📍नई दिल्ली | 28 Dec, 2025, 4:01 PM
Somaliland Explained: हॉर्न ऑफ अफ्रीका का इलाका लंबे समय से वैश्विक राजनीति का संवेदनशील केंद्र रहा है। लाल सागर, अदन की खाड़ी और बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट के पास स्थित यह इलाका न सिर्फ समुद्री व्यापार के लिए अहम है, बल्कि वैश्विक सैन्य और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का भी केंद्र बन चुका है। इसी इलाके में स्थित सोमालीलैंड एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा में है, जब इजरायल ने इसे आधिकारिक रूप से एक स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता दे दी।
इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कहा, यह मान्यता “अब्राहम अकॉर्ड्स की स्पिरिट में है”। वहीं, सोमालीलैंड के राष्ट्रपति अब्दिरहमान मोहम्मद अब्दुल्लाही ने घोषणा की कि उनका देश क्षेत्रीय शांति के लिए अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होगा।
वहीं, इजरायल का यह फैसला सिर्फ सोमालीलैंड के लिए ऐतिहासिक नहीं है, बल्कि तुर्की के लिए इसे एक बड़ा कूटनीतिक और रणनीतिक झटका माना जा रहा है।
Somaliland Explained: सोमालीलैंड का क्या है इतिहास
सोमालीलैंड की कहानी हजारों साल पुरानी है। यह इलाका प्राचीन समय में ‘पंट की भूमि’ के नाम से जाना जाता था, जिसका जिक्र प्राचीन मिस्र के अभिलेखों में मिलता है। यहां से लोबान और मिर्र जैसे कीमती पदार्थों का व्यापार होता था। मध्यकाल में यह क्षेत्र आदल सल्तनत और बाद में इसाक सल्तनत के अधीन रहा, जहां स्थानीय कबीलों के नेतृत्व में शासन व्यवस्था चली।
19वीं सदी के अंत में यूरोपीय शक्तियां अफ्रीका में पहुंचीं। ब्रिटेन ने 1884 से 1886 के बीच इस क्षेत्र में स्थानीय कबीलों से संधियां कर ब्रिटिश सोमालीलैंड प्रोटेक्टोरेट की स्थापना की। इसका मकसद लाल सागर और अदन की खाड़ी के समुद्री मार्गों पर नियंत्रण बनाए रखना था। दक्षिणी सोमालिया इटली का उपनिवेश था जिसे इटालियन सोमालीलैंड कहाा जाता था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने इटालियन हिस्से पर भी कब्जा कर लिया।
Somaliland Explained: 1960 को ब्रिटिश सोमालीलैंड को मिली आजादी
26 जून 1960 को ब्रिटिश सोमालीलैंड को आजादी मिली और यह कुछ ही दिनों के लिए एक स्वतंत्र राज्य बना। लेकिन 1 जुलाई 1960 को यह इटालियन सोमालीलैंड के साथ मिलकर सोमाली रिपब्लिक बना। यह एकीकरण ‘ग्रेटर सोमालिया’ की सोच से प्रेरित था, लेकिन प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर यह कभी पूरी तरह सफल नहीं हो सका।
1969 में जनरल सियाद बैरे ने सत्ता संभाली और सैन्य शासन लागू किया। इस दौरान उत्तर में बसे इसाक कबीले पर अत्याचार बढ़े। 1988 में हरगेइसा और बुराओ जैसे शहरों पर की गई बमबारी को आज भी एक बड़े नरसंहार के रूप में देखा जाता है।
Somaliland Explained: 1991 में गृहयुद्ध में फंस गया सोमालिया
1991 में सियाद बैरे के शासन के पतन के साथ ही सोमालिया गृहयुद्ध में फंस गया। उसी साल 18 मई को सोमालीलैंड ने ब्रिटिश काल की सीमाओं के आधार पर फिर से स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। इसके बाद जहां मोगादिशु और दक्षिणी सोमालिया अराजकता, मिलिशिया और अल-शबाब जैसे आतंकवादी संगठनों की चपेट में आ गए, वहीं सोमालीलैंड ने स्थानीय कबीलाई समझौतों के जरिए स्थिर शासन व्यवस्था खड़ी की।
यहां अपनी सरकार, संसद, मुद्रा, पुलिस, सेना और पासपोर्ट सिस्टम बनाई। समय-समय पर चुनाव हुए और सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण भी देखा गया।
Somaliland Explained: मान्यता की लंबी प्रतीक्षा
हालांकि तीन दशक से ज्यादा समय तक स्थिरता बनाए रखने के बावजूद सोमालीलैंड को अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिल सकी। अफ्रीकी संघ और संयुक्त राष्ट्र लगातार सोमालिया की क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन करते रहे। अधिकांश देशों ने मोगादिशु की फेडरल सरकार को ही वैध प्रतिनिधि माना।
इजरायल की मान्यता के बाद आया नया मोड़
इसी साल 26 दिसंबर को इजरायल ने सोमालीलैंड को आधिकारिक मान्यता देकर इस स्थिति को बदल दिया। दोनों पक्षों के बीच राजनयिक संबंध स्थापित करने, दूतावास खोलने और सहयोग बढ़ाने की घोषणा की गई। यह पहली बार था जब किसी संयुक्त राष्ट्र सदस्य देश ने सोमालीलैंड को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्वीकार किया।
सोमालीलैंड की राजधानी हरगेइसा है और आबादी करीब 60 लाख मानी जाती है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय मान्यता कई देशों से नहीं मिली है, लेकिन इजरायल के कदम ने इस मुद्दे को फिर से वैश्विक सुर्खियों पर ला दिया है।
इजरायल के इस फैसले को लाल सागर और यमन के समीप अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने के रूप में देखा जा रहा है। बर्बेरा बंदरगाह और आसपास का इलाका इस लिहाज से बेहद अहम माना जाता है।
तुर्की के लिए क्यों है ये बड़ा झटका
तुर्की पिछले एक दशक से हॉर्न ऑफ अफ्रीका में अपनी पकड़ मजबूत करता रहा है। सोमालिया में तुर्की का सबसे बड़ा विदेशी दूतावास, मोगादिशु में विशाल मिलिट्री ट्रेनिंग बेस, अरब सागर से लाल सागर तक समुद्री सुरक्षा में दखल, ये सभी तुर्की की उस रणनीति का हिस्सा रहे हैं, जिसके तहत अंकारा अफ्रीका में अपना दीर्घकालिक प्रभाव बढ़ाना चाहता है। ऐसे में सोमालीलैंड को इजरायल की मान्यता देने को तुर्की के लिए सिर्फ कूटनीतिक झटका नहीं, बल्कि उसकी पूरी क्षेत्रीय योजना के लिए चुनौती माना जा रहा है।
सोमालिया में तुर्की की गहरी पैठ
तुर्की का सोमालिया के साथ रिश्ता 2011 के अकाल संकट के दौरान मजबूती से सामने आया, जब राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन मोगादिशु पहुंचे। इसके बाद तुर्की ने सोमालिया में अस्पताल, सड़कें, स्कूल और बंदरगाह परियोजनाएं शुरू कीं। मोगादिशु में स्थित तुर्की दूतावास आज दुनिया में तुर्की का सबसे बड़ा दूतावास माना जाता है।
सैन्य स्तर पर, तुर्की ने सोमाली सेना को ट्रेनिंग देने के लिए तुर्कसोम मिलिटरी ट्रेनिंग बेस बनाया। यहां हजारों सोमाली सैनिकों को प्रशिक्षण दिया गया है। इसके अलावा तुर्की ने सोमालिया के साथ रक्षा सहयोग और समुद्री सुरक्षा समझौते भी किए हैं, जिससे लाल सागर और अदन की खाड़ी में उसकी भूमिका मजबूत हुई।
तुर्की की आधिकारिक नीति हमेशा स्पष्ट रही है, सोमालिया एक संप्रभु और एकीकृत देश है और सोमालीलैंड उसका अभिन्न हिस्सा है। अंकारा ने कभी भी सोमालीलैंड को अलग देश मानने का संकेत नहीं दिया। तुर्की के लिए यह सिर्फ एक कानूनी मान्यता नहीं, बल्कि उसके रणनीतिक निवेश और सैन्य मौजूदगी की सुरक्षा का मुद्दा भी है।
अगर सोमालीलैंड को व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलती है, तो इससे मोगादिशु की सरकार कमजोर होगी और तुर्की की वह स्थिति भी डगमगा सकती है, जो उसने सोमालिया की वैध सरकार के साझेदार के रूप में बनाई है।
2024 में अंकारा की कूटनीतिक जीत
जनवरी 2024 में जब इथियोपिया ने सोमालीलैंड के साथ बर्बेरा बंदरगाह को लेकर समझौता किया, तो इससे पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ गया। सोमालिया ने इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया। उस समय तुर्की ने मध्यस्थता की भूमिका निभाई और अंकारा में बातचीत कराई।
दिसंबर 2024 में अंकारा डिक्लेरेशन के जरिए इथियोपिया और सोमालिया के बीच तनाव कम किया गया। इथियोपिया ने सोमालिया की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की बात कही और सोमालीलैंड को लेकर समझौता ठंडे बस्ते में चला गया। इसे तुर्की की बड़ी कूटनीतिक सफलता माना गया था।
इज़रायल की मान्यता से बदला खेल
26 दिसंबर को इजरायल के सोमालीलैंड को मान्यता दिए जाने से यह संतुलन अचानक बदल गया है। तुर्की के लिए यह इसलिए बड़ा झटका है क्योंकि यह फैसला उसकी हालिया मध्यस्थता और नीति के विपरीत गया। अंकारा को आशंका है कि यह कदम अन्य देशों के लिए भी रास्ता खोल सकता है।
तुर्की के विदेश मंत्रालय ने इस फैसले को सोमालिया के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताया और कहा कि इससे क्षेत्रीय स्थिरता को नुकसान पहुंचेगा। मिस्र और सोमालिया के साथ मिलकर तुर्की ने संयुक्त बयान जारी कर इस कदम की निंदा की।
हॉर्न ऑफ अफ्रीका में रणनीतिक चिंता
हॉर्न ऑफ अफ्रीका वह इलाका है, जहां से बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट गुजरता है। बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के जरिए दुनिया के करीब 12 प्रतिशत वैश्विक व्यापार और लगभग 30 प्रतिशत कंटेनर ट्रैफिक गुजरता है। यह रास्ता लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और विश्व व्यापार के लिए बेहद अहम है। इस क्षेत्र में प्रभाव का मतलब है वैश्विक समुद्री व्यापार पर नजर। इसी वजह से तुर्की, चीन, अमेरिका और अब इज़रायल की गतिविधियां यहां लगातार बढ़ रही हैं।
तुर्की लंबे समय से इस इलाके में खुद को एक प्रमुख समुद्री सुरक्षा साझेदार के रूप में पेश करता रहा है। लेकिन अगर सोमालीलैंड में इज़रायल या अन्य देशों की सैन्य-रणनीतिक मौजूदगी बढ़ती है, तो तुर्की के लिए यह सीधे प्रभाव क्षेत्र में चुनौती होगी।
तुर्की-इजरायल के तनावपूर्ण संबंध
गाजा युद्ध और फिलिस्तीन मुद्दे को लेकर तुर्की और इजरायल के रिश्ते पहले से तनावपूर्ण रहे हैं। ऐसे माहौल में इजरायल का यह कदम तुर्की के लिए सिर्फ अफ्रीका तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि यह उसके व्यापक मध्य-पूर्व और अफ्रीका नीति से जुड़ जाता है।
तुर्की इसे इजरायल की उस रणनीति के रूप में देख रहा है, जिसके तहत वह लाल सागर और यमन के आसपास अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है।
लेकिन इजरायल की मान्यता ने इस संतुलन को झकझोर दिया। इससे सोमालीलैंड को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नया आत्मविश्वास मिला और तुर्की की उस नीति को सीधी चुनौती मिली, जो सोमालिया की अखंडता पर आधारित थी।
तुर्की अब इस मुद्दे पर सोमालिया के साथ अपने सहयोग को और मजबूत करने की कोशिश करता दिख रहा है, ताकि क्षेत्रीय संतुलन उसके पक्ष में बना रहे।
अब्राहम अकॉर्ड्स का विस्तार
26 दिसंबर को इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस मान्यता को “अब्राहम अकॉर्ड्स की स्पिरिट” बताया, जो 2020 में ट्रंप की मध्यस्थता से शुरू हुए समझौते हैं। सोमालीलैंड के राष्ट्रपति अब्दिरहमान मोहम्मद अब्दुल्लाही ने घोषणा की कि उनका देश अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होगा। यह अब्राहम अकॉर्ड्स का ऐतिहासिक विस्तार है कि पहली बार कोई गैर-अरब, मुस्लिम-बहुल देश इसमें जुड़ा है।
अरब लीग ने जताया विरोध
सोमालिया की फेडरल सरकार ने इस फैसले को अपनी संप्रभुता पर हमला बताया। अफ्रीकी संघ, अरब लीग और मिस्र ने भी इस कदम की आलोचना की। तुर्की ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया।
इसके बावजूद यह साफ है कि इजरायल की मान्यता ने हॉर्न ऑफ अफ्रीका की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है और पुराने समीकरणों को चुनौती दी है।


