📍नई दिल्ली | 15 Oct, 2026, 7:52 PM
Varunastra Torpedo and GSAT-7C Satellite: रक्षा मंत्रालय ने गुरुवार को भारतीय नौसेना और वायुसेना की क्षमताओं को मजबूत करने के लिए 4,106 करोड़ रुपये के दो बड़े डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट्स को मंजूरी दी। इनमें भारतीय नौसेना के लिए स्वदेशी वरुणास्त्र हेवी वेट टॉरपीडो और भारतीय वायुसेना के लिए जीसैट-7सी मिलिट्री कम्युनिकेशन सैटेलाइट शामिल हैं।
वरुणास्त्र का निर्माण पब्लिक सेक्टर की डिफेंस कंपनियां हैदराबाद स्थित भारत डायनामिक्स लिमिटेड (बीडीएल), हैदराबाद करेगी, जबकि जीसैट-7सी को बेंगलुरु स्थित न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड बनाएंगी।
Varunastra Torpedo and GSAT-7C Satellite: वरुणास्त्र टॉरपीडो के लिए 1,543 करोड़ रुपये का सौदा
भारतीय नौसेना के लिए वरुणास्त्र एक महत्वपूर्ण स्वदेशी अंडरवॉटर हथियार है। इसे नौसेना विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी प्रयोगशाला (एनएसटीएल) ने डेवलप किया है। इसका निर्माण भारत डायनामिक्स लिमिटेड करती है। यह एक शिप-लॉन्च्ड हेवी वेट टॉरपीडो है, जिसे दुश्मन की पनडुब्बियों को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है।
वरुणास्त्र में एडवांस मैन्यूवरिंग क्षमता है। यह पानी के भीतर अपना रास्ता बदलते हुए टारगेट तक पहुंच सकता है। पनडुब्बियों के खिलाफ यह क्षमता काफी महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि पनडुब्बियां लगातार अपनी जगह बदल सकती हैं।
15 अक्टूबर को किए गए कॉन्ट्रैक्ट की कुल लागत 1,543 करोड़ रुपये है। बीडीएल की एक्सचेंज फाइलिंग के मुताबिक टैक्स छोड़कर कुल कॉन्टैक्ट की कीमत लगभग 1,307 करोड़ रुपये है। वहीं इन टारपीडो की सप्लाई 42 महीने में करनी होगी। (Varunastra Torpedo and GSAT-7C Satellite)
7.78 मीटर लंबा और लगभग 1,850 किलोग्राम वजनी है वरुणास्त्र
वरुणास्त्र का आकार और वजन इसे नौसेना के हेवी वेट टॉरपीडो की श्रेणी में रखते हैं। इसकी लंबाई लगभग 7.78 मीटर और व्यास 533.4 मिलीमीटर है। इसका वजन कॉम्बैट कॉन्फिगरेशन में लगभग 1,850 किलोग्राम है।
इसकी अधिकतम रफ्तार लगभग 40 नॉट है। समुद्री गति मापने की इकाई नॉट में एक नॉट का मतलब प्रति घंटे एक समुद्री मील होता है। वरुणास्त्र को लगभग 8 मीटर से 600 मीटर तक की गहराई में ऑपरेशन के लिए तैयार किया गया है।
इसमें इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम लगा है। प्रोपल्शन सिस्टम टॉरपीडो को पानी के भीतर आगे बढ़ाता है। इसके साथ लगा गाइडेंस सिस्टम उसे टारगेट को निशाना बनाने में मदद करता है।
बता दें कि एंटी-सबमरीन वॉरफेयर में टारगेट की पहचान, उसकी गतिविधियों का पता लगाना, सही समय पर टॉरपीडो लॉन्च करना और पानी के भीतर उसकी दिशा बनाए रखना भी जरूरी होता है। वरुणास्त्र इसी तरह के ऑपरेशन के लिए तैयार किया गया है। (Varunastra Torpedo and GSAT-7C Satellite)
🚀🇮🇳 ₹4,106 Crore Defence Boost! India Signs GSAT-7C Satellite and Varunastra Torpedo Deals
The Ministry of Defence has signed contracts worth approximately ₹4,106 crore to strengthen the Indian Air Force’s secure communications and the Indian Navy’s anti-submarine warfare capabilities.
🛰️ GSAT-7C Communication Satellite — ₹2,563 Crore
The contract with NewSpace India Limited (NSIL), Bengaluru, covers an indigenously designed, developed and manufactured satellite to enhance secure, resilient and seamless communication for Indian Air Force assets.
⚓ Varunastra Heavyweight Torpedoes — ₹1,543 Crore
The contract with Bharat Dynamics Limited (BDL), Hyderabad, covers indigenous ship-launched anti-submarine torpedoes developed by the Naval Science and Technological Laboratory (NSTL). Varunastra is designed to engage enemy submarines at long ranges.
Signed in New Delhi on 15 October 2026, the two contracts reinforce India’s push for Aatmanirbhar Bharat and Make in India in critical defence technologies.
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2016 में नौसेना में शामिल हुआ था वरुणास्त्र
वरुणास्त्र को साल 2016 में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। नवंबर 2020 में भारत डायनामिक्स लिमिटेड ने पहले प्रोडक्शन मॉडल की सप्लाई की थी।
14 जून 2019 को नौसेना ने 63 वरुणास्त्र टॉरपीडो के लिए लगभग 1,187 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट किया था। इस खरीद का उद्देश्य नौसेना के युद्धपोतों की पनडुब्बी रोधी क्षमता को मजबूत करना था।
दरअसल समुद्र के भीतर पनडुब्बियों का पता लगाना और उन्हें रोकना किसी भी नौसेना के लिए चुनौतीपूर्ण काम है। पनडुब्बियां पानी के भीतर छिपकर निगरानी कर सकती हैं और जरूरत पड़ने पर युद्धपोतों या अन्य समुद्री लक्ष्यों के खिलाफ हथियारों का इस्तेमाल कर सकती हैं।
इसी कारण भारतीय नौसेना अपने एंटी-सबमरीन वॉरफेयर सिस्टम को मजबूत करने पर काम कर रही है। इसमें सोनार, समुद्री निगरानी विमान, हेलीकॉप्टर और टॉरपीडो जैसे कई सिस्टम एक साथ भूमिका निभाते हैं। (Varunastra Torpedo and GSAT-7C Satellite)
जीसैट-7सी के लिए 2,563 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट
दूसरा कॉन्ट्रैक्ट भारतीय वायुसेना के लिए जीसैट-7सी मिलिट्री कम्युनिकेशन सैटेलाइट के इस्तेमाल को लेकर है। इसके लिए बेंगलुरु स्थित न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड के साथ 2,563 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट किया है।
Defence Acquisition Council (डीएसी) ने नवंबर 2021 में इस प्रोजेक्ट के लिए 2,236 करोड़ रुपये की मंजूरी दी थी। लेकिन अब इसका कॉन्ट्रैक्ट मंजूर राशि से लगभग 15 प्रतिशत अधिक लागत पर किया गया है।
यह सैटेलाइट भारत में डिजाइन, विकसित और निर्मित किया जाएगा। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय वायुसेना के विमानों और अन्य सैन्य संसाधनों के बीच सुरक्षित, भरोसेमंद और निर्बाध कम्युनिकेशन व्यवस्था को मजबूत करना है।
भारत पहले भी मिलिट्री कम्युनिकेशन सैटेलाइटों के जरिए अपनी सेनाओं की जरूरतें पूरी करने की दिशा में काम करता रहा है। जीसैट-7ए को 2018 में लॉन्च किया गया था। नया जीसैट-7सी वायुसेना की समर्पित सैटेलाइट कम्युनिकेशन क्षमता को आगे बढ़ाने का प्रोजेक्ट है।
आधुनिक युद्ध में लड़ाकू विमान, निगरानी विमान, ड्रोन, रडार और जमीन पर मौजूद कमांड सेंटर के बीच जानकारी का तेजी से आदान-प्रदान जरूरी होता है। यदि अलग-अलग मिलिट्री प्लेटफॉर्म एक-दूसरे से लगातार संपर्क में रहें, तो ऑपरेशन के दौरान कॉर्डिनेशन बेहतर बनाया जा सकता है।
जीसैट-7सी वायुसेना की मिलिट्री कम्युनिकेशन क्षमता को मजबूत करने वाले अंतरिक्ष आधारित नेटवर्क का हिस्सा होगा। (Varunastra Torpedo and GSAT-7C Satellite)
जीसैट-7सी की क्यों है जरूरत
जीसैट-7सी वायुसेना को नेटवर्क-सेंट्रिक ऑपरेशन में बढ़त देगा। जिससे अलग-अलग मिलिट्री प्लेटफॉर्म एक-दूसरे से जुड़कर जरूरी सूचनाएं तेजी से शेयर कर सकेंगे। ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों के बाद मिलिट्री कम्युनिकेशन और स्पेस बेस्ड क्षमताओं को मजबूत करने के लिहाज से यह प्रोजेक्ट बेहद महत्वपूर्ण है।
सामान्य कम्युनिकेशन सैटेलाइट्स के मुकाबले मिलिट्री कम्युनिकेशन सिस्टम की जरूरतें अलग होती हैं। इसमें सुरक्षित डेटा ट्रांसफर, भरोसेमंद कनेक्टिविटी और ऑपरेशन के दौरान कम्युनिकेशन बनाए रखना महत्वपूर्ण होता है।
लड़ाकू विमान जब अपने बेस से काफी दूर ऑपरेशन करते हैं, तब केवल सामान्य रेडियो कम्युनिकेशन पर निर्भर रहना काफी नहीं होता। सैटेलाइट कम्युनिकेशन के जरिए लंबी दूरी पर मौजूद सैन्य प्लेटफॉर्म और कमांड सेंटर के बीच संपर्क बनाए रखने में मदद मिलती है।
जीसैट-7सी का उद्देश्य भारतीय वायुसेना को ऐसा डेडिकेटेड कम्युनिकेशन क्षमता उपलब्ध कराना है। इससे वायुसेना के अलग-अलग संसाधनों के बीच कॉर्डिनेशन और ऑपरेशनल कनेक्टिविटी को मजबूत करने में मदद मिलेगी।
यह सिस्टम लड़ाकू विमानों, एईडब्ल्यूएंडसी (AEW&C) विमानों, ड्रोन, रडार, ग्राउंड स्टेशन और कमांड सेंटर के बीच रियल-टाइम में सुरक्षित संपर्क और इनफॉरमेशन एक्सचेंज में मदद करेगा।
इसमें सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो (SDR) तकनीक को आसानी से जोड़ा जा सकेगा। यह लाइन ऑफ साइट से बाहर भी कम्युनिकेशन कर सकेगा। यानी जब दो मिलिट्री प्लेटफॉर्म एक-दूसरे को सीधे नहीं देख सकते, तब भी उनके बीच संपर्क बनाए रखने में मदद मिलेगी। इसके अलावा, यह सिस्टम जैमिंग और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के दौरान संचार को बाधित होने से बचाने की बेहतर क्षमता रखेगा। (Varunastra Torpedo and GSAT-7C Satellite)
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