back to top
Sunday, August 31, 2025
Home Blog Page 2

Ran Samwad 2025 Doctrine: ‘युद्ध का मैदान बने इंसानी दिमाग’ से ऐसे जंग लड़ेंगे स्पेशल फोर्सेज के जवान! ऑपरेशन सिंदूर के बाद सौंपा गया नया काम

Ran Samwad 2025 Doctrine: Indian Special Forces Information Warfare
AI Image

Ran Samwad 2025 Doctrine: मध्यप्रदेश के मऊ स्थित आर्मी वॉर कॉलेज में आयोजित रण संवाद 2025 भारतीय रक्षा इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ है। इस दो दिवसीय ट्राई सर्विसेज सेमिनार में सेना, नौसेना और वायुसेना के टॉप अफसरों के साथ-साथ इंडस्ट्री, एकेडमिशियंस और रणनीतिक विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। इसी मौके पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने भारतीय स्पेशल फोर्सेज के लिए पहली बार जॉइंट डॉक्ट्रिन (Joint Doctrine for Special Forces Operations) जारी की।

Rajnath Singh Ran Samwad 2025: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह बोले- “भारत ने कभी नहीं की युद्ध की शुरुआत, पर सुरक्षा के लिए हमेशा तैयार”

यह डॉक्ट्रिन बताती है कि अब स्पेशल फोर्सेज को केवल पारंपरिक युद्धक्षेत्रों जमीन, हवा और समुद्र में ही नहीं बल्कि सूचना युद्ध (Information Warfare) और नैरेटिव प्रबंधन (Narrative Management) जैसे नए क्षेत्रों में भी एक्टिव रहना होगा। देश की पहली सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जॉइंट स्पेशल फोर्सेस पॉलिसी में यह साफ कहा गया है कि स्पेशल फोर्सेस को अब प्रचार का मुकाबला करने, सूचनाओं को नियंत्रित करने और समाज में सही संदेश पहुंचाने की रणनीति तैयार करनी होगी। इस नीति में सूचना युद्ध को एक महत्वपूर्ण युद्धक्षेत्र के रूप में मान्यता दी गई है, जो पारंपरिक सैन्य कार्रवाइयों जितना ही जरूरी है।

Ran Samwad 2025 Doctrine: ह्यूमन ब्रेन बना बैटलफील्ड

डॉक्ट्रिन में कहा गया है कि आधुनिक समय में “इंसान का दिमाग भी युद्धक्षेत्र बन चुका है”। सोशल मीडिया, डीप फेक तकनीक और मनोवैज्ञानिक अभियानों के जरिए विरोधी देश जनमत को प्रभावित कर सकते हैं और समाज में अस्थिरता पैदा कर सकते हैं।

इसलिए भारतीय स्पेशल फोर्सेज को अब आक्रामक और रक्षात्मक दोनों प्रकार के इन्फो वॉरफेयर में सक्षम बनाया जाएगा। उन्हें न केवल दुश्मन के प्रोपेगेंडा को रोकना होगा, बल्कि भारत के पक्ष में मजबूत नैरेटिव तैयार करके उसे दुनियाभर में पहुंचाना भी होगा।

Ran Samwad 2025 Doctrine: ऑपरेशन सिंदूर से सीखे सबक

नई डॉक्ट्रिन का सबसे बड़ा संदर्भ ऑपरेशन सिंदूर है, जिसने दिखा दिया कि युद्ध केवल गोलियों और मिसाइलों से नहीं, बल्कि इनफॉरमेशन और परसेप्शन से भी जीता या हारा जा सकता है। इस ऑपरेशन ने यह साफ कर दिया कि युद्ध के मैदान में जीत के साथ-साथ लोगों के दिमाग में सही संदेश पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है। मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान पर आतंक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की थी। उस समय जनरल चौहान ने बताया था कि लगभग 15 फीसदी ऊर्जा दुश्मन की झूठी सूचनाओं और दुष्प्रचार को रोकने में खर्च हुई।

उन्होंने यह भी कहा था कि मिसइन्फॉर्मेशन (गलत सूचना) किसी एक घटना तक सीमित नहीं होती बल्कि यह लगातार चलती रहती है। इसलिए इसका जवाब भी बेहद सावधानीपूर्वक और संयमित तरीके से देना जरूरी है, ताकि दुश्मन को नैरेटिव बनाने का मौका न मिल सके।

मई 2025 में पाकिस्तान के खिलाफ चले इस ऑपरेशन में भारत ने हवाई, थल और नौसैनिक तीनों मोर्चों पर निर्णायक बढ़त हासिल की थी। लेकिन इस दौरान दुश्मन ने सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर झूठे नैरेटिव फैलाने की कोशिश की। पाकिस्तान ने यह प्रचारित किया कि उसने भारत को भारी नुकसान पहुंचाया, जबकि हकीकत इसके बिल्कुल उलट थी।

Ran Samwad 2025 Doctrine: “विक्ट्री इज इन द माइंड”- जनरल उपेंद्र द्विवेदी

सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने हाल हाल ही में कहा था कि आज की लड़ाई केवल जमीन पर जीतने से तय नहीं होती, बल्कि जनता के दिमाग में भी लड़ी जाती है। उन्होंने याद दिलाया कि पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर में हार के बावजूद यह प्रचार किया कि उसने ऑपरेशन सिंदूर जीता, और वहां की जनता भी यही मानने लगी। जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत थी।

जनरल द्विवेदी ने कहा कि अगर आप किसी पाकिस्तानी से पूछें कि ऑपरेशन सिंदूर में उनकी हार हुई या जीत, तो वह कहेगा, “हमारे प्रमुख को फील्ड मार्शल बनाया गया है, हमने तो जीत हासिल की।” इस घटना से यह साफ होता है कि लोगों के परसेप्शन को कंट्रोल करना अब युद्ध का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। उन्होंने एक “मैसेज मैनेजमेंट सिस्टम” की जरूरत पर भी जोर दिया ताकि इनफॉरमेशन और परसेप्शन वॉर को और मजबूत किया जा सके।

Ran Samwad 2025 Doctrine: Indian Special Forces Information Warfare
General Anil Chauhan, Chief of Defence Staff along with Admiral Dinesh Kumar Tripathi #CNS, Air Chief Marshal AP Singh CAS and Lt Gen PP Singh VCOAS released two joint doctrines on ‘Special Forces Operations’ and
‘Airborne & Heliborne Operations’ during RAN SAMWAD 2025, at the Army War College.

Ran Samwad 2025 Doctrine: स्पेशल फोर्सेज की नई भूमिका

भारतीय स्पेशल फोर्सेज जिनमें आर्मी के पैरा एसएफ (Para SF), नौसेना की मरीन कमांडो यूनिट्स (MARCOS) और वायुसेना की गरुड़ कमांडो फोर्स शामिल हैं, उन्हें अब एक नए बैटलफील्ड में काम करना होगा।

नई डॉक्ट्रिन कहती है कि स्पेशल फोर्सेज को सांस्कृतिक समझ, रणनीतिक संवाद और मनोवैज्ञानिक दृढ़ता (Psychological Resilience) की भी ट्रेनिंग दी जाएगी। यह स्किल उन्हें दुश्मन की प्रचार मशीनरी का मुकाबला करने और अपने संदेश को सही रूप में दुनिया तक पहुंचाने में मदद करेगी।

हाइब्रिड वॉरफेयर की तैयारी

डॉक्ट्रिन ने यह भी साफ किया है कि भविष्य का युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं लड़ा जाएगा। इसे हाइब्रिड वॉरफेयर कहा जाता है। इसमें पारंपरिक सैन्य बलों के साथ-साथ साइबर हमले, आर्थिक दबाव, फर्जी सूचनाएं और प्रॉक्सी संगठनों का इस्तेमाल किया जाएगा।

इसलिए भारतीय स्पेशल फोर्सेज को मल्टी-डोमेन यानी जमीन, हवा, समुद्र, अंतरिक्ष, साइबर और सूचना हर क्षेत्र में तैयार रहना होगा।

पहली स्वतंत्र स्पेशल ऑपरेशंस कमांड!

2018 में गठित और 2019 में पूरी तरह एक्टिव हुई आर्मर्ड फोर्सेस स्पेशल ऑपरेशन डिविजन (AFSOD) भारत की पहली ट्राई सर्विसेज स्पेशल ऑपरेशन यूनिट है। इसमें लगभग 3,000 कमांडो शामिल हैं, जो अलग-अलग सेवाओं से आते हैं। नई डॉक्ट्रिन में संकेत दिया गया है कि भविष्य में AFSOD का दायरा और स्ट्रक्चर बढ़ाया जा सकता है। इसे एक फुल-फ्लेज्ड कमांड का रूप दिया जा सकता है, जो सीधे चीफ ऑफ स्टााफ कमेटी (COSC) के तहत काम करेगा। वहीं, अगर ऐसा होता है तो भारत धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ेगा, जहां एक स्वतंत्र स्पेशल ऑपरेशंस कमांड (SOC) बनाया जा सके।

ट्रेनिंग सिस्टम में बड़ा बदलाव

इस डॉक्ट्रिन में ट्रेनिंग को लेकर भी अहम सुधारों की बात कही गई है। अभी तक तीनों सेनाओं की अपनी-अपनी ट्रेनिंग इंस्टीट्यूशंस और स्कूल हैं। लेकिन अब इन्हें अपग्रेड करके जॉइंट सर्विस ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट्स (JSTIs) बनाने की योजना है। हर JSTI को किसी खास कौशल (Core Competency) जैसे माउंटेन वॉर, समुद्री अभियान या साइबर ऑपरेशंस में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाया जाएगा। हालांकि इन संस्थानों का प्रशासनिक नियंत्रण संबंधित मूल सेना के पास ही रहेगा।

सूचना की जंग पर खुलेगा मोर्चा

यह डॉक्ट्रिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद जारी की गई है। जिसने भारतीय सैन्य रणनीति को यह बड़ा सबक दिया कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं जीते जाते। इस ऑपरेशन में भारत ने दिखाया कि कैसे भारचीय मिसाइलों ने दुश्मन की सीमा के अंदर तक प्रहार किया, नौसेना ने अरब सागर में पाकिस्तान की गतिविधियों को रोका और थल सेना ने सीमा पर मोर्चा संभाला।

लेकिन इसके साथ ही एक और जंग लड़ी गई सूचना की जंग। पाकिस्तान ने फर्जी वीडियो, मनगढ़ंत खबरें और सोशल मीडिया ट्रेंड्स के जरिए यह दिखाने की कोशिश की कि भारत को नुकसान हुआ है। भारतीय सेना और सरकार ने इस प्रोपेगेंडा का समय रहते जवाब दिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सही तस्वीर रखी। यही वजह है कि अब डॉक्ट्रिन में इसे “ऑपरेशनल इम्पेरेटिव” यानी युद्ध का जरूरी हिस्सा माना गया है।

Rajnath Singh Ran Samwad 2025: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह बोले- “भारत ने कभी नहीं की युद्ध की शुरुआत, पर सुरक्षा के लिए हमेशा तैयार”

Rajnath Singh Ran Samwad 2025 speech
Raksha Mantri Rajnath Singh Ran Samwad 2025 speech

Rajnath Singh Ran Samwad 2025: मध्यप्रदेश के मऊ स्थित आर्मी वॉर कॉलेज में आयोजित दो दिवसीय ट्राई सर्विसेज सेमिनार रण संवाद 2025 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत ने कभी किसी देश पर आक्रमण की शुरुआत नहीं की। लेकिन जब भी राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती मिली है, भारत ने पूरी ताकत और आत्मविश्वास के साथ उसका जवाब दिया है।

Ran Samwad 2025: सीडीएस चौहान बोले- ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीखों को अमल में ला रही सेना, ताकत के बिना शांति असंभव

उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक परंपरा में हमेशा संवाद और संघर्ष, दोनों का संतुलन रहा है। महाभारत का उदाहरण देते हुए रक्षा मंत्री ने बताया कि युद्धभूमि में भी संवाद की परंपरा चलती रही। यह भारत की विशेषता है कि यहां ‘शास्त्र’ और ‘शस्त्र’ को एक ही तलवार की दो धार माना जाता है।

राजनाथ सिंह ने कहा, “भारत शांति प्रेमी राष्ट्र है, लेकिन शांतिवाद का समर्थक नहीं। बिना शक्ति के शांति केवल एक कल्पना है।”

राजनाथ सिंह ने कहा कि “आज युद्ध केवल हथियारों का खेल नहीं रह गया है। यह तकनीक, खुफिया जानकारी, अर्थव्यवस्था और कूटनीति के मेल से लड़ा जाएगा। जो देश इस त्रिकोण तकनीक, रणनीति और अनुकूलन क्षमता को साध लेगा, वही असली वैश्विक शक्ति बनेगा।”

Rajnath Singh Ran Samwad 2025: तकनीक और ‘सरप्राइज’ की भूमिका

रक्षा मंत्री ने कहा कि आधुनिक युद्ध में तकनीक और आश्चर्य (Surprise) का मेल ही उसकी जटिलता और अप्रत्याशित स्वरूप की सबसे बड़ी वजह है। उन्होंने कहा कि तकनीकी विकास इतनी तेजी से हो रहा है कि एक इनोवेशन को समझने से पहले ही दूसरा सामने आ जाता है और युद्ध की दिशा बदल देता है।

उन्होंने कहा कि “अनमैन्ड एरियल व्हीकल्स (UAV), हाइपरसोनिक मिसाइलें, साइबर हमले और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित फैसले आज के युद्ध की नई पहचान बन चुके हैं। इस बदलाव का सबसे बड़ा पहलू यह है कि इसका कोई स्थायी रूप नहीं है। यह लगातार बदलता रहता है और यही अनिश्चितता दुश्मन को भ्रमित करती है।”

Rajnath Singh Ran Samwad 2025: ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण

राजनाथ सिंह ने अपने भाषण में हालिया ऑपरेशन सिंदूर का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस अभियान ने दिखाया कि भारत की सेनाएं तकनीक-आधारित रणनीति और संयुक्त कार्रवाई से किस तरह त्वरित और निर्णायक सफलता हासिल कर सकती हैं।

उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन में वायुसेना ने गहराई तक प्रहार कर दुश्मन की क्षमताओं को निष्क्रिय किया, नौसेना ने अरब सागर में दुश्मन की गतिविधियों को रोक दिया और थलसेना ने रणनीतिक मोर्चों पर दबदबा बनाया।

रक्षा मंत्री ने इसे “तकनीक-चालित युद्ध का परफेक्ट उदाहरण” बताया और कहा कि इससे भारत को ऐसे अनुभव मिले जो भविष्य के किसी भी संघर्ष के लिए मार्गदर्शन करेंगे।

Rajnath Singh Ran Samwad 2025: “सुदर्शन चक्र मिशन” का विशेष रूप से उल्लेख

रण संवाद 2025 में अपने संबोधन के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित “सुदर्शन चक्र मिशन” का विशेष रूप से उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि यह मिशन भारत सरकार की आत्मरक्षा (Self Defence) की प्रतिबद्धता का प्रतीक है। इस मिशन के तहत देश के महत्वपूर्ण ठिकानों और सामरिक स्थलों को आधुनिक और स्वदेशी तकनीक से बने सुरक्षा कवच से ढका जाएगा।

रक्षा मंत्री ने बताया कि सुदर्शन चक्र मिशन का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि भारत की रक्षा प्रणाली भविष्य की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम रहे। इसमें उन्नत एयर डिफेंस टेक्नोलॉजी, डाइरेक्टेड एनर्जी वेपन (Directed Energy Weapons) और अत्याधुनिक स्वदेशी हथियार प्रणालियों को शामिल किया जाएगा।

राजनाथ सिंह ने इस संदर्भ में डीआरडीओ की हालिया उपलब्धियों का भी जिक्र किया और कहा कि संगठन ने इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस वेपन सिस्टम और हाई पॉवर्ड डाइरेक्टेड एनर्जी वेपन का सफल परीक्षण किया है। उन्होंने इसे पूरे राष्ट्र की सफलता बताया और कहा कि यह भारत की वैज्ञानिक और औद्योगिक क्षमता की बड़ी उपलब्धि है।

Ran Samwad 2025: आत्मनिर्भरता: सुरक्षा की रीढ़

राजनाथ सिंह ने कहा कि आत्मनिर्भरता अब सिर्फ एक नारा नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की अटूट नींव है। उन्होंने बताया कि भारत कभी रक्षा उपकरणों का सबसे बड़ा आयातक था, लेकिन आज वह निर्यातक देशों में गिना जा रहा है।

उन्होंने कहा कि “आज हमारे स्वदेशी प्लेटफॉर्म तेजस हल्का लड़ाकू विमान, एडवांस्ड टोव्ड आर्टिलरी गन सिस्टम, आकाश मिसाइल सिस्टम और स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर – दुनिया को यह संदेश दे रहे हैं कि भारत की तकनीक और गुणवत्ता अब विश्वस्तरीय है। यह आत्मविश्वास हमारे वैज्ञानिकों, उद्योग जगत और नेतृत्व की देन है।”

रक्षा मंत्री ने बताया कि वर्ष 2014 में जहां रक्षा उत्पादन 46,425 करोड़ रुपये था, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया। इसी तरह, रक्षा निर्यात 10 साल पहले 1,000 करोड़ रुपये से भी कम था, जो अब 24,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

युद्ध का बदलता चेहरा

अपने संबोधन में उन्होंने बताया कि अब केवल सैनिकों की संख्या या हथियारों का भंडार युद्ध जीतने के लिए पर्याप्त नहीं है। अब सफलता के लिए वास्तविक समय की खुफिया जानकारी, सटीक हथियार और डेटा-आधारित रणनीति अनिवार्य हो गई है।

उन्होंने रूस-यूक्रेन संघर्ष का उदाहरण देते हुए कहा कि 2022 में यह युद्ध पारंपरिक हथियारों से शुरू हुआ था, लेकिन तीन साल में ही यह पूरी तरह बदल गया। अब इसमें ड्रोन, सेंसर-आधारित हथियार और सटीक प्रहार करने वाले म्युनिशन निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं।

अपने भाषण में रक्षा मंत्री ने इतिहास से लेकर आधुनिक समय तक युद्ध के स्वरूप में आए बदलावों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वायु शक्ति निर्णायक बन गई और 1962 के क्यूबा मिसाइल संकट ने दिखाया कि परमाणु हथियारों ने दुनिया के संतुलन को बदल दिया।

आज के युग में युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है। यह साइबर स्पेस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर तक फैल चुका है।

उन्होंने कहा कि “आज का युद्ध केवल बंदूक या मिसाइलों से नहीं लड़ा जाता। डेटा, सूचना और तकनीकी श्रेष्ठता ही निर्णायक कारक बन गई है।”

भविष्य की तैयारियां और नई पहलें

रक्षा मंत्री ने कहा कि युद्ध अब इतने अचानक और अप्रत्याशित हो गए हैं कि यह अनुमान लगाना कठिन है कि कोई संघर्ष कब शुरू होगा और कब खत्म होगा। इसलिए भारत को हर स्थिति के लिए तैयार रहना होगा।

उन्होंने कहा कि “अगर कोई युद्ध दो महीने, चार महीने, एक साल या पांच साल तक भी खिंच जाए, तो हमें पूरी तरह तैयार रहना चाहिए। हमारी क्षमता ऐसी होनी चाहिए कि हम किसी भी स्थिति का सामना कर सकें।”

राजनाथ सिंह ने यह भी जानकारी दी कि आर्मी ट्रेनिंग कमांड ने 2027 तक सभी सैनिकों को ड्रोन तकनीक की ट्रेनिंग देने का निर्णय लिया है। साथ ही सेना में नई यूनिट्स जैसे रुद्र ब्रिगेड, शक्तिबाण रेजिमेंट, दिव्यास्त्र बैटरी, ड्रोन प्लाटून और भैरव बटालियन बनाई गई हैं, जो भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप हैं।

नौसेना और वायुसेना की मजबूती

राजनाथ सिंह ने बताया कि हाल ही में आईएनएस हिमगिरी और आईएनएस उदयगिरी जैसे स्वदेशी स्टेल्थ फ्रिगेट नौसेना में शामिल किए गए हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान नौसेना ने अरब सागर में दुश्मन की गतिविधियों को पूरी तरह रोक दिया था, जिससे भारत की समुद्री सीमाएं सुरक्षित रहीं।

वायुसेना को भी लगातार नई क्षमताओं से लैस किया जा रहा है। लंबी दूरी की मिसाइलें, अगली पीढ़ी के हथियार और काउंटर-अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स ग्रिड वायुसेना की शक्ति को और बढ़ा रहे हैं।

संपूर्ण राष्ट्र की जिम्मेदारी

रक्षा मंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा अब केवल सशस्त्र सेनाओं की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें देश की अर्थव्यवस्था, औद्योगिक ढांचा, शिक्षा व्यवस्था, तकनीकी क्षमताएं और नागरिक समाज सभी की भूमिका है।

उन्होंने कहा कि “आज की दुनिया में सुरक्षा केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है। यह हमारी आर्थिक प्रणाली, औद्योगिक संरचना और तकनीकी नेटवर्क से भी जुड़ी हुई है। इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा अब पूरे राष्ट्र का विषय है। इसमें उद्योग, शिक्षाविद, मीडिया और नागरिक समाज सभी की सक्रिय भूमिका जरूरी है।”

राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत कभी युद्ध की शुरुआत नहीं करता और न ही किसी की भूमि पर नजर रखता है। लेकिन अगर किसी ने भारत की भूमि या संप्रभुता को चुनौती दी, तो भारत अपनी पूरी शक्ति से उसका सामना करेगा।

उन्होंने कहा कि “दुनिया हमें केवल हमारी शक्ति के लिए नहीं बल्कि सत्य, शांति और न्याय के प्रति हमारी प्रतिबद्धता के लिए सम्मान देती है। लेकिन जब बात सुरक्षा की आती है, तो हम हर संभव कदम उठाएंगे।”

Differences on Theatre Commands: क्या थिएटर कमांड को लेकर सेनाओं में बढ़ रहे हैं मतभेद? CDS जनरल चौहान ने कैसे निकाला बीच का रास्ता?

Differences on Theatre Commands iaf navy cds ran samwad 2025
General Anil Chauhan, Chief of Defence Staff along with Admiral Dinesh Kumar Tripathi #CNS, Air Chief Marshal AP Singh CAS and Lt Gen PP Singh VCOAS released two joint doctrines on 'Special Forces Operations' and 'Airborne & Heliborne Operations' during RAN SAMWAD 2025, at the Army War College.

Differences on Theatre Commands: भारतीय सेनाओं की टॉप लीडरशिप में थिएटर कमांड के स्ट्रक्चर को लेकर मतभेद सामने आ गए हैं। जहां नौसेना प्रमुख एडमिरल डीके त्रिपाठी ने बुधवार को थिएटराइजेशन की पैरवी की। तो वहीं, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने यह स्वीकार किया कि इस मुद्दे पर असहमतियां हैं, लेकिन उन्होंने भरोसा दिलाया कि इसे जल्द ही सुलझा लिया जाएगा। इससे एक दिन पहले ही एयरफोर्स चीफ एपी सिंह ने थिएटर कमांड को लेकर जल्दबाजी नहीं करने की बात कही थी।

IAF Chief AP Singh On Theatre Command: रण संवाद में एयर फोर्स चीफ ने थिएटर कमांड को लेकर कह दी ये बड़ी बात, सामने बैठे थे CDS, रहे चुप

Differences on Theatre Commands: क्या कहा था एयरफोर्स चीफ ने?

मऊ के आर्मी वॉर कालेज में आयोजित दो दिवसीय रण संवाद कार्यक्रम में बोलते हुए वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने थिएटर कमांड के प्रस्तावित स्ट्रक्चर को लेकर अलग बात कही थी। उन्होंने सुझाव दिया कि मिलिट्री कॉर्डिनेशन का स्स्ट्रक्चर ऐसा होना चाहिए जिसे सीधे तीनों सेनाओं के प्रमुख मिलकर ऑपरेट करें। वायुसेना प्रमुख का कहना था कि इस स्तर पर जॉइंट प्लानिंग और फैसले अधिक व्यावहारिक होंगे और इससे अनावश्यक नई परतें जोड़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने यह भी कहा था कि अभी थिएटर कमांड लागू करने का समय नहीं है। उन्होंने समझाया कि इस तरह की जल्दबाजी से तीनों सेनाओं की कोर स्ट्रेंथ को नुकसान हो सकता है।

एयर चीफ का कहना था कि “हमें अभी किसी नए स्ट्रक्चर की जरूरत नहीं है। जो सिस्टम मौजूद है, उसी के जरिए बेहतर काम हो सकता है। हमें दिल्ली में एक जॉइंट प्लानिंग और कॉर्डिनेशन सेंटर बनाना चाहिए, जहां से योजनाएं तैयार हों और फिर उनका क्रियान्वयन अलग-अलग स्तरों पर किया जाए।”

वायुसेना की चिंता यह है कि उसके पास सीमित संख्या में विमान, रिफ्यूलर और निगरानी प्रणाली (AWACS) हैं। अगर हवाई संसाधन अलग-अलग थिएटर कमांड को दे दिए गए, तो वायुसेना तेजी से किसी भी मोर्चे पर अपने संसाधन नहीं भेज पाएगी। वर्तमान में वायुसेना सिर्फ 48 घंटों में अपने संसाधनों को किसी भी हिस्से में भेज सकती है, और यही उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत है।

Differences on Theatre Commands: नौसेना प्रमुख ने किया समर्थन

वहीं नौसेना प्रमुख एडमिरल डीके त्रिपाठी ने थिएटराइजेशन का खुलकर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि नौसेना इस सुधार को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। एडमिरल त्रिपाठी ने कहा, “हमारा लक्ष्य है कि तीनों सेनाओं के बीच कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशन और कॉम्बैट यानी युद्धक क्षमता का बेहतर कॉर्डिनेशन हो। हमें एक साझा ऑपरेशनल पिक्चर और जॉइंट प्लानिंग बनाने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।”

नौसेना प्रमुख ने ज़ोर देकर कहा कि वर्तमान में भी तीनों सेनाएं जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन को मजबूत करने की दिशा में बड़े कदम उठा रही हैं। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी और थिएटर कमांड उसका अंतिम स्वरूप होगा।

नौसेना प्रमुख ने यह भी बताया कि समुद्री क्षेत्र में नए खतरे उभर रहे हैं। मछली पकड़ने वाली नावें और रिसर्च वेसल अब आधुनिक तकनीक से लैस होकर निगरानी और सूचनाएं इकट्ठा कर रहे हैं, जिन्हें सैन्य उद्देश्यों के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

CDS ने साधा संतुलन

दो सेनाओं के अलग-अलग विचार सामने आने के बाद, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने बीच का रास्ता अपनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि मतभेद होना कोई बुरी बात नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि हम खुलकर चर्चा कर रहे हैं।

सीडीएस ने कहा, “अगर असहमति नज़र आ रही है तो यह अच्छी बात है, क्योंकि हम इसे देशहित में सुलझा लेंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि तीनों सेनाओं में भरोसा है और हम एक-दूसरे की बात सुनने को तैयार हैं।”

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि थिएटर कमांड पर काम तेज करना होगा। “शायद हमें यह काम 10 साल पहले ही शुरू कर देना चाहिए था। अब देर हो चुकी है, लेकिन हमें इस कमी को जल्द पूरा करना होगा।”

जनरल चौहान ने कहा, “सीडीएस बनने के बाद से मेरा उद्देश्य तीनों सेनाओं में जॉइंटनेस को बढ़ावा देना रहा है। आज हम खुलकर अपनी राय रखते हैं, मतभेदों पर चर्चा करते हैं और फिर भी एक साझा समाधान तक पहुंचते हैं। यही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है।” सीडीएस ने यह भी कहा कि विचार-विमर्श की यह परंपरा तीनों सेनाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह साबित होता है कि वे जॉइंटनेस और सहयोग के लिए गंभीर हैं।

उन्होंने कहा कि भविष्य में केवल सेना, वायुसेना और नौसेना ही नहीं, बल्कि खुफिया एजेंसियों, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और तकनीकी संगठनों के साथ भी गहन तालमेल जरूरी होगा।

गौरतलब है कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद औपचारिक रूप से 1 जनवरी 2020 को अस्तित्व में आया था, जब जनरल बिपिन रावत को देश का पहला सीडीएस नियुक्त किया गया। उनके निधन के बाद सितंबर 2022 में जनरल अनिल चौहान ने यह जिम्मेदारी संभाली। सरकार ने सीडीएस को थिएटर कमांड्स बनाने और तीनों सेनाओं के बीच तालमेल को मजबूत करने का जिम्मेदारी सौंपी है।

जनरल चौहान ने कहा कि थिएटर कमांड की दिशा में आगे बढ़ने की प्रक्रिया को और तेज करने की जरूरत है। उन्होंने कहा, “यकीन रखिए, हम पूरी कोशिश कर रहे हैं और इसे आगे ले जाएंगे।”

क्या है थिएटर कमांड?

थिएटर कमांड के कॉन्सेप्ट का मतलब है कि सेना, नौसेना और वायुसेना को एक ही कमांडर के अधीन रखा जाए। यह कमांडर किसी खास भौगोलिक क्षेत्र की सुरक्षा का जिम्मा संभाले और उसके पास सभी तरह के संसाधन जैसे टैंक, तोप, जहाज, विमान, हेलिकॉप्टर और सैनिक एक साथ हों।

अभी भारतीय सेना और वायुसेना के पास सात-सात कमांड हैं और नौसेना के पास तीन। यानी कुल 17 स्वतंत्र कमांड काम कर रहे हैं। चीन ने 2016 में अपने सात सैन्य क्षेत्रों को पांच थिएटर कमांड में बदल दिया था, जिनमें भारत से सटे इलाके उसके पश्चिमी थिएटर कमांड के अंतर्गत आते हैं।

भारत में डिफेंस रिफॉर्म्स 2019 में शुरू हुए थे, जब डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स का गठन हुआ और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद सृजित किया गया। तब से लेकर अब तक थिएटर कमांड के कॉन्सेप्ट पर लगातार विचार-विमर्श चल रहा है।

भविष्य के युद्ध की नई तस्वीर

जनरल चौहान ने कहा कि आने वाले समय में युद्ध केवल जमीन या आसमान तक सीमित नहीं रहेंगे। अब यह घनी आबादी वाले शहरों, रेगिस्तानों, समुद्र के भीतर, अंतरिक्ष और साइबर स्पेस तक फैलेगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि शहरी इलाकों में आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए हल्के ड्रोन, डिटेक्शन सिस्टम और नई तकनीक निर्णायक साबित होंगी।

उन्होंने यह भी कहा कि अब युद्ध केवल संगठित सेनाओं के बीच नहीं हो रहे। आज पैरामिलिट्री फोर्स, निजी सुरक्षा कंपनियां, भाड़े के सैनिक और टेक्नोलॉजी आधारित हथियार प्रणाली भी सक्रिय हैं। आने वाले समय में रोबोट और स्वचालित हथियार भी युद्ध का हिस्सा बन सकते हैं।

सीडीएस ने कहा कि आज हमें सिर्फ स्कॉलर वॉरियर ही नहीं, बल्कि टेक वॉरियर और इंफ्लुएंस वॉरियर की भी जरूरत है। जहां स्कॉलर वॉरियर युद्ध की कला और विज्ञान को समझेगा। तो टेक वॉरियर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर और अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करेगा। जबकि इंफ्लुएंस वॉरियर नैरेटिव, सूचना और जनमत को नियंत्रित करेगा।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ेगी भूमिका

जनरल चौहान ने तकनीकी विकास को युद्ध का निर्णायक पहलू बताया। आधुनिक युद्ध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बिग डेटा एनालिटिक्स निर्णायक भूमिका निभाएंगे। डायरेक्टेड एनर्जी वेपन और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर युद्धक्षेत्र की दिशा को पूरी तरह बदल देंगे।

उन्होंने यह भी कहा कि आज साइबर वारफेयर, ऑनलाइन प्रोपेगैंडा और नैरेटिव ऑपरेशंस व्यक्तिगत स्तर तक पहुंच चुके हैं। आम नागरिक भी अब युद्ध का हिस्सा बन गए हैं और सोशल मीडिया, साइबर अभियानों तथा ऑनलाइन नैरेटिव्स के जरिए सीधे प्रभावित हो रहे हैं।

रण संवाद से मिली सीख

रण संवाद 2025 के दो दिनों की चर्चा का सार प्रस्तुत करते हुए सीडीएस ने कहा कि असमानता अब शक्ति संतुलन का नया आधार बन चुकी है। सटीकता पारंपरिक भारी बल प्रयोग की जगह ले रही है। युद्ध धीरे-धीरे मानव संचालित से मशीन संचालित होता जा रहा है, जिससे नैतिक सवाल भी उठेंगे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नैरेटिव बिल्डिंग अब केवल मीडिया का हिस्सा नहीं है, बल्कि युद्ध का निर्णायक पहलू बन गई है।

जनरल चौहान ने यह भी कहा कि युद्ध में काइनेटिक ऑपरेशंस और इंफॉर्मेशन ऑपरेशंस का इंटीग्रेशन अब अनिवार्य हो गया है। उन्होंने भरोसा जताया कि रण संवाद जैसे मंच भविष्य के युद्धों को समझने और भारतीय सेनाओं की तैयारियों को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

 

IAF Chief AP Singh On Theatre Command: रण संवाद में एयर फोर्स चीफ ने थिएटर कमांड को लेकर कह दी ये बड़ी बात, सामने बैठे थे CDS, रहे चुप

IAF Chief AP Singh on Theatre Command: Warns Against Rushed Theaterisation
File Photo

IAF Chief AP Singh On Theatre Command: भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा है कि थिएटर कमांड (Theaterisation) की प्रक्रिया को जल्दबाजी में लागू करना सही कदम नहीं होगा। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भारत को किसी दूसरे देश का मॉडल नहीं अपनाना चाहिए बल्कि अपनी जरूरतों के हिसाब से फैसला लेना होगा।

Ran Samwad 2025: सीडीएस चौहान बोले- ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीखों को अमल में ला रही सेना, ताकत के बिना शांति असंभव

अपनी बेबाक और सीधे-सपाट शब्दों में अपनी बाात कहने के लिए मशहूर एयर चीफ मार्शल एपी सिंह मंगलवार को मध्यप्रदेश के डॉ. भीमराव अंबेडकर नगर (मऊ) स्थित आर्मी वॉर कॉलेज में आयोजित रण संवाद 2025 कार्यक्रम के फायर साइट चैट कार्यक्रम में बोल रहे थे। यह ट्राई सर्विसेज (थलसेना, नौसेना और वायुसेना) का जॉइंट सेमिनार है, जिसमें वॉर, वॉर फाइटिंग और भविष्य की सैन्य चुनौतियों पर चर्चा की जा रही है।

IAF Chief AP Singh On Theatre Command: सामने बैठे थे जनरल अनिल चौहान

वर्तमान में सेना के सात, वायुसेना के सात और नौसेना के तीन कमांड अलग-अलग काम करते हैं, लेकिन इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड से सभी सेवाओं के संसाधनों को एक ही कमांडर के अधीन इंटीग्रेट किया जाएगा। यह सुधार 2019 में सैन्य मामलों के विभाग के गठन और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति से शुरू हुआ था।

मध्यप्रदेश के डॉ. अंबेडकर नगर (मऊ) में आर्मी वॉर कॉलेज में आयोजित रण संवाद 2025 के दौरान भारतीय वायुसेना के प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने थिएटर कमांड पर बोलते हुए उन्होंने मौजूदा मिलिट्री फॉरमेशंस में जल्दबाजी से बदलाव न करने की बीत कही। उनका कहना था कि सेनाओं के कोर स्किल्स को बनाए रखते हुए ही कोई फैसला लिया जाना चाहिए।

खास बात यह है कि जब एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने यह खरा-खरा बयान दिया तो दर्शक दीर्घा में सीडीएस जनरल अनिल चौहान भी बैठे हुए उन्हें सुन रहे थे और उनके बयान पर वे सिर्फ मुस्कुरा कर रह गए और कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। बता दें कि रण संवाद कार्यक्रम को सीडीएस अनिल चौहान की पहल के बाद बाद ही आयोजित किया गया है।

IAF Chief AP Singh On Theatre Command: अतिरिक्त लेयर्स न जोड़ी जाएं

वायुसेना प्रमुख एपी सिंह ने जोर दिया कि कंबाइंड स्ट्रक्चर्स में फैसला लेने की प्रक्रिया में अतिरिक्त लेयर्स न जोड़ी जाएं, क्योंकि इससे कमांडर स्तर पर जल्दी फैसला लेना मुश्किल हो जाता है। वायुसेना प्रमुख ने कहा कि थिएटर कमांड का उद्देश्य फटाफट फैसला लेना है, लेकिन इसके लिए मौजूदा व्यवस्था को बिना सोचे-समझे बदलना ठीक नहीं।

उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण देते हुए कहा कि इस अभियान में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ ने चार वरिष्ठ अधिकारियों सीडीएस और तीनों सेवाओं के प्रमुखों के बीच कॉर्डिनेशन का बड़ा काम किया। सिंह ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान केवल चार लोगों की जॉइंट प्लानिंग से कोई कमी नहीं आई। सब कुछ व्यवस्थित तरीके से हो गया। इस ऑपरेशन के दौरान चारों शीर्ष सैन्य अधिकारी सीडीएस जनरल अनिल चौहान और तीनों सेवा प्रमुख—साथ मिलकर काम कर रहे थे। इसलिए, उन्होंने टॉप लेवल पर जॉइंट प्लानिंग और क्रियान्वयनपर जोर दिया।

सिंह ने यह भी कहा कि कुछ छोटी-मोटी चुनौतियां जरूर सामने आईं, लेकिन उन्हें तुरंत हल कर लिया गया। इसका सबसे बड़ा सबक यह था कि दिल्ली में एक ज्वॉइंट प्लानिंग और कोऑर्डिनेशन सेंटर स्थापित होना चाहिए, जिसे सीडीएस और चीफ़्स ऑफ़ स्टाफ कमिटी के अधीन रखा जाए।

IAF Chief AP Singh On Theatre Command: गंभीर समस्याएं खड़ी होंगी

सिंह ने कहा कि “कोई भी नया स्ट्रक्चर निर्णय प्रक्रिया को लंबा नहीं करे। ओओडीए लूप (OODA Loop – Observe, Orient, Decide, Act) जितना छोटा रहेगा, युद्धक निर्णय उतने तेज होंगे।” उन्होंने यह भी जोर दिया कि हर सेवा की मुख्य क्षमता (Core Competence) बरकरार रहनी चाहिए। अगर थलसेना का कार्य वायुसेना को सौंपा जाएगा या नौसेना का कार्य किसी अन्य सेवा को, तो इससे गंभीर समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।

नए स्ट्रक्चर की अभी जरूरत नहीं”

एयर चीफ ने दोहराया कि भारत को अमेरिका या चीन के मॉडल की नकल नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा, “हर देश की अपनी जरूरतें होती हैं। चीन ने अपने हिसाब से थिएटर कमांड बनाए, अमेरिका ने अपने हिसाब से। लेकिन भारत को वही करना चाहिए जो हमारी स्थिति और जरूरत के अनुसार सही हो। सिर्फ दबाव में आकर अभी तुरंत इसे लागू करना ठीक नहीं है।”

उन्होंने यह भी कहा कि अगर थिएटर कमांडर कहीं और बैठकर केवल फोन पर आदेश देंगे, तो यह व्यवस्था कारगर नहीं होगी। युद्ध के दौरान वास्तविक समय (Real-time) पर कॉर्डिनेशन होना जरूरी है।

कल के युद्ध की आज करनी होगी तैयारी

रण संवाद में एयर चीफ ने कहा कि भारत को कल के युद्ध की तैयारी आज करनी होगी। आधुनिक तकनीकें जैसे साइबर युद्ध, अंतरिक्ष निगरानी (Space Surveillance), इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भविष्य की लड़ाई का अहम हिस्सा होंगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत को स्टार्टअप्स और स्वदेशी टेक्नोलॉजी में निवेश करना चाहिए ताकि रक्षा क्षेत्र में इनोवेशंस को बढ़ावा मिले।

भारत में थिएटर कमांड की बहस 2019 के बाद तेज हुई, जब सरकार ने डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स (DMA) बनाया और सीडीएस का पद सृजित किया। वर्तमान में भारतीय थलसेना और वायुसेना की सात-सात कमांड हैं जबकि नौसेना की तीन कमांड हैं। योजना यह है कि इन्हें मिलाकर इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड बनाए जाएं।

चीन की तर्ज पर थिएटर कमांड

चीन ने 2016 में अपनी सात सैन्य क्षेत्रों को पांच थिएटर कमांड में बदला था, जिसमें भारत से लगती सीमा का दायित्व वेस्टर्न थिएटर कमांड को सौंपा गया।

लेकिन भारत में इस स्ट्रक्चर को लागू करने पर कई बार सवाल उठते रहे हैं। खासकर वायुसेना ने चिंता जताई है कि उसकी सीमित स्क्वॉड्रन, एयरबोर्न वार्निंग सिस्टम (AWACS) और मिड-एयर रीफ्यूलर को विभिन्न थिएटरों में बांटने से फ्लेक्सिबिलिटी घट सकती है।

वायुसेना का तर्क है कि उसके पास पूरे देश में 48 घंटे के भीतर रिसोर्सेस को कहीं भी तैनात करने की क्षमता है। अगर इन्हें थिएटरों में बांट दिया गया तो यह रणनीतिक लाभ कम हो जाएगा।

दुनियाभर में हो रहे संघर्षों पर हुई चर्चा

रण संवाद में सिर्फ ऑपरेशन सिंदूर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय युद्धों जैसे रूस-यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया की लड़ाइयों के अनुभवों पर भी चर्चा हुई।

एयर चीफ मार्शल सिंह ने कहा कि युद्ध की प्रकृति बदल रही है। आज प्लेटफॉर्म महत्वपूर्ण हैं लेकिन उससे भी ज्यादा अहम है उनका रैप-अराउंड इकोसिस्टम जैसे साइबर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और स्पेस टेक्नोलॉजी। उन्होंने स्वीकार किया कि भारत इन क्षेत्रों में पर्याप्त तेजी से आगे नहीं बढ़ रहा है और जरूरत है कि इन्हें प्राथमिकता दी जाए।

Ran Samwad 2025: सीडीएस चौहान बोले- ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीखों को अमल में ला रही सेना, ताकत के बिना शांति असंभव

Ran Samwad 2025: india future warfare response cds sudarshan chakra operation sindoor
CDS General Anil Chauhan in Ran Samwad 2025

Ran Samwad 2025: मध्यप्रदेश के महू में स्थित आर्मी वॉर कॉलेज में आयोजित रण संवाद 2025 के उद्घाटन सत्र में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने भारतीय सेनाओं की प्राथमिक जिम्मेदारी और बदलती युद्ध रणनीति पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में भारत की प्रतिक्रिया तेज, निर्णायक और संयुक्त होनी चाहिए क्योंकि युद्ध का स्वरूप बदल रहा है और भविष्य के युद्ध केवल जमीन, समुद्र और आसमान तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि साइबर और अंतरिक्ष जैसे डोमेन भी शामिल होंगे।

Ran Samwad-2025: कैसे टेक्नोलॉजी ने ऑपरेशन सिंदूर में किया कमाल, ट्राई सर्विसेज सेमिनार में होगी चर्चा, कई देशों के डिफेंस अताशे भी होंगे शामिल

उन्होंने कहा कि यह सेमिनार शक्ति प्रदर्शन का मंच नहीं बल्कि उद्देश्य की स्पष्टता और साझा समझ विकसित करने का एक प्रयास है। उनके अनुसार, “हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी वॉर और वॉर फाइटिंग की समझ विकसित करना है। कई बार हम कूटनीति, भू-राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अधिक ध्यान देते हैं और मूल विषय यानी युद्ध की तैयारी को नजरअंदाज कर देते हैं। रण संवाद का मकसद इस सोच को बदलना है।”

उन्होंने कहा कि पिछले दो सालों से उनकी कोशिश रही है कि सेनाओं का ध्यान वॉर और वॉर फाइटिंग पर केंद्रित हो। वॉर फाइटिंग केवल सिद्धांतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तकनीक, रणनीति और टैक्टिक्स (युद्ध कौशल) के वास्तविक इस्तेमाल से जुड़ा हुआ है।

Ran Samwad 2025: पहली बार भारतीय मिलिट्री कॉन्क्लेव

जनरल चौहान मध्यप्रदेश के महू स्थित आर्मी वॉर कॉलेज में आयोजित ट्राई सर्विसेज रण संवाद 2025 मिलिट्री कॉन्क्लेव को संबोधित कर रहे थे। यह सेमिनार 26–27 अगस्त तक आयोजित हो रहा है और इसे मुख्य रूप से हेडक्वार्टर इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (IDS) और आर्मी वॉर कॉलेज ने मिलकर तैयार किया है।

सीडीएस ने कहा, “जॉइंटमैनशिप अब कोई कल्पना नहीं रही। यह हमारे मौजूदा परिवर्तन की नींव है, जिसमें थिएटराइजेशन, इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स और जॉइंट ट्रेनिंग शामिल हैं।” उन्होंने कहा कि यह सेमिनार शक्ति प्रदर्शन का मंच नहीं बल्कि उद्देश्य की स्पष्टता और साझा समझ विकसित करने का एक प्रयास है।

Ran Samwad 2025: तकनीक ने रणनीति और युद्धकला को बदला

रण संवाद का मुख्य विषय है – युद्ध पर तकनीकी प्रगति का प्रभाव। इस दौरान वरिष्ठ सैन्य अफसर हाल में हुए संघर्षों का अध्ययन करेंगे और बताएंगे कि कैसे तकनीक ने रणनीति और युद्धकला को बदला है। चर्चा के प्रमुख बिंदुओं में शामिल हैं – उभरती तकनीकें, आधुनिक युद्ध की चुनौतियां, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल, समुद्री अभियानों में ड्रोन स्वॉर्म, लैंड वॉरफेयर में यूएवी का इस्तेमाल, ट्रेनिंग में टेक्नोलॉजी का इंटीग्रेशन और 2035 तक नई युद्ध संरचनाओं की योजना।

Ran Samwad 2025: इस बार सर्विंग अफसर हैं स्पीकर

जनरल चौहान ने बताया कि पहले ऐसे सेमिनारों में मुख्य वक्ता (स्पीकर) रिटायर्ड अफसर होते थे और दर्शकों में सर्विंग अफसर होते थे। लेकिन उन्होंने इस परंपरा को उलट दिया है। इस बार वर्तमान में सेवा दे रहे अधिकारी ही मुख्य वक्ता हैं, जबकि पूर्व अधिकारी अपने अनुभव साझा करेंगे। उनका मानना है कि नई पीढ़ी तकनीक और आधुनिक युद्ध पद्धतियों के प्रति ज्यादा जागरूक है और उनके विचारों को सुना जाना जजरूरी है।

सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने कहा कि भारत प्राचीन काल से ही विचारों और ज्ञान का केंद्र रहा है। उन्होंने कौटिल्य का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे यहां हमेशा से बौद्धिक परंपरा रही है, लेकिन भारतीय युद्धों के गहन विश्लेषण या रणनीति पर शैक्षणिक विमर्श से जुड़ा साहित्य बहुत कम उपलब्ध है। उन्होंने कहा, “युद्ध के विभिन्न आयामों, नेतृत्व, प्रेरणा, मनोबल और तकनीक पर गंभीर शोध की आवश्यकता है। भारत को सशक्त, सुरक्षित, आत्मनिर्भर और विकसित बनाना है। यह तभी संभव है जब सभी हितधारक मिलकर भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार सेनाओं के निर्माण की प्रक्रिया में सामूहिक रूप से भाग लें।”

सीडीएस चौहान ने कहा कि आज युद्ध और शांति के बीच का फर्क धुंधला हो गया है। आधुनिक युग में संकट, संघर्ष और युद्ध एक-दूसरे से जुड़ गए हैं। उन्होंने कहा कि पहले जीत का पैमाना इलाके पर कब्जा या युद्धबंदियों की संख्या होती थी, लेकिन अब जीत का अर्थ है तेज और प्रभावी कार्रवाई, मानसिक और मनोवैज्ञानिक बढ़त, और तकनीकी श्रेष्ठता।

उनके अनुसार, आज की लड़ाइयां केवल भौतिक नुकसान पर नहीं बल्कि नैरेटिव कंट्रोल पर भी निर्भर करती हैं। यही कारण है कि पारंपरिक हथियार के साथ सूचना युद्ध (information warfare) और साइबर अभियान (cyber ops) उतने ही अहम हो गए हैं।

Ran Samwad 2025: “जो सबसे तेज है वही आगे रहेगा”

सीडीएस चौहान ने कहा कि रण संवाद का उद्देश्य है भविष्य के युद्धों पर चर्चा करना। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में युद्ध का स्वरूप और तकनीकी का इस्तेमाल इतना मुश्किल हो जाएगा कि सेनाओं को हर क्षेत्र में बराबरी से तैयार रहना होगा।
उन्होंने कहा, “हम एक ऐसी दौड़ में हैं जहां जो सबसे तेज है वही आगे रहेगा। लेकिन यह दौड़ केवल रफ्तार की नहीं है, बल्कि नई तकनीकों और नए क्षेत्रों में कूदने की भी है। भारत को इस दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहिए।”

सीडीएस चौहान ने आगे कहा, देश हमेशा शांति के पक्ष में खड़ा रहा है। “हम एक शांति-प्रिय राष्ट्र हैं, लेकिन गलती से हमें निष्क्रियतावादी (Pacifist) न समझा जाए। मेरा मानना है कि ताकत के बिना शांति केवल एक कल्पना है। एक लैटिन कहावत है, जिसका अर्थ है- यदि आप शांति चाहते हैं, तो युद्ध की तैयारी करें।”

उन्होंने आगे कहा कि भारत ने हमेशा ‘शस्त्र’ और ‘शास्त्र’ को एक साथ जोड़ा है, जो वास्तव में एक ही तलवार की दो धार हैं। शांति के लिए युद्ध लड़ना ही होगा। उन्होंने अंत में कहा कि भारतीय सेनाओं को सौ प्रतिशत तैयारी रखनी होगी क्योंकि भविष्य के युद्ध बहुआयामी होंगे और उनका स्वरूप पहले से कहीं अधिक जटिल होगा।

Ran Samwad 2025: ऑपरेशन सिंदूर से मिले सबक

सीडीएस ने अपने भाषण में मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख किया। यह ऑपरेशन पहलगाम आतंकी हमले के बाद शुरू किया गया था। इसमें भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों और सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेनाओं ने 9 आतंकी कैंप और 13 पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। इसमें कम से कम 100 आतंकियों के मारे जाने की पुष्टि हुई थी। भारतीय वायुसेना ने कई हवाई अड्डों और सैन्य ठिकानों को टारगेट किया। सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में कई लॉन्चपैड नष्ट किए। सीडीएस ने कहा कि इस ऑपरेशन से भारतीय सेनाओं ने कई सबक लिए हैं और उनमें से अधिकांश को लागू किया जा चुका है।

मिशन सुदर्शन चक्र का जिक्र

अपने संबोधन में सीडीएस चौहान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस पर किए गए मिशन सुदर्शन चक्र के एलान का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह भारत के पास अपना आयरन डोम जैसा एयर डिफेंस सिस्टम, जो दुश्मन के हवाई हमलों से न सिर्फ रक्षा करेगा बल्कि जवाबी कार्रवाई भी करेगा।

उन्होंने कहा कि इसके लिए भारी स्तर पर इंटीग्रेशन की जजरूरत होगी। इसमें जमीन, समुद्र, वायु, अंतरिक्ष और साइबर सभी क्षेत्रों के सेंसर और निगरानी तंत्र को जोड़ा जाएगा। रियल टाइम प्रतिक्रिया के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम कंप्यूटिंग का इस्तेमाल करना होगा।

DRDO का सफल परीक्षण

23 अगस्त को DRDO ने ओडिशा तट पर Integrated Air Defence Weapon System (IADWS) का पहला सफल परीक्षण किया था। इस स्वदेशी सिस्टम में QRSAM, VSHORADS और हाई-पावर लेज़र आधारित Directed Energy Weapon शामिल हैं। परीक्षण के दौरान तीन अलग-अलग टारगेट्स—दो हाई-स्पीड UAV और एक मल्टी-कॉप्टर ड्रोन को एक साथ नष्ट किया गया।

CDS चौहान ने कहा कि यह सिस्टम भविष्य के सुदर्शन चक्र का हिस्सा होगा। DRDO प्रमुख डॉ. समीर वी. कामत ने भी इस सफलता को ऐतिहासिक बताया था।

आकाशतीर सिस्टम की भूमिका

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने अपने स्वदेशी एयर डिफेंस नेटवर्क आकशतीर का इस्तेमाल किया था। इस सिस्टम ने पाकिस्तानी हमलों को रोकने में अहम योगदान दिया। आकसटीर ने तेजी से दुश्मन के मिसाइल और ड्रोन का पता लगाकर उन्हें निष्क्रिय किया। इसे भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) से जोड़ा गया था।

गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, चार दिन तक चले ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया था कि भारत की नई एयर डिफेंस क्षमता कितनी मजबूत हो चुकी है।

Rashtriya Rifles in Jammu Kashmir: जम्मू-कश्मीर से राष्ट्रीय राइफल्स को हटाने की तैयारी! पहलगाम हमले के बाद केंद्र का बड़ा कदम, CRPF संभालेगी सुरक्षा व्यवस्था!

Rashtriya Rifles in Jammu Kashmir replacing CRPF
Photo: Rashtriya Rifles

Rashtriya Rifles in Jammu Kashmir: जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा व्यवस्था में केंद्र सरकार एक बड़े बदलाव पर विचार कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार चाहती है कि भारतीय सेना की विशेष आतंकवाद-रोधी इकाई राष्ट्रीय राइफल्स (Rashtriya Rifles – RR) को घाटी के शहरी और ग्रामीण इलाकों से हटाकर अंतरराष्ट्रीय सीमा और एलओसी पर तैनात किया जाए। वहीं, आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) को सौंपी जाए।

Drone warfare in Indian Army: ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना की हर बटालियन होगी मॉडर्न! सर्विलांस और कॉम्बैट ड्रोंस होंगे स्टैंडर्ड हथियार

सूत्रों के मुताबिक रक्षा मंत्रालय और गृह मंत्रालय के बीच इस मुद्दे पर लगातार बैठकें हो रही हैं। हालांकि अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है, लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम जम्मू-कश्मीर की बदलती परिस्थितियों के मद्देनजर एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलाव साबित होगा।

Rashtriya Rifles in Jammu Kashmir: पहलगाम आतंकी हमले के बाद बढ़ी चर्चा

अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की थी। जांच में सामने आया कि इस हमले में शामिल आतंकवादी सीमा पार से कुछ महीने पहले ही घुसपैठ करके आए थे। इसके बाद सरकार की राय बनी कि सीमाओं की सुरक्षा में प्रशिक्षित राष्ट्रीय राइफल्स को एलओसी और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर तैनात करना चाहिए।

सुरक्षा मामलों के जानकार मानते हैं कि सेना की ताकत का इस्तेमाल सीमा की सुरक्षा के लिए करना अधिक उचित है, जबकि आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने के लिए अर्धसैनिक बलों को जिम्मेदारी दी जानी चाहिए।

Rashtriya Rifles in Jammu Kashmir: स्थानीय लोगों की है मांग

सूत्रों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर की मौजूदा स्थिति को देखते हुए आंतरिक सुरक्षा के लिए सीआरपीएफ सबसे उपयुक्त विकल्प है। उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय राइफल्स सीमा की सुरक्षा के लिए प्रशिक्षित हैं, जबकि सीआरपीएफ देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए विशेष रूप से तैयार की गई है। यह बदलाव एक संतुलित कदम होगा।”

रक्षा मामलों से जुड़े जानकारों का मानना है कि केवल सीआरपीएफ ही नहीं बल्कि सीमा सुरक्षा बल (BSF) को भी जम्मू-कश्मीर की आंतरिक सुरक्षा में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “बीएसएफ ने 1990 के दशक में कश्मीर में आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाई थी। इसलिए सरकार को बीएसएफ की तैनाती पर भी विचार करना चाहिए।”

घाटी के स्थानीय लोग और नेताओं की अक्सर मांग रही है कि इस इलाके को केवल सुरक्षा के नजरिए से न देखा जाए। अब सरकार का दावा है कि स्थिति बदल गई है, इसलिए सेना को आंतरिक ड्यूटी से हटाकर सीमा पर लगाया जा रहा है। गृह मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल और जम्मू-कश्मीर पुलिस अब किसी भी कानून-व्यवस्था की समस्या से निपटने में सक्षम हैं। वहीं अब आतंकवाद संबंधी घटनाओं में कमी आने से सरकार का फोकस सीमा सुरक्षा पर शिफ्ट हो रहा है।

सेना की विशेष विशेष काउंटर-इंसरजेंसी फोर्स है आरआर

राष्ट्रीय राइफल्स की स्थापना 1990 के दशक में उस समय की गई थी जब जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद तेजी से फैल रहा था। यह यूनिट भारतीय सेना के जवानों से बनी एक विशेष काउंटर-इंसरजेंसी फोर्स है, जिसने घाटी में आतंकवाद से निपटने में अहम भूमिका निभाई। कारगिल युद्ध के बाद मंत्रियों के एक समूह ने सिफारिश की थी कि सीमा सुरक्षा बल (BSF) को अपनी प्राथमिक भूमिका यानी सीमाओं की रक्षा पर केंद्रित किया जाए और जम्मू-कश्मीर में आंतरिक सुरक्षा का दायित्व सीआरपीएफ को सौंपा जाए। इसी रणनीति के तहत 2005 के आसपास सीआरपीएफ ने बीएसएफ की जगह पूरी तरह से ले ली थी। अब सरकार एक बार फिर सुरक्षा ढांचे में बदलाव की दिशा में आगे बढ़ रही है।

हर साल छिड़ती है बहस

राष्ट्रीय राइफल्स की स्थापना 1990 में हुई थी, और तब से पिछले 25 सालों में इसकी तैनाती को कम करने पर कई बहसें हुईं। 2011 से 2016 के बीच भारतीय सेना ने शहरों और गांवों से अपनी मौजूदगी कम करने की कोशिश की, जहां जिम्मेदारी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल और जम्मू-कश्मीर पुलिस को शिफ्ट करने की बात थी। इसकी वजह थी कि राष्ट्रीय राइफल्स मुख्य रूप से इन्फैंट्री बटालियनों से बनी है, और लंबे समय तक आंतरिक सुरक्षा में लगे रहने से सेना पर बोझ पड़ता है।

2022 में भी राष्ट्रीय राइफल्स की संख्या कम करने पर चर्चा हुई। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना था कि कश्मीर घाटी में आतंकवाद संबंधी घटनाओं में कमी आई है, और ओवर ग्राउंड नेटवर्क कमजोर हुए हैं। अनुच्छेद 370 हटने के बाद पर्यटन बढ़ा, व्यापार सुधरा, और सामान्य स्थिति की ओर कदम बढ़े, जिससे केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय राइफल्स की मौजूदगी कम करने पर विचार किया। हालांकि, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि अचानक बड़ा बदलाव नहीं करना चाहिए, क्योंकि सुरक्षा चुनौतियां बनी रह सकती हैं।

2023 की शुरुआत में सरकार ने कश्मीर घाटी के अंदरूनी इलाकों से सेना, जिसमें राष्ट्रीय राइफल्स शामिल है, को चरणबद्ध तरीके से हटाने पर विचार किया। यह चर्चा करीब दो साल से चल रही थी और एडवांस लेवल तक पहुंच गई थी। प्रस्ताव था कि सेना को सिर्फ नियंत्रण रेखा तक सीमित रखा जाए, और आंतरिक सुरक्षा सीआरपीएफ को सौंपी जाए। राष्ट्रीय राइफल्स की 63 बटालियनों को कम करके तीन चरणों में बदलाव करने की योजना थी, जिसमें हर बटालियन से दो कंपनियां कम की जातीं। इसका आधार था कि 2019 के बाद आतंकवाद में 50 फीसदी कमी आई है, लेकिन अंतिम फैसला राजनीतिक स्तर पर होना था।

उसी साल मई में जम्मू क्षेत्र से राष्ट्रीय राइफल्स की चरणबद्ध वापसी की योजना बनी, जहां तीन काउंटर-इंसर्जेंसी फोर्सेस डेल्टा फोर्स, रोमियो फोर्स और यूनिफॉर्म फोर्स की जिम्मेदारी स्थानीय पुलिस और अर्धसैनिक बलों को सौंपनी थी। लेकिन सीमा पार से हो रहे आतंकी हमलों की वजह से यह योजना अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई। उस साल 17 हत्याएं हुईं, राजौरी और पुंछ में हमले हुए जिसमें सेना के जवान भी शामिल थे।

क्या कहते हैं गृह मंत्रालय के ताजा आंकड़े

गृह मंत्रालय के नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर में पिछले पांच सालों में आतंकवादी घटनाओं में 70 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। 2019 में आतंकवाद से जुड़ी 286 घटनाएं हुई थीं, जबकि 2024 में यह संख्या घटकर केवल 40 रह गई। इसी अवधि में सुरक्षा बलों पर हमलों की संख्या भी 96 से घटकर 5 रह गई। नागरिकों की हत्याओं के मामलों में भी उल्लेखनीय कमी आई है। 2019 में सुरक्षाकर्मियों की 77 हत्याएं हुई थीं, जबकि 2024 में यह आंकड़ा घटकर केवल सात रह गया।

चरणबद्ध बदलाव की योजना

सूत्रों के अनुसार सरकार की योजना है कि जम्मू और कश्मीर के कई जिलों से धीरे-धीरे राष्ट्रीय राइफल्स की टुकड़ियों को हटाया जाए और उनकी जगह सीआरपीएफ की बटालियनों को तैनात किया जाए। सीआरपीएफ के एक अधिकारी ने बताया कि उनकी यूनिट्स आधुनिक उपकरणों से लैस हैं और स्थानीय समुदाय के साथ बेहतर तालमेल रखती हैं। जम्मू क्षेत्र में तीन बटालियनों की तैनाती इसी रणनीति का पहला कदम है। उदयपुर और कठुआ में राष्ट्रीय राइफल्स की यूनिटों को हटाकर सीआरपीएफ को सौंपा जाएगा, जिससे आतंकियों की घुसपैठ को रोकने में सेना को नियंत्रण रेखा पर मजबूती मिलेगी। प्रत्येक बटालियन में लगभग 800 जवान होते हैं। माना जा रहा है कि यह बदलाव धीरे-धीरे कश्मीर घाटी तक भी पहुंचेगा। इससे राष्ट्रीय राइफल्स को पूरी तरह से एलओसी और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर लगाया जा सकेगा।

Project 75I submarine deal: मझगांव डॉक्स बनेगा देश में सबमरीन बनाने का सबसे बड़ा हब, सरकार ने दी ये बड़ी मंजूरी

project 75i india submarine deal mazagon dock

Project 75I submarine deal: केंद्र सरकार ने रक्षा मंत्रालय और मझगांव डॉकयार्ड्स लिमिटेड को 70,000 करोड़ रुपये की लागत वाले सबमरीन सौदे के लिए बातचीत शुरू करने की मंजूरी दे दी है। यह फैसला छह महीने से ज्यादा समय से अटका हुआ था, लेकिन अब हरी झंडी मिलने से प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी। इस सौदे के तहत प्रोजेक्ट 75 इंडिया नाम से छह सबमरीन भारत में ही बनाई जाएंगी, जिसमें जर्मनी की मदद ली जाएगी।

Indian Navy Project-76: क्या है भारतीय नौसेना का ये खास Project-76? समुद्र के नीचे चीन-पाकिस्तान को टक्कर देने की कर रही बड़ी तैयारी!

रक्षा अधिकारियों ने बताया कि जनवरी में रक्षा मंत्रालय ने सरकारी कंपनी मझगांव डॉकयार्ड्स को इन सबमरीन के निर्माण के लिए चुना था, और उनके साथी के रूप में जर्मन कंपनी थाइसेनक्रुप मैरीन सिस्टम्स को शामिल किया गया है। इन सबमरीन में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी AIP तकनीक लगाई जाएगी, जो उन्हें पानी के नीचे ज्यादा समय तक रहने की क्षमता देगी।

अधिकारियों ने कहा कि केंद्र ने यह मंजूरी एक उच्च स्तरीय बैठक के बाद दी, जिसमें रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के शीर्ष अधिकारी शामिल थे। इस बैठक में देश की सबमरीन बेड़े की मौजूदा स्थिति और आगे की योजना पर चर्चा हुई। रक्षा मंत्रालय और भारतीय नौसेना को उम्मीद है कि अगले छह महीनों में कॉन्टैक्ट पर बातचीत पूरी हो जाएगी और अंतिम मंजूरी मिल जाएगी। इस सौदे का मुख्य उद्देश्य देश में ही पारंपरिक सबमरीन के डिजाइन और निर्माण की स्वदेशी क्षमता विकसित करना है।

सरकार सबमरीन बनाने की प्रक्रिया को तेज करने के तरीके भी तलाश रही है। भारतीय नौसेना छह ऐसी एडवांस सबमरीन खरीदना चाहती है, जो पानी के नीचे तीन हफ्तों तक रह सकें, और जर्मन प्रणाली से यह संभव हो पाएगा। भारतीय उद्योग भी दो न्यूक्लियर अटैक सबमरीन बनाने पर काम कर रहा है, जिसमें निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनी लार्सन एंड टुब्रो महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, साथ ही सबमरीन मैन्युफैक्चरिंग सेंटर भी शामिल होगा।

चीन की नौसेना के तेज आधुनिकीकरण के बीच, भारतीय सरकार ने कई सबमरीन परियोजनाओं को मंजूरी दी है, जिसमें परमाणु और पारंपरिक दोनों शामिल हैं। भारत को चीन और पाकिस्तान दोनों का मुकाबला करने के लिए जरूरी क्षमताएं विकसित करनी हैं। भारतीय नौसेना अगले दशक में अपनी करीब दस सबमरीन को रिटायर करने वाली है, और उनके स्थान पर नई सबमरीन की जरूरत पड़ेगी।

project 75i india submarine deal mazagon dock
Mazagaon Dockyards Limited

इस फैसले से मझगांव डॉकयार्ड्स की क्षमता में भी बढ़ोतरी होगी। कंपनी पहले से ही कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम कर रही है। कंपनी मुंबई में स्थित है और भारत की नौसेना के लिए जहाज बनाने का लंबा अनुभव रखती है। इससे मझगांव डॉक्स लिमिटेड की जहाज और सबमरीन बनाने की क्षमता दोगुनी हो जाएगी। अभी जहां कंपनी 40,000 टन वजन तक के जहाज बना पाती है, वहीं जल्द यह क्षमता 80,000 टन तक पहुंच जाएगी और आगे चलकर इसे दो लाख टन तक बढ़ाने का लक्ष्य है। Project 75I के साथ यह क्षमता भारत को आत्मनिर्भर बनाएगी। अब MDL एक साथ 10 युद्धपोत और 11 सबमरीन पर काम कर सकेगा। यह किसी भी एशियाई देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।

यही नहीं, MDL ने हाल ही में श्रीलंका के कोलंबो डॉकयार्ड पर 53 मिलियन डॉलर की डील कर नियंत्रण हासिल किया है। इसका मतलब है कि अब भारत सिर्फ अपने लिए ही नहीं बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में भी जहाज और पनडुब्बी निर्माण का अहम केंद्र बन सकता है।

प्रोजेक्ट 75 इंडिया (Project 75I) के तहत बनने वाली ये सबमरीन आधुनिक तकनीक से लैस होंगी, जो नौसेना की ताकत को बढ़ाएंगी। जर्मन साझेदारी से भारत को नई तकनीक मिलेगी, जो स्वदेशी निर्माण को मजबूत करेगी।

रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि बातचीत इस महीने के अंत तक शुरू हो जाएगी, और सभी पक्ष इस पर सक्रियता से काम कर रहे हैं। यह सौदा भारत की रक्षा नीति का हिस्सा है, जो आत्मनिर्भर भारत पर जोर देती है। सबमरीन निर्माण में स्वदेशी क्षमता विकसित होने से भविष्य में विदेशी निर्भरता कम होगी। नौसेना की मौजूदा सबमरीन बेड़े में रूसी और फ्रांसीसी तकनीक वाली सबमरीन शामिल हैं, लेकिन अब जर्मन सहयोग से विविधता आएगी।

मझगांव डॉकयार्ड्स ने पहले कलवरी क्लास की सबमरीन बनाई हैं, जो प्रोजेक्ट 75 का हिस्सा थीं। इस नई परियोजना से कंपनी की क्षमता और बढ़ेगी। उच्च स्तरीय बैठक में सबमरीन बेड़े की रोडमैप पर विस्तार से चर्चा हुई, जिसमें मौजूदा चुनौतियां और समाधान शामिल थे। भारत की समुद्री सीमाएं लंबी हैं, और पानी के नीचे की सुरक्षा महत्वपूर्ण है। इस सौदे से नौसेना की क्षमता में इजाफा होगा। अधिकारियों ने कहा कि अनुबंध पर बातचीत में सभी तकनीकी और वित्तीय पहलुओं पर ध्यान दिया जाएगा।

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: पीएम मोदी करेंगे न्योमा एयरबेस का उद्घाटन! बीआरओ ने चीन सीमा पर मात्र सात महीने में तैयार किया गेम चेंजर रनवे

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: पूर्वी लद्दाख के न्योमा इलाके में बन रहा मुद न्योमा एयरबेस भारत की सैन्य ताकत को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए तैयार है। सूत्रों के मुताबिक इस अत्याधुनिक एडवांस लैंडिंग ग्राउंड (ALG) का उद्घाटन अक्टूबर 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर सकते हैं। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से महज 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह एयरबेस समुद्र तल से 13,700 फीट की ऊंचाई पर है। यह भारत का सबसे ऊंचा एयरबेस और दुनिया में पांचवां सबसे ऊंचा हवाई अड्डा होगा।

Nyoma Airstrip in Eastern Ladakh: एलएसी पर चीन को टक्कर देने की तैयारी, अक्टूबर तक न्योमा एयरस्ट्रिप पर लैंड कर सकेंगे मिग-29 और सुखोई-30 फाइटर जेट

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: केवल सात महीने में बनकर हुआ तैयार

न्योमा एयरबेस का निर्माण बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन (BRO) ने किया है, जिसने कठिन भौगोलिक और मौसमी चुनौतियों के बावजूद इस परियोजना को समय से पहले पूरा किया। सूत्रों ने बताया कि इसके रनवे का काम 12 सितंबर 2023 को शुरू हुआ था और 12 अक्टूबर 2024 को इसे पूरी तरह तैयार कर लिया गया। चूंकि लद्दाख छह महीने तक पूरी तरह से बर्फ से ढका रहता है और रास्ते पूरी तरह से बंद हो जाते हैं, तो ऐसे में यह रनवे प्रभावी रूप से केवल सात महीने में बनकर तैयार हुआ है। उन्होंने बताया कि यहां सितंबर-अक्टूबर तक ही काम किया जा सकता है। इस प्रोजेक्ट को मिशन मोड में पूरा किया गया। उन्होंने कहा, “हमने दिन-रात काम किया और कठिन परिस्थितियों में भी क्वॉलिटी से कोई समझौता नहीं किया।”

सूत्रों ने बताया कि भारतीय वायुसेना के तय मानकों के मुताबिक एयर स्ट्रिप बनाई गई है और थोड़ा जरूरी काम अभी बाकी है। वहीं अक्तूबर तक न्योमा एयर बेस पर फुल इमर्जेंसी लैंडिंग के लिए सभी तैयारियां और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का काम पूरा हो जाएगा। यह रन 2.7 किलोमीटर लंबा है और पूरी तरह से कंक्रीट से बना है।

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: पीएम मोदी करेंगे उद्घाटन!

सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस साल अक्तूबर के दूसरे हफ्ते में पूर्वी लद्दाख के रणनीतिक न्योमा एयरबेस का उद्घाटन कर सकते हैं। यह एयरबेस समुद्र तल से 13,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। न्योमा एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड का इस्तेमाल 2020 में चीन और भारत के बीच लद्दाख में हुए सीमा विवाद के दौरान बड़े पैमाने पर किया गया था। उस समय इस एयरस्ट्रिप ने भारतीय सेना के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यहां से सैनिकों और सैन्य साजोसामान तेसी से एलएसी तक पहुंचाया गया था। लेह तक हैवी लिफ्ट ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के जरिए जवानों को लाया गया और फिर न्योमा से उन्हें ऊंचाई वाले मोर्चों तक भेजा गया। इसके लिए भारतीय वायुसेना ने सी-130 जे सुपर हरक्यूलिस और चिनूक हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल किया था।

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: फाइटर जेट्स भर सकेंगे उड़ान

यह एयरबेस रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा से लगभग 25-30 किमी की दूरी पर है। और डेमचोक जैसे संवेदनशील इलाके के करीब है। डेमचोक और डेपसांग जैसे इलाके भारत और चीन के बीच तनाव की बड़ी वजह रहे हैं। 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद भारत ने एलएसी के पास अपनी सैन्य तैयारियों को तेज कर दिया है। न्योमा एयरबेस के चालू होने से भारतीय वायुसेना मिग-29 और सुखोई-30 एमकेआई जैसे फाइटर जेट्स को यहां से ऑपरेट कर सकेगी। इसके अलावा, सी-17 ग्लोबमास्टर और सी-130जे जैसे ट्रांसपोर्ट विमान भी यहां से सैनिकों, हथियारों और राशन को जल्दी पहुंचा सकेंगे।

भारतीय सेना की सप्लाई चेन में आएगा बड़ा बदलाव

न्योमा एयरबेस लद्दाख में भारत का चौथा वायुसेना अड्डा होगा। इससे पहले लेह, कारगिल और परतापुर (थॉईस) में दो फाइटर एयरफील्ड मौजूद हैं। दौलत बेग ओल्डी (DBO) में एक मिट्टी का रनवे है, जो विशेष अभियानों के लिए उपयोग होता है। फुकचे और चुशूल में भी छोटे रनवे हैं, लेकिन युद्ध जैसे हालात में इनका उपयोग सीमित है। न्योमा एयरबेस के बन जाने के बाद यह लद्दाख के डाउनहिल फ्लैट प्लेन्स (नीचे के समतल क्षेत्र) में स्थित दक्षिणी क्षेत्र का पहला वायुसेना अड्डा होगा। वहीं, न्योमा एयरबेस की खासियत यह है कि यह अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर स्थित है, जिससे फिक्स्ड-विंग एयरक्राफ्ट के लिए यह अधिक उपयुक्त है।

न्योमा एयरबेस के एक्टिव हो जाने के बाद भारतीय सेना की सप्लाई चेन में बड़ा बदलाव आएगा। अभी तक लेह से न्योमा तक सड़क मार्ग से लॉजिस्टिक सप्लाई पहुंचाने में छह घंटे लगते हैं, लेकिन अब दिल्ली या चंडीगढ़ से विमान सीधे यहां तक डेढ़ से दो घंटे में पहुंच सकेंगे। इसका फायदा सैनिकों, गोला-बारूद, हथियारों और मेडिकल सपोर्ट को तेजी से आगे तक पहुंचाने में मिलेगा।

माइनस 30 डिग्री तक गिर जाता है तापमान

बीआरओ के प्रोजेक्ट हिमांक के चीफ इंजीनियर ब्रिगेडियर विशाल श्रीवाास्तव ने इस उपलब्धि पर गर्व जताते हुए कहा, “हमारी टीम ने कठिन परिस्थितियों में असाधारण काम किया है। न्योमा का यह रनवे न केवल सैन्य दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह स्थानीय लोगों के लिए बेहतर कनेक्टिविटी प्रदान करेगा और आपात स्थिति में राहत सामग्री को जल्दी पहुंचाने में मदद करेगा। न्योमा के पास मुद गांव के नाम पर इस एयरबेस का नाम रखा गया है, जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को भी दर्शाता है। उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में सर्दियों में तापमान माइनस 30 डिग्री तक गिर जाता है, और छह महीने तक सड़कें बर्फ से ढक जाती हैं। इसके बावजूद, बीआरओ ने आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करके इस एयरबेस को समय पर पूरा किया।

Nyoma Airstrip Eastern Ladakh: एयरफोर्स कर चुकी है टेस्टिंग

वहीं पिछले साल वायुसेना की एक विशेष टीम ने न्योमा रनवे का निरीक्षण भी किया था। टीम में पायलटों के साथ एयर ट्रैफिक कंट्रोलर और तकनीकी स्टाफ शामिल थे। हर पहलू की जांच के बाद रनवे को ऑपरेशनल घोषित किया गया। इसके बाद सी-130 जे सुपर हरक्यूलिस ने न्योमा ALG पर टेस्ट फ्लाइट की थी। इस ट्रायल में विमान ने रनवे के ऊपर से लो ओवरशूट किया, यानी लैंडिंग गियर खोलकर बिना टच किए रनवे के बिल्कुल नजदीक से उड़ान भरी। यह ट्रायल को एयर ट्रैफिक कंट्रोल की गाइडेंस में सफलतापूर्वक पूरा किया गया था।

बीआरओ के बजट में भारी इजाफा

2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत ने अपनी सीमा पर बुनियादी ढांचे के विकास को प्राथमिकता दी है। सरकार ने बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन के बजट में भी भारी इजाफा किया है। जहां 12-15 साल पहले इसका वार्षिक बजट केवल 4,000 करोड़ रुपये था, वहीं अब यह बढ़कर 18,700 करोड़ रुपये हो गया है। इस बढ़े हुए बजट का सीधा असर सीमा क्षेत्रों में नई सड़कों और एयरफील्ड्स के निर्माण में दिखाई दे रहा है। इस बढ़े हुए बजट ने सड़कों, पुलों और हवाई अड्डों के निर्माण में तेजी लाई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हमेशा कहा है कि सरकार सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए हर संभव मदद देगी। इसका परिणाम यह है कि भारत ने एलएसी के पास सड़कों का जाल बिछा दिया है, जिसमें हानले-चुमार रोड और सासोमा-डीबीओ रोड जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट शामिल हैं।

चुशूल-डेमचोक-फुकचे-डम रोड भी तैयार

हानले-चुमार रोड, जो 16,500 फीट की ऊंचाई पर सल्सा पास से होकर गुजरती है, अब हानले से चुमार तक की दूरी को छह घंटे से घटाकर केवल एक घंटे 45 मिनट तक रह गई है। इसी तरह, चुशूल-डेमचोक-फुकचे-डम रोड (CDFD) एलएसी के समानांतर चलती है और डेमचोक जैसे संवेदनशील क्षेत्रों तक तेजी से पहुंच मिलती है। सूत्रों ने बताया कि यह सड़क 14,000 से 15,000 फीट की ऊंचाई पर बनाई गई है, जहां तापमान माइनस 35 डिग्री तक गिर जाता है। उन्होंने कहा, “हमने कई चुनौतियों का सामना किया, लेकिन इस सड़क को समय पर पूरा करना हमारी प्राथमिकता थी।”

गेम-चेंजर साबित होगा न्योमा एयरबेस

न्योमा एयरबेस का निर्माण भारत की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह LAC पर चीन की सैन्य तैनाती का मुकाबला करने के लिए तैयार है। चीन ने अपनी तरफ 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा पर कई अग्रिम हवाई अड्डे विकसित किए हैं। अप्रैल 2020 में चीनी सेना की भारी तैनाती को देखते हुए भारत ने भी अपनी तैयारियों को तेज किया। न्योमा एयरबेस के चालू होने से भारत को तेजी से सैन्य उपकरण और सैनिकों को तैनात करने की क्षमता मिलेगी, जो युद्ध की स्थिति में गेम-चेंजर साबित हो सकता है।

Rafale locks F35: फ्रांस के रफाल ने किया अमेरिका के F-35 फाइटर जेट को लॉक, डॉगफाइट में सिमुलेटेड मिसाइल दागकर “मार गिराया”, देखें वीडियो

Rafale locks F-35 in NATO exercise Atlantic Trident 25 in Finland

Rafale locks F35: फिनलैंड के आसमान में हाल ही में एक ऐसा नजारा देखने को मिला, जिसने दुनिया भर के मिलिट्री एक्सपर्ट्स और एविएशन लवर्स का ध्यान खींच लिया। नॉटो (NATO) के अटलांटिक ट्राइडेंट 25 मल्टीनेशनल एक्सरसाइज के दौरान फ्रांस के राफेल लड़ाकू विमान ने अमेरिका के अत्याधुनिक F-35 लाइटनिंग II को एक सिमुलेटेड डॉगफाइट में लॉक कर दिया। इस घटना का 44 सेकंड का वीडियो फ्रेंच एयर एंड स्पेस फोर्स ने 20 अगस्त 2025 को अपने आधिकारिक X अकाउंट पर जारी किया, जो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

AMCA Engine Deal: पहली बार भारत को मिलेगा फाइटर जेट इंजन का मालिकाना हक, फ्रांस के साथ समझौते से बनेगा डुअल इंजन इकोसिस्टम

Rafale locks F35: फ्रांस के रफाल ने मारी बाजी

फ्रेंच एयर फोर्स (French Air and Space Force) द्वारा जारी वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि एक राफेल विमान उड़ान भरता है और कुछ ही सेकंड बाद एक अमेरिकी F-35 उसके सामने से गुजरता है। राफेल का पायलट तुरंत F-35 को अपने इन्फ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम (IRST) से लॉक करने की कोशिश करता है। वीडियो के 15वें सेकंड पर राफेल का रडार अमेरिकी स्टील्थ विमान को पूरी तरह लॉक कर लेता है। 44 सेकंड के इस वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कैसे रफाल पायलट ने अमेरिकी F-35 को पास से मुकाबले के दौरान लक्ष्य बनाकर “किल लॉक” हासिल किया। वीडियो में पायलट के कॉकपिट से आती आवाज “Take the shot” भी सुनी जा सकती है, जिसमें पायलट एक सिमुलेटेड मिसाइल भी दागता है। बता दें कि “टेक द शॉट” का मतलब है कि राफेल ने सिमुलेटेड मिसाइल दागकर F-35 को “मार गिराया”।

Rafale locks F35: वीडियो ने मचाई खलबली

वीडियो की शुरुआत में रफाल को टेक-ऑफ करते हुए दिखाया गया है। इसके कुछ सेकंड बाद अमेरिकी F-35 उसके सामने आता है। लगभग 15वें सेकंड पर रफाल का रडार F-35 को लॉक कर लेता है और “फायर” की कमांड सुनाई देती है। वीडियो में आगे देखा गया कि राफेल ने फिनलैंड के F/A-18 हॉर्नेट को भी दो बार लॉक किया। पहली बार 22-23 सेकंड के बीच और दूसरी बार 28-30 सेकंड के बीच।

यह वीडियो जारी होने के बाद डिफेंस एक्सपर्ट्स और डिफेंस इंडस्ट्री में हलचल मच गई है। जहां F-35 स्टील्थ और लंबी दूरी के वॉर स्किल्स में आगे है, जबकि रफाल अपनी एजिलिटी (फुर्ती) और नजदीकी हवाई मुकाबले (क्लोज कॉम्बैट) के लिए मशहूर है।

Rafale locks F35: फिनलैंड का पहला बड़ा बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास

फिनलैंड ने 4 अप्रैल 2023 को NATO की सदस्यता हासिल की थी और यह उसका पहला बड़ा बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास है। Atlantic Trident 25 का आयोजन 16 से 27 जून 2025 तक फिनलैंड के रोवानेमी, पिरक्काला, रिस्साला, हल्ली और ज्यवास्क्यला हवाई अड्डों पर आयोजित हुआ। इस युद्धाभ्यास में फ्रांस, अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और फिनलैंड की वायुसेनाओं ने हिस्सा लिया। कुल 40 से अधिक विमान और लगभग 1,000 सैन्यकर्मी इस अभ्यास का हिस्सा थे।

इसमें फ्रांस के रफाल, E-3F AWACS, A400M ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और A330 MRTT टैंकर शामिल हुए। अमेरिका की ओर से F-35A लाइटनिंग II, F-15E स्ट्राइक ईगल और KC-135 टैंकर शामिल थे। ब्रिटेन ने टाइफून लड़ाकू विमान भेजे जबकि फिनलैंड ने F/A-18 हॉर्नेट और NH90 हेलिकॉप्टर इस अभ्यास में उतारे। इसके अलावा ग्राउंड-बेस्ड एयर डिफेंस यूनिट्स और ड्रेकेन इंटरनेशनल के विमान भी अभ्यास का हिस्सा बने। NATO की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य Agile Combat Employment (ACE) यानी फुर्तीले युद्धक अभियानों की नई रणनीतियों को परखना था।

अभ्यास के दौरान फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन और फिनलैंड की सेनाओं ने संयुक्त रूप से कई तरह के अभ्यास किए, जिनमें हवाई डॉगफाइट, एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग और मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस शामिल थे।

वीडियो रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर #Rafale और #F35 ट्रेंड करने लगे।

Rafale locks F35: क्यों खास है रफाल बनाम F-35 मुकाबला?

रफाल को 4.5 पीढ़ी का लड़ाकू विमान माना जाता है, जो अपनी जबरदस्त फुर्ती और शक्तिशाली सेंसर सिस्टम के लिए जाना जाता है। दूसरी ओर, अमेरिकी F-35 पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर है, जिसका डिजाइन लंबी दूरी पर लड़ाई के लिए किया गया है। नजदीकी हवाई युद्ध में रफाल की फुर्ती और इंफ्रारेड सर्च एंड ट्रैक (Infrared Search and Track – IRST) जैसी तकनीक उसे बढ़त दिलाती है। वहीं F-35 की ताकत उसके स्टील्थ डिजाइन और एडवांस सेंसर फ्यूजन में है। इस अभ्यास में रफाल का F-35 को लॉक कर पाना इस बात का सबूत है कि करीबी हवाई मुकाबले में भी पुराने डिजाइन वाले विमान अपनी क्षमता दिखा सकते हैं।

फ्रेंच एयर फोर्स के इस वीडियो ने सोशल मीडिया पर खूब चर्चा बटोरी। कई फ्रेंच यूजर्स ने इस उपलब्धि पर गर्व जताया और इसे राफेल की ताकत का सबूत बताया। यह पहली बार नहीं है जब राफेल ने अमेरिकी स्टील्थ विमानों को हराया हो। साल 2009 में संयुक्त अरब अमीरात में हुए एक युद्धाभ्यास में राफेल ने अमेरिकी F-22 रैप्टर को भी लॉक कर “मार गिराया” था।

AMCA Engine Deal: पहली बार भारत को मिलेगा फाइटर जेट इंजन का मालिकाना हक, फ्रांस के साथ समझौते से बनेगा डुअल इंजन इकोसिस्टम

India-France AMCA Engine Deal indigenous fighter jet

AMCA Engine Deal: एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA के इंजन को लेकर भारत और फ्रांस के बीच हुई नई रक्षा साझेदारी को देश की डिफेंस हिस्ट्री में सबसे बड़ा मोड़ माना जा रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में घोषणा की कि भारत का पहला पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान अब अपने इंजन के साथ पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक पर खड़ा होगा। इस प्रोजेक्ट के तहत भारत और फ्रांस की राफेल का इंजन बनाने वाली कंपनी सफरान मिलकर नया स्वदेशी इंजन बनाएंगे। लेकिन इस बार सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस इंजन का मालिकाना हक यानी बौद्धिक संपदा अधिकार (IP Ownership) भारत के पास होगी।

AMCA jet engine: भारत-फ्रांस मिलकर बनाएंगे पांचवी पीढ़ी का स्वदेशी इंजन, राजनाथ सिंह किया बड़ा एलान, राफेल बनाने वाली कंपनी सफरान के साथ होगी साझेदारी

AMCA Engine Deal: क्या कहा पीएम मोदी और रक्षा मंत्री ने

हाल ही में 15 अगस्त को लाल किला के प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, “आज मैं युवा वैज्ञानिकों, प्रतिभाशाली युवाओं, इंजीनियरों, पेशेवरों और सरकार के सभी विभागों से आग्रह करता हूं कि हमारे पास अपने स्वयं के मेड इन इंडिया लड़ाकू विमानों के लिए जेट इंजन होने चाहिए।

वहीं उसके बाद 22 अगस्त को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एलान किया, “आज हम पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान बनाने की दिशा में भी आगे कदम बढ़ा चुके हैं। हम एयरक्राफ्ट का इंजन भी भारत में ही बनाने की तरफ बढ़ चुके हैं। हम लोग फ्रेंच कंपनी सफरान के साथ इंजन मेकिंग का काम भारत में शुरू करने जा रहे हैं।”

AMCA Engine Deal: 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर

अब तक भारत जिन लड़ाकू विमानों का निर्माण कर रहा था, उनके लिए विदेशी इंजन पर निर्भर रहना पड़ता था। तेजस विमान में इस्तेमाल होने वाले इंजन अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी से खरीदे जाते हैं। वहीं रूस से मिले मिग और सुखोई के इंजन भी वर्षों से भारतीय वायुसेना की रीढ़ बने हुए हैं। लेकिन इस बार भारत सिर्फ इंजन (AMCA Engine Deal) बनाएगा ही नहीं बल्कि उसका मालिक भी होगा। यह पहली बार होगा जब भारत के पास दुनिया के सबसे एडवांस्ड जेट इंजनों में से एक का IP होगा। यह ऐसा अधिकार है जो आज तक भारत को किसी भी रक्षा सौदे में नहीं मिला है। सफरान के साथ इंजन डील में 100 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, भारत का IP राइट्स पर पूरा मालिकाना हक़, और AMCA के लिए हाई-थ्रस्ट इंजन का डेवलपमेंट शामिल है।

इस साझेदारी में सफरान और भारत की हिंदुस्तान एयरनॉटिक्स लिमिटेड मुख्य भूमिका निभाएगी। इसके साथ ही डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन का गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) भी इस प्रोजेक्ट में शामिल होगा।

AMCA Engine Deal: इंजन तकनीक में भारत की सबसे बड़ी छलांग

24 टन कैटेगरी वाले एएमसीए प्रोजेक्ट (AMCA Engine Deal) को भारत के सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स में गिना जा रहा है। यह एक स्टील्थ यानी अदृश्य क्षमता वाला लड़ाकू विमान होगा, जिसमें दो इंजन होंगे। स्टील्थ होने की वजह से इसे रडार पर पकड़ना बेहद मुश्किल होगा। लेकिन ऐसे विमानों की असली ताकत उनके इंजन में छुपी होती है। अब तक भारत अपनी लड़ाकू विमानों के लिए खुद का इंजन नहीं बना पाया था। कई बार कोशिशें हुईं, डीआरडीओ ने कावेरी भी बनाया, लेकिन तकनीकी बाधाओं, खासकर थ्रस्ट-टू-वेट रेश्यो जैसी दिक्कतों के चलते इंजन डेवलप नहीं हो पाया।

यही वजह है कि सफरान के साथ हुआ यह करार केवल एक तकनीकी सहयोग नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक स्थिति को भी मजबूत करेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि जब भारत को इंजन के डिजाइन, निर्माण और उत्पादन की पूरी तकनीक मिल जाएगी और उसके सारे अधिकार भारत के पास होंगे, तो यह आत्मनिर्भर भारत अभियान के सबसे बड़े मील के पत्थरों में गिना जाएगा।

रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह डील भारत के “मेक इन इंडिया” पहल को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी। इसके लिए भारत में एक पूरी इंजन बनाने की व्यवस्था तैयार की जाएगी, जिसमें निजी कंपनियों को भी मौका मिलेगा। इससे नौकरियों का सृजन होगा और देश की अर्थव्यवस्था को भी फायदा पहुंचेगा।”

वहीं इसका सीधा असर भारत के डिफेंस एक्सपोर्ट्स पर पड़ेगा क्योंकि भविष्य में भारत इस इंजन को अन्य देशों को बेच भी सकता है, और यह सिर्फ अपने विमानों में इस्तेमाल करने तक सीमित नहीं रहेगा।

AMCA Engine Deal: पहली बार डुअल इंजन इकोसिस्टम

स्वदेशी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस (AMCA Engine Deal) के लिए अभी तक भारत सिर्फ अमेरिकी जनरल इलेक्ट्रिक के इंजनों पर निर्भर था। तेजस एमके-2 और नौसेना के ट्विन-इंजन डेक-बेस्ड (TEDBF) नेवी फाइटर के लिए जीई का F414 इंजन इस्तेमाल किया जाना है। लेकिन अब सफरान के साथ मिलकर एएमसीए के लिए नया इंजन तैयार किया जाएगा। इसका मतलब है कि भारत के पास पहली बार एक साथ दो इंजन इकोसिस्टम होंगे।

सफरान पहले से ही राफेल इंजन (M88) और हेलिकॉप्टर इंजनों में भारत का पार्टनर है। इस डील के बाद भारत के दो अलग-अलग इंजन इकोसिस्टम तेजस/एएमसीए (सफरान वाला) और GE F414 (तेजस एमके2) एकसाथ तैयार हो रहे हैं। यह डुअल इंजन इकोसिस्टम भारत को दुनिया के चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा करेगा जहां एक साथ पश्चिमी और स्वदेशी इंजन प्रोग्राम समानांतर रूप से आगे बढ़ेंगे।

AMCA Engine Deal: सफरान और जीई में कॉम्पिटिशन?

जीई के साथ तेजस एमके-2 के लिए F414 इंजन देने के लेकर बातचीत चल रही है। जिन्हें एचएएल और जीई दोनों कंपनियां मिल कर भारत में बनाएंगी। हालांकि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स और जीई ने भारत में 98 किलोन्यूटन थ्रस्ट कैटेगरी में जीई-एफ414 इंजन के को-प्रोडक्शन के लिए अभी तक अंतिम सौदा नहीं हुआ है, जिसमें लगभग 1.5 बिलियन डॉलर में 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा।

खास बात यह होगी कि सफरान (AMCA Engine Deal) का 120 किलोन्यूटन (kN) थ्रस्ट वाला इंजन होगा जबकि जीई का F414 इंजन 98 किलोन्यूटन थ्रस्ट का होगा। सफरान का इंजन AMCA के दूसरे चरण (Mk-2) के लिए डिजाइन किया जाएगा। इस इंजन का विकास 10 साल में पूरा होने की उम्मीद है, और यह पूरी तरह से नई डिज़ाइन पर आधारित होगा, जो राफेल के M88 इंजन से अलग होगा। यह इंजन AMCA को सुपरक्रूज और बेहतर थ्रस्ट-टू-वेट रेश्यो देगा।

जीई का F414 इंजन तेजस मार्क-2 और AMCA के पहले चरण (Mk-1) के लिए चुना गया है। यह इंजन एफ/ए-18 सुपर हॉर्नेट में इस्तेमाल होता है। जीई ने भारत को 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की सहमति दी है, जिसमें सिंगल क्रिस्टल ब्लेड और सेरामिक मैट्रिक्स कॉम्पोनेंट्स जैसे महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू शामिल हैं। हालांकि, इस डील में कुछ संवेदनशील तकनीकों तक पहुंच नहीं है, जिसमें अमेरिकी निर्यात नियमों (ITAR) आड़े आ रहे हैं।

मौजूदा समय-सीमा के अनुसार, अपेक्षित थ्रस्ट-टू-वेट रेश्यो, एडवांस सेंसर फ्यूजन और इंटरनल वेपन बे और “सर्पेंट-टाइन एयर-इन्टेक” जैसी स्टील्थ सुविधाओं के साथ AMCA 2035 तक ही प्रोडक्शन के लिए तैयार हो पाएगा।

बता दें कि भारतीय वायुसेना ने एएमसीए के सात स्क्वाड्रन (126 जेट) शामिल करने की योजना बनाई है, जिनमें से पहले दो स्क्वाड्रन अमेरिकी जीई-एफ414 इंजन से ऑपरेट होंगे और अगले पांच स्क्वाड्रन 120 किलोन्यूटन इंजन से ऑपरेट होंगे।

सिर्फ डिफेंस नहीं, स्पेस और सिविल एविएशन पर भी असर

सफरान (AMCA Engine Deal) सिर्फ लड़ाकू विमान इंजन बनाने वाली कंपनी नहीं है। वह स्पेस प्रोप्ल और सिविल एविएशन सेक्टर में भी अग्रणी है। कंपनी पहले से ही इसरो के साथ कई प्रोजेक्ट्स में सहयोग कर चुकी है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि एएमसीए इंजन प्रोजेक्ट का असर भविष्य में भारत के स्पेस प्रोग्राम और डोमेस्टिक पैसेंजर्स एयरक्राफ्ट के विकास पर भी पड़ेगा।

इसका मतलब है कि भारत सिर्फ लड़ाकू विमान इंजन बनाने तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि आने वाले सालों में सिविल एयरक्राफ्ट और स्पेस एयरक्राफ्ट के लिए भी एडवांस इंजन डेवलप कर सकेगा।

फ्रांस क्यों हुआ तैयार?

अब सवाल उठता है कि फ्रांस ने इतनी संवेदनशील तकनीक (AMCA Engine Deal) भारत के साथ साझा करने का फैसला क्यों लिया। रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है, फ्रांस भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन का सबसे बड़ा संतुलनकारी साझेदार मानता है। चीन की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए पेरिस और नई दिल्ली के बीच रणनीतिक सहयोग लगातार बढ़ रहा है। यही वजह है कि पेरिस ने भारत को सिर्फ ग्राहक मानने के बजाय एक असली साझेदार का दर्जा दिया है। पहले राफेल डील और अब AMCA इंजन डीलके जरिए फ्रांस, भारत को इंडो-पैसिफिक में चीन को बैलेंस करने वाले देश के रूप में देख रहा है।

प्रधानमंत्री कार्यालय की सीधी नजर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पिछले एक दशक में रक्षा उत्पादन पर लगातार ध्यान दिया है। तेजस विमान की भारी संख्या में खरीद, प्रचंड हेलिकॉप्टरों का बेड़ा, और ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों के निर्यात ने भारत को रक्षा उत्पादन में नया आत्मविश्वास दिया है। अब एएमसीए इंजन प्रोजेक्ट में मिली यह सफलता प्रधानमंत्री कार्यालय की सीधी निगरानी में आगे बढ़ रही है। यही कारण है कि पिछले महीने प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीके मिश्रा ने भी एचएएल की सुविधाओं का दौरा किया और तेजस प्रोजेक्ट की स्थिति का जायजा लिया।

584 अरब का प्रोजेक्ट, खुलेंगी निर्यात की संभावनाएं

सूत्रों का कहना है कि इस प्रोजेक्ट की लागत करीब सात बिलियन डॉलर यानी 584 अरब रुपये के आसपास मानी जा रही है। इस लागत में इंजन का डिजाइन, परीक्षण, उत्पादन और पूरी सप्लाई चेन शामिल होगी। लेकिन इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि एक बार तकनीक भारत के पास आने के बाद देश स्वतंत्र रूप से इसका इस्तेमाल कर सकेगा। भारत चाहे तो भविष्य में इस इंजन को निर्यात भी कर सकेगा। अभी तक भारत हथियार और मिसाइलें निर्यात कर रहा था, लेकिन इंजन जैसे हाई-टेक सिस्टम का निर्यात एक नए युग की शुरुआत होगी।

भारत ने पिछले एक दशक में रक्षा निर्यात के क्षेत्र में जबरदस्त प्रगति की है। 2013-14 में जहां यह आंकड़ा सिर्फ 686 करोड़ रुपये था, वहीं 2024-25 में यह 23,000 करोड़ रुपये से भी ऊपर पहुंच गया। सरकार ने 2029 तक इसे 50,000 करोड़ तक ले जाने का लक्ष्य रखा है।

Share on WhatsApp