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MiG-21 Memories: मिग-21 के कॉकपिट में रूसी भाषा और बिना ट्रेनर जेट के कैसे ली थी पायलटों ने ट्रेनिंग, रूस ने क्यों की थी चीन की तरफदारी!

मिग-21 बाइसन, देश का पहला सुपरसोनिक फाइटर, आखिरी उड़ान भरकर इतिहास बन जाएगा। नंबर 3 "कोबरा" और नंबर 23 "पैंथर्स" स्क्वॉड्रन भी नंबर प्लेटिंग के साथ फ्रीज हो जाएंगे। 60 बरसों तक यह "वर्किंग हॉर्स" भारतीय वायुसेना की रीढ़ बना रहा। 1965, 1971 और कारगिल के आसमान में इसकी दहाड़ ने भारत को विजय दिलाई। कभी इसे "विजय", "त्रिशूल" और "तलवार" कहा गया… आज लोग भले ही इसे "फ्लाइंग कॉफिन" कहें, लेकिन इसकी वीरगाथा अमर रहेगी। हजारों पायलटों ने इस पर उड़ान भरकर अपने करियर की शुरुआत की, कई एयर चीफ बने, कई मार्शल बने। यह जेट सिर्फ लोहे और इंजन का ढांचा नहीं था, यह भारतीय वायुसेना की ताकत, हिम्मत और भरोसे का प्रतीक था। रक्षा समाचार डॉट कॉम इस ऐतिहासिक विदाई के मौके पर मिग-21 की सुनहरी यादों की एक नई कड़ी शुरू कर रहा है। अगर आपके पास कोई कहानी है तो हमसे शेयर करें, हम उसे प्रकाशित करेंगे...

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📍नई दिल्ली | 14 Sep, 2025, 6:34 PM

MiG-21 Memories: भारतीय वायुसेना का इतिहास कई महत्वपूर्ण पड़ावों से भरा हुआ है, लेकिन उसमें मिग-21 का आना और इसकी शुरुआती ट्रेनिंग का दौर सबसे दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण माना जाता है। मिग-21, जो दुनिया का सबसे ज्यादा बनाया गया सुपरसोनिक फाइटर है, भारत में 1960 के दशक की शुरुआत में आया और छह दशकों से ज्यादा समय तक भारतीय आसमान का प्रहरी बना रहा। यह मिग-21एफ-13 वेरिएंट था, जिसे औपचारिक रूप से 1964 में वायुसेना में शामिल किया गया।

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MiG-21 Memories: 1962 युद्ध के बाद किया था फैसला

चीन के साथ 1962 के युद्ध के तुरंत बाद भारत ने सोवियत संघ से मिग-21 खरीदने का फैसला किया। उस समय यह विमान तकनीकी रूप से एडवांस था और इसके आने के बाद ही भारत की सुपरसोनिक युग में एंट्री हुई। 1963 में पहली बार छह MiG-21 विमान भारत पहुंचे। इन्हें बॉम्बे (अब मुंबई) से चंडीगढ़ लाकर रूसी इंजीनियरों ने असेंबल किया और इन्हें नंबर 28 स्क्वाड्रन में शामिल किया गया। इस स्क्वाड्रन ने खुद को “फर्स्ट सुपरसोनिक्स” नाम दिया।

इन विमानों में पहला जहाज BC 816 टेल नंबर वाला था, जिसे देखकर भारतीय पायलट हैरान रह गए। उनके लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था क्योंकि अब तक वे द्वितीय विश्व युद्ध के दौर के विमानों पर उड़ान भर रहे थे।

MiG-21 Memories: सोवियत संघ में भारतीय पायलटों की ट्रेनिंग

भारतीय पायलटों का पहला बैच 1962 में सोवियत संघ भेजा गया। इसमें आठ पायलट शामिल थे स्क्वाड्रन लीडर दिलबाग सिंह, एसके मेहरा, वोल्लेन, फ्लाइट लेफ्टिनेंट एके मुखर्जी, डेनजिल कीलर, एचएस गिल, लाडू सेन और सबसे जूनियर ब्रजेश धर जयाल। इनमें से कई आगे चलकर भारतीय वायुसेना प्रमुख और एयर मार्शल बने।

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सोवियत संघ में ट्रेनिंग आसान नहीं थी। भारतीय पायलटों को सुपरसोनिक विमान उड़ाने का कोई अनुभव नहीं था। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि MiG-21 का कोई ट्रेनर वर्जन उपलब्ध नहीं था। पायलटों को पहले पुराने सबसोनिक मिग-15 और मिग-17 पर उड़ान भरनी पड़ी और फिर सीधे मिग-21 में बैठकर अकेले उड़ना पड़ा।

इसके अलावा, कॉकपिट की हर चीज रूसी भाषा में थी और सभी डायल मीटर और किलोमीटर में बने थे, जबकि भारतीय पायलट फीट और माइल्स में काम करने के आदी थे। इस वजह से शुरुआती दिनों में उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ा।

MiG-21 Memories: रूस ने रोक दी थी ट्रेनिंग

फ्लाइट लेफ्टिनेंट ब्रजेश धर जयाल याद करते हैं कि सब कुछ बिल्कुल नया था। रूसी ट्रेनर भी शुरुआती दिनों में ज्यादा मददगार नहीं थे। पायलटों को लगता था कि रूस भारत को अपने कीमती विमान देने में हिचक रहा है। रूसी भाषा न समझ पाने की वजह से कॉकपिट में बैठकर हर बटन और डायल को समझना उनके लिए एक कठिन परीक्षा जैसा था।

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एयर चीफ मार्शल (रिटायर्ड) दिलबाग सिंह ने अपनी किताब On the Wings of Destiny में लिखा है कि उस समय रूस और चीन के संबंध काफी अच्छे थे। जब चीन ने भारत पर हमला किया तो रूस में ट्रेनिंग कर रहे भारतीय पायलटों से कई बार पूछा गया, “तुम चीन से क्यों लड़ रहे हो? वे तो कम्युनिस्ट हैं।” इस वजह से कुछ समय के लिए ट्रेनिंग रोक भी दी गई थी। बाद में राजनीतिक स्तर पर फैसला होने के बाद ही ट्रेनिंग दोबारा शुरू हो सकी।

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MiG-21 Memories: सब कुछ नया और चौंकाने वाला

एयर चीफ मार्शल (रिटायर्ड) एवाई टिपनिस ने याद किया कि जब उन्होंने पहली बार मिग-21 देखा तो वे दंग रह गए। उनका कहना था, “रूसी कॉकपिट, मीट्रिक डायल, सुपरसोनिक स्पीड, कोई ट्रेनर नहीं, न सिम्युलेटर। सब कुछ नया और चौंकाने वाला था।”

MiG-21 की लैंडिंग और टेकऑफ वेस्टर्न विमानों से बिल्कुल अलग थी। इसकी एप्रोच और क्लाइंबिंग ऐंगल पश्चिमी विमानों की तुलना में तीन गुना ज्यादा था। हेलमेट वाइजर में हीटिंग सिस्टम था, जो रूस की ठंड के लिए बनाया गया था, लेकिन भारत की गर्मी में पायलटों के सिर पसीने से भीग जाते थे। हाइड्रोलिक ब्रेक्स की जगह न्यूमैटिक ब्रेक्स थे, जिससे पायलटों को शुरू में असहजता महसूस हुई।

MiG-21 Memories: दो 1963 में ही हो गए थे दुर्घटनाग्रस्त

शुरुआती दौर में मिग-21 का ऑपरेशन आसान नहीं था। पहले छह विमानों में से दो 1963 में दुर्घटनाग्रस्त हो गए। इन्हें वोल्लेन और मुखर्जी उड़ा रहे थे। केवल चार विमान ही सुरक्षित बचे। टिपनिस का कहना है कि यह हादसे तकनीकी चुनौतियों और प्रशिक्षण की कमी की वजह से हुए।

लेकिन भारतीय वायुसेना ने हार नहीं मानी। जल्द ही छह और विमान आए। यह टाइप-76 FL वर्जन था, जिसमें नया रडार, आफ्टरबर्नर और दो एयर-टू-एयर मिसाइलें लगी थीं। यह भारतीय पायलटों के लिए बिल्कुल नया अनुभव था क्योंकि अब तक वे सिर्फ कैनन से फायर करने के आदी थे।

MiG-21 Memories: धीरे-धीरे बढ़ी मिग-21 की संख्या

1965 तक भारतीय वायुसेना में मिग-21 का इस्तेमाल बढ़ने लगा था। इसे हाई-एल्टीट्यूड इंटरसेप्टर की तरह डिजाइन किया गया था, लेकिन भारतीय पायलटों ने इसे कई और भूमिकाओं में ढाल लिया। शुरुआती चुनौतियों के बावजूद, धीरे-धीरे मिग-21 भारतीय वायुसेना की रीढ़ बनता चला गया।

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एयर चीफ मार्शल (रिटायर्ड) टिपनिस कहते हैं कि हालांकि शुरू में कॉकपिट ने पायलटों को आत्मविश्वास नहीं दिया, लेकिन समय के साथ यह विमान उनके दिल के बेहद करीब हो गया। “मैंने जब पहली बार अंबाला में इस विमान को देखा, तो इसकी डेल्टा विंग और नोज कोन ने मुझे मोहित कर लिया। मुझे लगा कि यह सिर्फ मेरा है। यह एक खतरनाक खूबसूरती थी, जैसे कोई वैम्प।”

MiG-21 Memories: 1966 में दो ट्रेनर जेट

भारतीय पायलटों की सबसे बड़ी मांग थी कि उन्हें ट्रेनिंग के लिए मिग-21 का ट्रेनर वर्जन दिया जाए। आखिरकार 1966 में रूस ने दो ट्रेनर विमान भारत भेजे। यह नई पीढ़ी के पायलटों के लिए राहत की बात थी। इसी साल मिग-21 ने पहली बार गणतंत्र दिवस परेड में फ्लाईपास्ट किया। उस दिन भारत ने दुनिया को यह संदेश दिया कि अब वह सुपरसोनिक फाइटर जेट्स से लैस है। टिपनिस ने 1966 में पहली बार मिग-21 से एयर-टू-ग्राउंड मिसाइल फायर की थी। यह उस समय एक बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि मिग-21 को शुरू में केवल इंटरसेप्टर माना जाता था।

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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