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ईरान में ‘डिकैपिटेशन स्ट्राइक’ से तबाही! अमेरिका की नई वॉर स्ट्रैटेजी से कैसे हिला तेहरान

Decapitation Strikes Strategy

Decapitation Strikes Strategy: पश्चिमी एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ इस बार एक नई तरह की सैन्य रणनीति अपनाई है, जो पारंपरिक युद्ध से अलग मानी जा रही है। एक तरफ जहां ईरान ड्रोन-मिसाइलों के जरिए पारंपरिक युद्ध लड़ रहा है, तो वहीं इजरायल और अमेरिका ने बड़े पैमाने पर जमीनी सेना भेजने या लंबा युद्ध छेड़ने के बजाय, ईरान की टॉप लीडरशिप, सैन्य ठिकानों और अहम इंफ्रास्ट्रक्चर को चुनिंदा तरीके से निशाना बनाया है। इस रणनीति को डिकैपिटेशन स्ट्राइक्स कहा जा रहा है।

फरवरी के आखिरी दिन अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान के कई रणनीतिक ठिकानों पर प्रिसिजन स्ट्राइक्स यानी सटीक हमले किए। इन हमलों में हाई-टेक मिसाइलों, ड्रोन और गाइडेड बमों का इस्तेमाल किया गया, जिससे कम समय में ज्यादा प्रभाव डालने की कोशिश की गई। (Decapitation Strikes Strategy)

क्या है Decapitation Strikes Strategy

डिकैपिटेशन स्ट्राइक एक सैन्य रणनीति है, जिसमें दुश्मन के लीडरशिप, कमांड एंड कंट्रोल (सी2) सिस्टम या प्रमुख कमांडरों को निशाना बनाकर संगठन या राज्य की कमान को कमजोर या नष्ट करने की कोशिश की जाती है। इसका मूल विचार है: “शीर्ष को काट दो, तो पूरा शरीर गिर जाएगा”। यह रणनीति प्राचीन काल से मौजूद है, लेकिन आधुनिक रूप में तकनीकी विकास (जैसे एयर स्ट्राइक्स, ड्रोन, प्रिसिजन मिसाइल्स) के साथ यह ज्यादा प्रभावी और चर्चित हुई है।

डिकैपिटेशन की अवधारणा बहुत पुरानी है। प्राचीन चीनी सैन्य रणनीतिकार सन त्जु (Sun Tzu) ने लगभग 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व लिखी गई अपनी किताब द आर्ट ऑफ वॉर में लिखा था कि दुश्मन के नेतृत्व को निशाना बनाना युद्ध को जल्दी खत्म करने का सबसे अच्छा तरीका है। यह विचार तब से सैन्य सिद्धांतों में शामिल रहा। (Decapitation Strikes Strategy)

क्यों बढ़ा तनाव

ईरान और अमेरिका के बीच टकराव नया नहीं है। इसकी जड़ें 1979 की इस्लामिक क्रांति से जुड़ी हैं, जब ईरान में शाह शासन खत्म हुआ और नया इस्लामिक सिस्टम स्थापित हुआ। इसके बाद से दोनों देशों के बीच रिश्ते लगातार तनावपूर्ण रहे हैं।

2015 में न्यूक्लियर डील यानी जेसीपीओए के जरिए कुछ समय के लिए स्थिति सामान्य हुई थी, लेकिन 2018 में अमेरिका के इससे बाहर निकलने के बाद फिर तनाव बढ़ गया। 2020 में अमेरिका ने ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के टॉप कमांडर कासिम सुलेमानी को बगदाद में ड्रोन हमले में मार गिराया था। हमला इराक की राजधानी बगदाद के बगदाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास हुआ। सुलेमानी सीरिया से आए एक फ्लाइट से उतरे थे और एयरपोर्ट से निकलते समय उनके काफिले (दो कारों) पर हमला किया गया। जिसे इस तरह की रणनीति की शुरुआती मिसाल माना जाता है।

2026 में हालात और ज्यादा बिगड़ गए, जब ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को लेकर बातचीत पूरी तरह विफल हो गई। इसके बाद अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपनी सैन्य तैनाती बढ़ा दी और बड़े स्तर पर एयर पावर को सक्रिय किया। (Decapitation Strikes Strategy)

लीडरशिप को खत्म करने की नई रणनीति

इस बार अमेरिका की रणनीति का मुख्य फोकस ईरान के नेतृत्व को निशाना बनाना है। पारंपरिक युद्ध में जहां सेना शहरों पर कब्जा करती है और लंबे समय तक लड़ाई चलती है, वहीं इस रणनीति में केवल अहम टारगेट्स पर हमला किया जाता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कहा कि यह अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक ईरान का मौजूदा सिस्टम कमजोर नहीं हो जाता। इस रणनीति का मकसद सीधे जनता को प्रभावित करना नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्र को निशाना बनाना है। इजरायल का कहना है कि वह अब तक 1200 से ज्यादा बम ईरान पर गिरा चुका है।

इस दौरान ईरान के कई शीर्ष सैन्य अधिकारियों और सुरक्षा ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा। इन हमलों में ईरान के सुप्रीम धार्मिक लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई भी मारे गए। अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स और आधिकारिक बयानों के अनुसार, करीब 30 से 40 या उससे ज्यादा वरिष्ठ अधिकारी इन हमलों में मारे गए। (Decapitation Strikes Strategy)

इनमें सबसे बड़ा नाम ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई का है, जो 1989 से देश की सत्ता संभाल रहे थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, तेहरान में उनके कंपाउंड पर एयरस्ट्राइक की गई, जिसमें उनकी मौत हो गई। इन हमलों में अली शमखानी भी मारे गए, जो सुप्रीम लीडर के करीबी सलाहकार थे और देश की नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े अहम पदों पर रह चुके थे। इसके अलावा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के कमांडर मोहम्मद पाकपुर भी हमले में मारे गए। ईरान की सैन्य ताकत में आईआरजीसी की बहुत बड़ी भूमिका होती है, इसलिए यह नुकसान काफी अहम माना जा रहा है।

ईरान के रक्षा मंत्री अजीज नसीरजादेह की मौत की भी पुष्टि कई रिपोर्ट्स में की गई है। साथ ही ईरान की पूरी सेना के प्रमुख यानी चीफ ऑफ स्टाफ अब्दोलरहीम मौसावी भी इन हमलों में मारे गए बताए गए हैं। इसके अलावा
सुप्रीम लीडर के मिलिट्री ऑफिस से जुड़े मोहम्मद शिराज़ी, इंटेलिजेंस से जुड़े सालेह असादी और न्यूक्लियर व केमिकल प्रोजेक्ट्स से जुड़े कुछ वरिष्ठ अधिकारी शामिल बताए गए हैं। हालांकि इन सभी नामों की पुष्टि अलग-अलग स्तर पर हुई है और कुछ मामलों में आधिकारिक जानकारी अभी भी सामने आ रही है। (Decapitation Strikes Strategy)

रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि शुरुआती हमलों में बहुत कम समय के भीतर कई कमांडरों को निशाना बनाया गया। इज़राइल की सेना के अनुसार, कुछ हमलों में एक ही समय में कई वरिष्ठ अधिकारियों को खत्म किया गया। इन ऑपरेशनों को अमेरिका की तरफ से “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” और इजरायल की तरफ से “ऑपरेशन रोअरिंग लायन” नाम दिया गया है। इन हमलों के बाद ईरान के अंदर राजनीतिक और सैन्य स्तर पर हलचल तेज हो गई। (Decapitation Strikes Strategy)

प्रिसिजन स्ट्राइक्स से किए जा रहे हैं हमले

इस पूरे अभियान में “प्रिसिजन स्ट्राइक्स” यानी सटीक हमले सबसे अहम भूमिका निभा रहे हैं। इसमें ऐसे हथियारों का इस्तेमाल किया जाता है जो जीपीएस, लेजर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या अन्य गाइडेंस सिस्टम की मदद से बिल्कुल सटीक निशाना लगाते हैं।

अमेरिका ने टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल किया, जिन्हें दूर समुद्र से लॉन्च किया गया। ये मिसाइलें हजारों किलोमीटर दूर तक जाकर सटीक हमला कर सकती हैं। इसके अलावा स्टेल्थ फाइटर जेट जैसे एफ-35 का इस्तेमाल किया गया, जो दुश्मन के रडार से बचकर अंदर तक घुस सकते हैं।

इजराइल ने भी अपने एडवांस्ड गाइडेड बम और स्पाइस सिस्टम का इस्तेमाल किया। इन हमलों में ड्रोन की भूमिका भी काफी अहम रही। खासकर “वन-वे अटैक ड्रोन” यानी कामिकेज ड्रोन, जो सीधे टारगेट से टकराकर उसे नष्ट कर देते हैं। (Decapitation Strikes Strategy)

ड्रोन और साइबर ऑपरेशन का बढ़ता रोल

इस बार के हमलों में सिर्फ मिसाइल और विमान ही नहीं, बल्कि ड्रोन और साइबर ऑपरेशन का भी बड़ा रोल देखा गया। अमेरिका ने लो-कॉस्ट ड्रोन का इस्तेमाल किया, जो सस्ते होते हुए भी प्रभावी साबित हो रहे हैं।

इन ड्रोन को बड़ी संख्या में लॉन्च किया जाता है, जिससे दुश्मन की एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ता है। इसके साथ ही साइबर अटैक के जरिए ईरान के कम्युनिकेशन और डिफेंस सिस्टम को भी प्रभावित करने की कोशिश की गई। (Decapitation Strikes Strategy)

बिना ग्राउंड ट्रूप्स के युद्ध

इस अभियान की एक बड़ी खासियत यह है कि इसमें अमेरिका ने जमीनी सेना भेजने से साफ इनकार किया है। इराक और अफगानिस्तान जैसे लंबे युद्धों से मिले अनुभव के बाद अब अमेरिका ऐसे ऑपरेशन से बचना चाहता है।

इसलिए पूरी रणनीति एयर पावर, मिसाइल, ड्रोन और इंटेलिजेंस पर आधारित है। इससे युद्ध की लागत कम होती है और सैनिकों की जान का खतरा भी कम रहता है। (Decapitation Strikes Strategy)

ईरान ने भी की जवाबी कार्रवाई

इन हमलों के बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की है। ईरान ने इजरायल, अमेरिकी ठिकानों और खाड़ी देशों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। कई जगहों पर अलर्ट जारी किए गए और एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय हो गए।

ईरान के अधिकारियों ने इन हमलों को “रेड लाइन” पार करना बताया और बदला लेने की बात कही। इसके साथ ही क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया।

इस पूरे घटनाक्रम पर दुनिया की नजर बनी हुई है। रूस और चीन ने इन हमलों की आलोचना की है, जबकि यूरोपीय देशों ने तनाव कम करने की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई है। (Decapitation Strikes Strategy)

भारत के लिए क्यों अहम

भारत ने भी संयम बरतने की बात कही है और सभी पक्षों से बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है। भारत के लिए यह स्थिति काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मध्य पूर्व से उसका बड़ा आर्थिक और ऊर्जा संबंध है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल इसी क्षेत्र से आयात करता है।

इसके अलावा लाखों भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं। ऐसे में क्षेत्र में अस्थिरता का असर सीधे भारत पर पड़ सकता है।

भारत सरकार ने स्थिति पर नजर रखने की बात कही है और अपने नागरिकों के लिए एडवाइजरी भी जारी की गई है। (Decapitation Strikes Strategy)

LUCAS Vs Shahed 136: पहली बार अमेरिका ने कामिकेज ड्रोन से किया हमला, ईरानी टेक्नोलॉजी को किया कॉपी

LUCAS Vs Shahed 136

LUCAS Vs Shahed 136: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी सेना ने पहली बार लंबी दूरी के कामिकेज ड्रोन का इस्तेमाल असली युद्ध में किया है। यह ड्रोन LUCAS नाम से जाना जाता है, जिसे “लो-कॉस्ट अनक्रूड कॉम्बैट अटैक सिस्टम” कहा जाता है। यह हमला अमेरिका और इजरायल द्वारा मिलकर चलाए गए ऑपरेशन “एपिक फ्यूरी” का हिस्सा था, जिसमें ईरान के कई ठिकानों को निशाना बनाया गया।

अमेरिकी सेंट्रल कमांड यानी सेंटकॉम ने इस बात की पुष्टि की है कि इन ड्रोन को जमीन से लॉन्च किया गया था। इस ऑपरेशन को टास्क फोर्स स्कॉर्पियन स्ट्राइक नाम की यूनिट ने अंजाम दिया, जिसे खास तौर पर ईरान की रणनीति का जवाब देने के लिए बनाया गया था। (LUCAS Vs Shahed 136)

LUCAS Vs Shahed 136: क्या होता है कामिकेज ड्रोन

कामिकेज ड्रोन को वन-वे अटैक ड्रोन भी कहा जाता है। इसका मतलब यह होता है कि यह ड्रोन एक बार उड़ान भरने के बाद सीधे अपने टारगेट से टकराकर उसे नष्ट कर देता है। इसमें वापसी का कोई सिस्टम नहीं होता। इसे लोइटरिंग म्यूनिशन भी कहा जाता है, यानी यह कुछ समय तक हवा में रह कर सही मौके पर हमला करता है।

यह ड्रोन पारंपरिक मिसाइलों की तुलना में काफी सस्ता होता है और बड़ी संख्या में इस्तेमाल किया जा सकता है। यही कारण है कि आधुनिक युद्ध में इनका इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।

सरल शब्दों में कहें तो शाहेद ड्रोन की डिजाइन पूरी तरह नई नहीं है। इसकी जड़ें पहले इजरायल की एक अवधारणा में मिलती हैं, और उस अवधारणा की प्रेरणा भी जर्मनी के पुराने डिजाइन से जुड़ी थी। यानी यह तकनीक कई देशों के विचारों और विकास से होकर आगे बढ़ी है, इसलिए इसकी पृष्ठभूमि काफी जटिल और मिश्रित मानी जाती है। (LUCAS Vs Shahed 136)

क्या है LUCAS ड्रोन की खासियत

LUCAS ड्रोन को कम लागत में ज्यादा असर देने के लिए डिजाइन किया गया है। इसे स्पेक्ट्रेवर्क्स ने डिजाइन किया है। एक ड्रोन की कीमत करीब 35,000 डॉलर बताई गई है, जो किसी भी मिसाइल से काफी कम है। इस वजह से इसे बड़ी संख्या में तैयार किया जा सकता है और एक साथ कई ड्रोन भेजकर हमला किया जा सकता है।

इस ड्रोन की सबसे बड़ी खासियत इसकी लंबी दूरी तक उड़ान भरने की क्षमता है। यह “बियॉन्ड लाइन ऑफ साइट” यानी आंखों से दिखाई देने वाली दूरी से भी आगे जाकर काम कर सकता है। इसमें ऑटोमेटेड सिस्टम लगाया गया है, जिससे यह खुद टारगेट पहचानकर हमला कर सकता है। (LUCAS Vs Shahed 136)

इस ड्रोन की रेंज करीब 444 मील तक बताई गई है और यह लगभग 6 घंटे तक हवा में रह सकता है। इसका मतलब है कि यह लंबे समय तक टारगेट ढूंढ सकता है और सही मौके पर हमला कर सकता है। इसमें करीब 40 पाउंड तक पेलोड ले जाने की क्षमता होती है, यानी यह एक सीमित लेकिन प्रभावी वारहेड लेकर जाता है।

वहीं इसकी क्रूज स्पीड लगभग 74 नॉट्स है, जो जरूरत पड़ने पर 105 नॉट्स तक पहुंच सकती है। LUCAS को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह ऑटोनॉमस यानी अपने आप काम कर सके और नेटवर्क के जरिए दूसरे ड्रोन के साथ मिलकर हमला कर सके। इसे अलग-अलग तरीकों ग्राउंड लॉन्चर, कैटापल्ट या वाहन से लॉन्च किया जा सकता है।

इसके अलावा इसमें स्वार्म यानी झुंड में काम करने की क्षमता भी है। इसका मतलब है कि कई ड्रोन एक साथ मिलकर एक ही लक्ष्य पर हमला कर सकते हैं। इससे दुश्मन की एयर डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ जाता है और उन्हें रोकना मुश्किल हो जाता है। (LUCAS Vs Shahed 136)

ईरान के ड्रोन से प्रेरित है अमेरिकी LUCAS

अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार LUCAS ड्रोन का डिजाइन काफी हद तक ईरान के मशहूर शाहेद-136 ड्रोन से लिया गया है। अमेरिकी सेना ने एक ईरानी ड्रोन को हासिल किया और उसकी तकनीक को समझकर उसे अपने तरीके से विकसित किया।

शाहेद-136 ड्रोन पहले से ही कई युद्धों में इस्तेमाल हो चुका है। यह लंबी दूरी तक उड़ान भर सकता है और तय किए गए टारगेट पर जाकर हमला करता है। रूस ने भी इसी तरह के ड्रोन का इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में किया है।

LUCAS ड्रोन उसी डिजाइन पर आधारित है, लेकिन इसमें अमेरिकी टेक्नोलॉजी और नए फीचर्स जोड़े गए हैं। (LUCAS Vs Shahed 136)

शाहेद-136 ड्रोन की खूबियां

शाहेद-136 ईरान का एक कामिकेज ड्रोन है, जो अपनी लंबी रेंज और भारी वारहेड के लिए जाना जाता है। इसमें छोटा इंजन लगा होता है, लेकिन इसके बावजूद यह लगभग 2,000 किलोमीटर तक उड़ सकता है, जो इसे बहुत लंबी दूरी का हथियार बनाता है।

शाहेद ड्रोन का डिजाइन पूरी तरह नया नहीं है। इसकी जड़ें पहले इजरायल की एक अवधारणा में मिलती हैं, और उस अवधारणा की प्रेरणा भी जर्मनी के पुराने डिजाइन से जुड़ी थी। 1980 के दशक में दुनिया ने पहली बार जर्मनी के एक खास ड्रोन द्रोहने एंटी-रडार (डीएआर) को देखा था, जिसे डोर्नियर कंपनी ने बनाया था। इसका मकसद दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को कमजोर करना था।

करीब चार दशक बाद, इसी तरह की सोच पर आधारित तकनीक और आगे बढ़ी। ईरान ने अपना मशहूर ड्रोन शाहेद-136 तैयार किया, जिसका इस्तेमाल रूस ने यूक्रेन युद्ध में बड़े पैमाने पर किया। बाद में ईरान ने भी इसे इजरायल के खिलाफ संघर्ष में इस्तेमाल किया। (LUCAS Vs Shahed 136)

इसी तरह भारत ने भी इज़राइली एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज के हेरोप और हार्पी जैसे ड्रोन का इस्तेमाल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमले करने के लिए किया।

अब अमेरिका ने भी इसी की नकल करके अपना नया ड्रोन LUCAS बनाया जिसे FLM-136 भी कहा जाता है।

शाहेद ड्रोन की टॉप स्पीड करीब 100 नॉट्स (लगभग 185 किमी/घंटा) है और यह करीब 40 किलोग्राम तक का वारहेड लेकर जा सकता है। इसका मतलब है कि यह एक बार में ज्यादा नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखता है। इसे पहले से प्रोग्राम किए गए टारगेट पर हमला करने के लिए डिजाइन किया गया है, यानी लॉन्च से पहले इसमें लक्ष्य की जानकारी डाल दी जाती है।

ईरान ने इसके कई नए वेरिएंट भी बनाए हैं, जैसे शाहेद-238, जिसमें बेहतर गाइडेंस सिस्टम, रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल/इंफ्रारेड ट्रैकिंग जैसी तकनीक शामिल की गई है। इसके अलावा रूस भी इसी डिजाइन पर आधारित “गेरान” ड्रोन बना रहा है।

शाहेद-136 की एक बड़ी खासियत यह है कि इसे बड़ी संख्या में इस्तेमाल किया जा सकता है और यह एयर डिफेंस सिस्टम के लिए चुनौती बन जाता है। हाल के संघर्षों में इसने कई अहम ठिकानों को निशाना बनाया है, जिससे इसकी प्रभावशीलता सामने आई है। (LUCAS Vs Shahed 136)

कैसे लॉन्च किया गया ड्रोन

इस ऑपरेशन में LUCAS ड्रोन को जमीन से लॉन्च किया गया। इसके लिए अलग-अलग लॉन्च सिस्टम का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे कैटापल्ट, रॉकेट असिस्टेड टेकऑफ या मोबाइल वाहन से लॉन्च किया जा सकता है।

अमेरिकी नौसेना ने पहले एक युद्धपोत से भी इस ड्रोन का परीक्षण किया था। इससे यह साफ होता है कि भविष्य में इसे समुद्र से भी लॉन्च किया जा सकता है। (LUCAS Vs Shahed 136)

ड्रोन की रेंज सैकड़ों किलोमीटर तक

इस तरह के ड्रोन की रेंज सैकड़ों किलोमीटर तक हो सकती है और यह कई घंटों तक हवा में रह सकता है। इसमें सीमित वजन का वारहेड लगाया जाता है, जो टारगेट पर जाकर विस्फोट करता है।

यह ड्रोन जीपीएस और अन्य नेविगेशन सिस्टम की मदद से उड़ान भरता है। कुछ आधुनिक वर्जन में रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर भी लगाए जाते हैं, जिससे यह चलते हुए लक्ष्य को भी पहचान सकता है। (LUCAS Vs Shahed 136)

आधुनिक युद्ध में ड्रोन का बढ़ता इस्तेमाल

हाल के वर्षों में ड्रोन युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पहले जहां महंगे मिसाइल सिस्टम पर निर्भरता थी, अब कम लागत वाले ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ गया है। इससे छोटे देशों को भी बड़ी सैन्य ताकत मिल रही है।

ईरान ने इस क्षेत्र में काफी पहले काम शुरू कर दिया था और अब अमेरिका भी उसी मॉडल को अपनाता दिख रहा है। इससे यह साफ होता है कि भविष्य के युद्ध में ड्रोन की भूमिका और बढ़ने वाली है।

क्यों एक जैसे दिखते हैं ये ड्रोन

अगर अलग-अलग देशों के कामिकेज ड्रोन को देखा जाए, तो उनमें काफी समानता नजर आती है। इसका मुख्य कारण उनका डिजाइन है। इन ड्रोन में डेल्टा विंग यानी त्रिकोण आकार के पंख होते हैं, जो उन्हें ज्यादा स्थिरता और लंबी दूरी देते हैं।

इस डिजाइन से ड्रोन को ज्यादा ईंधन रखने की जगह मिलती है और वह ज्यादा समय तक उड़ सकता है। साथ ही यह डिजाइन सस्ता और आसान भी होता है, इसलिए कई देश इसी तरह के ड्रोन बना रहे हैं। (LUCAS Vs Shahed 136)

कितना प्रभावी है यह हथियार

इस तरह के ड्रोन दुश्मन के ठिकानों, रडार सिस्टम और एयर डिफेंस को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। इनकी खासियत यह है कि ये अचानक हमला करते हैं और कम लागत में ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। ये कम ऊंचाई पर लो लेवल पर उड़ान भरते हैं, जिससे ये रडार की पकड़ में आसानी से नहीं आते। हालांकि एयर डिफेंस सिस्टम इन्हें रोकने की कोशिश करते हैं, लेकिन बड़ी संख्या में आने पर इन्हें पूरी तरह रोकना मुश्किल हो जाता है।

ऑपरेशन में कितने ड्रोन इस्तेमाल हुए

अमेरिका ने इस ऑपरेशन में कितने LUCAS ड्रोन इस्तेमाल किए और किन-किन ठिकानों को निशाना बनाया, इस बारे में आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। अमेरिकी अधिकारियों ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार किया है। फिर भी यह स्पष्ट है कि यह पहली बार है जब अमेरिका ने इस तरह के लंबी दूरी के कामिकेज ड्रोन को सीधे युद्ध में इस्तेमाल किया है। (LUCAS Vs Shahed 136)

हाइपरसोनिक से क्लस्टर वारहेड तक, ईरान के पास है 3000 से ज्यादा मिसाइलों, ड्रोन आर्मी और खतरनाक हथियारों का जखीरा

Iran military power

Iran Military Power: पश्चिमी एशिया में चल रहे तनाव के बीच ईरान की सैन्य ताकत एक बार फिर चर्चा में है। ईरान की सेना, जिसे इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान आर्म्ड फोर्सेस कहा जाता है, और खास तौर पर इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC के पास बड़ी संख्या में मिसाइलें, ड्रोन, टैंक और अन्य हथियार मौजूद हैं। हाल के संघर्ष के दौरान ईरान ने अपने हथियारों का इस्तेमाल किया, जिससे उसकी सैन्य क्षमता को लेकर नई जानकारी सामने आई है।

Iran Military Power: मिसाइल प्रोग्राम ईरान की सबसे बड़ी ताकत

ईरान का मिसाइल प्रोग्राम उसकी सैन्य शक्ति का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है। ईरान के पास अलग-अलग रेंज की हजारों बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुल मिलाकर यह संख्या 3,000 से ज्यादा हो सकती है। ईरान ने अपनी मिसाइलों की अधिकतम रेंज लगभग 2,000 किलोमीटर तक सीमित रखी है, जो क्षेत्रीय स्तर पर इजरायल जैसे बड़े लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए काफी है। (Iran Military Power)

MaRV तकनीक वाली मिसाइलें

शॉर्ट रेंज बैलिस्टिक मिसाइलों में शाहाब-1 और शाहाब-2 जैसे सिस्टम शामिल हैं, जिनकी रेंज 300 से 500 किलोमीटर तक है। इसके अलावा फतेह-110 और जोलफागर जैसी मिसाइलें भी बड़ी संख्या में मौजूद हैं। मीडियम रेंज मिसाइलों में शाहाब-3, सिज्जिल और खोर्रमशहर जैसे सिस्टम शामिल हैं, जो 1,000 से 2,000 किलोमीटर तक मार कर सकते हैं।

ईरान ने हाल के सालों में फत्ताह-1 और फत्ताह-2 जैसी हाइपरसोनिक क्षमता वाली मिसाइलों का भी दावा किया है। इसके अलावा क्रूज मिसाइलों में होवेइजेह और अबू महदी जैसे सिस्टम शामिल हैं, जो लंबी दूरी तक सटीक हमला करने में सक्षम हैं। फत्ताह-1 और फत्ताह-2 असल में बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, जिनमें मैन्यूवेरेबल री-एंट्री व्हीकल यानी MaRV तकनीक होती है। इसका मतलब यह है कि मिसाइल लक्ष्य के पास पहुंचते समय दिशा बदल सकती है और बहुत तेज गति से हमला करती है। इनकी रेंज करीब 1,400 से 1,500 किलोमीटर बताई जाती है। (Iran Military Power)

इसी तरह खोर्रमशहर-4 मिसाइल भी ईरान की ताकत का हिस्सा है, जिसकी रेंज लगभग 2,000 किलोमीटर है और यह भारी वारहेड ले जा सकती है। ईरान का दावा है कि यह मिसाइल एक से ज्यादा वारहेड भी ले जा सकती है, हालांकि इसे लेकर पूरी पुष्टि नहीं है। कुछ अन्य क्रूज मिसाइलें जैसे होवेइजेह और अबू महदी को भी तेज बताया जाता है, लेकिन ज्यादातर मामलों में वे सब-सोनिक या टर्मिनल फेज में ही ज्यादा स्पीड पकड़ती हैं।

सुपरसोनिक मिसाइलें भी हैं मौजूद

ईरान के पास सुपरसोनिक मिसाइलें भी मौजूद हैं, यानी ऐसी मिसाइलें जो आवाज की रफ्तार (मैक 1) से कई गुना तेज उड़ती हैं। आम तौर पर ये क्षमता उसकी क्रूज मिसाइलों में और बैलिस्टिक मिसाइलों के आखिरी चरण यानी टर्मिनल फेज में देखने को मिलती है। ईरान की ज्यादातर बैलिस्टिक मिसाइलें, जैसे शाहाब और सिज्जिल, अपने टारगेट के पास पहुंचते समय हाइपरसोनिक स्पीड (मैक 5 से ज्यादा) हासिल कर लेती हैं। हालांकि, अगर बात पूरी तरह विकसित सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों की करें, तो ईरान के पास अभी उनकी संख्या सीमित है। (Iran Military Power)

क्लस्टर वारहेड वाली मिसाइलें

इसके अलावा ईरान के पास क्लस्टर वारहेड वाली मिसाइलें भी हैं, जो हवा में जाकर कई छोटे बम छोड़ती हैं। खोर्रमशहर-4 को लेकर ईरान ने दावा किया है कि यह मल्टी-वारहेड कैपेबल है। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि यह एक साथ कई टारगेट्स को हिट कर सकती है, लेकिन विशेषज्ञ इसे पूरी तरह MIRV नहीं बल्कि क्लस्टर या मल्टीपल पेलोड सिस्टम मानते हैं।

इसके अलावा कद्र, जोलफागर और फतेह सीरीज की कुछ मिसाइलों में क्लस्टर म्यूनिशन इस्तेमाल होने की बात सामने आई है। इन मिसाइलों में मुख्य वारहेड हवा में खुलता है और कई छोटे बम गिराता है, जो बड़े इलाके को कवर करते हैं। 2025 के हमलों में ऐसी मिसाइलों के इस्तेमाल की रिपोर्ट भी सामने आई थी, जहां एक मिसाइल से कई सबम्यूनिशन गिराए गए।

इन क्लस्टर हथियारों की खासियत यह है कि ये एक साथ बड़े इलाके को नुकसान पहुंचा सकते हैं, लेकिन क्योंकि ये पूरी तरह गाइडेड नहीं होते, इसलिए नागरिक इलाकों में इनके इस्तेमाल से ज्यादा खतरा होता है। (Iran Military Power)

ड्रोन और यूएवी: स्ट्राइक मिशन के लिए इस्तेमाल

ईरान की सैन्य रणनीति में ड्रोन यानी अनमैन्ड एरियल व्हीकल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। ईरान के पास हजारों की संख्या में ड्रोन मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल निगरानी और हमले दोनों के लिए किया जाता है। शाहेद-136 जैसे कामिकेज ड्रोन हाल के संघर्षों में चर्चा में रहे हैं।

शाहेद-129 और मोहाजेर-6 जैसे ड्रोन सर्विलांस और स्ट्राइक मिशन के लिए इस्तेमाल होते हैं। वहीं अराश और मेराज जैसे लॉइटरिंग म्यूनिशन यानी खुद टारगेट पर गिरकर हमला करने वाले ड्रोन भी ईरान के आर्सेनल का हिस्सा हैं। इन ड्रोन का इस्तेमाल कम लागत में बड़े नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाता है। (Iran Military Power)

टैंक और आर्टिलरी

ईरान के पास बड़ी संख्या में जमीनी हथियार भी मौजूद हैं। टैंकों की संख्या 1,500 से ज्यादा बताई जाती है। इनमें करार, जुल्फिकार और टी-72 जैसे टैंक शामिल हैं। इसके अलावा ईरान के पास अलग-अलग तरह की आर्टिलरी गन और मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम भी हैं।

बीएम-21 ग्रैड और फजर-5 जैसे रॉकेट सिस्टम लंबी दूरी तक फायरिंग करने में सक्षम हैं। इन्फैंट्री हथियारों में जी3 राइफल, एके-103 और मशीन गन जैसे सिस्टम शामिल हैं। इसके अलावा एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल जैसे तुफान और देहलावियेह भी सेना के पास हैं।

एयर फोर्स: पुराने प्लेटफॉर्म पर निर्भरता

ईरान की एयर फोर्स को उसकी कमजोर कड़ी माना जाता है। इसके पास कई पुराने फाइटर जेट हैं, जिनमें एफ-14 टॉमकैट, मिग-29 और एफ-4 फैंटम शामिल हैं। हालांकि ईरान इन विमानों को अपग्रेड करके इस्तेमाल कर रहा है।

हेलीकॉप्टर फ्लीट में एमआई-17, बेल-214 और एएच-1जे जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं। हाल ही में रूस से एमआई-28 अटैक हेलीकॉप्टर मिलने की भी जानकारी सामने आई है। (Iran Military Power)

नौसेना और एंटी-शिप क्षमता

ईरान की नौसेना खास तौर पर पर्शियन गल्फ क्षेत्र में सक्रिय रहती है। यहां उसकी रणनीति तेज गति वाली बोट्स और एंटी-शिप मिसाइलों पर आधारित है। नूर, कादेर और घादिर जैसी मिसाइलें समुद्री लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं।

इसके अलावा ईरान ने नेवल ड्रोन और छोटे हमलावर प्लेटफॉर्म भी विकसित किए हैं, जो समुद्री युद्ध में इस्तेमाल होते हैं।

हाल के सालों में ईरान ने अपने सैन्य सिस्टम में लगातार बदलाव किए हैं। 2025 और 2026 के दौरान नए मिसाइल सिस्टम और उपकरणों को शामिल किया गया। कुछ सैन्य ठिकानों को नुकसान भी पहुंचा, लेकिन इसके बावजूद ईरान अपनी सैन्य क्षमता को बनाए हुए है। (Iran Military Power)

Israel Iran Conflict: भारत की अपील- कम करो तनाव, गल्फ में भारतीयों की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता

Israel Iran Conflict

Israel Iran Conflict: इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष के बीच भारत ने हालात को शांत करने के लिए तेज डी-एस्केलेशन यानी तनाव कम करने की अपील की है। सरकार के सूत्रों के मुताबिक, भारत इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से देख रहा है और चाहता है कि हालात और न बिगड़ें।

सूत्रों ने बताया कि मौजूदा स्थिति बेहद संवेदनशील है और लगातार हमलों के कारण क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ रही है। ऐसे में भारत की प्राथमिकता है कि सभी पक्ष बातचीत के जरिए तनाव को कम करें। (Israel Iran Conflict)

Israel Iran Conflict: खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता पर भारत का फोकस

भारत ने साफ किया है कि उसकी सबसे बड़ी चिंता खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता है। इसका सीधा संबंध वहां रह रहे भारतीय नागरिकों, व्यापार और समुद्री सुरक्षा से है। गल्फ देशों में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं और वहां की स्थिति का असर सीधे भारत पर पड़ता है।

सरकारी अधिकारियों के अनुसार, भारत के लिए जरूरी है कि इस क्षेत्र में शांति बनी रहे ताकि व्यापारिक गतिविधियां और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित न हों। (Israel Iran Conflict)

भारतीय नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी

इजरायल और ईरान में भारतीय दूतावासों ने अपने नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी की है। इसमें लोगों को सतर्क रहने, गैर-जरूरी यात्रा से बचने और सुरक्षित स्थानों पर रहने की सलाह दी गई है।

तेहरान और तेल अवीव में मौजूद भारतीयों से कहा गया है कि वे स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करें और किसी भी आपात स्थिति में दूतावास से संपर्क करें। गल्फ देशों में भी भारतीयों को सतर्क रहने के लिए कहा गया है। (Israel Iran Conflict)

फ्लाइट्स और ट्रैवल पर असर

मौजूदा हालात का असर हवाई सेवाओं पर भी पड़ा है। कई एयरलाइंस ने मध्य पूर्व के लिए अपनी उड़ानों को रोक दिया है या उनका रूट बदल दिया है। इजरायल का एयरस्पेस बंद होने के कारण कई फ्लाइट्स को डायवर्ट करना पड़ा।

इससे यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है और स्थिति सामान्य होने का इंतजार किया जा रहा है। (Israel Iran Conflict)

भारत की रणनीतिक संतुलन नीति

भारत इस पूरे मामले में संतुलन बनाए रखने की नीति पर चल रहा है। सरकार सभी पक्षों के साथ संवाद बनाए रखना चाहती है। सूत्रों के मुताबिक, भारत वॉशिंगटन, तेल अवीव और तेहरान के साथ बैक-चैनल बातचीत को भी बढ़ावा दे रहा है।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि भारत अपने हितों की रक्षा करते हुए सभी देशों के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है। यही भारत की रणनीतिक ऑटोनॉमी यानी स्वतंत्र नीति का हिस्सा है। (Israel Iran Conflict)

हाल ही में अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमले किए, जिसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए मिसाइल हमले किए। इन हमलों की आवाज कई देशों तक सुनी गई और क्षेत्र में तनाव तेजी से बढ़ गया।

ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने अमेरिका और उसके सहयोगियों को निशाना बनाने की बात कही है। वहीं इजरायल ने इन हमलों को अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी बताया है। (Israel Iran Conflict)

व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा पर असर

भारत के लिए इस क्षेत्र का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि देश का बड़ा हिस्सा तेल आयात खाड़ी से होता है। अगर हालात बिगड़ते हैं तो इसका असर एनर्जी सप्लाई और कीमतों पर पड़ सकता है।

इसके अलावा अरब सागर और आसपास के समुद्री मार्ग भारत के व्यापार के लिए बेहद अहम हैं। ऐसे में वहां की सुरक्षा भी भारत के लिए प्राथमिकता बनी हुई है।

सूत्रों के अनुसार, भारत समुद्री सुरक्षा पर भी नजर बनाए हुए है। जरूरत पड़ने पर भारतीय नौसेना अपनी गतिविधियां बढ़ा सकती है ताकि समुद्री रास्तों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। (Israel Iran Conflict)

कई देशों ने जताई चिंता

इस पूरे घटनाक्रम पर दुनिया के कई देशों ने चिंता जताई है और शांति की अपील की है। भारत भी लगातार यही कह रहा है कि तनाव को जल्द से जल्द कम किया जाए और बातचीत के जरिए समाधान निकाला जाए।

भारत ने किसी भी पक्ष का खुलकर समर्थन नहीं किया है और अपनी पारंपरिक संतुलित विदेश नीति को जारी रखा है। (Israel Iran Conflict)

क्या VSHORADS बनेगा भारतीय सेना का नया ‘भरोसा’? ‘लो-लेवल डिफेंस शील्ड’ में कैसे Igla-S और Stinger को दे रहा कड़ी टक्कर

VSHORADS vs Stinger vs Igla

VSHORADS vs Stinger vs Igla: ओडिशा के चांदीपुर तट के पास इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में हाल ही में डीआरडीओ ने बहुत कम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली (VSHORADS) के तीन लगातार सफल फ्लाइट ट्रायल किए। यह परीक्षण “यूजर वैलिडेशन ट्रायल” के तौर पर किए गए, जिसमें फील्ड ऑपरेटर्स ने खुद टारगेट को पहचान कर मिसाइल दागी।

यह सिस्टम खास तौर पर कम ऊंचाई पर उड़ने वाले खतरों जैसे ड्रोन, हेलीकॉप्टर और दुश्मन के विमान को नष्ट करने के लिए बनाया गया है। इसे पैदल सैनिक अपने कंधे या पोर्टेबल लॉन्चर से दाग सकते हैं। इस तरह के सिस्टम को मैनपैड्स यानी मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम कहा जाता है।

VSHORADS vs Stinger vs Igla: तीनों ट्रायल में हर टारगेट हुआ तबाह

डीआरडीओ के अनुसार तीनों परीक्षणों के दौरान मिसाइल ने हाई-स्पीड हवाई टारगेट्स को सफलतापूर्वक इंटरसेप्ट किया और नष्ट कर दिया। ये टारगेट दुश्मन के एयरक्राफ्ट जैसे हालात को ध्यान में रखकर तैयार किए गए थे। अलग-अलग ऊंचाई, दूरी और स्पीड पर उड़ते लक्ष्यों को मिसाइल ने सटीक तरीके से मार गिराया।

इन परीक्षणों के दौरान टेलीमेट्री, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम और रडार जैसे आधुनिक उपकरणों से डेटा रिकॉर्ड किया गया। इस डेटा से यह पुष्टि हुई कि सिस्टम हर तरह के खतरे के खिलाफ प्रभावी है। इन ट्रायल्स में तीनों सेनाओं के प्रतिनिधि और डीआरडीओ के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। (VSHORADS vs Stinger vs Igla)

कैसे काम करता है यह सिस्टम

VSHORADS एक चौथी पीढ़ी का एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम है। इसमें ड्यूल वेवबैंड इमेजिंग इंफ्रारेड सीकर लगा है, जो बहुत छोटे और कम हीट सिग्नेचर वाले टारगेट्स को भी पहचान सकता है। इसका मतलब है कि यह ड्रोन जैसे छोटे लक्ष्यों को भी आसानी से ट्रैक कर सकता है।

इस मिसाइल में ड्यूल-थ्रस्ट सॉलिड रॉकेट मोटर लगी है, जो शुरुआत में तेज स्पीड देती है और फिर लगातार उड़ान बनाए रखती है। इसकी अधिकतम रेंज करीब 6 किलोमीटर तक है और यह लगभग 3.5 किलोमीटर की ऊंचाई तक टारगेट को मार सकता है। इसकी स्पीड करीब मैक 1.5 तक पहुंच जाती है।

इसमें मिनिएचराइज्ड रिएक्शन कंट्रोल सिस्टम भी है, जिससे यह हवा में तेजी से दिशा बदल सकती है। यह फीचर इसे ज्यादा मैन्यूवेरेबल बनाता है, यानी यह टारगेट को बेहतर तरीके से फॉलो कर सकती है।

पुराने सिस्टम की जगह लेगा नया VSHORADS

भारतीय सेनाओं में अभी तक इग्ला जैसे पुराने MANPADS सिस्टम इस्तेमाल किए जाते हैं। VSHORADS को इन्हीं पुराने सिस्टम की जगह लेने के लिए विकसित किया गया है। यह तकनीक के मामले में ज्यादा एडवांस्ड है और आधुनिक युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया है।

खास बात यह है कि यह सिस्टम पूरी तरह स्वदेशी है। इसे डीआरडीओ के रिसर्च सेंटर इमारत (RCI) ने अन्य लैब्स और इंडस्ट्री पार्टनर्स के साथ मिलकर विकसित किया है। इससे भारत की विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम होगी। (VSHORADS vs Stinger vs Igla)

डेवलपमेंट और ट्रायल्स का सफर

इस सिस्टम का विकास पिछले कुछ वर्षों से लगातार जारी है। 2022 में इसका पहला सफल टेस्ट हुआ था। इसके बाद 2023, 2024 और 2025 में कई सफल ट्रायल किए गए। हर बार सिस्टम में सुधार किया गया और इसे अंतिम डिप्लॉयमेंट कॉन्फ़िगरेशन तक पहुंचाया गया।

फरवरी 2026 के ये ट्रायल इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा माने जा रहे हैं, क्योंकि इसमें फील्ड ऑपरेटर्स ने खुद सिस्टम का इस्तेमाल किया। इसका मतलब है कि अब यह सिस्टम असल ऑपरेशन के लिए तैयार हो रहा है।

आधुनिक युद्ध में क्यों है जरूरी 

आज के समय में युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है। ड्रोन और लो-एल्टीट्यूड अटैक का खतरा बढ़ गया है। छोटे ड्रोन भी बड़े नुकसान पहुंचा सकते हैं। ऐसे में VSHORADS जैसे सिस्टम बेहद जरूरी हो जाते हैं, जो तुरंत प्रतिक्रिया देकर खतरे को खत्म कर सकें।

यह सिस्टम मल्टी-लेयर्ड एयर डिफेंस का हिस्सा होगा, यानी बड़े मिसाइल सिस्टम के साथ मिलकर काम करेगा। इससे देश की सुरक्षा और मजबूत होगी। (VSHORADS vs Stinger vs Igla)

VSHORADS vs Stinger: कैसे भारतीय सिस्टम दे रहा है कड़ी टक्कर

भारत का स्वदेशी VSHORADS और अमेरिका का FIM-92 Stinger, दोनों ही MANPADS (मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम) हैं, लेकिन दोनों की डिजाइन फिलॉसफी और इस्तेमाल का तरीका अलग है। आसान भाषा में समझें तो VSHORADS नई पीढ़ी का “स्मार्ट शिकारी” है, जबकि स्टिंगर तेज और हल्का हथियार है जो लंबे समय से युद्ध में साबित हो चुका है।

टेक्नोलॉजी में आगे: VSHORADS में है ये फीचर

VSHORADS की सबसे बड़ी ताकत उसका इमेजिंग इंफ्रारेड (IIR) सीकर है। यह सिर्फ गर्मी नहीं, बल्कि टारगेट की पूरी इमेज को पहचानता है। इसका फायदा यह है कि दुश्मन अगर फ्लेयर्स (डिकॉय) छोड़ता है, तो भी मिसाइल असली टारगेट को पहचान सकती है।

वहीं स्टिंगर में पारंपरिक इंफ्रारेड/अल्ट्रावायलेट ड्यूल-बैंड सीकर सीकर होता है, जिसे अपग्रेड किया गया है, लेकिन वह पूरी तरह इमेजिंग बेस्ड नहीं है। इन्फ्रारेड बैंड में टारगेट के इंजन की गर्मी को ट्रैक करता है। अल्ट्रावायलेट बैंड में यह टारगेट (एयरक्राफ्ट) यूवी “शैडो” (छाया) बनाता है, क्योंकि आसमान में सूरज की यूवी लाइट स्कैटर होती है और एयरक्राफ्ट उसमें ब्लॉक करता है। यानी टारगेट यूवी में “डार्क स्पॉट” या “शैडो” की तरह दिखता है। इसी वजह से आधुनिक ड्रोन या कम हीट वाले टारगेट के खिलाफ VSHORADS ज्यादा प्रभावी माना जा रहा है।

भारत का सिस्टम ज्यादा प्रासंगिक

VSHORADS की रेंज लगभग 6–7 किलोमीटर तक बताई जाती है, जबकि स्टिंगर की सामान्य रेंज करीब 4.8 किलोमीटर है। आज के युद्ध में ड्रोन, लो-फ्लाइंग मिसाइल और हेलीकॉप्टर बड़े खतरे हैं। VSHORADS को खास तौर पर इन्हीं टारगेट्स को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। इसका IIR सीकर इसे छोटे और कम दिखने वाले टारगेट्स के खिलाफ ज्यादा असरदार बनाता है।

मैन्यूवरेबिलिटी का खास फीचर

VSHORADS में मिनी रिएक्शन कंट्रोल सिस्टम (RCS) दिया गया है, जिससे यह हवा में तेजी से दिशा बदल सकता है। इसका मतलब है कि अगर टारगेट अचानक मूव करे, तो मिसाइल भी उसी हिसाब से तुरंत एडजस्ट हो जाती है। हालांकि स्टिंगर भी मैन्यूवरेबल है, लेकिन उसमें RCS जैसा एडवांस्ड सिस्टम नहीं है। इसलिए हाई-मैन्यूवरिंग टारगेट्स के खिलाफ VSHORADS को बढ़त मिलती है। (VSHORADS vs Stinger vs Igla)

पोर्टेबिलिटी में स्टिंगर आगे

स्टिंगर का सबसे बड़ा फायदा है उसका हल्का होना। इसका वजन करीब 15–16 किलो होता है और इसे एक सैनिक आसानी से कंधे पर रखकर चला सकता है। वहीं VSHORADS का पूरा सिस्टम करीब 40 किलो तक पहुंच सकता है (लॉन्चर सहित), इसलिए इसे ऑपरेट करना थोड़ा भारी और मुश्किल हो सकता है। हालांकि भविष्य में इसका शोल्डर-फायर्ड वर्जन भी आने की बात कही जाती है।

स्पीड vs स्मार्टनेस

स्टिंगर की स्पीड मैक 2+ तक जाती है, जो VSHORADS (लगभग Mach 1.5) से ज्यादा है। इसका मतलब है कि स्टिंगर टारगेट तक जल्दी पहुंच सकता है। लेकिन VSHORADS “स्मार्ट ट्रैकिंग” पर ज्यादा फोकस करता है। यानी यह जरूरी नहीं कि सबसे तेज हो, लेकिन यह टारगेट को ज्यादा सटीक तरीके से पकड़ता है। (VSHORADS vs Stinger vs Igla)

भारत के लिए सबसे बड़ा गेम-चेंजर

सबसे बड़ा फर्क यहीं आता है। VSHORADS पूरी तरह स्वदेशी (इंडिजिनस) है। इसका मतलब है कि भारत इसे अपने हिसाब से अपग्रेड कर सकता है, बड़े पैमाने पर बना सकता है और किसी विदेशी देश पर निर्भर नहीं रहेगा।

वहीं Stinger पूरी तरह आयातित सिस्टम है, जिसमें टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नहीं मिलता। इसलिए इसकी संख्या सीमित रहती है और हर अपग्रेड के लिए बाहरी निर्भरता रहती है। (VSHORADS vs Stinger vs Igla)

Igla-S Vs VSHORADS: क्या स्वदेशी सिस्टम बनेगा सेना का ‘भरोसा’ 

भारतीय सेना के पास इग्ला-एस सिस्टम है, जो रूस से खरीदा हुआ है। भारतीय सेना इस पर काफी भरोसा करती है। इग्ला-एस और VSHORADS दोनों ही शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम हैं, जिन्हें कम ऊंचाई पर उड़ने वाले खतरों जैसे हेलीकॉप्टर, ड्रोन, फाइटर जेट और क्रूज मिसाइल को मार गिराने के लिए बनाया गया है। लेकिन इन दोनों के बीच सबसे बड़ा फर्क उनकी टेक्नोलॉजी और समय के हिसाब से उनकी क्षमता में है। (VSHORADS vs Stinger vs Igla)

टेक्नोलॉजी और गाइडेंस सिस्टम

Igla-S में ड्यूल-बैंड इंफ्रारेड (IR) सीकर का इस्तेमाल होता है, जो इंजन की गर्मी के आधार पर टारगेट को ट्रैक करता है। यह फ्लेयर्स जैसे डिकॉय से कुछ हद तक बच सकता है, लेकिन इसकी क्षमता सीमित होती है। वहीं VSHORADS में इमेजिंग इंफ्रारेड (IIR) सीकर दिया गया है, जो टारगेट की पूरी इमेज पहचानता है। इसका फायदा यह है कि यह ड्रोन, लो-सिग्नेचर एयरक्राफ्ट और फ्लेयर्स जैसे धोखे को बेहतर तरीके से पहचान कर असली टारगेट को हिट कर सकता है।

रेंज, स्पीड और ऊंचाई

दोनों सिस्टम की रेंज लगभग समान है और करीब 6 किलोमीटर तक के टारगेट को मार सकते हैं। ऊंचाई की सीमा भी लगभग 3.5 किलोमीटर तक है। हालांकि स्पीड के मामले में इग्ला-एस थोड़ा आगे है, जो लगभग मैक 1.9 तक जा सकता है, जबकि VSHORADS की स्पीड करीब मैक 1.5 है। लेकिन VSHORADS अपनी एडवांस गाइडेंस और मैन्यूवरेबिलिटी से इस कमी को काफी हद तक कवर करता है। (VSHORADS vs Stinger vs Igla)

वजन और पोर्टेबिलिटी

इग्ला का सबसे बड़ा फायदा इसका हल्का होना है। इसका कुल वजन करीब 17–19 किलो है और इसे सैनिक सीधे कंधे पर रखकर चला सकता है। इसके मुकाबले VSHORADS का वजन ज्यादा है, करीब 40 किलो के आसपास, और अभी इसे ट्राइपॉड के साथ इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए पोर्टेबिलिटी के मामले में इग्ला-एस ज्यादा आसान और तेज इस्तेमाल वाला सिस्टम है।

अगर पोर्टेबिलिटी और तुरंत इस्तेमाल की बात करें तो इग्ला अभी भी आगे है, क्योंकि यह हल्का और आसान है। लेकिन टेक्नोलॉजी, सटीकता और आधुनिक खतरों जैसे ड्रोन और लो-सिग्नेचर टारगेट्स से निपटने में SHORADS ज्यादा सक्षम है। यही वजह है कि इसे भविष्य का एयर डिफेंस सिस्टम माना जा रहा है। (VSHORADS vs Stinger vs Igla)

दुश्मन की पनडुब्बियों के शिकारी आईएनएस अंजदीप की नौसेना में हुई एंट्री, नेवी चीफ बोले- समुद्र से तय होगी भारत की ताकत

Indian Navy INS Anjadip

INS Anjadip: भारतीय नौसेना ने 2026 में अपने पहले शिप को कमीशन किया। डॉल्फिन हंटर के नाम से मशहूर स्वदेशी रूप से तैयार युद्धपोत आईएनएस अंजदीप को चेन्नई में आधिकारिक तौर पर नौसेना में शामिल किया गया। यह जहाज एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट है, जिसे खास तौर पर समुद्र में छिपी दुश्मन पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है। नौसेना प्रमुख ने इस मौके पर कहा कि यह जहाज भारत की समुद्री ताकत को और मजबूत करेगा और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम है।

INS Anjadip: भारत का समुद्र से पुराना रिश्ता

इस समारोह के दौरान नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने कहा कि चेन्नई का यह ऐतिहासिक कोरमंडल तट भारत की समुद्री विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि करीब एक हजार साल पहले चोल साम्राज्य ने इसी तट से समुद्री यात्राएं शुरू की थीं। इससे साफ होता है कि भारत का समुद्र से रिश्ता बहुत पुराना और मजबूत रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया है कि भारत हमेशा से एक समुद्री सभ्यता रहा है और आज देश की सुरक्षा और तरक्की समुद्र से जुड़ी हुई है। (INS Anjadip)

Indian Navy INS Anjadip

पेट्या क्लास कॉर्वेट की जगह लेगा अंजदीप

आईएनएस अंजदीप पेट्या क्लास कॉर्वेट का आधुनिक उत्तराधिकारी है, जिसने 1972 से 2003 तक देश की सेवा की थी। यह नया जहाज उसी परंपरा को आगे बढ़ाता है। इसके नाम का भी खास महत्व है, क्योंकि अंजदीप एक द्वीप का नाम है, जो 1961 में गोवा मुक्ति अभियान के दौरान नौसेना की कार्रवाई का गवाह रहा था। इसी वजह से इस जहाज के नाम में बहादुरी और देशभक्ति की भावना जुड़ी हुई है। (INS Anjadip)

हिंद महासागर क्षेत्र का बढ़ता महत्व

नौसेना प्रमुख ने अपने संबोधन में कहा कि 21वीं सदी को समुद्री सदी माना जा रहा है और इसमें हिंद महासागर क्षेत्र की भूमिका बहुत अहम है। इस क्षेत्र में दुनिया की करीब 40 प्रतिशत आबादी रहती है और यहां से हर साल बड़ी संख्या में जहाज गुजरते हैं। दुनिया के तेल का बड़ा हिस्सा, कंटेनर ट्रैफिक और व्यापार इसी रास्ते से होता है। ऐसे में इस क्षेत्र की सुरक्षा बहुत जरूरी हो जाती है। (INS Anjadip)

रेड सी संकट और होरमुज जलडमरूमध्य का किया जिक्र

एडमिरल त्रिपाठी ने यह भी बताया कि आज के समय में समुद्र से जुड़े खतरे लगातार बढ़ रहे हैं। सतह, समुद्र के नीचे और हवा, तीनों क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। कई बार जमीन पर होने वाले तनाव भी समुद्र तक पहुंच जाते हैं। ऐसे माहौल में छोटी सी घटना भी बड़े असर डाल सकती है। उन्होंने रेड सी संकट और होरमुज जलडमरूमध्य की स्थिति का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे एक जगह पर परेशानी होने से पूरी दुनिया के व्यापार और तेल की कीमतों पर असर पड़ता है। (INS Anjadip)

नेवी ने की 400 व्यापारिक जहाजों की मदद

नौसेना प्रमुख एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय नौसेना ऐसे चुनौतीपूर्ण माहौल में लगातार अपनी भूमिका निभा रही है। अक्टूबर 2023 से अब तक नौसेना ने रेड सी क्षेत्र में करीब 400 व्यापारिक जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने में मदद की है। इन जहाजों में करोड़ों टन तेल और सामान था, जिसकी कीमत अरबों डॉलर में है। इसके अलावा भारतीय नौसेना अन्य देशों की नौसेनाओं के साथ मिलकर भी काम कर रही है, जिससे समुद्री सुरक्षा को और मजबूत किया जा सके। (INS Anjadip)

तेजी से बढ़ रही नौसेना की ताकत

उन्होंने हाल ही में विशाखापत्तनम में हुए इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और मिलन एक्सरसाइज का भी जिक्र किया, जिसमें कई देशों की नौसेनाओं ने हिस्सा लिया। यह भारत की बढ़ती समुद्री साझेदारी और सहयोग का संकेत है। साथ ही, भारतीय नौसेना ने जरूरत के समय अन्य देशों की मदद भी की है, जैसे म्यांमार में भूकंप के बाद राहत पहुंचाना और श्रीलंका में चक्रवात के दौरान सहायता देना।

नौसेना प्रमुख ने बताया कि आज भारतीय नौसेना हिंद महासागर क्षेत्र और उससे आगे तक अपनी मौजूदगी बनाए हुए है। नौसेना के जहाज लगातार निगरानी, एंटी-पाइरेसी ऑपरेशन और संयुक्त गश्त में लगे रहते हैं। इससे भारत की समुद्री सुरक्षा मजबूत होती है।

उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय नौसेना तेजी से अपनी ताकत बढ़ा रही है। साल 2025 में 12 युद्धपोत और एक पनडुब्बी को शामिल किया गया, जबकि 2026 में करीब 15 और जहाज शामिल करने की योजना है। यह अब तक की सबसे तेज गति से जहाजों की कमीशनिंग मानी जा रही है। खास तौर पर पनडुब्बी रोधी यानी एंटी-सबमरीन क्षमता को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। आईएनएस अंजदीप इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। (INS Anjadip)

Indian Navy INS Anjadip

आईएनएस अंजदीप की खासियतें

यह जहाज आधुनिक सोनार सिस्टम, हल्के टॉरपीडो, एंटी-सबमरीन रॉकेट और एडवांस कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम से लैस है। इसे खास तौर पर तटीय इलाकों में तेजी और सटीकता के साथ ऑपरेशन करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें शैलो वॉटर सोनार, हल्के टॉरपीडो, एंटी-सबमरीन रॉकेट और एडवांस कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम लगाया गया है। इसे खास तौर पर तटीय इलाकों में तेजी और सटीकता से ऑपरेशन करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह जहाज दुश्मन की पनडुब्बियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करने में सक्षम है। (INS Anjadip)

आत्मनिर्भर भारत का मजबूत उदाहरण

नौसेना प्रमुख ने आत्मनिर्भरता पर जोर देते हुए कहा कि अब भारत केवल “मेक इन इंडिया” तक सीमित नहीं है, बल्कि “ट्रस्ट इन इंडिया” की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस जहाज का निर्माण भारत में ही हुआ है और इसमें देश के अलग-अलग हिस्सों की कंपनियों और विशेषज्ञों का योगदान रहा है। इसे कत्तुपल्ली में बनाया गया, डिजाइन कोलकाता से जुड़ा है और इसके सिस्टम गाजियाबाद में तैयार किए गए हैं। यह पूरे देश के सहयोग का उदाहरण है।

उन्होंने गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स और एलएंडटी जैसे संस्थानों की भी सराहना की, जिन्होंने मिलकर इस जहाज को समय पर तैयार किया। साथ ही, इस प्रोजेक्ट से जुड़े इंजीनियरों, कर्मचारियों और नौसेना की टीमों का भी धन्यवाद किया, जिनकी मेहनत से यह जहाज तैयार हो सका।

टीम को दी बधाई

नौसेना प्रमुख एडमिरल डिनेश त्रिपाठी ने अपने संबोधन के अंत में आईएनएस अंजदीप के कमांडिंग ऑफिसर और पूरी टीम को बधाई दी और कहा कि इस जहाज का आदर्श वाक्य “अद्वितीय शत्रु विध्वंसक” उन्हें हमेशा सतर्क रहने और देश की रक्षा के लिए तैयार रहने की प्रेरणा देगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह जहाज भारतीय नौसेना की ताकत को और बढ़ाएगा और देश की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। (INS Anjadip)

पोखरण में वायुसेना ने दोहराई ऑपरेशन सिंदूर की पूरी स्ट्राइक प्लानिंग, आकाश और स्पाइडर ने दुश्मन को हमलों को किया नाकाम!

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026: राजस्थान के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में आयोजित ‘वायु शक्ति 2026’ अभ्यास के दौरान भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े अहम हिस्सों को दोबारा दुनिया के सामने पेश किया। इस दौरान वायुसेना ने अपनी प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता और इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस फायरपावर का प्रदर्शन किया।

अभ्यास के दौरान वायुसेना ने दिखाया कि वह असली युद्ध जैसी परिस्थितियों में भी मुश्किल से मुश्किल ऑपरेशनों को आसानी से कर सकती है। इससे पहले राष्ट्रपति ने स्वदेशी लड़ाकू हेलीकॉप्टर एलसीएच ‘प्रचंड’ में उड़ान भी भरी।

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026: इंटेलिजेंस से शुरू हुई एक्सरसाइज

इस बार वायु शक्ति अभ्यास को ऑपरेशन सिंदूर को फोकस में रखते हुए एक पूरी कहानी की तरह तैयार किया गया, जिसमें युद्ध जैसी स्थितियां बनाई गई। इसमें हवाई हमले, एयर डिफेंस, स्पेशल फोर्स ऑपरेशन और राहत-बचाव मिशन सभी को एक साथ दिखाया गया। कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रगान और फ्लाईपास्ट से हुई, जिसमें चेतक हेलीकॉप्टरों ने तिरंगा और वायुसेना का झंडा लेकर उड़ान भरी। इसके बाद राफेल लड़ाकू विमान ने जोरदार सुपरसोनिक बूम साउंड के साथ उड़ान भरकर वहां सभी को अचरज में डाल दिया।

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

अभ्यास के दौरान ऑपरेशन सिंदूर की पूरी प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से दिखाया गया। सबसे पहले इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकॉनिसेंस यानी निगरानी और जानकारी जुटाने की प्रक्रिया को दर्शाया गया। इसमें रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट यानी ड्रोन का इस्तेमाल किया गया, जो दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखते हैं और जरूरी जानकारी जुटाते हैं।

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

Vayushakti 2026: राष्ट्रपति मुर्मू ‘प्रचंड’ हेलीकॉप्टर में भरेंगी उड़ान, पोखरण में देखेंगी एयरफोर्स का मेगा शो

इसके बाद दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को निष्क्रिय करने की कार्रवाई दिखाई गई। इसके लिए लॉइटरिंग म्यूनिशन यानी ऐसे ड्रोन का इस्तेमाल किया गया जो हवा में मंडराते हुए सही समय पर हमला कर सकते हैं। इस दौरान हार्पी ड्रोन का इस्तेमाल दिखाया गया, जिसे ऑपरेशन सिंदूर में भी इस्तेमाल किया गया था। (Operation Sindoor Vayu Shakti 2026)

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

आकाश, एल-70 की लाइव फायरिंग

अभ्यास में काउंटर अनमैन्ड एरियल सिस्टम यानी ड्रोन रोधी सिस्टम का भी प्रदर्शन किया गया। इसमें दुश्मन के ड्रोन जैसे टारगेट्स को पहचानकर उन्हें हवा में ही नष्ट करने की क्षमता का प्रदर्शन किया गया। इस दौरान एयर डिफेंस सिस्टम की ताकत भी दिखाई गई, जिसमें आकाश सरफेस टू एयर मिसाइल सिस्टम और स्पाइडर मिसाइल सिस्टम के साथ आर्मी की अपग्रेडेड एल-70 एयर डिफेंस गन, इजरायल से खरीदे स्पाइडर सिस्टम की लाइव फायरिंग भी की गई। अभ्यास में एम-777 हॉवित्जर का इस्तेमाल हुआ। इससे यह दिखाया गया कि भारतीय वायुसेना किस तरह अलग-अलग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर हवाई खतरों से निपट सकती है। (Operation Sindoor Vayu Shakti 2026)

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

ऑपरेशन सिंदूर में वायुसेना ने आतंकी ठिकानों को बनाया निशाना

अभ्यास के दौरान यह भी बताया गया कि 7 मई 2025 की सुबह भारतीय वायुसेना ने आतंकवादी ठिकानों पर सटीक हमले किए थे। इसके बाद पाकिस्तान की तरफ से किए गए हवाई प्रयासों को भी नाकाम किया गया था। इस दौरान वायुसेना ने पुराने सोवियत मूल के सिस्टम्स के साथ-साथ आधुनिक और स्वदेशी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया।

इनमें आकाश, एमआर-सैम, पिचोरा और ओसा-एके जैसे एयर डिफेंस सिस्टम शामिल थे, जिन्होंने दुश्मन के हवाई खतरों को रोकने में अहम भूमिका निभाई। (Operation Sindoor Vayu Shakti 2026)

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

S-400 की पावर का हुआ जिक्र

अभ्यास में S-400 एयर डिफेंस सिस्टम की क्षमता का भी जिक्र किया गया। बताया गया कि इस सिस्टम ने ऑपरेशन के दौरान लंबी दूरी पर दुश्मन के एयरक्राफ्ट को मार गिराया था। यह अब तक के सबसे लंबे दूरी के एयर किल में से एक माना जाता है। इस सिस्टम ने दुश्मन के एयर ऑपरेशन को काफी हद तक सीमित कर दिया था। (Operation Sindoor Vayu Shakti 2026)

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

130 एयरक्राफ्ट ने लिया हिस्सा

इस अभ्यास में 130 से ज्यादा एयरक्राफ्ट शामिल हुए। इनमें राफेल, सुखोई-30 एमकेआई, मिराज-2000, मिग-29, जगुआर, हॉक, एमआई-17, सी-130जे, सी-17, सी-295, एएलएच ध्रुव और एलसीएच प्रचंड जैसे विमान और हेलीकॉप्टर शामिल रहे। लड़ाकू विमानों ने दुश्मन के नकली ठिकानों पर सटीक हमले किए और आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल दिखाया। हालांकि स्वदेशी तेजस विमान इस अभ्यास का हिस्सा नहीं बना, क्योंकि हाल ही में हुए एक रनवे हादसे के बाद उसका बेड़ा अस्थायी रूप से ग्राउंड कर दिया गया था। (Operation Sindoor Vayu Shakti 2026)

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

सी-295 विमान की रात में असॉल्ट लैंडिंग

अभ्यास में स्पेशल फोर्स ऑपरेशन भी शामिल थे। शाम के समय गरुड़ कमांडो और पैरा स्पेशल फोर्स को हेलीकॉप्टर से उतारा गया, जिन्होंने शहर जैसी स्थिति में ऑपरेशन और बंधकों को छुड़ाने का अभ्यास किया। इसके बाद सी-130 और पहली बार सी-295 विमान ने रात के समय असॉल्ट लैंडिंग कर जवानों को निकालने का प्रदर्शन किया। इसके अलावा सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान ने छोटे रनवे पर लैंडिंग कर गरुड़ कमांडो को एक सिमुलेटेड युद्ध क्षेत्र में उतारा और कुछ ही मिनटों में वहां से वापस उड़ान भर ली।

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026

इसके दौरान अटैक हेलीकॉप्टरों ने पूरे इलाके को सुरक्षित किया, जिससे यह दिखाया गया कि युद्ध के दौरान अलग-अलग यूनिट्स किस तरह मिलकर काम करती हैं। (Operation Sindoor Vayu Shakti 2026)

अभ्यास के अंत में सी-17 ग्लोबमास्टर विमान ने फ्लेयर्स छोड़े और फ्लाईपास्ट किया और ड्रोन शो के जरिए वायुसेना की उपलब्धियों को दिखाया गया। ‘अचूक, अभेद्य और सटीक’ के मूल मंत्र के साथ हुए इस अभ्यास में वायुसेना ने अपनी पूरी ताकत और तैयारियों का प्रदर्शन किया।

Operation Sindoor Vayu Shakti 2026
Drone Show

हेलीकॉप्टरों ने दिखाई ताकत

अभ्यास में एमआई-17 हेलीकॉप्टर से स्पाइक एनएलओएस मिसाइल दागी गई, जो करीब 50 किलोमीटर दूर तक टारगेट को निशाना बना सकती है। इसके अलावा रुद्र, प्रचंड, चेतक, एएलएच एमके-4, चिनूक और अपाचे जैसे हेलीकॉप्टरों ने भी अलग-अलग मिशन में हिस्सा लिया।

इन सभी प्लेटफॉर्म्स ने मिलकर वायुसेना की मल्टी-रोल क्षमता को दर्शाया, जिसमें हमला, सपोर्ट और लॉजिस्टिक्स सभी शामिल हैं। (Operation Sindoor Vayu Shakti 2026)

विदेशी पत्रकार भी रहे मौजूद

इस बड़े अभ्यास को देखने के लिए करीब 30 विदेशी पत्रकारों को आमंत्रित किया गया था। यह पहल विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय की ओर से की गई थी, ताकि भारत की सैन्य क्षमता और स्वदेशी रक्षा तकनीक को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिखाया जा सके। इन पत्रकारों ने नौसेना की इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और थलसेना के रेगिस्तानी क्षेत्र में हुए ‘अग्नि वर्षा’ अभ्यास को भी देखा। (Operation Sindoor Vayu Shakti 2026)

21वीं सदी की जंग के लिए कैसे तैयार होंगे लीडर? आर्मी वॉर कॉलेज, महू में सेना ने बताया फॉर्मूला

Military Leadership Seminar

Military Leadership Seminar: मध्य प्रदेश के महू में स्थित आर्मी वॉर कॉलेज में 26 और 27 फरवरी को लीडरशिप सेमिनार 2026 आयोजित किया गया। यह दो दिन का कार्यक्रम आर्मी ट्रेनिंग कमांड यानी एआरटीआरएसी के तहत हुआ। सेमिनार की शुरुआत आर्मी वॉर कॉलेज के कमांडेंट ने की, जबकि मुख्य भाषण एआरटीआरएसी के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल देवेंद्र शर्मा ने दिया। इस कार्यक्रम में करीब 1000 लोग शामिल हुए, जिनमें सेवा में मौजूद और रिटायर्ड सैन्य अधिकारी भी थे।

इस सेमिनार की खास बात यह रही कि इसमें सिर्फ सेना ही नहीं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ भी शामिल हुए। इनमें न्यायपालिका, शिक्षा, कूटनीति, रक्षा रिसर्च, उद्योग और थिंक टैंक से जुड़े लोग शामिल थे। इससे नेतृत्व और नैतिकता जैसे मुद्दों पर अलग-अलग नजरिए सामने आए, जो आज के समय में सेना के लिए बहुत जरूरी माने जाते हैं।

इस सेमिनार का विषय था 21वीं सदी के लिए सैन्य नेतृत्व को तैयार करना, जिसमें नैतिकता और मूल्यों पर खास ध्यान दिया गया। आज के बदलते माहौल में, जहां नई तकनीक, सूचना युद्ध और अलग-अलग तरह के ऑपरेशन हो रहे हैं, वहां सेना के नेताओं के लिए सिर्फ ताकत ही नहीं, सही फैसले लेने की क्षमता और नैतिक सोच भी जरूरी मानी गई।

Military Leadership Seminar

पहले दिन लीडरशिप जर्नल 2026 जारी किया गया और पूर्व सैनिकों को सम्मानित किया गया। इसके बाद अलग-अलग सत्रों में यह चर्चा हुई कि एक अच्छा नेता कैसे बने, मिशन और नैतिकता के बीच संतुलन कैसे रखा जाए और जिम्मेदारी को सही तरीके से कैसे निभाया जाए। दूसरे दिन काउंटर इंसर्जेंसी और काउंटर टेररिज्म जैसे ऑपरेशन में नेतृत्व की भूमिका, नई तकनीक के दौर में आने वाली चुनौतियां और नई पीढ़ी को सैन्य मूल्य सिखाने पर बात की गई।

यह सेमिनार दिखाता है कि भारतीय सेना अपने नेताओं को बेहतर बनाने और उन्हें सही दिशा देने के लिए लगातार काम कर रही है। साथ ही, आर्मी वॉर कॉलेज इस दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

राफेल के Source Code पर क्यों मचा बवाल, क्या भारत लगा पाएगा अस्त्र और रूद्रम जैसी स्वदेशी मिसाइलें?

Rafale Source Code Explained

Rafale Source Code Explained: भारत और फ्रांस के बीच 114 राफेल फाइटर जेट की नई डील को लेकर चर्चा चल रही है। 114 अतिरिक्त राफेल जेट्स की खरीद को प्रारंभिक मंजूरी यानी एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी – एओएन दी जा चुकी है। यह डील करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की है। लेकिन इस बार मुद्दा सिर्फ फाइटर जेट खरीद का नहीं, बल्कि उसके “सोर्स कोड” को लेकर है। रिपोर्ट्स में कहा गया है कि फ्रांस राफेल के कुछ महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर का सोर्स कोड भारत को देने के लिए तैयार नहीं है। इसके बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या इससे भारत की ऑपरेशनल क्षमता पर असर पड़ेगा और क्या भारत अपनी स्वदेशी मिसाइलों जैसे अस्त्र और ब्रह्मोस एनजी को राफेल पर लगा पाएगा या नहीं।

यह पूरा मामला इसलिए भी अहम है 114 अतिरिक्त राफेल फाइटर जेट खरीद को अब तक की सबसे बड़ी डिफेंस डील कहा जा रहा है। इसके साथ ही नौसेना के लिए 26 राफेल-मरीन भी पहले ही तय किए जा चुके हैं। 114 राफेल में से 18 राफेल सीधे फ्रांस से फ्लाई अवे कंडीशन में 2030 तक आएंगे, जबकि बाकी बचे 90-96 राफेल मेक इन इंडिया के तहत भारत में असेंबल या निर्मित होंगे। भारत में बने राफेल की डिलीवरी 2031-2032 से शुरू हो सकती है। (Rafale Source Code Explained)

Rafale Source Code Explained: क्या होता है राफेल का सोर्स कोड

राफेल फाइटर जेट का सोर्स कोड उसके सॉफ्टवेयर सिस्टम का मूल हिस्सा होता है। यही सॉफ्टवेयर जेट के रडार, सेंसर, हथियार और मिशन कंप्यूटर को कंट्रोल करता है। आसान भाषा में समझें तो यह जेट का “दिमाग” होता है।

फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन और थेल्स ने इस सॉफ्टवेयर को कई सालों में डेवलप किया है। इसलिए इसे वे अपनी “प्रोप्राइटरी टेक्नोलॉजी” मानते हैं। इसी कारण फ्रांस किसी भी देश को पूरा सोर्स कोड देने से बचता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, अगर पूरा सोर्स कोड नहीं मिलता है तो खरीदने वाला देश खुद से जेट के सॉफ्टवेयर में बदलाव नहीं कर सकता और उसे हर बदलाव के लिए निर्माता पर निर्भर रहना पड़ता है। जिसके लिए कंपनी अलग से रकम वसूलती है या कई बार इनकार भी कर देती है। (Rafale Source Code Explained)

क्या फ्रांस ने मना किया सोर्स कोड के लिए

सूत्रों के मुताबिक फ्रांस का कहना है कि राफेल के कोर सिस्टम जैसे SPECTRA इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट और मिशन सॉफ्टवेयर अत्यंत संवेदनशील हैं। इन्हें साझा करना राष्ट्रीय सुरक्षा और इंडस्ट्री के हितों के खिलाफ हो सकता है। बता दें कि दुनिया में कोई भी जेट बनाने वाली कंपनी सोर्स कोड मुहैया नहीं कराती है।

इसी वजह से फ्रांस केवल सीमित एक्सेस देने के पक्ष में है, जिसे API यानी एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि भारत को पूरा सोर्स कोड नहीं मिलेगा, लेकिन सिस्टम के साथ काम करने के लिए जरूरी इंटरफेस उपलब्ध कराया जाएगा। (Rafale Source Code Explained)

API मॉडल क्या है और कैसे काम करता है

API मॉडल को आसान भाषा में “प्लग एंड प्ले” सिस्टम कहा जा सकता है। इसमें जेट के मूल सॉफ्टवेयर को छुए बिना नए हथियार या सिस्टम को जोड़ा जा सकता है।

इस मॉडल में भारतीय इंजीनियर सीधे सॉफ्टवेयर को नहीं बदलते, बल्कि एक इंटरफेस के जरिए अपने सिस्टम को जोड़ते हैं। इससे सुरक्षा भी बनी रहती है और जरूरत के हिसाब से बदलाव भी संभव होता है।

सूत्रों का कहना है कि भारतीय इंजीनियरों को जरूरी इंटरफेस (डेटा लिंक, रडार कम्युनिकेशन, कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम) तक बिना कोर सॉफ्टवेयर को छेड़े नियंत्रित एक्सेस मिलेगा।

यूएई जैसे देश पहले ही इस मॉडल का इस्तेमाल कर रहे हैं और उन्होंने अपने हथियारों को राफेल के साथ जोड़ने में सफलता हासिल की है। (Rafale Source Code Explained)

क्या अस्त्र-रूद्रम मिसाइल राफेल पर लग सकेंगी?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत की स्वदेशी अस्त्र-रूद्रम मिसाइलें राफेल पर लगाई जा सकेंगी। इस पर रक्षा सूत्रों के अनुसार जवाब हां है। अस्त्र बियोंड-विजुअल-रेंज एयर टू एयर मिसाइल है।

भारत और फ्रांस के बीच चल रही बातचीत में यह तय किया जा रहा है कि भारत को अपने हथियार राफेल पर लगाने की अनुमति मिलेगी। इसके लिए API और सॉफ्टवेयर अपग्रेड का इस्तेमाल किया जाएगा।

राफेल पर अस्त्र मिसाइल लगाने की तैयारी पहले से ही चल रही है। भारतीय नौसेना के लिए जो 26 राफेल-मरीन विमान खरीदे जा रहे हैं, उनकी डील में ही अस्त्र एमके1 मिसाइल का इंटीग्रेशन शामिल किया गया है। इन विमानों की डिलीवरी साल 2028 से शुरू होने की योजना है। (Rafale Source Code Explained)

वहीं भारतीय वायुसेना के मौजूदा और आने वाले राफेल विमानों पर भी अस्त्र एमके1 और अस्त्र एमके2 दोनों मिसाइलों को लगाने की योजना है। इसके लिए 2028 से ट्रायल्स शुरू होंगे, जिनमें अलग-अलग चरण होंगे जैसे कैरिज टेस्ट, कैप्टिव टेस्ट, रिलीज और लाइव फायरिंग। इन सभी परीक्षणों के लिए एक राफेल विमान को खास तौर पर फ्लाइंग टेस्ट बेड के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा।

अस्त्र मिसाइल पहले ही सुखोई-30 एमकेआई और तेजस जैसे भारतीय फाइटर जेट्स पर सफलतापूर्वक लगाई जा चुकी है। उसी तकनीक और अनुभव का उपयोग अब राफेल पर भी किया जाएगा, जिससे इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाना आसान हो जाता है। (Rafale Source Code Explained)

इस प्रक्रिया में फ्रांसीसी कंपनियां भी शामिल होंगी, जो सॉफ्टवेयर को इस तरह अपडेट करेंगी कि राफेल के रडार और सिस्टम के साथ अस्त्र मिसाइल सही तरीके से काम कर सके।

राफेल के नए वर्जन और उनकी क्षमता

भारत के पास अभी राफेल का F3-R वर्जन है, जिसमें भारत-विशेष कई सुधार किए गए हैं। नए सौदे में जो 114 राफेल आने हैं, वे F4 स्टैंडर्ड के होंगे, जो पहले से ज्यादा आधुनिक माने जाते हैं।

इसके बाद इन्हें भविष्य में F5 स्टैंडर्ड तक अपग्रेड किया जा सकता है, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, नेटवर्क आधारित युद्ध और ड्रोन के साथ काम करने जैसी क्षमताएं शामिल होंगी।

इन नए विमानों में भारत की जरूरत के अनुसार कई बदलाव भी किए जाएंगे, जिनमें कम्युनिकेशन सिस्टम, डेटा लिंक और हथियार इंटीग्रेशन शामिल है। (Rafale Source Code Explained)

मेक इन इंडिया और इंडिजिनाइजेशन

इस डील का एक बड़ा हिस्सा “मेक इन इंडिया” से जुड़ा है। योजना के अनुसार 114 में से 18 विमान सीधे फ्रांस से आएंगे, जबकि बाकी 96 भारत में असेंबल किए जाएंगे।

शुरुआत में लगभग 30 प्रतिशत इंडिजिनस कंटेंट रहेगा, जिसे धीरे-धीरे बढ़ाकर 60 प्रतिशत तक ले जाने की योजना है। भारत चाहता है कि यह आंकड़ा 50 प्रतिशत से ज्यादा हो।

इसके लिए भारतीय कंपनियों की भागीदारी बढ़ाई जाएगी और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर भी जोर दिया जा रहा है। (Rafale Source Code Explained)

सॉफ्टवेयर और नेटवर्क वॉरफेयर की भूमिका

आज के समय में फाइटर जेट सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि सॉफ्टवेयर और डेटा नेटवर्क से भी ताकतवर बनते हैं। राफेल में सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो (SDR) जैसी तकनीक होती है, जिससे अलग-अलग प्लेटफॉर्म आपस में जुड़कर काम कर सकते हैं।

इससे रियल टाइम में जानकारी साझा होती है और कई प्लेटफॉर्म मिलकर एक ही लक्ष्य पर हमला कर सकते हैं। इसे नेट-सेंट्रिक वॉरफेयर कहा जाता है।

भारत चाहता है कि नए राफेल जेट भारतीय और विदेशी दोनों तरह के सिस्टम के साथ आसानी से जुड़ सकें, ताकि ऑपरेशन में तेजी और सटीकता बनी रहे। (Rafale Source Code Explained)

राफेल के अलावा भी, डीआरडीओ इसी तरह के स्वदेशी सॉफ्टवेयर सिस्टम डेवलप करने पर काम कर रहा है, ताकि भारत अपनी तकनीक पर ज्यादा नियंत्रण रख सके।

उदाहरण के तौर पर, हाल ही में लॉन्च किया गया इंडियन रेडियो सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर (IRSA) स्टैंडर्ड 1.0 इस तरह बनाया गया है कि भारत में बने सॉफ्टवेयर-डिफाइंड रेडियो अलग-अलग सैन्य प्लेटफॉर्म पर आसानी से एक साथ काम कर सकें।

इस तरीके से भारत महंगे विदेशी प्लेटफॉर्म को एक फिक्स सिस्टम की तरह नहीं, बल्कि एक फ्लेक्सिबल सिस्टम की तरह इस्तेमाल कर रहा है, जिसमें जरूरत के हिसाब से बदलाव किए जा सकते हैं। इससे आज के समय में, जहां सॉफ्टवेयर की तेजी और अपडेट बहुत अहम हो गए हैं, भारत अपनी सैन्य क्षमता को मजबूत बनाए रख सकता है। (Rafale Source Code Explained)

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी जरूरत

मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह मुद्दा और ज्यादा चर्चा में आया। कुछ विशेषज्ञों का मानना था कि अगर भारत के पास पूरा सॉफ्टवेयर कंट्रोल होता तो वह तेजी से बदलाव कर सकता था।

हालांकि भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर इस तरह की किसी कमी को स्वीकार नहीं किया है। फिर भी, इस अनुभव के बाद भारत अब ज्यादा टेक्नोलॉजी कंट्रोल चाहता है। (Rafale Source Code Explained)

कई देशों के पास है राफेल

भारत लंबे समय से फ्रांस का बड़ा रक्षा साझेदार रहा है। कई देशों जैसे मिस्र, कतर और ग्रीस ने भी राफेल खरीदे हैं, लेकिन वे ज्यादातर फ्रांसीसी हथियारों पर निर्भर रहते हैं।

भारत की खासियत यह है कि वह अपने स्वदेशी हथियारों को इन प्लेटफॉर्म पर जोड़ना चाहता है। इसी वजह से सोर्स कोड और सॉफ्टवेयर एक्सेस का मुद्दा अहम हो गया है।

फ्रांस भी भारत के साथ सहयोग बढ़ाने के पक्ष में है, लेकिन वह अपनी कोर टेक्नोलॉजी को सुरक्षित रखना चाहता है। (Rafale Source Code Explained)

पहली बार सामने आया S-400 का फायरिंग वीडियो, ऑपरेशन सिंदूर में किया था 300 किमी एयर किल

S-400 Air Defence System
S-400 Air Defence System

S-400 Air Defence: भारतीय वायुसेना ने 26 फरवरी को पहली बार S-400 एयर डिफेंस सिस्टम की फायरिंग का वीडियो सार्वजनिक किया है। यह वीडियो वायु शक्ति-2026 अभ्यास से पहले जारी किया गया है और इसमें सिस्टम के काम करने के तरीके को दिखाया गया है। वीडियो में एक खास कैप्शन “longest ever air kill recorded in military history” भी दिखाया गया है, जिसे ऑपरेशन सिंदूर से जोड़ा जा रहा है।

यह वीडियो रक्षा समाचार के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा किया गया है, जिसमें “Enemy may be out of reach, but is never out of sight” जैसे संदेश भी शामिल हैं। यह वीडियो वास्तविक ऑपरेशन का नहीं, बल्कि प्रमोशनल और ट्रेनिंग फुटेज बताया गया है। (S-400 Air Defence)

S-400 Air Defence: वीडियो में क्या दिखाया गया

वीडियो में सबसे पहले रडार को एक दुश्मन विमान को ट्रैक करते हुए दिखाया गया है। इसके बाद एयर डिफेंस सिस्टम एक्टिवेट होता है और मिसाइल लॉन्च की जाती है। मिसाइल को हवा में उड़ते हुए दिखाया गया है, जिससे सिस्टम की क्षमता का प्रदर्शन होता है।

इस वीडियो का मकसद S-400 सिस्टम की कार्यक्षमता और वायुसेना की तैयारी को दिखाना है। इसमें पूरे प्रोसेस को सरल तरीके से प्रस्तुत किया गया है, ताकि आम लोग भी इसे समझ सकें। (S-400 Air Defence)

ऑपरेशन सिंदूर की दिलाई याद

इस वीडियो में “longest ever air kill” का जिक्र ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ा माना जा रहा है। यह ऑपरेशन मई 2025 में किया गया था, जिसमें भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के भीतर कई टारगेट्स पर कार्रवाई की थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इसी ऑपरेशन के दौरान S-400 सिस्टम का इस्तेमाल करते हुए लगभग 300 किलोमीटर दूर एक पाकिस्तानी विमान को मार गिराया गया था। इसे सतह से हवा में मार करने वाले सिस्टम के जरिए अब तक की सबसे लंबी दूरी का किल माना जा रहा है।

वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने भी पहले कहा था कि इस ऑपरेशन में लंबी दूरी से सटीक हमला किया गया था और इसके स्पष्ट सबूत मौजूद हैं। (S-400 Air Defence)

S-400 सिस्टम की खूबियां

एस-400 ट्रायम्फ एक लंबी दूरी का सतह से हवा में मार करने वाला मिसाइल सिस्टम है, जिसे रूस से लिया गया है। यह सिस्टम एक साथ कई टारगेट्स को ट्रैक और निशाना बना सकता है। इसकी अधिकतम रेंज लगभग 400 किलोमीटर तक बताई जाती है।

भारत ने इस सिस्टम को 2021 से अपने बेड़े में शामिल करना शुरू किया था। अब तक कई स्क्वाड्रन तैनात किए जा चुके हैं। यह सिस्टम दुश्मन के फाइटर जेट, ड्रोन और मिसाइल को हवा में ही नष्ट करने की क्षमता रखता है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस सिस्टम ने दुश्मन के विमानों की गतिविधियों पर असर डाला और उन्हें दूरी बनाए रखने के लिए मजबूर किया। (S-400 Air Defence)

वायु शक्ति-2026 से जुड़ा वीडियो

यह वीडियो वायु शक्ति-2026 अभ्यास के प्रमोशन के लिए जारी किया गया है। यह अभ्यास 27 फरवरी को राजस्थान के पोखरण में आयोजित किया जाएगा, जहां भारतीय वायुसेना अपनी फायरपावर और ऑपरेशनल क्षमता का प्रदर्शन करेगी।

इस अभ्यास में एस-400 के अलावा अन्य एयर डिफेंस सिस्टम जैसे आकाश, स्पाइडर और काउंटर ड्रोन सिस्टम भी शामिल किए जाएंगे। कार्यक्रम में विभिन्न प्रकार के फाइटर जेट, हेलीकॉप्टर और मिसाइल सिस्टम हिस्सा लेंगे।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगी और इससे पहले वे प्रचंड हेलीकॉप्टर में उड़ान भी भरेंगी। (S-400 Air Defence)

वीडियो के जरिए वायुसेना ने अपनी तैयारी और क्षमता को दिखाने की कोशिश की है। इसमें “Infallible, Impervious and Precise” जैसी टैगलाइन का इस्तेमाल किया गया है, जो सटीकता और ताकत का संकेत देती है।

इस वीडियो के जरिए वायुसेना ने यह भी दिखाया है कि आधुनिक युद्ध में लंबी दूरी से खतरे को पहचानना और उसे समय रहते खत्म करना कितना जरूरी है। (S-400 Air Defence)