📍नई दिल्ली | 28 Oct, 2025, 8:36 PM
Indo-Pacific Regional Dialogue 2025: भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी का कहना है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र का भविष्य केवल सामूहिक सहयोग, संवाद और विश्वास से ही सुरक्षित रह सकता है। उन्होंने कहा कि समुद्र सिर्फ व्यापार और संस्कृति के मार्ग नहीं हैं, बल्कि यह पूरी मानवता की साझा विरासत और अस्तित्व की नींव हैं।
नई दिल्ली में आयोजित इंडो-पैसिफिक रीजनल डायलॉग 2025 में बोलते हुए नौसेना प्रमुख ने कहा कि इस वर्ष डायलॉग की थीम है समग्र समुद्री सुरक्षा और विकास को बढ़ावा देना: क्षेत्रीय क्षमता निर्माण और सामूहिक शक्ति वृद्धि। उन्होंने कहा कि यह आयोजन भारत के नए समुद्री विजन “महासागर” (म्यूचुअल एंड होलिस्टिक एडवांसमेंट फॉर सिक्युरिटी एंड ग्रोथ अक्रोस रीजंस) के तहत किया गया है। यह विजन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “सागर” नीति (सिक्युरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन) का विस्तार है, जो अब पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सामूहिक सुरक्षा और विकास पर केंद्रित है।
“डायनैक्सिक चुनौती” बन रही खतरा
नौसेना प्रमुख ने कहा कि समुद्रों ने व्यापार, संस्कृति और जिज्ञासा के जरिए सदियों से देशों को आपस में जोड़ा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस कथन का उल्लेख किया जिसमें कहा गया है कि “किसी भी राष्ट्र की समृद्धि और समुद्र की शांति एक-दूसरे से जुड़ी हैं।” उन्होंने कहा कि अब समुद्री सुरक्षा को केवल खतरे की तरह नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसे एक “डायनैक्सिक चुनौती” के तौर पर समझने की आवश्यकता है, यानी ऐसी चुनौती जो गतिशील और जटिल दोनों है।
तीन प्रमुख चुनौतियों का किया जिक्र
नौसेना प्रमुख ने अपने संबोधन में तीन प्रमुख चुनौतियों का भी जिक्र किया जो मौजूदा वैश्विक समुद्री परिदृश्य को प्रभावित कर रही हैं। पहली चुनौती व्यापारिक अवरोध है। उन्होंने कहा कि 2025 में वैश्विक समुद्री व्यापार में गिरावट की संभावना है, जो 2024 के 2.2 फीसदी से घटकर सिर्फ 0.5 फीसदी रह सकती है। यह केवल आर्थिक मंदी नहीं बल्कि रणनीतिक कमजोरी का संकेत है। रेड सी संकट ने दिखाया कि कैसे एक समुद्री मार्ग बंद होने से पूरी दुनिया में शिपिंग कॉस्ट, बीमा प्रीमियम और खाद्य कीमतों पर असर पड़ सकता है।
अवैध मछली पकड़ने से 23 अरब डॉलर का घाटा
दूसरी चुनौती अंतरराष्ट्रीय अशांति है। उन्होंने कहा कि समुद्रों में अवैध गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं। इनमें अवैध तरीके से मछली पकड़ना, समुद्री डकैती, हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी, और मानव तस्करी शामिल हैं। ये सब समुद्री क्षेत्र के बड़े तनाव पैदा करने वाले कारक बन गए हैं। संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार, हर साल गैरकानूनी, बिना रिपोर्ट और नियम तोड़कर मछली पकड़ने से 1.1 से 2.6 करोड़ टन मछली बर्बाद हो जाती है। जिससे 10 से 23 अरब डॉलर का नुकसान होता है।
उन्होंने कहा कि तस्करी करने वाले गिरोह समुद्र के उन इलाकों का फायदा उठा रहे हैं जहां कोई सरकारों का कोई नियंत्रण नहीं है या कानून कमजोर हैं। वे ड्रग्स, हथियार और यहां तक कि प्रतिबंधित सामान भी ले जा रहे हैं। इससे आतंकवादी संगठनों को पैसा मिलता है और जमीन पर अशांति बढ़ती है। उन्होंने आगे कहा कि समुद्र का बढ़ता जलस्तर, तूफान और समुद्र में गंदगी ये सब नई मुसीबतें ला रहे हैं। इससे लोगों की जान और रोजगार दोनों खतरे में हैं। खासकर छोटे द्वीप वाले विकासशील देशों (के लिए ये बहुत बड़ा खतरा है।
तेजी से बदलती तकनीक बनी चुनौती
वहीं, तीसरी चुनौती उन्होंने तेजी से बदलती तकनीक को बताया। नौसेना प्रमुख ने कहा कि नई तकनीकें पुरानी सीमाओं को तोड़ रही हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोट शिप, और कमर्शियल सैटेलाइट अब समुद्र की निगरानी और जवाबी कार्रवाई को पूरी तरह बदल रहे हैं। वहीं, इसके साथ साइबर हमले, सिग्नल स्पूफिंग और इलेक्ट्रॉनिक इंटरफेरेंस जैसी नई समस्याएं भी बढ़ी हैं। उन्होंने हिंद महासागर क्षेत्र का जिक्र करते हुए कहा कि हाल की IFC-IOR रिपोर्ट्स के मुताबिक हर रोज जीपीएस जैमिंग और इलेक्ट्रॉनिक बाधाओं के मामले बढ़ रहे हैं।
समुद्री सुरक्षा और समुद्री विकास एक जहाज के दो प्रोपेलर
नेवी चीफ एडमिरल त्रिपाठी ने कहा कि हमें याद दिलाया जाता है कि समुद्री सुरक्षा और समुद्री विकास दो अलग रास्ते नहीं हैं। बल्कि एक जहाज के दो प्रोपेलर हैं, जो हमें शांति और समृद्धि की ओर ले जाते हैं। उन्होंने कहा कि भारत का लक्ष्य “संपूर्ण समुद्री सुरक्षा” सुनिश्चित करना है, जिसमें हर देश की भूमिका और जिम्मेदारी समान हो।
उन्होंने बताया कि भारतीय नौसेना इस दृष्टिकोण पर काम कर रही है और हाल में नौ अफ्रीकी देशों के साथ अफ्रीका-इंडिया की मैरीटाइम एंगेजमेंट (आइकेमे) अभ्यास इसी दिशा में उठाया गया कदम है। इसके अलावा, गुरुग्राम में स्थित इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर– इंडियन ओशन रीजन (एएफसी-एओआर) को अंतरराष्ट्रीय सूचना केंद्र के तौर पर तैयार किया गया है। यह केंद्र अब समुद्री सूचनाओं को साझा करने का एक बड़ा प्लेटफॉर्म बन चुका है। यहां इस समय 15 अंतरराष्ट्रीय लायजन अधिकारी काम कर रहे हैं और 2028 तक यह संख्या 50 तक पहुंचाने का लक्ष्य है।
नौसेना प्रमुख ने कहा कि समुद्री क्षमता सिर्फ जहाजों या बदरगाहों की संख्या नहीं है, बल्कि यह एक साझा क्षेत्रीय शक्ति का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि हाल ही में भारतीय नौसेना ने क्षेत्रीय सहयोग की दिशा में अहम कदम उठाते हुए पैसिफिक रीच एक्सरसाइज में विदेशी पनडुब्बियों के साथ सफलतापूर्वक अभ्यास भी किया था।
साथ ही, भारतीय नौसेना ने निशार-मित्र टर्मिनल्स भी तैयार किए हैं, जो मित्र देशों के साथ सूचना साझा करने में मदद करेंगे। उन्होंने बताया कि भारत अब “महासागर” विजन के तहत अपने डिफेंस-इंडस्ट्रीयल को-ऑपरेशन को सीमाओं से बाहर ले जा रहा है, ताकि मित्र देशों को स्वदेशी तकनीक और सस्ते सिस्टम्स के जरिए मजबूत किया जा सके।
नई चुनौतियों के लिए नई रणनीतियां जरूरी
नौसेना प्रमुख ने कहा कि किसी भी देश की वास्तविक क्षमता उसके जहाजों या इक्विपमेंट्स में नहीं, बल्कि उनकी सोच, सिद्धांत और प्रशिक्षण में होती है। उन्होंने “पर्पज-सेंट्रिक थिंकिंग” की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि नई चुनौतियों के लिए नई रणनीतियां जरूरी हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि भारतीय नौसेना ने हाल ही में इंडियन ओशन शिप (आईओएस) सागर को दक्षिण-पश्चिम हिंद महासागर क्षेत्र में तैनात किया, जिसमें एतिहासिक तौर पर नौ देशों के 44 अधिकारी संयुक्त रूप से शामिल हुए।
वहीं, कार्यक्रम की शुरुआत में भारतीय नौसेना के पूर्व प्रमुख एडमिरल करमबीर सिंह ने कहा कि आज दुनिया के समुद्रों में अस्थिरता बढ़ रही है। बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा, गैर-राज्यीय संगठनों की गतिविधियां और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां समुद्री क्षेत्र को जटिल बना रही हैं। उन्होंने कहा कि इन समस्याओं से निपटने के लिए सभी देशों को मिलकर एक सहयोगी समुद्री ढांचा बनाना चाहिए।
इंडो-पैसिफिक रीजनल डायलॉग 2025 में 19 देश शामिल
इस साल के इंडो-पैसिफिक रीजनल डायलॉग 2025 में 19 देशों से आए 40 विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
इस कार्यक्रम का आयोजन भारतीय नौसेना और नेशनल मेरीटाइम फाउंडेशन के सहयोग से किया गया। यह इस वार्षिक कार्यक्रम का सातवां संस्करण है। इसे भारतीय नौसेना हर साल अपने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों, रणनीतिक विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं के साथ मिलकर आयोजित करती है। इसका उद्देश्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग, संवाद और सुरक्षा को मजबूत करना है।



