📍नई दिल्ली | 17 Dec, 2025, 11:55 AM
Defence Emergency Procurement: भारत सरकार के इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट प्रक्रिया की समयसीमा को खत्म हुए एक महीना होने वाला है। यह समयसीमा पिछले महीने 19 नवंबर समाप्त हो गई थी। अब रक्षा मंत्रालय इस समय सीमा को एक महीना और आगे बढ़ाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। इसकी वजह यह है कि कई हथियार प्रणालियों और सैन्य उपकरणों से जुड़ी बातचीत अंतिम चरण में है, लेकिन समयसीमा समाप्त होने के चलते उन्हें पूरा नहीं किया जा सका।
रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ सूत्रों के अनुसार, अगर यह अवधि नहीं बढ़ाई जाती है, तो जिन सौदों पर बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है, वे अधर में लटक सकते हैं। ऐसे में एक महीने का एक्सटेंशन देकर इन सौदों को कॉन्ट्रैक्ट के स्तर तक पहुंचाया जा सकता है।
Defence Emergency Procurement: इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट क्या है और क्यों जरूरी है
इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट एक विशेष प्रक्रिया है, जिसके तहत भारतीय सेनाओं को बेहद कम समय में हथियार, गोला-बारूद और जरूरी सैन्य उपकरण खरीदने की अनुमति दी जाती है। सामान्य रक्षा सौदों में जहां दो से तीन साल तक का वक्त लग जाता है, वहीं इस प्रक्रिया के तहत छह महीने के भीतर डिलीवरी सुनिश्चित की जाती है।
इस प्रक्रिया में न तो लंबा टेंडर निकाला जाता है और न ही ट्रायल किए जाते हैं। आम तौर पर हर सौदे की सीमा 300 से 400 करोड़ रुपये के बीच होती है, ताकि जरूरत के समय तुरंत सैन्य क्षमता बढ़ाई जा सके।
Defence Emergency Procurement: ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी जरूरत
पिछले कुछ सालों में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट का इस्तेमाल कई बार किया गया है। पूर्वी लद्दाख के गलवान में चीनी सेना के साथ हुए टकराव के बाद भारत ने इस प्रक्रिया के तहत बड़ी संख्या में हथियार और उपकरण खरीदे थे। इसके अलावा, ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी इस प्रक्रिया को अपनाया गया।
मई 2025 में सरकार ने इस विशेष व्यवस्था के तहत करीब 40 हजार करोड़ रुपये की इमरजेंसी खरीद को मंजूरी दी थी। इसका मकसद सेना की तत्काल ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करना था, ताकि किसी भी हालात में तैयारियों में कमी न रहे। उस दौरान सेना को ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन, एयर डिफेंस सिस्टम और गोला-बारूद की तत्काल जरूरत पड़ी थी, जिसे इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के जरिए पूरा किया गया। (Defence Emergency Procurement)
बता दें कि इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट पावर की वैलिडिटी पीरियड आमतौर पर 6 महीने दी जाती है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद मई 2025 में दी गई पावर नवंबर 19, 2025 तक वैलिड थी। इसके तहत 40 दिनों के अंदर कॉन्ट्रैक्ट साइन करना अनिवार्य होता है। वहीं 1 साल के अंदर पूरी डिलीवरी होनी चाहिए। अगर 1 साल में डिलीवरी नहीं हुई, तो 2025 की नई पॉलिसी अपडेट के तहत कॉन्ट्रैक्ट फोरक्लोज यानी कैंसल किया जा सकता है। नवंबर 2025 में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने सख्त चेतावनी दी थी कि अब इस नियम को सख्ती से लागू किया जाएगा, चाहे सप्लायर देसी हो या विदेशी। आमतौर पर इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट का उद्देश्य 3-6 महीने में डिलीवरी सुनिश्चित करना है, ताकि तत्काल ऑपरेशनल गैप भरा जाए। (Defence Emergency Procurement)
Defence Emergency Procurement: सबसे ज्यादा जोर ड्रोन सिस्टम की खरीद पर
इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के तहत सबसे ज्यादा जोर ड्रोन और ड्रोन से जुड़े सिस्टम पर दिया गया। इसमें निगरानी के लिए इस्तेमाल होने वाले सर्विलांस ड्रोन शामिल हैं। इनमें हेरॉन मार्क-2 जैसे ड्रोन पहले ही खरीदे जा चुके हैं और इनकी संख्या बढ़ाने पर भी बातचीत हुई है। इसके साथ ही दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमला करने वाले कामिकेजे ड्रोन यानी सुसाइड ड्रोन भी खरीदे गए हैं। नागास्त्र-1आर जैसे ड्रोन की बड़ी संख्या में खरीद इसी प्रक्रिया के तहत की गई।
Defence Emergency Procurement: लॉन्ग रेंज लोइटरिंग म्यूनिशन पर फोकस
ड्रोन के अलावा, सेना की मारक क्षमता बढ़ाने के लिए लॉन्ग रेंज लोइटरिंग म्यूनिशन भी प्राथमिकता में रखे गए। इनमें हारॉप, हार्पी और स्काईस्ट्राइकर जैसे सिस्टम शामिल हैं, जो लंबे समय तक हवा में मंडराकर सही मौके पर टारगेट को निशाना बनाते हैं। इनके साथ-साथ आर्टिलरी, एयर डिफेंस सिस्टम और मिसाइल यूनिट्स के लिए जरूरी गोला-बारूद की खरीद भी की गई, ताकि किसी भी मोर्चे पर सप्लाई की कमी न हो। (Defence Emergency Procurement)
इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के दौरान कुछ खास मिसाइल सिस्टम भी शामिल किए गए। रैंपेज मिसाइल पहले ही इस प्रक्रिया में खरीदी जा चुकी हैं और अब इनके और ऑर्डर देने तथा स्वदेशी उत्पादन बढ़ाने पर भी काम चल रहा है। ड्रोन के खतरे को देखते हुए लो-लेवल रडार की खरीद भी अहम रही, जिनका इस्तेमाल कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन की पहचान के लिए किया जाता है। इस क्षेत्र में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड को ऑर्डर दिए गए हैं।
टैंक और बख्तरबंद वाहनों से निपटने के लिए जैवेलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल भी इमरजेंसी खरीद का हिस्सा बनीं। इन्हें अमेरिका से तुरंत खरीदा गया, साथ ही इनके को-प्रोडक्शन को लेकर भी बातचीत चल रही है। इसके अलावा, ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल किए गए एक्सकैलिबर 155 एमएम प्रिसिजन गाइडेड आर्टिलरी शेल की और खरीद पर भी विचार किया गया, क्योंकि इनकी सटीकता मैदान में साबित हो चुकी है। (Defence Emergency Procurement)
ड्रोन से बढ़ते खतरे को देखते हुए सेना ने इंटीग्रेटेड ड्रोन डिटेक्शन एंड इंटरडिक्शन सिस्टम पर भी ध्यान दिया है। यह सिस्टम ड्रोन की पहचान करने और उन्हें निष्क्रिय करने में मदद करता है, जिससे संवेदनशील ठिकानों की सुरक्षा मजबूत होती है।
Defence Emergency Procurement: भारतीय कंपनियों को प्राथमिकता
इन सभी खरीद में सरकार का जोर अधिक से अधिक भारतीय कंपनियों से सामान लेने पर रहा है। सोलर इंडस्ट्रीज, भारत डायनेमिक्स और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी कंपनियों को बड़े ऑर्डर दिए गए हैं, ताकि आत्मनिर्भर भारत की नीति को आगे बढ़ाया जा सके। हालांकि, कुछ जरूरी सिस्टम ऐसे भी हैं, जिन्हें इमरजेंसी हालात में विदेश से मंगाना पड़ा।
नवंबर 2025 तक इन सौदों में से कई पर बातचीत चलती रही, लेकिन इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट की समयसीमा खत्म हो जाने के कारण सभी समझौते पूरे नहीं हो सके। (Defence Emergency Procurement)
फास्ट ट्रैक परचेज सिस्टम भी विकल्प
रक्षा मंत्रालय के सामने एक और विकल्प फास्ट ट्रैक परचेज का भी है। यह प्रक्रिया इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट से मिलती-जुलती है, लेकिन इसमें हर सौदे की अधिकतम राशि की सीमा ज्यादा होती है। हालांकि, अभी इस विकल्प पर भी चर्चा चल रही है और कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
दिसंबर में हो सकती है डीएसी की अहम बैठक
इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट की समय सीमा बढ़ाने पर फैसला डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल की बैठक में लिया जा सकता है। यह बैठक रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में होती है। इसमें चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, तीनों सेनाओं के प्रमुख, रक्षा सचिव और डीआरडीओ के चेयरमैन शामिल होते हैं। (Defence Emergency Procurement)
सूत्रों के अनुसार, डीएससी की इस साल की आखिरी बैठक 26 दिसंबर को होने की संभावना है। इसी बैठक में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के को बढ़ानेया फास्ट ट्रैक प्रक्रिया को अपनाने पर फैसला लिया जा सकता है।
स्वदेशी हथियारों पर सरकार का फोकस
हाल के महीनों में डीएसी ने जिन हथियारों को मंजूरी दी है, उनमें से अधिकतर पूरी तरह स्वदेशी या बड़े स्तर पर स्वदेशी सामान का इस्तेमाल हुआ है। यह सरकार की आत्मनिर्भर भारत पहल का हिस्सा है। हालांकि, कुछ बड़े सौदे अब भी विदेशी कंपनियों से जुड़े हैं, जिनमें अमेरिका से एमक्यू-9बी प्रिडेटर ड्रोन की खरीद प्रमुख है। (Defence Emergency Procurement)
चल रही बातचीत को पूरा करने की जरूरत
रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का मानना है कि अगर इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट की समय सीमा को थोड़ा और बढ़ाया जाता है, तो पहले से चल रही बातचीत को औपचारिक समझौतों में बदला जा सकता है। इससे सेना की तत्काल जरूरतें भी पूरी होंगी और खरीद प्रक्रिया में किसी तरह की दिक्कतें भी नहीं आएंगी।
उरी आतंकी हमले के बाद बढ़ा इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट का इस्तेमाल
भारत में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट यानी आपातकालीन रक्षा खरीद की व्यवस्था का इस्तेमाल पिछले कुछ सालों में धीरे-धीरे बढ़ी है। साल 2014 से 2016 के बीच यह व्यवस्था बहुत सीमित थी और अधिकतर मामलों में खरीद सीधे रक्षा मंत्रालय के स्तर पर देखी जाती थी। उस समय सशस्त्र बलों को बड़े पैमाने पर विशेष खरीद अधिकार नहीं मिले थे।
लेकिन असल बदलाव साल 2016 के बाद आया। उरी आतंकी हमले के बाद सरकार ने सेना को विशेष वित्तीय शक्तियां दीं, ताकि जरूरत पड़ने पर हथियार, गोला-बारूद और जरूरी सैन्य उपकरण जल्दी खरीदे जा सकें। इसके बाद इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट एक अहम प्रक्रिया बन गई।
साल 2014 से अक्टूबर 2016 के बीच भारतीय सेना ने इस व्यवस्था के तहत कुल 17 छोटे कॉन्ट्रैक्ट किए, जिनकी कुल कीमत करीब 400 करोड़ रुपये रही। उस समय खरीद का दायरा सीमित था और जरूरतें भी तुलनात्मक रूप से कम थीं। (Defence Emergency Procurement)
इसके बाद हालात तेजी से बदले। उरी के बाद, बालाकोट एयर स्ट्राइक, फिर लद्दाख में चीन के साथ सैन्य तनाव और बाद में ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों के चलते सेना को तत्काल हथियारों और उपकरणों की जरूरत पड़ी। इसी दौर में इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट की कई ट्रांच यानी चरण शुरू किए गए।
अब तक ईपी के तहत कुल खरीद 70,000 से 80,000 करोड़ रुपये
पहली से तीसरी ट्रांच, जिन्हें आमतौर पर ईपी-1 से ईपी-3 कहा जाता है, मुख्य तौर पर से सेना से जुड़ी थीं। इन चरणों में लगभग 68 कॉन्ट्रैक्ट किए गए और कुल खर्च 6,500 से 7,000 करोड़ रुपये के आसपास रहा। इन खरीद में हथियार, गोला-बारूद, निगरानी उपकरण और अन्य जरूरी सैन्य सिस्टम शामिल थे। (Defence Emergency Procurement)
इसके बाद 2022-23 के आसपास ईपी-4 लागू हुई, उसमें इमरजेंसी खरीद का दायरा और बढ़ा। इस चरण में 70 से ज्यादा योजनाओं को मंजूरी दी गई और कुल राशि करीब 11,000 करोड़ रुपये रही। इस ट्रांच की खास बात यह थी कि इसमें ज्यादातर सामान स्वदेशी कंपनियों से खरीदा गया, ताकि आत्मनिर्भर भारत की नीति को आगे बढ़ाया जा सके।
इसके बाद एक और छोटी ट्रांच, जिसे ईपी-5 कहा गया, सामने आई। इसकी कुल राशि बहुत ज्यादा नहीं थी और अलग-अलग रिपोर्ट्स के मुताबिक यह करीब 2,000 करोड़ रुपये के आसपास मानी जाती है। इसका इस्तेमाल खासतौर पर काउंटर-टेरर ऑपरेशंस और तत्काल जरूरतों के लिए किया गया।
सबसे बड़ी और अहम ट्रांच साल 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद आई। इसे आमतौर पर ईपी-6 कहा जा रहा है। इस चरण में सरकार ने करीब 40,000 करोड़ रुपये की इमरजेंसी खरीद को मंजूरी दी। यह अब तक की सबसे बड़ी इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट ट्रांच मानी जा रही है। इसमें ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन, मिसाइल, गोला-बारूद और अन्य आधुनिक सैन्य उपकरण शामिल हैं।
अगर 2014 से दिसंबर 2025 तक की सभी उपलब्ध रिपोर्ट्स को जोड़ा जाए, तो अनुमानित तौर पर इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के तहत कुल खरीद 70,000 से 80,000 करोड़ रुपये के बीच बैठती है। अकेले सेना के लिए यह आंकड़ा अलग-अलग रिपोर्ट्स में 18,000 से 29,000 करोड़ रुपये के बीच बताया गया है। (Defence Emergency Procurement)



