📍नई दिल्ली | 28 Mar, 2026, 1:08 PM
MiG-29 ASRAAM missile upgrade: भारतीय वायुसेना अपने फेवरेट ‘बाज’ यानी मिग-29 फाइटर एयरक्राफ्ट (Fulcrum) को और ज्यादा घातक बनाने की तैयारी में है। वायुसेना मिग-29 में ASRAAM यानी एडवांस्ड शॉर्ट रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल को लगाने की तैयारी कर रही है। वायुसेना ने बकायदा इसके लिए प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। हाल ही में वायुसेना ने आरएफपी यानी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया है, जिसमें इंडिजिनस कंपनियों से निविदा मांगी गई है।
इस अपग्रेड के तहत मिग-29 फ्लीट के 56 एयरक्राफ्ट, जिनमें 48 फाइटर और 8 ट्रेनर शामिल हैं, पर ASRAAM मिसाइल का इंटीग्रेशन और सर्टिफिकेशन किया जाएगा। इसके साथ ही नए लॉन्चर, टेस्टिंग उपकरण, स्पेयर्स और ट्रेनिंग भी इस प्रोजेक्ट का हिस्सा होंगे।
MiG-29 ASRAAM missile upgrade: क्यों जरूरी है यह अपग्रेड
मिग-29 भारतीय वायुसेना का एक अहम फाइटर एयरक्राफ्ट है, जिसे मिग-29UPG वर्जन में अपग्रेड किया जा चुका है। इसके बावजूद इसमें इस्तेमाल हो रही कुछ मिसाइलें अब पुरानी हो चुकी हैं। खास तौर पर शॉर्ट रेंज फाइट यानी क्लोज कॉम्बैट में इस्तेमाल होने वाली आर-73 मिसाइल 1980 के दशक की टेक्नोलॉजी पर बेस्ड है। वहीं इसमें मीडियम रेंज के लिए आर-77 मिसाइल भी इस्तेमाल होती है।
आज के समय में जब एयर कॉम्बैट तेजी से बदल रहा है, जहां बेहतर सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और नई मिसाइल टेक्नोलॉजी की जरूरत होती है। ऐसे में ASRAAM जैसी लेटेस्ट मिसाइल के इंटीग्रेट होने से मिग-29 की कॉम्बैट क्षमता बनी रहेगी, बल्कि मॉडर्न डॉगफाइट में भी इसकी सुपीरियरिटी बनी रहेगी। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

क्या है ASRAAM मिसाइल
ASRAAM एक शॉर्ट रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल (विद इन विजुअल रेंज- WVR) है, जिसे ब्रिटेन की कंपनी एमबीडीए ने डेवलप किया है। यह मिसाइल मैक-3 से ज्यादा की स्पीड से उड़ सकती है और इसकी रेंज लगभग 50 किलोमीटर से ज्यादा मानी जाती है।
इसमें एडवांस्ड इंफ्रारेड इमेजिंग सीकर लगा होता है, जो दुश्मन के विमान को बेहतर तरीके से पहचान सकता है। यह मिसाइल फ्लेयर्स और जैमिंग जैसी तकनीकों से बचने में भी सक्षम है।
ASRAAM की एक खूबी यह भी है कि इसे लॉक-ऑन बिफोर लॉन्च (LOBL) और लॉक-ऑन आफ्टर लॉन्च (LOAL) मोड में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। लॉक-ऑन बिफोर लॉन्च मोड में पायलट पहले दुश्मन के विमान को अपनी स्क्रीन या हेलमेट से देखता है और मिसाइल को उसी समय टारगेट पर लॉक कर देता है। जब लॉक हो जाता है, तब मिसाइल फायर की जाती है। इसका फायदा यह है कि मिसाइल पहले से टारगेट को पकड़ चुकी होती है, इसलिए हिट करने की संभावना ज्यादा रहती है।
वहीं, लॉक-ऑन आफ्टर लॉन्च ज्यादा एडवांस है। इस मोड में पायलट बिना पूरी तरह लॉक किए पहले मिसाइल दाग देता है। मिसाइल हवा में आगे बढ़ती है और उड़ते-उड़ते खुद ही टारगेट को ढूंढकर लॉक कर लेती है। इसमें पायलट सिर्फ दिशा बताता है कि दुश्मन किस तरफ है। बाकी काम मिसाइल खुद करती है।
इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि पायलट को दुश्मन को सीधे सामने रखने की जरूरत नहीं होती। वह साइड में या दूर होते हुए भी हमला कर सकता है। कई बार दुश्मन को पता भी नहीं चलता कि मिसाइल उसकी तरफ आ रही है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)

मिग-29 में हुए क्या-क्या अपग्रेड
हाल ही में 12 मार्च को एयर फोर्स चीफ एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने आदमपुर एयरबेस पर अपग्रेड हुए मिग-29 यूपीजी को उड़ाया था। भारतीय वायुसेना के मिग-29यूपीजी एयरक्राफ्ट पहले से ही कई अपग्रेड से गुजर चुके हैं। शुरुआत में 6 मिग-29 विमानों का अपग्रेड रूस में किया गया था, जबकि बाकी विमानों को भारत में नासिक स्थित 11 बेस रिपेयर डिपो में अपग्रेड किया गया। वायुसेना के अधिकारियों के अनुसार, हर एक मिग-29 को अपग्रेड करने में करीब 15 मिलियन डॉलर खर्च आया है। अपग्रेड के बाद मिग-29यूपीजी की क्षमता काफी हद तक एफ-16 ब्लॉक 70 जैसे आधुनिक फाइटर के बराबर मानी जा रही है।
इसमें नया झुक-एमई रडार लगाया गया है, जो एक साथ कई टारगेट को ट्रैक कर सकता है। हवाई मोड में यह करीब 120 किलोमीटर दूर तक दुश्मन के विमान को पहचान सकता है। यह एक साथ 10 टारगेट को ट्रैक कर सकता है और उनमें से 4 पर एक साथ हमला किया जा सकता है। इसके अलावा इसमें एडवांस एवियोनिक्स, ग्लास कॉकपिट और इन-फ्लाइट रिफ्यूलिंग जैसी सुविधाएं भी जोड़ी गई हैं।
मिग-29यूपीजी में ईएलटी-568 जैमर भी लगाया गया है। यह सिस्टम दुश्मन के रडार और मिसाइलों को भ्रमित करने में मदद करता है। इससे विमान पर हमला करना मुश्किल हो जाता है।
इसके अलावा मिग-29 में डी-29 इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट भी लगाया गया है, जो दुश्मन के रडार को पहचान कर उसे जाम करने में मदद करता है। इसे भारत में ही डिफेंस एवियोनिक्स रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट ने बनाया है और इसका निर्माण बीईएल ने किया है। इसके साथ ही इसमें आईआरएसटी यानी इंफ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम भी है, जो बिना रडार ऑन किए दुश्मन के विमान को ट्रैक कर सकता है।
इसके अलावा इसमें सिक्योर डेटा लिंक भी लगाया गया है, जिससे यह अवाक्स और ग्राउंड रडार से जुड़कर जानकारी ले सकता है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)
मिग-29 का इंजन भी बदला
मिग-29 यूपीजी में नए सीरीज-3 आरडी-33 इंजन भी लगाया गया है। जहां चीन का जे-11 फाइटर जेट थ्रस्ट-टू-वेट रेशियो के मामले में करीब 1 पर है, वहीं मिग-29 यूपीजी का यह अनुपात लगभग 1.11 तक पहुंच जाता है। जिससे मिग-29 ज्यादा वजन के साथ भी बेहतर प्रदर्शन कर सकता है।
मिग-29 के आरडी-33 इंजन की खासियत यह है कि यह बहुत तेजी से पावर जनरेट करता है, जिससे पायलट को अचानक स्पीड और ऊंचाई बदलने में मदद मिलती है। यही वजह है कि हवाई लड़ाई के दौरान यह दुश्मन की मिसाइलों से बचने और जवाबी हमला करने में ज्यादा सक्षम माना जाता है। इन इंजनों का निर्माण भारत में ही एचएएल के कोरापुट डिवीजन में लाइसेंस के तहत किया जा रहा है। इस अपग्रेड के बाद मिग-29 अब सात हार्ड पॉइंट्स पर करीब 4,500 किलोग्राम तक हथियार ले जा सकता है, जिससे इसकी स्ट्राइक क्षमता बढ़ गई है।
इसके अलावा इस अपग्रेड से मिग-29 की रेंज में भी करीब 40 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है। अब यह विमान सिर्फ अपने इंटरनल फ्यूल के सहारे करीब 2,100 किलोमीटर तक मिशन पूरा कर सकता है। साथ ही इसमें एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग के लिए रिट्रैक्टेबल प्रोब भी जोड़ा गया है, जिससे जरूरत पड़ने पर उड़ान के दौरान ही ईंधन भरा जा सकता है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)
बढ़ जाएगी मिग-29 की लाइफ
मिग-29यूपीजी एयरक्राफ्ट को अभी कई साल तक सेवा में रखा जाना है। भारतीय वायुसेना का प्लान इसे 2033–37 तक रिटायर करने का है। इस वजह से इसमें लगातार नए अपग्रेड किए जा रहे हैं, ताकि यह आधुनिक युद्ध की जरूरतों के मुताबिक काम करता रहे। ASRAAM का इंटीग्रेशन इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। भारतीय वायुसेना के पास फिलहाल मिग-29 की तीन स्क्वाड्रन हैं, जो अलग-अलग इलाकों में तैनात हैं। इन एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल एयर डिफेंस और इंटरसेप्शन मिशन में किया जाता है। इन बदलावों के चलते इस विमान की उम्र करीब 10 साल तक बढ़ गई है। इसके रखरखाव की लागत भी कम हुई है और इसकी ऑपरेशनल रेंज भी पहले से ज्यादा हो गई है।
इन सभी अपग्रेड के बाद मिग-29यूपीजी अब एक आधुनिक 4 जेनरेशन फाइटर के बराबर माना जाता है। इसकी लड़ाकू क्षमता और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर ताकत दोनों में बड़ा सुधार हुआ है। अब यह विमान पहले की तुलना में ज्यादा समय तक उड़ान भर सकता है और ज्यादा प्रभावी तरीके से मिशन पूरा कर सकता है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)
किन मिसाइलों की जगह लेगी ASRAAM
मिग-29 में अभी दो तरह की एयर-टू-एयर मिसाइलें इस्तेमाल होती हैं। मीडियम रेंज के लिए आर-77 मिसाइल और शॉर्ट रेंज मिसाइल के लिए आर-73 मिसाइल लगी है।
अब वायुसेना आर-77 की जगह स्वदेशी अस्त्र मार्क-1 और आने वाले समय में अस्त्र मार्क-2 को शामिल करने की योजना बना रही है। वहीं आर-73 की जगह ASRAAM को लाया जा रहा है।
इस बदलाव के बाद मिग-29 पूरी तरह आधुनिक मिसाइल सिस्टम से लैस हो जाएगा, जिसमें लंबी दूरी के लिए अस्त्र और नजदीकी लड़ाई के लिए ASRAAM का कॉम्बिनेशन होगा। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)
दो कंपनियां बनाती हैं ASRAAM
ASRAAM मिसाइल को मुख्य रूप से दो कंपनियां बनाती हैं। पहली कंपनी है ब्रिटेन की एमबीडीए है, जो इस मिसाइल की असली और मुख्य निर्माता यानी ओईएम है। दुनिया भर में जो ASRAAM मिसाइल इस्तेमाल होती है, उसकी सप्लाई भी यही कंपनी करती है। यूके, ऑस्ट्रेलिया और कई फाइटर जेट जैसे टाइफून और एफ-35 में यही मिसाइल लगाई जाती है।
वहीं, दूसरी कंपनी है भारत डायनैमिक्स लिमिटेड यानी बीडीएल, जो भारत की सरकारी रक्षा कंपनी है। साल 2021 में दोनों कंपनियों के बीच एक समझौता हुआ था, जिसके तहत भारत में ही ASRAAM मिसाइल को जोड़ने और तैयार करने का काम शुरू हुआ। अब हैदराबाद में बीडीएल इस मिसाइल की असेंबली, टेस्टिंग और इंटीग्रेशन करती है।
एक जैसी मिसाइलों से मिलेगा फायदा
वायुसेना अब अपने अलग-अलग फाइटर एयरक्राफ्ट में एक जैसी मिसाइलों का इस्तेमाल करने की दिशा में काम कर रही है। ASRAAM को पहले ही तेजस मार्क-1ए और जगुआर जैसे एयरक्राफ्ट में शामिल किया जा चुका है। भारतीय वायुसेना की योजना है कि धीरे-धीरे इस मिसाइल को सभी फाइटर जेट में लगाया जाए।
अगर मिग-29 में भी यही मिसाइल लगती है, तो ट्रेनिंग और मेंटेनेंस आसान हो जाएगा। पायलट एक ही तरह की मिसाइल पर ट्रेनिंग ले सकेंगे और लॉजिस्टिक्स भी सरल हो जाएगा। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)
कैसे होगा इंटीग्रेशन
आरएफपी के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट में मिसाइल को एयरक्राफ्ट के साथ पूरी तरह जोड़ना और उसकी टेस्टिंग शामिल होगी। इसके अलावा 98 नए लॉन्चर दिए जाएंगे, जिनमें प्रोटोटाइप और प्रोडक्शन दोनों शामिल हैं।
इसके साथ ही टेस्टिंग उपकरण, स्पेयर्स और मेंटेनेंस टूल्स भी दिए जाएंगे। वायुसेना के 30 कर्मियों को इस सिस्टम के लिए खास ट्रेनिंग भी दी जाएगी, जो नासिक स्थित 11 बेस रिपेयर डिपो में होगी।
इस प्रक्रिया में एयरक्राफ्ट के सॉफ्टवेयर, फायर कंट्रोल सिस्टम और अन्य सिस्टम को भी अपडेट किया जाएगा, ताकि मिसाइल पूरी तरह से काम कर सके। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)
हाई एल्टीट्यूड में शानदार परफॉरमेंस
2020 में लद्दाख में भारत-चीन के बीच हुए गतिरोध के दौरान हल्के वजन के चलते मिग-29 यूपीजी ने शानदार प्रदर्शन किया था। ऊंचाई वाले कठिन इलाकों में इसकी क्षमता को देखते हुए इसे “ड्रैगन स्लेयर” का नाम भी दिया गया। 2020 में पूरी लद्दाख में स्टैंडऑफ के दौरान मिडियम-वेट फाइटर जैसे मिग-29 यूपीजी और राफेल ने उच्च हिमालयी इलाकों में बेहतर प्रदर्शन किया, जबकि भारी फाइटर जेट जैसे सुखोई-30 एमकेआई को पतली हवा के चलते कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
लद्दाख में तैनाती के दौरान मिग-29 यूपीजी को लेह और थोइस एयरबेस पर ऑपरेट किया गया। लेह करीब 10,600 फीट और थोइस लगभग 9,800 फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं। इन एयरबेस से मिग-29 ने नियमित सॉर्टीज उड़ाईं और हिमालयी इलाकों में पेट्रोलिंग की। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)
मिग-29 यूपीजी की ताकत का सबसे बड़ा कारण उसका हल्का वजन है। इसका मैक्स टेकऑफ वेट करीब 27 टन है, जबकि सुखोई-30 एमकेआई लगभग 38 टन का होता है। ऊंचाई वाले इलाकों में जहां हवा पतली होती है, वहां हल्का विमान ज्यादा आसानी से लिफ्ट और थ्रस्ट हासिल कर पाता है। यही वजह है कि मिग-29 ऐसे इलाकों में ज्यादा सहज तरीके से ऑपरेट करता है। (MiG-29 ASRAAM missile upgrade)






