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Pakistan Missile exposed: पाकिस्तान की ‘किलर मिसाइल’ का दावा झूठा, न बताई रेंज और न ही किया स्पीड का जिक्र

Pakistan Missile exposed
Pakistan Claims ‘Hypersonic Carrier Killer’

Pakistan Missile exposed: पाकिस्तान ने हाल ही में एक छोटा वीडियो जारी कर दावा किया कि उसने जहाज से दागी जाने वाली एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया है। वीडियो जारी होते ही पाकिस्तानी सोशल मीडिया नेटवर्क में खुशियों की लहर दौड़ गई। कई ने इसे हाइपरसोनिक, कुछ ने “800 किलोमीटर कैरियर किलर” और कुछ ने “भारत के एयरक्राफ्ट कैरियर को पलक झपकते डुबो देने वाली मिसाइल” तक बता दिया। लेकिन इन दावों के बीच एक बात साफ रही कि पाकिस्तान की तरफ से जारी आधिकारिक जानकारी बेहद सीमित थी।

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आईएसपीआर ने अपनी रिलीज में मिसाइल के बारे में कोई ठोस जानकारी ही नहीं दी। न रेंज बताई, न स्पीड का जिक्र किया, न सीकर टेक्नोलॉजी की बात की गई और न ही उस जहाज का नाम बताया गया जिससे परीक्षण किया गया था। वीडियो में भी किसी बड़े डेक या पहचान योग्य प्लेटफॉर्म को दिखाने से भी परहेज किया गया। सिर्फ एक लॉन्च दिखाई दिया और समुद्र में दूर एक स्पलैश। इस टेस्ट का न तो कोई टेलीमेट्री या ट्रैकिंग डेटा था और न ही कोई फोटो कि किसी कैसे मिसाइल ने टारगेट को निशाना बनाया। इस तरह की जानकारी आमतौर पर किसी भी ट्रांसपेरेंट मिसाइल टेस्ट में दी जाती है, लेकिन इस वीडियो में कुछ भी नहीं था।

पाकिस्तान की तरफ से जारी आधिकारिक बयान जितना अस्पष्ट था, उतने ही बढ़ा-चढ़ाकर दावे उसके बाद सोशल मीडिया पर किए गए। जैसे ही आईएसपीआर ने अपना संक्षिप्त बयान जारी किया, उससे जुड़े सोशल अकाउंट्स ने तुरंत मिसाइल के बारे में स्वयं ही नई कहानियां गढ़ना शुरू कर दिया। अचानक दावा किया जाने लगा कि यह मिसाइल मैक-8 की रफ्तार से उड़ती है, यह भारतीय नौसेना के कैरियर को निशाना बना सकती है और यह भारत की किसी भी नौसैनिक क्षमता से आगे है। दिलचस्प यह है कि इनमें से कोई भी जानकारी पाकिस्तान के आधिकारिक चैनलों से नहीं आई थी।

लेकिन असलियत इससे बिल्कुल अलग है। ओपन सोर्स से मिली जानकारी के मुताबिक पाकिस्तान की जिस मिसाइल को पी-282 स्मैश कहा जा रहा है, उसे अब भी एक शॉर्ट-रेंज कोस्टल डिफेंस मिसाइल माना जाता है, जिसकी रेंज 290 से 350 किलोमीटर के बीच मानी जाती है। यह क्षमता लगभग चीन की सीएम-401 मिसाइल के डिजाइन से मेल खाती है, जिसे कोस्टल सिक्योरिटी के लिए उपयोग किया जाता है, न कि गहरे समुद्र में मौजूद कैरियर ग्रुप्स पर हमला करने के लिए। पाकिस्तान के किसी आधिकारिक बयान में इसे “कैरियर-किलर” या “हाइपरसोनिक” नहीं कहा गया है। यह छवि केवल सोशल मीडिया पर गढ़ी गई।

दिलचस्प बात यह रही कि भारत ने इस दावे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। भारतीय नौसेना ने कोई बयान नहीं दिया, न कोई वीडियो जारी किया और न ही कोई पलटवार किया।

इससे पहले भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान आईएनएस विक्रांत और उसका एस्कॉर्ट समूह अरब सागर में पूरी आजादी के साथ एक्टिव रहा। तब पाकिस्तान की नौसेना अपने जहाजों को कराची के आसपास तक सीमित रखे हुए थी। खुले समुद्र में मौजूद रहने के बजाय उसने एक के बाद एक कई नेव-एरिया वार्निंग जारी कीं।

वहीं, भारत ने समुद्र में अपनी क्षमता दिखा दी थी, जबकि पाकिस्तान ने स्क्रीन पर अपनी क्षमता दिखाने की कोशिश की। पाकिस्तान के वीडियो में मिसाइल का टारगेट एक स्थिर समुद्री बार्ज था, जिस पर कोई सुरक्षा या इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट मौजूद नहीं था। जबकि भारतीय नौसेना के कैरियर समूह में मल्टी-लेयर सिक्योरिटी होती है, जिसमें बाराक-8 मिसाइलें, एमएफ-स्टार रडार, एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, डिकॉय, डेस्ट्रॉयर, फ्रिगेट और पनडुब्बियां शामिल हैं।

पाकिस्तान के दावे और उसके वीडियो में दिखी क्षमता के बीच इतना बड़ा अंतर था कि डिफेंस कम्युनिटी ने इसे गंभीरता से लिया ही नहीं। दरअसल एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है रियल-टाइम में चल रहे कैरियर समूह को ढूंढना और उस पर निशाना साधना। इसके लिए सैटेलाइट नेटवर्क, ओवर-द-होराइजन सेंसर और इंटीग्रेटेड आईएसआर (इंटेलिजेंस-सर्विलांस-रीकॉन) सिस्टम की जरूरत होती है। पाकिस्तान के पास ऐसी क्षमताएं नहीं हैं। बिना रियल टाइम ट्रैकिंग के मिसाइल बेकार है।

आईएसपीआर के अस्पष्ट बयान, सोशल मीडिया द्वारा बढ़ा-चढ़ा कर किए गए दावे और वीडियो में मिसाइल परीक्षण के अहम सबूतों के न होने से पाकिस्तान का दावा पूरी तरह से फेल हो गया है। लेकिन एक बात साफ हो गई है कि दक्षिण एशिया में अब लड़ाई सिर्फ समुद्र में नहीं, बल्कि इंटरनेट पर भी लड़ी जा रही है। जहां क्षमता कम होती है, वहां कुछ देश वीडियो और प्रचार के सहारे अपनी छवि बनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन प्रचार की एक सीमा होती है, असलियत सामने आ ही जाती है।

DRDO Defence manufacturing: डीआरडीओ ने 25 फीसदी रक्षा शोध बजट निजी सेक्टर के लिए खोला, ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी को भी बनाया आसान

DRDO Defence manufacturing
RRM Sanjay Seth inaugurated the India Pavilion at Dubai Airshow-2025. During his visit to DRDO stall he was briefed about the products and technologies being showcased.

DRDO Defence manufacturing: केंद्र सरकार ने रक्षा निर्माण क्षेत्र में रिसर्च एंड डेवलपमेंट को तेजी देने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। सरकार ने संसद में बताया कि डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट बजट का 25 फीसदी उद्योगों, स्टार्ट-अप्स और अकादमिक संस्थानों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। सरकार का कहना है कि इससे निजी उद्योगों को बड़े स्तर पर रक्षा टेक्नोलॉजी में भागीदारी का मौका मिलेगा और देश में डेवलप हो रही अत्याधुनिक तकनीक आगे बढ़ेगी।

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यह जानकारी आज राज्यसभा में रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने सदस्य एस. सेल्वगनाबाथी के प्रश्न के लिखित उत्तर में दी। संजय सेठ ने संसद को बताया कि डीआरडीओ उद्योगों के साथ मिलकर देश में रक्षा उत्पादन को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लगातार पहल कर रहा है। उनका कहना था कि रिसर्च एंड डेवलपमेंट बजट खोलने का कदम देश की शोध क्षमता को सीधे उद्योगों और स्टार्ट-अप्स से जोड़ देगा।

सरकार ने बताया कि डीआरडीओ ने उद्योगों के साथ मिलकर “डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर मॉडल” जिसे डीसीपीपी कहा जाता है, उसका इस्तेमाल शुरू किया है। इस मॉडल के तहत सार्वजनिक और निजी दोनों तरह की कंपनियों को प्रतियोगी प्रक्रिया के आधार पर चुना जाता है और उन्हें डीआरडीओ द्वारा विकसित तकनीक को प्रोडक्शन के लिए ट्रांसफर किया जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश में बनी तकनीक सीधे उद्योगों तक पहुंचे और उत्पादन तेजी से बढ़े।

सरकार ने बताया कि डीआरडीओ ने देश की लगभग दो हजार कंपनियों का एक नेटवर्क खड़ा किया है, जो विभिन्न रक्षा उपकरणों के सब-सिस्टम और सिस्टम तैयार करती हैं। साथ ही, तकनीक हस्तांतरण यानी ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (ToT) को भी आसान बनाया गया है। इन कंपनियों को ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी बिना किसी शुल्क के दी जाती है। इसके साथ-साथ डीआरडीओ के वैज्ञानिक भी उद्योगों को कंसल्टेंसी सेवाएं उपलब्ध कराते हैं।

रक्षा मंत्री ने यह भी बताया कि डीआरडीओ के पेटेंट अब भारतीय उद्योगों के लिए “फ्री-टू-यूज” नीति के तहत उपलब्ध हैं। इससे उद्योग बिना अतिरिक्त शुल्क दिए इन पेटेंट तकनीकों का इस्तेमाल कर सकते हैं और अपने प्रोडक्शन को रफ्तार दे सकते हैं।

सरकार की एक बड़ी पहल टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड यानी टीडीएफ योजना है, जिसका संचालन डीआरडीओ करता है। इसका उद्देश्य माइक्रो, स्मॉल और मीडियम इंटरप्राइजेज के साथ-साथ स्टार्ट-अप्स को रक्षा तकनीक के क्षेत्र में शोध और विकास के लिए प्रोत्साहित करना है। रक्षा राज्य मंत्री ने बताया कि टीडीएफ योजना से अब तक 26 तकनीकें सफलतापूर्वक विकसित की जा चुकी हैं और दो प्रोजेक्ट तो पीएसएलवी मिशन में उड़ान भी भर चुके हैं। सरकार ने टीडीएफ योजना में डेप-टेक और कटिंग-एज टेक्नोलॉजी पर ध्यान देते हुए 500 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि स्वीकृत की है।

रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने बताया कि स्टार्ट-अप्स को डिफेंस सेक्टर से जोड़ने के लिए डीआरडीओ नई स्टार्ट-अप नीति भी लाने जा रहा है। इस नीति का उद्देश्य स्टार्ट-अप्स के साथ संवाद की प्रक्रिया को सरल बनाना और इनोवेशन को डिफेंस डेवलपमेंट का हिस्सा बनाना है। इसी के साथ “डेयर टू ड्रीम” प्रतियोगिता भी आयोजित की गई है, जिसके चार संस्करण पूरे हो चुके हैं। यह प्रतियोगिता रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र में इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई थी।

सरकार ने यह भी जानकारी दी कि डीआरडीओ की 24 प्रयोगशालाओं की टेस्टिंग सुविधाएं अब उद्योगों के लिए खोल दी गई हैं। ये सुविधाएं डिफेंस टेस्टिंग पोर्टल पर सूचीबद्ध हैं, जिससे उद्योग विश्वस्तरीय टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल कर सकते हैं। साथ ही, सहयोग बढ़ाने के लिए डीआरडीओ की प्रयोगशालाओं में इंडस्ट्री इंटरैक्शन ग्रुप भी बनाए गए हैं, जहां उद्योगों और वैज्ञानिकों के बीच नियमित संवाद होता है।

सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में डीआरडीओ ने 148 नए आरएंडडी प्रोजेक्ट स्वीकृत किए। इसी अवधि में “मेक प्रोसीजर” के तहत 70 डिफेंस प्रोजेक्ट्स को भी स्वीकृति दी गई।

रक्षा राज्य मंत्री के मुताबिक डिफेंस रिसर्च को आगे बढ़ाने के लिए एक्सट्राम्यूरल रिसर्च प्रोग्राम को भी रफ्तार दी गई है, जिसके माध्यम से देश के विश्वविद्यालयों और शोध केंद्रों में रक्षा तकनीक पर उच्च स्तरीय शोध को बढ़ावा मिलता है। इसी दिशा में डीआरडीओ-इंडस्ट्री-एकेडेमिया सेंटर ऑफ एक्सीलेंस यानी डीआईए-सीओई भी स्थापित किए गए हैं। अब तक 15 ऐसे केंद्र बन चुके हैं, जो 80 से अधिक रिसर्च सेक्टर्स में काम कर रहे हैं।

सरकार ने बताया कि iDEX यानी इनोवेशंस फॉर डिफेंस एक्सीलेंस कार्यक्रम 2018 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य स्टार्ट-अप्स, एमएसएमई और इंडिविडुअल इनोवेटर्स के साथ मिलकर रक्षा तकनीक में नए समाधान विकसित करना है। iDEX विजेताओं को अनुदान और सहायता प्रदान की जाती है ताकि वे आरएंडडी कार्य पूरे कर सकें।

सरकार ने बताया कि डिफेंस एक्विजिशन प्रक्रिया के “मेक प्रोसीजर” के तहत पिछले तीन सालों में कुल 70 प्रोजेक्टों को मंजूरी दी गई है। इसके अलावा डीआरडीओ ने पिछले तीन साल में 148 नए आरएंडडी प्रोजेक्ट स्वीकृत किए हैं।

वहीं, सरकार ने बजट का विस्तृत विवरण भी संसद में रखा। 2022-23 में रक्षा आरएंडडी पर 20,586 करोड़ रुपये खर्च हुए। 2024-25 में यह आंकड़ा बढ़कर 24,696 करोड़ रुपये हो गया। वर्ष 2025-26 के लिए 26,816 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया है।

Bayraktar KIZILELMA: पहली बार हवा में मिसाइल दागकर तुर्की के अनमैन्ड फाइटर जेट ने रचा इतिहास, क्या मैन्ड-अनमैन्ड टीमिंग है फ्यूचर?

Bayraktar KIZILELMA
Bayraktar KIZILELMA

Bayraktar KIZILELMA: तुर्की ने हाल ही में पहली बार अनमैन्ड फाइटर जेट के जरिए हवा से हवा में मिसाइल दागकर एक जेट इंजन वाले एरियल टारगेट को निशाना बनाया है। तुर्की की डिफेंस कंपनी बेकर ने 30 नवंबर को एलान किया कि उसके अनमैन्ड फाइटर जेट बयरक्टर किजिलेलमा (Bayraktar KIZILELMA) ने पहली बार हवा से हवा में मिसाइल दागकर सिंगल जेट इंजन वाले एरियल टारगेट को मार गिराने में सफलता हासिल की है।

तुर्की की ओर से यह उपलब्धि एविएशन हिस्ट्री में बेहद अहम मानी जा रही है, क्योंकि दुनिया में अब तक किसी भी अनमैन्ड फाइटर जेट ने हवा में उड़ते तेज रफ्तार टारगेट पर एयर-टू-एयर मिसाइल नहीं दागी थी।

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यह टेस्ट तुर्की के सिनोप फायरिंग एरिया में किया गया, जहां किजिलेलमा ने उड़ान भरकर अपना पूरा एयर-कॉम्बैट प्रोफाइल दिखाया। तेज रफ्तार से आगे बढ़ रहे टारगेट एयरक्राफ्ट को किजिलेलमा में लगे नये पीढ़ी के मुराद एईएसए रडार ने उसे ट्रैक किया। रडार ने जैसे ही टारगेट को लॉक किया, विमान में लगी गोकडोगन एयर-टू-एयर मिसाइल को लॉन्च कर दिया गया। कुछ ही सेकंड में मिसाइल ने टारगेट को हवा में भेद दिया। इस मिसाइल को तुर्की की रक्षा रिसर्च एजेंसी तुबितक सेज ने डेवलप किया है।

इस पूरे परीक्षण के दौरान किजिलेलमा किसी भी मानव पायलट के बिना खुद उड़ान भरता रहा, टारगेट पहचान, और हथियार लॉन्च करने की क्षमता दिखाता रहा। इसे आधुनिक समय में “फुल्ली-ऑटोनोमस एयर कॉम्बैट” की दिशा में बढ़ाया गया सबसे बड़ा कदम बताया गया है।

बेकर ने बताया कि इस परीक्षण में विमान, रडार और मिसाइल तीनों ही पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित थे। अभी तक दुनिया में अधिकतर अनमैन्ड विमान केवल जमीन पर या समुद्र पर लक्ष्य साधने के लिए बनाए गए थे, लेकिन हवा-से-हवा में हमला कर पाना किसी भी देश के लिए एक बड़ी तकनीकी चुनौती माना जाता है।

किजिलेलमा की उड़ान के साथ तुर्की वायुसेना के पांच एफ-16 फाइटर जेट्स भी आसमान में दिखे। इन विमानों ने किजिलेलमा के साथ फॉर्मेशन फ्लाइट की। जो इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में पायलट वाले और अनमैन्ड फाइटर जेट एक साथ किसी मिशन में शामिल हो सकेंगे। जिसे सैन्य भाषा में “मैन्ड-अनमैन्ड टीमिंग” कहा जाता है।

किजिलेलमा को बेकर ने अपने “मीयूस” (MIUS – Milli Insansiz Ucak Sistemi) यानी नेशनल अनमैन्ड एयरक्राफ्ट सिस्टम कार्यक्रम के तहत डेवलप किया है। यह जेट इंजन से चलने वाला पहला अनमैन्ड फाइटर है जो स्टील्थ डिजाइन यानी कम रडार सिग्नेचर के साथ उड़ता है। जिससे रडार पर इसे पकड़ पाना मुश्किल हो जाता है।

यह विमान जमीन से ही नहीं बल्कि एयरक्राफ्ट कैरियर से भी उड़ान भर सकता है। कंपनी के अनुसार, यह आने वाले समय में तुर्की नौसेना के बड़े जहाजों टीसीजी अनादोलू और निर्माणाधीन मुगेम से भी ऑपरेट किया जा सकेगा। इसका मतलब है कि यह विमान समुद्री अभियानों में भी अहम भूमिका निभा सकता है।

किजिलेलमा की पेलोड क्षमता लगभग 1500 किलोग्राम है, यानी यह कई प्रकार के हथियार, बम और मिसाइलें अपने साथ ले जा सकता है। यह कई घंटों तक हवा में रह सकता है और लंबी दूरी पर मिशन संचालित कर सकता है। पहले किए गए परीक्षणों में इसने तोलुन और टेबर-82 जैसे प्रिसिजन-गाइडेड बम भी सटीकता से गिराए थे, लेकिन पहली बार हवा से हवा की मिसाइल दागना पहले बार हुआ है।

गोकडोगन मिसाइल तुर्की की रक्षा संस्था टूबिटक सेज ने विकसित की है। यह “बीवीआर” मिसाइल है, यानी ऐसी मिसाइल जो कई दर्जन किलोमीटर दूर मौजूद लक्ष्य को भी मार सकती है। इसका “फायर-एंड-फॉरगेट” गाइडेंस सिस्टम इसे लॉन्च होने के बाद अपने लक्ष्य को खुद खोजकर मारने की क्षमता देता है।

बेकर ने हाल के वर्षों में यूएवी बाजार में तेजी से वृद्धि की है और लगातार कई देशों को अपने सिस्टम एक्सपोर्ट कर रही है। कंपनी का कहना है कि 2024 में उसने कुल रेवेन्यू का 90 फीसदी निर्यात से हासिल किया। किजिलेलमा कार्यक्रम में कई विदेशी रक्षा बाजारों ने रुचि दिखाई है, हालांकि कंपनी ने किसी भी देश का नाम सार्वजनिक नहीं किया है।

Indian Air Force HADR: श्रीलंका में फंसे पाकिस्तानी नागरिक समेत 45 लोगों को IAF ने किया रेस्क्यू, 400 से अधिक भारतीयों की सुरक्षित वापसी

Indian Air Force HADR

Indian Air Force HADR: श्रीलंका में साइक्लोन दित्वाह और भारी बारिश से आए भीषण लैंडस्लाइड के बाद हालात गंभीर हो गए हैं। कई इलाके पूरी तरह सड़क संपर्क से कट गए हैं। प्रभावित इलाकों में इंडियन एयर फोर्स ने ऑपरेशन सागर बंधु के तहत एक बड़ा मानवीय राहत अभियान (HADR) शुरू किया है। इस अभियान में भारतीय वायुसेना ने पहले ही दिन न सिर्फ भारतीय नागरिकों को बल्कि पाकिस्तान के एक नागरिक समेत 45 से अधिक विदेशी नागरिकों को भी सुरक्षित निकाला जा चुका है।

श्रीलंका के कोटमाले क्षेत्र में भारी भूस्खलन के बाद सड़कें बह गईं और क्षेत्र पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया। ऐसे में वायुसेना के एमआई-17 वी5 हेलीकॉप्टरों ने दिनभर लगातार उड़ानें भरकर फंसे लोगों को निकालकर कोलंबो पहुंचाया गया।

Operation Sagar Bandhu: चक्रवात ‘दित्वाह’ से त्रस्त श्रीलंका और तमिलनाडु में फंसे लोगों की मदद में जुटी भारतीय वायुसेना, शुरू किया ऑपरेशन सागर बंधु

कोटमाले से 45 लोगों को हेलीकॉप्टरों द्वारा कोलंबो पहुंचाया गया, जिनमें 6 गंभीर रूप से घायल, 4 छोटे बच्चे और कई विदेशी नागरिक शामिल थे। इन नागरिकों में 12 भारतीय थे, जबकि अन्य में जर्मनी, साउथ अफ्रीका, स्लोवेनिया, ब्रिटेन, पोलैंड, बेलारूस, ईरान, ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित कई देशों के निवासी थे। इसके अलावा, कई श्रीलंकाई नागरिक भी शामिल थे।

इसके अलावा भारतीय वायुसेना ने भिष्म कैप्सूल और एक मेडिकल टीम को भी श्रीलंका भेजा। साथ ही 400 से अधिक भारतीय नागरिकों को रात 8 बजे तक सुरक्षित भारत वापस लाया गया। वायुसेना के ट्रांसपोर्ट विमान पूरे समय सक्रिय रहे और देर रात तक कई और उड़ानों की योजना बनाई गई है, ताकि सभी फंसे लोगों को सुरक्षित निकाला जा सके।

इस राहत कार्य में वायुसेना के एमआई-17 वी5 हेलीकॉप्टरों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई यात्री ऐसे जगह फंसे थे जहां हेलीकॉप्टर उतर नहीं सकता था। मुश्किल हालात के बीच ऊंचे इलाकों में फंसे लोगों तक पहुंचने के लिए पहले एक गरुड़ कमांडो को उतारा गया, जिसने उन्हें पैदल चलते हुए एक सुरक्षित हेलीपैड तक पहुंचाया। जिसके बाद वहां से सभी 24 लोगों को एयरलिफ्ट कर कोलंबो लाया गया।

वायुसेना ने अलग से एक मिशन चलाकर 3 गंभीर घायल लोगों को भी तुरंत कोलंबो के अस्पताल पहुंचाया, जहां उनका इलाज शुरू किया गया। इसके अलावा राहत ऑपरेशन को और मजबूती से चलाने के लिए भारतीय वायुसेना ने श्रीलंकाई सेना के 57 सैनिकों को हेलीकॉप्टरों के जरिये लैंडस्लाइड क्षेत्र में एयरलिफ्ट किया। ये टीमें राहत और रास्ते साफ करने में स्थानीय प्रशासन की मदद कर रही हैं।

वहीँ, तमिलनाडु में राहत सामग्री और एनडीआरएफ (राष्ट्रीय डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स) दल पहुंचाने के लिए भारतीय वायुसेना के ट्रांसपोर्ट विमानों ने भी उड़ान भरी। सूत्रों के अनुसार, पुणे से एक सी-17 विमान चेन्नई भेजा गया जिसमें भारी उपकरण और राहत सामग्रियां थीं।

भारतीय वायुसेना का कहना है कि इन विमानों ने अब तक कुल 27 टन राहत सामग्री श्रीलंका पहुंचाई है। इसमें मेडिकल किट, आपदा राहत उपकरण, पोर्टेबल हॉस्पिटल “भिष्म क्यूब” और अन्य जरूरी सामान शामिल था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रभावित लोगों के प्रति संवेदना जताई और कहा कि भारत हमेशा अपने समुद्री पड़ोसी के साथ खड़ा है। विदेश मामलों के मंत्रालय और एनडीआरएफ की स्थानीय टीमों ने मिलकर राहत अभियान को दिशा दी। इस ऑपरेशन का नाम ऑपरेशन सागर बंधु रखा गया है, जिसमें भारत ने “पड़ोसी प्रथम” नीति के अनुरूप तुरंत कदम उठाए। राहत, रेस्क्यू और पुनर्स्थापना कार्य तेजी से जारी है।

राहत एवं रेस्क्यू अभियान में वायुसेना के साथ-साथ श्रीलंकाई नौसेना, सेना, व अन्य अग्निशमन व राहत एजेंसियां भी जुटी हुई हैं। प्रभावित नागरिकों में बच्चों, बुजुर्गों और घायल शामिल हैं, जिन्हें प्राथमिक चिकित्सा के बाद सुरक्षित कोलंबो या भारत भेजा गया।

INS Taragiri delivery: भारतीय नौसेना को मिली प्रोजेक्ट 17ए की तीसरी स्टेल्थ फ्रिगेट, इस जहाज पर लगी हैं घातक बराक मिसाइलें

ENC Fleet Expansion 2026: INS Taragiri Delivery
Pix 1 (Wiki) is of the Nilgiri class: INS Nilgiri (F33), Himgiri (F34) and Udaygiri (F35).

INS Taragiri delivery: मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड ने भारतीय नौसेना को प्रोजेक्ट 17ए की तीसरी स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस तारागिरी औपचारिक रूप से सौंप दी है। यह नीलगिरी क्लास की चौथी फ्रिगेट है। इस प्रोजेक्ट के तहत प्रोजेक्ट 7 अत्याधुनिक स्टेल्थ फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं। ये नई पीढ़ी की फ्रिगेट हैं जो पुरानी शिवालिक क्लास (प्रोजेक्ट 17) से कहीं ज्यादा ताकतवर, स्टील्थ और स्वदेशी हैं।

इस प्रोजेक्ट के तहत आईएनएस तारागिरी (यार्ड 12653) एमडीएल की बनाई तीसरी फ्रिगेट है। यह डिलीवरी भारतीय नौसेना के आधुनिक बेड़े में एक बड़ा इजाफा है।

आईएनएस तारागिरी का निर्माण वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो के डिजाइन पर आधारित है और इसे वॉरशिप ओवरसीइंग टीम मुंबई ने मॉनिटर किया है। आईएनएस तारागिरी की कील लेइंग सेरेमनी 10 सितंबर 2020 को हुई थी, जिसके बाद 14 सितंबर 2022 को इसे लॉन्च किया गया। सभी सी-ट्रायल्स सफलतापूर्वक पूरे होने के बाद अब यह पूरी तरह नौसेना को सौंपा जा चुकी है। इसकी कमीशनिंग 2026 के शुरुआत में होने की उम्मीद है।

Tughril vs Nilgiri Class: पाक नेवी में चीन की ‘स्विस आर्मी नाइफ’ फ्रिगेट्स, तुघरिल के सामने भारत का नीलगिरी, कौन है ज्यादा ताकतवर?

तारागिरी वास्तव में भारतीय नौसेना की पारंपरिक विरासत का हिस्सा भी है। इससे पहले 1980 से 2013 तक एक लींडर क्लास की आईएनएस तारागिरी नौसेना में 33 साल तक सेवा दे चुकी है। नई तारागिरी उस गौरवशाली परंपरा को आधुनिक और कहीं ज्यादा ताकतवर है।

तारागिरी का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा पूरी तरह स्वदेशी है। इसकी लंबाई 149 मीटर और वजन करीब 6,670 टन है। यह एक मल्टी-मिशन स्टेल्थ फ्रिगेट है, जो हवा, समुद्र और पानी के भीतर तीनों तरह की लड़ाई एक साथ लड़ने की क्षमता रखती है। इसका स्टेल्थ डिजाइन ऐसा है कि इसका रडार, थर्मल और एकाउस्टिक सिग्नेचर बेहद कम रहता है, जिससे दुश्मन के सेंसर इसे पकड़ नहीं पाते।

हथियारों के मामले में यह बेहद घातक प्लेटफॉर्म है। इसके अलावा जहाज में बराक-8 और बराक-8 ईआर मिसाइलों के लिए 32-सेल वर्टिकल लॉन्च सिस्टम लगा है, जो 150–200 किलोमीटर दूरी तक हवाई खतरों को नष्ट कर सकता है। इसके अलावा जहाज में आठ सुपरसॉनिक ब्रह्मोस क्रूज मिसाइलें लगी हैं जो समुद्र और जमीन दोनों पर हमला कर सकती हैं। मेन गन के तौर पर इसमें 76 एमएम सुपर रैपिड गन माउंट सिस्टम और नजदीकी सुरक्षा के लिए दो एके-630 क्लोज-इन वेपन सिस्टम लगे हैं। साथ ही, यह आरबीयू-6000 एंटी-सबमरीन रॉकेट और टॉरपीडो ट्यूब से भी लैस है।

सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक्स की बात करें तो तारागिरी भारत के एमएफ-स्टार एईएसए रडार से लैस है, जो 360-डिग्री में सैकड़ों लक्ष्यों को एक साथ ट्रैक कर सकता है। जहाज में स्वदेशी हुमसा-एनजी सोनार और एडवांस्ड टोन्ड एरे सोनार (एटीएएस) भी लगा है, जो पनडुब्बी की गतिविधियों को दूर से पकड़ सकते हैं। पूरा कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम भारत में तैयार किया गया है, जो कई सेंसर और हथियारों को इंटीग्रेट करके ऑपरेट करता है।

आईएनएस तारागिरी में आधुनिक स्टेल्थ डिजाइन का उपयोग किया गया है जिससे इसका रडार, थर्मल, मैग्नेटिक और एकाउस्टिक सिग्नेचर काफी कम रहता है और दुश्मन के सेंसर इसे पकड़ना मुश्किल होता है।

आईएनएस तारागिरी प्रोजेक्ट 17ए का हिस्सा है, जिसे नीलगिरि क्लास भी कहा जाता है। इस कार्यक्रम के तहत सात आधुनिक स्टेल्थ फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं। इनमें से तीन मझगांव डॉकयार्ड में और चार गार्डन रीच शिपबिल्डर्स लिमिटेड कोलकाता में बन रहे हैं। यह पूरा प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना की “मल्टी-रोल” क्षमता को बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है, जिसमें हवाई रक्षा, समुद्री युद्ध, जमीन पर हमला और एंटी-सबमरीन ऑपरेशन शामिल हैं।

आईएनएस तारागिरी की डिलीवरी भारत के जहाज निर्माण क्षेत्र की क्षमता का प्रमाण है। एमडीएल ने पिछले 11 महीनों में प्रोजेक्ट 17ए की चार फ्रिगेट नौसेना को सौंपकर भारतीय निर्माण क्षमता की ताकत दिखाई है। पहले जहाज के निर्माण में जहां 93 महीने लगे थे, वहीं तारागिरी को सिर्फ 81 महीनों में पूरा कर लिया गया। इस प्रोजेक्ट में 200 से अधिक एमएसएमई कंपनियों का योगदान रहा और लगभग 4,000 लोगों को सीधी तथा 10,000 लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिला।

Operation Sagar Bandhu: चक्रवात ‘दित्वाह’ से त्रस्त श्रीलंका और तमिलनाडु में फंसे लोगों की मदद में जुटी भारतीय वायुसेना, शुरू किया ऑपरेशन सागर बंधु

Operation Sagar Bandhu- Indian Air Force HADR
Operation Sagar Bandhu- Indian Air Force HADR ((Photo: IAF)

Operation Sagar Bandhu: मानवीय सहायता और आपदा राहत अभियान के तहत भारतीय वायुसेना लगातार श्रीलंका और तमिलनाडु में फंसे लोगों तक राहत पहुंचाने में लगी हुई है। चक्रवात ‘दित्वाह’ के कारण श्रीलंका में भारी तबाही आने के बाद भारत ने तुरंत सहायता भेजी और वायुसेना ने राहत और बचाव कार्यों की कमान संभाल ली।

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29 नवंबर की रात से ही वायुसेना ने अपने भारी परिवहन विमानों को राहत अभियान में लगा दिया। पुणे से चेन्नई के लिए एक सी17 ग्लोबमास्टर ने उड़ान भरी, जिसमें एनडीआरएफ टीम और उनके उपकरण लोड किए गए थे। इसी दौरान हिंडन एयर बेस से सी-130 सुपर हरक्यूलिस और आईएल-76 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट राहत सामग्री लेकर श्रीलंका के लिए रवाना हुए। इन विमानों में कुल 21 टन राहत सामग्री, जरूरी दवाइयां, मेडिकल किट और भिष्म क्यूब्स जैसी आपदा सहायता सामग्री शामिल थी।

30 नवंबर की सुबह स्थिति और गंभीर हो गई, जिसके बाद वायुसेना ने राहत मिशन को और तेज कर दिया। सुबह 0500 बजे से ही हिंडन और तिरुवनंतपुरम से सी-130 और आईएल-76 उड़ान भरने के लिए तैयार थे। इनमें से एक आईएल-76 पहले ही कोलंबो उतर चुका था और वहीं से फंसे हुए भारतीय नागरिकों को वापस लाने की तैयारी शुरू हो गई। वायुसेना के अनुसार, इन दोनों विमानों से कोलंबो एयरपोर्ट पर फंसे हुए भारतीयों को सुरक्षित भारत लाया जाएगा।

श्रीलंका में फंसे कई भारतीय नागरिक अपने परिवारों से संपर्क नहीं कर पा रहे थे। तूफान के कारण फ्लाइटें रद्द हुईं और लगभग 800–1000 भारतीय कोलंबो में फंस गए। इसी स्थिति को देखते हुए भारत ने तुरंत ऑपरेशन सागर बंधु शुरू किया। इस अभियान के तहत बचाव कार्यों को तेज करने के लिए भारतीय वायुसेना ने कोलंबो में एमआई-17 वी5 हेलीकॉप्टर भी तैनात किए, जिससे प्रभावित क्षेत्रों में तेजी से मदद पहुंचाई जा सके।

तमिलनाडु में भी हालात गंभीर थे। चेन्नई और आसपास के तटीय इलाकों में राहत और बचाव कार्यों को मजबूती देने के लिए वायुसेना ने अतिरिक्त दल और राहत सामग्री भेजी। इसी क्रम में वडोदरा से एक और सी-17 ग्लोबमास्टर को चेन्नई के लिए लोड किया जा रहा था, जिसमें एनडीआरएफ की टीम और भारी उपकरण शामिल थे।

भारतीय वायुसेना ने बताया कि राहत मिशन के दौरान कोई भी विमान खाली नहीं लौट रहा है। जहां से राहत सामग्री उतारी जा रही है, वहीं से फंसे हुए भारतीयों को वापस लाया जा रहा है। यह मिशन निरंतर चल रहा है ताकि श्रीलंका और तमिलनाडु में फंसे नागरिकों तक समय पर मदद पहुंच सके।

Indian Navy Car Expedition: 290 साल पुराने नेवल डॉकयार्ड के सम्मान में भोपाल से शुरू हुई नौसेना की कार यात्रा, सुदर्शन कॉर्प्स के GoC ने दिखाई हरी झंडी

Indian Navy Car Expedition
Lt Gen Arvind Chauhan, YSM, SM, GOC, Sudarshan Chakra Corps, today ceremoniously flagged off a Naval Car Expedition at Dronachal Military Cantonment, Bhopal

Indian Navy Car Expedition: भोपाल के द्रोणाचल मिलिट्री कैंटोनमेंट में आज भारतीय नौसेना के इंडियन नेवी कार एक्सपीडिशन को औपचारिक रूप से फ्लैग-ऑफ किया गया। यह कार यात्रा मुंबई स्थित नेवल डॉकयार्ड की 290वीं वर्षगांठ मनाने के लिए आयोजित की गई है, ताकि देश की समुद्री विरासत और तीनों सेनाओं के बीच मजबूत संबंधों को प्रदर्शित किया जा सके।

मध्य प्रदेश के मिलिट्री एरिया भोपाल कैंट में शनिवार सुबह को सुदर्शन चक्र कॉर्प्स के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल अरविंद चौहान ने भारतीय नौसेना के इंडियन नेवी कार एक्सपीडिशन को औपचारिक रूप से फ्लैग-ऑफ किया।

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यह कार एक्सपीडिशन मुंबई स्थित नेवल डॉकयार्ड की स्थापना के 290 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया है। यह डॉकयार्ड वर्ष 1735 में स्थापित हुआ था और तब इसे बॉम्बे डॉकयार्ड के नाम से जाना जाता था। इसका इतिहास लगभग 300 वर्षों से भी ज्यादा पुराना है और इसे एशिया के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित समुद्री प्रतिष्ठानों में गिना जाता है।

 

सन् 1725 से 1821 के बीच इस डॉकयार्ड में 100 टन से बड़े 150 से अधिक जहाज बनाए गए थे। इनमें एचएमएस हिंदुस्तान, एचएमएस एशिया और एचएमएस कॉर्नवालिस जैसे कई महत्वपूर्ण युद्धपोत शामिल थे, जिनका उपयोग बाद में ब्रिटिश रॉयल नेवी ने भी किया। यही नहीं, वर्ष 1750 में यहां एशिया का पहला ड्राई डॉक बॉम्बे डॉक तैयार किया गया, जो आज भी ऑपरेशन में है। इसके बाद बना डंकन डॉक लंबे समय तक यूरोप के बाहर सबसे बड़ा ड्राई डॉक माना गया।

इतिहास ही नहीं, यह डॉकयार्ड 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान भी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका में रहा। नौसेना के जहाजों की मरम्मत और मॉडिफिकेशन यहीं किए गए थे। यह स्थान आज भारत के आत्मनिर्भर रक्षा निर्माण का अहम केंद्र माना जाता है।

भोपाल से शुरू हुई इंडियन नेवी कार एक्सपीडिशन कुल 21 दिनों की यात्रा पर है, जिसे चार चरणों में पूरा किया जाएगा। इस अभियान में कुल 12 आइकॉनिक वाहन शामिल हैं और हर चरण में लगभग 40 प्रतिभागी भाग लेंगे, जिनमें नौसेना के अधिकारी और डिफेंस सिविलियंस शामिल हैं। यह कार रैली मुंबई, शिमला, कल्पा और किन्नौर जैसे स्थानों से होकर गुजरेगी और देशभर में लोगों को नौसेना के इतिहास, क्षमता और राष्ट्र-सेवा से जोड़ने का संदेश देगी।

100 किमी की Malnad Ultra 2025 रेस में उम्र नहीं आई आड़े, सबसे उम्रदराज फिनिशर बने ब्रिगेडियर संजय दिखित

Malnad Ultra 2025
Brig Sanjay Dikhit Becomes Oldest Finisher at Malnad Ultra 2025

Malnad Ultra 2025 में भारतीय सेना के अधिकारी ब्रिगेडियर संजय दिखित ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि दृढ़ इच्छाशक्ति उम्र से कहीं ज्यादा ताकतवर होती है। 60 वर्ष की उम्र पार करने के बाद भी सेना से रिटायर्ड ब्रिगेडियर दिखित ने देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली 100 किलोमीटर अल्ट्रा-ट्रेल रन को सफलतापूर्वक पूरा किया और इस कैटेगरी में सबसे उम्रदराज फिनिशर बने।

ब्रिगेडियर दिखित मध्य प्रदेश के महू से कर्नाटक के चिकमंगलूर तक लगभग 3,100 किलोमीटर की मोटरसाइकिल राइड करके पहुंचे। इसके बाद उन्होंने सीधे पश्चिमी घाटों की चुनौतीपूर्ण पहाड़ियों में आयोजित इस रन में हिस्सा लिया, जिसे आयोजकों ने “माउंटेन लेवल 4” की कैटेगरी में रखा है। (Malnad Ultra 2025)

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यह 100 किलोमीटर की रेस दो 50 किलोमीटर लूप में बंटी थी, जिसमें लगभग 95 फीसदी रास्ता जंगलों और कॉफी प्लांटेशनों की ट्रेल्स पर था। पूरे कोर्स में करीब 3,801 मीटर चढ़ाई और उतनी ही उतराई शामिल थी। रास्ते में घना जंगल, तीखे ढलान और फिसलन भरी पगडंडियां थीं। (Malnad Ultra 2025)

ब्रिगेडियर दिखित के लिए मुश्किलें तब और बढ़ गई जब 70 किलोमीटर के बाद तेज बारिश शुरू हो गई और ऊंचाई वाले हिस्सों में घना कोहरा छा गया। रात के अंधेरे में केवल एक हेडलैम्प के सहारे रास्ता तलाशते हुए वे कई बार फिसल कर गिरे भी। गिरने से उनका जूता तक टूट गया और उन्हें एक हेल्प सेंटर पर जूते बदलने पड़े। (Malnad Ultra 2025)

लगभग 38वें किलोमीटर पर गलती से गलत रास्ते पर चले जाने के चलते उन्हें अपना रूट वापस पकड़ने में करीब एक घंटे का नुकसान हुआ। लेकिन उनकी जीपीएस डिवाइस ने अंत में कुल दूरी 103 किलोमीटर दर्ज की। ब्रिगेडियर संजय दिखित बता दिया कि नुशासन और दृढ़ संकल्प के साथ कोई भी दौड़ कठिन नहीं है, चाहे उम्र कुछ भी हो। (Malnad Ultra 2025)

128 प्रतिभागियों में से केवल 79 ही रेस पूरी कर पाए, और ब्रिगेडियर दिखित उनमें सबसे वरिष्ठ फिनिशर थे। रेस पूरी करने के बाद उन्होंने कहा कि यह अनुभव “सुंदर लेकिन बेहद मुश्किल” था। उन्होंने बताया कि लगातार बारिश, कोहरा, अंधेरा और थकान के बावजूद जंगल के बीच अकेले दौड़ना उनके लिए एक चुनौती थी। (Malnad Ultra 2025)

मलनाड अल्ट्रा में देश-विदेश के अनुभवी ट्रेल-रनर्स हिस्सा लेते हैं और इसे पूरी तरह वालंटियर्स द्वारा आयोजित किया जाता है। इस प्रतियोगिता का मकसद रेसर्स की शारीरिक क्षमता, मानसिक धैर्य और साहस को परखना होता है। (Malnad Ultra 2025)

Kashmir in the Line of Fire: मेजर जनरल महाजन ने अपनी नई किताब में साझा की कश्मीर के जाबांजों की अनसुनी दास्तानें

Kashmir in the Line of Fire Book Launch

Kashmir in the Line of Fire: मेजर (रि.) जनरल रंजन महाजन की नई किताब “कश्मीर इन द लाइन ऑफ फायर” कश्मीर घाटी में कठिन परिस्थितियों में सेवा करने वाले भारतीय सैनिकों को समर्पित है। किताब में उन्होंने सैनिकों के जीवन की उन अनकही कहानियों को शामिल किया है, जो सिर्फ ऑपरेशन नहीं बल्कि साहस, दोस्ती, बलिदान और संघर्ष के बीच मानवीय जज्बातों की सच्ची तस्वीर पेश करती हैं। मेजर जनरल महाजन ने घाटी में अपने लंबे अनुभवों के आधार पर यह भी बताया है कि कैसे आतंकवाद के शुरुआती वर्षों से लेकर आज तक कश्मीर का माहौल बदला और कैसे भारतीय सेना ने अपने काउंटर-टेररिज्म ग्रिड को मजबूत करते हुए हालात का सामना किया।

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हाल ही में नई दिल्ली में उनकी नई किताब का विमोचन हुआ। कार्यक्रम को “सेरेमनी ऑफ ग्रैटिट्यूड” का नाम दिया गया, जिसका उद्देश्य उन वीर जवानों को सम्मान देना था, जिन्होंने घाटी में आतंकवाद और हिंसा के बीच ड्यूटी निभाई। यह आयोजन राजपूताना राइफल्स रेजिमेंट के स्मरण दिवस के साथ आयोजित किया गया। किताब का विमोचन अशोक चक्र (मरणोपरांत) सम्मानित नायक नीरज कुमार सिंह की वीर नारियों और उनके दो बेटों ने किया। (Kashmir in the Line of Fire)

मेजर जनरल महाजन को 1987 में राजपूताना राइफल्स में ही कमीशन मिला था, और पांच बार कश्मीर में सेवा देते हुए उन्होंने घाटी के संघर्ष, सैनिकों के बलिदान और स्थानीय लोगों की बहादुरी को बेहद नजदीक से देखा।

Kashmir in the Line of Fire Book Launch

मेजर जनरल महाजन ने किताब में कश्मीर की कहानी को सिर्फ ऑपरेशन के नजरिए से नहीं, बल्कि इंसानियत की दृष्टि से लिखा है। कई अध्याय ऐसे हैं, जहां गोलीबारी और घुसपैठ की घटनाओं के बीच सैनिकों की हंसी, डर, दोस्ती और उम्मीद साथ-साथ चलती दिखती है। वे बताते हैं कि कैसे सैनिक रात-रात भर बर्फ में बैठकर घाटी की सुरक्षा करते हैं, कैसे हर ऑपरेशन के बाद शहीद साथियों की यादें दिल में घर कर लेती हैं, और कैसे स्थानीय नागरिक कई बार अपनी जान जोखिम में डालकर सेना की मदद करते हैं। (Kashmir in the Line of Fire)

किताब में मच्छल सेक्टर के 2014 ऑपरेशन का विस्तार से वर्णन है। इसमें उन्होंने उस रात का जिक्र किया है जब भारतीय जवानों ने नौ घुसपैठियों को रोका था। भोर होते-होते 8 ढेर थे, 1 पकड़ा गया। ऑपरेशन सफल रहा, लेकिन एक 24 साल के जवान, लांस नाइक राजेश कुमार ने अपनी जान गंवाई। मेजर जनरल महाजन इस घटना को बताते हुए कहते हैं, “वह सिर्फ एक सैनिक नहीं था, किसी का बेटा था, जिसका सपना वहीं बर्फ में दफन हो गया।” (Kashmir in the Line of Fire)

मेजर जनरल महाजन ने कश्मीर में आतंकवाद के बढ़ने, घुसपैठ की बदलती रणनीतियों और काउंटर-टेररिज्म ग्रिड के मजबूत होने की पूरी यात्रा को सरल भाषा में समझाया है। वे बताते हैं कि कैसे 1980 के दशक के अंत में कश्मीर का माहौल अचानक बदल गया और कैसे भारत ने इन चुनौतियों का मुकाबला करते हुए धीरे-धीरे हालात को संभाला। किताब में उन्होंने कुछ प्रमुख ऑपरेशंस, जैसे 2014 का मशाल ऑपरेशन, और शहीद कैप्टन तुषार महाजन के शौर्य की कहानी भी लिखी है।

मेजर जनरल महाजन के मुताबिक असली जंग सिर्फ हथियारों से नहीं जीती जाती, बल्कि भरोसे, संवाद और एकजुटता से जीती जाती है। उन्होंने किताब में घाटी के आम लोगों की भूमिका और उनकी हिम्मत को भी बराबर स्थान दिया है। उन्होंने उल्लेख किया कि कैसे कई बार स्थानीय लोगों ने अपनी जान जोखिम में डालकर सेना को महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं। किताब उन मनोवैज्ञानिक दबावों को भी सामने लाती है जिनका सामना सैनिक हर दिन करते हैं।

मेजर जनरल महाजन वर्ष 1987 में चार राजपूताना राइफल्स में कमीशंड हुए थे। 35 से अधिक वर्षों की सेवा के दौरान उन्होंने पूरे भारत में अहम कमांड संभाली, जिनमें राष्ट्रीय राइफल्स, लाइन ऑफ कंट्रोल पर इन्फैंट्री ब्रिगेड, और पश्चिमी सीमा पर एक डिवीजन का नेतृत्व शामिल है। वे डीएसएसस, सीडीएम और एनडीसी के पूर्व छात्र भी रहे हैं और सेना मेडल व विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित हैं।

“Kashmir in the Line of Fire” कश्मीर को सिर्फ एक संघर्ष के तौर पर नहीं, बल्कि उन असली लोगों की नजर से दिखाती है जिन्होंने वहां सालों तक “लाइन ऑफ फायर” में रहकर देश की रक्षा की।

The book is now available on Amazon and FaujiDays (Signed Copy).

Civil-Military Fusion: रक्षा मंत्री बोले- ऑपरेशन सिंदूर बना सिविल-मिलिट्री कोऑर्डिनेशन का सबसे बड़ा उदाहरण, प्रशासन भी रहे सैनिकों की तरह तैयार

Civil-Military Fusion
Raksha Mantri Rajnath Singh addressed the valedictory ceremony of the 100th Common Foundation Course at LBSNAA.

Civil-Military Fusion: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर भारत में सिविल-मिलिट्री फ्यूजन का सबसे बेहतरीन उदाहरण है। उन्होंने कहा कि इस पूरे अभियान में प्रशासनिक मशीनरी और सशस्त्र बलों ने एक साथ मिलकर जिस तरह समन्वय दिखाया, उसने देश में जनता का भरोसा मजबूत किया और हालात को नियंत्रित रखने में बड़ी भूमिका निभाई।

Civil-Military Fusion: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह बोले- सिविल-मिलिट्री फ्यूजन ही भारत की डिफेंस पावर की असली नींव

मसूरी में आयोजित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA) के 100वें कॉमन फाउंडेशन कोर्स के समापन समारोह में बोलते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि इस ऑपरेशन के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान और पीओके में मौजूद आतंकवादी कैंपों को निशाना बनाया। उन्होंने कहा कि भारत ने संतुलित और नॉन-एस्कलेटरी प्रतिक्रिया दी, लेकिन पड़ोसी देश के व्यवहार के चलते बॉर्डर एरिया में हालात सामान्य होने में दिक्कतें आईं। इसके बावजूद, देश के प्रशासनिक अधिकारियों ने पूरे अभियान में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने समय पर महत्वपूर्ण जानकारी जनता तक पहुंचाई और देशभर में आयोजित मॉक ड्रिल्स को सफलतापूर्वक आयोजित किया। (Civil-Military Fusion)

राजनाथ सिंह ने यंग सिविल सर्वेंट्स से कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सैनिकों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रशासन भी संकट की हर स्थिति में उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा कि जैसे सैनिक हमेशा हर स्थिति के लिए तैयार रहते हैं, वैसे ही युवा प्रशासनिक अधिकारी भी किसी भी चुनौती के लिए तैयार रहें।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस” और “रिफॉर्म, परफॉर्म एंड ट्रांसफॉर्म” के मंत्र का जिक्र करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि 2014 में भारत दुनिया की 11वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था, जो अब चौथे स्थान पर पहुंच गया है। उन्होंने कहा कि कई ग्लोबल वित्तीय संस्थाएं, जैसे मॉर्गन स्टेनली, अब अनुमान लगा रही हैं कि भारत अगले दो-तीन सालों में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। (Civil-Military Fusion)

उन्होंने कहा कि सिविल सेवक केवल “रूल मेकर्स” नहीं, बल्कि जनता के हितों के संरक्षक और सुविधा प्रदान करने वाले “एनैब्लर्स” होते हैं। उन्होंने अधिकारियों को ईमानदारी, नैतिकता और सार्वजनिक जवाबदेही के साथ काम करने की सलाह दी।

तकनीक के महत्व पर बोलते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि आज की तारीख में टेक्नोलॉजी शासन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। जनधन योजना, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर, आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन और इनकम टैक्स विभाग की फेसलेस असेसमेंट स्कीम इसका उदाहरण हैं। उन्होंने रक्षा मंत्रालय की संपूर्ण (एआई-ड्राइवन आटोमेशन सिस्टम) का जिक्र करते हुए कहा कि यह पारदर्शिता के साथ रक्षा खरीद प्रक्रिया को विश्लेषित करने और भुगतान प्रक्रिया को सरल बनाने में मदद कर रही है। (Civil-Military Fusion)

उन्होंने कहा कि तकनीक का उपयोग जनता की पहुंच, पारदर्शिता और समावेशन बढ़ाने के लिए होना चाहिए, लेकिन यह कभी अंतिम लक्ष्य नहीं बनना चाहिए।

अपने संबोधन में रक्षा मंत्री ने युवा अधिकारियों को संवेदनशील बने रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि जब अधिकारी समाज के वंचित या कमजोर वर्गों के लोगों से मिलें, तो उन्हें उनकी कठिनाइयों को समझना चाहिए, क्योंकि कई बार लोगों की परेशानियां सिर्फ उनके प्रयासों से नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक स्थितियों से भी तय होती हैं। यही सोच एक अधिकारी को वास्तव में “पीपल-सेंट्रिक” बनाती है। (Civil-Military Fusion)

समारोह में उन्होंने महिला अधिकारियों की बढ़ती भागीदारी की तारीफ करते हुए कि यूपीएससी के इस वर्ष के परिणाम में पहले स्थान सहित टॉप पांच में तीन महिलाएं शामिल थीं। उन्होंने कहा कि 2047 तक बड़ी संख्या में महिलाएं कैबिनेट सचिव के स्तर तक पहुंचेंगी और भारत की विकास यात्रा को नेतृत्व देंगी। (Civil-Military Fusion)