📍नई दिल्ली | 15 Oct, 2026, 1:08 PM
Indian Army Indigenisation Roadmap: भारतीय सेना ने रक्षा उपकरणों और उनके स्पेयर पार्ट्स के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम करने की बड़ी तैयारी कर रही है। सेना ने अपने स्वदेशीकरण निदेशालय (डायरेक्टोरेट ऑफ इंडिजेनाइजेशन यानी डीओआई) की मदद के लिए प्रोफेशनल कंसल्टेंसी फर्मों से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (ईओआई) मांगा है। इसका मकसद यह पता लगाना है कि सेना के लिए विदेश से मंगाए जाने वाले सामान को भारत में कैसे बनाया जा सकता है और इस पूरी प्रक्रिया को प्रभावी तरीके से जल्द पूरा किया जाए।
सेना के इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स (EME) कोर के तहत काम करने वाले इस निदेशालय के लिए चयनित कंसल्टेंसी फर्म को मौजूदा व्यवस्था का अध्ययन करके सुधार के सुझाव देने और स्वदेशीकरण के लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करने में मदद करनी होगी।
Indian Army Indigenisation Roadmap: सेना के स्वदेशीकरण निदेशालय की क्या है भूमिका?
भारतीय सेना को अपने टैंक, Armored Vehicle, मिलिट्री ट्रक, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, हथियार और इंजीनियरिंग सिस्टम चलाने के लिए बड़ी संख्या में स्पेयर पार्ट्स और दूसरे उपकरणों की जरूरत होती है। इनमें से कुछ सामान देश में बनता है, जबकि कई जरूरी पुर्जों के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता है।
कई बार विदेशी सप्लायर से सामान मिलने में देरी होती है। कुछ मामलों में संबंधित कंपनी उत्पादन बंद कर देती है या किसी पुराने उपकरण के लिए जरूरी पुर्जे उपलब्ध नहीं रहते। ऐसी स्थिति में सैन्य उपकरणों का रखरखाव प्रभावित हो सकता है।
स्वदेशीकरण निदेशालय का काम ऐसे ही सामान की पहचान करना है, जिसे भारतीय कंपनियों की मदद से देश में बनाया जा सकता है। इसका उद्देश्य केवल किसी विदेशी पुर्जे की नकल तैयार करना नहीं, बल्कि उसकी जरूरत, लागत, उपलब्धता और लंबे समय तक इस्तेमाल की संभावना को देखते हुए स्वदेशी विकल्प विकसित करने की प्रक्रिया को व्यवस्थित करना है।
इसमें व्हीकल से जुड़े कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, हथियारों से संबंधित स्टोर तथा इंजीनियरिंग स्टोर शामिल हैं। ऐसे सामान पर भी ध्यान दिया जाता है, जिन्हें रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (पीएसयू) नहीं बना सकते हैं या जिनकी समय पर सप्लाई नहीं हो पा रही है। (Indian Army Indigenisation Roadmap)
2010 में बना था निदेशालय
स्वदेशीकरण निदेशालय की स्थापना वर्ष 2010 में हुई थी। उस समय स्वदेशीकरण से जुड़ी जिम्मेदारी डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ डिफेंस क्वॉलिटी एश्योरेंस (डीजीक्यूए) से इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स महानिदेशालय (डीजीईएमई) को सौंपी गई थी।
शुरुआत में यह निदेशालय सेना मुख्यालय के तहत काम करता था। इसके बाद 24 फरवरी 2021 को इसका नियंत्रण एमजीएस/एडीजी ईएम के पास चला गया। 13 जून 2025 को इसे दोबारा सक्रिय किया गया। अब यह मुख्यालय बेस वर्कशॉप ग्रुप ईएमई और ईएमई कोर के तहत काम कर रहा है।
सेना अब इसे और प्रभावी बनाने के लिए एक्सपर्ट्स की मदद लेना चाहती है। कंसल्टेंसी फर्म मौजूदा प्रक्रियाओं, संगठनात्मक ढांचे और कामकाज की समीक्षा करेगी। इसके आधार पर यह बताया जाएगा कि स्वदेशीकरण से जुड़े फैसले लेने, कंपनियों को शामिल करने और जरूरी पुर्जों का उत्पादन शुरू कराने में कहां सुधार किया जा सकता है। (Indian Army Indigenisation Roadmap)
देशभर के आठ केंद्रों की भी होगी समीक्षा
इस प्रोजेक्ट के तहत सिर्फ दिल्ली स्थित मुख्यालय का अध्ययन नहीं किया जाएगा। इसमें देशभर में मौजूद आठ नोडल इंडिजेनाइजेशन सेंटर्स (एनआईसी) और दो इंडिजेनाइजेशन सेल्स का कामकाज भी परखा जाएगा।
ये केंद्र स्वदेशीकरण से जुड़े काम को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके जरिए जरूरतों की पहचान, संबंधित युनिट्स के साथ तालमेल और स्वदेशी विकल्प तैयार करने से जुड़े काम किए जाते हैं।
कंसल्टेंसी फर्म को यह समझना होगा कि मुख्यालय, नोडल सेंटर्स, बेस वर्कशॉप और दूसरी संबंधित युनिट्स के बीच जानकारी किस तरह साझा की जाती है। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि किसी पुर्जे को स्वदेशी बनाने का प्रस्ताव मिलने से लेकर उसके उत्पादन और इस्तेमाल तक की प्रक्रिया में कितना समय लगता है।
इस समीक्षा में आर्गनाइजेशन का स्ट्रक्चर, कर्मचारियों की क्षमता, नीतियां, फैसले लेने का सिस्टम और डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल जैसे पहलू शामिल होंगे। (Indian Army Indigenisation Roadmap)
कहां अटकता है स्वदेशीकरण का काम?
सेना ने इस प्रोजेक्ट के तहत उन समस्याओं की पहचान करने पर जोर दिया है, जिनकी वजह से स्वदेशीकरण की प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है। इनमें लंबी प्रशासनिक प्रक्रियाएं, डिजिटल सिस्टम का सीमित इस्तेमाल, तकनीकी जानकारी को एक युनिट से दूसरी युनिट तक पहुंचाने में दिक्कतें और निजी कंपनियों की भागीदारी से जुड़ी समस्याएं शामिल हैं।
किसी विदेशी उपकरण का स्वदेशी विकल्प तैयार करने के लिए कई बार उसकी तकनीकी जानकारी और डिजाइन से जुड़े दस्तावेजों की जरूरत होती है। लेकिन बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपी) और डिजाइन संबंधी जानकारी तक पहुंच आसान नहीं होती। कुछ मामलों में रिवर्स इंजीनियरिंग यानी किसी मौजूदा पुर्जे की बनावट और काम करने के तरीके का अध्ययन करके उसका स्वदेशी विकल्प तैयार करने में भी तकनीकी सहायता की जरूरत पड़ती है।
कंसल्टेंसी फर्म इन समस्याओं का अध्ययन करेगी और बताएगी कि प्रक्रियाओं को सरल बनाने, कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने तथा तकनीकी जानकारी के बेहतर इस्तेमाल के लिए क्या बदलाव किए जा सकते हैं।
इसके साथ ही देश और विदेश में अपनाई जा रही अच्छी मेथोडोलॉजी की भी स्टडी होगी। रक्षा उपकरणों के रखरखाव, उनके पूरे जीवनकाल में सहायता और स्वदेशी उत्पादन से जुड़ी व्यवस्थाओं की तुलना करके कमियों की पहचान की जाएगी। (Indian Army Indigenisation Roadmap)
16 सप्ताह में तैयार होंगी चार रिपोर्ट
सेना ने इस प्रोजेक्ट को चार चरणों में बांटा है। पूरा काम लगभग 16 सप्ताह में पूरा करने की योजना है। पहले चरण में मौजूदा व्यवस्था का आकलन किया जाएगा, जिसे पांचवें सप्ताह तक पूरा करना है। इसमें दस्तावेजों की समीक्षा, संबंधित अधिकारियों और अन्य पक्षों से बातचीत तथा मौजूदा प्रक्रियाओं में आने वाली समस्याओं की पहचान की जाएगी। इसके बाद मौजूदा व्यवस्था पर रिपोर्ट तैयार होगी।
दूसरे चरण में आठवें सप्ताह तक बेंचमार्किंग और गैप एनालिसिस किया जाएगा। इसमें मौजूदा व्यवस्था की तुलना बेहतर कार्यप्रणालियों से करके कमियों का पता लगाया जाएगा। इस चरण की रिपोर्ट में सुधार की जरूरत वाले क्षेत्रों का उल्लेख होगा।
तीसरे चरण में 12वें सप्ताह तक टारगेट ऑपरेटिंग मॉडल तैयार किया जाएगा। इसमें स्वदेशीकरण निदेशालय के कामकाज, संगठनात्मक ढांचे, जिम्मेदारियों, तकनीकी संसाधनों और नीतियों में बदलाव से जुड़े सुझाव शामिल होंगे।
चौथे चरण में 16वें सप्ताह तक इम्प्लीमेंटेशन रोडमैप और गवर्नेंस फ्रेमवर्क तैयार किया जाएगा। इसमें सुधार लागू करने की प्राथमिकताएं, जिम्मेदार इकाइयां, समयसीमा और प्रदर्शन मापने के तरीके तय किए जाएंगे।
इस तरह परियोजना का उद्देश्य केवल समस्याएं गिनाना नहीं, बल्कि स्वदेशीकरण की प्रक्रिया को व्यवस्थित करने के लिए चरणबद्ध योजना तैयार करना है। (Indian Army Indigenisation Roadmap)
कंसल्टेंसी फर्मों के लिए रखी गईं सख्त शर्तें
सेना ने इस काम के लिए कंपनियों की योग्यता से जुड़ी शर्तें भी तय की हैं। आवेदन करने वाली फर्म का भारतीय कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत रजिस्टर्ड हो और कम से कम 10 साल का अनुभव हो।
इसके अलावा वित्त वर्ष 2022-23, 2023-24 और 2024-25 के दौरान कंपनी का औसत सालाना टर्नओवर कम से कम 500 करोड़ रुपये होना चाहिए। फर्म का एनआईसीएसआई के साथ टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट श्रेणी में टियर-1 कंसल्टेंट के रूप में लिस्टेड होना भी जरूरी है।
किसी केंद्रीय या राज्य सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम अथवा वैधानिक प्राधिकरण ने कंपनी को ब्लैकलिस्ट या डिबार नहीं किया होना चाहिए। फर्म के पास कम से कम तीन विशेषज्ञ या कंसल्टेंट भी होने चाहिए, जिनके सीवी और संबंधित प्रमाणपत्र जमा करने होंगे। चयन प्रक्रिया में पहले कंपनियों की पात्रता की जांच होगी। शॉर्टलिस्ट की गई कंपनियों के लिए बाद में रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी किया जाएगा। (Indian Army Indigenisation Roadmap)
Author
Harendra Chaudhary is active in defence journalism and is associated with RakshaSamachar.com. They have long been covering strategic news, defence policies and national security related issues involving Indian Army, Navy and Air Force. In his career of journalism, Harendra has written detailed articles on Parliament’s activities, military campaigns, India-Pak and India-China border dispute, defence procurement and ‘Make in India’ defence projects. They are known for deep understanding and analytical approach of defense cases.





