ऊंचाई की जानकारी मिलने लगी, जिससे उन्हें वैकल्पिक नेविगेशन सिस्टम का सहारा लेना पड़ा।

मुरलीधर मोहोल ने बताया कि एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया नेविगेशन और सर्विलांस सिस्टम को अपग्रेड कर रही है ताकि हवाई यातायात बढ़ने के बावजूद सुरक्षा बनी रहे। उन्होंने कहा कि भारत में अब कई बड़े एयरपोर्ट्स पर अत्याधुनिक रेडियो नेविगेशन और सैटेलाइट ट्रैकिंग सिस्टम लगाए जा रहे हैं, जिससे जीपीएस पर पूरी तरह निर्भरता कम हो सके।

GPS Spoofing at IGI Airport: भारतीय वायुसेना के विमान हुए थे स्पूफिंग के शिकार

यह घटना (GPS Spoofing at IGI Airport) इस साल 29 मार्च को हुई थी, जब भारतीय वायुसेना का सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान म्यांमार में भूकंप के बाद ऑपरेशन ब्रह्मा के तहत मानवीय सहायता लेकर रवाना हुआ था। उड़ान के दौरान विमान के जीपीएस सिग्नल से छेड़छाड़ की गई, जिससे विमान का नेविगेशन सिस्टम गलत लोकेशन डेटा दिखाने लगा। बाद में राहत सामग्री लेकर भेजे गए वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर-III विमानों को भी इसी तरह की जीपीएस स्पूफिंग का सामना करना पड़ा। जिसके बाद वायुसेना के पायलटों ने तुरंत इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल कर सुरक्षित उड़ान भरी। यह सिस्टम जीपीएस से अलग होता है और गाइरोस्कोप और एक्सीलरोमीटर की मदद से विमान की रफ्तार, दिशा और ऊंचाई को अपने सेंसरों से ट्रैक करता है।

IAF World Record: 32,000 फीट की ऊंचाई से जंप कर वायुसेना ने ‘अनजाने’ में बना दिया वर्ल्ड रिकॉर्ड! DRDO के मिलिट्री पैराशूट से लगाई थी छलांग

Highest Military Parachute Deployment
Wing Commander Vishal Lakhesh, VM (G) Team Lead, High Altitude Parachute Trials DRDO

IAF World Record: वायुसेना और डीआरडीओ ने पिछले दिनों कुछ ऐसा कारनामा कर दिया जिसकी खुद उन्हें भी उम्मीद नहीं थी। 15 अक्टूबर को भारतीय वायुसेना ने 32,000 फीट की ऊंचाई से सफलतापूर्वक मिलिट्री पैराशूट से छलांग लगाई थी। इस खास मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम डीआरडीओ ने स्वदेश में ही तैयार किया गया है। लेकिन जंप के दौरान किसी को अंदाजा नहीं था कि यह वर्ल्ड रिकॉर्ड बन सकता है।

Military Combat Parachute System: डीआरडीओ ने रचा इतिहास, 32,000 फीट से किया स्वदेशी मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट का सफल परीक्षण

इस ऐतिहासिक मिशन का नेतृत्व भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर विशाल लखेश, वीएम (जी) ने किया। यह जंप भारत में ही बने स्वदेशी मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम (MCPS) का इस्तेमाल करते हुए की गई थी। 32,000 फीट की ऊंचाई से भारतीय वायुसेना के टेस्ट जम्पर्स ने इस पैराशूट के जरिए ऊंचाई से फ्रीफॉल जम्प किया था। उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि यह जंप वर्ल्ड रिकॉर्ड बनने जा रही है।

जंप के बाद विंग कमांडर विशाल लखेश को अहसास हुआ कि अभी तक किसी भी देश ने 30 हजार फीट की ऊंचाई पर मिलिट्री पैराशूट के जरिए जंप नहीं किया है। यहां तक कि भारतीय सेनाओं में भी इतनी उंचाई से जंप करने का कोई रिकॉर्ड नहीं है।

IAF World Record: कैसे बना यह ऐतिहासिक मिशन

इस हाई-ऑल्टिट्यूड जंप को विशेष परिस्थितियों में अंजाम दिया गया था। वायुसेना के एक विशेष विमान से 32,000 फीट की ऊंचाई पर से टीम ने छलांग लगाई। यह जंप किसी “स्काइडाइविंग रिकॉर्ड” के लिए नहीं थी बल्कि यह एक कॉम्बैट फ्रीफॉल मिशन था, जिसे युद्ध जैसी परिस्थितियों में टेस्ट के तौर पर डिजाइन किया गया था। पैराशूट को 30,000 फीट की ऊंचाई पर खोला गया, जो अब तक का सबसे ऊंचा मिलिट्री पैराशूट डिप्लॉयमेंट माना जा रहा है।

Highest Military Parachute Deployment
Data From Altimeters

इस मिशन में तीन अनुभवी टेस्ट जम्पर शामिल थे, विंग कमांडर विशाल लखेश, मास्टर वारंट ऑफिसर आरजे सिंह और विवेक तिवारी। यह कॉम्बैट फ्रीफॉल जंप था, जिसमें 150 किलो लोड (सैनिक+गियर) के साथ 40 किमी ग्लाइड रेंज और जीपीएस/नाविक नेविगेशन था। तीनों ने सुरक्षित लैंडिंग की और मिशन को 100 फीसदी सफलता के साथ पूरा किया।

वहीं अब विंग कमांडर विशाल लखेश ने रक्षा मंत्रालय को पत्र लिखकर इस उपलब्धि को वर्ल्ड रिकॉर्ड के तौर पर दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू करने का अनुरोध किया है। उन्होंने कहा कि “भारत अब दुनिया का पहला देश है जिसने 30,000 फीट पर लाइव मैनड मिलिट्री पैराशूट डिप्लॉयमेंट किया है।” इस रिकॉर्ड की पुष्टि के लिए डीआरडीओ को गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स और वर्ल्ड एयर स्पोर्ट्स फेडरेशन (एफएआई) को तकनीकी डेटा, फ्लाइट लॉग और वीडियो सबूत सौंपने होंगे।

क्या है मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम

यह पैराशूट सिस्टम डीआरडीओ की दो प्रमुख प्रयोगशालाओं आगरा की एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट और बेंगलुरु की डिफेंस बायोइंजीनियरिंग एंड इलेक्ट्रोमेडिकल लेबोरेटरी ने मिलकर डेवलप किया है।

यह सिस्टम रैम-एयर कैनोपी डिजाइन पर बेस्ड है, जो इसे हवा में बहुत अधिक दूरी तय करने की क्षमता देता है। यह पैराशूट जवान और उसके इक्विपमेंट सहित लगभग 150 किलो वजन संभाल सकता है और लगभग 4 से 6 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से नीचे उतरता है।

इसमें ऑक्सीजन सिस्टम, जीपीएस नेविगेशन, और -45°C तक के तापमान में काम करने की क्षमता है। सिस्टम को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह सैनिकों को दुश्मन की सीमा के अंदर 40 किलोमीटर तक ग्लाइड करने की क्षमता देता है, यानी वे बिना दुश्मन के रडार में आए दूर तक प्रवेश कर सकते हैं।

3,000 से 6,000 फीट की ऊंचाई पर खुलते हैं पैराशूट

दुनिया के अधिकांश देशों की सेनाएं हेलो (हाई एल्टीट्यूड लो ओपनिंग) और हाहो (हाई एल्टीट्यूड हाई ओपनिंग) तकनीक का इस्तेमाल करती हैं। आमतौर पर, सैनिक 25,000 से 35,000 फीट की ऊंचाई से जंप करते हैं, लेकिन पैराशूट को केवल 3,000 से 6,000 फीट की ऊंचाई पर खोला जाता है ताकि दुश्मन के रडार से बचा जा सके।

लेकिन भारत का यह मिशन अलग है, इसमें पैराशूट को 30,000 फीट पर खोला गया, जो अब तक किसी भी देश ने नहीं किया। इस ऊंचाई पर हवा बहुत पतली होती है, तापमान -45°C तक गिर जाता है और ऑक्सीजन की मात्रा बेहद कम हो जाती है। ऐसे में पैराशूट का स्थिर खुलना और सुरक्षित रूप से नीचे आना एक बहुत बड़ी तकनीकी चुनौती थी। डीआरडीओ ने इसके लिए एडवांस ऑक्सीजन प्री-ब्रीदर सिस्टम बनाया है जो 20,000 फीट से ऊपर जंपर को 30 मिनट तक ऑक्सीजन देता है।

साथ ही, एमसीपीएस पैराशूट में एक खास डिजिटल रेडियो फ्रीक्वेंसी मेमोरी तकनीक लगाई गई है, जो सिग्नल इंटरफेरेंस को कम करती है और हवा में स्थिरता बनाए रखती है। वहीं, बेंगलुरु की डिफेंस बायोइंजीनियरिंग ने बायो-सूट्स बनाया है, जो पैरा जंपर को ठंड और “डी-कंप्रेशन” जैसी समस्याओं से बचाते हैं।

IAF World Record: ये हैं रिकॉर्ड

अमेरिकी वायुसेना के जो किटिंगर ने 1960 में 102,800 फीट की ऊंचाई से छलांग लगाई थी, लेकिन उनका पैराशूट लगभग 18,000 फीट पर खुला था। इसी तरह 2014 में एलन यूस्टेस और 2012 में फेलिक्स बॉमगार्टनर ने भी हाई एल्टीट्यूड से छलांग लगाई थी, लेकिन उनकी डिप्लॉयमेंट 8,000 से 18,000 फीट के बीच हुई थी।

Special Family Pension: 1965 के वार वेटरन की पत्नी को मिलेगी स्पेशल फैमिली पेंशन, केंद्र सरकार ने अदालत में किया था विरोध

Special Family Pension
Special Family Pension: 1965 War Veteran Widow Wins Special Family Pension as High Court Rejects Govt’s Objection

Special Family Pension: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक आदेश में 1965 के भारत-पाक युद्ध के सैनिक की पत्नी को विशेष पारिवारिक पेंशन देने का फैसला बरकरार रखा है। मामला हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के रहने वाले स्वर्गीय चंद्रमणि से जुड़ा है। वे 1964 में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे, लेकिन 1965 के युद्ध में लगी शारीरिक और मानसिक चोटों के चलते उन्हें 1968 में “सर्विस नो लॉन्जर रिक्वायर्ड” (सेवा की अब जरूरत नहीं) कहकर समय से पहले ही सेना से हटा दिया गया था। गंभीर चोटों और मानसिक तनाव के चलते 24 मार्च 1987 को उनका निधन हो गया।

Commutation of Pension: 15 साल की रिकवरी पॉलिसी के खिलाफ एकजुट हुए पूर्व सैनिक, पेंशन कम्यूटेशन के नियमों पर फिर से हो विचार

उनकी पत्नी मिन्नी देवी (उर्फ मुन्नी) ने अपने दिवंगत पति के लिए विकलांगता पेंशन और उसके बाद परिवारिक पेंशन का दावा किया था। जुलाई 2023 में चंडीगढ़ की आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल ने मिन्नी देवी को सामान्य पारिवारिक पेंशन (आर्डिनरी फैमिली पेंशन) देने का आदेश दिया था। लेकिन केंद्र सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए दलील दी कि यह दावा “बहुत देर से” किया गया है, क्योंकि जवान की मौत कई साल पहले ही हो चुकी थी।

Special Family Pension: “सरकार का दायित्व है कि वह अधिकार दे, न कि छीने”

मामला पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के सामने गया। जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस विकास सूरी ने केंद्र सरकार की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि चंद्रमणि को 1965 के युद्ध में लगी चोटों के चलते ही नौकरी से हटाया गया था, इसलिए उन्हें विकलांगता पेंशन मिलनी चाहिए थी।

अदालत ने कहा, “यह स्पष्ट है कि मिन्नी देवी के पति की रिहाई 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान लगी चोटों की वजह से हुई थी। इसलिए उनकी मृत्यु के बाद पत्नी को विशेष पारिवारिक पेंशन दी जानी चाहिए थी।” अदालत ने यह भी कहा कि ट्रिब्यूनल ने गलती से सामान्य पेंशन दी, जबकि उन्हें विशेष पेंशन का हक था।

नौकरी से हटाने की प्रक्रिया पर भी उठे सवाल

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सैनिक को “सर्विस नो लॉन्जर रिक्वायर्ड” लिखकर हटा देना मनमाना और अनुचित कदम था। यह स्पष्ट था कि वह अपनी ड्यूटी करने में असमर्थ थे क्योंकि उन्होंने देश की रक्षा करते हुए गंभीर चोटें झेली थीं।

बेंच ने कहा कि ऐसे मामले में यह सरकार का नैतिक और कानूनी दायित्व बनता है कि वह सैनिक और उसके परिवार को सभी हकदार लाभ दे।

अदालत ने कहा कि “सामान्य पेंशन केवल उन सैनिकों को मिलती है जो बिना विकलांगता के सेवा से सेवानिवृत्त होते हैं, जबकि चंद्रमणि को 1965 के युद्ध में शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की चोटें आई थीं। ऐसे में उनके परिवार को विशेष पारिवारिक पेंशन पूरी तरह उचित है।”

कब दी जाती स्पेशल फैमिली पेंशन

  • यदि सैनिक की मौत सेवा के दौरान हुई हो, जैसे दुश्मन की कार्रवाई, आतंकवादी हमला, एंटी-टेरर ऑपरेशन, युद्ध, माइन-क्लियरिंग मिशन या किसी शांति मिशन में।
  • यदि सैनिक की मौत सेवा से जुड़ी दुर्घटना, चोट या बीमारी के कारण हुई हो। इसमें प्रशिक्षण के दौरान हुई घटनाएं, वाहन दुर्घटनाएं या प्राकृतिक आपदाएं भी शामिल हैं।
  • यदि सैनिक की मौत रिटायरमेंट के बाद होती है, लेकिन वह चोट या विकलांगता सेवा के दौरान लगी थी, तो पत्नी या परिवार को स्पेशल फैमिली पेंशन का अधिकार मिलता है।

हालांकि अगर मौत पूरी तरह सेवा-असंबंधित कारणों से हुई है, जैसे सामान्य बीमारी या प्राकृतिक कारण, तो केवल सामान्य फैमिली पेंशन दी जाती है।

स्पेशल फैमिली पेंशन का लाभ सैनिक के आश्रित परिवार को दिया जाता है। पात्रता का क्रम निम्न प्रकार से होता है —

  • सबसे पहले विधवा या विधुर को पेंशन दी जाती है, जो जीवनभर या पुनर्विवाह होने तक जारी रहती है।
  • अगर विधवा नहीं है, तो बच्चे (बेटा या बेटी) पात्र होते हैं। बच्चों को 25 वर्ष की आयु तक या शादी/आय शुरू होने तक यह पेंशन मिलती है।
  • अगर बच्चे भी नहीं हैं, तो माता-पिता को पेंशन दी जाती है, बशर्ते वे सैनिक पर निर्भर हों और उनकी मासिक आय 2,550 रुपये से कम हो।इसके अलावा, कुछ मामलों में निर्भर भाई-बहन को भी 25 वर्ष की आयु तक पेंशन दी जा सकती है।

पेंशन की राशि कितनी होती है

  • स्पेशल फैमिली पेंशन की दर अंतिम प्राप्त वेतन का 60 फीसदी होती है। वर्तमान नियमों के अनुसार, न्यूनतम 9,000 रुपये प्रति माह पेंशन दी जाती है और अधिकतम की कोई सीमा नहीं है।
  • इसके अलावा, डियरनेस रिलीफ भी जोड़ा जाता है, जो मुद्रास्फीति के अनुसार समय-समय पर बढ़ता है।
  • पेंशनधारकों को वन रैंक वन पेंशन योजना के तहत समान रैंक और सेवा अवधि के अनुसार समान पेंशन दी जाती है, जिसे हर 5 साल में संशोधित किया जाता है।
  • विशेष मामलों में, जैसे युद्ध या अत्यधिक जोखिम वाले इलाकों में हुई मृत्यु, लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन भी दी जाती है, जो 60 से 100 प्रतिशत तक हो सकती है।

Pakistan Nankana Sahib: ननकाना साहिब यात्रा पर गए हिंदुओं को पाकिस्तान ने लौटाया, बोला- सिर्फ सिखों को मिलेगी एंट्री

Pakistan Nankana Sahib
Pakistan Denies Entry to Indian Hindus Visiting Nankana Sahib with Sikh Jatha

Pakistan Nankana Sahib: गुरु नानक देव जी के जन्मोत्सव पर पाकिस्तान का दोहरा रवैया सामने आया है। पाकिस्तान ने 12 हिंदू श्रद्धालुओं को सीमा से ही वापस लौटा दिया। ये सभी श्रद्धालु सिख जत्थे के साथ ननकाना साहिब गुरुद्वारे में माथा टेकने जा रहे थे। भारतीय श्रद्धालुओं ने आरोप लगाया है कि उनके पास सभी वैध दस्तावेज मौजूद थे, फिर भी पाकिस्तानी अधिकारियों ने उन्हें सीमा पार नहीं करने दी।

Trump Pakistan Nuclear Bluff: ट्रंप हर बार फंस जाते हैं पाकिस्तान के परमाणु झांसे में, पीएम मोदी तो पहले ही कर चुके हैं बेनकाब

यह घटना उस समय हुई जब भारत-पाकिस्तान के बीच कुछ महीनों पहले हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बना हुआ है। इस जत्थे को भारत सरकार ने विशेष अनुमति दी थी ताकि श्रद्धालु गुरु नानक देव जी के 556वें प्रकाश पर्व पर पाकिस्तान जाकर दर्शन कर सकें। यह पहला जत्था था जिसे ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान भेजा गया।

Pakistan Nankana Sahib: सिर्फ सिखों को मिली इजाजत

मिली जानकारी के अनुसार, करीब 2,100 भारतीय श्रद्धालुओं को यात्रा की अनुमति दी गई थी, जिनमें से लगभग 1,900 लोग वाघा बॉर्डर के रास्ते पाकिस्तान में दाखिल हुए। लेकिन जैसे ही ये जत्था पाकिस्तानी इमिग्रेशन काउंटर पर पहुंचा, अधिकारियों ने 12 श्रद्धालुओं को रोक लिया। इनमें सभी हिंदू थे और वे दिल्ली और लखनऊ से आए थे।

दिल्ली के निवासी अमर चंद अपने परिवार के साथ यात्रा पर थे, उन्होंने बताया, “हम सिख जत्थे के साथ दर्शन के लिए जा रहे थे। हमारे पास सभी कागजात थे, लेकिन पाकिस्तानी अधिकारी ने कहा– ‘आप हिंदू हैं, इस जत्थे में क्या कर रहे हैं?’ फिर हमें वापस भेज दिया गया।”

श्रद्धालुओं का कहना है कि न केवल उन्हें यात्रा से रोका गया बल्कि उन्होंने जो बस किराया दिया था, उसका पैसा भी नहीं लौटाया गया। एक भारतीय खुफिया अधिकारी ने बताया कि पाकिस्तान का यह कदम पूरी तरह से “अभूतपूर्व” है और भविष्य में ऐसा करतारपुर कॉरिडोर के श्रद्धालुओं के साथ भी हो सकता है।

Pakistan Nankana Sahib
Pakistan Nankana Sahib

पाकिस्तान का यह रवैया गलत

भारत सरकार ने पाकिस्तान के इस व्यवहार पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। सरकारी सूत्रों ने कहा, “जब कोई देश विदेशी श्रद्धालुओं की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाता, तो इस तरह की यात्राएं व्यर्थ हो जाती हैं।” अधिकारियों ने कहा कि जिन लोगों को लौटाया गया, वे सामान्य नागरिक और श्रद्धालु थे, न कि किसी राजनीतिक दल से जुड़े लोग।

सूत्रों ने बताया, “इन लोगों को बिना किसी वजह के परेशान किया गया और अपमानित किया गया। यह मानवीय संवेदनशीलता के खिलाफ है और दोनों देशों के बीच लोगों के आपसी संबंधों की भावना को कमजोर करता है।”

ननकाना साहिब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित वह पवित्र स्थान है जहां सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ था। हर साल भारत से हजारों श्रद्धालु वहां जाते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान का रवैया लगातार खराब हो रहा है।

भारत की बार-बार की अपील के बावजूद पाकिस्तान करतारपुर कॉरिडोर से जाने वाले हर भारतीय श्रद्धालु से 20 अमेरिकी डॉलर की फीस वसूलता है। स्थानीय श्रद्धालुओं से यह शुल्क नहीं लिया जाता। इस नीति की भारत ने कई बार निंदा की है।

2018 में भी भारत ने अपने राजनयिक अधिकारियों के साथ हुए दुर्व्यवहार पर कड़ा विरोध जताया था। उस समय भारत के दूतावास के अधिकारियों को गुरुद्वारा ननकाना साहिब और सच्चा सौदा में प्रवेश नहीं दिया गया था, जबकि उन्हें पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय से अनुमति मिली हुई थी।

भारत ने कई बार पाकिस्तान पर आरोप लगाया है कि वह धार्मिक यात्राओं के नाम पर राजनीतिक और सांप्रदायिक एजेंडा चलाने की कोशिश करता है। भारतीय अधिकारियों ने कहा कि पाकिस्तान अक्सर सिख यात्राओं के दौरान प्रो-खालिस्तान बैनर लगाता है और भारत विरोधी नारेबाजी को बढ़ावा देता है।

इस बार भी पाकिस्तान का यह फैसला जानबूझकर हिंदू समुदाय को अपमानित करने और भारत के भीतर सांप्रदायिक असहमति पैदा करने का प्रयास माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान इस तरह की घटनाओं से धार्मिक एकता को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है, जबकि दोनों देशों के लोग धार्मिक स्थलों को शांति और सम्मान का प्रतीक मानते हैं।

भारत-पाक संबंधों में बढ़ा तनाव

यह घटना ऐसे समय हुई है जब भारत और पाकिस्तान के बीच राजनयिक संपर्क पहले से ही सीमित हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने कई बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ बयान दिए हैं। वहीं, भारत ने आतंकवाद और सीमा पार हिंसा को लेकर पाकिस्तान की कड़ी आलोचना की है।

भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि पाकिस्तान का यह व्यवहार “न केवल अस्वीकार्य है बल्कि यह द्विपक्षीय संबंधों की भावना के खिलाफ है।” भारत ने मांग की है कि भविष्य में इस तरह की घटनाएं न हों और श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

स्पष्टीकरण: जिन 14 लोगों को पाकिस्तान में प्रवेश नहीं करने दिया गया, वे सभी पाकिस्तानी मूल के हिंदू थे। पाकिस्तान ने भारत से गए हिंदू तीर्थयात्रियों को ननकाना साहिब जाने की अनुमति दी है, लेकिन पाकिस्तानी मूल के हिंदुओं, जिन्होंने अब भारतीय पासपोर्ट ले लिया है, उन्हें सीमा पार करने की अनुमति नहीं दी गई।

With agency inputs.

Operation Khanpi: मणिपुर में सेना का बड़ा अभियान, प्रतिबंधित यूनाइटेड कुकी नेशनल आर्मी के चार आतंकी ढेर

Operation Khanpi

Operation Khanpi: मणिपुर के चुराचांदपुर जिले के खानपी-हेंगलेप क्षेत्र में सुरक्षा बलों ने एक बड़ी कार्रवाई में प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन यूनाइटेड कुकी नेशनल आर्मी (यूकेएनए) के चार सशस्त्र कैडरों को मार गिराया। यह कार्रवाई 4 नवंबर की सुबह खुफिया जानकारी के आधार पर चलाई गई थी।

Manipur M4 Rifle Recovery: कश्मीर के बाद अब मणिपुर में उग्रवादियों से बरामद हुई M4 असाल्ट राइफल, पूर्वोत्तर में अशांति फैलाने की बड़ी तैयारी

अधिकारियों के मुताबिक, यूकेएनए हाल के दिनों में हिंसा और जबरन वसूली की कई घटनाओं में शामिल रहा है। संगठन ने हेंगलेप इलाके में एक ग्राम प्रधान की हत्या की थी और स्थानीय लोगों, स्कूलों व वित्तीय संस्थानों से 5 से 50 लाख रुपये तक की वसूली की कोशिश की थी। यूकेएनए उन कुकी और जोमी गुटों में शामिल नहीं है जो केंद्र और राज्य सरकार के साथ शांति समझौते में हैं।

सेना और असम राइफल्स की संयुक्त टीम ने सुबह करीब साढ़े पांच बजे सशस्त्र उग्रवादियों की गतिविधि का पता लगाया और उन्हें आत्मसमर्पण के लिए कहा। लेकिन जवाब में यूकेएनए के कैडरों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें सुरक्षा बलों के तीन जवान घायल हुए। जवाबी कार्रवाई में चार उग्रवादी मारे गए।

सुरक्षा बलों ने मौके से एक 7.62 मिमी सेल्फ-लोडिंग राइफल, एक एके-56, एक एमए4 एमके-II राइफल, एक अंडर-बैरल ग्रेनेड लॉन्चर, गोला-बारूद और अन्य हथियार बरामद किए। तलाशी अभियान के दौरान असम राइफल्स की एक टुकड़ी ने यूकेएनए का एक अस्थाई कैंप भी नष्ट किया, जहां से बुलेटप्रूफ जैकेट, कम्यूनिकेशन इक्विपमेंट और काफी संख्या में हथियार भी बरामद हुए।

Ex Trishul-Poorvi Prachand Prahar: टू फ्रंट वॉर की तैयारी! पूर्वी मोर्चे पर ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ और पश्चिम में ‘त्रिशूल’, दो मोर्चों से भारत ने दिया बड़ा संदेश

Ex Trishul-Poorvi Prachand Prahar

Ex Trishul-Poorvi Prachand Prahar: भारतीय सेनाएं एक बार फिर अपनी जॉइंटनेस का प्रदर्शन करने के लिए तैयार हैं। अरुणाचल प्रदेश के मेचुका क्षेत्र में 11 नवंबर से तीनों सेनाओं का एक बड़ा संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ शुरू हो रहा है। यह अभ्यास 15 नवंबर तक चलेगा और इसमें भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना एक साथ हिस्सा ले रहे रही हैं।

Exercise Poorvi Prachand Prahar: अरुणाचल प्रदेश में चीन से सटी सीमा पर तीनों सेनाएं करेंगी एक्सरसाइज, मेचुका की पहाड़ियों में ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ शुरू

यह कवायद ऐसे समय में हो रही है जब पश्चिमी सीमा पर राजस्थान और गुजरात के इलाकों में ट्राई सर्विस एक्सरसइज ‘त्रिशूल’ जारी है। इसमें भी तीनों सेनाएं एक साथ हिस्सा ले रही हैं। इन दोनों अभ्यासों का उद्देश्य भारत की मिलिट्री ‘थिएटर कमांड’ के कॉन्सेप्ट को जमीन पर उतारना और दोनों मोर्चों चीन और पाकिस्तान को एक स्पष्ट रणनीतिक संदेश देना है कि भारत अब किसी भी स्थिति के लिए तैयार है। ये अभ्यास ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना की इंटीग्रेटेड ट्राई सर्विस क्षमताओं को मजबूत करने के लिए उठाए गए हैं।

एक्सरसाइज पूर्वी प्रचंड प्रहार: चीन को ललकार

अरुणाचल प्रदेश का मेचुका इलाका जो वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से मात्र 30 किलोमीटर दूर है, हमेशा से चीन की नजरों में रहा है। बीजिंग द्वारा ‘दक्षिण तिब्बत’ का दावा करने वाले इस क्षेत्र में आसापिला, लोंगजू, बिसा, मझा, तुलुंग-ला और यांग्त्से जैसे छह विवादित क्षेत्र हैं, जबकि फिशटेल 1 और 2, थाग ला और डिचू जैसे चार बेहद संवेदनशील जोन हैं। 1962 की जंग के बाद से यह इलाका रणनीतिक तौर पर बेहद अहम है। चीन इस पूरे राज्य अरुणाचल प्रदेश को अपना इलाका बताता है और इसे “दक्षिणी तिब्बत यानी जांगनान कहता है।

इस इलाके में ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ एक्सरसाइज शुरू होने जा रही है जो 11-15 नवंबर तक चलेगी। इस अभ्यास में भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना एक साथ मिलकर ऊंचाई वाले इलाकों में लॉजिस्टिक चेन, सिचुएशनल अवेयरनेस और नेटवर्क्ड कमांड एंड कंट्रोल का परीक्षण करेंगे। अभ्यास में लॉन्ग-रेंज मैरीटाइम रिकॉनिसेंस एयरक्राफ्ट, आर्म्ड हेलीकॉप्टर, यूएवी (अनमैन्ड एरियल व्हीकल्स), लॉयटरिंग म्यूनिशंस और स्पेस-बेस्ड एसेट्स का इस्तेमाल किया जाएगा। यह अभ्यास 2023 के ‘भाला प्रहार’ और 2024 के ‘पूर्वी प्रहार’ का विस्तार है।

ईस्टर्न कमांड के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कर्नल महेंद्र रावत के अनुसार, यह अभ्यास भारत की तीनों सेनाओं के बीच ऑपरेशनल तालमेल, मल्टी-डोमेन वॉरफेयर और इंटीग्रेटेड ज्वॉइंट ऑपरेशन की क्षमता को परखने के लिए आयोजित किया जा रहा है। इस अभ्यास का मुख्य फोकस जमीन, हवा और समुद्र तीनों क्षेत्रों में एक साथ काम करने की तैयारियों को जांचना है।

रावत के अनुसार, इस अभ्यास में स्पेशल फोर्सेज, मार्कोस, अनमैन्ड प्लेटफॉर्म्स, प्रिसिजन वेपन्स और नेटवर्क्ड ऑपरेशन सेंटर्स का इस्तेमाल किया जाएगा। यह सब कुछ हाई एल्टीट्यूड वाले कठिन इलाकों में किया जाएगा, ताकि वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में सेनाओं की क्षमता की परख हो सके।

चीन सीमा पर भारत की तैयारी

‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ को भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत चीन सीमा पर सर्विलांस, मोबिलिटी और डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर को लगातार मजबूत किया जा रहा है।

हाल के महीनों में चीन ने एलएसी के पार ल्हुंजे एयरबेस में 36 एयरक्राफ्ट शेल्टर्स, नए प्रशासनिक ब्लॉक्स और रनवे डेवलप किए हैं, जो भारत के लिए चिंता का विषय हैं। पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ (सेवानिवृत्त) ने कहा था कि इन निर्माणों से साफ है कि चीन भविष्य के किसी भी टकराव में अपने लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टर वहीं से ऑपरेट करेगा।

एक्सरसाइज त्रिशूल: पाकिस्तान को चेतावनी

पूर्वी मोर्चे के साथ-साथ, भारतीय सेनाओं ने पश्चिमी सीमा पर ‘त्रिशूल’ सैन्य अभ्यास की शुरुआत की है। ‘त्रिशूल 2025’ अभ्यास 30 अक्टूबर से 10 नवंबर तक राजस्थान और गुजरात की सीमाओं पर चल रहा है। नौसेना की अगुवाई में थलसेना और वायुसेना के साथ मिलकर यह अभ्यास सर क्रीक क्षेत्र के पास हो रहा है, जहां पाकिस्तान ने हाल ही में तेल-गैस भंडारों की खोज के दावों के साथ गतिविधियां बढ़ाई हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में सर क्रीक में किसी भी साहसिक कदम के खिलाफ कड़ी चेतावनी दी थी, और यह अभ्यास उसी का परिणाम है।

Exercise Trishul: 12 दिन तक चैन की नींद नहीं सो पाएगा पाकिस्तान, भारत ने सर क्रीक के पास शुरू की ट्राई सर्विसेज एक्सरसाइज

इस अभ्यास में टी-90 बैटल टैंक्स, ब्रह्मोस और आकाश मिसाइल सिस्टम्स, प्रचंड अटैक हेलीकॉप्टर, राफेल जेट्स, सुखोई-30 एमकेआई, मिग-29के और आर्टिलरी यूनिट्स शामिल हैं। 28,000 फीट ऊंचे कॉरिडोर में ‘शूट-एंड-स्कूट’ स्ट्राइक्स का अभ्यास हो रहा है, जो पाकिस्तानी रडार की नजर में है।

रक्षा मंत्रालय ने बताया कि यह अभ्यास तीनों सेनाओं के बीच ऑपरेशनल प्रोसीजर, कमांड एंड कंट्रोल, और नेटवर्क इंटीग्रेशन को बेहतर बनाने के लिए किया जा रहा है। इस दौरान सेनाएं लाइव फायरिंग ड्रिल्स, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम्स और संयुक्त संचार प्रणालियों का परीक्षण कर रही हैं।

नौसेना संचालन महानिदेशक वाइस एडमिरल एएन प्रमोद ने बताया कि त्रिशूल अभ्यास का मुख्य उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच इंटर-सर्विस कोऑर्डिनेशन और टेक्नोलॉजिकल इंटीग्रेशन को मजबूत करना है। उन्होंने इसे एक मल्टी-डोमेन ऑपरेशन बताया, जिसमें साइबर और स्पेस वारफेयर भी शामिल है।

वहीं, पाकिस्तान ने भी अरब सागर में फायरिंग ड्रिल्स के लिए नोटाम और नेवेरिया चेतावनियां जारी की हैं, जो आंशिक रूप से ‘त्रिशूल’ से ओवरलैप करती हैं।

थिएटर कमांड का ट्रायल!

‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ थिएटर कमांड व्यवस्था को लागू करने की दिशा में एक अहम अभ्यास माना जा रहा है। इस व्यवस्था के तहत, एक ही कमांड के तहत सेना, नौसेना और वायुसेना के यूनिट्स एक साथ किसी विशेष क्षेत्र या ऑपरेशन में काम करेंगे।

इस अभ्यास के जरिए यह जांचा जा रहा है कि तीनों सेनाएं एक साथ कितनी सहजता और सटीकता से संयुक्त कार्रवाई कर सकती हैं। इसमें कमांड और कंट्रोल स्ट्रक्चर, कम्युनिकेशन नेटवर्क, और हथियार प्रणालियों की कार्यक्षमता की भी समीक्षा होगी। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह अभ्यास भारत की सेनाओं की ‘जॉइंटनेस’ और इंटरऑपरेबिलिटी को और मजबूत करेगा।

दो मोर्चों पर रणनीतिक संदेश

‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ और ‘त्रिशूल’ दोनों ही अभ्यास ऑपरेशन सिंदूर के बाद आयोजित किए जा रहे हैं। इस साल मई में भारत ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान और पीओके में मौजूद नौ आतंकी ठिकानों पर सटीक हवाई हमले किए थे। उस ऑपरेशन ने भारतीय सेनाओं ने दुनिया के सामने साबित किया और यह दिखाया कि भारत किसी भी खतरे का जवाब देने के लिए अब देर नहीं करता। अब ये दोनों अभ्यास उस तैयारी का विस्तार हैं, एक पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान के खिलाफ और दूसरा पूर्वी मोर्चे पर चीन के खिलाफ।

भारत के इन दोनों सैन्य अभ्यासों ‘त्रिशूल’ और ‘पूर्वी प्रचंड प्रहार’ को एक साथ आयोजित करने का साफ मतलब है कि भारत अब दो फ्रंट वॉर की स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। पूर्व में चीन के बढ़ते सैन्य निर्माण और पश्चिम में पाकिस्तान की गतिविधियों को देखते हुए यह तैयारी भारत की रणनीतिक सोच का हिस्सा है। भारतीय सेनाओं का यह संयुक्त अभ्यास न केवल पड़ोसी देशों को संदेश देता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि भारत की सैन्य नीति अब “रिएक्टिव” नहीं, बल्कि “प्रोएक्टिव” हो चुकी है।

Swayam Raksha Kavach: DRDO ने शुरू किया तेजस Mk1A के लिए ‘स्वयं रक्षा कवच’ का फ्लाइट ट्रायल, नए 97 जेट्स में होगा इंटीग्रेट

Tejas Mk1A Delivery
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Swayam Raksha Kavach: स्वदेशी तेजस एमके-1ए फाइटर जेट के लिए नए एयरबोर्न इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम का सफल उड़ान परीक्षण शुरू कर दिया है। इस सिस्टम को ‘स्वयं रक्षा कवच’ नाम दिया गया है, जिसे डीआरडीओ ने डेवलप किया है। यह सिस्टम भारतीय वायुसेना के आने वाले तेजस एमके-1ए विमानों में लगाया जाएगा, जो आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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डीआरडीओ ने ‘समन्वय 2025’ इंडस्ट्री समिट के दौरान जानकारी दी कि ‘स्वयं रक्षा कवच’ का डेवलपमेंट 2021 में शुरू हुआ था और फिलहाल इसका परीक्षण एक तेजस एमके-1ए विमान पर किया जा रहा है। परीक्षणों को 2026 के मध्य तक पूरा किया जााना है और इसे वर्ष 2026 के आखिर तक वायुसेना में शामिल किया जाएगा। डीआरडीओ के सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स (सीएबीएस) द्वारा विकसित यह सूट आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर की चुनौतियों का सामना करने के लिए डिजाइन किया गया है।

‘स्वयं रक्षा कवच’ सिस्टम तेजस विमान को दुश्मन के रडार, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक हमलों से बचाने में मदद करेगा। इस सिस्टम में रडार वार्निंग रिसीवर, चाफ और फ्लेयर डिस्पेंसर सिस्टम और जैमर पॉड लगे हैं, जो दुश्मन के रडार सिग्नल को पहचान कर उन्हें जाम कर सकते हैं। यह नया सूट इस साल सितंबर में दिए गए 97 तेजस एमके1ए में लगाया जाएगा।

डीआरडीओ के अधिकारी ने बताया कि यह सिस्टम पहले से मौजूद डी-29 ईडब्ल्यू सूट का एडवांस वर्जन है, जिसे पहले मिग-29 विमानों के लिए बनाया गया था। यह सूट तेजस एमके-1ए के मौजूदा इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम को अपग्रेड करेगा, जिसमें पहले से ही डिफेंस एवियोनिक्स रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (डेयर) द्वारा डेवलप यूनिफाइड इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट (यूईडब्ल्यूएस) शामिल है। यूईडब्ल्यूएस में इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमेजर्स (ईसीएम) और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटरमेजर्स (ईसीसीएम) क्षमताएं पहले से मौजूद हैं, लेकिन एसआरके इनकी क्षमताओं को डिजिटल रेडियो फ्रीक्वेंसी मेमोरी आधारित जामिंग और डिसेप्शन तकनीकों से मजबूत बनाएगा।

नया एसआरके सिस्टम ज्यादा ताकतवर और तेज है। इसमें डिजिटल रेडियो फ्रीक्वेंसी मेमोरी जैसी एडवांस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है, जो दुश्मन के सिग्नल ट्रैकिंग सिस्टम को कन्फ्यूज कर सकती है।

हालांकि स्वयं रक्षा कवच को अभी तक फुल सर्टिफिकेशन (फुल प्रोडक्शन क्लियरेंस) नहीं मिला है। यह सूट अभी फ्लाइट ट्रायल्स की स्टेज में है, जो नवंबर 2025 से शुरू हुए हैं। सेंटर फॉर मिलिट्री एयरवर्थिनेस एंड सर्टिफिकेशन (सेमीलैक) अभी इनकी क्वालिफिकेशन टेस्टिंग कर रही है, और प्रोडक्शन क्लियरेंस की अगले साल जून तक मिलने की उम्मीद है। सूत्रों का कहना है कि स्वयं रक्षा कवच के प्रमुख कंपोनेंट लाइन रिप्लेसेबल यूनिट्स (एलआरयू) की क्वालिफिकेशन टेस्टिंग पूरी होने के बाद ही प्रोडक्शन क्लियरेंस का रास्ता खुलेगा।

सूत्रों का कहना है कि सर्टिफिकेशन में देरी के चलते एचएएल पहले बैच के तेजस एमके-1ए में ‘स्वयं रक्षा कवच’ को इंटीग्रेट नहीं कर पाया। जिसके चलते एचएएल को इजरायली एल्टा-2052 रडार और स्कॉर्पियस ईडब्ल्यू पॉड को चुनना पड़ा। सर्टिफेकशन न होने की वजह से तेजस की डिलीवरी में देरी हुई।

एचएएल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण यह था कि वायुसेना को तय समय पर विमान मिले। जब तक स्वदेशी सिस्टम पूरी तरह प्रमाणित नहीं होते, हम डिलीवरी नहीं कर सकते थे।” वहीं, डीआरडीओ सूत्रों का कहना है कि डीआरडीओ को पुराने तेजस विमानों तक सीमित पहुंच थी, जबकि विदेशी मैन्युफैक्चरर्स को एमके1ए के प्रोटोटाइप्स मिले थे। जिसके चलते वे टेस्टिंग नहीं कर पाए। उनका कहना है कि एचएएल ने “प्रूवन टेक्नोलॉजी” को प्राथमिकता दी।