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Vayushakti 2026: राष्ट्रपति मुर्मू ‘प्रचंड’ हेलीकॉप्टर में भरेंगी उड़ान, पोखरण में देखेंगी एयरफोर्स का मेगा शो

Vayushakti 2026- LCH Prachand
LCH Prachand

Vayushakti 2026: भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 27 फरवरी को राजस्थान के जैसलमेर दौरे पर रहेंगी। वे भारतीय वायुसेना के बड़े फायरपावर अभ्यास वायु शक्ति-2026 में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगी। इस दौरान वे स्वदेशी लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर प्रचंड में उड़ान भी भरेंगी। यह पहली बार होगा जब कोई राष्ट्रपति कॉम्बैट हेलीकॉप्टर में को-पायलट के तौर पर उड़ान भरेंगी।

राष्ट्रपति 26 फरवरी की शाम को जैसलमेर पहुंचेंगी, जहां उनका स्वागत राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा करेंगे। इसके बाद अगले दिन सुबह उनका कार्यक्रम शुरू होगा।

Vayushakti 2026: ‘प्रचंड’ में उड़ान का कार्यक्रम

27 फरवरी की सुबह राष्ट्रपति जैसलमेर एयर फोर्स स्टेशन से लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर प्रचंड में सॉर्टी लेंगी। यह उड़ान एक तरह का एरियल सर्वे होगी, जिसमें वे पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज और आसपास के चांधन इलाके का हवाई निरीक्षण करेंगी। इस उड़ान की अवधि करीब 20 से 30 मिनट रहने की संभावना है।

यह हेलीकॉप्टर पूरी तरह से भारत में डेवलप किया गया है और इसे कठिन परिस्थितियों में ऑपरेशन के लिए तैयार किया गया है। प्रचंड हेलीकॉप्टर ऊंचाई वाले इलाकों और रेगिस्तानी क्षेत्र दोनों में प्रभावी तरीके से काम कर सकता है।

प्रचंड हेलीकॉप्टर की खासियत

लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर प्रचंड को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने डेवलप किया है। यह हेलीकॉप्टर लगभग 5.8 टन वजन का है और इसकी अधिकतम गति करीब 280 किलोमीटर प्रति घंटा है। इसकी रेंज 550 किलोमीटर से ज्यादा बताई जाती है।

इसमें आधुनिक हथियार लगाए जा सकते हैं, जिनमें एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल, 70 एमएम रॉकेट और 20 एमएम गन शामिल हैं। हेलीकॉप्टर में ट्विन इंजन, आर्मर्ड कॉकपिट और आधुनिक एवियोनिक्स सिस्टम भी मौजूद हैं, जिससे यह युद्ध के दौरान सुरक्षित और प्रभावी रहता है।

वायुसेना के जवानों से मुलाकात

उड़ान के बाद राष्ट्रपति एयर फोर्स स्टेशन पर मौजूद वायुसेना के अधिकारियों और जवानों से बातचीत करेंगी। इस दौरान वे उनकी तैयारियों और अनुभवों के बारे में जानकारी लेंगी।

इसके बाद वे पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज के चांधन क्षेत्र में जाएंगी, जहां वायु शक्ति-2026 का मुख्य कार्यक्रम आयोजित होगा।

वायु शक्ति-2026 का आयोजन

वायु शक्ति-2026 का मुख्य कार्यक्रम 27 फरवरी को शाम 4:40 बजे शुरू होगा। इसमें भारतीय वायुसेना अपनी पूरी ताकत का प्रदर्शन करेगी। इस अभ्यास में फाइटर जेट, हेलीकॉप्टर और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट मिलकर विभिन्न प्रकार के ऑपरेशन दिखाएंगे।

कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, तीनों सेनाओं के प्रमुख और कई विदेशी प्रतिनिधि भी मौजूद रहेंगे। इस पूरे कार्यक्रम का लाइव प्रसारण डीडी न्यूज और वायुसेना के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किया जाएगा।

अभ्यास में दिखेगी आधुनिक युद्ध क्षमता

इस अभ्यास में भारतीय वायुसेना दिन, शाम और रात तीनों समय के ऑपरेशन दिखाएगी। इसमें प्रिसिजन स्ट्राइक, एयर डिफेंस, हेलिबोर्न ऑपरेशन और राहत एवं बचाव मिशन जैसे कई पहलुओं को शामिल किया गया है।

इस आयोजन में ऑपरेशन सिंदूर के अनुभवों को भी शामिल किया गया है, जिसमें लंबी दूरी से सटीक हमले और मल्टी-डोमेन ऑपरेशन की क्षमता दिखाई गई थी।

Vayushakti 2026 की फुल ड्रेस रिहर्सल में दुश्मन के सभी टारगेट हुए तबाह! ऑपरेशन सिंदूर के बाद IAF का जबरदस्त फायरपावर शो

Vayushakti 2026

Vayushakti 2026: राजस्थान के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में भारतीय वायुसेना का सबसे बड़ा फायरपावर डेमो ‘वायु शक्ति 2026’ अब अपने आखिरी फेज में पहुंच गया है। 26 फरवरी को हुई फुल ड्रेस रिहर्सल में वायुसेना ने अपनी पूरी तैयारी का प्रदर्शन किया, जिसमें सभी टारगेट सफलतापूर्वक न्यूट्रलाइज कर दिए गए। इसके साथ ही वायुसेना 27 फरवरी को होने वाले मुख्य कार्यक्रम के लिए पूरी तरह तैयार है।

यह अभ्यास भारतीय वायुसेना की ऑपरेशनल क्षमता, सटीकता और तुरंत जवाबी कार्रवाई को दिखाने के लिए आयोजित किया जाता है। इस बार का आयोजन खास इसलिए भी है क्योंकि इसमें आधुनिक युद्ध की सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दिन, शाम और रात तीनों समय के ऑपरेशन्स को शामिल किया गया है। खास बात यह है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद वायुसेना पहली बार इतने बड़े स्तर पर एक्सरसाइज का आयोजन कर रही है। वायु शक्ति की फुल ड्रेस रिहर्सल 24 फरवरी को आयोजित की गई थी, जिसमें फाइटर जेट, हेलीकॉप्टर और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट ने मिलकर कई तरह के मिशन पूरे किए। (Vayushakti 2026)

रक्षा समाचार ने सबसे पहले बताया था कि देश के पश्चिमी मोर्चे पर भारतीय वायुसेना बड़े अभ्यास की तैयारी कर रही है, जिसके लिए नोटम– नोटिस टू एयरमैन भी जारी किया गया था।

Vayushakti 2026: सभी प्रमुख एयरक्राफ्ट शामिल

इस अभ्यास में भारतीय वायुसेना ने अपने लगभग सभी प्रमुख एयरक्राफ्ट को शामिल किया है। इसमें राफेल, सुखोई-30 एमकेआई, मिराज-2000, मिग-29, जगुआर और हॉक जैसे फाइटर जेट शामिल हैं। इनके साथ-साथ एएन-32, सी-130जे, सी-17 ग्लोबमास्टर और सी-295 जैसे ट्रांसपोर्ट विमान भी इस अभ्यास का हिस्सा हैं। हेलीकॉप्टरों में अपाचे, एलसीएच प्रचंड, एमआई-17, चिनूक और एएलएच जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं।

वायु शक्ति 2026 में कुल मिलाकर 77 फाइटर विमान, 43 हेलीकॉप्टर और 8 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट हिस्सा ले रहे हैं। इस दौरान करीब 277 हथियारों का इस्तेमाल किया जाएगा, जिनमें लगभग 12,000 किलो विस्फोटक शामिल हैं। अभ्यास के लिए 23 अलग-अलग टारगेट तैयार किए गए हैं, जो जमीन और हवा दोनों तरह के खतरों को दर्शाते हैं। (Vayushakti 2026)

फुल ड्रेस रिहर्सल में रात-दिन ऑपरेशन

फुल ड्रेस रिहर्सल के दौरान वायुसेना ने दिन से लेकर रात तक लगातार ऑपरेशन किए। सभी टारगेट्स को सटीक तरीके से निशाना बनाया गया। इस दौरान हेलीकॉप्टरों ने रॉकेट फायरिंग और प्रिसिजन स्ट्राइक का प्रदर्शन किया, जबकि फाइटर जेट्स ने हाई स्पीड अटैक मिशन पूरे किए।

इस अभ्यास में आर्मी के साथ जॉइंट ऑपरेशन भी शामिल रहा। इसमें एम777 हॉवित्जर गन और एल70 एयर डिफेंस गन का इस्तेमाल किया गया। इसके अलावा स्पेशल फोर्सेस ने भी अपनी भूमिका निभाई। अनमैन्ड सिस्टम यानी ड्रोन और काउंटर ड्रोन सिस्टम को भी इस अभ्यास में शामिल किया गया, जिससे आधुनिक युद्ध की तैयारी को दिखाया गया। (Vayushakti 2026)

27 फरवरी को होगा मुख्य कार्यक्रम

वायु शक्ति 2026 का मुख्य कार्यक्रम 27 फरवरी को शाम 4:40 बजे शुरू होगा। इसमें 43 अलग-अलग सेगमेंट में ऑपरेशन्स का प्रदर्शन किया जाएगा। यह कार्यक्रम शाम 5:10 बजे से लेकर रात 7:45 बजे तक चलेगा।

इस कार्यक्रम की मुख्य अतिथि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू होंगी। जानकारी के मुताबिक, वे कार्यक्रम से पहले स्वदेशी एएलएच हेलीकॉप्टर में उड़ान भी भरेंगी। मौसम खराब होने की स्थिति में 28 फरवरी को रिजर्व डे रखा गया है। (Vayushakti 2026)

ऑपरेशन सिंदूर की दिखेगी झलक

इस अभ्यास में ऑपरेशन सिंदूर की सफलता को भी दिखाया जाएगा। यह ऑपरेशन मई 2025 में किया गया था, जिसमें वायुसेना ने लंबी दूरी से सटीक हमले कर दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाया था। वायु शक्ति 2026 में उसी तरह की क्षमताओं का प्रदर्शन किया जाएगा, जिसमें मल्टी-डोमेन ऑपरेशन और एयर सुपीरियरिटी पर जोर रहेगा।

तेजस की भागीदारी पर संशय

इस बार के अभ्यास में एलसीए तेजस को शामिल किए जाने की उम्मीद थी, लेकिन फुल ड्रेस रिहर्सल में यह विमान नजर नहीं आया। रिपोर्ट्स के अनुसार, मुख्य कार्यक्रम में भी इसकी भागीदारी को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। हालांकि बाकी सभी प्रमुख प्लेटफॉर्म इस अभ्यास में हिस्सा ले रहे हैं। (Vayushakti 2026)

मानवीय सहायता और राहत मिशन भी शामिल

वायु शक्ति 2026 सिर्फ युद्ध क्षमता दिखाने तक सीमित नहीं है। इसमें ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिजास्टर रिलीफ यानी आपदा के समय राहत और बचाव कार्यों की क्षमता भी दिखाई जाएगी। इसमें एयरलिफ्ट, रेस्क्यू और इवैक्यूएशन ऑपरेशन शामिल हैं, जो देश और विदेश दोनों जगहों पर किए जा सकते हैं।

महिला पायलट भी अहम भूमिका में

इस अभ्यास की एक खास बात यह भी है कि इसमें महिला पायलटों को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं। वे हाई विजिबिलिटी मिशन में हिस्सा ले रही हैं और फाइटर और हेलीकॉप्टर ऑपरेशन का हिस्सा हैं। (Vayushakti 2026)

पूरे आयोजन की जिम्मेदारी साउथ वेस्ट एयर कमांड पर

इस बड़े आयोजन की योजना और संचालन की जिम्मेदारी साउथ वेस्ट एयर कमांड को दी गई है। इसमें कई सिविल और डिफेंस मेहमानों के साथ विदेशी प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया गया है। (Vayushakti 2026)

क्या है भारतीय वायुसेना की Kalari Leap Exercise? जब लक्षद्वीप में एयरफोर्स, कोस्ट गार्ड और स्पेशल फोर्स एक साथ उतरे मिशन पर

Kalari Leap Exercise

Kalari Leap Exercise: भारतीय वायुसेना की दक्षिण एयर कमांड ने हाल ही में ‘कलारी लीप’ नाम की जॉइंट मैरिटाइम एक्सरसाइज का आयोजन किया था। जिसे लक्षद्वीप और मिनिकॉय द्वीपसमूह में सफलतापूर्वक पूरा किया गया। इस अभ्यास में भारतीय वायुसेना के साथ आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल ऑपरेशंस डिवीजन और इंडियन कोस्ट गार्ड की टीमें भी शामिल रहीं। यह अभ्यास समुद्री इलाकों में तेज और सटीक ऑपरेशन करने की क्षमता को परखने के लिए आयोजित किया गया था।

Kalari Leap Exercise: क्या है कलारी लीप?

‘कलारी लीप’ नाम के पीछे भी एक खास अर्थ है। यह नाम केरल की पारंपरिक मार्शल आर्ट ‘कलरिपयट्टू’ से लिया गया है, जो ताकत, संतुलन और तेज कार्रवाई का प्रतीक मानी जाती है। इसी भावना को ध्यान में रखते हुए इस अभ्यास का नाम रखा गया, ताकि एयर, समुद्र और जमीन तीनों क्षेत्रों में एक साथ काम करने की क्षमता को दिखाया जा सके।

इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य जॉइंट प्लानिंग, रैपिड फोर्स प्रोजेक्शन और प्रिसिजन एक्जीक्यूशन को टेस्ट करना था। आसान शब्दों में कहें तो यह देखा गया कि कैसे अलग-अलग फोर्स मिलकर कितनी तेजी से किसी मिशन को प्लान कर सकती हैं, कितनी जल्दी फोर्स को मौके पर पहुंचा सकती हैं और कितनी सटीकता से ऑपरेशन को पूरा कर सकती हैं। यह अभ्यास खास तौर पर ऐसे समुद्री इलाकों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, जहां भौगोलिक हालात चुनौतीपूर्ण होते हैं।

अभ्यास के दौरान कई तरह के ऑपरेशन किए गए। इसमें एयरबोर्न और एयर-लैंडेड इंसर्शन शामिल था, जिसमें सैनिकों को हवाई मार्ग से टारगेट एरिया में उतारा गया। इसके अलावा हेलीकॉप्टर के जरिए स्पेशल मिशन भी किए गए, जिन्हें हेलिबोर्न ऑपरेशन कहा जाता है। समुद्र से तट पर हमला करने की तैयारी के लिए एम्फीबियस असॉल्ट की भी प्रैक्टिस की गई। (Kalari Leap Exercise)

एंटी-शिप स्ट्राइक का अभ्यास

इसके साथ ही एंटी-शिप स्ट्राइक का अभ्यास किया गया, जिसमें दुश्मन के जहाजों को निशाना बनाने की प्रक्रिया को परखा गया। समुद्र में किसी आपात स्थिति से निपटने के लिए सर्च एंड रेस्क्यू यानी खोज और बचाव अभियान भी इस अभ्यास का हिस्सा रहा। इन सभी ऑपरेशन्स को इस तरह डिजाइन किया गया था कि वास्तविक परिस्थितियों के करीब अनुभव मिल सके।

इस एक्सरसाइज में भारतीय वायुसेना ने कई अहम एसेट्स का इस्तेमाल किया। इसमें एएन-32 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, एमआई-17 वी5 हेलीकॉप्टर और सुखोई-30 एमकेआई फाइटर जेट शामिल रहे। एएन-32 का इस्तेमाल सैनिकों को ले जाने और मेडिकल इवैक्यूएशन के लिए किया गया। वहीं, सुखोई-30 एमकेआई फाइटर जेट ने मैरिटाइम स्ट्राइक मिशन में हिस्सा लिया। (Kalari Leap Exercise)

इंडियन कोस्ट गार्ड भी हुआ शामिल

इंडियन कोस्ट गार्ड ने भी इस अभ्यास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कोस्ट गार्ड के जहाज, जेमिनी बोट्स और डोर्नियर 228 एयरक्राफ्ट का इस्तेमाल किया गया। डोर्नियर विमान ने सर्च एंड रेस्क्यू मिशन में मदद की और फाइटर जेट्स को गाइड करने का काम भी किया। इसके अलावा स्पेशल फोर्स के जवानों ने कॉम्बैट फ्री फॉल यानी पैराशूट जंप के जरिए इंसर्शन किया और एम्फीबियस ऑपरेशन में भाग लिया।

इस अभ्यास का एक अहम हिस्सा मास कैजुअल्टी मैनेजमेंट ड्रिल भी रहा। इसमें घायल सैनिकों को तेजी से निकालने और इलाज के लिए एयरलिफ्ट करने की प्रक्रिया का अभ्यास किया गया। अगत्ती से तिरुवनंतपुरम तक एएन-32 एयरक्राफ्ट के जरिए मरीजों को ले जाने का अभ्यास किया गया, जिससे मेडिकल रिस्पॉन्स सिस्टम को भी मजबूत किया जा सके। (Kalari Leap Exercise)

एयर डिफेंस सिस्टम और नेटवर्क के साथ मिलकर करे काम

‘कलारी लीप’ अभ्यास में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि इसे इस तरह डिजाइन किया गया था कि यह मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम और नेटवर्क के साथ मिलकर काम कर सके। इसमें एंटी-जैमिंग और एडवांस कम्युनिकेशन सिस्टम का भी इस्तेमाल किया गया, ताकि ऑपरेशन के दौरान किसी तरह की रुकावट न आए।

यह अभ्यास यह दिखाने के लिए आयोजित किया गया था कि भारतीय सशस्त्र बल द्वीपीय क्षेत्रों में एक साथ मिलकर ऑपरेशन करने में सक्षम हैं। इसमें एयर, मैरिटाइम और स्पेशल ऑपरेशंस का पूरा तालमेल देखने को मिला। अभ्यास के दौरान सभी फोर्सेस ने मिलकर जटिल ऑपरेशन्स को अंजाम दिया और अपनी तैयारी का प्रदर्शन किया। (Kalari Leap Exercise)

INS विक्रांत पर खत्म हुई नेवी की सबसे बड़ी मल्टीनेशनल एक्सरसाइज MILAN 2026, 40 से ज्यादा युद्धपोत और 29 एयरक्राफ्ट हुए शामिल

Indian Navy MILAN 2026 Exercise

MILAN 2026 Exercise: भारतीय नौसेना द्वारा आयोजित मल्टीनेशनल मैरीटाइम एक्सरसाइज मिलन 2026 का समापन 25 फरवरी को सफलतापूर्वक किया गया। इस अभ्यास की क्लोजिंग सेरेमनी विशाखापत्तनम के तट के पास समुद्र में भारत के स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत पर आयोजित हुई। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता ईस्टर्न फ्लीट के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग रियर एडमिरल आलोक आनंदा ने की। इस मौके पर सभी भाग लेने वाले देशों के कमांडिंग ऑफिसर्स और अधिकारी मौजूद रहे।

मिलन 2026 भारतीय नौसेना की एक प्रमुख मल्टीनेशनल मैरीटाइम एक्सरसाइज है, जिसमें इस बार रिकॉर्ड स्तर पर भागीदारी देखने को मिली। इस एक्सरसाइज में कुल 42 युद्धपोत और पनडुब्बियां शामिल हुईं, जबकि 29 एयरक्राफ्ट ने भी इसमें हिस्सा लिया। इनमें 18 जहाज मित्र देशों की नौसेनाओं के थे, जो इस अभ्यास में शामिल हुए। इसके अलावा फ्रांस, जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों के मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट ने भी इस अभ्यास में हिस्सा लिया। (MILAN 2026 Exercise)

Indian Navy MILAN 2026 Exercise

यह अभ्यास ‘कैमराडरी, कोऑपरेशन और कोलैबोरेशन’ थीम के तहत आयोजित किया गया था। इसका मकसद विभिन्न देशों की नौसेनाओं के बीच बेहतर तालमेल और सहयोग को मजबूत करना था। इस एक्सरसाइज की शुरुआत हार्बर फेज से हुई, जिसमें अलग-अलग देशों के बीच द्विपक्षीय बातचीत, सब्जेक्ट मैटर एक्सपर्ट एक्सचेंज प्रोग्राम और इंटरनेशनल मैरीटाइम सेमिनार का आयोजन किया गया। इसके साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रम, क्रॉस-डेक विजिट और अलग-अलग जगहों पर इंटरैक्शन भी आयोजित किए गए। (MILAN 2026 Exercise)

हार्बर फेज के दौरान टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेशन और यंग ऑफिसर्स के लिए खास इंटरैक्शन प्रोग्राम भी आयोजित किए गए। इससे अलग-अलग देशों के नौसेना अधिकारियों को एक-दूसरे के अनुभव और कार्यशैली को समझने का मौका मिला। इसके अलावा खेल गतिविधियों के जरिए भी अनौपचारिक बातचीत और संबंध मजबूत करने की कोशिश की गई।

Indian Navy MILAN 2026 Exercise

इसके बाद एक्सरसाइज का सी फेज शुरू हुआ, जिसमें समुद्र में हाई-इंटेंसिटी ऑपरेशनल ड्रिल्स आयोजित की गईं। इन ड्रिल्स में एडवांस्ड वारफेयर तकनीकों पर फोकस किया गया, जिसमें इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस, एंटी-सबमरीन वारफेयर, मैरीटाइम इंटरडिक्शन ऑपरेशन्स और सरफेस स्ट्राइक ऑपरेशन्स शामिल थे। इसके साथ ही कम्युनिकेशन एक्सरसाइज और क्रॉस-डेक फ्लाइंग ऑपरेशन्स भी किए गए, जिससे सभी देशों की नौसेनाओं के बीच तालमेल को और बेहतर बनाया गया। (MILAN 2026 Exercise)

इस दौरान लाइव फायरिंग एक्सरसाइज भी की गई, जिसमें गन फायर और एंटी-एयर फायरिंग शामिल रही। समुद्र में रियल टाइम कोऑर्डिनेशन, जॉइंट मिशन प्लानिंग और लॉजिस्टिक सपोर्ट पर भी खास ध्यान दिया गया। इस अभ्यास में शामिल सभी नौसेनाओं ने मिलकर हाई-टेम्पो टैक्टिकल ऑपरेशन्स को अंजाम दिया।

मिलन 2026 के दौरान विभिन्न देशों की नौसेनाओं ने भारतीय नौसेना के साथ मिलकर कई जटिल ऑपरेशन्स किए, जिससे समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया। इस अभ्यास ने यह दिखाया कि अलग-अलग देशों की नौसेनाएं एक साथ मिलकर समुद्र में किसी भी स्थिति का सामना कर सकती हैं। (MILAN 2026 Exercise)

पीएम मोदी के जेरूसलम दौरे में भारत को मिल सकती है आयरन डोम आयरन बीम की सौगात! सुदर्शन चक्र शील्ड होगी मजबूत

Israel India Defence Deal 2026

Israel India Defence Deal 2026: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25 फरवरी को दो दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर इजराइल पहुंचे हुए हैं। यह इजराइल की उनकी दूसरी यात्रा है। बेन गुरियन एयरपोर्ट पर इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने खुद उनका स्वागत किया। इस दौरान गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया और दोनों नेताओं के बीच गर्मजोशी भरी मुलाकात हुई। यह स्वागत प्रोटोकॉल से अलग माना गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जेरूसलम यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच बड़े रक्षा समझौते होने की उम्मीद है, जिनकी कुल कीमत लगभग 8 से 10 अरब डॉलर तक बताई जा रही है। इन समझौतों में मिसाइल, ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी आधुनिक तकनीकों पर खास फोकस है। (Israel India Defence Deal 2026)

यात्रा के पहले दिन प्रधानमंत्री मोदी ने इजराइली संसद केनेस्सेट में संबोधन दिया, जहां बहुत कम विदेशी नेताओं को बोलने का मौका मिलता है। इसके अलावा उन्होंने राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग से मुलाकात की और यद वशेम होलोकॉस्ट मेमोरियल का दौरा किया। इस दौरान दोनों देशों के बीच इनोवेशन समिट और संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस भी आयोजित हुई। (Israel India Defence Deal 2026)

Israel India Defence Deal 2026: रक्षा समझौतों पर खास फोकस

इस यात्रा का सबसे ज्यादा फोकस भारत और इजराइल के बीच रक्षा सहयोग को लेकर है। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इन समझौतों की कुल कीमत लगभग 8.6 से 10 अरब डॉलर के बीच बताई जा रही है। इन डील्स में एयर डिफेंस, मिसाइल, ड्रोन और एडवांस टेक्नोलॉजी से जुड़े कई बड़े प्रोजेक्ट शामिल हैं।

इन समझौतों के तहत भारत को मल्टी लेयर एयर डिफेंस सिस्टम मजबूत करने में मदद मिलेगी। इसमें आयरन डोम, डेविड स्लिंग और एरो जैसे सिस्टम शामिल हैं। इसके साथ ही आयरन बीम लेजर सिस्टम भी चर्चा में है, जो लेजर आधारित तकनीक से दुश्मन के टारगेट को नष्ट करने की क्षमता रखता है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय में हो रहा है जब हाल के सालों में युद्ध के तरीके तेजी से बदले हैं। 2023 से 2025 के बीच हुए मिडिल ईस्ट युद्ध में इजराइल के एयर डिफेंस सिस्टम ने अपनी ताकत साबित की थी। वहीं मई 2025 में भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान ड्रोन, मिसाइल और साइबर हमलों से जुड़े खतरे भी सामने आए थे। इसी अनुभव के आधार पर भारत अपनी सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। (Israel India Defence Deal 2026)

मल्टी लेयर एयर डिफेंस सिस्टम की तैयारी

इस यात्रा के दौरान इजराइल के मल्टी-लेयर मिसाइल डिफेंस सिस्टम के चार बड़े हिस्सों पर सहयोग की संभावना है। इनमें एरो मिसाइल डिफेंस सिस्टम, डेविड्स स्लिंग, आयरन डोम और आयरन बीम शामिल है, जो लेजर आधारित तकनीक से दुश्मन के टारगेट को नष्ट करने की क्षमता रखता है। इनमें से आयरन डोम और आयरन बीम पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। हालांकि अभी तक इन कंपनियों की तरफ से किसी अंतिम समझौते की औपचारिक पुष्टि नहीं की गई है।

वहीं, भारत पहले से ही रूस के एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम, आकाश और बाराक जैसे सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है। इजराइल के साथ सहयोग से इन सभी सिस्टम को बेहतर तरीके से जोड़ने और उनकी क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। इससे भारत लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल, मध्यम दूरी के रॉकेट और क्रूज मिसाइल के साथ-साथ कम दूरी के खतरों से भी निपट सकेगा।

इस सहयोग के तहत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर भी जोर दिया गया है, जिससे भारत में ही इन सिस्टम का उत्पादन और विकास किया जा सके। यह आत्मनिर्भर भारत पहल के अनुरूप है। (Israel India Defence Deal 2026)

मिसाइल और हथियारों पर समझौते

इसके अलावा हमलावर हथियारों के क्षेत्र में भी कई समझौते सामने आ सकते हैं। इनमें स्पाइस 1000 गाइडेड बम, रैम्पेज एयर-टू-ग्राउंड मिसाइल, आइस ब्रेकर नेवल क्रूज मिसाइल और एयर लोरा सुपरसोनिक मिसाइल शामिल हैं। इन हथियारों की खासियत यह है कि ये लंबी दूरी से सटीक निशाना लगाने में सक्षम हैं।

इसके अलावा स्पाइक एंटी टैंक मिसाइल भी इस सहयोग का हिस्सा है, जो जमीन पर मौजूद टारगेट को नष्ट करने में इस्तेमाल होती है। (Israel India Defence Deal 2026)

ड्रोन और निगरानी क्षमता में बढ़ोतरी

ड्रोन युद्ध के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच बड़े समझौते की उम्मीद है। इजराइल की कई कंपनियां इस क्षेत्र में काम कर रही हैं और अलग-अलग तकनीक पेश कर रही हैं। इनमें हर्मीस 900 ड्रोन को लेकर बड़ा समझौता होने की संभावना जताई जा रही है, जो निगरानी और ऑपरेशन दोनों में अहम भूमिका निभा सकता है। भारत में इसे “दृष्टि 10 स्टारलाइनर” के नाम से डेवलप किया जा रहा है।

यह ड्रोन लंबी दूरी तक निगरानी करने और कई तरह के मिशन को अंजाम देने में सक्षम है। इससे सीमा पर निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिलेगी। (Israel India Defence Deal 2026)

एयर डिफेंस सिस्टम की रेंज से बाहर से हमला

रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत ऐसी क्षमता भी विकसित करना चाहता है, जिससे वह दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम की रेंज से बाहर रहकर हमला कर सके। इज़राइल ने जून 2025 में ईरान के खिलाफ इसी तरह की रणनीति का इस्तेमाल किया था।

इजराइल से भारत को 34 फीसदी रक्षा निर्यात

भारत और इजराइल के बीच रक्षा संबंध पहले से ही मजबूत रहे हैं। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच इजराइल के कुल रक्षा निर्यात का लगभग 34 फीसदी हिस्सा भारत को गया। इसी अवधि में दोनों देशों के बीच करीब 20.5 अरब डॉलर के रक्षा सौदे हुए।

2012 से 2017 के बीच दोनों देशों के रक्षा सौदों में तेजी से बढ़ोतरी हुई थी, जिसमें बाराक एयर डिफेंस सिस्टम का बड़ा समझौता भी शामिल था। इसके बाद 2017 से 2023 के बीच यह रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ी, क्योंकि भारत ने “मेक इन इंडिया” पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया। (Israel India Defence Deal 2026)

हालांकि 2024 के बाद स्थिति फिर बदलने लगी, जब इजराइली कंपनियों ने भारत में निवेश बढ़ाया और यहां अपनी सहायक कंपनियां स्थापित कीं। अब दोनों देश केवल खरीद तक सीमित नहीं रहकर संयुक्त उत्पादन और लंबी अवधि की साझेदारी की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

इस यात्रा के दौरान साइबर सिक्योरिटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने की योजना है। इन क्षेत्रों में संयुक्त प्रोजेक्ट्स और जॉइंट वेंचर शुरू किए जा सकते हैं।

कुल मिलाकर, यह दौरा भारत और इजराइल के बीच रक्षा और तकनीकी सहयोग को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है, जिसमें आधुनिक युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कई अहम कदम उठाए जा रहे हैं। (Israel India Defence Deal 2026)

लोंगेवाला से कच्छ के रन तक- 3400 किमी के सफर के बाद दिल्ली पहुंचा सेना का काफिला, भारत रणभूमि दर्शन एक्सपेडिशन का समापन

Bharat Ranbhoomi Darshan Expedition

Bharat Ranbhoomi Darshan Expedition: भारतीय सेना द्वारा आयोजित “भारत रणभूमि दर्शन एक्सपेडिशन 2026” का समापन नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में किया गया। इस एक्सपेडिशन को सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने फ्लैग-इन किया। इस मौके पर कई वरिष्ठ सैन्य और नागरिक अधिकारी मौजूद रहे।

यह एक्सपेडिशन 3 फरवरी को गुजरात के द्वारका से शुरू हुआ था और लगभग 3400 किलोमीटर की यात्रा तय करने के बाद दिल्ली पहुंचा। इस पूरी यात्रा का नेतृत्व भारतीय सेना की रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी ने किया। इस अभियान का उद्देश्य देश के ऐतिहासिक युद्ध स्थलों और सीमावर्ती इलाकों को लोगों तक पहुंचाना था।

इस एक्सपेडिशन के दौरान टीम ने गुजरात और राजस्थान के कई महत्वपूर्ण स्थानों का दौरा किया। इसमें भुज, रण ऑफ कच्छ, मुनाबाव, गदरा, लोंगेवाला, जैसलमेर, बीकानेर और अंबाला जैसे स्थान शामिल रहे। यह सभी इलाके भारत की सुरक्षा और सैन्य इतिहास से जुड़े हुए हैं।

यात्रा के दौरान सैनिकों ने कई ऐतिहासिक युद्ध स्थलों और स्मारकों पर जाकर देश के वीर जवानों को श्रद्धांजलि दी। खास तौर पर लोंगेवाला जैसे स्थानों पर टीम ने 1971 के युद्ध में शहीद हुए सैनिकों को याद किया।

Bharat Ranbhoomi Darshan Expedition

इस एक्सपेडिशन में करीब 35 सदस्यीय दल शामिल था, जिसमें भारतीय सेना के साथ नौसेना और सीमा सुरक्षा बल के जवान भी शामिल थे।

पूरी यात्रा के दौरान यह काफिला सीमा क्षेत्रों की सड़कों और दुर्गम रास्तों से होकर गुजरा। इससे यह भी दिखाया गया कि सीमावर्ती इलाकों में कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार हुआ है। इन सड़कों का निर्माण सीमा सड़क संगठन यानी बीआरओ द्वारा किया गया है, जो सैन्य और नागरिक दोनों के लिए उपयोगी है।

इस एक्सपेडिशन का एक अहम पहलू लोगों से जुड़ाव भी रहा। यात्रा के दौरान टीम ने वीर नारियों, पूर्व सैनिकों, एनसीसी कैडेट्स, छात्रों और स्थानीय लोगों से मुलाकात की। हर स्थान पर लोगों ने इस काफिले का स्वागत किया और सेना के प्रति सम्मान व्यक्त किया।

यह पहल “रणभूमि दर्शन” कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसे भारतीय सेना और पर्यटन मंत्रालय मिलकर आगे बढ़ा रहे हैं। इसका मकसद देश के ऐतिहासिक युद्ध स्थलों को पर्यटन से जोड़ना और युवाओं को देश के सैन्य इतिहास से परिचित कराना है।

सेना प्रमुख ने इस अवसर पर कहा कि इस तरह के अभियान देश की विरासत को सुरक्षित रखने के साथ-साथ नई पीढ़ी को देशसेवा के लिए प्रेरित करते हैं।

हेलीकॉप्टर की भारी कमी के बीच नौसेना का बड़ा फैसला! प्राइवेट सेक्टर से लीज पर लेने के लिए हुई मजबूर!

Indian Navy Helicopter Lease- Leonardo AW139
Leonardo AW139

Indian Navy Helicopter Lease: भारतीय नौसेना ने यूटिलिटी हेलीकॉप्टरों की कमी को पूरा करने के लिए एक बड़ा और अहम कदम उठाया है। नौसेना ने पहली बार प्राइवेट सेक्टर से हेलीकॉप्टर लीज पर लेकर अपनी ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करना शुरू किया है। इस कदम के तहत नौसेना ने AW139 यूटिलिटी हेलीकॉप्टर को “वेट लीज” मॉडल पर शामिल किया है। इनमें से एक हेलीकॉप्टर पूर्वी तट पर और दूसरा पश्चिमी तट पर तैनात किया गया है।

यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारतीय सेनाओं में हेलीकॉप्टर की कमी लंबे समय से बनी हुई है। इससे पहले भारतीय सेना भी इसी तरह का मॉडल अपनाकर प्राइवेट कंपनियों से हेलीकॉप्टर लीज पर ले चुकी है। अब नौसेना ने भी इसी रास्ते पर आगे बढ़ते हुए अपनी जरूरतों को पूरा करने की कोशिश कर रही है। (Indian Navy Helicopter Lease)

Indian Navy Helicopter Lease: क्या है वेट लीज

नौसेना ने यह हेलीकॉप्टर एक प्राइवेट ऑपरेटर कंपनी से लिया है, जो इन्हें ऑपरेट और मेंटेन भी करेगी। इसे वेट लीज कहा जाता है, जिसमें हेलीकॉप्टर के साथ पायलट, मेंटेनेंस और सपोर्ट स्टाफ भी उसी कंपनी के होते हैं। इस मॉडल से बिना लंबे इंतजार के नौसेना को तुरंत ऑपरेशनल क्षमता मिल जाती है।

फरवरी 2026 की शुरुआत में इन हेलीकॉप्टरों में से एक ने पूर्वी समुद्री क्षेत्र में उड़ान भरनी शुरू कर दी है। यह हेलीकॉप्टर यूटिलिटी रोल में इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें लॉजिस्टिक्स सपोर्ट, कम्युनिकेशन, मेडिकल इवैक्यूएशन और सर्च ऑपरेशन जैसे काम शामिल हैं। दूसरे हेलीकॉप्टर को पश्चिमी तट पर इसी तरह के कार्यों के लिए तैनात किया गया है। (Indian Navy Helicopter Lease)

2021 में 24 में हेलीकॉप्टर लीज पर लेने की थी तैयारी

नौसेना ने पहले भी साल 2021 में 24 हेलीकॉप्टर लीज पर लेने की योजना बनाई थी। इस योजना में ग्राउंड सपोर्ट, मेंटेनेंस और ट्रेनिंग जैसी सुविधाएं भी शामिल थीं, लेकिन यह प्रोग्राम आगे नहीं बढ़ सका। इसके बाद नौसेना और कोस्ट गार्ड ने एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर मार्क-3 (एएलएच एमके3) को शामिल किया, लेकिन हाल के वर्षों में इन हेलीकॉप्टरों के साथ कई हादसे हुए।

इन हादसों में कुल चार हेलीकॉप्टर खो गए, जिनमें से दो मामलों में जान का नुकसान भी हुआ। 5 जनवरी 2025 को हुए एक बड़े हादसे के बाद पूरे एएलएच फ्लीट को कुछ समय के लिए ग्राउंड कर दिया गया था। जांच में एक तकनीकी खराबी सामने आई थी, जिसके बाद इस फ्लीट की उड़ान पर असर पड़ा। (Indian Navy Helicopter Lease)

सी किंग पड़ चुके हैं पुराने

इस बीच पुराने हेलीकॉप्टर जैसे अलुएट-3 और सी किंग भी धीरे-धीरे सेवा से बाहर हो रहे हैं। नए हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी में समय लग रहा है, जिससे नौसेना के सामने ऑपरेशनल गैप की स्थिति बन गई। इसी वजह से लीज मॉडल को फिर से अपनाया गया है।

नौसेना द्वारा लिए गए AW139 हेलीकॉप्टर सिविल एविएशन नियमों के तहत ऑपरेट किए जाएंगे। इसके लिए डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन यानी डीजीसीए द्वारा तय स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर के अनुसार काम किया जाएगा। इन हेलीकॉप्टरों का उपयोग तटीय इलाकों, जहाजों और ऑफशोर एसेट्स के बीच आवाजाही के लिए किया जाएगा।

हालांकि इन हेलीकॉप्टरों में कुछ सीमाएं भी हैं। इनमें रेस्क्यू विंच और ब्लेड फोल्डिंग की सुविधा नहीं है, जिसकी वजह से इन्हें जहाजों पर सीधे ऑपरेशन के लिए सीमित रूप से इस्तेमाल किया जा सकेगा। ऐसे में इनका उपयोग मुख्य रूप से ट्रांजिट और सपोर्ट मिशन के लिए किया जाएगा। (Indian Navy Helicopter Lease)

लियोनार्डो के AW139 को चुना

इस लीज प्रक्रिया के लिए ईस्टर्न नेवल कमांड और वेस्टर्न नेवल कमांड ने टेंडर जारी किया था। इसमें दो भारतीय कंपनियों को शॉर्टलिस्ट किया गया था। प्रतिस्पर्धा के बाद लियोनार्डो कंपनी के AW139 हेलीकॉप्टर को चुना गया, जिसने एयरबस डॉफिन N3 हेलीकॉप्टर को पीछे छोड़ा।

भारत में रक्षा खरीद प्रक्रिया के तहत हेलीकॉप्टर लीज करने का प्रावधान डीएपी 2020 में शामिल किया गया है। इसके जरिए सेना और नौसेना जैसी सेवाएं अपनी तत्काल जरूरतों को तेजी से पूरा कर सकती हैं। इसी मॉडल पर भारतीय सेना पहले से ही उत्तरी कमान में हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल कर रही है।

वर्तमान में सेना के पास AS350 B3 और बेल 407 जैसे हल्के हेलीकॉप्टर प्राइवेट कंपनियों से लीज पर लिए गए हैं, जिनका इस्तेमाल कठिन इलाकों में लॉजिस्टिक्स और कम्युनिकेशन के लिए किया जा रहा है। अब नौसेना ने भी इसी तरह का मॉडल अपनाकर अपनी ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। (Indian Navy Helicopter Lease)

यूटिलिटी हेलीकॉप्टर-मैरीटाइम में है देरी

भारतीय नौसेना द्वारा हेलीकॉप्टर की कमी को पूरा करने के लिए प्राइवेट कंपनियों से चॉपर लीज पर लेने के बीच एक और अहम अपडेट सामने आया है। सेंटरम इलेक्ट्रॉनिक्स को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल से लगभग 66 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है। यह ऑर्डर यूटिलिटी हेलीकॉप्टर-मैरीटाइम यानी यूएच-एम के लिए एईएसए रडार के डिजाइन और डेवलपमेंट से जुड़ा है, जिसे अगले दो साल में पूरा किया जाना है।

एईएसए रडार एक आधुनिक रडार तकनीक है, जो एक साथ कई टारगेट को ट्रैक करने और ज्यादा सटीक जानकारी देता है। इस रडार का इस्तेमाल यूएच-एम हेलीकॉप्टर में किया जाएगा, जो भविष्य में नौसेना के लिए एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म माना जा रहा है।

हालांकि, इस ऑर्डर से यह भी साफ संकेत मिलता है कि यूएच-एम प्रोग्राम अभी शुरुआती चरण में है। रडार के डेवलपमेंट में ही दो साल लगने हैं, इसके बाद हेलीकॉप्टर में इंटीग्रेशन, टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया भी होगी। ऐसे में इस हेलीकॉप्टर के ऑपरेशनल रूप से शामिल होने में अभी करीब 4 से 5 साल का समय लग सकता है। यही वजह है कि फिलहाल नौसेना को अपनी तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए लीज मॉडल का सहारा लेना पड़ रहा है। (Indian Navy Helicopter Lease)

भारतीय सेना को चाहिए नया ‘ड्रोन इंटरसेप्शन सिस्टम’, स्वॉर्म अटैक से निपटने की है तैयारी, जारी की RFI

Drone Interception System RFI Indian Army

Drone Interception System RFI: भारतीय सेना अब ड्रोन इंटरसेप्शन सिस्टम खरीदने की तैयारी कर रही है। रूस-यूक्रेन जंग से सबक लेते हुए आर्मी एयर डिफेंस विंग एक अहम रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन यानी आरएफआई जारी किया है। जिसमें ड्रोन इंटरसेप्शन सिस्टम की खरीद के लिए कंपनियों से जानकारी मांगी गई है। यह सिस्टम खास तौर पर छोटे और कम रडार सिग्नेचर वाले ड्रोन और यूएएस यानी अनमैन्ड एरियल सिस्टम से निपटने के लिए तैयार किया जाएगा। हाल के समय में ड्रोन और स्वॉर्म अटैक का खतरा तेजी से बढ़ा है, इसलिए सेना अब ऐसे सिस्टम की तलाश में है जो इन खतरों का सीधे मुकाबला कर सके। (Drone Interception System RFI)

Drone Interception System RFI: क्या है यह RFI और क्यों जारी हुआ?

यह आरएफआई सेना के एयर डिफेंस निदेशालय द्वारा जारी किया गया है और इसका मकसद कंपनियों से तकनीकी और ऑपरेशनल जानकारी जुटाना है। यह कोई फाइनल खरीद प्रक्रिया नहीं है, बल्कि आगे आने वाले टेंडर और ट्रायल की तैयारी का पहला चरण माना जाता है। इसमें साफ किया गया है कि सरकार इस प्रक्रिया को कभी भी बदल या रद्द कर सकती है और यह पूरी प्रक्रिया डीएपी 2020 के नियमों के तहत आगे बढ़ेगी। (Drone Interception System RFI)

तीन हिस्सों में पूरा नेटवर्क

इस प्रस्तावित सिस्टम को ड्रोन इंटरसेप्शन सिस्टम यानी डीआईएस कहा गया है। यह एक ऐसा सिस्टम होगा जो दुश्मन के ड्रोन को हवा में ही रोक सके और उन्हें नष्ट कर सके। इसमें तीन मुख्य हिस्से होंगे, जिनमें एक ड्रोन सेंसर, एक ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन और चार ड्रोन इंटरसेप्टर शामिल होंगे। इन तीनों हिस्सों के जरिए पूरा सिस्टम मिलकर काम करेगा और दुश्मन के ड्रोन पर नजर रखने से लेकर उसे खत्म करने तक का पूरा काम करेगा। (Drone Interception System RFI)

ड्रोन सेंसर: आसमान पर 360 डिग्री नजर

ड्रोन सेंसर इस सिस्टम का सबसे अहम हिस्सा होगा। यह सेंसर इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे तकनीक पर आधारित होगा। इसका काम आसमान में हर दिशा में नजर रखना होगा और एक साथ कम से कम 20 ड्रोन को पहचानना, ट्रैक करना और उनकी प्राथमिकता तय करना होगा। यह सेंसर बहुत छोटे ड्रोन को भी कई किलोमीटर दूर से पकड़ सकेगा और उनकी लोकेशन, दिशा और ऊंचाई की जानकारी देगा। (Drone Interception System RFI)

ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन: पूरा ऑपरेशन यहीं से कंट्रोल

इसके बाद यह जानकारी ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन तक पहुंचेगी। यह स्टेशन एक तरह का कंट्रोल सेंटर होगा, जिसमें लैपटॉप या टैबलेट आधारित सिस्टम होगा। इसमें ऑपरेटर को सभी जरूरी जानकारी रियल टाइम में दिखाई देगी। यह स्टेशन ड्रोन इंटरसेप्टर को कमांड देगा और उसे टारगेट तक पहुंचाएगा। इसमें डेटा रिकॉर्डिंग की सुविधा भी होगी, जिससे मिशन के बाद पूरा विश्लेषण किया जा सकेगा। यह स्टेशन आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकेगा और फील्ड में जल्दी तैनात किया जा सकेगा। (Drone Interception System RFI)

ड्रोन इंटरसेप्टर: हवा में ही दुश्मन का खात्मा

ड्रोन इंटरसेप्टर इस पूरे सिस्टम का सबसे एक्टिव पार्ट होगा। यह एक खास तरह का ड्रोन होगा जो दुश्मन के ड्रोन को हवा में ही खत्म करेगा। इसमें दो तरह की क्षमता होगी, एक काइनेटिक यानी सीधे टक्कर मारकर दुश्मन ड्रोन को गिराना और दूसरा हाई एक्सप्लोसिव यानी विस्फोट के जरिए उसे नष्ट करना। यह इंटरसेप्टर पूरी तरह ऑटोमैटिक होगा और फायर एंड फॉरगेट तकनीक पर काम करेगा। यानी एक बार लॉन्च होने के बाद यह खुद ही लक्ष्य तक पहुंचकर हमला करेगा।

हर इलाके में तैनाती के लिए तैयार

इस सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि यह हर तरह के भारतीय इलाके में काम कर सके। चाहे रेगिस्तान हो, पहाड़ी इलाका हो, समुद्र के पास का क्षेत्र हो या फिर ऊंचाई वाले इलाके, हर जगह यह सिस्टम काम करने में सक्षम होगा। इसे माइनस 20 डिग्री से लेकर प्लस 45 डिग्री तापमान तक चलाने की क्षमता रखनी होगी और नमी वाले वातावरण में भी यह काम कर सकेगा। (Drone Interception System RFI)

आकाशतीर से इंटीग्रेशन

इस सिस्टम की एक खास बात यह भी है कि इसे मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम और आकाशतीर जैसे नेटवर्क से जोड़ा जा सकेगा। इससे सेना को एकीकृत कमांड एंड कंट्रोल मिलेगा और सभी सिस्टम आपस में जुड़कर तेजी से काम कर सकेंगे। इसमें एंटी-जैमिंग क्षमता भी होगी, जिससे दुश्मन अगर इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग की कोशिश करे तो भी सिस्टम सही तरीके से काम करता रहेगा।

सॉफ्टवेयर और AI की भूमिका

इसमें इस्तेमाल होने वाला सॉफ्टवेयर पूरी तरह स्वदेशी होगा और भविष्य में इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक को इंटीग्रेट करने की भी संभावना रखी गई है। सिस्टम में डेटा स्टोरेज की सुविधा भी होगी, जिससे एक महीने तक का डेटा सुरक्षित रखा जा सकेगा और बाद में उसे ट्रेनिंग या विश्लेषण के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा।

स्वदेशी तकनीक पर जोर

सेना ने इस आरएफआई में कंपनियों के लिए कुछ शर्तें भी रखी हैं। इसमें कहा गया है कि कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सा स्वदेशी होना चाहिए। यानी सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले उपकरण, सॉफ्टवेयर और कंपोनेंट भारत में बने होने चाहिए। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

कंपनियों को अपनी जानकारी 25 मार्च तक जमा करनी होगी। इसके बाद सेना इन प्रस्तावों का अध्ययन करेगी और आगे की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इसमें ट्रायल, टेक्निकल इवैल्यूएशन और कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशन जैसे कई चरण शामिल होंगे।

इस पूरी प्रक्रिया में स्टार्टअप और एमएसएमई कंपनियों को भी मौका दिया जा रहा है। छोटे उद्यमों के लिए कुछ वित्तीय शर्तों में छूट भी दी गई है, ताकि ज्यादा से ज्यादा भारतीय कंपनियां इसमें भाग ले सकें। (Drone Interception System RFI)

बढ़ते ड्रोन खतरे के बीच अहम पहल

इस सिस्टम की जरूरत इसलिए महसूस की जा रही है क्योंकि आधुनिक युद्ध में ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। छोटे ड्रोन भी अब बड़े नुकसान पहुंचा सकते हैं और स्वॉर्म अटैक यानी एक साथ कई ड्रोन के हमले को रोकना एक बड़ी चुनौती बन चुका है। ऐसे में यह ड्रोन इंटरसेप्शन सिस्टम सेना की सुरक्षा क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। (Drone Interception System RFI)

Su-30MKI अपग्रेड पर बड़ा अपडेट! भारतीय वायुसेना ने अपनाई ड्यूल ट्रैक स्ट्रैटेजी, रूस के साथ पैरेलल प्लान शुरू

Super Sukhoi Upgrade

Super Sukhoi Upgrade: भारतीय वायुसेना अपने सबसे बड़े फाइटर जेट बेड़े सु-30एमकेआई को अपग्रेड करने के लिए नई रणनीति पर काम कर रही है। “सुपर सुखोई अपग्रेड” नाम से चल रहे इस प्रोग्राम को अभी तक कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी यानी सीसीएस की अंतिम मंजूरी नहीं मिली है। इसी देरी के चलते वायुसेना अब एक साथ दो विकल्पों पर काम करने की योजना बना रही है, जिसे ड्यूल-ट्रैक स्ट्रैटेजी कहा जा रहा है।

इस रणनीति के तहत एक तरफ स्वदेशी अपग्रेड प्रोग्राम जारी रहेगा, वहीं दूसरी तरफ रूस के साथ मिलकर एक पैरेलल अपग्रेड प्लान पर भी विचार किया जा रहा है। इसका मकसद यह है कि वायुसेना की ऑपरेशनल तैयारी पर कोई असर न पड़े। (Super Sukhoi Upgrade)

Super Sukhoi Upgrade: क्या है सुपर सुखोई प्रोग्राम

सुपर सुखोई प्रोग्राम के तहत भारतीय वायुसेना के सु-30एमकेआई फाइटर जेट्स को आधुनिक बनाया जाना है। शुरुआत में करीब 84 विमानों को अपग्रेड करने की योजना है, लेकिन आगे चलकर पूरी फ्लीट के बड़े हिस्से को अपग्रेड करने का टारगेट रखा गया है। फिलहाल वायुसेना के पास लगभग 260 से ज्यादा सु-30एमकेआई विमान हैं।

इस प्रोग्राम में स्वदेशी तकनीक पर जोर दिया जा रहा है। इसमें डीआरडीओ और एचएएल मिलकर काम कर रहे हैं। अपग्रेड के तहत नए रडार, आधुनिक एवियोनिक्स, डिजिटल कॉकपिट और बेहतर इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम लगाए जाने हैं। (Super Sukhoi Upgrade)

देरी क्यों बनी चिंता की वजह

इस प्रोजेक्ट को नवंबर 2023 में शुरुआती मंजूरी यानी एओएन मिल चुकी थी, लेकिन अंतिम मंजूरी अभी बाकी है। अधिकारियों के अनुसार, अगर मंजूरी जल्द भी मिलती है तो इस पूरे अपग्रेड को पूरा होने में कई साल लग सकते हैं। शुरुआती ऑपरेशनल क्लियरेंस में लगभग पांच साल और पूरी तरह तैयार होने में सात साल तक का समय लग सकता है।

यही वजह है कि वायुसेना केवल इसी प्रोग्राम पर निर्भर नहीं रहना चाहती और उसने दूसरा विकल्प भी तलाशना शुरू कर दिया है। (Super Sukhoi Upgrade)

रूस के साथ पैरेलल अपग्रेड प्लान

सूत्रों के अनुसार, वायुसेना रूस के साथ मिलकर सु-30 के लिए एक अलग अपग्रेड प्लान पर विचार कर रही है। हाल ही में रूस की एक टीम ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के नासिक प्लांट का दौरा भी किया है।

इस पैरेलल प्लान में खास तौर पर रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम को मजबूत करने पर ध्यान दिया जाएगा। इसके अलावा रूस ने नए और ज्यादा ताकतवर एएल-41एफ-1 इंजन देने का प्रस्ताव भी रखा है, जिसे वर्तमान एएल-31 इंजन से बेहतर माना जाता है। नया इंजन 15 फीसदी ज्यादा थ्रस्ट देता है। (Super Sukhoi Upgrade)

दोनों ट्रैक कैसे करेंगे काम

इस योजना के तहत भारत और रूस दोनों अपने-अपने हिस्से का काम करेंगे। भारत में एचएएल और डीआरडीओ सिस्टम का इंटीग्रेशन और डेवलपमेंट करेंगे, जबकि रूस से कुछ जरूरी तकनीक और उपकरण लिए जा सकते हैं। यह मॉडल पहले मिग-21 बाइसन अपग्रेड में भी अपनाया गया था।

इसका उद्देश्य यह है कि अपग्रेड का काम तेजी से हो और वायुसेना के बेड़े में किसी तरह की क्षमता की कमी न आए। (Super Sukhoi Upgrade)

विरूपाक्ष एईएसए रडार की तैयारी

स्वदेशी अपग्रेड में विरूपाक्ष एईएसए रडार लगाया जाएगा, जो मौजूदा रडार से ज्यादा ताकतवर माना जा रहा है। इसमें गैलियम नाइट्राइड तकनीक का इस्तेमाल होगा, जिससे दुश्मन को ज्यादा दूरी से पहचानना संभव होगा।

इसके अलावा इन विमानों में ब्रह्मोस-ईआर मिसाइल, अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल और रुद्रम एंटी-रेडिएशन मिसाइल जैसे आधुनिक हथियार शामिल किए जाएंगे। इससे विमान की मारक क्षमता और बढ़ेगी। जबकि इंडीजीनियस कंटेंट 70 से 78 फीसदी तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। (Super Sukhoi Upgrade)

क्यों जरूरी है यह अपग्रेड

भारतीय वायुसेना के सामने स्क्वाड्रन की संख्या से जुड़ी चुनौती भी है। मौजूदा समय में वायुसेना के पास जरूरी संख्या से कम स्क्वाड्रन हैं। ऐसे में मौजूदा विमानों को आधुनिक बनाना जरूरी हो जाता है, ताकि उनकी क्षमता बनी रहे। इसी को ध्यान में रखते हुए वायुसेना ने यह ड्यूल-ट्रैक रणनीति अपनाने का फैसला किया है, जिसमें स्वदेशी और विदेशी दोनों विकल्पों को साथ लेकर चलने की कोशिश की जा रही है। (Super Sukhoi Upgrade)

ब्रह्मोस से लैस स्टेल्थ वॉरशिप INS तारागिरी नौसेना में होगा शामिल, Project 17A का चौथा युद्धपोत 14 मार्च को होगा कमीशन

INS Taragiri Commissioning

INS Taragiri Commissioning: आईएनएस अंजदीप के बाद भारतीय नौसेना 14 मार्च को अपने बेड़े में एक और आधुनिक वॉरशिप शामिल करने जा रही है। आईएनएस तारागिरी को विशाखापत्तनम में आयोजित समारोह में आधिकारिक रूप से कमीशन किया जाएगा। यह प्रोजेक्ट 17ए के तहत तैयार नीलगिरी क्लास का चौथा स्टेल्थ फ्रिगेट है, जिसे ईस्टर्न नेवल कमांड में शामिल किया जाएगा।

तारागिरी को पूरी तरह भारत में डिजाइन और तैयार किया गया है। इसे मुंबई स्थित मजगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड ने बनाया है और पिछले साल 28 नवंबर को नौसेना को सौंपा गया था। इस जहाज को तैयार होने में करीब 81 महीने का समय लगा, जो पहले बने जहाजों की तुलना में कम है। (INS Taragiri Commissioning)

INS Taragiri Commissioning: पुराने नाम को नई पहचान

प्रोजेक्ट 17ए यानी नीलगिरि क्लास के युद्धपोतों के नाम रखने की एक खास परंपरा भारतीय नौसेना में लंबे समय से चली आ रही है। इन जहाजों के नाम भारत की अलग-अलग पर्वत श्रृंखलाओं के नाम पर रखे जाते हैं। यह परंपरा नई नहीं है, बल्कि पुराने नीलगिरि क्लास जहाजों के समय से ही जारी है और आज भी उसी तरह निभाई जा रही है।

इसी वजह से इस क्लास के जहाजों के नाम जैसे नीलगिरि, हिमगिरि, उदयगिरि, द्रोणागिरि, विंध्यगिरि और महेंद्रगिरि रखे गए हैं। ये सभी नाम भारत की अलग-अलग पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों से जुड़े हुए हैं और देश की भौगोलिक पहचान को दर्शाते हैं। (INS Taragiri Commissioning)

इसी परंपरा के तहत नए युद्धपोत का नाम तारागिरी रखा गया है। यह नाम उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय क्षेत्र की एक पर्वत श्रृंखला से लिया गया है। तारागिरी कोई बहुत बड़ी रेंज नहीं है, लेकिन यह हिमालय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है और भारत की प्राकृतिक विरासत का प्रतीक है।

तारागिरी नाम रखने के पीछे एक और महत्वपूर्ण कारण भी है। यह नया युद्धपोत पुराने आईएनएस तारागिरी का ही एक तरह से “पुनर्जन्म” है। पुराना आईएनएस तारागिरी एक लिअंडर क्लास फ्रिगेट था, जिसने 1980 से 2013 तक करीब 33 साल तक भारतीय नौसेना में सेवा दी थी। वह जहाज भी इसी तारागिरी पर्वत श्रृंखला के नाम पर रखा गया था।

अब नए युद्धपोत को वही नाम देकर उसकी पुरानी विरासत को आगे बढ़ाया गया है। भारतीय नौसेना में यह परंपरा रही है कि जो नाम पहले सफल और सम्मानित रहे हैं, उन्हें नए और आधुनिक जहाजों को दिया जाता है, ताकि उनकी पहचान और गौरव बना रहे। नया तारागिरी उसी नाम को आगे बढ़ाता है, लेकिन तकनीक और क्षमता के मामले में यह पूरी तरह आधुनिक है। इसे मल्टी-रोल फ्रिगेट के रूप में डिजाइन किया गया है, यानी यह एक साथ कई तरह के ऑपरेशन कर सकता है। (INS Taragiri Commissioning)

वजन लगभग 6,670 टन

यह जहाज करीब 149 मीटर लंबा है और इसका कुल वजन लगभग 6,670 टन है। इसमें करीब 225 से 226 कर्मियों की तैनाती की जा सकती है। जहाज में ऑटोमेशन का ज्यादा इस्तेमाल किया गया है, जिससे कम लोगों में भी यह आसानी से ऑपरेट हो सकता है।

इसकी रफ्तार 28 नॉट्स से ज्यादा है और यह लंबी दूरी तक बिना रुके ऑपरेशन कर सकता है। इसमें दो हेलीकॉप्टर रखने की सुविधा भी है, जिनमें ध्रुव, सी किंग या चेतक जैसे हेलीकॉप्टर शामिल हैं। (INS Taragiri Commissioning)

स्टेल्थ तकनीक की खासियत

आईएनएस तारागिरी में स्टेल्थ तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिससे यह दुश्मन के रडार पर आसानी से दिखाई नहीं देता। इसकी डिजाइन इस तरह बनाई गई है कि इसका रडार सिग्नेचर कम हो और यह कम शोर पैदा करे। इससे यह समुद्र में दुश्मन की नजर से बचकर काम कर सकता है। तारागिरी को खास तौर पर समुद्र में उभरते खतरों से निपटने के लिए तैयार किया गया है। यह दुश्मन के जहाज, मिसाइल और पनडुब्बियों से लड़ने में सक्षम है। (INS Taragiri Commissioning)

ताकतवर हथियारों से है लैस

इस युद्धपोत में कई आधुनिक हथियार लगाए गए हैं। इसमें ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल लगाई गई है, जो बहुत तेज गति से लंबी दूरी तक हमला कर सकती है। इसके अलावा इसमें एमआर-सैम एयर डिफेंस सिस्टम है, जो हवाई खतरों से सुरक्षा देता है।

जहाज में 76 मिमी की मुख्य तोप लगी है, जो समुद्र और जमीन दोनों पर हमला कर सकती है। इसके अलावा 30 मिमी की गन और 12.7 मिमी मशीन गन भी मौजूद हैं, जो नजदीकी खतरों से सुरक्षा देती हैं। पनडुब्बियों से निपटने के लिए इसमें टॉरपीडो और एंटी-सबमरीन रॉकेट सिस्टम लगाए गए हैं। (INS Taragiri Commissioning)

आधुनिक रडार और सेंसर सिस्टम भी लगे

तारागिरी में एडवांस रडार और सेंसर सिस्टम लगाए गए हैं। इसमें मल्टी-फंक्शन रडार, सोनार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम शामिल हैं, जो दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखते हैं। यह सिस्टम दुश्मन के जहाज, मिसाइल और पनडुब्बियों को ट्रैक करने में मदद करते हैं।

यह जहाज नेटवर्क-इनेबल्ड सिस्टम से जुड़ा है, जिससे यह अन्य युद्धपोतों और कमांड सेंटर के साथ रियल टाइम में जानकारी साझा कर सकता है। (INS Taragiri Commissioning)

डीजल इंजन और गैस टरबाइन दोनों

इस जहाज में सीओडीओजी यानी कंबाइंड डीजल ऑर गैस प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है। इसमें डीजल इंजन और गैस टरबाइन दोनों का इस्तेमाल होता है। इससे जहाज को तेज गति और बेहतर ईंधन क्षमता मिलती है। इसके साथ इंटीग्रेटेड प्लेटफॉर्म मैनेजमेंट सिस्टम लगाया गया है, जो पूरे सिस्टम को कंट्रोल करता है। इसकी स्पीड 28 नॉट्स से ज्यादा है और यह लंबी दूरी तक बिना रुके ऑपरेशन कर सकता है। (INS Taragiri Commissioning)

कम क्रू, ज्यादा ऑटोमेशन

तारागिरी की एक खास बात यह भी है कि इसमें ऑटोमेशन का ज्यादा इस्तेमाल किया गया है। इसकी वजह से कम क्रू में भी यह जहाज आसानी से ऑपरेट किया जा सकता है। इससे मानव संसाधन की जरूरत कम होती है और काम तेजी से होता है।

75 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी तकनीक

तारागिरी में करीब 75 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इस प्रोजेक्ट में 200 से ज्यादा भारतीय कंपनियों और एमएसएमई ने हिस्सा लिया है। इसके निर्माण से हजारों लोगों को रोजगार भी मिला है।

प्रोजेक्ट 17ए के तहत कुल 7 स्टेल्थ फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं। इनमें से कुछ पहले ही नौसेना में शामिल हो चुके हैं, जबकि बाकी जहाज अलग-अलग चरणों में तैयार हो रहे हैं। ये सभी जहाज आधुनिक तकनीक से लैस हैं और भारतीय नौसेना की ताकत को बढ़ाने के लिए तैयार किए गए हैं। तारागिरी को ईस्टर्न फ्लीट में शामिल किया जाएगा, जहां यह अन्य आधुनिक युद्धपोतों के साथ ऑपरेशन करेगा। (INS Taragiri Commissioning)