📍नई दिल्ली | 21 Aug, 2025, 2:09 PM
Agni-5 IRBM: भारत ने 20 अगस्त 2025 को ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से अग्नि-5 का सफल परीक्षण किया गया। इस परीक्षण में मिसाइल ने सभी ऑपरेशनल और टेक्निकल स्टैंडर्ड्स को सफलतापूर्वक पूरा किया। इस मिसाइल को डीआरडीओ ने बनाया है। यह मिसाइल जमीन से जमीन पर मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइल है जिसकी रेंज 5000 किलोमीटर से अधिक है।
यह परीक्षण खास इसलिए है क्योंकि यह पिछले साल मार्च 2024 में मिशन दिव्यास्त्र के तहत मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल (MIRV) टेक्नोलॉजी के साथ अग्नि-5 के पहले सफल परीक्षण के बाद हुआ। इस तकनीक ने भारत को उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल कर दिया, जिनके पास एक मिसाइल से कई लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता है। लेकिन MIRV तकनीक क्या है? सरकार अब अग्नि-5 को इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल (IRBM) क्यों कह रही है, जबकि पहले इसे इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) कहा जाता था? आइए, इसे सरल भाषा में समझते हैं।
Agni-5 IRBM: क्या कहा सरकार ने अपने बयान में
भारत सरकार ने अब आधिकारिक तौर पर अग्नि-5 मिसाइल (Agni-5 IRBM) को IRBM की श्रेणी में रखा है। 20 अगस्त को सरकार की तरफ से जारी हुई प्रेस रिलीज में भी अग्नि-5 को IRBM कहा गया है। इस बदलाव के कई रणनीतिक मायने हैं। सबसे बड़ा कारण यह हो सकता है कि भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को डिफेंसिव राष्ट्र के रूप में दिखाना चाहता है और ICBM का टैग सीधे परमाणु महाशक्तियों की लीग में रख देता है।
रक्षा मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि इस परीक्षण ने मिसाइल के सभी ऑपरेशनल और टेक्निकल मापदंडों को सफलतापूर्वक मान्य किया। यह परीक्षण स्ट्रैटेजिक फोर्सेस कमांड (SFC) की निगरानी में हुआ, जो भारत के एटोमिक वेपंस डिलीवरी सिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मिसाइल इतनी तेज है कि लॉन्च होने के बाद इसे रोकना लगभग नामुमकिन है। एक बार टारगेट सेट कर देने के बाद यह अपने लक्ष्य को नष्ट किए बिना नहीं रुकती।
Agni-5 IRBM: कैनिस्टर-लॉन्च सिस्टम से लैस
अग्नि-5 मिसाइल (Agni-5 IRBM) को 1983 में शुरू हुए इंटीग्रेटेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IGMDP) के तहत विकसित किया गया है। यह मिसाइल 50 टन वजनी और 17 मीटर लंबी है, जिसकी मोटाई करीब 2 मीटर है। यह 1,500 किलोग्राम तक के हथियार ले जा सकती है और जमीन से जमीन पर मार करने में सक्षम है। इसकी रफ्तार ध्वनि की रफ्तार से 24 गुना तेज है, यानी यह मैक 24 की रफ्तार से लक्ष्य की ओर बढ़ सकती है। इसकी खासियत यह है कि इसे सड़क पर आसानी से ले जाया जा सकता है, क्योंकि यह कैनिस्टर-लॉन्च सिस्टम से लैस है। इसका मतलब है कि मिसाइल को एक विशेष कंटेनर में रखकर कहीं भी ले जाया जा सकता है, जिससे इसे तैनात करना और छिपाना आसान हो जाता है।
🚀 BREAKING: India successfully test-fires Agni-5 Intermediate Range Ballistic Missile from Chandipur, Odisha.
✅ Launch validated all operational & technical parameters, confirms MoD.
🎯 Conducted under Strategic Forces Command.#Agni5 #MissileTest #IndianDefence pic.twitter.com/VFn9Q3i9Qy— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) August 20, 2025
Agni-5 IRBM: IRBM वर्सेस ICBM
अग्नि-5 (Agni-5 IRBM) का पहला परीक्षण 2012 में हुआ था, और तब से इसकी कई बार टेस्टिंग हो चुकी है। पहले इसे ICBM कहा जाता था, क्योंकि इसकी रेंज 5,000 किमी से अधिक थी, इसकी जद में चीन के ज्यादातर शहर खासतौर पर उत्तरी और पूर्वी हिस्से आते हैं। लेकिन अब सरकार इसे IRBM के रूप में पेश कर रही है। IRBM यानी इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल की रेंज 3,000 से 5,500 किलोमीटर तक होती है, जबकि ICBM यानी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल की रेंज 5,500 किलोमीटर से अधिक होती है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि वजन कम करने के बाद अग्नि-5 की वास्तविक रेंज 7,000 किमी तक हो सकती है। 2022 में DRDO ने मिसाइल का वजन 20 फीसदी तक कम करने का दावा किया था, जिससे इसकी रेंज बढ़कर 7,000 किमी से अधिक हो सकती है। फिर भी, सरकार इसे आधिकारिक तौर पर IRBM ही कह रही है।
Agni-5 IRBM: अग्नि-5 में MIRV टेक्नोलॉजी
अग्नि-5 (Agni-5 IRBM) में MIRV टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गयाा है। MIRV का मतलब है मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल। यह एक ऐसी टेक्नोलॉजी है, जिसमें एक मिसाइल कई परमाणु हथियार ले जा सकती है, और प्रत्येक हथियार को अलग-अलग लक्ष्य पर निशाना साधने के लिए प्रोग्राम किया जा सकता है। ये लक्ष्य सैकड़ों किलोमीटर दूर हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, एक अग्नि-5 मिसाइल तीन से चार परमाणु हथियार ले जा सकती है, और प्रत्येक को अलग-अलग रफ्तार और दिशा में छोड़ा जा सकता है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यह मिसाइल 10-12 हथियार भी ले जा सकती है। इस तकनीक की खासियत यह है कि यह दुश्मन के मिसाइल डिफेंस सिस्टम्स को भी चकमा दे सकती है। MIRV-लैस मिसाइलें डिकॉय यानी नकली हथियार भी ले जा सकती हैं, जो दुश्मन के रडार को भ्रमित करते हैं, जिससे असली हथियार को रोका जाना मुश्किल हो जाता है।
Agni-5 IRBM: क्यों जरूरी है MIRV क्षमता
MIRV तकनीक को विकसित करना आसान नहीं है। इसके लिए हथियारों का छोटा साइज (मिनिएचराइजेशन), हल्के वजन के री-एंट्री व्हीकल, और सटीक नेविगेशन सिस्टम की जरूरत होती है। अग्नि-5 में स्वदेशी एवियोनिक्स सिस्टम और ज्यादा सटीकता वाले सेंसर पैकेज लगाए गए हैं, ताकि हथियार अपने टारगेट पर हिट करे। इस तकनीक का पहला सफल परीक्षण 11 मार्च 2024 को मिशन दिव्यास्त्र के तहत हुआ, जिसे DRDO ने ओडिशा के डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वीप से लॉन्च किया था। इस परीक्षण की निगरानी विभिन्न टेलीमेट्री और रडार स्टेशनों ने की, और मिसाइल ने सभी निर्धारित मापदंडों को पूरा किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने DRDO के वैज्ञानिकों की इस उपलब्धि की सराहना की।
यह तकनीक भारत की रक्षा रणनीति में क्यों महत्वपूर्ण है? भारत की परमाणु नीति ‘नो-फर्स्ट-यूज’ (पहले हमला न करना) और क्रेडिबल मिनिमम डिटरेंस पर आधारित है। इसका मतलब है कि भारत पहले परमाणु हमला नहीं करेगा, लेकिन अगर कोई देश भारत पर परमाणु हमला करता है, तो भारत इसका करारा जवाब देगा। MIRV तकनीक इस जवाबी क्षमता को बढ़ाती है, क्योंकि एक मिसाइल कई लक्ष्यों को नष्ट कर सकती है। चीन के पास पहले से ही हांगकी (HQ-19) जैसा मिसाइल डिफेंस सिस्टम है, MIRV तकनीक भारत को सामरिक संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। चीन ने अपनी कुछ DF-5 मिसाइलों में MIRV तकनीक लगाई है।
अग्नि-5 (Agni-5 IRBM) को खासतौर पर चीन से मिलने वाली चुनौतियों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। भारत की दूसरी मिसाइलें, जैसे अग्नि-1, अग्नि-2, और अग्नि-3, मुख्य रूप से पाकिस्तान से मिल रहे खतरे को देखते हुए बनाई गई थीं। लेकिन अग्नि-5 की रेंज इसे पूरे एशिया, विशेष रूप से चीन के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों, और यूरोप के कुछ हिस्सों तक पहुंचने में सक्षम बनाती है। मिसाइल के पहले चरण को अग्नि-3 से लिया गया है, जबकि दूसरे और तीसरे चरण को हल्का करने के लिए कंपोजिट सामग्री का उपयोग किया गया है। MIRV से यह मुश्किल हो जाता है क्योंकि दुश्मन को पता नहीं चलता कि असली वारहेड कौन सा है और किस दिशा में जाएगा। कई डमी वॉरहेड्स के साथ असली वारहेड्स को भी छोड़ा जाता है। इससे दुश्मन का सुरक्षा कवच टूट सकता है।
जारी किया था नोटम
20 अगस्त 2025 के परीक्षण के लिए पहले ही बंगाल की खाड़ी में नोटम (नोटिस टू एयरमैन) भी जारी किया गया था, जो अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत विमानन और समुद्री यातायात को सूचित करता है। इस परीक्षण की निगरानी भारतीय नौसेना के जहाजों और DRDO के वैज्ञानिकों ने की, जो दक्षिणी हिंद महासागर में कई जगहों पर तैनात थे।
पांच देशों के पास है MIRV तकनीक
MIRV तकनीक की शुरुआत 1960 के दशक में अमेरिका ने की थी, जब उसने 1970 में मिनटमैन-III मिसाइल और 1971 में पॉसाइडन मिसाइल में इस तकनीक का उपयोग किया। आज अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, और यूके के पास यह तकनीक है। पाकिस्तान ने भी 2017 में अपनी अबाबील मिसाइल में MIRV तकनीक का परीक्षण किया था, हालांकि इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं।
अग्नि-5 के नेविगेशन और गाइडेंस सिस्टम में रिंग लेजर जायरोस्कोप और एक्सेलेरोमीटर का उपयोग किया गया है। मिसाइल का निर्माण कार्बन कंपोजिट सामग्री से किया गया है, जो इसे हल्का बनाता है और वायुमंडल में पुनः प्रवेश के दौरान उच्च तापमान को सहन करने में सक्षम बनाता है। सूत्र बताते हैं कि अग्नि-5 में एंटी-सैटेलाइट (ASAT) क्षमता से भी लैस है। 2019 में मिशन शक्ति के तहत भारत ने 300 किमी की ऊंचाई पर एक उपग्रह को नष्ट करके अपनी ASAT क्षमता दिखाई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि अग्नि-5 को 800 किमी की ऊंचाई तक पहुंचने में सक्षम बनाया जा सकता है, जिससे यह उपग्रहों को नष्ट करने में भी उपयोगी हो सकता है।
अग्नि-5 (Agni-5 IRBM) भारत की परमाणु त्रिकोणीय क्षमता का भी हिस्सा है, जिसमें जमीन, हवा, और समुद्र से परमाणु हथियार दागने की क्षमता शामिल है। भारत ने 2018 में INS अरिहंत पनडुब्बी के पहले डिटरेंस गश्त के साथ इस ट्राइंगल को पूरा किया था। यह मिसाइल भारत की “सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी” को भी मजबूत करती है, यानी अगर भारत पर परमाणु हमला होता है, तो जवाबी हमला और भी ज्यादा असरदार हो सकता है।