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अब हफ्तों तक पानी के नीचे रहेगी भारतीय सबमरीन, INS Khanderi पनडुब्बी में लगने जा रहा पहला स्वदेशी AIP सिस्टम

इस तकनीक को लगाने के लिए पनडुब्बी को रिफिट यानी बड़े मेंटेनेंस के लिए डॉक में लाया जाएगा। इस दौरान पनडुब्बी के स्ट्रक्चर के अंदर एक विशेष “एनर्जी मॉड्यूल” लगाया जाएगा...

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📍नई दिल्ली | 6 Mar, 2026, 10:56 PM

AIP System: भारतीय नौसेना को इस साल तक पहली स्वदेशी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन वाली सबमरीन मिल जाएगी। भारतीय नौसेना की कलवरी क्लास पनडुब्बी आईएनएस खंडेरी में जल्द ही स्वदेशी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम लगाया जाएगा। सूत्रों के अनुसार यह काम वर्ष 2026 के अंत तक पूरा करने की योजना है। इस तकनीक के जुड़ने के बाद पनडुब्बी लंबे समय तक समुद्र के भीतर छिपकर काम कर सकेगी, जिससे उसकी ऑपरेशनल क्षमता और स्टेल्थ दोनों में बड़ा सुधार होगा।

इस सिस्टम को डीआरडीओ ने डेवलप किया है। इस तकनीक पर कई सालों से काम चल रहा था और अब इसे ऑपरेशनल पनडुब्बी में लगाने की तैयारी की जा रही है। (AIP System)

AIP System: क्या है एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन सिस्टम

एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी AIP एक ऐसी तकनीक है जिससे डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी बिना सतह पर आए लंबे समय तक समुद्र के अंदर रह सकती है। सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को हर कुछ दिनों में बैटरी चार्ज करने के लिए समुद्र की सतह के पास आना पड़ता है।

जब पनडुब्बी सतह के पास आती है, तो उसके पकड़े जाने का खतरा बढ़ जाता है, क्योंकि उस समय दुश्मन के रडार या एंटी-सबमरीन सिस्टम उसे खोज सकते हैं।

वहीं एआईपी सिस्टम लगने के बाद पनडुब्बी कई हफ्तों तक पानी के अंदर रह सकती है। इस सिस्टम के साथ पनडुब्बी कम गति पर करीब 13 से 21 दिन तक लगातार पानी के अंदर रह सकती है। और इस दौरान उसे बैटरी चार्ज करने के लिए स्नॉर्कलिंग यानी सतह के पास आने की जरूरत नहीं पड़ती। (AIP System)

इसके विपरीत सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को हर 4 से 5 दिन में, और कई बार ऑपरेशन की स्थिति के अनुसार 2 से 3 दिन में ही सतह के पास आकर बैटरी चार्ज करनी पड़ती है। यही कारण है कि AIP सिस्टम पनडुब्बी की स्टेल्थ और ऑपरेशनल क्षमता को काफी बढ़ा देता है। इससे उसकी छिपकर काम करने की क्षमता काफी बढ़ जाती है। यह तकनीक पनडुब्बियों को दुश्मन की नजर से बचाकर लंबे समय तक ऑपरेशन करने में मदद करती है।

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एआईपी तकनीक में फ्यूल-सेल के जरिए बिजली बनाई जाती है। इसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रतिक्रिया से ऊर्जा पैदा होती है। इस प्रक्रिया में कोई धुआं या प्रदूषण नहीं निकलता और इसका मुख्य बाई-प्रोडक्ट्स साफ पानी होता है। खास बात यह है कि इसमें हाइड्रोजन को ऑनबोर्ड जेनरेट किया जाता है। (AIP System)

डीआरडीओ ने बनाया है स्वदेशी एआईपी

भारत का एआईपी सिस्टम पुणे स्थित नेवल मैटीरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी ने डेवलप किया है। यह प्रयोगशाला समुद्री तकनीकों के विकास के लिए जानी जाती है। भारतीय वैज्ञानिकों ने इसमें फॉस्फोरिक एसिड फ्यूल-सेल टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया है। यह तकनीक हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के जरिए बिजली पैदा करती है।

इस परियोजना को शुरू करने की मंजूरी लगभग 2014 में मिली थी। उस समय इस प्रोजेक्ट की शुरुआती लागत करीब 270 करोड़ रुपये बताई गई थी। हालांकि तकनीकी चुनौतियों और ट्रायल प्रोसेस के चलते इस परियोजना को पूरा होने में कई साल लग गए। डीआरडीओ के साथ इस प्रोजेक्ट में इंडस्ट्री पार्टनर लार्सन एंड टूब्रो है। (AIP System)

लंबे परीक्षणों के बाद मिली मंजूरी

रक्षा सूत्रों के अनुसार इस सिस्टम का जमीन पर आधारित प्रोटोटाइप कई सालों तक ट्रायल्स के दौर से गुजरा है। इन परीक्षणों में यह देखा गया कि फ्यूल-सेल आधारित यह सिस्टम लगातार बिजली बना सकता है या नहीं और पनडुब्बी की जरूरतों के अनुसार इसकी क्षमता कितनी है। सूत्रों के अनुसार इस सिस्टम ने परीक्षण के दौरान 200 किलोवॉट से अधिक बिजली उत्पादन की क्षमता दिखाई है। यह क्षमता कलवरी क्लास पनडुब्बियों के लिए पर्याप्त मानी जा रही है। लंबे ट्रायल्स के बाद अब इस सिस्टम को ऑपरेशनल पनडुब्बी में लगाने के लिए तैयार माना जा रहा है। बता दें कि भारतीय नेवी में स्कॉर्पीन क्लास को ही कलवरी क्लास कहा जाता है। (AIP System)

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आईएनएस खंडेरी पर कैसे लगेगा एआईपी

इस तकनीक को लगाने के लिए पनडुब्बी को रिफिट यानी बड़े मेंटेनेंस के लिए डॉक में लाया जाएगा। इस दौरान पनडुब्बी के स्ट्रक्चर के अंदर एक विशेष “एनर्जी मॉड्यूल” लगाया जाएगा। यही मॉड्यूल फ्यूल-सेल के जरिए बिजली पैदा करेगा। रक्षा सूत्रों के अनुसार अगले तीन से चार महीनों में डीआरडीओ यह एनर्जी मॉड्यूल मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड को सौंप देगा। इसके बाद इस सिस्टम को आईएनएस खंडेरी में लगाने की प्रक्रिया शुरू होगी। (AIP System)

कब होंगे समुद्री ट्रायल्स

सूत्रों के अनुसार एआईपी सिस्टम लगाने के बाद पनडुब्बी के समुद्री परीक्षण किए जाएंगे। इन परीक्षणों का उद्देश्य यह जांचना होगा कि सिस्टम वास्तविक समुद्री परिस्थितियों में सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं। रक्षा अधिकारियों का कहना है कि शुरुआती समुद्री परीक्षण 2027 के मध्य में शुरू हो सकते हैं। पूरी प्रक्रिया 2027 के अंत या 2028 की शुरुआत तक पूरी होने की संभावना है। (AIP System)

पहले आईएनएस कलवरी पर लगना था सिस्टम

दिलचस्प बात यह है कि इस तकनीक को सबसे पहले भारतीय नौसेना की पहली कलवरी क्लास पनडुब्बी आईएनएस कलवरी पर लगाने की योजना थी। लेकिन उस समय एआईपी सिस्टम पूरी तरह तैयार नहीं था, इसलिए इसे बाद में लगाने का फैसला किया गया। अब इस तकनीक को आईएनएस खंडेरी पर लगाया जा रहा है, जो इस वर्ग की दूसरी पनडुब्बी है। (AIP System)

कलवरी क्लास पनडुब्बियों की खासियत

स्कॉर्पीन क्लास यानी कलवरी क्लास की छह पनडुब्बियां भारत के प्रोजेक्ट-75 कार्यक्रम के तहत बनाई गई हैं। इन्हें मुंबई में तैयार किया गया है। इन पनडुब्बियों का निर्माण फ्रांस की कंपनी नेवल ग्रुप के सहयोग से किया गया है।
इस परियोजना के तहत कुल छह पनडुब्बियां बनाई गई हैं और सभी अब भारतीय नौसेना में शामिल हो चुकी हैं। इनके नाम हैं आईएनएस कलवरी (S21), आईएनएस खंडेरी (S22), आईएनएस करंज (S23), आईएनएस वेला (S24), आईएनएस वागीर (S25) और आईएनएस वाग्शीर (S26) हैं। इन पनडुब्बियों को आधुनिक सेंसर, टॉरपीडो और मिसाइल सिस्टम से लैस किया गया है। (AIP System)

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भारत के पास कितनी हैं सबमरींस

भारतीय नौसेना के पास फिलहाल लगभग 16 पारंपरिक पनडुब्बियां हैं। इनमें से कई पनडुब्बियां 30 साल से अधिक पुरानी हो चुकी हैं और धीरे-धीरे उन्हें सेवा से हटाने की योजना बनाई जा रही है। नई पनडुब्बियों और आधुनिक तकनीक के जुड़ने से भारतीय नौसेना की समुद्री शक्ति बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि एआईपी सिस्टम लगने के बाद डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की क्षमता काफी बढ़ जाती है।

वहीं, अगर यह तकनीक सफलतापूर्वक काम करती है तो भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा जिन्होंने फ्यूल-सेल आधारित एआईपी तकनीक खुद विकसित की है। दुनिया में अभी बहुत कम देशों के पास यह क्षमता है। इनमें जर्मनी, फ्रांस और स्वीडन जैसे देश शामिल हैं। भारत के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होगी। (AIP System)

Author

  • हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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