📍नई दिल्ली | 12 Feb, 2026, 11:41 AM
Indian Navy Submarine LACM: भारतीय नौसेना अपनी पारंपरिक पनडुब्बियों को और अधिक घातक बनाने की तैयारी कर रही है। रक्षा मंत्रालय ने भारतीय नौसेना के लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की है। आरएफआई में नौसेना ने कंपनियों से जानकारी मांगी है जो ऐसी लैंड अटैक क्रूज मिसाइल उपलब्ध करा सकें, जिन्हें पनडुब्बियों से दागी जा सकें और जो जमीन पर दूर बैठे दुश्मन के अहम सैन्य ठिकानों को सटीकता के साथ निशाना बना सकें।
इन मिसाइलों का मकसद समुद्र के भीतर से दुश्मन के जमीन पर मौजूद ठिकानों पर सटीक हमला करना है। इससे नौसेना की लंबी दूरी से वार करने की क्षमता और मजबूत होगी। ऐसी मिसाइलें दुश्मन के एयरबेस, सैन्य ठिकानों, कमांड सेंटर या अन्य रणनीतिक ठिकानों को निशाना बना सकती हैं। (Indian Navy Submarine LACM)
Indian Navy Submarine LACM: क्यों बढ़ाई जा रही है यह क्षमता
आज के दौर में युद्ध केवल सीमाओं या समुद्र की सतह तक सीमित नहीं है। मॉडर्न मिलिटरी स्ट्रेटेजी में पनडुब्बियों को “साइलेंट स्ट्राइक प्लेटफॉर्म” माना जाता है। यानी वे समुद्र के भीतर छिपकर दुश्मन के तटीय शहरों, एयरबेस, सैन्य ठिकानों, रडार स्टेशनों और कमांड सेंटर पर हमला कर सकती हैं।
यदि किसी पनडुब्बी के पास 500 किलोमीटर या उससे अधिक दूरी तक मार करने वाली क्रूज मिसाइल हो, तो वह दुश्मन के ठिकानों तक अंदर तक मार तक सकती है। इससे स्ट्रेटेजिक बैलेंस बदल सकता है। यही वजह है कि नौसेना ऐसी मिसाइल चाहती है जो लंबी दूरी, उच्च सटीकता और विश्वसनीयता के साथ काम कर सके। (Indian Navy Submarine LACM)
मिसाइल का वजन 1500 किग्रा से कम
रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि उन्हे जो मिसाइल चाहिए उसकी अधिकतम मारक दूरी 500 किलोमीटर से अधिक होनी चाहिए, जबकि न्यूनतम दूरी 50 किलोमीटर से कम हो। इसका मतलब है कि मिसाइल छोटी दूरी के लक्ष्यों के साथ-साथ बहुत दूर स्थित ठिकानों में इस्तेमाल की जा सके।
मिसाइल का कुल वजन 1500 किलोग्राम से कम होना चाहिए, जिसमें उसका कैप्सूल भी शामिल होगा। मिसाइल को 533 मिलीमीटर व्यास वाले पनडुब्बी के वेपन ट्यूब से लॉन्च किया जा सके। इसकी लंबाई 6.4 मीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। यह शर्त इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय नौसेना की पारंपरिक पनडुब्बियां इसी मानक के टॉरपीडो ट्यूब से लैस हैं। (Indian Navy Submarine LACM)
पनडुब्बी से कैसे दागी जाएगी मिसाइल?
यह मिसाइल न्यूमेटिक रैम इजेक्शन सिस्टम से लॉन्च की जाएगी। इसका मतलब है कि पहले मिसाइल को प्रेशराइज्ड हवा की मदद से ट्यूब से बाहर निकाला जाएगा, फिर पानी की सतह पर पहुंचते ही उसका इंजन एक्टिव होगा।
यह मिसाइल पेरिस्कोप गहराई से लॉन्च की जा सकेगी। यानी पनडुब्बी जब समुद्र में लगभग 15 मीटर से लेकर 100 मीटर की गहराई पर होगी, तब भी इसे दागा जा सकेगा। सामान्य ऑपरेशन के दौरान पनडुब्बी की स्पीड 6 नॉट्स तक और आपात स्थिति में 8 नॉट्स तक हो सकती है। यह भी शर्त रखी गई है कि दो मिसाइलों को एक साथ सैल्वो फायरिंग मोड में दागा जा सके, और उनके होमिंग सिस्टम में आपसी हस्तक्षेप न हो। (Indian Navy Submarine LACM)
नेविगेशन के लिए आईएनएस सिस्टम
मिसाइल की उड़ान चार फेज में होगी। पहले बूस्ट फेज में शुरुआती गति प्राप्त की जाएगी। उसके बाद क्रूज फेज में मिसाइल लंबी दूरी तक स्थिर रूप से उड़ान भरेगी। तीसरे चरण में टर्मिनल गाइडेंस होगा, जिसमें टारगेट के पास पहुंचकर अंतिम फाइनल डायरेक्शन करेक्शन किया जाएगा। अंत में पॉप-अप मैन्यूवर जैसे विकल्प भी हो सकते हैं, जिससे आखिरी समय में भी ऊंचाई बदलकर हमला किया जा सके।
नेविगेशन के लिए आईएनएस (इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम), सैटेलाइट नेविगेशन और एंटी-जैम तकनीक अनिवार्य रखी गई है। यानी यदि दुश्मन जीपीएस सिग्नल को बाधित करने की कोशिश करे, तब भी मिसाइल अपने मार्ग से भटके नहीं। (Indian Navy Submarine LACM)
कितनी मिसाइलें खरीदी जाएंगी?
फिलहाल रक्षा मंत्रालय ने यह साफ नहीं किया है कि कितनी मिसाइलें खरीदी जाएंगी। लेकिन कंपनियों से यह जरूर पूछा गया है कि क्या वे ऐसी ही या मिलती-जुलती मिसाइलें पहले किसी अन्य देश को दे चुकी हैं या नहीं।
साथ ही, ऑफसेट नियम के तहत यह शर्त रखी गई है कि जिस कंपनी को ठेका मिलेगा, उसे कुल अनुबंध राशि का 30 फीसदी भारत में निवेश या उत्पादन के रूप में पूरा करना होगा। इससे देश में रक्षा उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। (Indian Navy Submarine LACM)
मिसाइल में हाई एक्सप्लोसिव वारहेड
मिसाइल में असंवेदनशील हाई एक्सप्लोसिव वारहेड लगाया जाएगा। इसे इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि स्टोरेज या ट्रांसपोर्टेशन के दौरान अनजाने में सक्रिय न हो। वारहेड की विश्वसनीयता 0.99 यानी लगभग 99 प्रतिशत होनी चाहिए। इसका अर्थ है कि लक्ष्य पर पहुंचने के बाद उसके फेल होने की संभावना बेहद कम हो।
सेफ्टी एंड आर्मिंग मैकेनिज्म यह सुनिश्चित करेगा कि वारहेड केवल लॉन्च के बाद सुरक्षित दूरी तय करने पर ही सक्रिय हो। यदि किसी कारण से मिसाइल लक्ष्य से भटक जाए या ऑपरेटर आदेश दे, तो उसमें सेल्फ-डिस्ट्रक्ट की क्षमता भी होनी चाहिए। (Indian Navy Submarine LACM)
कठिन हालात में भी काम करने की क्षमता
मिसाइल को ऐसे डिजाइन किया जाना चाहिए कि वह पनडुब्बी के रोल और पिच यानी झुकाव को भी सहन कर सके। यदि पनडुब्बी 45 डिग्री तक झुक जाए या हिले, तब भी सिस्टम काम करता रहे।
टारगेट तय करने की प्रक्रिया भौगोलिक निर्देशांकों यानी अक्षांश और देशांतर के आधार पर होगी। मिसाइल को घने इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर वातावरण में भी काम करने में सक्षम होना चाहिए। इसका मतलब है कि यदि दुश्मन रेडियो सिग्नल या जीपीएस में बाधा डालने की कोशिश करे, तब भी मिसाइल अपना रास्ता न भूले। (Indian Navy Submarine LACM)
25 साल तक अपग्रेड की सुविधा
रक्षा मंत्रालय ने यह भी शर्त रखी है कि निर्माता कंपनी को कम से कम 25 साल तक अपग्रेड का रास्ता उपलब्ध कराना होगा। यानी भविष्य में तकनीक बदलने पर मिसाइल को आधुनिक बनाया जा सके। ऑनबोर्ड स्टोरेज कम से कम 24 महीने तक संभव होना चाहिए। यह -10 डिग्री से +70 डिग्री सेल्सियस तापमान और 95 प्रतिशत आर्द्रता तक सहन कर सके।
कंपनियों को 10 वर्षों तक स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध कराने होंगे। इसके अलावा ट्रेनिंग मॉड्यूल, टेस्ट इक्विपमेंट और विस्तृत तकनीकी दस्तावेज भी देने होंगे। (Indian Navy Submarine LACM)
मारक क्षमता में बड़ा इजाफा
आज के समय में पनडुब्बी से जमीन पर लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता किसी भी नौसेना के लिए बहुत बड़ी ताकत मानी जाती है। इससे दुश्मन को बिना चेतावनी अंदर तक निशाना बनाया जा सकता है।
इस नई मिसाइल खरीद प्रक्रिया से भारतीय नौसेना की अंडरसी स्ट्राइक पावर यानी समुद्र के भीतर से हमला करने की ताकत काफी बढ़ जाएगी। हिंद महासागर क्षेत्र में बदलते सुरक्षा परिदृश्य और पड़ोसी देशों की सैन्य गतिविधियों को देखते हुए यह कदम भारत के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक बढ़त साबित हो सकता है। (Indian Navy Submarine LACM)


