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Project-17A का चौथा स्टेल्थ फ्रिगेट INS Taragiri नौसेना में शामिल, पढ़ें कैसे स्वदेशी शिपबिल्डिंग इकोसिस्टम हो रहा मैच्योर

आईएनएस तारागिरी (एफ41) एक आधुनिक नीलगिरी क्लास स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट है, जिसे प्रोजेक्ट-17 अल्फा के तहत तैयार किया गया है। प्रोजेक्ट-17 अल्फा के तहत कुल सात ऐसे फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं...

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📍विशाखापत्तनम | 3 Apr, 2026, 5:30 PM

INS Taragiri Commission: भारत की समुद्री क्षमता को शुक्रवार को बड़ा बूस्ट मिला, जब देश की तीसरी न्यूक्लियर सबरमरीन आईएनएस अरिदमन के साथ एडवांस स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस तारागिरी को विशाखापत्तनम में नौसेना में शामिल किया गया। तारागिरी पूर्वी समुद्री तट पर ईस्टर्न फ्लीट का हिस्सा बनेगी।

इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद रहे। समारोह विशाखापत्तनम के नौसैनिक डॉकयार्ड में आयोजित किया गया, जहां नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ अनिल चौहान समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

6,670 टन वजनी आईएनएस तारागिरी को प्रोजेक्ट 17ए के तहत तैयार किया गया है और यह आधुनिक स्टेल्थ फ्रिगेट्स की उसी सीरीज का हिस्सा है, जिसे भारतीय नौसेना के लिए खास तौर पर नई पीढ़ी के समुद्री युद्ध को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है।

INS Taragiri Commission: 11 हजार किमी से ज्यादा लंबी समुद्री सीमा

समारोह के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि आईएनएस तारागिरी का नौसेना में शामिल होना भारत की बढ़ती समुद्री ताकत का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि देश की 11 हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी समुद्री सीमा है और भारत तीन तरफ से समुद्र से घिरा हुआ है। ऐसे में देश के विकास को समुद्र से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

उन्होंने साफ कहा कि देश का लगभग 95 फीसदी व्यापार समुद्री रास्तों से होता है और ऊर्जा सुरक्षा भी समुद्र पर निर्भर करती है। इसलिए एक मजबूत और सक्षम नौसेना अब विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन चुकी है।

रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि भारतीय नौसेना लगातार हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बनाए रखती है, चाहे वह फारस की खाड़ी हो या मलक्का जलडमरूमध्य। किसी भी संकट की स्थिति में नौसेना हमेशा आगे रहती है, चाहे वह लोगों को सुरक्षित निकालना हो या मानवीय सहायता पहुंचाना। (INS Taragiri Commission)

बदलते हालात में बढ़ रही समुद्र की अहमियत

रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि आज के समय में वैश्विक हालात तेजी से बदल रहे हैं और समुद्र इन बदलावों का सबसे बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि जब भी दुनिया में तनाव बढ़ता है, तो उसका असर सबसे पहले समुद्री व्यापार और एनर्जी सप्लाई पर दिखाई देता है।

उन्होंने यह भी बताया कि भारत की नौसेना ने कई बार यह साबित किया है कि वह सिर्फ देश के हितों की रक्षा ही नहीं करती, बल्कि जरूरत पड़ने पर वैश्विक स्तर पर भी अपने नागरिकों और व्यापारिक रास्तों को सुरक्षित रखने में सक्षम है।

इंटरनेट केबल्स की सुरक्षा पर जताई चिंता

रक्षा मंत्री ने कहा कि आज के डिजिटल दौर में दुनिया का ज्यादातर डेटा समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबल्स के जरिए चलता है। अगर इन केबल्स को कोई नुकसान पहुंचता है, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। इसलिए अब समुद्री सुरक्षा को सिर्फ पारंपरिक नजरिए से नहीं, बल्कि एक व्यापक और भविष्य के हिसाब से तैयार दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हमें केवल अपनी तटरेखा की सुरक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों, चोक पॉइंट्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की भी सुरक्षा करनी होगी, जो सीधे देश के हितों से जुड़े हैं। भारतीय नौसेना इन सभी क्षेत्रों में सक्रिय रूप से काम कर रही है और यही सोच हमें आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार करती है। उन्होंने कहा कि जब भी भारत आईएनएस तारागिरी जैसे आधुनिक युद्धपोत बनाता और तैनात करता है, तो यह पूरे क्षेत्र में शांति और समृद्धि की गारंटी जैसा होता है। (INS Taragiri Commission)

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नेवी चीफ बोले- जीपीएस और सैटेलाइट सर्विसेज पर बढ़ा खतरा

वहीं, नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने कहा कि आज का सुरक्षा माहौल तेजी से बदल रहा है और इसका सबसे ज्यादा असर समुद्री क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का असर भी समुद्री व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा पर साफ दिखाई दे रहा है।

नौसेना प्रमुख ने कहा कि अब समुद्री क्षेत्र में सिर्फ पारंपरिक खतरे ही नहीं हैं, बल्कि जीपीएस और सैटेलाइट सेवाओं में रुकावट जैसे नए खतरे भी सामने आ रहे हैं, जिससे समुद्री ऑपरेशन और भी जटिल हो गए हैं।

उन्होंने कहा कि आज का समुद्री सुरक्षा माहौल पहले से ज्यादा जटिल हो गया है, जहां बदलती जियोपॉलिटिक्स, नई तकनीक और नए तरह के खतरे सामने आ रहे हैं। ऐसे समय में भारतीय नौसेना का लक्ष्य है कि वह हमेशा कॉम्बैट-रेडी, भरोसेमंद और भविष्य के लिए तैयार फोर्स बनी रहे, जो कभी भी, कहीं भी देश के समुद्री हितों की रक्षा कर सके।

नौसेना की ताकत बढ़ाने पर जोर

नौसेना प्रमुख ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय नौसेना ने लगातार अपनी ताकत बढ़ाई है। उन्होंने कहा कि हाल के समय में नौसेना ने कई नए जहाज, पनडुब्बियां और एयरक्राफ्ट स्क्वाड्रन को शामिल किया है।

उन्होंने यह भी कहा कि देश के दोनों समुद्री तटों यानी पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों पर नौसेना की क्षमता को मजबूत किया जा रहा है, ताकि हर तरह की चुनौती का सामना किया जा सके। (INS Taragiri Commission)

पुराने तारागिरी की विरासत का किया जिक्र

नौसेना प्रमुख ने अपने संबोधन में पुराने आईएनएस तारागिरी की विरासत को भी याद किया। उन्होंने बताया कि इसका नाम पहले लियंडर क्लास फ्रिगेट पर रखा गया था, जो 1980 में नौसेना में शामिल हुआ था और जिसने एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और ऑपरेशनल इनोवेशन में अहम भूमिका निभाई थी।

उन्होंने बताया कि पुराने तारागिरी ने 1999 के गुजरात चक्रवात के दौरान राहत और बचाव कार्यों में अहम भूमिका निभाई थी। इसके अलावा 2004 की सुनामी के समय श्रीलंका में मानवीय सहायता पहुंचाने में भी इस जहाज ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

उन्होंने कहा कि उस समय इस जहाज पर सी किंग हेलीकॉप्टर का संचालन एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि मानी जाती थी, जिससे नौसेना की एंटी-सबमरीन क्षमता में भी सुधार हुआ था। (INS Taragiri Commission)

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आधुनिक तकनीक से लैस नया युद्धपोत

नई आईएनएस तारागिरी पूरी तरह आधुनिक तकनीक से लैस है। यह करीब 6,670 टन वजनी युद्धपोत है, जिसे मुंबई स्थित मझगांव जॉक शिपबिल्डर्स में बनाया गया है। इस जहाज को बनाने में 75 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। इसके निर्माण में देश के 200 से ज्यादा एमएसएमई यानी छोटे और मध्यम उद्योगों ने योगदान दिया है।

स्टेल्थ डिजाइन से दुश्मन के लिए चुनौती

आईएनएस तारागिरी की सबसे बड़ी खासियत इसका स्टेल्थ डिजाइन है। इसका मतलब यह है कि इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह दुश्मन के रडार पर आसानी से नजर नहीं आता।

इसका रडार क्रॉस सेक्शन काफी कम रखा गया है और इसके बाहरी ढांचे को इस तरह बनाया गया है कि यह समुद्र में आसानी से छिपा रह सके। इसके अलावा इसमें कम इंफ्रारेड सिग्नेचर तकनीक भी दी गई है, जिससे दुश्मन के सेंसर इसे पकड़ने में मुश्किल महसूस करते हैं।

लगे हैं आधुनिक हथियार और कॉम्बैट सिस्टम

इस युद्धपोत में आधुनिक हथियारों का पूरा सेट लगाया गया है। इसमें सुपरसोनिक सर्फेस-टू-सर्फेस मिसाइल सिस्टम, मीडियम रेंज सर्फेस-टू-एयर मिसाइल और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर सिस्टम शामिल हैं।

इन सभी सिस्टम को एक आधुनिक कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम से जोड़ा गया है, जिससे जहाज का क्रू तेजी से फैसले ले सकता है और तुरंत कार्रवाई कर सकता है।

तेज रफ्तार और लंबी तैनाती की क्षमता

आईएनएस तारागिरी में सीओडीओजी यानी कंबाइंड डीजल ऑर गैस प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है। इससे जहाज जरूरत के हिसाब से डीजल इंजन या गैस टरबाइन का इस्तेमाल कर सकता है।

इस वजह से यह जहाज तेज रफ्तार से चल सकता है और लंबे समय तक समुद्र में तैनात रह सकता है। यह खासियत इसे अलग-अलग तरह के मिशन के लिए सक्षम बनाती है। (INS Taragiri Commission)

कई तरह के मिशन के लिए तैयार

आईएनएस तारागिरी को सिर्फ युद्ध के लिए ही नहीं बनाया गया है, बल्कि यह कई तरह के ऑपरेशन में काम आ सकता है। यह जहाज हाई इंटेंसिटी कॉम्बैट के साथ-साथ ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ जैसे मिशन में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

प्रोजेक्ट-17 अल्फा के तहत सात फ्रिगेट

आईएनएस तारागिरी (एफ41) एक आधुनिक नीलगिरी क्लास स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट है, जिसे प्रोजेक्ट-17 अल्फा के तहत तैयार किया गया है। प्रोजेक्ट-17 अल्फा के तहत कुल सात ऐसे फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं। इनमें चार जहाज मझगांव डॉक द्वारा और तीन जहाज गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स द्वारा बनाए जा रहे हैं। इनमें चार नीलगिरी क्लास स्टेल्थ फ्रिगेट भारतीय नौसेना में शामिल हो चुके हैं। इनमें आईएनएस नीलगिरी, आईएनएस उदयगिरि, आईएनएस हिमगिरि और अब आईएनएस तारागिरी शामिल हैं।

इसके अलावा कुछ अन्य जहाज जैसे दुनागिरी पहले ही नौसेना को डिलीवर हो चुके हैं, लेकिन उनका कमीशन होना अभी बाकी है। वहीं महेंद्रगिरि और विंध्यगिरि जैसे अन्य युद्धपोत अलग-अलग निर्माण और परीक्षण के चरण में हैं। इन जहाजों को सी ट्रायल यानी समुद्री परीक्षण के बाद ही नौसेना में शामिल किया जाता है।

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इन फ्रिगेट्स का सबसे बड़ा फायदा यह है कि ये भारतीय नौसेना की ब्लू-वॉटर क्षमता को मजबूत करते हैं। इसका मतलब है कि अब भारतीय नौसेना सिर्फ अपने तटों की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि दूर समुद्र में भी लंबे समय तक ऑपरेशन कर सकती है। स्टेल्थ डिजाइन, तेज मिसाइलें और पनडुब्बी रोधी क्षमता के चलते ये युद्धपोत एक साथ कई तरह के खतरों का सामना करने में सक्षम हैं।

इस साल 15 शिप शामिल करने का लक्ष्य

नौसेना का लक्ष्य 2035 तक 200 से ज्यादा जहाजों की फ्लीट तैयार करना है। जिनमें अभी सभी 50 से ज्यादा शिप भारतीय यार्ड्स में ही बन रहे हैं।

अगर साल 2025 की बात करें, तो इस दौरान भारतीय नौसेना में कुल 12 नए युद्धपोत, एक पनडुब्बी और एक एयरक्राफ्ट स्क्वाड्रन को शामिल किया गया। वहीं, साल 2026 में यह रफ्तार और बढ़ने की उम्मीद है। नेवी चीफ के मुताबिक इस साल करीब 15 नए युद्धपोत नौसेना में शामिल किए जा सकते हैं। इस तेज रफ्तार के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है भारत का मजबूत होता स्वदेशी शिपबिल्डिंग सिस्टम। मझगांव डॉक, गार्डन रीच शिपबिल्डर्स, कोचीन शिपयार्ड और एलएंडटी जैसे शिपयार्ड अब एक साथ कई जहाजों का निर्माण कर रहे हैं। इसके साथ ही मॉड्यूलर कंस्ट्रक्शन तकनीक अपनाई जा रही है, जिससे अलग-अलग हिस्सों को पहले तैयार करके बाद में जोड़ा जाता है, और समय की बचत होती है।

वहीं, पहले किसी भी नए जहाज की पहली यूनिट बनने में ज्यादा समय लगता था, लेकिन अब उसी क्लास के अगले जहाज कम समय में तैयार हो रहे हैं। अनुभव और तकनीकी सुधार की वजह से अब बाद के जहाज 20 से 30 प्रतिशत कम समय में बन जाते हैं। इसके अलावा पहले नौसेना किसी जहाज को कमीशन करने से पहले कम से कम पांच सॉर्टी करती थी, जहां जहाज का परीक्षण करती थी, लेकिन अब 1-2 सॉर्टी में ही अप्रूवल मिल जाता है। इसकी वजह है कि जहाज बनाने वाली कंपनियों को इस बात का अनुभव हो गया कि नौसेना की असल जरूरत क्या है, जिसका फायदा जल्दी कमीशनिंग में देखने को मिल रहा है।

इसके अलावा आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं ने भी इस रफ्तार को बढ़ाया है। अब जहाजों में 75 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सामग्री इस्तेमाल हो रही है और सैकड़ों छोटे और मध्यम उद्योग इसमें योगदान दे रहे हैं। सरकार की नीतियों और बेहतर प्रोजेक्ट मैनेजमेंट ने भी निर्माण प्रक्रिया को तेज किया है। (INS Taragiri Commission)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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