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Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: पीएम मोदी करेंगे न्योमा एयरबेस का उद्घाटन! बीआरओ ने चीन सीमा पर मात्र सात महीने में तैयार किया गेम चेंजर रनवे

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: पूर्वी लद्दाख के न्योमा इलाके में बन रहा मुद न्योमा एयरबेस भारत की सैन्य ताकत को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए तैयार है। सूत्रों के मुताबिक इस अत्याधुनिक एडवांस लैंडिंग ग्राउंड (ALG) का उद्घाटन अक्टूबर 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर सकते हैं। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से महज 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह एयरबेस समुद्र तल से 13,700 फीट की ऊंचाई पर है। यह भारत का सबसे ऊंचा एयरबेस और दुनिया में पांचवां सबसे ऊंचा हवाई अड्डा होगा।

Nyoma Airstrip in Eastern Ladakh: एलएसी पर चीन को टक्कर देने की तैयारी, अक्टूबर तक न्योमा एयरस्ट्रिप पर लैंड कर सकेंगे मिग-29 और सुखोई-30 फाइटर जेट

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: केवल सात महीने में बनकर हुआ तैयार

न्योमा एयरबेस का निर्माण बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन (BRO) ने किया है, जिसने कठिन भौगोलिक और मौसमी चुनौतियों के बावजूद इस परियोजना को समय से पहले पूरा किया। सूत्रों ने बताया कि इसके रनवे का काम 12 सितंबर 2023 को शुरू हुआ था और 12 अक्टूबर 2024 को इसे पूरी तरह तैयार कर लिया गया। चूंकि लद्दाख छह महीने तक पूरी तरह से बर्फ से ढका रहता है और रास्ते पूरी तरह से बंद हो जाते हैं, तो ऐसे में यह रनवे प्रभावी रूप से केवल सात महीने में बनकर तैयार हुआ है। उन्होंने बताया कि यहां सितंबर-अक्टूबर तक ही काम किया जा सकता है। इस प्रोजेक्ट को मिशन मोड में पूरा किया गया। उन्होंने कहा, “हमने दिन-रात काम किया और कठिन परिस्थितियों में भी क्वॉलिटी से कोई समझौता नहीं किया।”

सूत्रों ने बताया कि भारतीय वायुसेना के तय मानकों के मुताबिक एयर स्ट्रिप बनाई गई है और थोड़ा जरूरी काम अभी बाकी है। वहीं अक्तूबर तक न्योमा एयर बेस पर फुल इमर्जेंसी लैंडिंग के लिए सभी तैयारियां और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का काम पूरा हो जाएगा। यह रन 2.7 किलोमीटर लंबा है और पूरी तरह से कंक्रीट से बना है।

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: पीएम मोदी करेंगे उद्घाटन!

सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस साल अक्तूबर के दूसरे हफ्ते में पूर्वी लद्दाख के रणनीतिक न्योमा एयरबेस का उद्घाटन कर सकते हैं। यह एयरबेस समुद्र तल से 13,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। न्योमा एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड का इस्तेमाल 2020 में चीन और भारत के बीच लद्दाख में हुए सीमा विवाद के दौरान बड़े पैमाने पर किया गया था। उस समय इस एयरस्ट्रिप ने भारतीय सेना के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यहां से सैनिकों और सैन्य साजोसामान तेसी से एलएसी तक पहुंचाया गया था। लेह तक हैवी लिफ्ट ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के जरिए जवानों को लाया गया और फिर न्योमा से उन्हें ऊंचाई वाले मोर्चों तक भेजा गया। इसके लिए भारतीय वायुसेना ने सी-130 जे सुपर हरक्यूलिस और चिनूक हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल किया था।

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: फाइटर जेट्स भर सकेंगे उड़ान

यह एयरबेस रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा से लगभग 25-30 किमी की दूरी पर है। और डेमचोक जैसे संवेदनशील इलाके के करीब है। डेमचोक और डेपसांग जैसे इलाके भारत और चीन के बीच तनाव की बड़ी वजह रहे हैं। 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद भारत ने एलएसी के पास अपनी सैन्य तैयारियों को तेज कर दिया है। न्योमा एयरबेस के चालू होने से भारतीय वायुसेना मिग-29 और सुखोई-30 एमकेआई जैसे फाइटर जेट्स को यहां से ऑपरेट कर सकेगी। इसके अलावा, सी-17 ग्लोबमास्टर और सी-130जे जैसे ट्रांसपोर्ट विमान भी यहां से सैनिकों, हथियारों और राशन को जल्दी पहुंचा सकेंगे।

भारतीय सेना की सप्लाई चेन में आएगा बड़ा बदलाव

न्योमा एयरबेस लद्दाख में भारत का चौथा वायुसेना अड्डा होगा। इससे पहले लेह, कारगिल और परतापुर (थॉईस) में दो फाइटर एयरफील्ड मौजूद हैं। दौलत बेग ओल्डी (DBO) में एक मिट्टी का रनवे है, जो विशेष अभियानों के लिए उपयोग होता है। फुकचे और चुशूल में भी छोटे रनवे हैं, लेकिन युद्ध जैसे हालात में इनका उपयोग सीमित है। न्योमा एयरबेस के बन जाने के बाद यह लद्दाख के डाउनहिल फ्लैट प्लेन्स (नीचे के समतल क्षेत्र) में स्थित दक्षिणी क्षेत्र का पहला वायुसेना अड्डा होगा। वहीं, न्योमा एयरबेस की खासियत यह है कि यह अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर स्थित है, जिससे फिक्स्ड-विंग एयरक्राफ्ट के लिए यह अधिक उपयुक्त है।

न्योमा एयरबेस के एक्टिव हो जाने के बाद भारतीय सेना की सप्लाई चेन में बड़ा बदलाव आएगा। अभी तक लेह से न्योमा तक सड़क मार्ग से लॉजिस्टिक सप्लाई पहुंचाने में छह घंटे लगते हैं, लेकिन अब दिल्ली या चंडीगढ़ से विमान सीधे यहां तक डेढ़ से दो घंटे में पहुंच सकेंगे। इसका फायदा सैनिकों, गोला-बारूद, हथियारों और मेडिकल सपोर्ट को तेजी से आगे तक पहुंचाने में मिलेगा।

माइनस 30 डिग्री तक गिर जाता है तापमान

बीआरओ के प्रोजेक्ट हिमांक के चीफ इंजीनियर ब्रिगेडियर विशाल श्रीवाास्तव ने इस उपलब्धि पर गर्व जताते हुए कहा, “हमारी टीम ने कठिन परिस्थितियों में असाधारण काम किया है। न्योमा का यह रनवे न केवल सैन्य दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह स्थानीय लोगों के लिए बेहतर कनेक्टिविटी प्रदान करेगा और आपात स्थिति में राहत सामग्री को जल्दी पहुंचाने में मदद करेगा। न्योमा के पास मुद गांव के नाम पर इस एयरबेस का नाम रखा गया है, जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को भी दर्शाता है। उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में सर्दियों में तापमान माइनस 30 डिग्री तक गिर जाता है, और छह महीने तक सड़कें बर्फ से ढक जाती हैं। इसके बावजूद, बीआरओ ने आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करके इस एयरबेस को समय पर पूरा किया।

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: एयरफोर्स कर चुकी है टेस्टिंग

वहीं पिछले साल वायुसेना की एक विशेष टीम ने न्योमा रनवे का निरीक्षण भी किया था। टीम में पायलटों के साथ एयर ट्रैफिक कंट्रोलर और तकनीकी स्टाफ शामिल थे। हर पहलू की जांच के बाद रनवे को ऑपरेशनल घोषित किया गया। इसके बाद सी-130 जे सुपर हरक्यूलिस ने न्योमा ALG पर टेस्ट फ्लाइट की थी। इस ट्रायल में विमान ने रनवे के ऊपर से लो ओवरशूट किया, यानी लैंडिंग गियर खोलकर बिना टच किए रनवे के बिल्कुल नजदीक से उड़ान भरी। यह ट्रायल को एयर ट्रैफिक कंट्रोल की गाइडेंस में सफलतापूर्वक पूरा किया गया था।

बीआरओ के बजट में भारी इजाफा

2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत ने अपनी सीमा पर बुनियादी ढांचे के विकास को प्राथमिकता दी है। सरकार ने बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन के बजट में भी भारी इजाफा किया है। जहां 12-15 साल पहले इसका वार्षिक बजट केवल 4,000 करोड़ रुपये था, वहीं अब यह बढ़कर 18,700 करोड़ रुपये हो गया है। इस बढ़े हुए बजट का सीधा असर सीमा क्षेत्रों में नई सड़कों और एयरफील्ड्स के निर्माण में दिखाई दे रहा है। इस बढ़े हुए बजट ने सड़कों, पुलों और हवाई अड्डों के निर्माण में तेजी लाई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हमेशा कहा है कि सरकार सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए हर संभव मदद देगी। इसका परिणाम यह है कि भारत ने एलएसी के पास सड़कों का जाल बिछा दिया है, जिसमें हानले-चुमार रोड और सासोमा-डीबीओ रोड जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट शामिल हैं।

चुशूल-डेमचोक-फुकचे-डम रोड भी तैयार

हानले-चुमार रोड, जो 16,500 फीट की ऊंचाई पर सल्सा पास से होकर गुजरती है, अब हानले से चुमार तक की दूरी को छह घंटे से घटाकर केवल एक घंटे 45 मिनट तक रह गई है। इसी तरह, चुशूल-डेमचोक-फुकचे-डम रोड (CDFD) एलएसी के समानांतर चलती है और डेमचोक जैसे संवेदनशील क्षेत्रों तक तेजी से पहुंच मिलती है। सूत्रों ने बताया कि यह सड़क 14,000 से 15,000 फीट की ऊंचाई पर बनाई गई है, जहां तापमान माइनस 35 डिग्री तक गिर जाता है। उन्होंने कहा, “हमने कई चुनौतियों का सामना किया, लेकिन इस सड़क को समय पर पूरा करना हमारी प्राथमिकता थी।”

गेम-चेंजर साबित होगा न्योमा एयरबेस

न्योमा एयरबेस का निर्माण भारत की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह LAC पर चीन की सैन्य तैनाती का मुकाबला करने के लिए तैयार है। चीन ने अपनी तरफ 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा पर कई अग्रिम हवाई अड्डे विकसित किए हैं। अप्रैल 2020 में चीनी सेना की भारी तैनाती को देखते हुए भारत ने भी अपनी तैयारियों को तेज किया। न्योमा एयरबेस के चालू होने से भारत को तेजी से सैन्य उपकरण और सैनिकों को तैनात करने की क्षमता मिलेगी, जो युद्ध की स्थिति में गेम-चेंजर साबित हो सकता है।

Rafale locks F35: फ्रांस के रफाल ने किया अमेरिका के F-35 फाइटर जेट को लॉक, डॉगफाइट में सिमुलेटेड मिसाइल दागकर “मार गिराया”, देखें वीडियो

Rafale locks F-35 in NATO exercise Atlantic Trident 25 in Finland

Rafale locks F35: फिनलैंड के आसमान में हाल ही में एक ऐसा नजारा देखने को मिला, जिसने दुनिया भर के मिलिट्री एक्सपर्ट्स और एविएशन लवर्स का ध्यान खींच लिया। नॉटो (NATO) के अटलांटिक ट्राइडेंट 25 मल्टीनेशनल एक्सरसाइज के दौरान फ्रांस के राफेल लड़ाकू विमान ने अमेरिका के अत्याधुनिक F-35 लाइटनिंग II को एक सिमुलेटेड डॉगफाइट में लॉक कर दिया। इस घटना का 44 सेकंड का वीडियो फ्रेंच एयर एंड स्पेस फोर्स ने 20 अगस्त 2025 को अपने आधिकारिक X अकाउंट पर जारी किया, जो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

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Rafale locks F35: फ्रांस के रफाल ने मारी बाजी

फ्रेंच एयर फोर्स (French Air and Space Force) द्वारा जारी वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि एक राफेल विमान उड़ान भरता है और कुछ ही सेकंड बाद एक अमेरिकी F-35 उसके सामने से गुजरता है। राफेल का पायलट तुरंत F-35 को अपने इन्फ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम (IRST) से लॉक करने की कोशिश करता है। वीडियो के 15वें सेकंड पर राफेल का रडार अमेरिकी स्टील्थ विमान को पूरी तरह लॉक कर लेता है। 44 सेकंड के इस वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कैसे रफाल पायलट ने अमेरिकी F-35 को पास से मुकाबले के दौरान लक्ष्य बनाकर “किल लॉक” हासिल किया। वीडियो में पायलट के कॉकपिट से आती आवाज “Take the shot” भी सुनी जा सकती है, जिसमें पायलट एक सिमुलेटेड मिसाइल भी दागता है। बता दें कि “टेक द शॉट” का मतलब है कि राफेल ने सिमुलेटेड मिसाइल दागकर F-35 को “मार गिराया”।

Rafale locks F35: वीडियो ने मचाई खलबली

वीडियो की शुरुआत में रफाल को टेक-ऑफ करते हुए दिखाया गया है। इसके कुछ सेकंड बाद अमेरिकी F-35 उसके सामने आता है। लगभग 15वें सेकंड पर रफाल का रडार F-35 को लॉक कर लेता है और “फायर” की कमांड सुनाई देती है। वीडियो में आगे देखा गया कि राफेल ने फिनलैंड के F/A-18 हॉर्नेट को भी दो बार लॉक किया। पहली बार 22-23 सेकंड के बीच और दूसरी बार 28-30 सेकंड के बीच।

यह वीडियो जारी होने के बाद डिफेंस एक्सपर्ट्स और डिफेंस इंडस्ट्री में हलचल मच गई है। जहां F-35 स्टील्थ और लंबी दूरी के वॉर स्किल्स में आगे है, जबकि रफाल अपनी एजिलिटी (फुर्ती) और नजदीकी हवाई मुकाबले (क्लोज कॉम्बैट) के लिए मशहूर है।

Rafale locks F35: फिनलैंड का पहला बड़ा बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास

फिनलैंड ने 4 अप्रैल 2023 को NATO की सदस्यता हासिल की थी और यह उसका पहला बड़ा बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास है। Atlantic Trident 25 का आयोजन 16 से 27 जून 2025 तक फिनलैंड के रोवानेमी, पिरक्काला, रिस्साला, हल्ली और ज्यवास्क्यला हवाई अड्डों पर आयोजित हुआ। इस युद्धाभ्यास में फ्रांस, अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और फिनलैंड की वायुसेनाओं ने हिस्सा लिया। कुल 40 से अधिक विमान और लगभग 1,000 सैन्यकर्मी इस अभ्यास का हिस्सा थे।

इसमें फ्रांस के रफाल, E-3F AWACS, A400M ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और A330 MRTT टैंकर शामिल हुए। अमेरिका की ओर से F-35A लाइटनिंग II, F-15E स्ट्राइक ईगल और KC-135 टैंकर शामिल थे। ब्रिटेन ने टाइफून लड़ाकू विमान भेजे जबकि फिनलैंड ने F/A-18 हॉर्नेट और NH90 हेलिकॉप्टर इस अभ्यास में उतारे। इसके अलावा ग्राउंड-बेस्ड एयर डिफेंस यूनिट्स और ड्रेकेन इंटरनेशनल के विमान भी अभ्यास का हिस्सा बने। NATO की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य Agile Combat Employment (ACE) यानी फुर्तीले युद्धक अभियानों की नई रणनीतियों को परखना था।

अभ्यास के दौरान फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन और फिनलैंड की सेनाओं ने संयुक्त रूप से कई तरह के अभ्यास किए, जिनमें हवाई डॉगफाइट, एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग और मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस शामिल थे।

वीडियो रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर #Rafale और #F35 ट्रेंड करने लगे।

Rafale locks F35: क्यों खास है रफाल बनाम F-35 मुकाबला?

रफाल को 4.5 पीढ़ी का लड़ाकू विमान माना जाता है, जो अपनी जबरदस्त फुर्ती और शक्तिशाली सेंसर सिस्टम के लिए जाना जाता है। दूसरी ओर, अमेरिकी F-35 पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर है, जिसका डिजाइन लंबी दूरी पर लड़ाई के लिए किया गया है। नजदीकी हवाई युद्ध में रफाल की फुर्ती और इंफ्रारेड सर्च एंड ट्रैक (Infrared Search and Track – IRST) जैसी तकनीक उसे बढ़त दिलाती है। वहीं F-35 की ताकत उसके स्टील्थ डिजाइन और एडवांस सेंसर फ्यूजन में है। इस अभ्यास में रफाल का F-35 को लॉक कर पाना इस बात का सबूत है कि करीबी हवाई मुकाबले में भी पुराने डिजाइन वाले विमान अपनी क्षमता दिखा सकते हैं।

फ्रेंच एयर फोर्स के इस वीडियो ने सोशल मीडिया पर खूब चर्चा बटोरी। कई फ्रेंच यूजर्स ने इस उपलब्धि पर गर्व जताया और इसे राफेल की ताकत का सबूत बताया। यह पहली बार नहीं है जब राफेल ने अमेरिकी स्टील्थ विमानों को हराया हो। साल 2009 में संयुक्त अरब अमीरात में हुए एक युद्धाभ्यास में राफेल ने अमेरिकी F-22 रैप्टर को भी लॉक कर “मार गिराया” था।

AMCA Engine Deal: पहली बार भारत को मिलेगा फाइटर जेट इंजन का मालिकाना हक, फ्रांस के साथ समझौते से बनेगा डुअल इंजन इकोसिस्टम

India-France AMCA Engine Deal indigenous fighter jet

AMCA Engine Deal: एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA के इंजन को लेकर भारत और फ्रांस के बीच हुई नई रक्षा साझेदारी को देश की डिफेंस हिस्ट्री में सबसे बड़ा मोड़ माना जा रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में घोषणा की कि भारत का पहला पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान अब अपने इंजन के साथ पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक पर खड़ा होगा। इस प्रोजेक्ट के तहत भारत और फ्रांस की राफेल का इंजन बनाने वाली कंपनी सफरान मिलकर नया स्वदेशी इंजन बनाएंगे। लेकिन इस बार सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस इंजन का मालिकाना हक यानी बौद्धिक संपदा अधिकार (IP Ownership) भारत के पास होगी।

AMCA jet engine: भारत-फ्रांस मिलकर बनाएंगे पांचवी पीढ़ी का स्वदेशी इंजन, राजनाथ सिंह किया बड़ा एलान, राफेल बनाने वाली कंपनी सफरान के साथ होगी साझेदारी

AMCA Engine Deal: क्या कहा पीएम मोदी और रक्षा मंत्री ने

हाल ही में 15 अगस्त को लाल किला के प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, “आज मैं युवा वैज्ञानिकों, प्रतिभाशाली युवाओं, इंजीनियरों, पेशेवरों और सरकार के सभी विभागों से आग्रह करता हूं कि हमारे पास अपने स्वयं के मेड इन इंडिया लड़ाकू विमानों के लिए जेट इंजन होने चाहिए।

वहीं उसके बाद 22 अगस्त को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एलान किया, “आज हम पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान बनाने की दिशा में भी आगे कदम बढ़ा चुके हैं। हम एयरक्राफ्ट का इंजन भी भारत में ही बनाने की तरफ बढ़ चुके हैं। हम लोग फ्रेंच कंपनी सफरान के साथ इंजन मेकिंग का काम भारत में शुरू करने जा रहे हैं।”

AMCA Engine Deal: 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर

अब तक भारत जिन लड़ाकू विमानों का निर्माण कर रहा था, उनके लिए विदेशी इंजन पर निर्भर रहना पड़ता था। तेजस विमान में इस्तेमाल होने वाले इंजन अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी से खरीदे जाते हैं। वहीं रूस से मिले मिग और सुखोई के इंजन भी वर्षों से भारतीय वायुसेना की रीढ़ बने हुए हैं। लेकिन इस बार भारत सिर्फ इंजन (AMCA Engine Deal) बनाएगा ही नहीं बल्कि उसका मालिक भी होगा। यह पहली बार होगा जब भारत के पास दुनिया के सबसे एडवांस्ड जेट इंजनों में से एक का IP होगा। यह ऐसा अधिकार है जो आज तक भारत को किसी भी रक्षा सौदे में नहीं मिला है। सफरान के साथ इंजन डील में 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, भारत का IP राइट्स पर पूरा मालिकाना हक़, और AMCA के लिए हाई-थ्रस्ट इंजन का डेवलपमेंट शामिल है।

इस साझेदारी में सफरान और भारत की हिंदुस्तान एयरनॉटिक्स लिमिटेड मुख्य भूमिका निभाएगी। इसके साथ ही डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन का गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) भी इस प्रोजेक्ट में शामिल होगा।

AMCA Engine Deal: इंजन तकनीक में भारत की सबसे बड़ी छलांग

24 टन कैटेगरी वाले एएमसीए प्रोजेक्ट (AMCA Engine Deal) को भारत के सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स में गिना जा रहा है। यह एक स्टील्थ यानी अदृश्य क्षमता वाला लड़ाकू विमान होगा, जिसमें दो इंजन होंगे। स्टील्थ होने की वजह से इसे रडार पर पकड़ना बेहद मुश्किल होगा। लेकिन ऐसे विमानों की असली ताकत उनके इंजन में छुपी होती है। अब तक भारत अपनी लड़ाकू विमानों के लिए खुद का इंजन नहीं बना पाया था। कई बार कोशिशें हुईं, डीआरडीओ ने कावेरी भी बनाया, लेकिन तकनीकी बाधाओं, खासकर थ्रस्ट-टू-वेट रेश्यो जैसी दिक्कतों के चलते इंजन डेवलप नहीं हो पाया।

यही वजह है कि सफरान के साथ हुआ यह करार केवल एक तकनीकी सहयोग नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक स्थिति को भी मजबूत करेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि जब भारत को इंजन के डिजाइन, निर्माण और उत्पादन की पूरी तकनीक मिल जाएगी और उसके सारे अधिकार भारत के पास होंगे, तो यह आत्मनिर्भर भारत अभियान के सबसे बड़े मील के पत्थरों में गिना जाएगा।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह डील भारत के “मेक इन इंडिया” पहल को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी। इसके लिए भारत में एक पूरी इंजन बनाने की व्यवस्था तैयार की जाएगी, जिसमें निजी कंपनियों को भी मौका मिलेगा। इससे नौकरियों का सृजन होगा और देश की अर्थव्यवस्था को भी फायदा पहुंचेगा।”

वहीं इसका सीधा असर भारत के डिफेंस एक्सपोर्ट्स पर पड़ेगा क्योंकि भविष्य में भारत इस इंजन को अन्य देशों को बेच भी सकता है, और यह सिर्फ अपने विमानों में इस्तेमाल करने तक सीमित नहीं रहेगा।

AMCA Engine Deal: पहली बार डुअल इंजन इकोसिस्टम

स्वदेशी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस (AMCA Engine Deal) के लिए अभी तक भारत सिर्फ अमेरिकी जनरल इलेक्ट्रिक के इंजनों पर निर्भर था। तेजस एमके-2 और नौसेना के ट्विन-इंजन डेक-बेस्ड (TEDBF) नेवी फाइटर के लिए जीई का F414 इंजन इस्तेमाल किया जाना है। लेकिन अब सफरान के साथ मिलकर एएमसीए के लिए नया इंजन तैयार किया जाएगा। इसका मतलब है कि भारत के पास पहली बार एक साथ दो इंजन इकोसिस्टम होंगे।

सफरान पहले से ही राफेल इंजन (M88) और हेलिकॉप्टर इंजनों में भारत का पार्टनर है। इस डील के बाद भारत के दो अलग-अलग इंजन इकोसिस्टम तेजस/एएमसीए (सफरान वाला) और GE F414 (तेजस एमके2) एकसाथ तैयार हो रहे हैं। यह डुअल इंजन इकोसिस्टम भारत को दुनिया के चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा करेगा जहां एक साथ पश्चिमी और स्वदेशी इंजन प्रोग्राम समानांतर रूप से आगे बढ़ेंगे।

AMCA Engine Deal: सफरान और जीई में कॉम्पिटिशन?

जीई के साथ तेजस एमके-2 के लिए F414 इंजन देने के लेकर बातचीत चल रही है। जिन्हें एचएएल और जीई दोनों कंपनियां मिल कर भारत में बनाएंगी। हालांकि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स और जीई ने भारत में 98 किलोन्यूटन थ्रस्ट कैटेगरी में जीई-एफ414 इंजन के को-प्रोडक्शन के लिए अभी तक अंतिम सौदा नहीं हुआ है, जिसमें लगभग 1.5 बिलियन डॉलर में 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा।

खास बात यह होगी कि सफरान (AMCA Engine Deal) का 120 किलोन्यूटन (kN) थ्रस्ट वाला इंजन होगा जबकि जीई का F414 इंजन 98 किलोन्यूटन थ्रस्ट का होगा। सफरान का इंजन AMCA के दूसरे चरण (Mk-2) के लिए डिजाइन किया जाएगा। इस इंजन का विकास 10 साल में पूरा होने की उम्मीद है, और यह पूरी तरह से नई डिज़ाइन पर आधारित होगा, जो राफेल के M88 इंजन से अलग होगा। यह इंजन AMCA को सुपरक्रूज और बेहतर थ्रस्ट-टू-वेट रेश्यो देगा।

जीई का F414 इंजन तेजस मार्क-2 और AMCA के पहले चरण (Mk-1) के लिए चुना गया है। यह इंजन एफ/ए-18 सुपर हॉर्नेट में इस्तेमाल होता है। जीई ने भारत को 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की सहमति दी है, जिसमें सिंगल क्रिस्टल ब्लेड और सेरामिक मैट्रिक्स कॉम्पोनेंट्स जैसे महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू शामिल हैं। हालांकि, इस डील में कुछ संवेदनशील तकनीकों तक पहुंच नहीं है, जिसमें अमेरिकी निर्यात नियमों (ITAR) आड़े आ रहे हैं।

मौजूदा समय-सीमा के अनुसार, अपेक्षित थ्रस्ट-टू-वेट रेश्यो, एडवांस सेंसर फ्यूजन और इंटरनल वेपन बे और “सर्पेंट-टाइन एयर-इन्टेक” जैसी स्टील्थ सुविधाओं के साथ AMCA 2035 तक ही प्रोडक्शन के लिए तैयार हो पाएगा।

बता दें कि भारतीय वायुसेना ने एएमसीए के सात स्क्वाड्रन (126 जेट) शामिल करने की योजना बनाई है, जिनमें से पहले दो स्क्वाड्रन अमेरिकी जीई-एफ414 इंजन से ऑपरेट होंगे और अगले पांच स्क्वाड्रन 120 किलोन्यूटन इंजन से ऑपरेट होंगे।

सिर्फ डिफेंस नहीं, स्पेस और सिविल एविएशन पर भी असर

सफरान (AMCA Engine Deal) सिर्फ लड़ाकू विमान इंजन बनाने वाली कंपनी नहीं है। वह स्पेस प्रोप्ल और सिविल एविएशन सेक्टर में भी अग्रणी है। कंपनी पहले से ही इसरो के साथ कई प्रोजेक्ट्स में सहयोग कर चुकी है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि एएमसीए इंजन प्रोजेक्ट का असर भविष्य में भारत के स्पेस प्रोग्राम और डोमेस्टिक पैसेंजर्स एयरक्राफ्ट के विकास पर भी पड़ेगा।

इसका मतलब है कि भारत सिर्फ लड़ाकू विमान इंजन बनाने तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि आने वाले सालों में सिविल एयरक्राफ्ट और स्पेस एयरक्राफ्ट के लिए भी एडवांस इंजन डेवलप कर सकेगा।

फ्रांस क्यों हुआ तैयार?

अब सवाल उठता है कि फ्रांस ने इतनी संवेदनशील तकनीक (AMCA Engine Deal) भारत के साथ साझा करने का फैसला क्यों लिया। रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है, फ्रांस भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन का सबसे बड़ा संतुलनकारी साझेदार मानता है। चीन की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए पेरिस और नई दिल्ली के बीच रणनीतिक सहयोग लगातार बढ़ रहा है। यही वजह है कि पेरिस ने भारत को सिर्फ ग्राहक मानने के बजाय एक असली साझेदार का दर्जा दिया है। पहले राफेल डील और अब AMCA इंजन डीलके जरिए फ्रांस, भारत को इंडो-पैसिफिक में चीन को बैलेंस करने वाले देश के रूप में देख रहा है।

प्रधानमंत्री कार्यालय की सीधी नजर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पिछले एक दशक में रक्षा उत्पादन पर लगातार ध्यान दिया है। तेजस विमान की भारी संख्या में खरीद, प्रचंड हेलिकॉप्टरों का बेड़ा, और ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों के निर्यात ने भारत को रक्षा उत्पादन में नया आत्मविश्वास दिया है। अब एएमसीए इंजन प्रोजेक्ट में मिली यह सफलता प्रधानमंत्री कार्यालय की सीधी निगरानी में आगे बढ़ रही है। यही कारण है कि पिछले महीने प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीके मिश्रा ने भी एचएएल की सुविधाओं का दौरा किया और तेजस प्रोजेक्ट की स्थिति का जायजा लिया।

584 अरब का प्रोजेक्ट, खुलेंगी निर्यात की संभावनाएं

सूत्रों का कहना है कि इस प्रोजेक्ट की लागत करीब सात बिलियन डॉलर यानी 584 अरब रुपये के आसपास मानी जा रही है। इस लागत में इंजन का डिजाइन, परीक्षण, उत्पादन और पूरी सप्लाई चेन शामिल होगी। लेकिन इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि एक बार तकनीक भारत के पास आने के बाद देश स्वतंत्र रूप से इसका इस्तेमाल कर सकेगा। भारत चाहे तो भविष्य में इस इंजन को निर्यात भी कर सकेगा। अभी तक भारत हथियार और मिसाइलें निर्यात कर रहा था, लेकिन इंजन जैसे हाई-टेक सिस्टम का निर्यात एक नए युग की शुरुआत होगी।

भारत ने पिछले एक दशक में रक्षा निर्यात के क्षेत्र में जबरदस्त प्रगति की है। 2013-14 में जहां यह आंकड़ा सिर्फ 686 करोड़ रुपये था, वहीं 2024-25 में यह 23,000 करोड़ रुपये से भी ऊपर पहुंच गया। सरकार ने 2029 तक इसे 50,000 करोड़ तक ले जाने का लक्ष्य रखा है।

Parliamentary Defence Panel: संसदीय रक्षा समिति ने किया बेंगलुरु में HAL फैसिलिटी का दौरा, तेजस Mk-1A और AMCA प्रोजेक्ट के बारे में ली जानकारी

Parliamentary Defence Panel visits HAL Bengaluru
Photo: HAL

Parliamentary Defence Panel: रक्षा मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने आज बेंगलुरु में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) का दौरा किया। दस सदस्यों वाली इस समिति की अगुवाई लोकसभा सांसद राधा मोहन सिंह ने की। अपने इस दौरे में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की हेलिकॉप्टर डिवीजन, LCA तेजस डिवीजन और एअरक्राफ्ट डिवीजन का जायजा लिया। इससे पहले जुलाई में प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी.के. मिश्रा ने भी बेंगलुरु में एचएलएल की फैसिलिटीज का दौरा किया था।

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एचएएल से मिली जानकारी के मुताबिक कंपनी ने समिति को अपनी आधुनिकीकरण योजनाओं और स्वदेशी परियोजनाओं में हो रही प्रगति के बारे में विस्तार से जानकारी दी। इस दौरान एचएएल में बन ररहे स्वदेशी विमानों और हेलिकॉप्टरों ने हवाई करतब भी दिखाए। जिसमें एलसीए तेजस Mk 1A, हिंदुस्तान टर्बो ट्रेनर-40, हिंदुस्तान जेट ट्रेनर ‘यशस’ और हॉक-आई जैसे विमानों ने हिस्सा लिया। इसके साथ ही, ध्रुव एडवांस लाइट हेलिकॉप्टर और लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर ने भी अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया।

इस समिति को एचएएल की आधुनिकरण योजनाओं और स्वदेशीकरण से जुड़ी प्रमुख परियोजनाओं की जानकारी दी गई। एचएएल के अधिकारियों ने बताया कि आने वाले समय में कंपनी न केवल भारतीय वायुसेना की जरूरतों को पूरा कर रही है बल्कि निर्यात के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।

इससे पहले, 9 जुलाई 2025 को, प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी.के. मिश्रा ने बेंगलुरु में एचएएल की सुविधाओं का दौरा किया था। उन्होंने अपने दौरे की शुरुआत एचएएल के विमान अनुसंधान और डिजाइन केंद्र में LCA Mk-2 हैंगर से की थी। इसके बाद उन्होंने तेजस Mk-1A के असेंबली हैंगर और एयरोस्पेस डिवीजन का जायजा लिया था। इस दौरान उन्हें तेजस Mk-1A के उत्पादन की प्रगति के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई थी। एचएएल ने उन्हें छह Mk-1A फाइटर जेट और दो Mk-1 ट्रेनर जेट भी दिखाए थे, जो जल्द ही भारतीय वायुसेना को सौंपे जाएंगे।

Parliamentary Defence Panel visits HAL Bengaluru
Photo: HAL

डॉ. मिश्रा को एचएएल ने तेजस Mk-2 और एडवांस मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) जैसी परियोजनाओं की जानकारी ली थी। उन्होंने ‘प्रचंड’ लाइट कॉम्बैट हेलिकॉप्टर, लाइट यूटिलिटी हेलिकॉप्टर, ध्रुव ALH और HTT-40 ट्रेनर विमान के प्रोटोटाइप भी देखे थे। इसके अलावा, उन्होंने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़े GSLV MkIII और PSLV रॉकेट्स के असेंबली शॉप्स का दौरा करने के साथ गगनयान मिशन के लिए एचएएल के सिस्टम्स और इंटीग्रेटेड क्रायोजेनिक इंजन निर्माण सुविधा का निरीक्षण किया। उनके इस दौरे को इस बात से जोड़ा जा रहा था कि प्रधानमंत्री कार्यालय एचएएल के कार्यों और भारत के रक्षा व अंतरिक्ष क्षेत्र की प्रगति पर पैनी नजर रख रहा है।

AMCA jet engine: भारत-फ्रांस मिलकर बनाएंगे पांचवी पीढ़ी का स्वदेशी इंजन, राजनाथ सिंह किया बड़ा एलान, राफेल बनाने वाली कंपनी सफरान के साथ होगी साझेदारी

AMCA Jet Engine: Rajnath Singh Announces India-France Aircraft Engine Collaboration

AMCA jet engine: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने घोषणा की है कि भारत और फ्रांस मिलकर देश के पहले स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के लिए स्वदेशी जेट इंजन तैयार करेंगे और उसका निर्माण भी भारत में ही करेंगे। यह साझेदारी फ्रांस की एयरोस्पेस कंपनी सफरान (Safran) के साथ होगी। उन्होंने कहा कि भारत अब विमान इंजन के निर्माण में भी आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ रहा है।

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रक्षा मंत्री ने नई दिल्ली में आयोजित ईटी वर्ल्ड लीडर्स फोरम को संबोधित करते हुए कहा, “हमने अपने लड़ाकू विमान के इंजन को भारत में ही बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। हम फ्रांस की कंपनी सफरान के साथ मिलकर जल्द ही इंजन निर्माण का काम शुरू करने जा रहे हैं।” इस परियोजना को भारत के स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता को मजबूत बनाने की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है।

AMCA jet engine: फ्रांस के साथ तकनीकी सहयोग

सफरान दुनियाभर में एडवांस जेट इंजनों की मैन्युफैक्चरिंग के लिए जानी जाती है। कंपनी राफेल लड़ाकू विमान के लिए M88 इंजन बना चुकी है, जिसका इस्तेमाल भारतीय वायुसेना भी कर रही है। भारत और फ्रांस के बीच यह नया सहयोग इंजन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, जॉइंट रिसर्च और देश में निर्माण को शामिल करेगा। हालांकि AMCA के लिए तैयार किया जा रहा इंजन अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित होगा, जिसमें स्टील्थ क्षमता, सुपरसोनिक क्रूज और हाई मोबिलिटी जैसी खूबियां होंगी। हालांकि इंजन के टेक्निकल स्पेसिफिकेशंस को सार्वजनिक नहीं किया गया है।

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अपने संबोधन में राजनाथ सिंह ने कहा कि भारतीय सभ्यता वैश्विक व्यवस्था को प्रभुत्व की होड़ के रूप में नहीं, बल्कि सम्मान और समानता पर आधारित साझा यात्रा के रूप में देखती है। उन्होंने कहा कि भारत की ताकत केवल शक्ति प्रदर्शन में नहीं, बल्कि देखभाल और सहयोग की क्षमता में निहित है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की रक्षा नीति संकीर्ण हितों पर आधारित नहीं है, बल्कि वैश्विक कल्याण की भावना पर आधारित है।

AMCA jet engine: सफरान ने भारत में बनाई एमआरओ सुविधा

सफरान पहले से ही भारत में अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुकी है। कंपनी ने हैदराबाद में एक मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (MRO) सुविधा स्थापित की है, जो भारतीय और विदेशी एयरलाइंस के लिए LEAP-1A और LEAP-1B इंजनों का रखरखाव करती है। इसके अलावा, सफरान और एचएएल ने बेंगलुरु में एक संयुक्त उद्यम के तहत हेलीकॉप्टर और लड़ाकू विमानों के लिए इंजन पार्ट्स का निर्माण शुरू किया है।

AMCA jet engine: पाकिस्तान को दिया करारा जवाब

रक्षा मंत्री ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख के हालिया बयान पर भी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, जिसमें मुनीर ने भारत की अर्थव्यवस्था की तुलना स्पोर्ट्स कार और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की तुलना ट्रक से की थी। उन्होंने कहा कि यह केवल मजाक नहीं बल्कि स्वीकारोक्ति है कि भारत ने सही नीतियों और दृष्टिकोण से प्रगति की है जबकि पाकिस्तान अपनी असफलताओं में फंसा रहा।

उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की समृद्धि के साथ-साथ उसकी रक्षा क्षमता और राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा करने की प्रतिबद्धता भी उतनी ही मजबूत है। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने पहले ही भारत की दृढ़ इच्छाशक्ति को दिखा दिया है और पाकिस्तान के मन में भारत की ताकत को लेकर कोई गलतफहमी पनपने नहीं दी जाएगी।

AMCA jet engine: रक्षा उत्पादन और निर्यात में बड़ी छलांग

राजनाथ सिंह ने बताया कि पिछले एक दशक में भारत के रक्षा निर्यात में 35 गुना वृद्धि हुई है। वर्ष 2013-14 में जहां यह मात्र 686 करोड़ रुपये था, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 23,622 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। आज भारत लगभग 100 देशों को डिफेंस इक्विपमेंट्स निर्यात कर रहा है।

सरकार ने 2025 में रक्षा निर्यात का लक्ष्य 30,000 करोड़ रुपये और 2029 तक 50,000 करोड़ रुपये तय किया है। इसके साथ ही रक्षा उत्पादन भी 2014 के 40,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 1.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है और वर्तमान वित्तीय वर्ष में यह लगभग 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है।

AMCA jet engine: आत्मनिर्भरता के लिए नई सूची

रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत ने अब तक 509 प्लेटफॉर्म, सिस्टम और हथियारों को शामिल करते हुए पांच सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची जारी की हैं। इन सभी का निर्माण अब भारत में ही किया जाएगा। इसके अलावा रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों (DPSUs) ने 5,000 से अधिक महत्वपूर्ण उपकरणों और कलपुर्जों की अपनी स्वदेशीकरण सूची भी जारी की है। उन्होंने यह भी बताया कि सरकार ने रक्षा पूंजीगत खरीद बजट का 75% भारतीय कंपनियों के लिए रिजर्व कर दिया है।

तेजस के मिल रहे लगातार ऑर्डर

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि कंपनी को हाल ही में 97 तेजस लड़ाकू विमानों के लिए 66,000 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है। इसके अलावा पहले से ही 83 तेजस विमानों का 48,000 करोड़ रुपये का ऑर्डर दिया गया था। उन्होंने कहा कि तेजस भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमताओं का शानदार उदाहरण है।

बन रहे डिफेंस कॉरिडोर

रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में यह भी बताया कि भारत ने रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में बन रहे डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर्स का जिक्र किया, जो निवेश को आकर्षित कर रहे हैं और रक्षा क्षेत्र के लिए विकास का इंजन बन रहे हैं। इसके अलावा, सरकार ने रक्षा क्षेत्र में FDI सीमा 74% (ऑटोमैटिक रूट) और 100% (गवर्नमेंट रूट) तक बढ़ा दी है और DRDO की तकनीक ट्रांसफर भी मुफ्त उपलब्ध कराई जा रही है।

उन्होंने बताया कि स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप मॉडल के जरिए निजी कंपनियों को लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, टैंक और पनडुब्बी बनाने का मौका दिया जा रहा है। स्टार्टअप्स और एमएसएमई को प्रोत्साहित करने के लिए iDEX (Innovations for Defence Excellence) जैसी योजनाओं की शुरुआत की गई है।

रक्षा बजट में बड़ा इजाफा

रक्षा मंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का रक्षा बजट 2013-14 के 2.53 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में लगभग 6.22 लाख करोड़ रुपये हो गया है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद इसमें और बढ़ोतरी की गई है ताकि सेना को और आधुनिक बनाया जा सके।

विदेशी कंपनियों को भारत में निवेश का न्योता

राजनाथ सिंह ने कहा कि आज दुनिया की बड़ी रक्षा कंपनियों के पास भारत में निवेश करने और यहां रक्षा उपकरण बनाने का बेहतरीन अवसर है। उन्होंने एयरबस और टाटा एयरोस्पेस के सहयोग से बन रहे C295 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट का उदाहरण दिया।

उन्होंने कहा कि भारत का “हमारा मेक इन इंडिया केवल भारत तक सीमित नहीं है। जब आप भारत में बनाएंगे, तो आप पूरी दुनिया के लिए बनाएंगे।

भारत की तीन बड़ी ताकतें

रक्षा मंत्री ने कहा कि उन्हें विश्वास है कि भारत आने वाले समय में वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाएगा। इसके पीछे उन्होंने तीन कारण गिनाए- भारत की सभ्यतागत मूल्य, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और युवा जनसंख्या।

उन्होंने बताया कि भारत आज दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और तीसरे स्थान की ओर बढ़ रहा है। पिछले दशक में भारत का निर्यात 76% बढ़ा है और घरेलू मांग वैश्विक चुनौतियों के बावजूद मजबूत बनी हुई है।

उन्होंने यह भी बताया कि भारत की 65% से अधिक आबादी 35 साल से कम उम्र की है और देश में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है, जिसमें 100 से अधिक यूनिकॉर्न शामिल हैं।

Speedy Justice for Armed Forces: दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश; आर्मी, नेवी, एयरफोर्स और पैरामिलिट्री मामलों की सुनवाई को मिलेगी प्राथमिकता

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Speedy Justice for Armed Forces: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम सर्कुलर जारी करते हुए निर्देश दिया है कि राजधानी की सभी अदालतें भारतीय सेना, नौसेना, वायुसेना और पैरामिलिट्री बलों से जुड़े मामलों की सुनवाई को प्राथमिकता दें। यह आदेश हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल अरुण भारद्वाज की ओर से जारी किया गया है।

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सर्कुलर में कहा गया है कि संसद ने पहले से ही सशस्त्र बलों की जिम्मेदारियों को देखते हुए विभिन्न कानूनों में विशेष प्रावधान किए हैं। इनमें आर्मी एक्ट 1950 की धारा 32, नेवी एक्ट 1957 की धारा 24 और एयर फोर्स एक्ट 1950 की धारा 32 शामिल हैं। इन प्रावधानों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि आर्मी, नेवी और एयरफोर्स से जुड़े मामलों की सुनवाई तेजी से हो सके।

इसके अलावा, भारतीय सैनिक (विवाद) अधिनियम 1925, जिसे 19 नवंबर 2018 को संशोधित किया गया था, भी इस विशेष सुरक्षा का आधार है। इस अधिनियम के तहत भारतीय सैनिकों को सिविल और राजस्व मामलों की सुनवाई में प्राथमिकता दिए जाने का प्रावधान है।

दिल्ली हाई कोर्ट के नियमों और आदेशों के वॉल्यूम-1 में भी स्पष्ट किया गया है कि सैन्य सेवा से जुड़े व्यक्तियों के खिलाफ या उनके पक्ष में दायर मुकदमों को प्राथमिकता दी जाए। विशेष रूप से अध्याय 6 के अंतर्गत आने वाले प्रावधान इस बात पर जोर देते हैं कि सेना और वायुसेना से जुड़े विवादों को तेजी से निपटाया जाए।

इस आदेश के अनुसार, दिल्ली के सभी सिविल और राजस्व अदालतों को यह निर्देश दिया गया है कि वे आर्मी, नेवी और एयरफोर्स से जुड़े मुकदमों और आपराधिक मामलों को प्राथमिकता से लें। साथ ही, कोर्ट को यह भी कहा गया है कि पैरामिलिट्री बलों के मामलों की जल्दी सुनवाई और अंतिम निपटारा सुनिश्चित किया जाए।

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मुख्य न्यायाधीश के इस आदेश की प्रतियां दिल्ली की सभी जिला और सत्र अदालतों के प्रधान न्यायाधीशों को भेज दी गई हैं। इनमें तिहाड़ कोर्ट, रोहिणी कोर्ट, साकेत कोर्ट, द्वारका कोर्ट, कड़कड़डूमा कोर्ट, पटियाला हाउस कोर्ट और शाहदरा कोर्ट शामिल हैं।

सर्कुलर के साथ यह भी निर्देश दिया गया है कि अदालतें इस तरह के मामलों की जल्दी सुनवाई और अंतिम निर्णय की व्यवस्था करें ताकि वर्दीधारी बलों को अनावश्यक देरी से राहत मिल सके।

Pinaka Rocket System: नेवी और एयरफोर्स भी यूज कर सकेंगी पिनाका, DRDO बना रहा है 300 किमी रेंज वाला वर्जन, अमेरिकी ATACMS को देगा टक्कर

Pinaka Rocket System
Pinaka MBRL

Pinaka Rocket System: डीआरडीओ पिनाका रॉकेट सिस्टम (Pinaka Rocket System) का लॉन्ग रेंज वेरियंट तैयार कर रहा है। पुणे स्थित आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (ARDE) के निदेशक डॉ. ए. राजू ने एक विशेष साक्षात्कार में इसकी पुष्टि की। उन्होंने बताया कि 120 किलोमीटर तक मार करने वाला पिनाका वेरिएंट तैयार हो चुका है, जबकि 300 किलोमीटर तक मारक क्षमता वाले नए वेरियंट पर काम जारी है।

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Pinaka Rocket System: भारत का स्वदेशी मल्टी-बैरल रॉकेट सिस्टम

पिनाका रॉकेट सिस्टम को भारतीय सेना में रूसी BM-21 ग्रैड और स्मर्च सिस्टम के विकल्प के रूप में शामिल किया गया। यह 8×8 टाट्रा ट्रक पर लगाया जाता है और महज 44 सेकंड में 12 रॉकेट दाग सकता है। इसकी तेज जवाबी क्षमता और सटीकता की वजह से यह युद्ध के दौरान दुश्मन की महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने में सक्षम है।

प्रत्येक लॉन्चर में दो पॉड होते हैं, और हर पॉड में छह ट्यूब लगी होती हैं। इसे फायर कंट्रोल कंप्यूटर (FCC), लॉन्चर कंप्यूटर (LC) या मैन्युअल रूप से चलाया जा सकता है। निशाना साधने के लिए इसमें ऑटोमैटिक गन एलाइनमेंट एंड प्वाइंटिंग सिस्टम (AGAPS) या डायल साइट का उपयोग होता है।

इस सिस्टम का उत्पादन कई भारतीय कंपनियों के जरिए किया जा रहा है। यंत्र इंडिया लिमिटेड, सोलर इंडस्ट्रीज लिमिटेड, इकनॉमिक एक्सप्लोसिव्स लिमिटेड और म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड रॉकेट बनाती हैं। वहीं लार्सन एंड टुब्रो और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लॉन्चर का निर्माण करते हैं, जबकि बीईएमएल (BEML) ट्रक उपलब्ध कराती है।

Pinaka Rocket System: कारगिल युद्ध का हीरो

पिनाका का पहला उपयोग 1999 के कारगिल युद्ध में किया गया था। ऊंचाई वाले इलाकों में दुश्मन की चौकियों को ध्वस्त करने में इसकी भूमिका बेहद अहम रही। बोफोर्स तोपों के साथ मिलकर पिनाका ने दुश्मन के ठिकानों को तबाह कर भारतीय सेना को निर्णायक बढ़त दिलाई।

फिलहाल पिनाका के तीन वेरिएंट भारतीय सेना में मौजूद हैं। पिनाका Mk-I जिसकी मारक क्षमता 37.5 किलोमीटर है। इसके बाद एन्हांस्ड पिनाका जो 50 किलोमीटर तक मार कर सकता है। तीसरा वेरिएंट है गाइडेड पिनाका जिसकी मारक क्षमता 75 किलोमीटर है।

गाइडेड पिनाका को 2024 में भारतीय सेना में शामिल किया गया। परीक्षण के दौरान इसकी सटीकता (Circular Error Probable) केवल 2 से 3 मीटर रही, जबकि सेना की जरूरत 40 मीटर तक थी। डॉ. राजू के अनुसार, “यह लगभग एक क्रूज मिसाइल की तरह काम करता है।”

Pinaka Rocket System: नए वेरिएंट्स की तैयारी

वहीं, डीआरडीओ अब पिनाका को और लंबी दूरी तक सक्षम बनाने की दिशा में काम कर रहा है। डॉ. राजू ने बताया कि 120 किलोमीटर रेंज वाला वेरिएंट पूरा हो चुका है। इसके अलावा, 300 किलोमीटर तक मारक क्षमता वाला पिनाका भी तैयार किया जा रहा है, जो अमेरिकी आर्मी के टैक्टिकल मिसाइल सिस्टम (ATACMS) के बराबर होगा।

थलसेना, नौसेना और वायुसेना के लिए अलग संस्करण

डीआरडीओ पिनाका के ऐसे वेरिएंट भी तैयार कर रहा है, जिन्हें भारतीय नौसेना और वायुसेना के लिए इस्तेमाल किया जा सके। नौसेना के लिए विशेष संस्करण पर काम चल रहा है, वहीं वायुसेना के लिए एयर-लॉन्च्ड वेरिएंट पर विचार किया जा रहा है। इन नए संस्करणों को पिनाका Mk-3 और Mk-4 के नाम से जाना जाएगा।

Pinaka Rocket System: डिजाइन में बदलाव

ARDE के अनुसार, पिनाका के लॉन्चर प्लेटफॉर्म में बदलाव नहीं किया जाएगा। नया बदलाव केवल रॉकेट्स के डिजाइन में होगा ताकि उन्हें लंबी दूरी तक मारक क्षमता दी जा सके और अलग-अलग सेनाओं की जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल किया जा सके।

पिनाका का विकास 1980 के दशक में शुरू हुआ और 1999 के कारगिल युद्ध में इसके प्रदर्शन ने इसे भारतीय सेना का भरोसेमंद हथियार बना दिया। पिछले दो दशकों में डीआरडीओ ने लगातार इसकी रेंज और सटीकता को बढ़ाने पर काम किया है। गाइडेड वेरिएंट के बाद अब इसकी क्षमता बैलिस्टिक मिसाइल और क्रूज मिसाइल जैसी कैटेगरी तक पहुंच रही है।

HC judgement paramilitary: पूर्व सैनिक श्रेणी में पैरामिलिट्री कर्मियों को शामिल करने पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

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HC judgement paramilitary:पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में स्पष्ट कर दिया है कि पैरामिलिट्री फोर्सेज जैसे सीआरपीएफ, बीएसएफ और सीआईएसएफ से सेवानिवृत्त कर्मियों को एक्स-सर्विसमैन (ESM) की श्रेणी में शामिल करने का फैसला अदालत का नहीं बल्कि राज्य सरकार की नीति का विषय है। अदालत ने कहा कि यह पूरी तरह से राज्य सरकार पर निर्भर करता है कि वह इस मामले में कोई निर्णय लेती है या नहीं।

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हाईकोर्ट ने 18 अगस्त को दिए गए अपने आदेश में कहा, “यह अदालत यह तय नहीं कर सकती कि पैरामिलिट्री फोर्सेज के सेवानिवृत्त अधिकारियों को एक्स-सर्विसमैन की परिभाषा में शामिल किया जाए या नहीं। यह एक नीतिगत मामला है और राज्य को ही इसका फैसला करना है।”

यह आदेश न्यायमूर्ति जगमोहन बंसल ने उस याचिका को निपटाते हुए पारित किया, जो पंजाब के फाजिल्का निवासी मक्खन सिंह ने दायर की थी। मक्खन सिंह सीआरपीएफ से रिटायर होने के बाद पंजाब पुलिस में कांस्टेबल (ड्राइवर) के पद के लिए आवेदन किया था। लेकिन उन्हें एक्स-सर्विसमैन कोटे के तहत नियुक्ति नहीं मिली। इस पर उन्होंने कोर्ट में याचिका दायर कर पंजाब सरकार को निर्देश देने की मांग की थी कि उन्हें ईएसएम श्रेणी में माना जाए और पुलिस में नियुक्ति दी जाए।

याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि सर्वोच्च न्यायालय ने 11 फरवरी 1981 को दिए गए एक फैसले (अखिलेश प्रसाद बनाम यूनियन टेरिटरी ऑफ मिजोरम) में सीआरपीएफ को सशस्त्र बल घोषित किया था। उस फैसले के तहत सीआरपीएफ को “आर्म्ड फोर्सेज ऑफ द यूनियन” की श्रेणी में रखा गया था। इसलिए, पैरामिलिट्री बलों के कर्मियों को भी एक्स-सर्विसमैन का दर्जा मिलना चाहिए।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस पर कोई सीधा आदेश पारित करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि यह मामला नीतिगत है और इसमें हस्तक्षेप करना न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। साथ ही, पंजाब सरकार को निर्देश दिया गया कि वह याचिकाकर्ता के इस प्रतिनिधित्व पर विचार करे और उचित निर्णय ले।

अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार छह माह के भीतर इस विषय पर कोई उपयुक्त आदेश पारित कर सकती है। इस तरह, याचिका का निस्तारण करते हुए अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि पैरामिलिट्री बलों को पूर्व सैनिक का दर्जा देने का सवाल अदालत के नहीं बल्कि सरकार के पाले में है।

इस फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि आने वाले समय में यदि सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ जैसे अर्धसैनिक बलों को पूर्व सैनिक की श्रेणी में शामिल करना है तो इसके लिए राज्य सरकार को नीतिगत फैसला लेना होगा। वहीं, पूर्व सैनिक संगठन लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि देश की सुरक्षा में समान भूमिका निभाने वाले पैरामिलिट्री बलों को भी सेना की तरह एक्स-सर्विसमैन का दर्जा मिले।

Agni-5 IRBM: सरकार ने अग्नि-5 मिसाइल को क्यों बताया इंटरमीडिएट रेंज मिसाइल, दुश्मन को कैसे चकमा देगी इसमें लगी मल्टीपल वॉरहेड तकनीक, पढ़ें एक्सप्लेनर

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Agni-5 IRBM: भारत ने 20 अगस्त 2025 को ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से अग्नि-5 का सफल परीक्षण किया गया। इस परीक्षण में मिसाइल ने सभी ऑपरेशनल और टेक्निकल स्टैंडर्ड्स को सफलतापूर्वक पूरा किया। इस मिसाइल को डीआरडीओ ने बनाया है। यह मिसाइल जमीन से जमीन पर मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइल है जिसकी रेंज 5000 किलोमीटर से अधिक है।

यह परीक्षण खास इसलिए है क्योंकि यह पिछले साल मार्च 2024 में मिशन दिव्यास्त्र के तहत मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल (MIRV) टेक्नोलॉजी के साथ अग्नि-5 के पहले सफल परीक्षण के बाद हुआ। इस तकनीक ने भारत को उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल कर दिया, जिनके पास एक मिसाइल से कई लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता है। लेकिन MIRV तकनीक क्या है? सरकार अब अग्नि-5 को इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल (IRBM) क्यों कह रही है, जबकि पहले इसे इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) कहा जाता था? आइए, इसे सरल भाषा में समझते हैं।

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Agni-5 IRBM: क्या कहा सरकार ने अपने बयान में

भारत सरकार ने अब आधिकारिक तौर पर अग्नि-5 मिसाइल (Agni-5 IRBM) को IRBM की श्रेणी में रखा है। 20 अगस्त को सरकार की तरफ से जारी हुई प्रेस रिलीज में भी अग्नि-5 को IRBM कहा गया है। इस बदलाव के कई रणनीतिक मायने हैं। सबसे बड़ा कारण यह हो सकता है कि भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को डिफेंसिव राष्ट्र के रूप में दिखाना चाहता है और ICBM का टैग सीधे परमाणु महाशक्तियों की लीग में रख देता है।

रक्षा मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि इस परीक्षण ने मिसाइल के सभी ऑपरेशनल और टेक्निकल मापदंडों को सफलतापूर्वक मान्य किया। यह परीक्षण स्ट्रैटेजिक फोर्सेस कमांड (SFC) की निगरानी में हुआ, जो भारत के एटोमिक वेपंस डिलीवरी सिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मिसाइल इतनी तेज है कि लॉन्च होने के बाद इसे रोकना लगभग नामुमकिन है। एक बार टारगेट सेट कर देने के बाद यह अपने लक्ष्य को नष्ट किए बिना नहीं रुकती।

Agni-5 IRBM: कैनिस्टर-लॉन्च सिस्टम से लैस

अग्नि-5 मिसाइल (Agni-5 IRBM) को 1983 में शुरू हुए इंटीग्रेटेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IGMDP) के तहत विकसित किया गया है। यह मिसाइल 50 टन वजनी और 17 मीटर लंबी है, जिसकी मोटाई करीब 2 मीटर है। यह 1,500 किलोग्राम तक के हथियार ले जा सकती है और जमीन से जमीन पर मार करने में सक्षम है। इसकी रफ्तार ध्वनि की रफ्तार से 24 गुना तेज है, यानी यह मैक 24 की रफ्तार से लक्ष्य की ओर बढ़ सकती है। इसकी खासियत यह है कि इसे सड़क पर आसानी से ले जाया जा सकता है, क्योंकि यह कैनिस्टर-लॉन्च सिस्टम से लैस है। इसका मतलब है कि मिसाइल को एक विशेष कंटेनर में रखकर कहीं भी ले जाया जा सकता है, जिससे इसे तैनात करना और छिपाना आसान हो जाता है।

Agni-5 IRBM: IRBM वर्सेस ICBM

अग्नि-5 (Agni-5 IRBM) का पहला परीक्षण 2012 में हुआ था, और तब से इसकी कई बार टेस्टिंग हो चुकी है। पहले इसे ICBM कहा जाता था, क्योंकि इसकी रेंज 5,000 किमी से अधिक थी, इसकी जद में चीन के ज्यादातर शहर खासतौर पर उत्तरी और पूर्वी हिस्से आते हैं। लेकिन अब सरकार इसे IRBM के रूप में पेश कर रही है। IRBM यानी इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल की रेंज 3,000 से 5,500 किलोमीटर तक होती है, जबकि ICBM यानी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल की रेंज 5,500 किलोमीटर से अधिक होती है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि वजन कम करने के बाद अग्नि-5 की वास्तविक रेंज 7,000 किमी तक हो सकती है। 2022 में DRDO ने मिसाइल का वजन 20 फीसदी तक कम करने का दावा किया था, जिससे इसकी रेंज बढ़कर 7,000 किमी से अधिक हो सकती है। फिर भी, सरकार इसे आधिकारिक तौर पर IRBM ही कह रही है।

Agni-5 IRBM: अग्नि-5 में MIRV टेक्नोलॉजी

अग्नि-5 (Agni-5 IRBM) में MIRV टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गयाा है। MIRV का मतलब है मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल। यह एक ऐसी टेक्नोलॉजी है, जिसमें एक मिसाइल कई परमाणु हथियार ले जा सकती है, और प्रत्येक हथियार को अलग-अलग लक्ष्य पर निशाना साधने के लिए प्रोग्राम किया जा सकता है। ये लक्ष्य सैकड़ों किलोमीटर दूर हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, एक अग्नि-5 मिसाइल तीन से चार परमाणु हथियार ले जा सकती है, और प्रत्येक को अलग-अलग रफ्तार और दिशा में छोड़ा जा सकता है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यह मिसाइल 10-12 हथियार भी ले जा सकती है। इस तकनीक की खासियत यह है कि यह दुश्मन के मिसाइल डिफेंस सिस्टम्स को भी चकमा दे सकती है। MIRV-लैस मिसाइलें डिकॉय यानी नकली हथियार भी ले जा सकती हैं, जो दुश्मन के रडार को भ्रमित करते हैं, जिससे असली हथियार को रोका जाना मुश्किल हो जाता है।

Agni-5 IRBM: क्यों जरूरी है MIRV क्षमता

MIRV तकनीक को विकसित करना आसान नहीं है। इसके लिए हथियारों का छोटा साइज (मिनिएचराइजेशन), हल्के वजन के री-एंट्री व्हीकल, और सटीक नेविगेशन सिस्टम की जरूरत होती है। अग्नि-5 में स्वदेशी एवियोनिक्स सिस्टम और ज्यादा सटीकता वाले सेंसर पैकेज लगाए गए हैं, ताकि हथियार अपने टारगेट पर हिट करे। इस तकनीक का पहला सफल परीक्षण 11 मार्च 2024 को मिशन दिव्यास्त्र के तहत हुआ, जिसे DRDO ने ओडिशा के डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वीप से लॉन्च किया था। इस परीक्षण की निगरानी विभिन्न टेलीमेट्री और रडार स्टेशनों ने की, और मिसाइल ने सभी निर्धारित मापदंडों को पूरा किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने DRDO के वैज्ञानिकों की इस उपलब्धि की सराहना की।

यह तकनीक भारत की रक्षा रणनीति में क्यों महत्वपूर्ण है? भारत की परमाणु नीति ‘नो-फर्स्ट-यूज’ (पहले हमला न करना) और क्रेडिबल मिनिमम डिटरेंस पर आधारित है। इसका मतलब है कि भारत पहले परमाणु हमला नहीं करेगा, लेकिन अगर कोई देश भारत पर परमाणु हमला करता है, तो भारत इसका करारा जवाब देगा। MIRV तकनीक इस जवाबी क्षमता को बढ़ाती है, क्योंकि एक मिसाइल कई लक्ष्यों को नष्ट कर सकती है। चीन के पास पहले से ही हांगकी (HQ-19) जैसा मिसाइल डिफेंस सिस्टम है, MIRV तकनीक भारत को सामरिक संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। चीन ने अपनी कुछ DF-5 मिसाइलों में MIRV तकनीक लगाई है।

अग्नि-5 (Agni-5 IRBM) को खासतौर पर चीन से मिलने वाली चुनौतियों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। भारत की दूसरी मिसाइलें, जैसे अग्नि-1, अग्नि-2, और अग्नि-3, मुख्य रूप से पाकिस्तान से मिल रहे खतरे को देखते हुए बनाई गई थीं। लेकिन अग्नि-5 की रेंज इसे पूरे एशिया, विशेष रूप से चीन के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों, और यूरोप के कुछ हिस्सों तक पहुंचने में सक्षम बनाती है। मिसाइल के पहले चरण को अग्नि-3 से लिया गया है, जबकि दूसरे और तीसरे चरण को हल्का करने के लिए कंपोजिट सामग्री का उपयोग किया गया है। MIRV से यह मुश्किल हो जाता है क्योंकि दुश्मन को पता नहीं चलता कि असली वारहेड कौन सा है और किस दिशा में जाएगा। कई डमी वॉरहेड्स के साथ असली वारहेड्स को भी छोड़ा जाता है। इससे दुश्मन का सुरक्षा कवच टूट सकता है।

जारी किया था नोटम

20 अगस्त 2025 के परीक्षण के लिए पहले ही बंगाल की खाड़ी में नोटम (नोटिस टू एयरमैन) भी जारी किया गया था, जो अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत विमानन और समुद्री यातायात को सूचित करता है। इस परीक्षण की निगरानी भारतीय नौसेना के जहाजों और DRDO के वैज्ञानिकों ने की, जो दक्षिणी हिंद महासागर में कई जगहों पर तैनात थे।

पांच देशों के पास है MIRV तकनीक

MIRV तकनीक की शुरुआत 1960 के दशक में अमेरिका ने की थी, जब उसने 1970 में मिनटमैन-III मिसाइल और 1971 में पॉसाइडन मिसाइल में इस तकनीक का उपयोग किया। आज अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, और यूके के पास यह तकनीक है। पाकिस्तान ने भी 2017 में अपनी अबाबील मिसाइल में MIRV तकनीक का परीक्षण किया था, हालांकि इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं।

अग्नि-5 के नेविगेशन और गाइडेंस सिस्टम में रिंग लेजर जायरोस्कोप और एक्सेलेरोमीटर का उपयोग किया गया है। मिसाइल का निर्माण कार्बन कंपोजिट सामग्री से किया गया है, जो इसे हल्का बनाता है और वायुमंडल में पुनः प्रवेश के दौरान उच्च तापमान को सहन करने में सक्षम बनाता है। सूत्र बताते हैं कि अग्नि-5 में एंटी-सैटेलाइट (ASAT) क्षमता से भी लैस है। 2019 में मिशन शक्ति के तहत भारत ने 300 किमी की ऊंचाई पर एक उपग्रह को नष्ट करके अपनी ASAT क्षमता दिखाई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि अग्नि-5 को 800 किमी की ऊंचाई तक पहुंचने में सक्षम बनाया जा सकता है, जिससे यह उपग्रहों को नष्ट करने में भी उपयोगी हो सकता है।

अग्नि-5 (Agni-5 IRBM) भारत की परमाणु त्रिकोणीय क्षमता का भी हिस्सा है, जिसमें जमीन, हवा, और समुद्र से परमाणु हथियार दागने की क्षमता शामिल है। भारत ने 2018 में INS अरिहंत पनडुब्बी के पहले डिटरेंस गश्त के साथ इस ट्राइंगल को पूरा किया था। यह मिसाइल भारत की “सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी” को भी मजबूत करती है, यानी अगर भारत पर परमाणु हमला होता है, तो जवाबी हमला और भी ज्यादा असरदार हो सकता है।

General Level Mechanism: चीन के विदेश मंत्री वांग यी और NSA अजीत डोवाल ने क्यों बनाया यह नया मैकेनिज्म, SHMC और WMCC से कैसे अलग, पढ़ें एक्सप्लेनर

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Member of the Political Bureau of the CPC Central Committee Wang Yi and India’s National Security Adviser Ajit Doval held the 24th Round of Talks Between the Special Representatives of China and India on the Boundary Question in New Delhi. (Photo- MEA)

General Level Mechanism: भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को सुलझाने के लिए बातचीत का सिलसिला पिछले कई सालों से जारी है। 19 अगस्त 2025 को नई दिल्ली में दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों चीन के विदेश मंत्री वांग यी और भारत के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल के बीच 24वीं वार्ता हुई। इस दौरान दोनों देशों ने सीमा पर शांति बनाए रखने, व्यापार बढ़ाने और आपसी विश्वास को मजबूत करने के लिए कई अहम फैसले लिए गए। लेकिन इस बार 24वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता के बाद जो सहमति सामने आई है, वह पहले से अलग और महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस बैठक में पहली बार भारत और चीन ने पूर्वी और मध्य सेक्टर में भी “जनरल लेवल मैकेनिज्म” (General Level Mechanism) बनाने का फैसला लिया है। लेकिन यह मैकेनिज्म क्या है? यह पहले से मौजूद SHMC और WMCC से कैसे अलग है? आइए, इसे आसान भाषा में समझते हैं।

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क्या है General Level Mechanism

दरअसल यह मैकेनिज्म (General Level Mechanism) सैन्य स्तर पर होने वाली कोर कमांडर स्तर की बैठकें हैं। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद जब एलएसी (लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल) पर स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई थी, तब पहली बार कोर कमांडर स्तर पर बैठकों का सिलसिला शुरू किया गया। इसका मकसद यह था कि दोनों देशों की सेनाओं के सीनियर अफसर सीधे बातचीत कर सकें और किसी भी विवाद या गतिरोध को बातचीत से सुलझाने का रास्ता निकाल सकें। 2020 में गलवान के बाद दोनों देशों ने फैसला किया कि छोटे स्तर के अधिकारियों की बजाय कोर कमांडर स्तर पर बातचीत होगी ताकि बड़े विवादों को जल्दी सुलझाया जा सके। भारतीय सेना की 14वीं कोर, जो पूर्वी लद्दाख की जिम्मेदारी देखती है, इस मैकेनिज्म का हिस्सा रही है।

अब यह व्यवस्था सिर्फ पश्चिमी सेक्टर यानी लद्दाख तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के इलाकों में भी लागू होगी। इसका मतलब यह है कि भविष्य में अगर किसी भी तरह की टकराव की स्थिति पूर्वी या मध्य सेक्टर में पैदा होती है, तो उसे भी कोर कमांडर स्तर पर सुलझाने की कोशिश होगी।

कहां-कहां है तनाव और क्या है मौजूदा स्थिति

भारत और चीन के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर विवाद तीन प्रमुख इलाकों पश्चिमी, मध्य, और पूर्वी में फैला है। इन इलाकों में दोनों देशों की अलग-अलग दावेदारी और एलएसी की अस्पष्ट के चलते बार-बार तनाव पैदा होता है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद का आधार एलएसी है, जो दोनों देशों के बीच एक अस्थायी सीमा रेखा है। इस रेखा की कोई औपचारिक परिभाषा नहीं है, और दोनों देश इसे अलग-अलग नजरिए से देखते हैं। इसी के चलते दोनों देशों के सैनिकों की गश्त के दौरान टकराव आम है। एलएसी को तीन क्षेत्रों में बांटा गया है, पश्चिमी क्षेत्र (लद्दाख और अक्साई चिन), मध्य क्षेत्र (हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड), और पूर्वी क्षेत्र (अरुणाचल प्रदेश)।

पश्चिमी क्षेत्र, यानी लद्दाख और अक्साई चिन, इस विवाद का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। भारत का दावा है कि 1865 में बनाई गई जॉनसन लाइन के अनुसार अक्साई चिन लद्दाख का हिस्सा है। यह इलाका करीब 38,000 वर्ग किलोमीटर का है और भारत इसे अपना मानता है। दूसरी ओर, चीन 1899 की मैकार्टनी-मैकडोनाल्ड लाइन को मानता है, जिसके अनुसार अक्साई चिन उसके शिनजियांग प्रांत का हिस्सा है। हकीकत यह है कि 1950 के दशक से अक्साई चिन पर चीन का नियंत्रण है। उसने यहां G219 राजमार्ग बनाया, जो उसके शिनजियांग और तिब्बत क्षेत्र को जोड़ता है।

मध्य क्षेत्र, यानी हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में सीमा विवाद अपेक्षाकृत कम है। यह एलएसी का सबसे छोटा हिस्सा है, जहां बाराहोती और नेलांग घाटी को लेकर विवाद है। इन इलाकों पर भारत का नियंत्रण है, लेकिन दोनों देशों की सेनाएं समय-समय पर गश्त करती हैं। इस क्षेत्र में तनाव लद्दाख या अरुणाचल की तुलना में कम हैं। फिर भी, छोटे-मोटे विवादों को सुलझाने के लिए स्थानीय स्तर पर बातचीत होती रहती है।

पूर्वी क्षेत्र, यानी अरुणाचल प्रदेश की बात करें, तो यहां लद्दाख के बाद सबसे ज्यादा तनाव है। भारत 1914 की शिमला संधि में बनी मैकमोहन लाइन को मान्यता देता है, जिसके अनुसार अरुणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा है। यह क्षेत्र करीब 90,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है और भारत इसे अपना पूर्ण राज्य मानता है। लेकिन चीन इस रेखा को “साम्राज्यवादी” बताकर खारिज करता है और अरुणाचल को “दक्षिण तिब्बत” के रूप में दावा करता है। यहां दोनों देशों की सेनाएं गश्त करती हैं, और कई बार टकराव की स्थिति बनती है। अरुणाचल में भारत ने सैन्य और बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया है, जबकि चीन ने भी अपनी तरफ सैन्य ठिकानों और सड़कों का जाल बिछाया है।

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External Affairs Minister S Jaishankar emphasized that maintaining peace and tranquility along the India-China border is fundamental to improving bilateral relations (Photo: MEA)

क्या है SHMC?

भारत-चीन सीमा विवाद को सुलझाने के लिए पहले से दो सिस्टम काम कर रहे हैं। पहला है SHMC यानी सीनियर हाईएस्ट मिलिट्री कमांडर लेवल मीटिंग, जिसे साधारण भाषा में कोर कमांडर स्तर की बैठक कहा जाता है। यह व्यवस्था 2020 में गलवान झड़प के बाद शुरू हुई थी। 2020 से पहले एलएसी पर विवाद सुलझाने के लिए कर्नल या ब्रिगेडियर स्तर के अधिकारी बातचीत करते थे। लेकिन गलवान के बाद यह साफ हो गया कि बड़े विवादों को सुलझाने के लिए उच्च स्तर की बातचीत जरूरी है। इसलिए SHMC बनाया गया, जिसमें कोर कमांडर शामिल होते हैं। नया जनरल लेवल मैकेनिज्म SHMC का ही विस्तार है, लेकिन अब इसे पूरे LAC पर लागू किया जाएगा, न कि सिर्फ पूर्वी लद्दाख में।

WMCC के बारे में जानें?

वहीं, WMCC यानी मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन ऑन इंडिया-चाइना बॉर्डर अफेयर्स। यह एक डिप्लोमैटिक-मिलिट्री स्ट्रक्चर है, जिसमें दोनों देशों के विदेश मंत्रालय और सेना के अधिकारी शामिल होते हैं। WMCC की शुरुआत 2012 में हुई थी और इसका मकसद सीमा प्रबंधन के लिए नियमित संवाद बनाए रखना है। 1960 में दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सुलझाने की कोशिश हुईं, लेकिन बातचीत नाकाम रही। 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा के बाद जॉइंट वर्किंग ग्रुप बनाया गया। 1993 और 1996 में एलएसी पर शांति बनाए रखने के लिए समझौते हुए। 2003 में स्पेशल रिप्रजेंटेटिव सिस्टम शुरू हुआ, और 2005 में सीमा विवाद के हल के लिए मार्गदर्शक सिद्धांतों पर दस्तखत हुए। 2012 में WMCC बनाया गया, जो डिप्लोमैटिक लेवल पर बॉर्ड मैनेजमेंट का काम करता है। WMCC में सीमा से जुड़े बड़े नीतिगत फैसले लिए जाते हैं, जैसे कि तनाव कम करने की रणनीति बनाना या सीमा पर व्यापार और सहयोग बढ़ाने के तरीके तलाशना।

24वीं विशेष प्रतिनिधि वार्ता में WMCC के तहत दो नए समूह बनाने का फैसला हुआ। पहला है एक्सपर्ट ग्रुप, जो सीमा पर परिसीमन यानी बॉर्डर डिलिमिटेशन की संभावनाओं पर काम करेगा। दूसरा है वर्किंग ग्रुप, जो बॉर्डर मैनेजमेंट को और प्रभावी बनाने के लिए रणनीतियां तैयार करेगा। ये दोनों समूह WMCC के तहत काम करेंगे और डिप्लोमैटिक लेवल पर सीमा विवाद को सुलझाने में मदद करेंगे।

क्या SHMC का विस्तार है General Level Mechanism

हालांकि यह बात सही कि इतने मैकेनिज्म होने के बावजूद अभी तक एलएसी का कोई अंतिम परिसीमन या सीमा निर्धारण नहीं हुआ है। लेकिन उम्मीद जताई जा रही है कि भारत और चीन के बीच यह नया जनरल लेवल मैकेनिज्म (General Level Mechanism) एलएसी पर शांति और स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकता है। सही मायने में कहा जाए तो जनरल लेवल मैकेनिज्म (General Level Mechanism) दरअसल SHMC का ही विस्तार है, जो मिलिट्री लेवल पर काम करता है, और अब इसे पूर्वी और मध्य सेक्टर तक विस्तारित किया जा रहा है। यह न सिर्फ सैन्य अधिकारियों के बीच सीधी बातचीत को बढ़ाएगा, बल्कि इससे तनावपूर्ण स्थितियों का समाधान तेजी से निकाला जा सकेगा। जबकि WMCC डिप्लोमैटिक लेवल स्तर पर सीमा विवाद को सुलझाने का काम करता है। दोनों सिस्टम एक-दूसरे के पूरक हैं और मिलकर सीमा पर तनाव कम करने में मदद करेंगे।

बता दें कि सिक्किम में भारतीय सेना की जिम्मेदारी 33 कोर के पास है, जबकि अरुणाचल प्रदेश में 3 कोर और 4 कोर तैनात हैं। इन दोनों सेक्टरों में जनरल-लेवल मैकेनिज्म का उद्देश्य यह है कि अगर सीमा पर कोई विवाद पैदा होता है और वह जूनियर अफसरों की बातचीत से हल नहीं हो पाता, तो उसे कोर कमांडर स्तर की बातचीत में सुलझाने की कोशिश की जाए। पूर्वी लद्दाख के अनुभवों से यह साफ हुआ है कि सीनियर मिलिट्री कमांडर स्तर की वार्ताओं ने ही गतिरोध कम करने का रास्ता बनाया। यही वजह है कि भारत और चीन दोनों के स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव्स ने जनरल लेवल मैकेनिज्म को लेकर सहमति जताई।

वार्ता में बनी और भी सहमतियां

19 अगस्त 2025 को नई दिल्ली में हुई स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव स्तर की इस बैठक में दोनों देशों ने सीमा प्रबंधन और सीमा विवाद को लेकर कुल दस बिंदुओं पर सहमति जताई। जिसमें तीन पारंपरिक व्यापारिक बाजारों को फिर से खोलने का फैसला हुआ। ये बाजार हैं रेनक्विंगगांग-चांगगु, पुलान-गुंजी और जिउबा-नामग्या। ये ट्रेडिंग पॉइंट्स एलएसी के पास हैं और इनके खुलने से दोनों देशों के बीच व्यापार और आपसी संपर्क बढ़ेगा। साथ ही, दोनों देशों ने सीधी उड़ान सेवाएं शुरू करने और पर्यटकों, कारोबारियों और मीडिया के लिए वीजा प्रक्रिया को आसान बनाने पर सहमति जताई। वहीं, खास बात यह रही कि विशेष प्रतिनिधि वार्ता में दोनों देशों ने 2026 में चीन में 25वें दौर की वार्ता आयोजित करने पर भी सहमति जताई।

सीमा पार नदियों पर सहयोग भी एक अहम मुद्दा रहा। भारत ने यार्लंग त्सांगपो यानी ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन द्वारा बनाए जा रहे विशाल बांध को लेकर चिंता जताई। इस बांध का असर भारत के निचले तटवर्ती राज्यों पर पड़ सकता है। चीन ने आपात स्थिति में हाइड्रोलॉजिकल डाटा साझा करने का वादा किया, जो मानवीय आधार पर लिया गया फैसला है। दोनों देशों ने इस मुद्दे पर पहले से मौजूद एक्सपर्ट लेवल सिस्टम को और मजबूत करने का फैसला किया।

वहीं, आतंकवाद का मुद्दा भी इस बैठक में उठा। भारत ने सीमा पार आतंकवाद सहित हर तरह के आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाया। विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का एक मूल उद्देश्य आतंकवाद से लड़ना है। भारत ने चीन से इस दिशा में और सहयोग की उम्मीद जताई।