📍नई दिल्ली | 21 Mar, 2026, 8:31 PM
Holographic Reflex Sight India RFI: भारतीय सेना को आधुनिक बनाने के लिए फ्यूचर इन्फैंट्री सोल्जर प्रोग्राम (F-INSAS) के तहत रक्षा मंत्रालय ने सेना के लिए 15,000 होलोग्राफिक रिफ्लेक्स साइट्स खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी की गई है। यह इक्विपमेंट जवानों की निशानेबाजी को पहले से कहीं ज्यादा तेज और सटीक बनाने में मदद करेगा। खास बात यह है कि यह पूरी प्रक्रिया ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत की जा रही है, ताकि देश में ही इन इक्विपमेंट्स का निर्माण हो सके।
Holographic Reflex Sight India RFI: क्या है होलोग्राफिक रिफ्लेक्स साइट और क्यों है जरूरी
सरल शब्दों में समझें तो होलोग्राफिक रिफ्लेक्स साइट एक आधुनिक निशानेबाजी इक्विपमेंट है, जो राइफल पर लगाया जाता है। पहले जवान आयरन साइट्स यानी साधारण निशाने का इस्तेमाल करते थे, जिसमें टारगेट को फोकस करने में थोड़ा समय लगता था। लेकिन इस नई तकनीक में जवानों को एक होलोग्राफिक रेटिकल यानी चमकता हुआ निशान दिखाई देता है, जिससे वह बहुत तेजी से टारगेट पर निशाना लगा सकता है।
यह इक्विपमेंट मुख्य रूप से 7.62×51 मिमी असॉल्ट राइफल के साथ इस्तेमाल किया जाएगा, लेकिन इसे 7.62×39 मिमी राइफल पर भी आसानी से लगाया जा सकेगा।
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जवान दोनों आंखें खुली रखकर भी फायरिंग कर सकता है। इससे आसपास के हालात पर नजर बनाए रखते हुए भी दुश्मन पर सटीक निशाना लगाया जा सकता है। युद्ध जैसी परिस्थितियों में जहां हर सेकंड की अहमियत होती है, वहां यह इक्विपमेंट काफी मददगार साबित होगा। (Holographic Reflex Sight India RFI)
हर मौसम और हर इलाके में काम करेगा
आरएफआई में साफ कहा गया है कि ये साइट्स देश के अलग-अलग इलाकों में इस्तेमाल होंगी। इसमें पश्चिमी सीमा के रेगिस्तान से लेकर उत्तर-पूर्व के ऊंचे पहाड़ तक शामिल हैं। यानी यह इक्विपमेंट 18,000 फीट की ऊंचाई तक भी काम करेगा।
मौसम चाहे कितना भी खराब क्यों न हो, जैसे तेज बारिश, धूल, बर्फ या तेज धूप, यह साइट लगातार काम करती रहेगी। तापमान माइनस 20 डिग्री से लेकर प्लस 45 डिग्री तक होने पर भी इसकी परफॉर्मेंस पर असर नहीं पड़ेगा। और जेन-2 या जेन-3 इमेज इंटेंसिफायर के साथ आसानी से काम करेंगी। रात के समय भी इसे नाइट विजन डिवाइस के साथ इस्तेमाल किया जा सकेगा, जिससे सैनिक अंधेरे में भी दुश्मन को आसानी से देख और निशाना लगा पाएंगे। इनका डिजाइन मॉड्यूलर होगा, यानी भविष्य में इन्हें बिना ज्यादा बदलाव किए आसानी से अपग्रेड किया जा सकेगा। (Holographic Reflex Sight India RFI)
सैनिकों की ताकत कई गुना बढ़ेगी
इस इक्विपमेंट से सैनिकों की फायरिंग स्पीड और सटीकता दोनों बढ़ेंगी। पहले जहां निशाना साधने में समय लगता था, अब दुश्मन को देखते ही तुरंत फायर किया जा सकेगा। इसमें पैरालैक्स एरर नहीं होता, यानी आंख की स्थिति बदलने पर भी निशाना नहीं बदलता।
सबसे खास बात यह है कि अगर इस साइट का सामने वाला ग्लास आंशिक रूप से टूट भी जाए, तब भी इसका रेटिकल काम करता रहता है। यही होलोग्राफिक साइट की सबसे बड़ी खासियत मानी जाती है। यानी युद्ध के दौरान नुकसान होने पर भी सैनिक अपनी फायरिंग जारी रख सकता है। यही वजह है कि इसे सैनिकों के लिए “तीसरी आंख” भी कहा जाता है।
इसके साथ ही इसमें लंबी बैटरी लाइफ होनी चाहिए, ताकि इसे बार-बार चार्ज या बदलने की जरूरत न पड़े। सैनिक अगर दस्ताने पहने हों तब भी इसके बटन आसानी से दबा सकें। इसे हेलमेट या गैस मास्क पहनकर भी आराम से इस्तेमाल किया जा सके और राइफल के रेल कवर या चार्जिंग हैंडल के साथ कोई दिक्कत न आए।
रक्षा मंत्रालय ने आरएफआई जारी करके कंपनियों से जानकारी मांगी है। इसका मकसद यह जानना है कि कौन-कौन सी भारतीय या विदेशी कंपनियां इस तरह के इक्विपमेंट बना सकती हैं। कंपनियों को 28 अप्रैल तक अपना जवाब देना होगा।
इसके बाद तकनीकी जांच होगी, फिर ट्रायल किए जाएंगे। ट्रायल में यह देखा जाएगा कि इक्विपमेंट असली परिस्थितियों में कितना अच्छा काम करता है। इसमें ऊंचे पहाड़, रेगिस्तान, बारिश और धूल जैसी परिस्थितियों में टेस्ट किया जाएगा। जो कंपनी इन सभी टेस्ट में सफल होगी, उसे आगे कॉन्ट्रैक्ट मिलने की संभावना होगी। (Holographic Reflex Sight India RFI)
‘आत्मनिर्भर भारत’ को मिलेगा बड़ा फायदा
इस पूरी खरीद प्रक्रिया का एक बड़ा उद्देश्य देश को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना भी है। सरकार चाहती है कि अधिक से अधिक इक्विपमेंट भारत में ही बनें। इससे देश की कंपनियों को काम मिलेगा, रोजगार बढ़ेगा और विदेशी निर्भरता कम होगी।
भारतीय कंपनियों से यह भी पूछा गया है कि वे कितने प्रतिशत इक्विपमेंट देश में ही बना सकती हैं और क्या वे टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के जरिए पूरी तरह स्वदेशी उत्पादन कर सकती हैं। अगर यह योजना सफल होती है, तो आने वाले समय में भारत खुद इस तकनीक में आत्मनिर्भर बन सकता है।
कंपनियों से पूछा गया है कि उनके प्रोडक्ट में कितना हिस्सा भारत में बना है, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का क्या प्लान है और जरूरी पार्ट्स कहां से आएंगे।
ट्रायल्स के लिए “नो कॉस्ट नो कमिटमेंट” आधार रखा गया है, यानी कंपनियों को बिना किसी भुगतान के अपने प्रोडक्ट का टेस्ट देना होगा। यह टेस्ट ऊंचाई वाले इलाकों, रेगिस्तान, बारिश, धूल, रिकॉयल और गिरने जैसी स्थितियों में किया जाएगा। इसके लिए वेंडर को अपना प्रोटोटाइप देना होगा।
ट्रेनिंग के मामले में भी कंपनियों से पूछा गया है कि वे सैनिकों और तकनीकी स्टाफ को कैसे ट्रेनिंग देंगे, क्या कंप्यूटर बेस्ड ट्रेनिंग देंगे और ट्रेन-द-ट्रेनर सिस्टम होगा या नहीं।
वहीं वेंडर चुनने की प्रक्रिया में स्टार्टअप और एमएसएमई कंपनियों को इसमें कुछ छूट भी दी गई है। (Holographic Reflex Sight India RFI)
अभी क्या स्थिति है सेना में
फिलहाल भारतीय सेना में यह तकनीक सीमित संख्या में इस्तेमाल हो रही है। इन्हें अभी चुनिंदा यूनिट्स में ही इस्तेमाल किया जा रहा है, जैसे घातक प्लाटून, पैरा एसएफ और वे इन्फैंट्री यूनिट्स जो फ्यूचर इन्फैंट्री सोल्जर प्रोग्राम (एफ-इंसास) के तहत आधुनिक उपकरणों से लैस हैं। कुल मिलाकर इनकी संख्या अभी कुछ हजार के आसपास ही है। कुछ यूनिट्स, खासकर स्पेशल फोर्सेस और घातक प्लाटून में ऐसे इक्विपमेंट पहले से मौजूद हैं। लेकिन अब इन्हें बड़े स्तर पर लाने की तैयारी है।
सबसे पहले बात करें स्वदेशी विकल्प की, तो भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड यानी बीईएल की होलोग्राफिक वेपन साइट सबसे ज्यादा इस्तेमाल में आ रही है। इसे डीआरडीओ के सहयोग से बनाया गया है। यह साइट सिग-716आई बैटल राइफल, एके-203 असॉल्ट राइफल, इंसास और अन्य क्लोज क्वार्टर बैटल हथियारों पर लगाई जा रही है। यह एफ-इंसास प्रोग्राम का हिस्सा है और 2022 से धीरे-धीरे सेना में शामिल की जा रही है। इसकी खासियत यह है कि सैनिक दोनों आंखें खुली रखकर निशाना लगा सकता है, इसमें पैरालैक्स की समस्या नहीं होती, दिन और रात दोनों समय काम करती है और मजबूत होने के साथ-साथ अपेक्षाकृत सस्ती भी है। (Holographic Reflex Sight India RFI)
इसके अलावा कुछ इम्पोर्टेड साइट्स भी इस्तेमाल हो रही हैं, जिनमें ईओटेक EXPS3 और 512 मॉडल शामिल हैं। ये मुख्य रूप से पैरा एसएफ, एनएसजी और अन्य स्पेशल फोर्सेस के पास हैं। इन्हें एम4ए1 कार्बाइन, एके-203 और सिग-716 जैसी राइफलों पर लगाया जाता है। इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये दुनिया की सबसे भरोसेमंद होलोग्राफिक साइट्स मानी जाती हैं। अगर इनका फ्रंट ग्लास टूट भी जाए, तब भी रेटिकल काम करता रहता है, जो युद्ध में बहुत अहम होता है।
इसके अलावा कुछ अन्य साइट्स भी सीमित संख्या में मौजूद हैं। डीआरडीओ की इंडिजिनस साइट, जिसे इगनेटा कहा जाता है, अभी डेवलपमेंट और ट्रायल के चरण में है और इसे सिग सॉयर, एके-47 और उग्रम जैसी राइफलों के लिए तैयार किया जा रहा है। (Holographic Reflex Sight India RFI)
जानें फ्यूचर इन्फैंट्री सोल्जर प्रोग्राम के बारे में
भारतीय सेना का फ्यूचर इन्फैंट्री सोल्जर प्रोग्राम, जिसे एफ-इंसास (F-INSAS) कहा जाता है, एक ऐसा बड़ा प्रोजेक्ट है जिसका मकसद सैनिकों को आधुनिक युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार करना है। इस सिस्टम में हथियार, बुलेटप्रूफ जैकेट, हेलमेट, नाइट विजन, कम्युनिकेशन और डिजिटल नेटवर्क जैसी सभी चीजें शामिल होती हैं, ताकि वह ज्यादा सुरक्षित, तेज और घातक बन सके।
यह योजना करीब 2007-08 में शुरू हुई थी। उस समय लक्ष्य था कि 2020 तक सेना की सभी इन्फैंट्री बटालियनों को आधुनिक इक्विपमेंटों से लैस कर दिया जाए। 2015 में इसमें बड़ा बदलाव किया गया। पहले यह एक ही बड़ा प्रोग्राम था, लेकिन बाद में इसे दो हिस्सों में बांट दिया गया। पहला हिस्सा था सैनिकों के हथियार और व्यक्तिगत इक्विपमेंट, जैसे असॉल्ट राइफल, हेलमेट, बुलेटप्रूफ जैकेट, जूते और अन्य जरूरी चीजें। दूसरा हिस्सा था बैटलफील्ड मैनेजमेंट सिस्टम, यानी ऐसा डिजिटल सिस्टम जिससे सैनिक को रीयल टाइम में जानकारी मिल सके कि दुश्मन कहां है, उसके साथी कहां हैं और किस दिशा से हमला हो सकता है।
इसके बाद 2022 में इस प्रोग्राम को नया रूप मिला। रक्षा मंत्री ने इसका एक अपडेटेड वर्जन सेना को सौंपा। इसमें कई नई चीजें शामिल थीं, जैसे नया कैमोफ्लाज यूनिफॉर्म, एडवांस्ड हेलमेट, मजबूत बॉडी आर्मर, नाइट विजन डिवाइस, थर्मल इमेजर और बेहतर कम्युनिकेशन सिस्टम। इसके साथ ही नई एके-203 असॉल्ट राइफल भी दी गई, जो पुरानी इंसास राइफल की जगह ले रही है। (Holographic Reflex Sight India RFI)
फिलहाल यह प्रोग्राम धीरे-धीरे लागू किया जा रहा है। कई यूनिट्स, खासकर जो सीमा पर तैनात हैं, उन्हें नए इक्विपमेंट मिल चुके हैं। सैनिकों को बेहतर राइफल, मजबूत सुरक्षा गियर और आधुनिक इक्विपमेंट दिए जा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ डीआरडीओ और निजी कंपनियां डिजिटल सिस्टम पर काम कर रही हैं, जिससे सैनिक को युद्ध के दौरान हर जानकारी तुरंत मिल सके।
आने वाले समय में इसमें और भी नई तकनीक जुड़ सकती है। जैसे सैनिक हेलमेट या चश्मे के जरिए ही दुश्मन की लोकेशन देख सके, ड्रोन से मिल रही जानकारी सीधे उसके सामने दिखाई दे, और वह तेजी से फैसले ले सके। इसे और बेहतर बनाने के लिए “स्मार्ट सोल्जर” जैसी पहल भी चल रही है।
इस प्रोग्राम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि सैनिक की फायरपावर बढ़ेगी। नई राइफल से वह ज्यादा दूर और सटीक निशाना लगा सकेगा। साथ ही, बेहतर बॉडी आर्मर और हेलमेट उसे दुश्मन की गोली से बचाने में मदद करेंगे। हल्के और आरामदायक इक्विपमेंट होने से उसकी मूवमेंट भी बेहतर होगी। सबसे अहम बात यह है कि डिजिटल सिस्टम के जरिए उसे हर समय पूरी स्थिति की जानकारी मिलती रहेगी, जिससे वह ज्यादा समझदारी से लड़ाई लड़ सकेगा।
कुल मिलाकर, एफ-इंसास अब सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं रहा, बल्कि भारतीय सेना के आधुनिकीकरण की पूरी सोच बन चुका है। यह धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है और आने वाले समय में भारतीय सैनिक को तकनीक से लैस एक “स्मार्ट फाइटर” बना देगा, जो हर तरह की चुनौती का सामना करने के लिए तैयार होगा। (Holographic Reflex Sight India RFI)


