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Sheikh Hasina slams ICT verdict: शेख हसीना ने आईसीटी के फैसले को बताया साजिश, कहा- लोकतंत्र खत्म करने की कोशिश

Sheikh Hasina slams ICT verdict

Sheikh Hasina slams ICT verdict: ढाका से एक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम में, बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपने खिलाफ आए इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल के फैसले को “साजिश और राजनीतिक बदले की कार्रवाई” बताया है। हसीना ने कहा कि यह फैसला एक “गैर-निर्वाचित और मनमाने” ट्रिब्यूनल ने दिया है, जो मौजूदा अंतरिम सरकार के इशारे पर काम कर रहा है। इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने शेख हसीना को आजीवन कारावास और मौत की सजा सुनाई है।

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हसीना ने पांच पन्नों का विस्तृत बयान जारी करते हुए कहा कि “यह फैसला बांग्लादेश की लोकतांत्रिक आवाज को दबाने और अवामी लीग को खत्म करने की कोशिश है।”

Sheikh Hasina slams ICT verdict: ‘ट्रिब्यूनल ने बिना निष्पक्ष सुनवाई के फैसला सुनाया’

शेख हसीना ने कहा कि इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल एक निष्पक्ष संस्था नहीं है और इसके जरिए विपक्ष को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने साफ कहा, “मेरे खिलाफ लगाए गए सभी आरोप झूठे और मनगढ़ंत हैं। मुझे कोर्ट में अपना बचाव करने या अपनी पसंद के वकील रखने का मौका भी नहीं दिया गया।”

हसीना ने कहा कि ट्रिब्यूनल के ज्यादातर जज और वकील वही हैं जो पहले उनकी पार्टी अवामी लीग का विरोध करते रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि “इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने सिर्फ अवामी लीग के नेताओं को सजा दी है, जबकि चरमपंथी समूहों और अन्य संगठनों के अपराधों की जांच तक नहीं की गई।”

‘डॉ. यूनुस की सरकार ने लोकतंत्र को बंधक बनाया’

पूर्व प्रधानमंत्री ने बांग्लादेश के अंतरिम शासक डॉ. मोहम्मद यूनुस की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि देश की सत्ता “हिंसक, असंवैधानिक और चरमपंथी ताकतों” के हाथों में चली गई है। उन्होंने कहा कि डॉ. यूनुस की सरकार ने “सत्ता हथियाने के लिए अवामी लीग के हजारों कार्यकर्ताओं पर झूठे केस दर्ज किए हैं।”

हसीना ने कहा कि इस सरकार ने बांग्लादेश के लोकतंत्र, मीडिया और न्याय प्रणाली को कमजोर कर दिया है। उनके मुताबिक, “यूनुस सरकार के दौरान पुलिस पीछे हट गई, कानून व्यवस्था चरमरा गई और महिलाओं तथा अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ गए। पत्रकारों को जेल में डाला गया और उनकी आवाज दबाई गई।”

‘मासूम नागरिकों को निशाना बनाया गया’

अपने बयान में हसीना ने जुलाई और अगस्त 2024 की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि उस दौरान देश में हिंसा और अराजकता फैली थी, लेकिन “सरकार ने नागरिकों की सुरक्षा के लिए काम किया, किसी के खिलाफ साजिश नहीं की।” उन्होंने कहा कि उनके आदेश पर किसी प्रदर्शनकारी की हत्या नहीं की गई और न ही किसी को जानबूझकर निशाना बनाया गया।

हसीना ने कहा कि उस समय स्थिति नियंत्रण से बाहर थी, लेकिन इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है। उन्होंने कहा कि “सरकारी इमारतें, थाने और अन्य कार्यालय प्रदर्शनकारियों द्वारा जलाए गए, लेकिन इसका दोष मुझ पर लगाया गया।”

‘अवामी लीग को खत्म करने की अंतरराष्ट्रीय साजिश’

पूर्व प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि अंतरिम सरकार और उसके सहयोगी संगठनों ने अवामी लीग को राजनीतिक रूप से खत्म करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर झूठ फैलाया है। उन्होंने कहा कि इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल का नाम “इंटरनेशनल” जरूर है, लेकिन इसका कोई अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त चरित्र नहीं है।

उन्होंने कहा, “यह वही अदालत है जिसने कभी युद्ध अपराधियों को सजा देने के नाम पर राजनीतिक विरोधियों को जेल भेजा था। आज वही अदालत मेरे खिलाफ इस्तेमाल की जा रही है ताकि लोकतंत्र की आखिरी आवाज भी बंद की जा सके।”

‘अंतरराष्ट्रीय अदालत में लाए जाएं आरोप’

हसीना ने कहा कि वह चाहती हैं कि यह मामला इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (आईसीसी) में सुना जाए ताकि असली सच सामने आ सके। उन्होंने कहा, “अगर यह सरकार सच बोल रही है, तो उसे आईसीसी में सबूत पेश करने चाहिए। लेकिन उन्हें डर है कि आईसीसी उनके अपने मानवाधिकार हनन को उजागर कर देगा।”

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मीडिया, एनजीओ और आईएमएफ जैसी संस्थाओं का हवाला देते हुए कहा कि “विश्व समुदाय जानता है कि यह पूरा मामला राजनीतिक प्रतिशोध का हिस्सा है।”

‘बांग्लादेश का भविष्य उसके लोगों का है’

अपने बयान के अंत में हसीना ने कहा कि बांग्लादेश की जनता किसी भी झूठी साजिश में नहीं फंसेगी। उन्होंने कहा, “बांग्लादेश का भविष्य उसके लोगों का है, किसी गैर-निर्वाचित सरकार का नहीं। देश को आज आजाद और निष्पक्ष चुनावों की जरूरत है।”

उन्होंने दावा किया कि डॉ. यूनुस और उनकी सरकार ने देश को संकट में डाल दिया है, जबकि अवामी लीग ने हमेशा देश की एकता, धर्मनिरपेक्षता और विकास के लिए काम किया है।

शेख हसीना ने कहा कि उनके शासनकाल में बांग्लादेश ने मानवाधिकार, शिक्षा, बिजली और आर्थिक विकास में ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल कीं। उन्होंने कहा, “हमने रोहिंग्या शरणार्थियों को आश्रय दिया, बिजली और शिक्षा की पहुंच बढ़ाई और 15 साल में 450 फीसदी जीडीपी वृद्धि हासिल की। ये हमारे नेतृत्व की सच्ची पहचान हैं, न कि इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल के झूठे आरोप।”

laser anti drone system: भारतीय सेना और वायुसेना को मिलेंगे 2 किमी रेंज वाले नए स्वदेशी लेजर एंटी-ड्रोन सिस्टम

laser anti drone system
Photo: X/@ajitkdubey

laser anti drone system: भारतीय सेना और भारतीय वायुसेना जल्द ही अपनी एंटी-ड्रोन क्षमता को और मजबूत करने जा रही हैं। दोनों सेनाएं 16 नए स्वदेशी लेजर एंटी-ड्रोन सिस्टम खरीदने की तैयारी में हैं। ये सिस्टम ड्रोन को 2 किलोमीटर की दूरी से लेजर बीम से मार गिरा सकते हैं। रक्षा मंत्रालय इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी देने वाला है, जिसके बाद इन सिस्टम का प्रोडक्शन शुरू हो जाएगा।

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यह नया सिस्टम डीआरडीओ के इंटीग्रेटेड ड्रोन डिटेक्शन एंड इंटरडिक्शन सिस्टम (आईडीडीएस) मार्क-2 का अपडेटेड वर्जन है। इसमें 10 किलोवॉट लेजर बीम लगाई गई है, जो पहले की तुलना में दुश्मन ड्रोन को लगभग दोगुनी दूरी से निशाना बना सकती है। पहले वाले सिस्टम की रेंज करीब 1 किलोमीटर थी, लेकिन मार्क-2 अब 2 किलोमीटर से ड्रोन को नष्ट कर सकता है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किए जाने के बाद इन हाई-टेक सिस्टम की जरूरत और बढ़ गई। इसी को देखते हुए डीआरडीओ ने लेजर-बेस्ड डिफेंस टेक्नोलॉजी पर काम शुरू किया है।

डीआरडीओ ने हाल ही में डायरेक्ट एनर्जी वेपन सिस्टम का सफल परीक्षण भी किया है, जिसकी मारक क्षमता 5 किलोमीटर तक है। यह सिस्टम 30 किलोवॉट लेजर बीम से काम करता है और सेना के साथ मिलकर इसके ट्रायल जारी हैं।

भारत ने इस साल अप्रैल में पहली बार ऐसी लेजर तकनीक दिखाई, जो फिक्स्ड-विंग एयरक्राफ्ट, मिसाइल और स्वॉर्म ड्रोन तक को गिरा सकती है। यह ट्रायल आंध्र प्रदेश के करनूल में किया गया था, जहां चेस लैब ने व्हीकल बेस्ड लेजर वेपन सिस्टम DEW Mk-II (A) का सफल परीक्षण किया था। इस टेस्ट में लेजर ने ड्रोन के स्ट्रक्चर और सेंसर को निशाना बनाया था।

laser anti drone system विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्धों में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है और इसलिए भारत को ऐसे इंटीग्रेटेड ड्रोन डिटेक्शन एंड इंटरडिक्शन सिस्टम की काफी संख्या में जरूरत होगी। डीआरडीओ प्रमुख डॉ. समीर वी. कामत ने कहा था कि संगठन हाई-एनर्जी माइक्रोवेव, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स और कई नई तकनीकों पर भी काम कर रहा है, जो भविष्य में भारत की रक्षा क्षमता को और मजबूत बनाएंगी।

Smartphone Use in Army: सेना में स्मार्टफोन के इस्तेमाल लेकर कही ये बड़ी बात, कहा- रिएक्ट और रेस्पॉन्ड के बीच अंतर को समझना जरूरी

Army Chief Chanakya Defence Dialogue- Operation Sindoor, Border Talks and Theatreization
Army Chief General Updendra Dwivedi in Chanakya Defence Dialogue

Smartphone Use in Army: सेना में फोन के इस्तेमाल को लेकर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी का कहना है कि स्मार्टफोन आज के समय की जरूरत बन गया है, लेकिन साथ ही सैनिकों को सोशल मीडिया पर रिएक्ट और रेस्पॉन्ड के बीच अंतर समझना होगा।

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नई दिल्ली में आयोजित चाणक्य डिफेंस डायलॉग के दौरान जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने सेना में आ रही आज की युवा पीढ़ी डिजिटल है और स्मार्टफोन आज की जरूरत बन गया है। लेकिन साथ ही सैनिकों को सोशल मीडिया पर तत्काल प्रतिक्रिया यानी रिएक्ट और सोची-समझी प्रतिक्रिया यानी रेस्पॉन्ड के बीच अंतर समझना होगा। उन्होंने कहा कि स्मार्टफोन पर पूरी तरह पाबंदी सही नहीं है, बल्कि इस्तेमाल के नियम और जवाब देने का तरीका महत्वपूर्ण है।

सेना प्रमुख ने कहा कि जब युवा एनडीए में आता है तो उसे यह बताने में तीन से छह महीने लगते हैं कि बिना फोन के भी जिंदगी है। उन्होंने कहा कि स्मार्टफोन आज के जमाने की जरूरत है। जब भी मैं जवानों से मिलता हूं तो उन्हें यही बताता हूं स्मार्टफोन निहायत जरूरत है। मैं उसको मना कभी नहीं करता हूं। क्योंकि जब हम लोग फील्ड में रहते हैं, सैनिक जहां पर कहीं पर है वह अगर वह बच्चे की किलकारी देखना चाहता है तो फोन पर ही देखेगा?

जनरल द्विवेदी ने फील्ड में तैनात जवानों के संदर्भ में बताया कि स्मार्टफोन परिवार और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ने का जरिया है। उन्होंने कहा कि सैनिकों को अपने परिवार की चिंता, बच्चों की खबरें और निजी जरूरी काम के लिए फोन की जरूरत होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि फोन का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद रखना व्यावहारिक नहीं होगा क्योंकि इससे जवानों का मनोबल और घरेलू जिम्मेदारियां प्रभावित हो सकती हैं। फिर भी उन्होंने यह भी कहा कि फोन के इस्तेमाल में अनुशासन जरूरी है और जवानों को यह समझना होगा कि क्या तुरंत रिएक्ट करना है और क्या गंभीरता से सोचकर रेस्पॉन्ड करना है।

सेना प्रमुख ने रिएक्ट और रेस्पॉन्ड के फर्क पर जोर देते हुए बताया कि रिएक्ट में अक्सर भावनात्मक और अधूरा संदर्भ रहता है जबकि रेस्पॉन्ड में विश्लेषण और परिपक्वता होती है। उनके शब्दों में, “रिएक्ट वह होता है जिसमें आप तुरंत उत्तर देना चाहते हैं; रेस्पॉन्ड वह है जिसे सोचकर, गंभीरता से विश्लेषित करके दिया जाता है।” उन्होंने कहा कि फौजी भाई-बहनों को ट्विटर आदि प्लेटफॉर्म पर निगरानी की अनुमति दी जा सकती है ताकि वे देख सकें, लेकिन सार्वजनिक रूप से तुरंत जवाब देने से रुका जाए।

Chanakya Defence Dialogue: आर्मी चीफ बोले- 88 घंटे का ट्रेलर था ऑपरेशन सिंदूर, पाकिस्तान मौका देगा तो फिर सिखाएंगे सबक

Army Chief Chanakya Defence Dialogue- Operation Sindoor, Border Talks and Theatreization
Army Chief General Updendra Dwivedi in Chanakya Defence Dialogue

Chanakya Defence Dialogue: सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर एक ट्रेलर की तरह था, जो 88 घंटे में खत्म हुआ। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत किसी भी तरह के स्टेट-स्पॉन्सर्ड आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं करेगा और आतंकियों को सहयोग देने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

Chanakya Defence Dialogue: बातचीत और आतंक साथ नहीं चल सकते

नई दिल्ली में आयोजित चाणक्य डिफेंस डायलॉग के फायरसाइड चैट में सेना प्रमुख ने कहा कि जब कोई देश किसी तरह के आतंकवाद को बढ़ावा देता है तो यह भारत के लिए चिंता का विषय बन जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत विकास की राह पर है और यदि कोई हमारे रास्ते में बाधा खड़ी करता है तो कार्रवाई करना पड़ेगी। जनरल द्विवेदी ने दोहराया कि बातचीत और आतंक साथ नहीं चल सकते और शांतिपूर्ण प्रक्रिया अपनाने तक आतंकवादियों और उनके समर्थन करने वालों को समान रूप से देखा जाएगा। उनके शब्दों में, आज भारत इतना सशक्त है कि किसी भी तरह की ब्लैकमेल की कोशिश से डरता नहीं है।

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ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन 88 घंटे में खत्म हुआ और इस अवधि में जरूरी कार्रवाई पूरी की गई। उन्होंने कहा कि मूवी शुरू भी नहीं हुई थी। सिर्फ एक ट्रेलर दिखाया गया था और ट्रेलर के बाद 88 घंटे में वो ट्रेलर खत्म हो गया था। उन्होंने कहा कि सेना किसी भी परिस्थितियों के लिए हमेशा तैयार रहती है और यदि पाकिस्तान ने दोबारा कोई मौका दिया तो उसे यह सिखाया जाएगा कि पड़ोसी देशों के साथ किस तरह व्यवहार करना चाहिए। जनरल द्विवेदी ने यह बात स्पष्ट की कि सीमापार हिंसा और अशांति का जवाब देना जरूरी हुआ तो वह दिया जाएगा।

भारत-चीन के बीच 1,100 बार बातचीत

सीमा पर भारत-चीन संबंधों पर चर्चा करते हुए जनरल द्विवेदी ने कहा कि अक्टूबर 2024 के बाद दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार दिखा है। उन्होंने जिक्र किया कि 21 अक्टूबर को पूर्वी लद्दाख में हुए समझौते और 24 अक्टूबर को प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक ने माहौल सामान्य बनाने में मदद की। जनरल द्विवेदी ने बताया कि पिछले एक साल में जमीन-स्तर पर करीब 1,100 बातचीत हुई हैं, यानी औसतन रोज तीन इंटरैक्शन हुए हैं। उनके अनुसार यह बातचीत अब कोर कमांडर स्तर से नीचे आकर बटालियन और कंपनी कमांडर स्तर तक पहुंच गई है, जिससे छोटे विवाद वहीं हल होने लगे हैं और मामले फाइलों में फंसकर नहीं रुकते।

Army Chief Chanakya Defence Dialogue- Operation Sindoor, Border Talks and Theatreization
Army Chief General Updendra Dwivedi in Chanakya Defence Dialogue

डिफेंस डिप्लोमेसी को लेकर कही ये बात

डिफेंस डिप्लोमेसी पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि हार्ड पावर और सॉफ्ट पावर के मेल से जो ‘स्मार्ट पावर’ बनती है, वही असली कूटनीति और भरोसा जगाती है। जब सैन्य और कूटनीतिक संपर्क बढ़ते हैं तो ट्रेनिंग, तकनीकी आदान-प्रदान और संयुक्त अभ्यास जैसे क्षेत्रों में सहयोग संभव होता है। जनरल द्विवेदी ने यह भी कहा कि संगीत और सेना दोनों भाषा की बाधा को पार कर देते हैं और इसी तरह सैन्य संपर्क से भी पारस्परिक भरोसा बढ़ता है।

बताया थियेटराइजेशन क्यों है जरूरी

थियेटराइजेशन पर उन्होंने स्पष्ट किया कि यह भौगोलिक आधार पर है और हमारी दो तरफ सीमाएं हैं। और उसके ऊपर हमारी आंतरिक चुनौतियां हैं, उनसे डील करता है। उन्होंने कहा कि अब युद्ध केवल जमीन-हवा-समुद्र तक सीमित नहीं रह गया। साइबर, स्पेस, इन्फोर्मेशन वॉरफेयर और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम जैसे नए डोमेन भी युद्ध के हिस्से बन गए हैं। इसलिए सेना ने अपनी स्ट्रक्चर में बदलाव किए हैं और रुद्र ब्रिगेड जैसे इंटीग्रेटेड सभी हथियारों वाले ब्रिगेड बनाए जा रहे हैं। जनरल द्विवेदी ने बताया कि रुद्र ब्रिगेड में इंफैंट्री, मेकैनाइज्ड यूनिट, टैंक्स, आर्टिलरी, एयर-डिफेंस, इंजीनियर्स और ड्रोन यूनिट सब एक साथ हैं ताकि संयुक्त तौर पर तेज और प्रभावी कार्रवाई हो सके।

उन्होंने कहा कि इंटीग्रेशन का मतलब है कि आर्मी, नेवी, एयरफोर्स, सीएपीएफ, साइबर, स्पेस। जितनी जल्दी इंटीग्रेशन करेंगे उतना हम इस लड़ाई को बड़े साझे ढंग से लड़ सकेंगे क्योंकि आज की लड़ाई जो है वह मल्टी डोमेन है। अगर मैं बोलूं सिर्फ आर्मी अकेले लड़ सकती है, तो नहीं, बल्कि हम सबको मिलकर लड़ना पड़ेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य की लड़ाई में समय की अहमियत बढ़ गई है और यदि कोई अभियान 88 घंटे के भीतर पूरा करना हो, तो देश की सारी ताकत उस थिएटर कमांडर के पास होगी। जनरल द्विवेदी ने बताया कि थिएटर कमांडरों को पूरा दायित्व और संसाधन दिए जाएंगे ताकि निर्णय-निर्माण और क्रियान्वयन में देरी न हो। उनका कहना था कि पहले ऐसे फैसले दिन-रात के बाद लिए जाते थे, अब समय कम है और हर स्तर पर स्वतन्त्रता व जवाबदेही जरूरी है।

मणिपुर में लौट रहा लोगों का भरोसा

मणिपुर की स्थिति पर बात करते हुए जनरल द्विवेदी ने कहा कि वहां स्थिति में सुधार हुआ है और लोगों का भरोसा लौट रहा है। जो 2023 में जो मापदंड थे, जो आज के मापदंड हैं बिल्कुल बदले हो गए हैं। उन्होंने बताया कि 2023 के मुकाबले घटनाओं की संख्या कम हुई है, हथियारों की रिकवरी बढ़ी है और स्थानीय उत्सवों तथा खेल आयोजनों के माध्यम से सामान्य जीवन लौट रहा है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि रेल संपर्क और इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से स्थिति और बेहतर होने की उम्मीद है।

उन्होंने कहा कि मणिपुर में जो हिंसा के मामले लगातार घटते हुए सात से आठ इंसिडेंट पर माह रह गए हैं। उन्होंने कहा बदलाव अभी और भी आएंगे जब आप देखेंगे जब हमारी ट्रेन इंफाल तक आएगी तो वह बदलाव धीरे-धीरे और बढ़ते जाएंगे। उन्होंने कहा, मुझे लग रहा है कि आगे आने वाले दिनों में अगर वहां पर समुदाय के लोग आपस में बैठे और खुद एक सॉल्यूशन निकालना चाहेंगे तो बदलाव जल्दी आएगा।

नेटवर्किंग और डेटा-सेंट्रिसिटी पर काम जारी

जनरल द्विवेदी ने बताया कि सेना ने ‘टेक्नोलॉजी एब्जॉर्प्शन’ का वर्ष घोषित किया और अब नेटवर्किंग व डेटा-सेंट्रिसिटी की ओर काम जारी है। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम, ड्रोन व इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसे क्षेत्रों में टेक्नोलॉजी और मानव संसाधन को साथ जोड़ना प्राथमिकता है। इसके साथ ही आपातकालीन खरीद-प्रक्रियाओं के जरिये जरूरी तकनीक जल्दी लाई जा रही है ताकि ऑपरेशनल गैप्स भरे जा सकें।

Cold Strike Doctrine: पुरानी कोल्ड स्टार्ट रणनीति की जगह सेना अपनाएगी कोल्ड स्ट्राइक डॉक्ट्रिन, जानें सेना ने क्यों लिया यह फैसला?

Cold Strike Doctrine: Rudra Brigade
Lt General Dhiraj Seth, PVSM, AVSM, General Officer Commanding-in-Chief Southern Command

Cold Strike Doctrine: भारतीय सेना अपनी युद्ध रणनीति में एक बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। हाल ही में पाकिस्तान से सटी पश्चिमी सीमा पर ट्राई सर्विसेज एक्सरसाइज त्रिशूल में सेना की हााल ही में गठित नई रुद्र ऑल-आर्म्स ब्रिगेड ने भी अपना कौशल दिखाया था। इसके बाद सेना अब अपनी पुरानी कोल्ड स्टार्ट रणनीति को आगे बढ़ाकर कोल्ड स्ट्राइक डॉक्ट्रिन बनाने की सोच रही है।

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इसके संकेत हाल ही में दक्षिणी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने दिए। उन्होंने कहा कि रुद्र ब्रिगेड का प्रदर्शन पूरी तरह सफल रहा और इसने बड़े स्तर पर अपनी ऑपरेशनल क्षमता साबित की है। यह ब्रिगेड कोनार्क कॉर्प्स के तहत बनाई गई है और इसे ‘अखंड प्रहार’ एक्सरसाइज में परखा गया था।

लेफ्टिनेंट जनरल सेठ के मुताबिक, अब सेना ऐसे समय में पहुंच चुकी है कि कोल्ड स्टार्ट रणनीति से आगे बढ़कर कोल्ड स्ट्राइक रणनीति (Cold Strike Doctrine) को अपनाने के बारे में सोच रही है। उनका कहना था कि रुद्र ब्रिगेड आने वाले समय में मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी और दुश्मन के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करेगी।

कोल्ड स्टार्ट रणनीति की शुरुआत 2001 में संसद पर हुए आतंकी हमले के बाद सेना ने की थी। उसी समय सेना की स्ट्राइक फोर्मेशन को पाकिस्तान सीमा तक पहुंचने में लगभग एक महीना लग गया था, जिससे भारत के तुरंत जवाबी कार्रवाई करने में देरी हुई थी। इस देरी के दौरान पाकिस्तान ने अपने डिफेंस मजबूत कर लिया था। इसके बाद सेना ने यह महसूस किया कि सीमा पर तुरंत कार्रवाई के लिए नई रणनीति की जरूरत है।

Cold Strike Doctrine

पाकिस्तान ने समय-समय पर भारत की कोल्ड स्टार्ट रणनीति (Cold Strike Doctrine) का जवाब अपने नसर शॉर्ट-रेंज न्यूक्लियर मिसाइल के माध्यम से देने की कोशिश की। लेकिन भारत लगातार अपनी क्षमता बढ़ाता रहा और अब रुद्र ब्रिगेड इस दिशा में बड़ा कदम है।

रुद्र ब्रिगेड की खासियत यह है कि इसमें युद्ध के लिए जरूरी हर ब्रांच शामिल है। जैसे इन्फैंट्री, मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री, आर्मर्ड यूनिट्स (टैंक), आर्टिलरी, एयर डिफेंस, इंजीनियर्स, सिग्नल्स, ड्रोन यूनिट्स, सपोर्ट और लॉजिस्टिक्स सब एक ही छतरी के नीचे काम करती हैं।

इस वजह से रुद्र ब्रिगेड हमेशा तैयार रहती है और युद्ध के हालात में बहुत तेजी से आगे बढ़ सकती है। इसका मतलब है कि अब सेना को अलग-अलग यूनिट्स के एक जगह आने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। पूरी ब्रिगेड एक जॉइंट कॉम्बैट यूनिट के तौर पर पहले से तैनात रहेगी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, रुद्र ब्रिगेड का मॉडल पहले चीन सीमा के लिए बनाया गया था। सेना की दो रुद्र ब्रिगेड पहले ही पूर्वी लद्दाख और सिक्किम में तैनात हैं। अब पाकिस्तान मोर्चे के लिए भी रुद्र ब्रिगेड तैयार की गई है, जो त्रिशूल एक्सरसाइज में पहली बार बड़े पैमाने पर शामिल हुई।

इस अभ्यास में रुद्र ब्रिगेड ने मैकेनाइज्ड और इन्फैंट्री मूवमेंट, आर्टिलरी फायरिंग, हेलिबोर्न ऑपरेशन, अटैक हेलिकॉप्टर मिशन और वायुसेना के साथ जॉइंट एक्सरसाइज की। भारतीय वायुसेना के फाइटर ग्राउंड अटैक मिशन भी सेना के इस अभ्यास का हिस्सा थे।

सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, हर रुद्र ब्रिगेड उस इलाके के हिसाब से बनाई जाएगी, जिसमें उसे तैनात किया जाना है। उसके क्षेत्र, भूगोल और ऑपरेशनल जरूरतों को देखकर यूनिट्स को एडजस्ट किया जाएगा। यह ब्रिगेड शांति के समय भी पूरी तरह तैयार रहती है और युद्ध की स्थिति में तुरंत कार्रवाई कर सकती है।

रुद्र ब्रिगेड (Cold Strike Doctrine) को सेना की न्यू जनरेशन फॉर्मेशन बताया जा रहा है। यह अपने साथ भारतीय सेना के भविष्य की रणनीति का रास्ता भी तैयार कर रही है।

INS Mahe Commissioning: भारतीय नौसेना में 24 नवंबर को कमीशन होगी आईएनएस माहे एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट

INS Mahe Commissioning
INS Mahe

INS Mahe Commissioning: भारतीय नौसेना ने पहले माहे क्लास एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट आईएनएस माहे को 24 नवंबर को मुंबई के नेवल डॉकयार्ड में कमीशन करने की तैयारी पूरी कर ली है। यह जहाज माहे क्लास की आठ यूनिट्स में पहली है और इसे 23 अक्टूबर को नौसेना को डिलीवर किया गया था। माहे क्लास उथले पानी में पनडुब्बियों का पता लगाने और उनका मुकाबला करने के लिए डिजाइन की गई है।

INS Mahe Delivery: कोचिन शिपयार्ड ने भारतीय नौसेना को सौंपी पहली एंटी-सबमरीन शैलो वॉटर क्राफ्ट ‘माहे’, करेगी पनडुब्बियों का शिकार

माहे की लंबाई लगभग 78 मीटर और डिस्प्लेसमेंट लगभग 1,100 टन है। यह शैलो वाटर क्राफ्ट 25 नॉट्स तक की रफ्तार दे सकती है और इसका ड्राफ्ट इसलिए कम रखा गया है ताकि यह तटीय और उथले इलाकों में स्वतंत्र रूप से ऑपरेट कर सके। शिप में 80 फीसदी से अधिक इंडिजिनस कंटेंट इस्तेमाल किया गया है।

जहाज में एडवांस्ड सेंसर और हथियार लगे हैं। माहे में हल-माउंटेड सोनार और लो-फ्रीक्वेंसी वेरिएबल डेप्थ सोनार लगे हैं जो पानी के नीचे लक्ष्यों का पता लगाने में सक्षम हैं। इसके साथ ही इसमें टॉरपीडो लॉन्चर, मल्टी-फंक्शनल एंटी-सबमरीन रॉकेट सिस्टम, आधुनिक रडार और फायर-कंट्रोल सिस्टम लगे हैं। माहे में माइन-लेइंग क्षमता और स्टेल्थ खूबियां भी हैं।

माहे-क्लास का नाम भारत के मालाबार तट पर स्थित माहे नामक ऐतिहासिक बंदरगाह से लिया गया है। जहाज के क्रेस्ट में ‘उरुमी’ की फोटो है, जो केरल की पारंपरिक युद्धक तलवार है।

INS Mahe Commissioning

माहे-क्लास की कुल आठ शिपें कोचीन शिपयार्ड बना रहा है जबकि दूसरी कैटेगरी की आठ एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स तैयार कर रहा है। कुल मिलाकर 16 शैलो वाटर क्राफ्ट बनने हैं, जो उत्तरी और पूर्वी तटीय क्षेत्रों में तैनाती के लिए काम आएंगी। माहे क्लास छोटे आकार की होने के बावजूद तुरंत प्रतिक्रिया देने के साथ समुद्री इलाके में अंडरवाटर खतरे से निपटने की क्षमता है।

नौसेना सूत्रों के अनुसार माहे की कमीशनिंग से तटीय सुरक्षा और समुद्री निगरानी का दायरा मजबूत होगा। यह जहाज विशेषकर उन क्षेत्रों में काम देगा जहां बड़े डेस्ट्रॉयर्स और फ्रिगेट्स का जाना मुश्किल होता है। माहे पुराने अभय क्लास कोरवेट्स की जगह भी लेने के लिए तैयार है और यह कोस्टल डिफेंस आपरेशंस को नई क्षमता देगा।

LCA Tejas vs JF-17: दुबई एयरशो में फिर आमने-सामने होंगे भारत का तेजस और पाकिस्तान का जेएफ-17 थंडर, भारत ने लगाया बड़ा इंडिया पवेलियन

LCA Tejas vs JF-17 thunder Dubai Airshow 2025
LCA Tejas and JF-17 Thunder at Dubai Airshow 2025 (X/@connect_rishav

LCA Tejas vs JF-17: दुनिया के सबसे बड़े एविएशन इवेंट्स में से एक दुबई एयरशो 2025 में इस बार फिर भारत और पाकिस्तान के दो प्रमुख लड़ाकू विमान एक ही मंच पर दिखाई देंगे। भारतीय वायुसेना का स्वदेशी एलसीए तेजस और पाकिस्तानी वायुसेना का जेएफ-17 थंडर दुबई में आमने-सामने होंगे। यह दूसरा मौका है जब दोनों फाइटर जेट एक ही एयरशो में हिस्सा लेंगे। इससे पहले ऐसा 2023 में हुआ था।

Dubai Airshow 2025: सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम और LCA तेजस दिखाएंगे दुबई एयरशो में जलवा

एयरशो 17 से 21 नवंबर तक अल मक्तूम इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर आयोजित हो रहा है। इस कार्यक्रम में 100 से अधिक देशों की एयरफोर्स, 1,500 से ज्यादा एग्जीबिटर्स और 200 से अधिक एयरक्राफ्ट हिस्सा ले रहे हैं।

भारतीय वायुसेना की तैयारियां इस बार पहले से ज्यादा मजबूत हैं। वायुसेना ने दुबई में तीन तेजस फाइटर जेट भेजे हैं, जो स्टैटिक और फ्लाइंग डिस्प्ले दोनों में हिस्सा लेंगे। इनके साथ भारत की प्रसिद्ध सूर्यकिरण एरोबैटिक टीम भी पहुंच चुकी है। यह टीम हॉक एमके-132 ट्रेनर जेट्स पर शानदार हवाई करतब दिखाने के लिए मशहूर है। सपोर्ट स्टाफ और उपकरणों को सी-17 ग्लोबमास्टर और सी-130जे सुपर हरक्यूलस विमान से दुबई पहुंचाया है।

तेजस भारत का स्वदेशी एय़रक्राफ्ट है। इसका डिजाइन हल्का है, मैन्यूवरेबिलिटी बेहतरीन है और इसमें आधुनिक एवियोनिक्स लगे हैं। तेजस के एमके-1ए वर्जन में एईएसए रडार, अस्त्र बीवीआर मिसाइल, और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम शामिल हैं। यह 4.5-जेनरेशन का एयरक्राफ्ट है। 2023 के मुकाबले इस बार तेजस की फ्लाइंग परफॉरमेंस और एडवांस तकनीक में बड़ा सुधार देखने को मिलेगा, क्योंकि पिछले एक साल में तेजस मार्क1ए ने कई महत्वपूर्ण अपग्रेड पूरे किए हैं।

वहीं, पाकिस्तान की ओर से जेएफ-17 थंडर इस एयरशो में भाग ले रहा है। माना जा रहा है कि पाकिस्तान इस बार इसका नया ब्लॉक-III वर्जन पेश करेगा। जेएफ-17 को पाकिस्तान और चीन ने संयुक्त रूप से डेवलप किया गया है। इसमें केएलजे-7ए एईएसए रडार और रूसी आरडी-93 इंजन लगा है। कई देशों को पाकिस्तान इसे एक्सपोर्ट करने की कोशिश करता रहा है।

दुबई एयरशो में तेजस और जेएफ-17 का आमना-सामना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों विमान अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी हैं। अर्जेंटीना, मिस्र, मलेशिया और नाइजीरिया जैसे देशों ने दोनों में अपनी रूचि दिखाई है। इस एयरशो दोनों विमानों की वास्तविक क्षमता और फ्लाइंग परफॉर्मेंस को एक ही जगह देखने का मौका मिलेगा।

भारत के रक्षा राज्यमंत्री संजय सेठ इस एयरशो में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं। वे यूएई के नेताओं से मुलाकात करेंगे और एक बड़े इंडस्ट्री राउंड टेबल की अध्यक्षता करेंगे, जिसमें भारत, यूएई, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील और यूरोप की कंपनियां हिस्सा लेंगी। इसका मकसद भारत में रक्षा तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग में सहयोग बढ़ाना है।

LCA Tejas vs JF-17

दुबई एयरशो में भारत ने एक बड़ा इंडिया पवेलियन भी लगाया है, जहां एचएएल, डीआरडीओ, कोरल टेक्नोलॉजीज, डेंटल हाइड्रोलिक्स, इमेज सिनर्जी और एसएफओ टेक्नोलॉजीज जैसी कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स पेश कर रही हैं। इसके अलावा भारत की 19 प्राइवेट कंपनियां जैसे भारत फोर्ज, ब्रह्मोस एयरोस्पेस और टेक महिंद्रा अलग से अपने स्टॉल लगा रही हैं। भारत के 15 स्टार्टअप भी पहली बार इस एयरशो में भाग ले रहे हैं।

इस एयरशो को एविएशन दुनिया में महत्व इसलिए भी मिलता है क्योंकि यहां रुस के सुखोई-57, अमेरिका के एफ-16, बी-52, और बोइंग 777एक्स जैसे बड़े विमान भी देखने को मिलेंगे।

Women soldiers Territorial Army: अगर आप भी वर्दी पहन कर करना चाहती हैं देश की सेवा, तो टेरिटोरियल आर्मी की बटालियंस में महिलाओं की भर्ती का खुला रास्ता

Women soldiers Territorial Army
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Women soldiers Territorial Army: भारतीय सेना ने महिलाओं के लिए एक और नया रास्ता खोल दिया है। पहली बार टेरिटोरियल आर्मी (टीए) यानी प्रादेशिक सेना की कुछ इंफैंट्री बटालियनों में महिला सैनिकों की भर्ती की तैयारी शुरू हो गई है। यह फैसला सेना के लिए एक अहम कदम माना जा रहा है, क्योंकि अब तक महिलाओं को टीए की होम एंड हर्थ बटालियनों में शामिल होने की अनुमति नहीं थी।

Women soldiers Territorial Army: 2025-26 के लिए नए पदों की सूची जारी

टेरिटोरियल आर्मी के डायरेक्टरेट जनरल ने हाल ही में साल 2025-26 के लिए नए पदों की सूची जारी की। इस सूची में पहली बार कुछ टीए की होम एंड हर्थ बटालियनों में “सेक्शन स्ट्रेंथ” के बराबर महिला सैनिकों की भर्ती का प्रावधान किया गया है। एक सेक्शन में आमतौर पर 10 सैनिक होते हैं। यानी, अब एक टीए बटालियन, जिसकी कुल संख्या 750 से 1,000 के बीच होती है, उसमें अलग से एक महिला सैनिकों का सेक्शन भी होगा।

Women in Indian Armed Forces: मोदी राज में नारी शक्ति का पराक्रम; भारतीय सेनाओं में 11 साल में तीन गुना बढ़ी महिलाओं की भागीदारी

टेरिटोरियल आर्मी की होम एंड हर्थ बटालियंस वर्ष 2004-05 में बनाई गई थीं। इनमें कुल 11 बटालियन हैं। इनमें से आठ जम्मू-कश्मीर के लिए और तीन नॉर्थ-ईस्ट के लिए बनाई गई थीं। इन बटालियनों का प्रमुख काम स्थानीय इलाकों की सुरक्षा में मदद करना, इंटेलिजेंस जुटाना, रोड ओपनिंग पार्टी में हिस्सा लेना, आंतरिक सुरक्षा में मदद करना और प्राकृतिक आपदा के समय मदद देना है। चूंकि ये बटालियन स्थानीय नागरिकों से ही बनती हैं, इसलिए इनकी इलाके पर स्वाभाविक पकड़ होती है।

इन बटालियनों में महिला सैनिकों की भर्ती का फैसला कई मायनों में अहम है। आज भी भारतीय सेना में महिलाएं मैन कॉम्बैट ब्रांच जैसे इंफैंट्री, आर्मर्ड कॉर्प्स और मैकेनाइज्ड इंफैंट्री में शामिल नहीं हो सकतीं। हालांकि कुछ कॉम्बैट सपोर्ट शाखाओं में महिला अधिकारी हैं, लेकिन सैनिक के रूप में भर्ती का विकल्प केवल मिलिट्री पुलिस तक ही सीमित है। ऐसे में टेरिटोरियल आर्मी की होम एंड हर्थ बटालियनों में महिलाओं की भर्ती एक नए परिवर्तन की शुरुआत मानी जा रही है।

सेना के अनुसार, शुरुआत में कुछ चुनिंदा बटालियनों में महिला सेक्शन शामिल किए जाएंगे। इसके बाद इसे सभी होम एंड हर्थ बटालियंस बटालियनों तक बढ़ाया जाएगा। आगे चलकर महिला सैनिकों की संख्या भी बढ़ाई जाएगी। यह व्यवस्था पूरी तरह से चरणबद्ध तरीके से लागू होगी, ताकि ट्रेनिंह से लेकर तैनाती तक सब कुछ सुचारू तरीके से हो सके।

टेरिटोरियल आर्मी को नागरिकों की स्वयंसेवी सेना कहा जाता है। इसमें वे लोग शामिल होते हैं जो अपनी सामान्य नौकरी या काम के साथ-साथ समय निकालकर देश की रक्षा में योगदान देना चाहते हैं। टीए की कुल ताकत लगभग 50,000 है। इसमें रेलवे, ओएनजीसी, आईओसी जैसी संस्थाओं की डिपार्टमेंटल टीए यूनिटें शामिल हैं। इसके अलावा इंफैंट्री टीए, होम एंड हर्थ टीए, इकोलॉजिकल बटालियंस, इंजीनियर रेजिमेंट टीए और राष्ट्रीय मिशन फॉर क्लीन गंगा के लिए एक इको टास्क फोर्स भी मौजूद है।

इस वर्ष मई में हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद रक्षा मंत्रालय ने 32 इंफैंट्री टीए बटालियनों में से 14 को एक्टिव करने का फैसला लिया था। इन बटालियनों की तैनाती फरवरी 2028 तक विभिन्न इलाकों में की जाएगी। महिला सैनिकों की भर्ती इसी बड़े बदलाव का हिस्सा है, जो टीए की भूमिकाओं को और मजबूत करेगा।

टीए से जुड़ी एक दिलचस्प बात यह भी है कि इसमें कई जानी-मानी हस्तियां भी शामिल रही हैं या उन्हें ऑनरेरी रैंक दी गई है। इनमें अभिनेता नाना पाटेकर, मोहनलाल, क्रिकेटर एम. एस. धोनी, कपिल देव और ओलंपिक चैंपियन अभिनव बिंद्रा जैसे नाम शामिल हैं। इससे यह भी समझ आता है कि टेरिटोरियल आर्मी न केवल सेना के लिए बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणा का स्रोत रही है।

महिला सैनिकों की टीए में भर्ती की पहल को सेना के व्यापक सुधारों का हिस्सा बताया जा रहा है। सेना का कहना है कि यह कदम न केवल महिलाओं को अधिक अवसर देगा, बल्कि टीए बटालियनों की क्षमता भी बढ़ाएगा। सेना के मुताबिक, महिलाएं पहले से कई महत्वपूर्ण भूमिकाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं और टीए में भर्ती उन्हें नई जिम्मेदारियों के लिए तैयार करेगी।

Women soldiers Territorial Army: टेरिटोरियल आर्मी में “होम एंड हर्थ” क्या होता है?

टेरिटोरियल आर्मी भारतीय सेना की पार्ट-टाइम रिजर्व फोर्स है। इसमें सैनिक अपनी आम नौकरी या बिजनेस करते हुए भी देश की सेवा कर सकते हैं। होम एंड हर्थ बटालियनें टेरिटोरियल आर्मी की खास इन्फैंट्री यूनिट होती हैं। इन्हें एक अनोखे कॉन्सेप्ट पर बनाया गया था, जिसका नाम है “संस ऑफ सोयल” यानी जिस इलाके के लोग हैं, उन्हें उसी इलाके की बटालियन में भर्ती करना। इसका मतलब यह है कि जो जवान जम्मू-कश्मीर, उत्तर-पूर्व या किसी खास क्षेत्र से होते हैं, वही उसी इलाके की टीए होम एंड हर्थ बटालियन में शामिल होते हैं। इससे फायदा यह होता है कि स्थानीय लोग अपने इलाके के हालात, भाषा, रास्ते और माहौल को अच्छी तरह समझते हैं, इसलिए ऑपरेशन ज्यादा प्रभावी तरीके से हो पाते हैं।

जम्मू-कश्मीर में कई होम एंड हर्थ बटालियनों ने आर्मी की मदद की है। उत्तर-पूर्व में भी ये बटालियनें स्थानीय सुरक्षा के काम में लगी हैं। इनका काम रेगुलर आर्मी की फुल-टाइम यूनिटों जैसा नहीं होता, बल्कि इन्हें जरूरत पड़ने पर बुलाया जाता है। इन्हें इंटेलिजेंस जुटाने, रोड ओपनिंग, लोकल गाइडेंस, सुरक्षा ड्यूटी और आपदा की स्थिति में सिविल प्रशासन की मदद जैसे काम दिए जाते हैं।

Women soldiers Territorial Army: क्या मिलते हैं भत्ते या सैलरी?

अब एक बड़ा सवाल यह रहता है कि क्या टेरिटोरियल आर्मी की होम एंड हर्थ में कोई भत्ता या सैलरी मिलती है। टीए पार्ट-टाइम फोर्स है। यहां अधिकांश जवान अपनी असली नौकरी करते रहते हैं और सिर्फ ट्रेनिंग या एम्बॉडीमेंट यानी जब सेना बुलाए तब कुछ समय के लिए फुल-टाइम ड्यूटी करते हैं। चूंकि टीए में रेगुलर आर्मी की तरह बार-बार ट्रांसफर नहीं होते, इसलिए कोई खास ट्रांसफर भत्ता या अलाउंस नहीं मिलता है।

टेरिटोरियल आर्मी में जब जवान ट्रेनिंग या एम्बॉडीमेंट पर होते हैं, तब उन्हें रेगुलर आर्मी की तरह वेतन, डीए, राशन, मेडिकल, कैंटीन सुविधा, लीव और अन्य सामान्य सुविधाएं मिलती हैं। टीए जवानों को कमीशनिंग के समय आउटफिट अलाउंस मिलता है और इंश्योरेंस तथा कुछ अन्य लाभ भी दिए जाते हैं। लेकिन चूंकि टीए एक रिजर्व फोर्स है और पोस्टिंग या ट्रांसफर बहुत सीमित रहते हैं।

India-China LAC Patrolling: कोर कमांडर स्तर की बातचीत में भारत ने उठाई थी फिर से पेट्रोलिंग बहाल करने की मांग, चीन बोला- “और समय चाहिए”

India-China LAC Patrolling

India-China LAC Patrolling: भारत और चीन के बीच लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी पर पिछले पांच साल से पेट्रोलिंग बंद है। जून 2020 में हुए गलवान संघर्ष के बाद से अभी तक पूर्वी लद्दाख में कई जगहों पर पूरी तरह से पेट्रोलिंग बहाल नहीं हो पाई है। गलवाान घटना के बाद तनाव कम करने के लिए दोनों देशों ने कुछ इलाकों में पेट्रोलिंग रोकने का फैसला किया था। इस फैसले को “मोरैटोरियम ऑन पेट्रोलिंग” कहा जाता है।

LAC geo-tagging: लद्दाख में सेना ने पूरी की जियो-टैगिंग, चीन के दावों को गलत बताने के लिए बड़ी तैयारी

अब हाल ही में दोनों देशों के बीच 23वीं कोर कमांडर स्तर की बैठक 25 अक्टूबर को लद्दाख के चुशुल-मोल्डो बॉर्डर पॉइंट पर आयोजित की गई थी। इस उच्च-स्तरीय सैन्य वार्ता में भारत ने इस मुद्दे को दोबारा उठाया है और कहा है कि पेट्रोलिंग बंद रहने से वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सामान्य स्थिति बहाल नहीं हो पा रही है। बातचीत के दौरान भारतीय पक्ष ने साफ कहा कि मोरैटोरियम चार साल पहले अस्थायी रूप से लगाया गया था, लेकिन अब हालात शांत हैं और एलएसी पर कोई बड़ी घटना नहीं हुई है।

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भारतीय पक्ष के अनुसार, विश्वास का माहौल पहले की तुलना में बेहतर है और कई क्षेत्रों में कोई विवाद नहीं बचा है। इसलिए पेट्रोलिंग बहाल की जानी चाहिए। लेकिन चीनी कमांडर ने जवाब दिया कि उन्हें “थोड़ा और समय” चाहिए। सूत्रों का कहना है कि चीन की ओर से जो अधिकारी इस बैठक में शामिल हुए थे, वे हाल ही में नियुक्त हुए हैं और उन्हें अभी अपने हाई कमान से आगे की मंजूरी लेनी है। इसी वजह से उन्होंने तुरंत कोई फैसला नहीं दिया।

India-China LAC Patrolling

एलएसी के जिन इलाकों में पेट्रोलिंग पर रोक है, उनमें पीपी-16, पीपी-17 और पैंगोंग त्सो के उत्तरी तट का बड़ा इलाका शामिल है। पैंगोंग झील करीब 130 किलोमीटर लंबी है और गलवान विवाद के बाद यही क्षेत्र सबसे ज्यादा संवेदनशील माना गया था। पेट्रोलिंग रोकने के बाद इन इलाकों में पिछले कुछ वर्षों में कोई बड़ी घटना नहीं हुई है।

भारत का कहना है कि क्षेत्र में शांति बनी रहने के बावजूद चीनी सेना की कुछ टुकड़ियां एलएसी के पास अब भी मौजूद हैं। हालांकि सूत्रों ने बताया कि चीन की तैनाती पिछले साल की तुलना में थोड़ी कम हुई है। भारतीय पक्ष चाहता है कि पूरी तरह से डीस्‍केलेशन हो और दोनों देशों की सेनाएं अपने–अपने स्थायी बेस पर लौटें।

लद्दाख में भारतीय सेना की मौजूदगी बेहद मजबूत है। यहां सेना की 3 डिविजन और यूनिफॉर्म फोर्स की तैनाती है, जो किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहती है। भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसकी प्राथमिकता सीमा पर स्थिरता और हालात को अप्रैल 2020 से पहले जैसा बनाना है।

भारत–चीन संबंधों में हाल के दिनों में कुछ सकारात्मक संकेत भी देखे गए हैं। मानसरोवर यात्रा दोबारा शुरू हुई है, दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें भी शुरू हुई हैं सात ही, सिक्किम के नाथूला पास वाले व्यापार मार्ग को भी खोला गया है। यह ऐसे कदम हैं जो बताते हैं कि दोनों देश कुछ मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने के इच्छुक हैं। इसके साथ ही बीजिंग में मार्च महीने में डब्ल्यूएमसीसी यानी वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन की बैठक भी हुई थी। दोनों देशों के बीच जल्द ही फिर ऐसी बैठक होने की संभावना जताई जा रही है।

सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एससीओ की बैठक में शामिल होने के लिए हुई चीन यात्रा के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई बातचीत ने भी माहौल को सकारात्मक बनाया है। हालांकि पेट्रोलिंग जैसे मुद्दों पर अभी स्पष्ट सहमति नहीं बनी है, लेकिन दोनों पक्ष बातचीत जारी रख रहे हैं ताकि तनाव दोबारा न बढ़े।

गलवान संघर्ष के बाद भारत ने सीमा पर तेजी से इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास किया है। सड़कें, पुल, सुरंगें और एयरफील्ड लगातार बनाए और अपग्रेड किए जा रहे हैं। हाल ही में भारत ने चीन सीमा से सटे न्योमा एयरफील्ड को भी ऑपरेशन कर दिया है। जहां वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने खुद सी-130जे ट्रांसपोर्ट उड़ा कर उसे वहां लैंड किया। इस एयरफील्ड के ऑपरेशनल होने से भारतीय सेना की तैनाती और लॉजिस्टिक क्षमता काफी मजबूत हुई है।

कुल मिलाकर, India-China LAC Patrolling भारत का रुख साफ है कि पेट्रोलिंग बहाल होनी चाहिए क्योंकि इससे एलएसी पर वास्तविक और स्थायी शांति की दिशा में कदम बढ़ेगा। वहीं, चीन की ओर से “और समय” मांगना बताता है कि बीजिंग फिलहाल हालात का आकलन कर रहा है और आगे के कदम सोच-समझकर उठाना चाहता है।

Explainer DRDO MP-AUV: समझें कैसे समंदर के नीचे बारूदी सुरंगे ढूंढेगा यह स्वदेशी रोबोट, नेवी को मिलेगी बड़ी ताकत

Explainer DRDO MP-AUV

Explainer DRDO MP-AUV: भारत की रक्षा अनुसंधान संस्था DRDO ने भारतीय नौसेना के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण तकनीक डेवलप की है। यह तकनीक समुद्र के नीचे छिपी बारूदी सुरंगों यानी माइन को तेजी से ढूंढ सकती है और उनकी पहचान कर सकती है। इसे एमपी-एयूवी, यानी मैन-पोर्टेबल ऑटोनोमस अंडरवॉटर व्हीकल कहा जाता है। आसान शब्दों में समझें तो यह एक छोटा, स्मार्ट और बेहद हल्का पानी के अंदर चलने वाला रोबोट है, जिसे एक या दो लोग आसानी से उठा सकते हैं और किसी भी जगह समुद्र में उतार सकते हैं।

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Explainer DRDO MP-AUV: डीआरडीओ की लैब ने किया तैयार

इस सिस्टम को डीआरडीओ की विशाखापट्टनम स्थित लैब नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लैबोरेटरी ने बनाया है। डीआरडीओ के मुताबिक यह तकनीक भारत की नौसेना को माइन वारफेयर यानी समुद्र में बिछाई गई माइन से निपटने की क्षमता में बड़ी बढ़ोतरी देगी। समुद्री माइन जहाजों, पनडुब्बियों और बंदरगाहों के लिए खतरनाक साबित हो सकती हैं, इसलिए उन्हें ढूंढना और पहचानना नौसेना की सबसे जरूरी जरूरतों में शामिल है।

Explainer DRDO MP-AUV: लगा है साइड-स्कैन सोनार

डीआरडीओ का यह नया एमपी-एयूवी आधुनिक तकनीकों से लैस है। इसमें साइड-स्कैन सोनार लगा है, जो पानी के भीतर समुद्र की सतह की डिटेल्ड तस्वीरें बनाता है। सोनार का काम “ध्वनि तरंगों” की मदद से आसपास की चीजों की पहचान करना होता है। इसके साथ ही इसमें अंडरवॉटर कैमरा लगा है, जो पानी के नीचे की साफ तस्वीरें भेज सकता है। इन दोनों सेंसरों की मदद से यह रोबोट उन वस्तुओं को खोज लेता है जो समुद्री माइन जैसी दिखती हैं।

 

डीप लर्निंग बेस्ड एआई एल्गोरिदम से लैस

लेकिन इसकी सबसे खास बात है इसमें मौजूद डीप लर्निंग आधारित एआई एल्गोरिदम। ये एल्गोरिदम यानी कंप्यूटर दिमाग रोबोट को यह समझने में सक्षम बनाते हैं कि सामने मिली वस्तु वास्तव में माइन है या नहीं। पहले यह काम नौसेना के ऑपरेटरों को खुद करना पड़ता था, जिसमें काफी समय लगता था। लेकिन अब यह सिस्टम खुद-ब-खुद सही पहचान कर लेता है, जिससे मिशन का समय काफी कम हो जाता है और मानवीय गलती की संभावना भी घट जाती है।

एक टीम की तरह काम कर सकते हैं कई एयूवी – Explainer DRDO MP-AUV

डीआरडीओ ने इस सिस्टम में अंडरवॉटर एकॉस्टिक कम्युनिकेशन यानी पानी के अंदर ध्वनि के जरिए एक-दूसरे से बात करने की क्षमता भी शामिल की है। इससे कई एयूवी एक टीम की तरह काम कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, अगर एक रोबोट को कोई माइन जैसी वस्तु मिलती है, तो वह तुरंत बाकी रोबोट्स को सूचना भेज सकता है। इससे पूरा मिशन सुरक्षित हो जाता है।

पूरी तरह मैन-पोर्टेबल

हाल ही में इस एमपी-एयूवी के साथ किए गए ट्रायल्स डीआरडीओ के विशाखापट्टनम हार्बर में पूरे हुए, जहां सिस्टम को असली समुद्री परिस्थितियों में टेस्ट किया गया। डीआरडीओ ने बताया कि सभी महत्वपूर्ण पैरामीटर सफलतापूर्वक पूरे हुए और सिस्टम ने उम्मीद के अनुसार प्रदर्शन किया।

इस रोबोट की खासियतों में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे पूरी तरह मैन-पोर्टेबल बनाया गया है। यानि यह भारी नहीं है और इसे आसानी से ले जाया जा सकता है। जबकि विदेशी सिस्टम महंगे भी हैं और आकार में बड़े भी। डीआरडीओ का यह सिस्टम इस मामले में भारत के लिए बेहद फायदेमंद होगा क्योंकि यह स्वदेशी है, हल्का है और कम लॉजिस्टिक सपोर्ट की जरूरत पड़ती

है।

डीआरडीओ के चेयरमैन डॉ. समीर वी. कामत ने इस सिस्टम की तारीफ करते हुए कहा कि यह के लिए “एक बड़ा माइलस्टोन” है। उनके मुताबिक, यह सिस्टम नौसेना को कम समय में ज्यादा क्षेत्र में खोजबीन करने की क्षमता देगा और समुद्री सुरक्षा को मजबूत करेगा।

भारत की समुद्री चुनौतियां पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ी हैं। हिंद महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियां, भारतीय जलसीमा के पास विदेशी ड्रोन और सबमरीन की मूवमेंट, तथा बढ़ती समुद्री तस्करी, इन सब परिस्थितियों में समुद्र के नीचे छिपे खतरों को पहचानने वाला यह सिस्टम भारतीय नौसेना के लिए बहुत उपयोगी होगा।

डीआरडीओ ने बताया कि एमपी-एयूवी आने वाले महीनों में उत्पादन के लिए तैयार हो जाएगा। कई इंडस्ट्री पार्टनर्स पहले से ही इसमें शामिल हैं। इसका मतलब है कि यह तकनीक केवल लैब में नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए पूरी तरह तैयार है।