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China Pakistan Grey Zone Warfare: ऑपरेशन सिंदूर के पीछे चीन की परछाईं? अमेरिकी रिपोर्ट में पाकिस्तान को मिली खुफिया मदद का दावा

यूएस रिपोर्ट के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर इस ग्रे-जोन रणनीति का एक तरह से टेस्ट केस था। पाकिस्तान ने सामने रहकर काम किया और चीन ने उसे हर जरूरी जानकारी और सपोर्ट चुपचाप उपलब्ध कराया...

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📍नई दिल्ली | 24 Dec, 2025, 10:08 PM

China Pakistan Grey Zone Warfare: ऐसे वक्त में जब भारत और चीन के संबंध सुधर रहे हैं, अमेरिका ने एक सनसखीखेज दावा किया है। ऑपरेशन सिंदूर को लेकर अमेरिका के रक्षा विभाग ने एक आकलन में दावा किया है कि इस ऑपरेशन के दौरान चीन ने पर्दे के पीछे रहकर पाकिस्तान की पूरी मदद की थी। यह मदद सीधे सैनिक भेजकर नहीं, बल्कि इंटेलिजेंस, इंफॉर्मेशन वॉरफेयर, साइबर एक्टिविटी, इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस और डिप्लोमैटिक मूव्स के जरिए की गई।

China Pakistan Grey Zone Warfare: क्या है ‘ग्रे-जोन स्ट्रैटेजी’?

अमेरिकी दावे के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर चीन और पाकिस्तान की साझा ग्रे-जोन वॉरफेयर स्ट्रैटेजी का एक अहम उदाहरण रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने जमीन पर दिखने वाले हमले, प्रॉक्सी एक्टिविटी और सैन्य दबाव बनाया, जबकि चीन बैकग्राउंड में रहकर पूरा माहौल अपने हिसाब से ढालता रहा।

ग्रे-जोन स्ट्रैटेजी का मतलब होता है ऐसा दबाव बनाना, जो आमने-सामने का युद्ध न करके, लेकिन दुश्मन देश को लगातार तनाव में रखे। इसमें सीधी लड़ाई नहीं होती, बल्कि साइबर अटैक, फेक न्यूज, डिसइंफॉर्मेशन, डिप्लोमैटिक प्रेशर, इकोनॉमिक कोएर्शन और प्रॉक्सी ताकतों का इस्तेमाल किया जाता है।

यूएस रिपोर्ट के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर इस ग्रे-जोन रणनीति का एक तरह से टेस्ट केस था। पाकिस्तान ने सामने रहकर काम किया और चीन ने उसे हर जरूरी जानकारी और सपोर्ट चुपचाप उपलब्ध कराया।

China Pakistan Grey Zone Warfare: पाकिस्तान फ्रंट पर, चीन बैकग्राउंड में

रिपोर्ट कहती है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने जो भी काइनेटिक एक्शन किया उसके पीछे चीन का पूरा हाथ था। लेकिन असल में उसकी रियल-टाइम सिचुएशनल अवेयरनेस चीन की मदद से बेहतर हुई थी।

चीन के सैटेलाइट कवरेज, इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस और सर्विलांस इनपुट्स ने पाकिस्तान को यह समझने में मदद की कि भारतीय सेना कहां तैनात है, किस इलाके में मूवमेंट हो रही है और किस समय कौन-सा एक्शन संभव है। इससे पाकिस्तान की टारगेटिंग और ऑपरेशनल कोऑर्डिनेशन बेहतर हुआ, जबकि चीन खुद किसी सैन्य कार्रवाई में सीधे शामिल नहीं दिखा।

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China Pakistan Grey Zone Warfare: प्लॉजिबल डिनायबिलिटी’ की चाल

इस पूरी रणनीति का सबसे अहम पहलू था प्लॉजिबल डिनायबिलिटी, यानी जिम्मेदारी से बच निकलने की क्षमता। दुनिया की नजरों में पाकिस्तान ही मुख्य खिलाड़ी बना रहा, जबकि चीन ने खुद को बैकग्राउंड में रखकर काम किया।

यूएस अधिकारियों का मानना है कि चीन ने जानबूझकर ऐसा किया ताकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर उस पर सीधा आरोप न आए। साथ ही उसने अपने डिप्लोमैटिक मैसेजिंग और ऑनलाइन इनफॉरमेशन कैंपेन के जरिए पाकिस्तान के नैरेटिव को आगे बढ़ाया।

इन कैंपेन का मकसद भारत के दावों पर सवाल उठाना, भ्रम पैदा करना और भारत के पक्ष में बनने वाली अंतरराष्ट्रीय सहमति को धीमा करना था।

भारत की ‘एस्केलेशन लिमिट’ को परखने की कोशिश

रिपोर्ट के मुताबिक, चीन इस पूरे घटनाक्रम के जरिए भारत की एस्केलेशन थ्रेशहोल्ड को परखना चाहता था। यानी यह देखना कि भारत किस हद तक प्रतिक्रिया देता है और किस बिंदु पर रुकता है।

चीन के लिए यह जरूरी था कि वह भारत पर दबाव बनाए, लेकिन ऐसा न हो कि मामला सीधे भारत-चीन युद्ध की तरफ चला जाए। इसीलिए पाकिस्तान को आगे रखकर प्रयोग किया गया।

भारत चीन की नजर में क्यों अहम है चुनौती?

यूएस आकलन में यह भी कहा गया है कि चीन अब भारत को सिर्फ एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि एक लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजिक चैलेंज के रूप में देख रहा है। भले ही चीन का मुख्य फोकस अमेरिका-ताइवान क्षेत्र पर हो, लेकिन भारत को भविष्य में कंटेनमेंट टारगेट के तौर पर देखा जा रहा है।

खासकर हिमालयन फ्रंटियर और इंडियन ओशन रीजन में चीन भारत की बढ़ती ताकत को सीमित करना चाहता है। इसके लिए वह सीधे टकराव की बजाय अप्रत्यक्ष तरीकों को तरजीह दे रहा है।

पाकिस्तान बना चीन का ‘प्रेशर वॉल्व’

यूएस इंटेलिजेंस सोर्सेज के मुताबिक, पाकिस्तान चीन के लिए एक तरह का प्रेशर वॉल्व है। इसका मतलब है कि जब भी चीन भारत पर दबाव बनाना चाहता है, वह पाकिस्तान को आगे कर देता है।

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इससे चीन को कई फायदे मिलते हैं। पहला, भारत का ध्यान चीन से हटकर पाकिस्तान की ओर चला जाता है। दूसरा, भारत-अमेरिका के बीच बढ़ता डिफेंस कोऑपरेशन कमजोर पड़ता है। तीसरा, चीन को अपने हाइब्रिड वॉरफेयर मॉडल्स को कम लागत में टेस्ट करने का मौका मिलता है।

एलएसी पर समझौता: शांति या रणनीति?

यूएस रिपोर्ट में अक्टूबर 2024 में भारत और चीन के बीच एलएसी पर हुए डिसएंगेजमेंट एग्रीमेंट को भी रणनीतिक नजरिए से देखा गया है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि यह कदम चीन की तरफ से तनाव कम करने का संकेत नहीं था।

बल्कि असल में चीन चाहता था कि पश्चिमी सीमा पर कुछ समय के लिए स्थिरता बनी रहे, ताकि भारत अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग को और तेज न कर सके। यानी यह शांति नहीं, बल्कि रणनीतिक ब्रेक था।

साउथ एशिया से बाहर भी नजर

पेंटागन इस बात पर भी नजर रखे हुए है कि चीन दुनिया के करीब 20 देशों में भविष्य के लिए मिलिट्री बेसिंग या लॉजिस्टिक एक्सेस तलाश रहा है। इनमें पाकिस्तान, श्रीलंका और क्यूबा जैसे देश शामिल हैं।

अगर ऐसा होता है, तो इसका सीधा असर भारत की मैरीटाइम सिक्योरिटी और थल सुरक्षा पर पड़ेगा। खासकर हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के लिए चुनौतियां और बढ़ सकती हैं।

भारत जानता था चीन ने की पीछे से मदद

हालांकि चीन के साथ देने का दावा करने वाला अमेरिका अकेला नहीं हैं। बल्कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सेंटर फॉर जॉइंट वॉरफेयर स्टडीज (CENJOWS) के डायरेक्टर जनरल मेजर जनरल (रिटायर्ड) अशोक कुमार ने कहा था कि चीन ने पाकिस्तान को रियल-टाइम सैटेलाइट जानकारी दी थी। जिससे पाकिस्तान को अपने एयर डिफेंस सिस्टम्स को पोजिशन करने में मदद की, ताकि भारत की गतिविधियों का पता लगाया जा सके।

वहीं इस साल जुलाई में डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (कैपेबिलिटी डेवलपमेंट एंड सस्टेनेंस) लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर सिंह ने एक सेमिनार में कहा था कि चीन ने पाकिस्तान को रीयल-टाइम सैटेलाइट इंटेलिजेंस और सर्विलांस सपोर्ट मुहैया कराया था। उन्होंने कहा था कि डीजीएमओ लेवल की डी-एस्केलेशन टॉक्स के दौरान पाकिस्तानी पक्ष को भारतीय फोर्सेस की डिप्लॉयमेंट्स की लाइव जानकारी मिल रही थी। पाकिस्तानी डीजीएमओ ने बातचीत में कहा था, “हम जानते हैं कि आपका यह महत्वपूर्ण वेक्टर प्राइम्ड है और एक्शन के लिए तैयार है, इसे वापस पुल करें।” यह जानकारी इतनी सटीक और ताजा थी कि वह केवल चाइनीज सैटेलाइट्स, इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस और रीयल-टाइम मॉनिटरिंग से ही आ सकती थी।

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लेफ्टिनेंट जनरल राहुल सिंह ने इसे “वन बॉर्डर, थ्री एडवरसरीज” की स्थिति करार दिया था, जिसमें सामने पाकिस्तान लड़ रहा था, बैकग्राउंड में चीन सपोर्ट दे रहा था और तुर्की ड्रोन्स सप्लाई कर रहा था। उनका कहना था कि चीन ने इस कॉन्फ्लिक्ट को अपने वेपन्स सिस्टम्स का “लाइव टेस्टिंग ग्राउंड” बना लिया, जहां जे-10सी फाइटर्स, पीएल-15 मिसाइल्स और एचक्यू-9 एयर डिफेंस सिस्टम्स की परफॉर्मेंस चेक की गई।

वहीं अमेरिकी रिपोर्ट ने बता दिया है कि भविष्य की जंग कैसी होगी? यूएस रिपोर्ट की सबसे अहम चेतावनी यह है कि भविष्य में भारत-चीन टकराव की शुरुआत सीधे युद्ध से नहीं होगी। पहले साइबर डिसरप्शन, इकोनॉमिक दबाव, इंफॉर्मेशन वॉरफेयर और प्रॉक्सी इंस्टेबिलिटी देखने को मिलेगी।

ऑपरेशन सिंदूर ने यह दिखा दिया है कि यह मॉडल कैसे काम करता है। यही वजह है कि भारत के लिए आने वाले सालों में सुरक्षा चुनौतियों और ज्यादा मुश्किल होने वाली है।

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  • News Desk

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