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4000 किमी दूर डिएगो गार्सिया पर ईरानी मिसाइल अटैक से सकते में दुनिया, क्या इसमें है चीन का हाथ?

रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने दो बैलिस्टिक मिसाइलें डिएगो गार्सिया की ओर दागीं। यह बेस ईरान से करीब 4000 किलोमीटर दूर हिंद महासागर में चागोस द्वीपसमूह में स्थित है...

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📍नई दिल्ली | 21 Mar, 2026, 1:19 PM

Iran Missile Range Diego Garcia: पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच हिंद महासागर के बीच स्थित एक छोटे से द्वीप पर ईरान ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने पूरी दुनिया के रक्षा समीकरण बदल दिए। ब्रिटेन द्वारा अमेरिका को डिएगो गार्सिया बेस इस्तेमाल करने की अनुमति देने के कुछ ही घंटों बाद ईरान ने इस सैन्य ठिकाने को निशाना बनाकर बैलिस्टिक मिसाइल दाग दीं।

हालांकि यह हमला भले ही सफल नहीं रहा, लेकिन इससे एक बड़ा संदेश दुनिया को मिल गया कि अब ईरान की मिसाइल क्षमता पहले से कहीं ज्यादा दूर तक पहुंच चुकी है।

Iran Missile Range Diego Garcia: क्या हुआ डिएगो गार्सिया में

रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने दो बैलिस्टिक मिसाइलें डिएगो गार्सिया की ओर दागीं। यह बेस ईरान से करीब 4000 किलोमीटर दूर हिंद महासागर में चागोस द्वीपसमूह में स्थित है।

हालांकि एक मिसाइल बीच रास्ते में ही फेल हो गई, जबकि दूसरी को अमेरिकी युद्धपोत ने रोकने की कोशिश की। यह साफ नहीं हो पाया कि इंटरसेप्शन सफल रहा या नहीं, लेकिन इतना जरूर तय है कि ईरान ने इतनी लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता दिखा दी। यह घटना इसलिए भी अहम है क्योंकि ईरान पहले दावा करता रहा है कि उसकी मिसाइलों की अधिकतम रेंज करीब 2000 किलोमीटर है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

ईरान ने असली ताकत छिपाई थी?

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कुछ दिन पहले कहा था कि देश ने जानबूझकर अपनी मिसाइल रेंज को सीमित रखा है। लेकिन इस हमले ने उस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब यह साफ हो गया है कि ईरान की मिसाइलें 4000 किलोमीटर तक पहुंच सकती हैं। इसका मतलब है कि सिर्फ मध्य पूर्व ही नहीं, बल्कि यूरोप के कई हिस्से भी इस रेंज में आ जाते हैं। इससे दुनिया भर के सैन्य ठिकानों और ऊर्जा संस्थानों के लिए खतरा बढ़ गया है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

ब्रिटेन के फैसले से बढ़ा तनाव

यह पूरा मामला फरवरी महीने से शुरू हुआ। उस समय ब्रिटेन ने अमेरिका को अपने दो अहम सैन्य ठिकानों, आरएएफ फेयरफोर्ड और डियागो गार्सिया, का इस्तेमाल करने की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया था। इसकी सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय कानून बताई गई। सरकार के कानूनी सलाहकारों ने कहा था कि अगर बिना मजबूत कानूनी आधार के किसी हमले में शामिल हुआ जाता है, तो यह नियमों के खिलाफ हो सकता है। इसी वजह से प्रधानमंत्री कीयर स्टार्मर ने खुद इस अनुरोध को ठुकरा दिया। (Iran Missile Range Diego Garcia)

इस फैसले के तुरंत बाद अमेरिका की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आई। डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा कि ब्रिटेन को डियागो गार्सिया जैसे महत्वपूर्ण बेस पर अपना नियंत्रण नहीं खोना चाहिए। उन्होंने यह भी इशारा किया कि चागोस द्वीपों को मॉरिशस को सौंपने का जो समझौता चल रहा था, वह भी इस फैसले से प्रभावित हो सकता है। ट्रंप ने इसे कमजोरी के रूप में पेश किया और कहा कि ऐसे समय में, खासकर चीन जैसे देश के सामने, यह सही संकेत नहीं है।

जिसके बाद हालात तेजी से बदले। करीब दस दिन बाद, यानी मार्च की शुरुआत में, ब्रिटेन ने अपना रुख बदलते हुए प्रधानमंत्री स्टार्मर ने एक आधिकारिक बयान जारी कर अमेरिका को इन बेस के इस्तेमाल की अनुमति दे दी। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह अनुमति सिर्फ सीमित और रक्षात्मक उद्देश्यों के लिए खासकर ईरान के मिसाइल लॉन्च साइट और उनके स्टोरेज ठिकानों को निशाना बनाने के लिए है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

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इसी दौरान हालात और ज्यादा गंभीर हो गए। उसी दिन ईरान ने बहरीन में मौजूद एक ब्रिटिश सैन्य ठिकाने को निशाना बनाया। इस हमले में ब्रिटिश सैनिक बाल-बाल बच गए, लेकिन खतरा साफ दिखने लगा था। इसके अलावा कतर के ऊपर एक ईरानी ड्रोन को ब्रिटेन के आरएएफ टाइफून लड़ाकू विमान ने मार गिराया।

इन सब घटनाओं के बीच एक और बड़ा दबाव था, जो चागोस द्वीपों से जुड़ा था। यह सौदा करीब 35 अरब पाउंड का था और इस पर अमेरिका का भी असर था। ऐसे में ब्रिटेन के सामने सुरक्षा, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का दबाव एक साथ आ गया। (Iran Missile Range Diego Garcia)

अमेरिकी ऑपरेशन पर पड़ा था असर 

ब्रिटेन की अनुमति न मिलने की वजह से अमेरिका को पहले लंबी दूरी से ऑपरेशन करना पड़ा था। अमेरिकी बी-2 बॉम्बर्स को अमेरिका से उड़ान भरकर 36 घंटे का मिशन करना पड़ा था। अब जब ब्रिटेन ने अपने बेस खोल दिए हैं, तो ऑपरेशन आसान हो गया है। अब बी-52 और बी-1 जैसे बॉम्बर्स कम समय में लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं और बार-बार ऑपरेशन कर सकते हैं। (Iran Missile Range Diego Garcia)

ईरान ने दी कड़ी प्रतिक्रिया

ईरान ने इस फैसले के तुरंत बाद कड़ी प्रतिक्रिया दी। ईरान के विदेश मंत्री ने कहा कि ब्रिटेन इस कदम से अपने नागरिकों को खतरे में डाल रहा है। उन्होंने साफ चेतावनी दी कि ईरान आत्मरक्षा का अधिकार इस्तेमाल करेगा। कुछ ही घंटों बाद मिसाइलें दाग दी गईं। यानी चेतावनी और हमला लगभग एक ही समय में हुआ।

हालांकि इस घटनाक्रम ने अमेरिका और ब्रिटेन के बीच मतभेद भी उजागर कर दिए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि ब्रिटेन ने बहुत देर से अनुमति दी, जिससे ऑपरेशन में देरी हुई। उन्होंने यह भी कहा कि सहयोगी देशों को ऐसे मामलों में तुरंत फैसले लेने चाहिए।

दरअसल अमेरिका चाहता है कि उसके सहयोगी देश तुरंत सैन्य समर्थन दें, जबकि ब्रिटेन अपने कानूनी और राजनीतिक पहलुओं को ध्यान में रखता है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

Iran Missile Range Diego Garcia

क्यों इतन अहम है डिएगो गार्सिया बेस

डियागो गार्सिया सिर्फ एक छोटा सा द्वीप नहीं है, बल्कि यह हिंद महासागर में स्थित एक बेहद अहम और रणनीतिक सैन्य ठिकाना है। यह चागोस द्वीपसमूह का सबसे बड़ा हिस्सा है, जहां अमेरिका और ब्रिटेन का संयुक्त सैन्य बेस मौजूद है।

इस बेस की खासियत यह है कि यहां दुनिया के सबसे आधुनिक सैन्य संसाधन तैनात हैं। बी-2 स्टेल्थ बॉम्बर जैसे अत्याधुनिक विमान, परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियां, गाइडेड मिसाइल से लैस युद्धपोत और खुफिया जानकारी जुटाने वाले इंटेलिजेंस सेंटर सभी एक ही जगह पर मौजूद हैं।

भौगोलिक रूप से भी यह जगह बेहद महत्वपूर्ण है। यह मालदीव से करीब 1600 किलोमीटर, श्रीलंका से लगभग 1900 किलोमीटर और भारत से करीब 1800 से 2000 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ऐसे में अगर कोई देश इस बेस तक पहुंचने की क्षमता दिखा देता है, तो इसका मतलब है कि पूरे क्षेत्र के कई अहम सैन्य और रणनीतिक ठिकाने खतरे में आ सकते हैं।

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इस बेस का इतिहास भी काफी पुराना और विवादों से जुड़ा रहा है। 1960 के दशक में ब्रिटेन ने इस सैन्य ठिकाने को विकसित किया था। उस समय चागोस द्वीपसमूह के मूल निवासियों को यहां से हटाया गया था, ताकि इस जगह को पूरी तरह सैन्य उपयोग के लिए तैयार किया जा सके। तब से लेकर आज तक यह बेस अमेरिका के लिए हिंद महासागर में सबसे महत्वपूर्ण ऑपरेशनल हब बना हुआ है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

गल्फ वॉर से लेकर इराक युद्ध तक, कई बड़े सैन्य अभियानों में इसी बेस से बॉम्बर विमान उड़ान भरते रहे हैं। यह जगह अमेरिका के लिए एक लॉन्च पैड की तरह काम करती है, जहां से वह एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका तक अपनी सैन्य पहुंच बनाए रखता है।

हाल के घटनाक्रम के बाद इस बेस की अहमियत और बढ़ गई है। पहले अमेरिका को अपने बॉम्बर विमान मिसौरी से उड़ाकर लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी, जिसमें करीब 36 घंटे का समय लगता था। लेकिन अब जब ब्रिटेन ने फेयरफोर्ड और डियागो गार्सिया जैसे बेस खोल दिए हैं, तो ऑपरेशन कहीं ज्यादा आसान हो गया है।

अब बमवर्षक विमान कम समय में लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं, मिशन पूरा कर सकते हैं और दोबारा हथियार भरकर फिर से उड़ान भर सकते हैं। इससे सैन्य कार्रवाई की गति और प्रभाव दोनों बढ़ जाते हैं। (Iran Missile Range Diego Garcia)

मिसाइल की रेंज ने बदला पूरा समीकरण

ईरान लंबे समय से यह कहता रहा है कि उसकी मिसाइलों की अधिकतम रेंज करीब 2000 किलोमीटर तक ही सीमित है। लेकिन हालिया हमले ने इस दावे को पूरी तरह बदल दिया है। अब जिस तरह से अटैक हुआ है, उससे साफ है कि ईरान की असली क्षमता इससे कहीं ज्यादा है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस हमले में इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल का इस्तेमाल किया गया था। इससे पहले ईरान के पास ज्यादातर शॉर्ट और मीडियम रेंज मिसाइलें थीं, जिनमें शाहब-3, एमाद और खोर्रमशहर शामिल हैं। इनकी रेंज लगभग 1300 से 3000 किलोमीटर के बीच मानी जाती है।

लेकिन पिछले कुछ सालों में ईरान ने स्पेस लॉन्च व्हीकल टेक्नोलॉजी पर भी काम किया है। इसी तकनीक की मदद से वह धीरे-धीरे लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा था।

हाल ही में अमेरिका और इजरायल ने “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” के तहत ईरान के कई मिसाइल ठिकानों, फैक्ट्रियों और स्टोरेज साइट्स पर बड़े हमले किए थे। इसके बावजूद ईरान इस तरह का लंबी दूरी का हमला करने में सफल रहा। इससे यह संकेत मिलता है कि उसकी मिसाइल उत्पादन क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है और वह अभी भी सक्रिय है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

हालांकि इस हमले में तकनीकी कमियां भी सामने आईं। एक मिसाइल उड़ान के दौरान ही फेल हो गई, जबकि दूसरी को रोक दिया गया। इससे यह पता चलता है कि ईरान की मिसाइलों की सटीकता और भरोसेमंद प्रदर्शन अभी पूरी तरह मजबूत नहीं है।

इसका सीधा असर यह है कि अब खतरे का दायरा काफी बढ़ गया है। पहले जहां 2000 किलोमीटर तक का क्षेत्र ही खतरे में माना जाता था, अब यह सीमा करीब 4000 किलोमीटर तक पहुंच गई है।

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इस नए दायरे में अब सिर्फ मध्य पूर्व ही नहीं, बल्कि यूरोप के कई हिस्से भी शामिल हो गए हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा समीकरण पर बड़ा असर पड़ सकता है। (Iran Missile Range Diego Garcia)

क्या चीन का है कोई रोल

इस पूरे मामले को लेकर कई लोग इसे सिर्फ ईरान का “मैसेज” बता रहे हैं, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा जटिल मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ ईरान की कार्रवाई नहीं थी, बल्कि इसके पीछे चीन की भूमिका भी हो सकती है। उनका मानना है कि यह कदम अमेरिका की सैन्य क्षमता और उसके मिसाइल डिफेंस सिस्टम को परखने के लिए उठाया गया।

20 मार्च को ईरान ने हिंद महासागर में स्थित डियागो गार्सिया बेस की ओर दो मीडियम रेंज बैलिस्टिक मिसाइल दागीं। इनमें से एक मिसाइल उड़ान के दौरान ही खराब हो गई, जबकि दूसरी को अमेरिकी युद्धपोत ने एसएम-3 इंटरसेप्टर से रोकने की कोशिश की। हालांकि यह साफ नहीं हो पाया कि वह मिसाइल पूरी तरह नष्ट हुई या नहीं। (Iran Missile Range Diego Garcia)

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस हमले में खोर्रमशहर-4 मिसाइल का इस्तेमाल किया गया हो सकता है, जिसे खैबर के नाम से भी जाना जाता है। यह ईरान की एक एडवांस लिक्विड फ्यूल वाली मीडियम रेंज बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसकी रेंज 4000 किलोमीटर से ज्यादा बताई जाती है और यह करीब 1500 किलोग्राम तक का वॉरहेड ले जा सकती है।

इस मिसाइल की खास बात यह है कि यह बहुत तेज गति से उड़ती है, जिसे हाइपरसोनिक रेंज कहा जाता है। इसकी गति मैक 8 से लेकर मैक 16 तक हो सकती है। इसमें एक खास तरह का सिस्टम होता है, जिसे मैन्युवरेबल री-एंट्री व्हीकल कहा जाता है। इसके जरिए मिसाइल अपने रास्ते में बदलाव कर सकती है, जिससे इसे रोकना और भी मुश्किल हो जाता है।

बताया जाता है कि यह मिसाइल कम समय में तैयारी के साथ मोबाइल लॉन्चर से करीब 15 मिनट के अंदर दागी जा सकती है। इसकी सटीकता भी काफी बेहतर मानी जाती है, जो करीब 30 से 100 मीटर तक की गलती के दायरे में रहती है।

माना जाता है कि यह मिसाइल उत्तर कोरिया की ह्वासोंग-10 तकनीक पर आधारित है, जो खुद सोवियत संघ की पुरानी आर-27 मिसाइल से प्रेरित थी। ईरान ने 2005 के आसपास इस तकनीक को हासिल किया और फिर इसमें अपने स्तर पर सुधार करते हुए खोर्रमशहर सीरीज तैयार की।

कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि इस मिसाइल के नए वर्जन खासकर डिजाइन और गाइडेंस सिस्टम में में चीन की तकनीकी मदद भी शामिल हो सकती है।

खास बात यह रही कि अमेरिका इस मिसाइल को पूरी तरह रोक नहीं पाया। इसे एक चिंता की बात माना जा रहा है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका के मिसाइल डिफेंस सिस्टम में कुछ कमियां हो सकती हैं। (Iran Missile Range Diego Garcia)

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    रक्षा समाचार न्यूज डेस्क भारत की अग्रणी हिंदी रक्षा समाचार टीम है, जो Indian Army, Navy, Air Force, DRDO, रक्षा उपकरण, युद्ध रणनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक खबरें पेश करती है। हम लाते हैं सटीक, सरल और अपडेटेड Defence News in Hindi। हमारा उद्देश्य है – "हर खबर, देश की रक्षा से जुड़ी।"

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