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India Russia RELOS agreement: भारत ने किया रूस के साथ यह खास सैन्य समझौता, आर्कटिक तक मिलेगी पहुंच, चीन पर लगाम कसने की तैयारी

समझौते के मुताबिक, भारत और रूस एक समय में 5 वॉरशिप, 10 विमान और 3000 सैनिक तक एक-दूसरे के इलाकों में तैनात कर सकते हैं...

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📍नई दिल्ली | 4 Dec, 2025, 5:48 PM

India Russia RELOS agreement: इस साल की शुरुआत में भारत और रूस के बीच एक अहम सैन्य समझौते RELOS पर दस्तखत हुए थे। वहीं रूसी राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा के दौरान रूस की संसद ड्यूमा ने इस समझौते को हरी झंडी दे दी है। इस समझौते का नाम रिकॉप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक सपोर्ट है, जो एक विशेष सैन्य समझौता है। यह समझौता फरवरी 2025 में मॉस्को में किया गया था। वहीं ड्यूमा की मंजूरी के बाद यह समझौता आधिकारिक रूप से लागू हो गया है। इस समझौते की सबसे बड़ी खास बात यह है कि भारत और रूस एक-दूसरे के मिलिट्री बेस और लॉजिस्टिक फैसिलिटीज का इस्तेमाल कर सकेंगे।

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यह समझौता भारत को आर्कटिक क्षेत्र में रूस के सैन्य ठिकानों तक पहुंच देता है, जबकि रूस को भारतीय नौसेना के लिए महत्वपूर्ण इंडियन ओशन रीजन यानी IOR में एंट्री और सपोर्ट की सुविधा मिलेगी। यह सहयोग दोनों देशों की रणनीतिक पहुंच को बड़ा विस्तार देता है।

क्या है India Russia RELOS agreement?

समझौते के मुताबिक, भारत और रूस एक समय में 5 वॉरशिप, 10 विमान और 3000 सैनिक तक एक-दूसरे के इलाकों में तैनात कर सकते हैं। यह समझौता 5 सालों के लिए होगा, जिसे आपसी सहमति से बढ़ाया भी जा सकता है। यह पहली बार है कि किसी सैन्य समझौते में विदेशी धरती पर सैनिकों की इतनी बड़ी संख्या तैनाती करने सुविधा मिलेगी।

इस समझौते के बाद भारतीय नौसेना को रूस के उत्तरी क्षेत्र, विशेषकर आर्कटिक के पास स्थित मुरमान्स्क और सेवेरोमॉर्स्क जैसे अत्यंत रणनीतिक बंदरगाहों तक पहुंच मिल सकेगी। आर्कटिक क्षेत्र दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक बनने की दिशा की ओर अग्रसर है, जहां रूस और चीन दोनों अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं।

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रूस की ओर से भी इस समझौते से बड़ा लाभ होगा। अब रूसी नौसेना को भारतीय क्षेत्र में ईंधन, मरम्मत, स्पेयर पार्ट्स, राशन और अन्य जरूरी सपोर्ट आसानी से मिल सकेगा। इससे रूस हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी को बेहतर तरीके से बनाए रख सकेगा। भारतीय नौसेना की लॉजिस्टिक सुविधाओं के इस्तेमाल से रूस को इस इलाके में मदद मिलेगी।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इन दिनों भारत की यात्रा पर हैं और ड्यूमा द्वारा इस समझौते को मंजूरी देना दोनों देशों के बीच मजबूत होती रणनीतिक साझेदारी का संकेत माना जा रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और रूस के रक्षा मंत्री आंद्रेई बेलोउसॉव नई दिल्ली में होने वाली अंतर-सरकारी बैठक में इस समझौते की आधिकारिक रूप से समीक्षा करेंगे।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, राजनाथ सिंह और आंद्रेई बेलोउसव दिल्ली में 22वें इंडिया-रशिया इंटर-गवर्नमेंटल कमीशन फॉर मिलिट्री एंड मिलिट्री-टेक्निकल कोऑपरेशन की सह-अध्यक्षता करने वाले हैं। दोनों मंत्री सीमाओं, सैनिक सहयोग और चल रहे मिलिटरी-टेक्निकल प्रोजेक्टों को लेकर विस्तृत समीक्षा करेंगे। रक्षा मंत्रालय ने यह भी बताया कि बेलोउसव राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए पुष्पचक्र अर्पित करेंगे।

रेलोस समझौते की खास बात यह है कि यह समझौता युद्धकाल और सामान्य समय दोनों में लागू होगा। इसके तहत सैन्य जहाजों और विमानों को ईंधन भरने, भोजन, स्पेयर पार्ट्स, रिप्लेनिशमेंट और बेस में रुकने की सुविधा मिलेगी। यह भारत और रूस दोनों की सेनाओं को लंबी दूरी तक मिशन करने में मदद करेगा।

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भारत के लिए यह समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि चीन आर्कटिक क्षेत्र में अपनी दावेदारी बढ़ा रहा है। ऐसे समय में भारत को रूस के आर्कटिक मिलिट्री स्ट्रक्चर तक पहुंच मिलने से उसे वैश्विक स्तर पर नई रणनीतिक शक्ति मिलती है। इसी तरह रूस के लिए हिंद महासागर में भारत एक मजबूत और विश्वसनीय साझेदार बनकर उभर रहा है।

लेमोआ और रेलोस दोनों में क्या है अंतर

भारत इससे पहले अमेरिका के साथ लेमोआ (लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरंडम ऑफ एग्रीमेंट) कर चुका है, जिसके तहत भारत अमेरिकी मिलिट्री बेसों का लॉजिस्टिक इस्तेमाल कर सकता है। लेमोआ में सैनिक तैनाती की संख्या तय नहीं की जाती, जबकि रूस के साथ रेलोस में संख्या का स्पष्ट प्रावधान है। दोनों समझौतों का उद्देश्य लॉजिस्टिक सहयोग बढ़ाकर सैन्य ऑपरेशनों को आसान बनाना है।

हालांकि लेमोआ की तरह रेलोस भी कॉस्ट-रीइम्बर्सेबल यानी भुगतान आधारित व्यवस्था है, लेकिन रेलोस में कई बार गुड्स-एक्सचेंज या बार्टर की सुविधा भी संभव है। भारतीय नौसेना लंबे समय से उत्तरी समुद्री मार्ग की निगरानी और व्यावहारिक पहुंच चाहती थी, जो अब संभव हो सकेगी।

भारतीय नौसेना के सूत्रों का कहना है, यह समझौता भारत की “मल्टी-अलाइनमेंट” पॉलिसी का मजबूत उदाहरण है। भारत अब दोनों महाशक्तियों अमेरिका और रूस के साथ लॉजिस्टिक समझौते रखता है, जिससे उसकी समुद्री पहुंच दुनिया के हर दिशा में बढ़ जाती है।

भारत और रूस की सेनाएं पहले से संयुक्त अभ्यास और तकनीकी सहयोग करती रही हैं। अब रेलोस के तहत यह सहयोग और सरल हो जाएगा, क्योंकि जहाजों और विमानों को मेंटेनेंस, ईंधन और अन्य सपोर्ट तुरंत मिल सकेगा। विशेष रूप से समुद्री मिशनों, आपदा राहत अभियानों में इसका बड़ा फायदा मिलेगा।

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रूस के साथ यह समझौता बढ़ते वैश्विक तनावों के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के इक्विपमेंट्स, बेस और सपोर्ट सिस्टम का इस्तेमाल कर पाएंगी, जिससे उनकी ऑपरेशनल क्षमता और बढ़ जाएगी। भारतीय नौसेना का कहना है कि इससे मिशन की लागत भी कम होगी और समय भी बचेगा।

रूस के विदेश मामलों की समिति के उपाध्यक्ष व्याचेस्लाव निकोनोव ने पुष्टि की कि समझौते के तहत भारत और रूस एक-दूसरे के लॉजिस्टिक नेटवर्क का आसानी से इस्तेमाल कर पाएंगे।

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  • हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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