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CDS on 1962 War: 1962 युद्ध पर बोले सीडीएस जनरल अनिल चौहान, कहा- अगर एयरफोर्स एक्टिव होती तो कमजोर हो जाता चीन का हमला

CDS on 1962 War
CDS General Anil Chauhan on 1962 War

CDS on 1962 War: चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने 1962 के भारत-चीन युद्ध पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अगर उस समय भारतीय वायुसेना का इस्तेमाल किया गया होता, तो चीन का आक्रमण काफी हद तक धीमा हो सकता था और भारतीय सेना को तैयारी करने के लिए अधिक समय मिल जाता।

उनका यह बयान कई मायनों में खास है क्योंकि अब तक इस विषय पर औपचारिक रूप से खुलकर चर्चा नहीं होती थी। जनरल चौहान ने यह विचार पुणे में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान साझा किए, जहां लेफ्टिनेंट जनरल एसपीपी थोराट की आत्मकथा “Reveille to Retreat” के संशोधित संस्करण का विमोचन किया गया।

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सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने कहा कि 1962 के समय एयरफोर्स का इस्तेमाल “एस्केलेटरी” यानी हालात को और बिगाड़ने वाला माना गया था, इसी कारण इसे युद्ध में शामिल नहीं किया गया। लेकिन उनके अनुसार यह एक गंभीर रणनीतिक गलती थी।

उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर एयरफोर्स को शामिल किया गया होता तो चीन का हमला कमजोर हो जाता और भारतीय सेना को अतिरिक्त तैयारी का समय मिल सकता था। उन्होंने यह भी कहा कि अब हालात बदल चुके हैं। आधुनिक युद्ध में एयरपावर को नजरअंदाज करना असंभव है।

जनरल चौहान ने इसका उदाहरण हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर से दिया, जिसमें भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी ठिकानों पर कार्रवाई की थी।

अपने बयान में सीडीएस ने भारत की फॉरवर्ड पॉलिसी की भी समीक्षा की। उन्होंने कहा कि इसे लद्दाख और नेफा (अब अरुणाचल प्रदेश) दोनों जगह एक समान तरीके से लागू करना गलत था।

उनके अनुसार, लद्दाख और नेफा के विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अलग थी और भौगोलिक परिस्थितियां भी भिन्न थीं। लद्दाख में चीन पहले से भारतीय क्षेत्र के हिस्से पर कब्जा कर चुका था, जबकि नेफा में भारत का दावा कहीं अधिक वैध था। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों इलाकों को एक जैसा मानकर नीतियां बनाना उस समय की बड़ी रणनीतिक भूल थी।

सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने इस बात पर जोर दिया कि 1962 और आज की परिस्थितियों में जमीन-आसमान का फर्क है। उस समय की भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति आज से पूरी तरह अलग थी। आज भारत ने न सिर्फ अपनी सीमाओं पर बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया है, बल्कि वायुसेना और थलसेना की क्षमताएं भी काफी मजबूत हो चुकी हैं।

CDS on 1962 War
From Reveille to Retreat, the iconic autobiography of Lt Gen S.P.P. Thorat, KC, DSO, Padma Shri

उन्होंने कहा कि आज किसी भी परिस्थिति में एयरफोर्स को “एस्केलेटरी” मानना सही नहीं होगा। बल्कि आधुनिक युद्ध में एयर पावर निर्णायक भूमिका निभाती है।

1962 का भारत-चीन युद्ध भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। उस समय भारत की सैन्य तैयारी सीमित थी और चीन ने अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश (तत्कालीन नेफा) के कई हिस्सों पर हमला किया था। हालांकि भारतीय सैनिकों ने वीरतापूर्वक मुकाबला किया, लेकिन रणनीतिक कमजोरियों के कारण भारत को नुकसान उठाना पड़ा।

जिस कार्यक्रम में सीडीएस ने यह विचार रखे, वहां लेफ्टिनेंट जनरल एसपीपी थोराट की आत्मकथा “Reveille to Retreat” का संशोधित संस्करण लॉन्च किया गया। जनरल चौहान ने कहा कि यह किताब केवल एक आत्मकथा नहीं है, बल्कि इसमें नेतृत्व, रणनीति और सेवा को लेकर महत्वपूर्ण सीखें दी गई हैं। इसमें उस दौर के फैसलों की ईमानदारी से समीक्षा की गई है, जो आज भी प्रासंगिक हैं।

MiG-21 into UAVs?: चीन ने अपने पुराने जे-6 विमानों को बना दिया ड्रोन, तो मिग-21 को लेकर सरकार को क्या है दिक्कत, क्या है आपकी राय?

MiG-21 into UAVs?
Should the IAF Convert Retired MiG-21 Bison Fighters into UAVs

MiG-21 into UAVs?: भारतीय वायुसेना 26 सितंबर को 62 साल बाद अपने बाकी बचे 27 मिग-21 बाइसन लगभग दो स्क्वाड्रन को रिटायर कर देगी। यह फैसला इसलिए लेना पड़ा क्योंकि यह विमान अब पुराना हो चुका है और तकनीकी सुरक्षा मानकों पर खरा नहीं उतरता। 1963 से 2025 तक लगभग 463 मिग-21 विमान दुर्घटनाग्रस्त हुए हैं और 200 से अधिक पायलट इन हादसों में मारे गए। जिसके चलते वायुसेना की छवि और ऑपरेशनल सेफ्टी दोनों पर सवाल उठने लगे।

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वहीं कुछ लोगों का कहना है कि क्या इन विमानों को कबाड़ में बदलने की बजाय इन्हें यूएवी या ड्रोन में बदला जा सकता है? क्योंकि चीन ने भी अपने पुराने जे-6 विमानों को कबाड़ की बजाय ड्रोन में बदला है। हाल ही में चीन ने इन्हें शोकेस भी किया है। कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इन्हें ड्रोन में तब्दील कर दिया जाए तो यह भारत की युद्ध क्षमता में कई गुना बढ़ोतरी कर सकता है।

MiG-21 into UAVs?: 1963 में भारतीय वायुसेना में हुए थे शामिल

MiG-21 सोवियत युग का सुपरसोनिक फाइटर जेट है, जिसे 1963 में पहली बार भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया था। इसके बाद से यह भारत की एयर पावर की रीढ़ बना रहा। इस विमान ने 1971 के भारत-पाक युद्ध, कारगिल युद्ध और बालाकोट एयर स्ट्राइक में अहम भूमिका निभाई2000 के दशक की शुरुआत में इसके बाइसन वेरिएंट को आधुनिक एवियोनिक्स और रडार से लैस करके अपग्रेड भी किया गया, ताकि इसकी आयु और युद्ध क्षमता बढ़ाई जा सके। लेकिन 2025 तक आते-आते यह विमान तकनीकी रूप से इतना पुराना हो चुका है कि इसके पार्ट्स मिलना भी मुश्किल है, मेंटेनेंस का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है और लगातार हो रहे हादसों ने इसके भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

क्या UAV में बदला जा सकता है मिग-21?

जानकारों का कहना है कि इन विमानों को सीधे स्क्रैप करने की बजाय इन्हें ड्रोन प्लेटफॉर्म में बदला जा सकता है। इस ट्रांसफॉर्मेशन से कई तरह की विकल्प खुलेंगे। सबसे पहले इन्हें टारगेट ड्रोन में बदला जा सकता है। इसका मतलब है कि वायुसेना के पायलट और मिसाइल सिस्टम इनका इस्तेमाल अभ्यास और परीक्षण में कर सकते हैं। मैक-2 की रफ्तार से उड़ने वाला मिग-21 अगर दुश्मन के इलाके में घुस जाए तो उसे असली विमान जैसा लगेगा। वहीं, नए मिसाइल सिस्टम जैसे आकाश-एनजी, क्यूआरएसएएम और एक्सआरएसएएम के ट्रायल्स के लिए बेहद उपयोगी साबित होगा।

वहीं, दूसरी संभावना है कि इन्हें डिकॉय ड्रोन बनाया जाए। यानी इन्हें इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर उपकरणों से लैस करके दुश्मन के रडार सिस्टम को कन्फ्यूज करने में लगाया जाए। इससे दूसरे मानव-संचालित विमानों को सुरक्षित रखा जा सकता है।

तीसरा, इन्हें कम्युनिकेशन रिले के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। मॉडर्न कम्यूनिकेशन सिस्टम को लगाकर यह दुर्गम इलाकों में हवाई कम्युनिकेशन नोड की तरह काम कर सकते हैं।

इसके अलावा, इन्हें खुफिया निगरानी कामों में भी लगाया जा सकता है। ये हाई एल्टीट्यूड इलाकों में बेहतर तरीके से उड़ान भर सकते हैं, इनकी ये क्षमता इन्हें लंबी दूरी के जासूसी मिशनों के लिए उपयोगी बनाती है।

वहीं, इन्हें कामिकाजे ड्रोन यानी आत्मघाती ड्रोन के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है, जो विस्फोटक से लैस होकर दुश्मन के ठिकानों पर एकतरफा हमला कर सकते हैं।

MiG-21 into UAVs?
Should the IAF Convert Retired MiG-21 Bison Fighters into UAVs?

क्या हैं तकनीकी चुनौतियां

हालांकि, MiG-21 को यूएवी में बदलना उतना आसान नहीं है जितना सुनने में लगता है। इसे लेकर हमने एयरफोर्स के कई अधिकारियों से बात की। उन्हें यह आइडिया तो सुहाता है, लेकिन वह कहते हैं कि इनके साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका स्ट्रक्चर और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम बहुत पुराना है। इन्हें लेटेस्ट रिमोट-कंट्रोल और ऑटोनॉमस फ्लइट सिस्टम से जोड़ना बेहद मुश्किल होगा। साथ ही यह बेहद खर्चीला भी होगा। उनका कहना है कि दशकों तक इस्तेमाल होने के कारण इनका एयरफ्रेम कमजोर हो चुका है। ऐसे में इसे लंबे समय तक ड्रोन के तौर पर ऑपरेट करना जोखिम भरा हो सकता है।

वहीं, बड़ी चुनौती बजट को लेकर है। भारत पहले ही राफेल, तेजस एमके 1ए और एमके 2 जैसे नए जहाजों पर अरबों रुपये खर्च कर रहा है। ऐसे में पुराने विमानों को ड्रोन में बदलने का खर्च अलग पड़ेगा, जिसका असर रक्षा बजट पर नकारात्मक पड़ सकता है।

अमेरिका और चीन कर चुके हैं ऐसा

हालांकि यह आइडिया नया नहीं है। अमेरिका ने अपने एफ-16 विमानों को क्यूएफ-16 टारगेट ड्रोन में बदला है, जिन्हें मिसाइल परीक्षणों में इस्तेमाल किया जाता है। इसी तरह, इजराइल ने भी अपने पुराने एफ-4 फैंटम विमानों को ड्रोन बनाया था।

वहीं, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स ने हाल ही में अपने जे-6 फाइटर जेट्स को ड्रोन में बदला है। 1950 और 1960 के दशक में बने ये विमान, जो कभी सोवियत मिग-19 पर आधारित थे, अब पूरी तरह से यूएवी में बदल दिए गए हैं।

हाल ही में चांगचुन एयर शो 2025 में पहली बार जे-6डब्ल्यू ड्रोन को शोकेस किया गया था। यह वही विमान है जिसे कभी चीन ने हजारों की संख्या में बनाया था, लेकिन अब इसे ड्रोन के तौर पर जंग के लिए तैयार किया जा रहा है।

चीन ने बनाया स्वार्म अटैक का बेड़ा

चीन ने भी अपने पुराने जे-6 और जे-7 विमानों को ड्रोन और यूसीएवी में बदलने का काम किया है। इन विमानों को स्वार्म अटैक के लिए तैयार किया गया है। अनुमान है कि चीन ने सैकड़ों पुराने विमानों को इस तरह अपग्रेड किए है, जिन्हें ताइवान के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है।

जे-6 चीन का दूसरा पीढ़ी का सुपरसोनिक लड़ाकू विमान था। इसकी अधिकतम रफ्तार मैक 1.3 थी और यह 700 किलोमीटर की रेंज तक उड़ सकता था। 1960 से लेकर 1980 के दशक तक चीन ने इनकी हजारों यूनिट बनाई। लेकिन जब जे-10, जे-11 और जे-20 जैसे आधुनिक विमान आए, तो यह मॉडल पुराना हो गया।

हालांकि, चीन ने इन विमानों को पूरी तरह कबाड़ नहीं किया। बीते दो दशकों में इन्हें सुरक्षित रूप से एयरबेस पर रखा गया और अब बड़ी संख्या में इन्हें ड्रोन में बदला जा रहा है।

कैसे किया ट्रांसफॉर्मेशन?

ड्रोन ट्रांसफॉर्मेशन की प्रक्रिया में सबसे पहले पायलट से जुड़ी सभी चीजें हटा दी गईं। कॉकपिट, कैनन, सहायक ईंधन टैंक और इजेक्शन सीट को निकाल दिया गया। इसके बाद इन विमानों को आधुनिक ऑटोपायलट सिस्टम, टेर्रेन-मैचिंग नेविगेशन, और अटोनॉमस फ्लाइट कंट्रोल से लैस किया गया।

इसके अलावा, नए वेपन स्टेशन जोड़े गए, ताकि ये विमानों की तरह हथियार ले जा सकें। कुछ विमानों को कामिकाजे ड्रोन के तौर पर तैयार किया गया है, जो एकतरफा हमलों में इस्तेमाल होंगे।

चीन का उद्देश्य ताइवान पर दबाव बनाना है। जे-6 ड्रोन बड़े पैमाने पर स्वॉर्म अटैक में इस्तेमाल किए जा सकते हैं। जब सैकड़ों पुराने जे-6 ड्रोन एक साथ उड़ान भरेंगे, तो ताइवान के एयर डिफेंस सिस्टम पर भारी दबाव पड़ेगा।

यह ड्रोन ताइवान के रडार और मिसाइल रक्षा सिस्टम को भ्रमित कर सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ताइवान इन ड्रोन को रोकने के लिए महंगे पैट्रियॉट मिसाइल इंटरसेप्टर्स का इस्तेमाल करेगा, तो उसका स्टॉक जल्दी खत्म हो जाएगा। इसके बाद चीन के आधुनिक जे-20 और जे-35 लड़ाकू विमान आसानी से हमला कर सकेंगे।

एट्रिशन वारफेयर टेक्निक

रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि चीन के पास लगभग 3,000 पुराने जे-6 विमान अब भी स्टोरेज में हैं। इनमें से सैकड़ों पहले ही ड्रोन में बदले जा चुके हैं। हालांकि जे-6 ड्रोन आधुनिक विमानों की तुलना में धीमे और पुराने हैं, लेकिन इनकी खासियत यह है कि ये सस्ते और बड़ी संख्या में उपलब्ध हैं। यही कारण है कि इन्हें एट्रिशन वारफेयर यानी थकाऊ युद्ध की रणनीति में इस्तेमाल किया जाएगा। इनकी मदद से चीन दुश्मन को अपने एयर डिफेंस सिस्टम को लगातार इस्तेमाल करने पर मजबूर करेगा।

एचएएल और बीईएल मिलकर कर सकते हैं ट्रांसफॉर्मेशन

वहीं, भारत में इस ट्रांसफॉर्मेशन को एचएएल और बीईएल मिलकर कर सकते हैं। एचएएल को MiG-21 के मैंटेनेंस का दशकों का अनुभव है, जबकि बीईएल की विशेषज्ञता राडार और टेलिमेट्री सिस्टम में है। डीआरडीओ इस प्रोजेक्ट का तकनीकी नेतृत्व कर सकता है।

जानकारों के अनुसार, एक मिग-21 को टारगेट ड्रोन में बदलने की लागत लगभग 5 से 10 करोड़ रुपये होगी। वहीं, अगर इन्हें UCAV यानी कॉम्बैट ड्रोन में बदला जाए तो लागत 50 से 100 करोड़ रुपये तक जा सकती है। इसके मुकाबले एक नए एमक्यू-9बी जैसे ड्रोन की कीमत कई सौ करोड़ रुपये है।

कर सकते हैं मिसाइलों की टेस्टिंग

वहीं, भारत अभी नई पीढ़ी की एयर डिफेंस मिसाइलों डेवलप कर रहा है। इनमें आकाश-एनजी, क्यूआरएसएएम और एक्सआरएसएएम शामिल हैं। इन मिसाइलों को टेस्ट करने के लिए ऐसे टारगेट्स की जरूरत होती है जो तेज गति से उड़ने वाले दुश्मन विमानों जैसी चुनौती पेश कर सकें।

मैक-2 की रफ्तार और 17 किलोमीटर की ऊंचाई तक उड़ने की क्षमता वाले मिग-21 बाइसन इस काम के लिए बिल्कुल उपयुक्त हैं। जब इन्हें ड्रोन में बदला जाएगा तो ये रीयल टाइम वॉर जैसी स्थिति पैदा कर सकते हैं, जिससे मिसाइलों की सही क्षमता का पता लगाया जा सकेगा।

ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान ने तुर्की के बायरकटार टीबी2 जैसे ड्रोन का इस्तेमाल किया था। वहीं, चीन बड़े पैमाने पर पुराने विमानों को ड्रोन में बदलकर उन्हें स्वॉर्म अटैक्स के लिए तैयार कर रहा है। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह ऐसे प्रयोग करे जिससे उसकी ड्रोन और एयर डिफेंस क्षमता दोनों मजबूत हों। मिग-21 को ड्रोन में बदलना इस दिशा में एक ब्रिज कैपेबिलिटी साबित हो सकता है, जब तक कि डीआरडीओ के तापस और घातक जैसे प्रोजेक्ट पूरी तरह से ऑपरेशनल न हो जाएं।

97 LCA Mk1A Deal: रक्षा मंत्रालय ने किया 97 तेजस LCA Mk1A के लिए HAL के साथ करार, 2027-28 से शुरू होगी डिलीवरी

97 LCA Mk1A Deal

97 LCA Mk1A Deal: रक्षा मंत्रालय ने गुरुवार को हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ 97 एलसीए एमके1ए (LCA Mk1A) विमान की खरीद के लिए 62,370 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत किए हैं। इन विमानों में 68 लड़ाकू और 29 ट्विन-सीटर शामिल हैं।

इस डील के मुताबिक इन विमानों की डिलीवरी 2027-28 से शुरू होगी और अगले छह सालों में पूरी की जाएगी। इस बीच एचएएल अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी काम करेगा, ताकि वायुसेना की ज़रूरतें समय पर पूरी हो सकें।

नए कॉन्ट्रैक्ट के तहत एचएएल को यह सुनिश्चित करना होगा कि विमानों में 64 फीसदी से ज्यादा स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया जाए। इसके लिए 67 अतिरिक्त स्वदेशी आइटम जोड़े गए हैं, जो पहले जनवरी 2021 में हुए कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा नहीं थे।

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तेजस एमके1ए अपने पुराने वैरिएंट के मुकाबले में काफी एडवांस है। इसमें उत्तम एईएसए (Active Electronically Scanned Array) रडार भी लगाया जाएगा। इसके साथ स्वयम् रक्षा कवच (Swayam Raksha Kavach) और कंट्रोल सरफेस एक्ट्यूएटर्स जैसी स्वदेशी सिस्टम भी इसमें लगाए जाएंगे।

उत्तम एईएसए रडार दुश्मन के विमानों और मिसाइलों को दूर से ही ट्रैक करने में सक्षम है और मल्टी-टारगेट एंगेजमेंट की सुविधा देता है। गैलियम आर्सेनाइड बेस्ड यह रडार 150 किलोमीटर से दूर से ही ट्रैक कर सकता है और 50 से अधिक टारगेट्स को 100 किलोमीटर से अधिक दूरी पर ट्रैक कर सकता है। वहीं एलसीए एमके2 में एडवांस गैलियम नाइट्राइड रडार लगाया जाएगा, जो 180-200 किलोमीटर की रेंज तक ट्रैक कर सकताा है।

वहीं, स्वयम् रक्षा कवच मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम और काउंटरमेजर्स से लैस है, जो विमान को दुश्मन की मिसाइल से बचाने में मदद करता है।

इस प्रोजेक्ट में करीब 105 भारतीय कंपनियां शामिल होंगी, जो विभिन्न कंपोनेंट्स और इक्विपमेंट्स बनाएंगी। इस वजह से अगले छह साल तक हर साल लगभग 11,750 सीधी और अप्रत्यक्ष नौकरियां पैदा होंगी। यह भारतीय एयरोस्पेस सेक्टर को नई ऊर्जा देगा और निजी क्षेत्र की कंपनियों को भी रक्षा निर्माण में बड़ा योगदान करने का अवसर मिलेगा।

वहीं यह कॉन्ट्रैक्ट रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 की ‘बॉय (India-IDDM)’ कैटेगरी के अंतर्गत किया गया है। इस श्रेणी का उद्देश्य है कि रक्षा जरूरतों के लिए अधिक से अधिक स्वदेशी उत्पाद तैयार किए जाएं। आईडीडीएम (Indigenously Designed, Developed and Manufactured) कैटेगरी में आने वाले उत्पाद पूरी तरह भारत में डिजाइन और विकसित होते हैं।

97 LCA Mk1A Deal

यह डील इसलिए भी अहम है क्योंकि 26 सितंबर के बाद जब मिग-21 रिटायर हो जाएंगे तो भारतीय वायुसेना के पास केवल 29 स्क्वाड्रन ही रह जाएंगे। वहीं पाकिस्तान के पास वर्तमान में लगभग 25 लड़ाकू स्क्वॉड्रन हैं और वह चीन से 40 जे-35ए पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हासिल करने की तैयारी कर रहा है। चीन पहले से ही भारत से कई गुना अधिक फाइटर जेट, बॉम्बर और फोर्स-मल्टीप्लायर ऑपरेट कर रहा है। ऐसे में भारतीय वायुसेना के लिए नए लड़ाकू विमानों की जरूरत और भी अहम हो जाती है।

मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर ने यह साफ कर दिया कि भारतीय वायुसेना को नई तकनीकों और बड़ी संख्या में लड़ाकू विमानों की जरूरत है। उस दौरान पाकिस्तान ने चीन के बने जे-10 विमानों का इस्तेमाल किया था, जो पीएल-15 जैसे 200 किलोमीटर रेंज वाले बियॉन्ड विजुअल रेंज (BVR) एयर-टू-एयर मिसाइल से लैस थे। वायुसेना की इंटरनल रिव्यू रिपोर्ट में कहा गया है कि दो फ्रंच मोर्चों को देखते हुए भारत को 50 से ज्यादा अधिक स्क्वॉड्रन और लेटेस्ट टेक्नोलॉजी से लैस विमानों की तुरंत जरूरत है।

वहीं, वायुसेना की जरूरतों को देखते हुए एलसीए तेजस का डेवलपमेंट और प्रोडक्शन बेहद धीमी रफ्तार से चल रहा है। 2021 में 83 तेजस एमके1ए विमानों के लिए 46,898 करोड़ रुपये की डील हुई थी। लेकिन अभी तक भारतीय वायुसेना को पहला विमान भी नहीं मिला। हालांकि, एचएएल का दावा है कि अक्टूबर 2025 में शुरुआती दो विमान वायुसेना की डिलीवरी कर देगा।

इसमें अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक की बड़ी भूमिका है, जिसने अगस्त 2021 में 5,375 करोड़ रुपये की सौदे के तहत 99 जीई-एफ404 टर्बोफैन इंजन देने का करार किया था। अब तक तीन इंजन भारत पहुंच चुके हैं और साल के अंत तक सात और आने की उम्मीद है। आने वाले सालों में हर साल 20 इंजन दिए जाएंगे। नए 97 विमानों के लिए एएचएल को 113 और इंजन खरीदने होंगे, जिसकी लागत करीब 1 अरब डॉलर होगी।

एचएएल ने भरोसा दिलाया है कि वह धीरे-धीरे उत्पादन दर को बढ़ाकर हर साल 20 विमान बनाएगा और फिर इसे 24 से 30 विमानों तक ले जाएगा। इसके लिए नासिक में तीसरी प्रोडक्शन लाइन शुरू की जा चुकी है, जो बेंगलुरु की दो मौजूदा लाइनों के साथ मिलकर काम करेगी। इसके अलावा निजी क्षेत्र की कंपनियों की सप्लाई चेन भी एचएएल को मदद करेगी।

वहीं, भारतीय वायुसेना इन विमानों को डिलीवरी तभी करेगी जब एस्ट्रा वीवीआर मिसाइल, शॉर्ट-रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल और लेजर-गाइडेड बम जैसे हथियारों के फायरिंग ट्रायल सफलतापूर्वक पूरे हो जाएंगे। इसके अलावा इजरायली एल्टा ELM-2052 रडार और फायर कंट्रोल सिस्टम का इंटीग्रेशन भी पूरी तरह से सर्टिफाइड होना जरूरी है।

ALG On LaC: भारत-चीन सीमा पर सरकार करने जा रही बड़ी तैयारी, ड्रैगन से बढ़ते खतरे को देखते हुए दो पुराने एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड फिर होंगे एक्टिव!

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ALG On LaC: चीन से बढ़ते खतरे को देखते हुए रक्षा मंत्रालय ने दो पुराने एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड को फिर से तैयार करने का फैसला किया है। इनमें पहला चुशूल में है, जो पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा यनी एलएसी के पास स्थित है, और दूसरा अरुणाचल प्रदेश के दूरस्थ इलाके अनीनी में है। दोनों एयरस्ट्रिप सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं और इनके फिर तैयार होने से भारतीय वायुसेना और थलसेना की क्षमताएं मजबूत होंगी।

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ALG On LaC: 1962 की जंग में फोकस में था चुशूल

पूर्वी लद्दाख में स्थित चुशूल समुद्र तल से करीब 14,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह जगह एलएसी से महज चार किलोमीटर पश्चिम में है। इस इलाके में यही समतल जमीन है, जो एयरस्ट्रिप के लिए मुफीद है।

वहीं, चूशुल 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान ऐतिहासिक भूमिका निभा चुका है। रक्षा मंत्रालय की 1993 में जारी एक “सीक्रेट हिस्ट्री” रिपोर्ट में उल्लेख है कि 25 अक्टूबर 1962 को सोवियत मूल के एएन-12 विमान ने चंडीगढ़ से चुशूल तक एएमएक्स-13 टैंकों और 25-पाउंडर गनों को पहुंचाया था। जिसके बाद टैंकों और गनों ने जंग का रुख बदल दिया था और भारतीय सैनिकों को निर्णायक बढ़त दी थी।

हालांकि, युद्ध के बाद चुशूल की एयरस्ट्रिप बेकार पड़ी रही। समय-समय पर इसे फिर से एक्टिव करने का प्रस्ताव आया, लेकिन चीन की संवेदनशीलता और सीमा पर तनाव को देखते हुए इसे आगे नहीं बढ़ाया गया। अब रक्षा मंत्रालय ने इसे दोबारा डेवलप करने का फैसला लिया है, ताकि यहां से ड्रोन, हेलिकॉप्टर और स्पेशल मिशनों के लिए एयरबस सी-295 और सी-130जे जैसे लॉजिस्टिक एयरक्राफ्ट ऑपरेट किए जा सकें।

ALG On LaC: अरुणाचल का भूला-बिसरा एयरस्ट्रिप अनीनी

अरुणाचल प्रदेश के दिबांग वैली जिले में स्थित अनीनी भारत-चीन सीमा के पूर्वी छोर पर पड़ता है और सामरिक दृष्टि से बेहद अहम है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहां से अंग्रेज चीन तक सप्लाई पहुंचाने का इसे स्टेजिंग ग्राउंड की तरह यूज करते थे। उस समय सहयोगी सेनाओं के विमान हिमालय के ऊपर से होकर उड़ान भरते थे। इस मार्ग को “द हंप” कहा जाता था, क्योंकि इसमें ऊंचे पर्वतों को पार करना पड़ता था।

आजादी के बाद भारतीय वायुसेना ने यहां मिट्टी से बना रनवे तैयार किया, लेकिन उसका इस्तेमाल नहीं हुआ। अब अरुणाचल प्रदेश सरकार ने केंद्र से मांग की थी कि इस एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड यानी एएलजी को दोबारा से डेवलप किया जाए। यहां 1.5 किलोमीटर लंबा रनवे पहले से मौजूद है, जिसे वायुसेना और थलसेना के इस्तेमाल के लिए तैयार किया जाएगा। हाल ही में वायुसेना और रक्षा मंत्रालय की एक टीम ने इस जगह का सर्वे भी किया था।

ALG On LaC: क्या है एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड

एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड एक मिलिट्री टर्म है, जो सीमा के पास मौजूद कच्ची या पक्की हवाई पट्टियों के लिए इस्तेमाल होता है। ये एयरस्ट्रिप फॉरवर्ड मोर्चे पर सैनिकों और सप्लाई पहुंचाने के लिए इस्तेमाल होती हैं। वहीं, एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड को एक्टिव करने का मतलब है कि यहां रनवे बनाने के अलावा एक छोटी यूनिट को तैनात करनी पड़ी, विमानों और हेलिकॉप्टरों की लैंडिंग-टेकऑफ के लिए गाइडेंस सिस्टम लगाना और धीरे-धीरे बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत भी करना होगा। इसमें फ्यूल स्टोरेज, कम्यूनकेशन सिस्टम और सैनिकों की अस्थायी तैनाती की सुविधाएं शामिल होती हैं।

पिछले बीस सालों में भारत ने कई पुराने एएलजी को दोबारा सक्रिय किया है। लद्दाख में दौलत बेग ओल्डी और न्योमा जैसे एएलजी पहले ही फिर से चालू हो चुके हैं। इनमें से न्योमा एएलजी को अब पूर्ण एयरबेस में बदलने की प्रक्रिया चल रही है, और अगले महीने से इसे औपचारिक तौर पर ऑपरेशनल किया जाएगा।

अरुणाचल प्रदेश में भी सात एएलजी को रनवे में बदला गया है। इनमें अलोंग, मेचुका, पासीघाट, तूतिंग, विजयनगर, वालोंग और जीरो शामिल हैं। इन जगहों से न केवल सैन्य विमान बल्कि सिविलियन ट्रैफिक भी चलता है, जिससे स्थानीय आबादी को भी फायदा मिलता है।

रक्षा मंत्रालय ने इसे भारतीय वायुसेना के “फ्यूचर रोडमैप” का हिस्सा बताया है। मंत्रालय के अनुसार, चुशूल और अनीनी दोनों ही जगहें यूएवी, हेलिकॉप्टर और स्पेशल एयरक्राफ्ट ऑपरेशन के लिए उपयुक्त हैं। मंत्रालय का मानना है कि इन एयरस्ट्रिप्स को सक्रिय करने से भारत की रणनीतिक पहुंच बढ़ेगी और दुश्मन की गतिविधियों पर बेहतर नजर रखी जा सकेगी।

Stealth Fighter AMCA: स्वदेशी फिफ्थ जनरेशन एयरक्राफ्ट बनाने में बढ़ रही है कंपनियों की दिलचस्पी, लार्सन एंड टुब्रो और बीईएल ने की साझेदारी

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Stealth Fighter AMCA: लार्सन एंड टुब्रो और सरकारी डिफेंस कंपनी भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड दोनों मिल कर महत्वाकांक्षी फिफ्थ-जेनरेशन स्टेल्थ फाइटर जेट प्रोजेक्ट यानी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) डेवलपमेंट प्रोग्राम में हिस्सा लेंगे। लार्सन एंड टुब्रो ने घोषणा करते हुए कहा कि कंपनी बीईएल के साथ मिलकर भारत के स्वदेशी स्टेल्थ फाइटर जेट के विकास में हिस्सा लेगी। दोनों कंपनियां मिलकर प्रोटोटाइप निर्माण, फ्लाइट टेस्ट और सर्टिफिकेशन में योगदान देंगी। इसके लिए वे एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी को अपने एक्सप्रेशन ऑफ इंट्रेस्ट (ईओआई) का जवाब देंगी।

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डीआरडीओ का विंग एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी यानी एडीए एएमसीए प्रोग्राम को इंडस्ट्री पार्टनरशिप मॉडल के जरिए आगे बढ़ा रही है। जून 2025 में एडीए ने ईओआई जारी किया था ताकि निजी और सरकारी भारतीय कंपनियों को इस प्रोजेक्ट में शामिल किया जा सके। कंपनियों को 30 सितंबर तक अपना प्रस्ताव जमा करना होगा।

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एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए भारत का फिफ्थ-जेनरेशन स्टेल्थ फाइटर जेट प्रोग्राम है। यह विमान अत्याधुनिक स्टेल्थ तकनीक, सुपरक्रूज क्षमता, एडवांस्ड सेंसर फ्यूजन और मल्टीरोल ऑपरेशंस के लिए डिजाइन किया गया है। इसे भारतीय वायुसेना के पुराने विमानों जैसे मिग-29 और मिराज-2000 से रिप्लेस किया जाएगा। इस प्रोजेक्ट के तहत 2029 तक पहली प्रोटोटाइप उड़ान होगी। वहीं, 2034 तक इसका डेवलपमेंट वर्क पूरा किए जाने की उम्मीद है। जिसके बाद इसका उत्पादन शुरू होगा। एएमसीए को पांचवीं पीढ़ी की क्षमता से लैस किया जाएगा, और भविष्य में इसे छठी पीढ़ी की कुछ विशेषताओं तक अपग्रेड करने की योजना है।

लार्सन एंड टुब्रो का डिफेंस और एयरोस्पेस सेक्टर में अच्छा अनुभव है। कंपनी ने सबमरीन, वॉरशिप, मिसाइल लॉन्चर और विभिन्न स्ट्रैटेजिक प्लेटफॉर्म डेवलप किए हैं। दूसरी तरफ बीईएल डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स और सिस्टम्स में एक्सपर्ट है और रडार, एवियोनिक्स और कम्युनिकेशन सिस्टम्स के लिए जानी जाती है।

दोनों कंपनियां मिलकर एएमसीए के डिजाइन, उपकरण, इंटीग्रेशन, इंजीनियरिंग, टेस्टिंग और क्वालिटी मैनेजमेंट में योगदान करेंगी।

एलएंडटी के चेयरमैन एस. एन. सुब्रमण्यम ने कहा कि यह साझेदारी भारत की रक्षा क्षमताओं को आधुनिक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है और बीईएल के साथ मिलकर काम करना हमारे लिए गर्व की बात है।

वहीं, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक मनोज जैन ने कहा, “एएमसीए परियोजना रक्षा प्रौद्योगिकी में भारत की बढ़ती क्षमताओं का प्रतिनिधित्व करती है। एलएंडटी के साथ हमारा सहयोग इस दृष्टिकोण को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।”

एएमसीए प्रोजेक्ट में एल एंड टी और बीईएल अकेले खिलाड़ी नहीं हैं। एडीए को और भी कई बड़ी कंपनियों से एक्सप्रेशन ऑफ इंट्रेस्ट मिले हैं, जिनमें अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस, महिंद्रा ग्रुप, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और दूसरी निजी कंपनियां भी शामिल हैं।

अब एडीए इन कंपनियों का मूल्यांकन करेगी और इसके बाद शॉर्टलिस्टेड कंपनियों को रिक्वेस्ट फॉर कोटेशन (RFQ) जारी किया जाएगा। इस प्रक्रिया से यह तय होगा कि कौन सी कंपनियां एचएएल के साथ मिलकर एएमसीए का निर्माण करेंगी।

इससे पहले तक माना जा रहा था कि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड इस प्रोजेक्ट की मुख्य कंपनी होगी। लेकिन मई 2025 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इंडस्ट्री पार्टनरशिप मॉडल को मंजूरी देकर नए रास्ते खोल दिए। इस मॉडल से न केवल एएचएल बल्कि निजी कंपनियों को भी बराबरी का मौका मिलेगा।

एएचएल ने भी इस प्रोजेक्ट के लिए कई निजी कंपनियों से संपर्क किया है और एएचएल ने एक कमेटी का गठन किया है, जो इन कंपनियों में से दो को शॉटलिस्ट करेगी।

AMCA की खूबियां

एएमसीए स्टेल्थ डिजाइन, डेल्टा विंग कॉन्फिगरेशन और ट्विन-इंजन पावर से लैस होगा। इसमें AESA राडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम्स, ड्यूल-रिडंडेंट नेविगेशन और कैनिस्टराइज्ड वेपन सिस्टम होंगे। यह विमान सुपरसोनिक स्पीड के बिना आफ्टरबर्नर के सुपरक्रूज कर सकेग। इसका कॉम्बैट रेडियस 1,500 किलोमीटर से अधिक होगा और इसमें परमाणु और पारंपरिक दोनों हथियार ले जाने की क्षमता होगी। इसे भविष्य में ड्रोन टीमिंग और नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर के लिए भी तैयार किया जाएगा।

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Agni-Prime Missile: डीआरडीओ ने गुरुवार को ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए अग्नि-प्राइम मिसाइल का सफल परीक्षण किया। ये परीक्षण इसलिए भी खास है क्योंकि पहली बार इस मिसाइल को रेल-आधारित मोबाइल लॉन्चर से लॉन्च किया गया। यह परीक्षण डीआरडीओ और स्ट्रैटेजिक फोर्सेसज कमांड के सथ मिल कर किया गया। वहीं, इस उपलब्धि के बाद भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया है जिनके पास कैनिस्टराइज्ड रेल नेटवर्क से मिसाइल लॉन्च करने की क्षमता है।

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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफलता को “ऐतिहासिक क्षण” बताते हुए डीआरडीओ, स्ट्रैटेजिक फोर्सेसज कमांड और भारतीय सशस्त्र बलों को बधाई दी। रक्षा मंत्रालय ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि यह परीक्षण भारत की सामरिक क्षमताओं को और मजबूती देगा और भविष्य की सैन्य रणनीतियों के लिए निर्णायक साबित होगा।

Agni-Prime Missile: क्या है अग्नि-प्राइम मिसाइल?

अग्नि-प्राइम मिसाइल भारत की अग्नि सीरीज की नई पीढ़ी की मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है। इसे 1,000 से 2,000 किलोमीटर की दूरी तक मार करने के लिए डिजाइन की गई है। यह मिसाइल परमाणु और पारंपरिक दोनों तरह के हथियार ले जाने में सक्षम है।

यह अग्नि-I और अग्नि-II का अपग्रेड वर्जन है, लेकिन उससे हल्की, अधिक सटीक और तकनीकी रूप से एडवांस है। अग्नि-प्राइम का वजन लगभग 11,500 किलोग्राम है, जो अग्नि-III की तुलना में लगभग आधा है। इसके कैनिस्टराइज्ड डिजाइन के चलते इसे लंबे समय तक स्टोर करने और किसी भी समय तुरंत लॉन्च किया जा सकता है।

रेल-बेस्ड मोबाइल लॉन्चर क्यों है खास?

इस परीक्षण की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पहली बार अग्नि-प्राइम को रेल-आधारित मोबाइल लॉन्चर से छोड़ा गया। यह लॉन्चर भारतीय रेल नेटवर्क पर बिना किसी विशेष तैयारी के आसानी से लॉन्च किया जा सकता है।

रेल-आधारित लॉन्चर पूरी तरह से सेल्फ-कंटेंड सिस्टम है। इसमें आधुनिक संचार उपकरण, सुरक्षा प्रणाली और स्वतंत्र रूप से लॉन्च करने की क्षमता मौजूद है। यह मिसाइल को कम समय में तैयार कर सकता है और लॉन्च कर सकता है, जिससे भारत तुरंत जवाबी कार्रवाई कर सकता है।

भारत का रेलवे सिस्टम दुनिया के सबसे बड़े नेटवर्क में से एक है, जिसकी कुल लंबाई 69,181 किमी है। वहीं, भारत चीन सीमा के आसपास रेल नेटवर्क को तेजी से बढ़ा रहा है। यहां रेल नेटवर्क मुख्य रूप से पूर्वोत्तर राज्यों (नॉर्थईस्ट फ्रंटियर रेलवे) के जिम्मे है, जहां 2025 में 500 किमी नई लाइनें बनाने की योजना है। यहां एलएसी से 100 से 200 किमी तक सटे इलाकों में पहले से 800-1,000 किमी का रेल नेटवर्क मौजूद है। वहीं, एलएसी से सटे सिक्कम में नाथू ला और अरुणाचल में तवांग तक कई इलाकों को रेल नेटवर्क से जोड़ने की योजना है। जिसके बाद चीन के 10 से 12 शहर अग्निप्रााइम की रेंज में आ जाएंगे। अग्नि-प्राइम मिसाइल चीन के पश्चिमी क्षेत्रों में तैनात मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।

रेल नेटवर्क का उपयोग मिसाइल को देश के किसी भी हिस्से तक ले जाने में मदद करता है, जिससे दुश्मनों के लिए इसे ट्रैक करना और नष्ट करना बेहद मुश्किल हो जाता है। इसे ले जाने वाली खास ट्रेनें टनलों में छिप सकती हैं। जिससे ये किसी की नजर में नहीं आती। यह तकनीक भारत की रक्षा रणनीति में “गेम चेंजर” साबित हो सकती है।

बताया “टेक्स्ट बुक लॉन्च”

24 सितंबर को किए गए परीक्षण के दौरान मिसाइल की ट्रैजेक्टरी (trajectory) को कई ग्राउंड स्टेशनों से ट्रैक किया गया। डीआरडीओ के वरिष्ठ वैज्ञानिकों और स्ट्रैटेजिक फोर्सेसज कमांड के अधिकारियों ने इस लॉन्च को देखा और इसे “टेक्स्ट बुक लॉन्च” बताया, यानी यह पूरी तरह सफल रहा और मिशन के सभी उद्देश्यों को हासिल किया गया।

2,000 किलोमीटर तक की रेंज के साथ यह मिसाइल पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देशों तक मार करने में सक्षम है। रेल-आधारित लॉन्चर से तैनाती से भारत की सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी मजबूत होगी। वहीं, परमाणु युद्ध की स्थिति में यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इससे भारत दुश्मन के पहले हमले के बाद भी प्रभावी जवाब दे सकता है।

इससे पहले अग्नि-प्राइम का पहला सफल परीक्षण 28 जून 2021 को ओडिशा के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से किया गया था। इसके बाद दिसंबर 2021, जून 2023 और अप्रैल 2024 में भी सफल उड़ान परीक्षण हुए। सड़क-आधारित मोबाइल लॉन्चर से यह मिसाइल पहले ही सेना में शामिल की जा चुकी है। लेकिन रेल-आधारित लॉन्चर से यह पहला परीक्षण था।

अग्नि-प्राइम की खूबियां

अग्नि-प्राइम मिसाइल को कई एडवांस टेक्नोलॉजी से लैस किया गया है। हल्के डिजाइन होने की वजह से इसे ले जाना आसान है। इसमें डुअल रिडंडेंट नेविगेशन सिस्टम लगाया गया है, जिसमें आईएनएस, जीपीएस और आईआरएनएसएस शामिल हैं। इसके कारण इसका सर्कुलर एरर प्रोबेबल (सीईपी) 10 मीटर से भी कम है, यानी यह अपने लक्ष्य को बहुत सटीकता से भेद सकती है।

मिसाइल में मैन्यूवरेबल री-एंट्री व्हीकल (MaRV) तकनीक है, जो इसे दुश्मन के मिसाइल डिफेंस सिस्टम से बचने में सक्षम बनाती है। इसमें थ्रस्टर या एयरोडायनामिक कंट्रोल सिस्टम होते हैं, जिससे यह मिसाइल वायुमंडल में पुनः प्रवेश के दौरान अपनी दिशा बदल सकती है। यह दो चरणों में सॉलिड ईंधन पर चलती है। इस मिसाइल को कैनिस्टर में स्टोर किया जाता है। जिससे यह मौसम और बाहरी खतरों से बची रहती है और साथ ही इसे फटाफट लॉन्च किया जा सकता है।

किन-किन देशों के पास है यह सुविधा

रेल-बेस्ड लॉन्चर सिस्टम बहुत कम देशों के पास है। रूस ने 1980 में आरटी-23 मिसाइल के लिए इसका इस्तेमाल किया था। चीन के पास डीएफ-41 मिसाइल का रेल वर्जन है। डीएफ-41 आईसीबीएम के रेल वर्जन को 2015-2016 में टेस्ट किया गया था। यह सॉलिड-फ्यूल्ड और मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल री-एंट्री व्हीकल (MIRV) तकनीक से लैस है। MIRV की खासियत है कि एक मिसाइल कई वारहेड्स ले जा सकती है, और प्रत्येक वारहेड को अलग-अलग टारगेट्स पर निशाना बनाने की क्षमता होती है। इसे पीएलए की रॉकेट फोर्स ऑपरेट करती है।

वहीं, उत्तर कोरिया ने 15 सितंबर, 2021 में ह्वासोंग-11A मिसाइल को रेल से छोड़ा था। जिसे रेलवे-बोर्न मिसाइल रेजिमेंट ने ऑपरेट किया था। वहीं, पाकिस्तान के पास अभी ऐसी कोई सुविधा नहीं है और वह अभी भी रोड बेस्ड मिसाइलों पर ही निर्भर है।

Indian Army Recruitment Rally: दिल्ली से द्वीप पहल के तहत भारतीय सेना आयोजित कर रही है भर्ती रैली, यहां पढ़ें पूरी जानकारी

Indian Army Recruitment Rally

Indian Army Recruitment Rally: भारतीय सेना ने पहली बार अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में बड़े स्तर पर भर्ती रैलियों का आयोजन करने का ऐलान किया है। इसे “दिल्ली से द्वीप” नाम दिया गया है। इस पहल का उद्देश्य देश के सबसे दूरदराज इलाकों तक समान अवसर पहुंचाना और युवाओं को सेना में शामिल होने का मौका देना है।

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जोनल रिक्रूटिंग ऑफिस, चेन्नई ने जानकारी दी है कि भर्ती रैली अक्टूबर 2025 में आयोजित होगी। उत्तर, मध्य और दक्षिण अंडमान जिले के उम्मीदवारों के लिए रैली 8 से 10 अक्टूबर तक श्री विजया पुरम के नेताजी स्टेडियम में होगी। वहीं, निकोबार जिले के युवाओं के लिए 14 और 15 अक्टूबर को ग्रेट निकोबार के कैंपबेल बे में मिनी स्पोर्ट्स स्टेडियम में आयोजन होगा।

Indian Army Recruitment Rally: कौन-कौन से पदों पर भर्ती

यह रैली अग्निवीर जनरल ड्यूटी, अग्निवीर ऑफिस असिस्टेंट और स्टोर कीपर टेक्निकल, अग्निवीर टेक्निकल, अग्निवीर ट्रेड्समैन (10वीं और 8वीं पास), सिपाही फार्मेसी, सोल्जर टेक्निकल नर्सिंग असिस्टेंट/वेटरनरी नर्सिंग असिस्टेंट और अग्निवीर (महिला) मिलिट्री पुलिस जैसे पदों पर भर्ती के लिए होगी। यह कदम अंडमान-निकोबार के युवाओं को मुख्यधारा में शामिल करने की बड़ी कोशिश है।

ऑनलाइन परीक्षा से शॉर्टलिस्टिंग

सेना ने स्पष्ट किया है कि इन रैलियों के लिए उम्मीदवारों को पहले ऑनलाइन कॉमन एंट्रेंस एग्जामिनेशन (CEE) के जरिए शॉर्टलिस्ट किया गया है। इसके बाद ही उन्हें भर्ती रैली में बुलाया जाएगा। सभी उम्मीदवारों के लिए एडमिट कार्ड अगस्त 2025 के आखिरी सप्ताह में जारी होंगे। उम्मीदवारों को सलाह दी गई है कि वे नियमित रूप से वेबसाइट और अपनी ईमेल जांचते रहें ताकि समय पर अपडेट मिल सके। वहीं भर्ती से जुड़ी किसी भी तरह की शंका या मदद के लिए उम्मीदवार सीधे “भर्ती कार्यालय (मुख्यालय), चेन्नई, फोर्ट सेंट जॉर्ज कॉम्प्लेक्स, चेन्नई – 600009, फोन नं- 044-25674924” से संपर्क कर सकते हैं।

जरूरी दस्तावेज और नियम

उम्मीदवारों को भर्ती स्थल पर पहुंचते समय अपने सभी दस्तावेज साथ लाने होंगे। सेना ने चेतावनी दी है कि अधूरे दस्तावेज या गलत फॉर्मेट वाले कागजात (खासतौर पर हलफनामा) के बिना किसी को रैली में शामिल नहीं किया जाएगा। सभी जरूरी दस्तावेजो का विवरण और फॉर्मेट सेना की आधिकारिक वेबसाइट [www.joinindianarmy.nic.in](http://www.joinindianarmy.nic.in) पर उपलब्ध है।

सेना ने दोहराया है कि भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह ऑटोमेटेड और पारदर्शी है। किसी भी एजेंट या दलाल का इसमें कोई रोल नहीं है। उम्मीदवारों से कहा गया है कि वे मेहनत और तैयारी के बल पर चयन की कोशिश करें और धोखाधड़ी करने वालों से दूर रहें।

भारतीय सेना की यह पहल न सिर्फ रोजगार का अवसर है, बल्कि अनुशासन, सम्मान और देश सेवा की राह भी खोलती है। “दिल्ली से द्वीप” पहल को राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बताया जा रहा है। अंडमान और निकोबार जैसे दूरस्थ क्षेत्रों के युवाओं के लिए यह ऐतिहासिक मौका है, जहां वे अपने ही द्वीप पर भर्ती रैली में शामिल होकर भारतीय सेना का हिस्सा बन सकते हैं।

FCAS dispute: क्या AMCA की वजह से खटाई में पड़ा फ्रांस, जर्मनी और स्पेन का छठी पीढ़ी का फाइटर जेट प्रोजेक्ट, तीनों देशों में क्यों छिड़ी रार?

FCAS dispute
France Germany fighter jet dispute

FCAS dispute: एक तरफ चीन जहां अपने छठवीं पीढ़ी के फाइटर जेट चेंगदू जे-36 और शेनयांग जे-50 के प्रोटोटाइप की टेस्टिंग करने में जुटा है, तो वहीं यूरोपीय देशों में अभी छठवीं पीढ़ी के फाइटर जेट बनाने को लेकर तू-तू मैं-मैं छिड़ी हुई है। यूरोप की सबसे बड़े डिफेंस प्रोजेक्ट्स में शामिल फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) को लेकर इन दिनों रार छिड़ी हुई है। इस प्रोजेक्ट के तहत 2040 तक यूरोप की एयर फोर्स के लिए छठवीं पीढ़ी का फाइटर जेट तैयार करना है। वहीं इस प्रोजेक्ट में फ्रांस की दसॉ एविएशन, जर्मनी स्पेन की एयरबस शामिल है। लेकिन इन तीनों के बीच कलह ठन गई है और ये प्रोजेक्ट खत्म होने की कगार पर खड़ा है।

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इस प्रोजेक्ट का मकसद था कि यूरोप अपने दम पर छठवीं पीढ़ी का एक ऐसा फाइटर जेट बनाए जो दुनिया की सबसे आधुनिक तकनीकों से लैस हो। इस विमान को मानवयुक्त लड़ाकू विमानों के साथ ही स्वार्मिंग ड्रोंस और डिजिटल कॉम्बैट क्लाउड से जोड़ा जाना था। लेकिन अब इस प्रोजेक्ट की राह इतनी आसान नहीं लग रही, क्योंकि फ्रांस और जर्मनी के बीच इस पर लीडरशिप को लेकर जबरदस्त खींचतान चल रही है।

FCAS dispute: “सिस्टम ऑफ सिस्टम्स” पर होना था काम

इस प्रोजेक्ट की शुरुआत 2017 में हुई थी, जब फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन और जर्मनी की तत्कालीन चांसलर एंजेला मर्केल ने इसका एलान किया। इसका लक्ष्य 2040 तक फ्रांस के राफेल, जर्मनी के यूरोफाइटर टाइफून और स्पेन के EF-18 हॉर्नेट जैसे मौजूदा विमानों की जगह लेना था। इस प्रोजेक्ट को फ्रांस में Système de Combat Aérien du Futur-SCAF नाम से भी जाना जाता है। इसकी खासियत यह थी कि इसमें केवल एक फाइटर जेट नहीं, बल्कि पूरे “सिस्टम ऑफ सिस्टम्स” पर काम होना था। इस सिस्टम में तीन मुख्य हिस्से रखे गए। पहला, न्यू जेनरेशन फाइटर यानी मानवयुक्त स्टेल्थ जेट, जिसे फ्रांस की दसॉ एविएशन लीड कर रही थी। दूसरा, रिमोट कैरियर्स यानी ऐसे ड्रोंस जो स्वार्मिंग और मल्टी-रोल मिशंस को अंजाम दे सकें। इन्हें एयरबस की जिम्मेदारी में जर्मनी और स्पेन को तैयार करना था। तीसरा, रीयल-टाइम इंटेलिजेंस शेयरिंग और डिसीजन मेकिंग के कॉम्बैट क्लाउड सिस्टम, जो एक तरह का डिजिटल नेटवर्क था और जिसका उद्देश्य आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से सभी प्लेटफॉर्म्स को जोड़ना था।

FCAS dispute: प्रोजेक्ट को कब्जे में लेना चाहता है दसॉ?

जब यह प्रोजेक्ट शुरू हुआ था तो इसकी लागत लगभग सौ अरब यूरो आंकी गई थी। उम्मीद थी कि यह यूरोप को अमेरिका के एफ-35 और चीन के जे-20 जैसे लड़ाकू विमानों की बराबरी में खड़ा कर देगा। लेकिन जल्द ही मतभेद उभरने लगे। विवाद तब और गहराया जब 2019 में स्पेन भी इसमें शामिल हो गया। स्पेन के शामिल होने से एयरबस का हिस्सा बढ़कर लगभग दो-तिहाई हो गया और दसॉ की हिस्सेदारी एक-तिहाई रह गई। जर्मनी और स्पेन की ओर से प्रतिनिधित्व करने वाली एयरबस का कहना है कि दसॉ प्रोजेक्ट को कब्जे में लेना चाहता है और सभी अहम फैसले अपने हाथ में रखना चाहता है। दूसरी ओर दसॉ का कहना है कि लीडरशिप के बिना प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ सकता।

दसॉ एविएशन के सीईओ एरिक ट्रैपियर ने हाल ही में पेरिस के पास एक नई राफेल फैक्ट्री के उद्घाटन पर अपने बयान से पूरे विवाद को और भड़का दिया। उन्होंने कहा कि फ्रांस अकेले भी यह फाइटर जेट बना सकता है। उन्होंने जर्मनी को चुनौती देते हुए कहा कि यदि बर्लिन चाहे, तो वह भी अकेले यह काम कर सकता है, क्योंकि दसॉ के पास इस तरह की क्षमता पहले से है। उनका कहना था कि फ्रांस ने पिछले सत्तर सालों में मिराज और राफेल जैसे विमान बनाकर यह साबित किया है कि डिजाइन से लेकर प्रोडक्शन तक हर चरण में वह आत्मनिर्भर है।

FCAS dispute: इन वजहों से खटाई में पड़ी साझेदारी

दसॉ न्यू जेनरेशन फाइटर यानी NGF का प्राइम कॉन्ट्रैक्टर है, लेकिन स्पेन की एंट्री के बाद फैसलों में वह आउटवोटेड हो गया। फ्रांस की मांग है रि उसे NGF पर 80 फीसदी कंट्रोल दिया जाए। जर्मनी का आरोप है कि दसॉ फ्रांस में ज्यादातर काम रखना चाहता है और अगले फेज (डेमॉन्स्ट्रैटर बनाने) को ब्लॉक कर रहा है। दसॉ का कहना है कि स्पष्ट लीडरशिप के बिना प्रोजेक्ट धीमा हो रहा है। स्पेन के शामिल होने से एयरबस का शेयर 66 फीसदी हो गया, जिससे दसॉ को केवल 25-33 फीसदी काम मिल रहा है। दसॉ के मुताबिक, इससे “जॉइंट डिजाइन अथॉरिटी” मॉडल फेल हो रहा है। वहीं, जर्मनी के डिफेंस मिनिस्टर बोरिस पिस्टोरियस ने अगस्त 2025 में कहा कि जर्मनी प्रोजेक्ट में देरी और नहीं बर्दाश्त कर सकता”।

फ्रांस पहले भी हुआ था बाहर

यह भी कहा जा रहा है कि यूरोफाइटर प्रोजेक्ट के फेल होने के पीछे भी फ्रांस ही था। यूरोफाइटर टाइफून को यूरोपियन फाइटर एयरक्राफ्ट (EFA) या फ्यूचर यूरोपियन फाइटर एयरक्राफ्ट (FEFA) के नाम से जाना जाता था, जो चौथी पीढ़ी का मल्टी-रोल फाइटर जेट है। इसे 1983 में यूरोप के चार देशों जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, इटली और स्पेन के सहयोग से शुरू किया गया था। वहीं शुरुआत में फ्रांस भी इसका हिस्सा था, लेकिन वह 1985 में ही बाहर हो गया था। कहा जाता है कि फ्रेंच इंडस्ट्री हमेशा से सहयोग के खिलाफ रही, लेकिन पॉलिटिकल दबाव और यूरोपियन यूनियन के चलते ऐसा करना पड़ा।

जर्मनी तलाश रहा साझेदार

जर्मनी की स्थिति फिलहाल असमंजस में है। जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस पहले ही यह कह चुके हैं कि प्रोजेक्ट में और देरी बर्दाश्त नहीं की जा सकती। जर्मनी की संसद में तो यहां तक सुझाव दिया गया कि बर्लिन को इस प्रोजेक्ट से बाहर निकलकर किसी अन्य साझेदारी की ओर देखना चाहिए। इसके बाद खबरें आईं कि जर्मनी ब्रिटेन, इटली और जापान के साथ मिलकर चल रहे GCAP यानी ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम से जुड़ने पर विचार कर रहा है। यही नहीं, स्वीडन के साथ भी बातचीत की चर्चा है।

क्या कहना है स्पेन का

स्पेन इस विवाद में अपेक्षाकृत शांत है। उसकी भूमिका एयरबस के जरिए है और वह फ्रांस तथा जर्मनी के बीच सीधी खींचतान में नहीं पड़ना चाहता। लेकिन स्पेन भी प्रोजेक्ट में लगातार हो रही देरी से परेशान है क्योंकि इस पर उसकी वायुसेना के भविष्य की योजनाएं टिकी हैं। स्पेन का कहना है कि वह इस प्रोजेक्ट में पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। स्पेनिश प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने हाल ही में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “स्पेन की रुचि इस प्रोजेक्ट में तीनों देशों जर्मनी, फ्रांस और स्पेन द्वारा पहले से तय शर्तों पर पूरी तरह से है। सांचेज ने कहा कि FCAS “मूल वर्कशेयर डील” का सम्मान करे। बता दें कि स्पेन 2019 में फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम प्रोजेक्ट में शामिल हुआ था। वहीं, मैड्रिड ने अमेरिकी एफ-35 को भी ठुकरा कर FCAS या यूरोफाइटर टाइफून पर फोकस कर लिया।

वहीं स्पेन की कंपनी इंद्रा सिस्टेमास (Indra) इस प्रोजेक्ट में सेंसर, रिमोट कैरियर्स (ड्रोंस) और कॉम्बैट क्लाउड पर काम कर रही है। साथ ही, स्पेन कुल फंडिंग का लगभग 33 फीसदी (फ्रांस और जर्मनी के बराबर) दे रहा है।

वहीं, अगर फ्रांस नहीं मानता है, तो जर्मनी GCAP यानी यूके-इटली-जापान या स्वीडन से जुड़ सकता है। इससे स्पेन का नुकसान कम होगा। वहीं अगर FCAS सफल हुआ तो स्पेन को 100+ विमान मिलेंगे, जो EF-18 को 2040 तक रिप्लेस करेंगे।

क्या होंगी FCAS में खूबियां

फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम के तहत न्यू जेनरेशन फाइटर एक ट्विन इंजन डेल्टा विंग डिजाइन पर बेस्ड स्टेल्थ जेट होगा। इसकी रफ्तार मैक 2 से भी अधिक बताई जा रही है और इसमें आफ्टरबर्नर के बिना ही सुपरक्रूज की क्षमता होगी। इसका कॉम्बैट रेडियस लगभग 1500 किलोमीटर से ज्यादा होगा। इसमें इंटरनल वेपन्स बे होंगे, जिससे इसका रडार क्रॉस सेक्शन बेहद कम रहेगा। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित कॉकपिट और सेंसर फ्यूजन की खूबी होगी। साथ ही यह फाइटर जेट विमान हाइपरसोनिक हथियारों और लेजर वेपंस तक ले जाने में सक्षम होगा।

रिमोट कैरियर्स इस प्रोजेक्ट का दूसरा अहम हिस्सा है। ये ऐसे ड्रोन्स होंगे जो अलग-अलग आकार और भूमिका में तैनात किए जा सकेंगे। इनका इस्तेमाल निगरानी, स्ट्राइक और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर जैसे मिशनों में किया जाएगा। इन्हें विमान या अन्य प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकेगा। ये पूरी तरह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से ऑपरेट होंगे लेकिन कंट्रोल नीचे क्रू के हाथों में रहेगा।

कॉम्बैट क्लाउड FCAS का तीसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह एक डिजिटल नेटवर्क होगा जो रीयल-टाइम डेटा शेयरिंग, साइबर सिक्योरिटी और बिग डेटा एनालिसिस की सुविधा देगा। इसकी मदद से वायु, थल, नौसेना और स्पेस सभी प्लेटफॉर्म एक-दूसरे से जुड़े रहेंगे। यह नेटवर्क युद्ध के दौरान फैसले लेने में मदद करेगा।

FCAS के इंजन की बात करें, तो इसे सफरान और एमटीयू मिल कर बना रही हैं। इसमें वेरिएबल साइकिल एडवांस्ड टर्बोफैन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा, जिससे यह सुपरक्रूज कर सकेगा और साथ ही फ्यूल एफिशिएंसी भी बनी रहेगी। यह इंजन हाई थ्रस्ट-टू-वेट रेशियो देने वाला होगा और इसमें ऐसा डिजाइन होगा जिससे इसका इन्फ्रारेड सिग्नेचर कम हो और दुश्मन इसे आसानी से ट्रैक न कर सके।

भारत को दिया था शामिल होने का ऑफर

जहां एक ओर यूरोप इस प्रोजेक्ट को लेकर बंटा हुआ नजर आ रहा है, वहीं भारत को भी इसमें शामिल होने का ऑफर दिया गया था। जर्मनी और स्पेन ने नवंबर 2024 में इस प्रोजेक्ट में भारत को ऑब्जर्वर स्टेटस देने का प्रस्ताव रखा था। जिसके तहत भारत इस प्रोजेक्ट की तकनीक को करीब से देख सकेगा और उसकी सप्लाई चेन यानी एवियोनिक्स, सेंसर, इंजन कंपोनेंट्स की सप्लाई में हिस्सा ले सकेगा। हालांकि इसमें भारत के पास फैसला लेने का कोई अधिकार नहीं होता। वहीं, इसके लिए फ्रांस और स्पेन की मंजूरी जरूरी थी। खबरों के मुताबिक पिछले साल फ्रांस, जर्मनी औऱ स्पेन ने भारत में मल्टी लेटरल एक्सरसाइज तरंग शक्ति में हिस्सा लिया था। जो इस ऑफर का आधार का बना। हालांकि फ्रांस ने ऑफर का विरोध नहीं किया, लेकिन मंजूरी भी नहीं दी। वहीं भारत को डुअल ऑफर्स मिले। जहां भारत को FCAS के अलावा यूके-इटली-जापान के ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम- GCAP में भी आमंत्रित किया गया था।

भारत ने इसलिए किया रिजेक्ट

वहीं, भारत ने फरवरी 2025 में ऑफर को अस्वीकार कर दिया। भारत की प्राथमिकता फिलहाल अपना स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA प्रोजेक्ट पर है। भारत नहीं चाहता कि उसकी एनर्जी और रिसोर्सेज किसी विदेशी प्रोजेक्ट में उलझें। लेकिन अगर भारत को ऑब्जर्वर स्टेटस मिलता है तो उसकी प्राइवेट डिफेंस इंडस्ट्री को यूरोप की सप्लाई चेन में जुड़ने का बड़ा मौका मिल सकता था।

भारत के लिए यह स्थिति दिलचस्प है। एक ओर वह AMCA पर तेजी से काम कर रहा है, दूसरी ओर वह यूरोपीय तकनीक से सीखने का अवसर भी पा सकता है। लेकिन भारत के लिए प्राथमिकता आत्मनिर्भरता ही है और इसी वजह से उसने FCAS में शामिल होने का कोई औपचारिक प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया है। वहीं, भारत और सफरान मिल कर AMCA के लिए इंजन बनाने की तैयारी कर रहे हैं। इस समझौते के तहत भारत को पहली बार पूर्ण रूप से जेट इंजन की टेक्नोलॉजी मिलेगी। यह भारत का पहला 100 फीसदी स्वदेशी जेट इंजन होगा जिसे यहीं बनाया जाएगा। और सफरान ने 100% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की पेशकश भी की है।

Hanle-Chumar Road: रंग लाई बीआरओ की मेहनत, लद्दाख में 17,200 फीट ऊंचाई पर बनी 91 किमी लंबी ऑल वेदर रोड जनता के लिए खुली

Hanle-Chumar Road

Hanle-Chumar Road: लद्दाख के दुर्गम रास्तों के बीच बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन के प्रोजेक्ट हिमांक के तहत बनी हानले-चुमार रोड को जनता के लिए खोल दिया गया है। यह सड़क कुल 91 किलोमीटर लंबी है और 14,500 फीट से लेकर 17,200 फीट तक की ऊंचाई पर बनी है। इस मार्ग पर स्थित साल्सा ला पास को पार करना रोड इंजीनियरिंग की एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। बता दें कि प्रोजेक्ट हिमांक 1985 से चल रहा है।

BRO Project Vijayak: जिस प्रोजेक्ट ने कारगिल और लद्दाख को देश से जोड़ा, पूरे हुए उसके 15 साल, बनाईं 1400 किमी लंबी सड़कें और 80 पुल

यह सड़क भारत-चीन सीमा लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के करीब स्थित है। इस सड़क के बन जाने के बाद चुमार सेक्टर तक आवाजाही आसान हो गई है। इस मार्ग से भारतीय सेना को सैनिकों, हथियारों और रसद सामग्री की सप्लाई में बड़ी मदद मिलेगी। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद से लद्दाख में सड़क और पुलों का नेटवर्क तेजी से बनाया जा रहा है। हानले-चुमार रोड इस रणनीतिक प्रयास का अहम हिस्सा है।

हाई-एल्टीट्यूड सड़कें बनाने में सामान्य से ज्यादा वक्त लगता है। क्योंकि लद्दाख जैसे क्षेत्र में जहां काम केवल गर्मियों (मई से अक्टूबर) में ही संभव होता है।

वहीं सेना के साथ आम लोग भी इस सड़क का इस्तेमाल कर सकेंगे। यह मार्ग कई पर्यटन स्थलों को जोड़ता है जहां अभी तक बेहद कठिन रास्तों से ही पहुंचा जा सकता था। इस सड़क के जरिए पर्यटक अब आसानी से हानले हान्ले वेधशाला, क्यूं त्सो लेक, चिलिंग त्सो लेक और आगे त्सो मोरिरी लेक तक पहुंच सकेंगे। हानले ऑब्जर्वेटरी दुनिया की सबसे ऊंचाई पर स्थित वेधशालाओं में से एक है, जहां रात का आसमान तारों से भरा हुआ दिखाई देता है। वहीं, यह सड़क के बनने के बाद अब पर्यटक भी इस अनुभव का आनंद दे सकेंगे।

लद्दाख जैसे कठिन भौगोलिक इलाके में सड़क बनाना आसान नहीं होता। यहां का मौसम बेहद शुष्क है, तापमान अक्सर शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता है और ऑक्सीजन का स्तर भी कम हो जाता है। ऐसे हालात में बीआरओ ने इस सड़क का निर्माण किया और दिखाया कि भारतीय इंजीनियरिंग क्षमता कितनी मजबूत है। प्रोजेक्ट हिमांक पहले भी उमलिंग ला पास पर 19,024 फीट की ऊंचाई पर दुनिया की सबसे ऊंची सड़क बनाकर रिकॉर्ड कायम कर चुका है।

वहीं इस रोड के बनने से स्थानीय लोगों को भी फायदा होगा। अब गांवों तक सामान की सप्लाई आसान होगी। स्थानीय किसान और हस्तशिल्प कलाकार अपने उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचा पाएंगे। स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाएं भी इन इलाकों में तेजी से पहुंचेंगी। साथ ही पर्यटन बढ़ने से होमस्टे, गाइड और स्थानीय परिवहन सेवाओं को बढ़ावा मिलेगा।

हानले-चुमार रोड का उद्घाटन ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हुआ था, जिसमें 50 बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का लोकार्पण किया गया था। इनमें से 16 प्रोजेक्ट्स लद्दाख में पूरे किए गए हैं। इनकी कुल लागत लगभग 947 करोड़ रुपये है। इनमें कई महत्वपूर्ण सड़कें और छह बड़े पुल भी शामिल हैं। साथ ही, हनले में एक विशेष एम्युनिशन स्टोरेज साइट और सड़कों पर नई इंटरलॉकिंग कंक्रीट ब्लॉक तकनीक का इस्तेमाल भी किया गया है, जिससे सर्दियों में सड़कें टिकाऊ बनी रह सकें।

साल्सा ला पास से गुजरेगी सड़क

इस सड़क का सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा सालसा ला पास है। यह पास 17,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और यहां पर मौसम अचानक बदल जाता है। बर्फबारी और तेज हवाओं के बीच सड़क निर्माण बेहद कठिन था। बीआरओ ने कठिन परिश्रम और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करके इस रास्ते को तैयार किया, जो अब पूरे साल इस्तेमाल किया जा सकेगा।

IAF MiG-21 ceremony: वायुसेना अपने वर्कहॉर्स मिग-21 को खास तरीके से देगी विदाई, तेजस और जगुआर ऐसे देंगे आखिरी सलामी

IAF MiG-21 ceremony

IAF MiG-21 ceremony: भारतीय वायुसेना 26 सितंबर के दिन को एतिहासिक बनाने की तैयारी कर रही है। 62 साल की सेवा के बाद 26 सितंबर को उसका सबसे पुराना फाइटर जेट मिग-21 आखिरी बार आसमान में गरजता नजर आएगा। चंडीगढ़ वायुसेना स्टेशन पर होने वाले इस भव्य विदाई समारोह में एयर चीफ मार्शल एपी सिंह खुद कॉकपिट में बैठेंगे। उनके साथ स्क्वॉड्रन लीडर प्रिया शर्मा भी MiG-21 की आखिरी उड़ान का हिस्सा होंगे और इस तरीके से MiG-21 ceremony होगी

MiG-21 in 1971 War: ऑपरेशन सिंदूर से 54 साल पहले मिग-21 ने की थी यह जबरदस्त प्रिसिजन स्ट्राइक, हाथ मलते रह गया था गार्जियन एंजल

IAF MiG-21 ceremony: बादल और पैंथर फॉर्मेशन

वायुसेना सूत्रों के मुताबिक मिग-21 नंबर 23 स्क्वॉड्रन “पैंथर्स” का हिस्सा हैं, आखिरी बार दो अलग-अलग फॉर्मेशन में उड़ान भरेंगे। इनमें पहला होगा तीन विमानों का “बादल फॉर्मेशन”, जिसमें एयर चीफ मार्शल एपी सिंह लीड करेंगे। वे लैंडिंग करेंगे जबकि बाकी दो मिग-21 ऊपर उठकर कॉम्बैट एयर पेट्रोल (CAP) का प्रदर्शन करेंगे।

दूसरा होगा “पैंथर फॉर्मेशन”, जिसमें तीन MiG-21 और दो स्वदेशी तेजस एलसीए मैक-1 शामिल होंगे। जैसे ही मिग-21 स्क्वॉड्रन सलामी देंगे, वे अलग हो जाएंगे और तेजस विमान भारतीय आसमान में आगे बढ़ते हुए भविष्य का संकेत देंगे। MiG-21 ceremony नजारा पुराने युग से नए युग की ओर बढ़ते कदमों की तस्वीर पेश करेगा।

IAF MiG-21 ceremony: जगुआर भी बनेंगे हिस्सा

समारोह में सिर्फ मिग-21 ही नहीं बल्कि जगुआर लड़ाकू विमान भी हिस्सा लेंगे। वे बेस स्ट्राइक का डेमो देंगे और दिखाएंगे कि वायुसेना की ताकत अब किस तरह आधुनिक विमानों पर टिक चुकी है। इसके अलावा स्वदेशी तेजस भी पहली बार मिग-21 के साथ आधिकारिक विदाई में शामिल होंगे।

प्रिया शर्मा ने पहले भी उड़ाया था मिग

कुछ हफ्ते पहले राजस्थान के नाल एयरबेस पर एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने खुद मिग-21 बाइसन सीयू2777 पर सोलो कॉम्बैट सॉर्टी की थी। खास बात यह रही कि उस फॉर्मेशन की अगुवाई स्क्वॉड्रन लीडर प्रिया शर्मा ने की थी। वायुसेना ने इसे “ट्रेडिशन एंड ट्रांसफॉर्मेशन” का पल बताया था। अब यही जोड़ी MiG-21 की आखिरी उड़ान में भी हिस्सा लेकर इतिहास का हिस्सा बनेगी।

राजस्थान के झुंझुनू जिले में जन्मी स्क्वाड्रन लीडर प्रिया शर्मा आईएएफ की सातवीं महिला फाइटर पायलट हैं। वे 2018 में एयर फोर्स अकादमी, दुंदिगल से ग्रेजुएट हुईं, जहां उन्होंने स्टेज-1 (पिलाटस पीसी-7), स्टेज-2 (किरण) पर ट्रेनिंग पूरी की। जनवरी 2019 से स्टेज-3 (बीदर AFS) में मिग-21 पर एडवांस्ड ट्रेनिंग ली। वहीं वे मोहना सिंह औऱ प्रतिभा सिंह के बाद राजस्थान की तीसरी महिला फाइटर पायलट हैं। उनके पिता भी बीदर एयरफोर्स स्टेशन में सेवाएं चुके हैं।

वहीं भारतीय वायुसेना के लिए यह सिर्फ MiG-21 ceremony नहीं बल्कि दुनिया को यह संदेश भी देना है कि वायुसेना में महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है।

एसीएम एपी सिंह के पास 5000 घंटे का फ्लाइंग एक्सपीरियंस

मिग-21 केवल एक विमान नहीं बल्कि कई पीढ़ियों के पायलटों की पहचान रहा है। भारतीय वायुसेना के लगभग हर एयर चीफ ने इस विमान को उड़ाया है और इसकी कठिन उड़ानों से खुद को तैयार किया है। वर्तमान एयर चीफ मार्शल एपी सिंह के पास कुल पांच हजार घंटे से ज्यादा का फ्लाइंग अनुभव है और उन्होंने MiG-21 पर लंबा समय बिताया है। 1984 में कमीशन हुए एसीएम एपी सिंह मिग-21 पर कमांडर रहे थे और 1985 में उन्होंने तेजपुर में टाइप-77 वेरिएंट उड़ाया था। उन्होंने कहा था कि मिग-21 ने पीढ़ियों को ट्रेनिंग दी है, इसकी एजिलिटी और क्विक एक्सेलरेशन ने ऑपरेशनल फिलॉसफी को प्रभावित किया है। खुद एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने मिग-29 अपग्रेड प्रोजेक्ट भी लीड किया है।

उनके पहले एयर चीफ्स का इतना है फ्लाइंग अनुभव

उनके पूर्ववर्ती एयर चीफ मार्शल वीआर चौधरी (2021-2024) के पास 3,800 घंटे का फ्लाइंग एक्सपीरियंस है, जिसमें मिग-21, मिग-23एमएफ, मिग-29 और सुखोई-30एमकेआई शामिल हैं।

वहीं रिटायर्ड एसीएम आरकेएस भदौरिया (2019-2021) के नाम 26 तरह के विमानों पर 4,250 घंटे का फ्लाइंग एक्सपीरियंस है। जबकि बीएस धनोआ (2016-2019) ने 3,000 घंटे लॉग किए। वे 1999 कारगिल में नंबर 17 स्क्वाड्रन कमांडर रहे, जहां उन्होंने मिग-21 पर सॉर्टी उड़ाईं। उन्होंने 2019 में विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान के साथ अंतिम ट्रेनर सॉर्टी उड़ाई थी।

जबकि उनके पूर्ववर्ती एसीएम अरूप राहा (2013-2016) के 3,400 घंटे का फ्लाइंग एक्सपीरियंस है। उन्होंने मिग-29 स्क्वाड्रन कमांड किया। जबकि एनएके ब्राउन (2012-2013) ने 3,500 घंटे लॉग किए। एक बार MiG-21 ने उनकी जान बचाई थी, जब इंजन फेल होने पर बेली आउट के बजाय इमरजेंसी लैंडिंग की। वहीं उनके भी पूर्ववर्ती पीवी नाइक (2009-2012) के 3,000 घंटे हैं, जिनमें 2,000 घंटे मिग-21 पर बिताए। उन्होंने 1971 युद्ध में भाग लिया और मिग-21 बाइसन अपग्रेड शुरू किया। एफएच मेजर (2007-2009) ने 3,200 घंटे लॉग किए, जिनमें मिग-21 प्रमुख रहा।

उनके पहले एसपी त्यागी (2005-2007) के 3,000 घंटे हैं, और उन्होंने मिग-21 पर खूब सोलो सॉर्टी उड़ाईं। 1980 के दशक में बॉर्डर टेंशन के दौरान कमांड किया।

जबकि उनके पहले प्रदीप वासंत नाइक (2009-2011) के पास 3,000 घंटे काा फ्लाइंग एक्सपीरियंस रहा। उन्होंने मिग-21 के सभी वैरियंट्स पर उड़ान भरी। साथ ही, उन्होंने 1971 युद्ध में पूर्वी-पश्चिमी सेक्टर में सक्रिय भूमिका भी निभाई थी।

मिग का कॉकपिट किसी राजा की गद्दी से भी ज्यादा कीमती

मिग-21 का सफर भारतीय वायुसेना में लगभग 900 विमानों से शुरू हुआ था। अलग-अलग वेरिएंट्स में इसे शामिल किया गया। दशकों तक यह भारतीय वायुसेना का सबसे बड़ा फाइटर फ्लीट रहा। 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक जीत से लेकर 1999 कारगिल युद्ध में हवाई सुरक्षा तक इसने अपनी क्षमता दिखाई। वहीं, 2019 की बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद पाकिस्तान के एफ-16 को गिराने वाले मिग-21 बाइसन की सफलता आज भी लोगों को याद है।

पूर्व एयर चीफ मार्शल एवाई टिपनिस ने “भारतीय वायुसेना के साथ मिग-21 के 50 साल” किताब में लिखा था कि मिग-21 का कॉकपिट किसी राजा की गद्दी से भी ज्यादा कीमती है, क्योंकि यह लड़कों को मर्द और पायलटों को योद्धा बना देता है।

पहला सुपरसोनिक इंटरसेप्टर

1963 में भारतीय वायुसेना में शामिल हुआ मिग-21 सोवियत संघ का पहला सुपरसोनिक इंटरसेप्टर था। जो आने वाले दशकों में भारत की एयर पावर की बैक बोन बना। 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के कई ठिकाने तबाह करने से लेकर करगिल युद्ध और बालाकोट एयरस्ट्राइक तक में मिग-21 ने अपनी क्षमता साबित की। पिछले छह दशकों में 400 से ज्यादा मिग-21 हादसों का शिकार हुए औऱ तकरीबन 200 पायलटों ने अपनी जान गंवाई। बावजूद इसके, भारतीय वायुसेना अपने इस वर्कहॉर्स को लगातार अपग्रेड किया और नए हथियारों की मदद से इसे 21वीं सदी तक ऑपरेशन में बनाए रखा और अब MiG-21 ceremony हो रही है।