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Illegal Indian Migrants: अमेरिका से बेड़ियों में लौटाए गए भारतीय नागरिक! क्या पीएम मोदी अब भी कहेंगे ‘माय डियर फ्रेंड ट्रंप’?

Indian Illegal Migrants: Indians Deported in Shackles from the US! Will PM Modi Still Call Trump 'My Dear Friend'?

Illegal Indian Migrants: अमेरिका से 104 भारतीय नागरिकों को जबरन एक अमेरिकी मिलिट्री एयरक्राफ्ट सी-17 ग्लोबमास्टर के जरिए हाल ही में अमृतसर भेजा गया। अमेरिका के इस तरह वापस भेजे जाने को लेकर सोशल मीडिया पर नई बहस छिड़ गई है कि जिस तरह से अमेरिका ने इन्हें वापस भेजा है क्या यह अमेरिका का रवैया सही है। ये नागरिक अवैध प्रवासी थे, जो अच्छे जीवन और बेहतर रोजगार की तलाश में डंकी रूट से अमेरिका में घुसे थे। इन्हें अमेरिकी सेना के विमान में हथकड़ियां और पैरों में बेड़ियां डालकर भारत भेजा गया। यह घटना तब घटी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13-14 फरवरी को अमेरिकी दौरे पर जा रहे हैं, जहां उनकी मुलाकात राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से होने वाली है। सवाल यह उठता है कि क्या ट्रंप अब भी भारत के ‘फ्रेंड’ हैं?

Indian Illegal Migrants: Indians Deported in Shackles from the US! Will PM Modi Still Call Trump 'My Dear Friend'?

इस घटना के फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए हैं। सोशल मीडिया पर लोग भारत सरकार की चुप्पी पर हैरान हैं। सबसे पहला सवाल तो यही है कि क्या अमेरिका ने अपने सैन्य विमान में भारतीय नागरिकों को अपराधियों की तरह भेजकर भारत का अपमान किया है? और अगर ऐसा है, तो भारत सरकार ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? कोलंबिया और मेक्सिको जैसे देशों ने जब अमेरिकी सेना के विमानों में उनके नागरिकों को हथकड़ियों में भेजा गया, तो उन्होंने विरोध जताया और अपने नागरिकों को सम्मान के साथ वापस लाने के लिए अपने विमान भेजे। लेकिन भारत ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया।

Illegal Indian Migrants: कैसे हुआ यह सब?

सूत्रों के अनुसार, इन भारतीयों को अमेरिका में अवैध रूप से प्रवेश करने और रहने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। अमेरिका की इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) एजेंसी ने इन्हें डिपोर्ट करने का फैसला कियाया। हालांकि, जिस तरीके से यह डिपोर्टेशन किया गया, उसने ह्यूमन राइट्स एंड डिप्लोमेटिक एटिकेट्स पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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हाथों में हथकड़ी, पैरों में बेड़ियां और कमर में जंजीरें बांधकर इन लोगों को अमेरिका के सैन्य विमान में बैठाया गया। यह वही तरीका है, जिसे आमतौर पर खतरनाक अपराधियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इन अवैध भारतीयों में 25 महिलाएं और 12 नाबालिग बच्चे भी शामिल थे।

Illegal Indian Migrants: अमृतसर एयरपोर्ट पर गुप्त तरीके से लैंडिंग

इस सैन्य विमान की लैंडिंग के समय मीडिया को एयरपोर्ट तक पहुंचने की अनुमति नहीं दी गई। किसी भी पत्रकार या फोटोग्राफर को विमान की तस्वीरें लेने या प्रवासियों से बातचीत करने की इजाजत नहीं दी गई। हालांकि, कुछ स्थानीय लोगों ने विमान के उतरने का वीडियो बना लिया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

सरकार की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया गया, जिससे यह सवाल उठता है कि आखिर सरकार ने इस शर्मनाक स्थिति पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी?

Illegal Indian Migrants: कोलंबिया और मेक्सिको का रुख

जहां कोलंबिया और मेक्सिको जैसे देशों ने अमेरिका के इस कदम का विरोध किया, वहीं भारत ने इस मामले में चुप्पी साध ली। कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्ताव पेट्रो ने अमेरिकी सैन्य विमान को अपने देश में उतरने की अनुमति नहीं दी थी। उन्होंने अपने नागरिकों को वापस लाने के लिए खुद का विमान भेजा और यह सुनिश्चित किया कि उन्हें सम्मानजनक तरीके से वापस लाया जाए।

कोलंबिया के राष्ट्रपति ने कहा, “प्रवासियों को हथकड़ी पहनाना और अपराधियों जैसा व्यवहार करना उनकी गरिमा का अपमान है।”

इसके विपरीत, भारत सरकार ने न केवल अमेरिकी सैन्य विमान को अपने एयरपोर्ट पर उतरने दिया, बल्कि इस मुद्दे पर कोई विरोध भी दर्ज नहीं कराया। इस पर सवाल उठ रहे हैं कि भारत ने अपने नागरिकों की गरिमा की रक्षा के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाया?

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भारतीयों को क्यों नहीं मिला सम्मानजनक वापसी का अधिकार?

इस घटना के बाद सवाल उठता है कि क्या भारत सरकार को अपने नागरिकों के सम्मान की परवाह नहीं है? क्या भारत की विदेश नीति में इतनी मजबूती नहीं है कि वह अपने नागरिकों के लिए आवाज उठा सके? वहीं, विदेश मंत्रालय की ओर से जारी एक संक्षिप्त बयान में कहा गया कि, “भारत अवैध प्रवास के खिलाफ है और अमेरिका के साथ इस मुद्दे पर सहयोग जारी रखेगा।” हालांकि, मंत्रालय ने हथकड़ी और बेड़ियों में लाए गए भारतीय नागरिकों के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की। यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि क्या भारत ने अमेरिका से इस अमानवीय व्यवहार पर स्पष्टीकरण मांगा है या नहीं।

लेकिन सवाल यह है कि इस सहयोग का मतलब क्या है? क्या इसका मतलब यह है कि भारत अपने नागरिकों के साथ हो रहे अपमानजनक व्यवहार को भी नजरअंदाज कर देगा?

Illegal Indian Migrants: भारत को करना चाहिए था विरोध

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय दी है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी कहते हैं, मेक्सिको और कोलंबिया ने हथकड़ी लगे प्रवासियों को ले जाने वाली अमेरिकी सैन्य उड़ानों को रोक दिया। जबकि कोलंबिया ने निर्वासितों को “अमानवीय व्यवहार” के बिना लाने के लिए अपना खुद का विमान भेजा। लेकिन भारत ने न केवल हथकड़ी लगे निर्वासितों के साथ एक अमेरिकी जहाज को लैंड करने दिया, बल्कि यह भी दावा किया कि अवैध प्रवास का मुकाबला करने में “भारत और अमेरिका के बीच सहयोग मजबूत और प्रभावी है”। उनका कहना है कि जब अमेरिकी विमान भारतीयों को ला रहा था, तो भारत को इस बात पर जोर देना चाहिए था कि निर्वासितों के साथ मानवीय व्यवहार किया जाए, न कि उनके हाथों और पैरों को अपराधियों की तरह बेड़ियों से बांधा जाए।

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क्या मोदी सरकार ने जानबूझकर चुप्पी साधी?

इस घटना के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रयागराज में गंगा स्नान कर रहे थे। कई लोगों का मानना है कि यह समय जानबूझकर चुना गया, ताकि मीडिया का ध्यान कहीं और लगा रहे और इस मुद्दे पर ज्यादा हंगामा न हो।

सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे पर सरकार की चुप्पी की आलोचना हो रही है। कई यूजर्स ने सवाल उठाया है कि अगर यह घटना किसी अन्य सरकार के कार्यकाल में हुई होती, तो क्या मोदी सरकार और समर्थक इतने चुप रहते?

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क्या बदल रहे हैं भारत-अमेरिका संबंध?

यह घटना ऐसे समय पर हुई है जब प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका दौरे पर जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना भारत-अमेरिका संबंधों में संभावित तनाव का संकेत हो सकती है।

डोनाल्ड ट्रंप के फिर से राष्ट्रपति बनने के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में बदलाव आ सकता है। ट्रंप के कार्यकाल में भारत को अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी में प्राथमिकता दी गई थी, लेकिन अब ऐसा लगता है कि अमेरिका का रुख बदल रहा है।

विदेश और रक्षा मामलों के एक दूसरे जानकार प्रवीण साहनी कहते हैं, अमेरिका ने जिस तरह से 100 से अधिक भारतीय अवैध प्रवासियों, जिनमें महिलाएं और नाबालिग भी शामिल थे, को हथकड़ी और बेड़ियों में जकड़कर सैन्य विमान के जरिए भारत वापस भेजा। यह सिर्फ अवैध प्रवासियों को वापस भेजने का मामला नहीं है, बल्कि इससे पता चलता है कि भारत-अमेरिका संबंधों में एक गंभीर दरार पैदा हो गई है। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे कई राजनीतिक और कूटनीतिक कारण छिपे हुए हैं।

वह कहते हैं, यह घटना बताती है कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका अपनी ताकत को बढ़ाने पर जोर देगा और भारत को ज्यादा प्राथमिकता नहीं दी जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि चीन के खिलाफ हिंद महासागर क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी के रूप में भारत की भूमिका अब अमेरिका की प्राथमिकता नहीं होगी। वह आगे कहते हैं कि मोदी 2024 में अमेरपिका दौरे पर आए थे, लेकिन उन्होंने ट्रंप की चुनावी रैली में हिस्सा नहीं लिया। जबकि ट्रंप ने रैली में एलान किया था कि उनके मित्र मोदी आएंगे। साहनी के मुताबिक, ट्रंप व्यक्तिगत अपमान को गंभीरता से लेते हैं।

वह आगे कहते हैं कि ट्रंप जानते हैं कि मोदी विश्व नेता के रूप में अपनी छवि को पेश करने में मदद के लिए अमेरिका के समर्थन पर बहुत अधिक निर्भर हैं। प्रवीण के मुताबिक यह बेहद दुख की बात है कि ट्रंप के इतना करने के बावजूद मोदी ‘व्यक्तिगत संबंध’ की खातिर ट्रंप से मिलने के लिए अमेरिका जाएंगे। वह कहते हैं कि ट्रंप ने जिस तरह से देश का अपमान किया है, कोई भी स्वाभिमानी देश ट्रंप के नखरे और अपमान को सहन नहीं करेगा।

सरकार की चुप्पी और मीडिया का रवैया

इस घटना पर भारत सरकार की चुप्पी और मीडिया की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। जब ऑपरेशन गंगा के तहत यूक्रेन से भारतीय छात्रों को लाया गया था, तब मीडिया ने इसे बड़े जोर-शोर से दिखाया था। लेकिन इस बार जब भारतीय नागरिकों को बेड़ियों में जकड़कर लाया गया, तो मीडिया ने इसे नजरअंदाज कर दिया। क्या यह सरकार की नाकामी को छिपाने की कोशिश थी?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात से भी कई नागरिक इस विमान में थे। सवाल यह है कि जब गुजरात को विकास का मॉडल बताया जाता है, तो वहां के लोग क्यों अवैध तरीके से अमेरिका जाने की कोशिश कर रहे हैं? क्या यह विकास के दावों पर सवाल नहीं उठाता?

अवैध प्रवासियों के बढ़ते मामले और भारत की चुनौती

यह पहली बार नहीं है जब भारतीय नागरिकों को अवैध प्रवास के आरोप में गिरफ्तार कर वापस भेजा गया है। पिछले कुछ वर्षों में अवैध रूप से अमेरिका और कनाडा जाने की घटनाओं में वृद्धि हुई है।

कनाडा में भी हजारों भारतीय छात्रों के लापता होने की खबरें आई हैं, जिन पर अवैध प्रवास का शक जताया गया है। गुजरात और पंजाब के युवा विशेष रूप से अमेरिका और कनाडा में बसने के लिए अवैध रास्ते अपनाते हैं।

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INS Vikramaditya

Indian Navy Aircraft Carrier: भारतीय नौसेना की तीन एयरक्राफ्ट कैरियर को ऑपरेट करने की योजना को सरकार ने खारिज कर दिया है। इसके बजाय, नौसेना अब अपने दूसरे स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर (IAC) को INS विक्रमादित्य के रिप्लेसमेंट के तौर पर डेवलप करने की तैयारी कर रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार इस योजना का समर्थन नहीं कर रही है कि नौसेना के पास एक साथ तीन एयरक्राफ्ट कैरियर हों। भारतीय नौसेना का कहना था कि अगर तीन एयरक्राफ्ट कैरियर उपलब्ध रहते हैं, तो उनमें से दो हमेशा एक्टिव रह सकते हैं, जबकि एक मरम्मत या अपग्रेड के लिए डॉक में रहे।

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Indian Navy Aircraft Carrier: बदलती रणनीति और चीन की बढ़ती समुद्री शक्ति

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब रिपोर्ट्स में कहा गया है कि चीन अपने न्यूक्लियर-पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर प्रोग्राम को आगे बढ़ा रहा है। चीन का चौथा एयरक्राफ्ट कैरियर न्यूक्लियर एनर्जी से ऑपरेट हो सकता है, जिससे उसकी नौसैनिक ताकत और अधिक बढ़ सकती है।

भारतीय नौसेना ने पहले तीन एयरक्राफ्ट कैरियर की रणनीति बनाई थी, लेकिन अब यह योजना बदली जा रही है। इससे पहले, कई नौसेना प्रमुखों ने तीन एयरक्राफ्ट कैरियर होने की बात कही थी, जिनमें पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल हरी कुमार भी शामिल थे।

हालांकि, सरकार का नजरिया इससे अलग रहा है। 2020 से ही सरकार का झुकाव पनडुब्बियों (Submarines) को प्राथमिकता देने की ओर है। पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल बिपिन रावत ने भी तीन एयरक्राफ्ट कैरियर की जरूरत पर संदेह जताया था और इन्हें “सिटिंग डक” (आसानी से निशाना बनने वाले) कहकर इनकी उपयोगिता पर सवाल उठाए थे। सरकार को लगता है कि एयरक्राफ्ट कैरियर की तुलना में पनडुब्बियां समुद्री युद्ध में ज्यादा प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं, खासकर ऐसे समय में जब चीन एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइल (ASBM) विकसित कर रहा है, जो बड़े जहाजों को निशाना बनाने में सक्षम हैं।

Indian Navy Aircraft Carrier: INS विक्रमादित्य का भविष्य

पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल हरी कुमार ने INS विक्रांत जैसे दूसरे एयरक्राफ्ट कैरियर के निर्माण का प्रस्ताव दिया था। लेकिन उनके पहले के नौसेना प्रमुखों ने सुझाव दिया था कि नया एयरक्राफ्ट कैरियर बड़ा और अधिक क्षमता वाला होना चाहिए, ताकि ज्यादा फाइटर जेट पार्क हो सकें। उनके अनुसार, CATOBAR (Catapult Assisted Take-Off Barrier Arrested Recovery) टेक्नोलॉजी से लैस एयरक्राफ्ट कैरियर कारगर साबित हो सकता है और युद्ध में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकता है।

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नौसेना के सूत्रों के मुताबिक, INS विक्रमादित्य, जो रूसी मूल का एक एयरक्राफ्ट कैरियर है, अगले 10-12 वर्षों में रिटायर हो सकता है। ऐसे में नौसेना का मानना है कि नए स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर को INS विक्रमादित्य के रिप्लेसमेंट के तौर पर देखा जाना चाहिए, न कि एक अतिरिक्त एयरक्राफ्ट कैरियर के तौर पर। चूंकि एक नए नए स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर (IAC-2) को बनाने में कम से कम 10-12 साल लगते हैं, इसलिए नौसेना INS विक्रमादित्य के रिप्लेसमेंट की तैयारियां अभी से करना चाहती है।

राजनाथ सिंह ने कही थी ये बात

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मई 2024 में यह एलान किया था कि भारत जल्द ही अपने तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण शुरू करेगा, जो INS विक्रमादित्य की जगह लेगा। हालांकि, INS विक्रांत की तरह 45,000 टन का यह विमानवाहक पोत कोचीन शिपयार्ड में निर्मित किया जाएगा और इसमें पारंपरिक इंजन (Conventional Propulsion) होगा।

Indian Navy Aircraft Carrier: भारत के पास दो एयरक्राफ्ट कैरियर

भारत फिलहाल दो एयरक्राफ्ट कैरियर ऑपरेट कर रहा है। इनमें पहला INS विक्रमादित्य है, जो 2014 में भारतीय नौसेना में शामिल हुआ। यह रूस से खरीदा गया था और इसमें स्की-जंप टेकऑफ सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है। जबकि INS विक्रांत 2022 में भारत में बना पहला स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर है। इसे कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने बनाया है और यह भी स्की-जंप टेक्नोलॉजी पर आधारित है।

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दोनों विमानवाहक पोत करीब 25-30 फिक्स्ड-विंग लड़ाकू विमानों और 10 हेलीकॉप्टरों को ऑपरेट कर सकते हैं। अगर तीसरा विमानवाहक पोत भी इसी साइज का होता है, तो इसकी क्षमता भी समान होगी।

मनोहर पर्रिकर की ये थी प्लानिंग

पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के कार्यकाल में भारत के दूसरे स्वदेशी विमानवाहक पोत (IAC-2) को 65,000 टन वजन और CATOBAR तकनीक के साथ डिजाइन करने की योजना थी। इस एय़रक्राफ्ट कैरियर को न्यूक्लियर एनर्जी से संचालित करने पर विचार किया गया था। साथ ही, योजना थी कि इस पर 54 फाइटर जेट्स पार्क किए जा सकें। इसके अलावा भविष्य में जरुरत पड़ने पर एय़रक्राफ्ट कैरियर को इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट लॉन्च सिस्टम (EMALS) जैसी अत्याधुनिक तकनीक से लैस किया जा सके।

भारत की तीन एयरक्राफ्ट कैरियर की नीति क्यों बदली?

भारत सरकार ने नौसेना को स्पष्ट कर दिया है कि अब एय़रक्राफ्ट कैरियर के बजाय पनडुब्बियों को प्राथमिकता दी जाएगी। इसकी जो प्रमुख वजहें बताई गई हैं, उनके अनुसार एक एय़रक्राफ्ट कैरियर न केवल अपने आप में बहुत महंगा होता है, बल्कि उसके साथ काम करने वाले कैरीयर बैटल ग्रुप (CBG) और लड़ाकू विमानों की लागत भी बहुत अधिक होती है।

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इसके अलावा चीन ने लंबी दूरी की एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइलें (ASBM) विकसित की हैं, जो विशेष रूप से अमेरिकी विमानवाहक पोतों को निशाना बनाने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। अमेरिका के विमानवाहक पोत ज्यादा बड़े और सुरक्षित हैं, फिर भी वे खतरे में हैं। ऐसे में भारत के छोटे और कम प्रोटेक्टेड एय़रक्राफ्ट कैरियर के लिए यह एक गंभीर चुनौती हो सकती है।

सरकार ने 30 वर्षीय सबमरीन कंस्ट्रक्शन प्लान को संशोधित किया है। पहले इसमें 24 पारंपरिक पनडुब्बियों को शामिल किया जाना था, लेकिन अब इसे घटाकर 18 डीजल-इलेक्ट्रिक और 6 परमाणु ऊर्जा संचालित हमलावर पनडुब्बियों (SSN) तक सीमित कर दिया गया है। साथ ही, भारत परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) प्रोग्राम को भी आगे बढ़ा रहा है।

चीन का न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर प्रोजेक्ट

नवंबर 2024 में खबरें आई थीं कि चीन अपने परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत कार्यक्रम पर तेज़ी से काम कर रहा है। दक्षिण चीन मॉर्निंग पोस्ट (SCMP) के अनुसार, चीन एक प्रोटोटाइप न्यूक्लियर रिएक्टर विकसित कर रहा है, जिसे भविष्य में अपने एयरक्राफ्ट कैरियर्स में इस्तेमाल किया जा सकता है।

परमाणु-संचालित विमानवाहक पोतों की खासियत यह होती है कि वे लंबे समय तक समुद्र में तैनात रह सकते हैं और उन्हें बार-बार ईंधन भरने की जरूरत नहीं होती। इससे उनकी ऑपरेशनल रेंज भी बढ़ जाती है और वे ज्यादा हथियार और ईंधन ले जा सकते हैं। चीन 2035 तक छह एयरक्राफ्ट कैरियर्स को ऑपरेट करने की योजना बना रहा है।

चीन ने हाल ही में अपना तीसरा विमानवाहक पोत फ़ुजियान (Fujian) लॉन्च किया है, जो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट सिस्टम (EMALS) से लैस है। यह तकनीक अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर्स में उपयोग होती है, जिससे ज्यादा भारी और बड़े विमान कम रनवे पर उड़ान भर सकते हैं। फ़ुजियान का उत्तराधिकारी टाइप 004 (Type 004) कहा जा रहा है, जो परमाणु-संचालित हो सकता है।

इस खबर पर आपकी क्या राय है? क्या भारत को तीन विमानवाहक पोतों की योजना पर दोबारा विचार करना चाहिए? हमें अपने विचार कमेंट बॉक्स में साझा करें।

Aero India 2025: अमेरिकी F-35 स्टील्थ फाइटर या रूसी SU-57 फेलॉन! कौन होगा भारत की पहली पसंद? दोनों हैं एयरो इंडिया 2025 में

Aero India 2025: US F-35 vs Russian Su-57 – Which Fighter Will India Choose?

Aero India 2025: एयरो इंडिया 2025 में अमेरिकी एयरफोर्स का F-35 स्टेल्थ फाइटर एक बार फिर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाला है, लेकिन इस बार इसे केवल स्टेटिक डिस्प्ले और फ्लाइ-बाय डेमो के तौर पर प्रदर्शित किया जाएगा। अमेरिकी वायुसेना (USAF) ने पुष्टि की है कि अत्याधुनिक स्टील्थ क्षमताओं और उन्नत युद्ध तकनीक से लैस यह फाइटर जेट बेंगलुरु के येलहंका एयर फोर्स स्टेशन में आयोजित हो रहे एयरो इंडिया शो का हिस्सा बनेगा। हालांकि, इस बार इसके एरोबेटिक प्रदर्शन की कोई योजना नहीं है।

Aero India 2025: US F-35 vs Russian Su-57 – Which Fighter Will India Choose?

अमेरिका का F-35 और रूस का Su-57 फाइटर जेट एक साथ इस शो का हिस्सा बनेंगे। जहां, F-35 डेमो टीम इस बार भारत नहीं आ रही है, जबकि, रूस का Su-57 आसमान में अपने जबरदस्त करतबों से लोगों को रोमांचित करेगा।

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USAF के डिप्टी चीफ, एरिन एम. वुड ने कहा, _”F-35 डेमो टीम एयरो इंडिया (Aero India 2025) में प्रदर्शन नहीं करेगी। हालांकि, F-35 विमान और उसकी एयरक्रू टीम स्टेटिक डिस्प्ले और फ्लाइ-बाय डेमो के लिए मौजूद रहेगी।”

एयरो इंडिया 2025 का आयोजन 10 से 14 फरवरी तक बेंगलुरु के येलहंका एयरफोर्स स्टेशन पर होगा। यह शो एशिया का सबसे बड़ा एविएशन और डिफेंस एक्सपो है, जहां दुनियाभर की प्रमुख रक्षा कंपनियां, डिफेंस एक्सपर्ट्स और एविएशन के शौकीन लोग जुटते हैं।

Aero India 2025: पहली बार भारत के आसमान में गरजेगा रूस का फिफ्थ-जनरेशन फाइटर जेट Su-57, अमेरिकी F-35 भी रहेगा स्टेटिक डिस्प्ले में

यह पहली बार नहीं है जब F-35 भारत आ रहा है। इससे पहले एयरो इंडिया 2023 में भी इस विमान ने अपनी शुरुआत की थी। हालांकि, इस बार एरोबेटिक डेमो नहीं होने के कारण, इसके हाई-स्पीड स्टंट और एरियल मेन्युवर्स को देखने का मौका नहीं मिलेगा।

Aero India 2025: रूसी Su-57 दिखाएगा शानदार हवाई करतब

जहां F-35 सिर्फ डिस्प्ले का हिस्सा बनेगा, वहीं रूसी Su-57 फेलॉन (Su-57 Felon) के भारतीय आसमान में शानदार हाई-एनर्जी एरियल स्टंट्स और शानदार एरोबेटिक्स देखने को मिलेंगे। यह पहली बार होगा जब Su-57 फाइटर जेट भारत में आधिकारिक तौर पर प्रदर्शित किया जाएगा। रूस का Su-57 फिफ्थ-जेनरेशन मल्टीरोल स्टेल्थ फाइटर जेट है, जिसे रूस की सुखोई कंपनी ने विकसित किया है। यह सुपरक्रूज़, सुपर-मेन्युवरिबिलिटी, स्टेल्थ तकनीक और आधुनिक हथियारों से लैस है।

इस फाइटर जेट का भारत से खास नाता रहा है। 2007 में भारत और रूस ने मिलकर Su-57 को डेवलप करने का समझौता किया था, लेकिन 2018 में भारत इस प्रोजेक्ट से अलग हो गया। इसके बावजूद, Su-57 को लेकर भारत में अब भी चर्चा बनी रहती है।

हालांकि, F-35 पूरी तरह से नेट-सेंट्रिक वॉरफेयर (Network-Centric Warfare) के लिए डिजाइन किया गया है, जिससे यह डेटा लिंकिंग, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और रडार से बचने में सक्षम है। दूसरी ओर, Su-57 अपनी तेज रफ्तार, बेहतर युद्धाभ्यास (maneuverability) और भारी हथियार ले जाने की क्षमता की वजह से खास है।

Aero India 2025: भारत का अपना स्टेल्थ फाइटर प्रोग्राम

भारत भी अपने फिफ्थ-जेनरेशन स्टील्थ फाइटर जेट प्रोग्राम (AMCA – एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) पर काम कर रहा है। हालांकि, इस प्रोजेक्ट की प्रगति अपेक्षाकृत धीमी रही है। भारतीय वायुसेना की नजर इस समय F-35 और Su-57 दोनों पर है।

Aero India 2025: क्या Su-75 चेकमेट भी होगा शामिल?

अटकलें लगाई जा रही हैं कि एयरो इंडिया 2025 में रूस का नया Su-75 चेकमेट (Checkmate) फाइटर जेट भी प्रदर्शित किया जा सकता है। ऑनलाइन लीक हुई तस्वीरों के अनुसार, Su-75 का मॉडल मास्को से बेंगलुरु भेजा जा रहा है, लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।

AFT On OROP: आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल का एतिहासिक फैसला! प्री-मैच्योर रिटायरमेंट लेने वाले सैन्य अफसरों को भी मिले वन रेंक वन पेंशन

AFT On OROP: Pre-Mature Retirees to Get One Rank One Pension Benefits

AFT On OROP: सशस्त्र बल अधिकरण (Armed Forces Tribunal – AFT) ने केंद्र सरकार की उस पॉलिसी को खारिज कर दिया है जिसमें प्री-मैच्योर रिटायरमेंट (PMR) लेने वाले सैन्य अधिकारियों को ‘वन रैंक वन पेंशन’ (OROP) योजना का लाभ देने से इनकार किया गया था। ट्रिब्युनल ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन बताया, जो समानता के अधिकार और सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की गारंटी देते हैं।

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File Photo

AFT On OROP: सैन्य अधिकारियों ने दायर की थी याचिका

आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल की इस मुख्य बेंच में जस्टिस राजेंद्र मेनन और रियर एडमिरल (सेवानिवृत्त) धीरन विग शामिल थे। बेंच ने 31 जनवरी को फैसला सुनाया। इस मामले में थलसेना, नौसेना और वायुसेना के कई अधिकारियों ने याचिकाएं दायर की थीं, जिन्होंने प्री-मैच्योर रिटायरमेंट के आधार पर OROP से वंचित किए जाने को चुनौती दी थी।

आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के फैसले से पहले, प्री-मैच्योर रिटायरमेंट लेने वाले अधिकारियों को तीन श्रेणियों में बांटा गया था। इनमें कैटेगरी A में वे अधिकारी थे, जिन्होंने 1 जुलाई 2014 से पहले रिटायरमेंट लिया था, जिन्हें OROP का लाभ दिया गया था।, कैटेगरी B में वे अधिकारी थे, जिन्होंने 1 जुलाई 2014 से 7 नवंबर 2015 के बीच रिटायरमेंट लिया था। जबकि कैटेगरी C में उन अधिकारियों को शामिल किया गयाा था, जिन्होंने 7 नवंबर 2015 के बाद रिटायरमेंट लिया था, जिन्हें OROP का लाभ नहीं दिया गया।

वहीं, आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने कैटेगरी C के अधिकारियों के पक्ष में फैसला सुनाया, जो सरकार की नीति से OROP के लाभ से वंचित थे।

AFT On OROP: 1973 से पहले सभी को मिलता था OROP

1973 से पहले, सभी सैन्य कर्मियों को समान सेवा अवधि और समान रैंक के आधार पर समान पेंशन दी जाती थी, जिसे ‘वन रैंक वन पेंशन’ (OROP) कहा जाता था। लेकिन, तीसरे वेतन आयोग (3rd Pay Commission) ने इसे बंद कर दिया। इसके बाद, रिटायरमेंट की तारीख के आधार पर पेंशन में असमानता आ गई, जिससे पूर्व सैनिकों में नाराजगी बढ़ी।

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1987 से 2000 तक, 5वें और 6वें वेतन आयोग में OROP पर चर्चा तो हुई, लेकिन उस पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई। 2004 में सरकार ने इसे लागू करने की बात कही, लेकिन 2008 में इनकार कर दिया, जिसके बाद देशभर में भूतपूर्व सैनिकों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए। 2009 में वॉर वेटरंस ने अपने पदक वापस कर दिए थे।

इन विरोध प्रदर्शनों के चलते सरकार को 10-सदस्यीय “कोश्यारी कमेटी” गठित करनी पड़ी, जिसने 2011 में अपनी रिपोर्ट में OROP लागू करने की सिफारिश की।

कटऑफ डेट से शुरू हुआ विवाद

सरकार ने 2014 में OROP लागू करने क एलान किया और इसे 2014-15 के वित्तीय वर्ष से लागू करने की बात कही। लेकिन नवंबर 2015 में जारी की गई पॉलिसी में एक विवादास्पद कटऑफ डेट रखी गई, जिसमें 1 जुलाई 2014 के बाद प्री-मैच्योर रिटायरमेंट लेने वाले अधिकारियों को OROP का लाभ नहीं देने का प्रावधान किया गया।

सरकार के इस फैसले का विरोध हुआ, क्योंकि 2015 में गठित न्यायिक आयोग ने भी प्री-मैच्योर रिटायरमेंट लेने वाले अधिकारियों को OROP से बाहर रखने पर कोई टिप्पणी नहीं की थी।

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एएफटी ने कटऑफ डेट को बताया असंवैधानिक

आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में कहा कि OROP लाभ देने के लिए किसी कटऑफ डेट को आधार बनाना गैर-कानूनी है। फैसले में बेंच ने कहा, “एक समान समूह में कटऑफ डेट के आधार पर अंतर करना असंवैधानिक है। यह अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है।” ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि राज्य सरकार को संविधान के तहत समानता का पालन करना होगा और उसे किसी भी तारीख को आधार बनाकर भेदभाव नहीं करना चाहिए। आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के अनुसार, OROP के तहत सभी प्री-मैच्योर रिटायरमेंट अधिकारियों को समान लाभ मिलना चाहिए और सरकार का यह फैसला ‘क्लासिफिकेशन एन क्लास’ करने के समान है, जो संविधान की भावना के खिलाफ है।

सरकार को OROP पर नया फैसला लेना होगा

आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने 2015 की नीति को खारिज करते हुए सरकार को निर्देश दिया कि प्री-मैच्योर रिटायरमेंट अधिकारियों को भी अन्य अधिकारियों के समान OROP का लाभ दिया जाए। बेंच के इस फैसले के बाद अब सरकार के पास या तो नए दिशा-निर्देश जारी करने या फिर सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का विकल्प बचा है।

पूर्व सैनिकों में खुशी की लहर

आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद पूर्व सैनिकों में खुशी की लहर है। एक पूर्व सैन्य अधिकारी ने कहा, “यह फैसला हमारे संघर्ष की जीत है। जो लोग 2015 के बाद रिटायर हुए हैं, उनके साथ भी समान व्यवहार होना चाहिए।” वहीं, कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को अब OROP की सभी विसंगतियों को दूर करके इसे पूरी तरह से पारदर्शी तरीके से लागू करना चाहिए।

वहीं, आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब OROP के तहत सभी प्री-मैच्योर रिटायरमेंट अधिकारियों को शामिल करना सरकार की जिम्मेदारी बन गई है। हालांकि, सरकार इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकती है, लेकिन संविधान और न्यायिक उदाहरणों के आधार पर इस फैसले को पलट पाना मुश्किल होगा। इस फैसले के बाद यह भी संभावना बढ़ गई है कि सरकार अब OROP की समीक्षा कर सकती है और भविष्य में सभी सैनिकों को समान पेंशन देने के लिए एक स्थायी नीति बना सकती है।

Anti-Ship Cruise Missiles: नौसेना के पनडुब्बी बेड़े को मिलेंगी एंटी-शिप क्रूज मिसाइलें, भारत और रूस के बीच हुआ सौदा

India-Russia Deal: Indian Navy to Get Anti-Ship Cruise Missiles for Submarine Fleet

Anti-Ship Cruise Missiles: भारतीय रक्षा मंत्रालय ने आज रूस के साथ एक महत्वपूर्ण रक्षा सौदे पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के तहत भारतीय नौसेना के लिए एंटी-शिप क्रूज़ मिसाइलों की खरीद की जाएगी। यह सौदा नई दिल्ली में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की उपस्थिति में पूरा हुआ। इस समझौते से भारतीय नौसेना की युद्ध क्षमता में बड़ा इज़ाफ़ा होने की उम्मीद है, खासतौर पर उसकी पनडुब्बी बेड़े की मारक शक्ति बढ़ाने के लिए यह सौदा बेहद अहम माना जा रहा है।

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रूस के साथ नई रक्षा साझेदारी, नौसेना की ताकत बढ़ेगी

भारत और रूस के बीच रक्षा संबंध काफी पुराने और मजबूत हैं। इस सौदे के तहत भारत को एंटी-शिप क्रूज़ मिसाइलें मिलेंगी, जो भारतीय नौसेना के पनडुब्बी बेड़े की क्षमता को कई गुना बढ़ा देंगी। ये मिसाइलें समुद्री अभियानों के दौरान दुश्मन के युद्धपोतों को आसानी से निशाना बनाने में सक्षम होंगी।

Klub मिसाइलें: सिंधुघोष (Kilo) क्लास पनडुब्बियों के लिए घातक हथियार

इस डील में भारतीय नौसेना की सिंधुघोष (Kilo) क्लास पनडुब्बियों के लिए Klub मिसाइलों को खरीदा जाना है। Klub मिसाइलें लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम हैं और दुश्मन के युद्धपोतों और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों को सटीकता से नष्ट कर सकती हैं।

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सिंधुघोष क्लास की पनडुब्बियां भारतीय नौसेना के लिए बेहद अहम हैं। ये पनडुब्बियां गुप्त मिशनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और अब Klub मिसाइलों के जरिए इनकी ताकत में और इजाफा होगा। ये मिसाइलें पानी के अंदर से लॉन्च की जा सकती हैं और 400 किलोमीटर तक दुश्मन के ठिकानों को ध्वस्त करने की क्षमता रखती हैं।

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नौसेना के पनडुब्बी बेड़े को नई ताकत

भारतीय नौसेना लगातार अपनी पनडुब्बी क्षमता को मजबूत करने के लिए नए हथियारों का अधिग्रहण कर रही है। इस समझौते के तहत खरीदी गई एंटी-शिप क्रूज़ मिसाइलें भारतीय नौसेना की रणनीतिक ताकत को बढ़ाएंगी और हिंद महासागर क्षेत्र में भारतीय प्रभाव को और मजबूत करेंगी।

भारत की समुद्री सुरक्षा को मिलेगा फायदा

इस सौदे का सबसे बड़ा लाभ भारत की समुद्री सुरक्षा को होगा। चीन और पाकिस्तान लगातार हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी गतिविधियों को बढ़ा रहे हैं। ऐसे में भारतीय नौसेना को अपनी रणनीतिक तैयारियों को और मजबूत करने की जरूरत है।

रूस से खरीदी गई ये क्रूज़ मिसाइलें भारतीय नौसेना को लंबी दूरी तक लक्ष्य भेदने की क्षमता देंगी, जिससे किसी भी संभावित खतरे का मुंहतोड़ जवाब दिया जा सकेगा।

समुद्री शक्ति में भारत की स्थिति होगी और मजबूत

हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों को देखते हुए भारत अपनी समुद्री शक्ति को और अधिक बढ़ा रहा है। Klub मिसाइलों के अलावा, भारतीय नौसेना को मिलने वाली नई एंटी-शिप क्रूज़ मिसाइलें समुद्री युद्ध अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

Illegal Indian Migrants: अमेरिका ने वापस भेजे 205 अवैध भारतीय प्रवासी, अमृतसर में लैंड करेगा यूएस का C-17 मिलिट्री प्लेन!

Illegal Indian Migrants: US Deports 205 Indians, C-17 Military Plane to Land in Amritsar

Illegal Indian Migrants: अमेरिका ने एक बार फिर अपनी कठोर इमीग्रेशन पॉलिसी के तहत अवैध भारतीय प्रवासियों को वापस भेजने की प्रक्रिया तेज कर दी है। हाल ही में, 205 भारतीय नागरिकों को एक अमेरिकी मिलिट्री प्लेन के जरिए अमृतसर भेजा गया है। अमेरिका में अवैध रूप से रहने वाले भारतीयों की संख्या लाखों में है। प्यू रिसर्च सेंटर के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में करीब 7.25 लाख भारतीय अवैध प्रवासी हैं, जो मेक्सिको और एल साल्वाडोर के बाद तीसरा सबसे बड़ा अवैध प्रवासी समूह है। इनमें से कई नागरिक दशकों से वहां रह रहे हैं और रोज़गार एवं बेहतर जीवन की तलाश में अमेरिका पहुंचे थे। लेकिन ट्रंप प्रशासन की सख्त नीतियों के चलते अब उन्हें जबरन वापस भेजा जा रहा है।

Illegal Indian Migrants: US Deports 205 Indians, C-17 Military Plane to Land in Amritsar
सांकेतिक फोटो

अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ये अवैध प्रवासी उनकी सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं और अमेरिका अब अपनी इमीग्रेशन पॉलिसी को और सख्त बनाने की योजना बना रहा है। यूएस इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) ने करीब 18,000 अवैध भारतीय प्रवासियों को प्राथमिकता के आधार पर अमेरिका से निकालने की लिस्ट में डाला है।

Illegal Indian Migrants: भारतीय नागरिकों की वापसी की प्रक्रिया हुई तेज

रिपोर्ट्स के मुताबिक, C-17 मिलिट्री प्लेन ने सैन एंटोनियो, टेक्सास से उड़ान भरी और अमृतसर के लिए रवाना हो गया। इस दौरान विमान ने ईंधन भरने के लिए जर्मनी के रामस्टीन एयरबेस पर अस्थायी तौर पर रुका भी। हालांकि दिल्ली स्थित यूएस एंबेसी ने इस कार्रवाई की पुष्टि नहीं की, लेकिन एक प्रवक्ता ने कहा, “अमेरिका अपनी सीमाओं को कड़ाई से लागू कर रहा है, इमीग्रेशन पॉलिसी को सख्त कर रहा है और अवैध प्रवासियों को वापस भेज रहा है। ये कदम स्पष्ट संदेश देते हैं कि अवैध रूप से अमेरिका में रहना अब जोखिम भरा है।”

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Illegal Indian Migrants: क्या कहते हैं विदेश मंत्री एस. जयशंकर

भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत केवल उन्हीं प्रवासियों को स्वीकार करेगा जिनकी नागरिकता सत्यापित होगी। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा, “अगर कोई भारतीय नागरिक अमेरिका में अवैध रूप से रह रहा है और हमें उनकी नागरिकता की पुष्टि हो जाती है, तो हम उनके कानूनी प्रत्यावर्तन (deportation) के लिए तैयार हैं।”

जयशंकर का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका से अवैध प्रवासियों को वापस भेजने की प्रक्रिया तेज हो गई है। भारत ने पहले भी कहा था कि वह ऐसे मामलों में सहयोग करेगा, लेकिन बिना उचित जांच के किसी को स्वीकार नहीं किया जाएगा।

Illegal Indian Migrants: ट्रंप प्रशासन का दबाव

डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका ने अवैध प्रवासियों पर कड़ी कार्रवाई शुरू की है। ट्रंप ने अपने हालिया बयान में कहा था कि “भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सही फैसला लेंगे और अमेरिका में अवैध रूप से रहने वाले भारतीयों को वापस लेने के लिए कदम उठाएंगे।”

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इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन ने 5,000 से अधिक अवैध प्रवासियों को ग्वाटेमाला, पेरू और होंडुरास भेजने के लिए अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) के मिलिट्री एयरक्राफ्ट्स का इस्तेमाल किया है। मिलिट्री एयरक्राफ्ट्स के जरिए लोगों को वापस भेजना काफी महंगा पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक, पिछले हफ्ते ग्वाटेमाला भेजे गए अवैध प्रवासियों पर प्रति व्यक्ति $4,675 (लगभग 3.9 लाख रुपये) का खर्च आया था।

Illegal Indian Migrants: US Deports 205 Indians, C-17 Military Plane to Land in Amritsar

Illegal Indian Migrants: अमेरिका से बदले में क्या लेकर लौटेंगे मोदी?

अंतराष्ट्रीय मामलों के जानकार, ब्रह्मा चेलानी का कहना है, “एक तरफ ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अगले हफ्ते व्हाइट हाउस आने का न्योता दिया है, तो दूसरी तरफ अमेरिका ने भारतीय प्रवासियों का पहला बैच सैन्य विमान के जरिए भारत भेज दिया। यह साफ संकेत देता है कि ट्रंप अपने फैसलों को लेकर बेहद गंभीर हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि ट्रंप इस मुलाकात में भारत से क्या रियायतें हासिल करेंगे और बदले में मोदी क्या लेकर लौटेंगे?”

चेलानी ने यह भी इशारा किया कि अमेरिका द्वारा अवैध भारतीय प्रवासियों को सैन्य विमान से भारत भेजना यह दर्शाता है कि इस पर भारत की सहमति है। यह भारत के लिए भी फायदे का सौदा हो सकता है, क्योंकि अमेरिका अगर खुद प्रवासियों को भेजता है, तो भारत को विशेष विमान किराए पर लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

क्या होगा अवैध प्रवासियों का भविष्य

जो प्रवासी दशकों से अमेरिका में रह रहे थे, उनके लिए अब घर लौटने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा है। इनमें से कई लोगों ने अमेरिका में नौकरी, परिवार और घर तक बना लिए थे। लेकिन अब जबरन निर्वासन ने उनके भविष्य अंधकार में है। क्योंकि भारत लौटने के बाद, इन लोगों के सामने नई चुनौतियां खड़ी होंगी। रोजगार का संकट, सामाजिक पुनर्वास (reintegration) और कानूनी समस्याएं इन प्रवासियों के लिए बड़ी परेशानियां बन सकती हैं। इनमें से कुछ लोग अमेरिका में लंबी कानूनी लड़ाई लड़ सकते हैं, लेकिन अधिकतर प्रवासियों को अपने देश लौटकर नए सिरे से जीवन की शुरुआत करनी होगी।

भारत-अमेरिका संबंधों पर असर

भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक संबंध मजबूत होते जा रहे हैं, लेकिन अवैध प्रवासियों का मुद्दा एक संवेदनशील विषय है। अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस मामले में कोई नरमी नहीं बरतेगा, और भारत को अवैध प्रवासियों को वापस लेने के लिए मजबूर किया जा सकता है।

हालांकि, भारत अपनी शर्तों पर प्रत्यावर्तन प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहता है और बिना नागरिकता सत्यापन के किसी भी व्यक्ति को स्वीकार नहीं करने की नीति पर कायम है।

Chinese Spy Vessels: हिंद महासागर में फिर बढ़ीं चीन की गतिविधियां, ‘मछली पकड़ने’ के बहाने इस तरह हो रही भारतीय नौसेना की जासूसी?

Chinese Spy Vessels: Suspected Espionage in Indian Ocean Under ‘Fishing’ Cover?

Chinese Spy Vessels: हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की गतिविधियां फिर से एकाएक बढ़ गई हैं, जिसके बाद भारत समेत कई देशों की सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। इस बार चीन ने मत्स्य अनुसंधान (Fisheries Research) के नाम पर अपने दो जहाजों लान हाई 101 और 201 (Lan Hai 101 & 201) को अरब सागर में तैनात किया है। दावा किया जा रहा है कि ये जहाज चीन के जल कृषि क्षेत्र (Aquaculture) के लिए रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों को इस बात का संदेह है कि यह सिर्फ एक कवर है और असल में चीन हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में भारत की समुद्री खुफिया जानकारियां एकत्र करने में जुटा हुआ है।

Chinese Spy Vessels: Suspected Espionage in Indian Ocean Under ‘Fishing’ Cover?

ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) एक्सपर्ट डेमियन सायमन ने एक्स (Twitter) पर इन चीनी जहाजों की गतिविधियों को ट्रैक किया और उनकी रूट्स शेयर किए हैं। इन जहाजों की गतिविधियां केवल रिसर्च तक सीमित नहीं दिख रही हैं, बल्कि वे चीन की विस्तृत समुद्री रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ये जहाज चीन के डिस्टेंट वाटर फिशिंग फ्लीट और मिलिट्री ऑपरेशंस के लिए खुफिया जानकारी एकत्र कर रहे हैं।

Chinese Spy Vessels: मालदीव ने चीन को दी विशेष अनुमति

सबसे अधिक चिंता इस बात की है कि मालदीव की सरकार ने राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के नेतृत्व में चीन के जहाज लान हाई 101 को अपने जल क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति दी है। यह जहाज अत्याधुनिक उपकरणों, ड्रोन और रिमोट ऑपरेटिव व्हीकल्स से लैस है, जो समुद्री सतह का नक्शा बनाने और हाइड्रोग्राफिक डेटा एकत्र करने में सक्षम हैं। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह डाटा पनडुब्बियों की तैनाती और समुद्री मार्गों की निगरानी के लिए बेहद उपयोगी हो सकता है।

चौंकाने वाली बात यह है कि चीन के इन जहाजों ने अपने ऑटोमैटिक ट्रांसपोंडर सिस्टम (AIS) को बंद कर दिया है, जिससे उन्हें रियल टाइम ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। यह पहली बार नहीं है जब चीन ने अपने जहाजों के ट्रांसपोंडर बंद कर दिए हों। इससे पहले भी चीन के “रिसर्च शिप” भारत के मिसाइल परीक्षण क्षेत्रों और नौसैनिक ठिकानों के पास संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त पाए गए थे।

Chinese Spy Vessels: चीन का समुद्री जासूसी मिशन?

चीन की तथाकथित डिस्टेंट वाटर फिशिंग फ्लीट (Distant-Water Fishing Fleet) पर लंबे समय से अवैध, अनियंत्रित और अनियमित मत्स्य पालन (Illegal, Unreported, and Unregulated (IUU) Fishing) के आरोप लगते रहे हैं।

भारत, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे कई देशों के मछुआरे लंबे समय से चीनी ट्रॉलरों द्वारा ज्यादा मछली पकड़ने के कारण आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। स्थानीय मछुआरों का कहना है कि चीनी ट्रॉलर ज्यादा मछली पकड़ने की तकनीकों का उपयोग करते हैं, जिससे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचता है।

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इससे भी अधिक चिंता की बाात यह है कि चीन इन जहाजों का इस्तेमाल खुफिया जानकारियां जुटाने के लिए कर सकता है। कई सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि ये चीनी जहाज सैन्य रणनीतिक ठिकानों की निगरानी और “ग्रे ज़ोन वॉरफेयर” नीति के तहत गुप्त जासूसी अभियानों को अंजाम दे सकते हैं।

चीन संग पाकिस्तान की नौसैनिक आयोजित कर रही है AMAN-25

चीन के ये जहाज ऐसे समय में हिंद महासागर में एक्टिव हुए हैं, जब पाकिस्तानी नौसेना कराची में 7 से 11 फरवरी 2025 को मल्टीलेटरल नेवल एक्सरसाइज AMAN-25 आयोजित करने जा रही है। इस अभ्यास में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLA Navy) भी हिस्सा ले रही है। माना जा रहा है कि इस एक्सरसाइज के जरिए हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में चीन और पाकिस्तान अपना दबदबा बढ़ाना चाहते हैं।

यह पहली बार नहीं है जब चीन के जहाज भारत के स्ट्रेटेजिक ठिकानों के पास देखे गए हैं। पहले भी बंगाल की खाड़ी में भारत के मिसाइल परीक्षणों के दौरान और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पास चीन के जहाजों की संदिग्ध गतिविधियां देखी गई थीं।

हिंद महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी नेवल सर्विलांस कैपेबिलिटी को और मजबूत करने की जरूरत है। इसके लिए भारत को अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अन्य देशों के साथ समुद्री सहयोग को बढ़ाना होगा। साथ ही, भारत को मालदीव, श्रीलंका, बांग्लादेश और अफ्रीकी देशों के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करना होगा, ताकि हिंद महासागर में चीन के प्रभाव को संतुलित किया जा सके। इसके अलावा भारत को अपनी पनडुब्बी और जंगी बेड़े को और मजबूत करना होगा और समुद्री सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अत्याधुनिक रडार और सैटेलाइट सर्विलांस मैकेनिज्म को डेवलप करना होगा।

PM Modi US Visit: अमेरिका दौरे में मोदी पर F-21 या F-35A फाइटर जेट की खरीद का दबाव बना सकते हैं ट्रंप! लेकिन भारत नहीं है तैयार, ये है वजह

PM Modi US Visit: Trump May Push for F-21 or F-35A Deal, But India Unlikely to Agree! Here's Why

PM Modi US Visit: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 12 से 14 फरवरी के बीच अमेरिका की यात्रा पर जाएंगे, जहां उनकी मुलाकात राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से होगी। इस साल ट्रंप से मिलने वाले वह तीसरे वैश्विक नेता होंगे, इससे पहले इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और जॉर्डन के किंग अब्दुल्ला II नए अमेरिकी राष्ट्रपति से मुलाकात कर चुके हैं। इस दौरे के दौरान भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सौदों को लेकर अहम बातचीत होने की संभावना है। ट्रंप प्रशासन चाहता है कि भारत अमेरिकी हथियारों और डिफेंस टेक्नोलॉजी की खरीद को और बढ़ाए।

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अमेरिका भारत पर दबाव बना रहा है कि वह अपनी रक्षा जरूरतों के लिए और अधिक अमेरिकी हथियारों और डिफेंस सिस्टम की खरीद करे। 2007 से अब तक भारत ने अमेरिका से 25 अरब डॉलर से अधिक के डिफेंस इक्विपमेंट्स खरीदे हैं, लेकिन ट्रंप प्रशासन चाहता है कि यह सहयोग और आगे बढ़े। इसके तहत फाइटर जेट्स, आर्मर्ड व्हीकल्स, एरो-इंजन और मिसाइलों की खरीद के लिए अमेरिका भारत को राजी करने की कोशिश करेगा।

PM Modi US Visit: F-21 या F-35A स्टेल्थ फाइटर जेट देने की पेशकश

सूत्रों के मुताबिक अमेरिकी सरकार भारत पर दबाव बना रही है कि वह अपने मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) प्रोजेक्ट के तहत Lockheed Martin के F-21 या Boeing के F-15EX को चुन ले। बदले में, अमेरिका ने भारत को कुछ व्यापारिक रियायतें (तेजस के इंजन और अपाचे AH-64E हेलीकॉप्टर की डिलीवरी) देने की पेशकश की है। हालांकि भारतीय वायुसेना (IAF) इस सौदे को लेकर तैयार नहीं है। वहीं अमेरिका ने भारत को F-35A स्टेल्थ फाइटर जेट देने की पेशकश भी की है, लेकिन इसके साथ कई सख्त शर्तें रखी गई हैं।

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PM Modi US Visit: वायुसेना को चाहिए 114 नए मल्टीरोल फाइटर जेट

भारतीय वायुसेना लंबे समय से 114 नए मल्टीरोल फाइटर जेट (MRFA) खरीदने की योजना बना रही है, जिसकी अनुमानित लागत 1.25 लाख करोड़ रुपये है। इस सौदे को लेकर अमेरिकी कंपनियां बोइंग और लॉकहीड मार्टिन अपने लड़ाकू विमानों F-16 और F-35 को भारत में पेश करने के लिए तैयार हैं। 10 से 14 फरवरी को बेंगलुरु में होने वाले एयरो इंडिया शो में अमेरिका अपने F-16 और पांचवीं पीढ़ी के F-35 फाइटर जेट का भी प्रदर्शन करेगा, लेकिन उसकी डेमो फ्लाइट नहीं करेगा।

PM Modi US Visit: कमजोर हैं F-21 और F-15EX

वायुसेना सूत्रों के मुताबिक भारतीय वायुसेना का मानना है कि F-21 और F-15EX भले ही आधुनिक तकनीकों से लैस हों, लेकिन ये विमान चीन और पाकिस्तान के स्टेल्थ फाइटर जेट्स के मुकाबले कमजोर साबित हो सकते हैं। भारत का सबसे बड़ा डर यह है कि चीन के J-20 और J-35A जैसे लेटेस्ट पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर जेट्स के मुकाबले ये अमेरिकी विमान किसी मुकाबले में नहीं हैं।  वहीं, पाकिस्तान भी चीनी स्टेल्थ लड़ाकू विमानों को शामिल करने की योजना बना रहा है। ऐसे में, भारत ऐसे फाइटर जेट्स नहीं खरीदना चाहता जो तकनीकी रूप से पिछड़ सकते हैं।

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F-35A Fighter Jet

PM Modi US Visit: फाइटर जेट बेचने के लिए ये हैं अमेरिकी शर्तें

इसके अलावा, भारतीय वायुसेना इस बात से भी चिंतित है कि अमेरिका द्वारा बेचे गए लड़ाकू विमानों पर ऑपरेशनल प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। ऐसा पहले भी हो चुका है कि अमेरिका अपने मिलिट्री एक्सपोर्ट्स को सख्त निगरानी के साथ बेचता है, जिससे किसी भी देश की सैन्य स्वायत्तता (Operational Sovereignty) प्रभावित होती है। अमेरिकी शर्तें भारत के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं, क्योंकि भारतीय वायुसेना ऐसे कोई भी वेपन सिस्टम्स नहीं चाहती जिस पर बाहरी नियंत्रण हो।

हालांकि अमेरिका ने भारत को F-35A स्टेल्थ फाइटर जेट देने की पेशकश भी की है, लेकिन इसके साथ कई सख्त शर्तें रखी गई हैं। सूत्रों के अनुसार, यदि भारत F-35A लड़ाकू विमान खरीदने का फैसला करता है, तो उसे अमेरिका की ओर से तीन प्रमुख शर्तें माननी होंगी। इनमें पहली शर्त भारतीय एयरबेस पर नियमित निरीक्षण शामिल है। अमेरिकी प्रस्ताव के मुताबिक, F-35A की तैनाती वाले भारतीय एयरबेस का नियमित निरीक्षण किया जाएगा। अमेरिका यह सुनिश्चित करना चाहता है कि विमान का संचालन, रखरखाव और तकनीकी इस्तेमाल उनकी निर्धारित प्रक्रियाओं के मुताबिक हो। इससे भारत की डिफेंस स्ट्रेटेजी पर अमेरिकी की निगरानी बढ़ सकती है।

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वहीं, अमेरिका चाहता है कि भारत F-35A की तैनाती और उसके इस्तेमाल पर अमेरिकी डिफेंस एक्सपर्ट्स की निगरानी हो। इसका मतलब यह होगा कि भारत को हर मिलिट्री मिशन के दौरान अमेरिका को जानकारी देनी होगी, जिसका असर भारत की ऑपरेशनल प्लानिंग पर पड़ सकता है। इसके अलावा तीसरी शर्त भारत में प्रोडक्शन को लेकर है। भारत लंबे समय से अपनी ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत रणनीति के तहत रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रहा है। लेकिन अमेरिका ने साफ कर दिया है कि F-35A का प्रोडक्शन भारत में नहीं होगा। इससे भारत को इस विमान के लिए पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर रहना पड़ेगा, जिससे लॉजिस्टिक और मेंटेनेंस पर लागत बढ़ सकती है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इन प्रतिबंधों के चलते F-35A को खरीदना भारत के लिए फायदेमंद नहीं होगा। अमेरिकी कंपनी Lockheed Martin ने भारत में F-35 के प्रोडक्शन की किसी भी संभावना से इनकार किया है। उसका कहना है कि भारत का ऑर्डर केवल 114 विमानों का है, इसलिए वह यहां इसकी प्रोडक्शन लाइन नहीं लगा सकती है। वहीं अमेरिका की इस रणनीति से भारत को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का फायदा नहीं मिलेगा और वह अमेरिका पर निर्भर रहेगा।

F-16 का मॉडर्न वर्जन है F-21

भारतीय वायुसेना के लिए MRFA टेंडर के तहत मीडियम-वेट फाइटर (Medium-Weight Fighter) की तलाश है। लेकिन F-15EX एक हेवी-कैटेगरी लड़ाकू विमान है। IAF पहले से ही Su-30MKI जैसे हेवी फाइटर जेट्स ऑपरेट कर रही है। ऐसे में एक और भारी लड़ाकू विमान खरीदना वायुसेना के लिए व्यावहारिक नहीं होगा। वहीं, F-21 के बारे में भी कई सवाल उठाए जा रहे हैं, क्योंकि यह Lockheed Martin के पुराने F-16 का एक मॉडर्न वर्जन है। ऐसे में, भारत इसे लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट के रूप में नहीं देख रहा है। भारतीय वायुसेना चाहती है कि वह एक ऐसा फाइटर जेट खरीदे जो तकनीकी रूप से एडवांस हो, मीडियम-वेट हो और सस्ता भी हो। F-21 और F-15EX दोनों ही इन मानकों पर खरे नहीं उतरते।

सूत्रों के मुताबिक भारतीय वायुसेना ऐसे फाइटर जेट्स चाहती है, जो चीन और पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य क्षमताओं का मुकाबला कर सकें। यदि अमेरिका अपनी शर्तों में ढील देता है और F-35A को उचित शर्तों पर भारत को देने के लिए तैयार होता है, तो भारत इस डील पर विचार कर सकता है। लेकिन F-21 और F-15EX जैसे पुराने डिजाइनों को खरीदने के लिए भारतीय वायुसेना बिल्कुल भी तैयार नहीं है।

ट्रंप की ‘डील-मेकिंग’ रणनीति

राष्ट्रपति ट्रंप की “डील-मेकिंग” रणनीति उनके कार्यकाल की पहचान रही है। इसी कड़ी में उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से फोन पर बात कर भारत को अधिक अमेरिकी डिफेंस टेक्नोलॉजी देने की बात कही है। एक वरिष्ठ भारतीय अधिकारी के मुताबिक, “भारत को ट्रंप प्रशासन के साथ सावधानीपूर्वक बातचीत करनी होगी। अमेरिकी डिफेंस टेक्नोलॉजी एडवांस जरूर है, लेकिन इसे ‘मेक इन इंडिया’ नीति के तहत विदेशी सहयोग से उचित लागत पर विकसित करना हमारी प्राथमिकता है। भारत पूरी तरह से आयात करने के बजाय सह-विकास और सह-उत्पादन के मॉडल को प्राथमिकता देगा।”

बाइडेन प्रशासन के अंतिम महीनों में भारत और अमेरिका के बीच 3.3 अरब डॉलर का सौदा हुआ था, जिसमें भारत ने 31 आर्म्ड MQ-9B ‘प्रिडेटर’ ड्रोन खरीदे थे। इसके अलावा, ड्रोन निर्माता कंपनी जनरल एटॉमिक्स के साथ 520 मिलियन डॉलर का एक और समझौता हुआ, जिसके तहत भारत में मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (MRO) फैसिलिटी स्थापित की जा रही है। लेकिन ट्रंप प्रशासन कुछ खास डिफेंस डील्स को लेकर ही उत्सुक है।

अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के बीच तेजस मार्क-2 लड़ाकू विमान के लिए F414-INS6 एयरो-इंजन के को-प्रोडक्शन पर बातचीत जारी है। इस सौदे में 80 फीसदी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी शामिल है और इसकी अनुमानित लागत 1.5 अरब डॉलर होगी।

इसके अलावा, अमेरिका ने भारतीय सेना को लेटेस्ट जनरेशन स्ट्राइकर आर्मर्ड कॉम्बैट व्हीकल्स (ICVs) की जॉइंट मैन्युफैक्चरिंग की पेशकश भी की है। पिछले साल जून में भारत-अमेरिका डिफेन्स इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन रोडमैप तैयार किया गया था, जिसके तहत 527 व्हील्ड ICVs की जरूरतों का अनुमान लगाया गया है। बता दें कि अमेरिका ने लद्दाख में ऊंचाई वाले इलाकों में Javelin एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलों से लैस स्ट्राइकर आर्मर्ड व्हीकल्स का ट्रायल भी कर चुका है।

MH-60R सी हॉक हेलीकॉप्टर और P-8I पेट्रोलिंग एयरक्राफ्ट पर हो सकती है बातचीत

भारत ने फरवरी 2020 में 2.13 अरब डॉलर में 24 MH-60R सी हॉक हेलीकॉप्टर खरीदे थे। अब अमेरिका इस हेलिकॉप्टर के लिए एडिशनल टेक्निकल इक्विपमेंट और सपोर्ट सिस्टम देने के लिए 1.1 अरब डॉलर का सौदा करना चाहता है। इसके अलावा, अमेरिका भारत को छह और P-8I मेरीटाइम पैट्रॉल एयरक्राफ्ट बेचने का इच्छुक है। इससे पहले, भारत ने 12 P-8I विमान 3.2 अरब डॉलर में खरीदे थे। P-8I विमान में अत्याधुनिक हथियार और सेंसर लगे हैं, जो भारतीय नौसेना को समुद्री सीमाओं पर बेहतर निगरानी और सुरक्षा प्रदान करते हैं।

ALH Dhruv Crash: HAL-IAF को झटका, LCH प्रचंड भी खतरे में! हो सकती है ALH ध्रुव हेलीकॉप्टर वाली दिक्कत

ALH Dhruv Crash: Major Setback for HAL & IAF! LCH Prachand Could Face Similar Issues

ALH Dhruv Crash: भारतीय तटरक्षक बल (कोस्ट गार्ड) के ध्रुव एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) की गुजरात के पोरबंदर में 5 जनवरी को हुई दुर्घटना की जांच में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, यह दाहसा हेलीकॉप्टर के ट्रांसमिशन सिस्टम में एक दुर्लभ खराबी की वजह से हुई थी। सूत्रों का कहना है कि ट्रांसमिशन सिस्टम के इस पार्ट में आमतौर पर खराबी आती है और ऐसा बहुत कम ही देखा जाता है। इस हादसे में दो पायलट और एक एयरक्रू मेंबर की मौत हो गई थी।

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ALH Dhruv Crash: आर्मी डे और रिपब्लिक डे पर ध्रुव ने नहीं भरी थी उड़ान

रक्षा मंत्रालय ने इस हादसे के बाद देशभर में मौजूद लगभग 330 ALH हेलीकॉप्टरों की उड़ानों पर रोक लगा दी थी। यहां तक कि 15 सितंबर को मनाए जाने वाले आर्मी डे और रिपब्लिक डे पर भी ध्रुव और इसके दूसरे वैरिएंट्स ने उड़ान नहीं भरी थी। वहीं, ALH ध्रुव की आर्म्ड वर्जन ‘रुद्र’ को भी फिलहाल ग्राउंडेड कर दिया गया है। भारतीय सेना और वायुसेना के पास 90 से अधिक रुद्र हेलीकॉप्टर हैं, जिनकी उड़ानें भी अभी रुकी हुई हैं।

इस हादसे की जांच के लिए अब एक उच्च स्तरीय जांच समिति बनाई गई है, जो खराबी की असली वजह और उसे ठीक करने के उपायों पर काम करेगी। इस जांच के पूरा होने और आवश्यक सुधारों के बाद ही ALH को फिर से उड़ान भरने की मंजूरी मिलेगी।

ALH Dhruv Crash: भारतीय सेना के इस वर्कहॉर्स को लेकर आर्मी चीफ ने कही ये बड़ी बात, पांच साल में हो चुके हैं 15 क्रैश

ALH (Advanced Light Helicopter) ध्रुव हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) का बनाया एक मल्टीरोल हेलीकॉप्टर है, जिसका इस्तेमाल भारतीय सेना, वायुसेना, नौसेना और तटरक्षक बल कर रहे हैं। हाई एल्टीट्यूड में उड़ान भरने की क्षमता, मिलिट्री ऑपरेशंस में उपयोगिता और रेस्क्यू ऑपरेशंस में विशेषज्ञता के कारण इसे भारतीय सशस्त्र बलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ALH हेलीकॉप्टर भारतीय सेना और वायुसेना के लिए एक वर्कहॉर्स की तरह काम करते हैं। इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि 2024 में भारतीय सेना में ALH हेलीकॉप्टरों ने 5,000 फीट से अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में 40,000 घंटे से अधिक की उड़ान भरी थी।

ALH Dhruv Crash: क्या कहती है जांच रिपोर्ट?

बेंगलुरु स्थित काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च-नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेट्री (CSIR-NAL) की गई जांच में पता चला है कि ALH हेलीकॉप्टर के ट्रांसमिशन सिस्टम में गड़बड़ी हुई थी। यह खामी सबसे ज्यादा स्वाशप्लेट असेंबली (Swashplate Assembly) में पाई गई है, जिससे पायलट हेलीकॉप्टर की डायरेक्शन और एल्टीट्यूड को कंट्रोल करता है।

ALH Dhruv Crash: क्या है स्वाशप्लेट असेंबली और क्या है इसका रोल ?

स्वाशप्लेट असेंबली, हेलीकॉप्टर के रोटर ब्लेड को कंट्रोल करने वाला अहम सिस्टम है। यह पायलट द्वारा दिए गए इनपुट को हेलीकॉप्टर के मुख्य और पिछले रोटर तक पहुंचाने में मदद करता है। इस सिस्टम में आई खराबी से हेलीकॉप्टर का कंट्रोल बिगड़ सकता है, जिससे दुर्घटनाएं हो सकती हैं।

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ALH Dhruv Crash: हेलीकॉप्टर उड़ानों पर अभी रोक जारी रहेगी

ALH हेलीकॉप्टरों को फिर से उड़ान भरने की अनुमति देने से पहले, एक सिक्योरिटी चेक और सुधार प्रक्रिया अपनाई जाएगी। सरकार ने  इस मुद्दे पर एक “डिफेक्ट इंवेस्टिगेशन कमेटी” (DIC) का गठन किया है। इस कमेटी में बेंगलुरु स्थित मिलिट्री एयरवर्थिनेस एंड सर्टिफिकेशन सेंटर (CEMILAC), डायरेक्टरेट जनरल ऑफ एयरोनॉटिकल क्वालिटी एश्योरेंस और HAL के अधिकारी शामिल होंगे। यह कमेटी चार हफ्तों में अपनी रिपोर्ट सौंपेगी, जिसके बाद हेलीकॉप्टरों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। इसके बाद ही ALH को उड़ान भरने की अनुमति मिल सकेगी।

सूत्रों का कहना है कि ALH हेलीकॉप्टरों की सुरक्षा पर जांच पूरी होने में अभी कम से कम एक से दो महीने लग सकते हैं। अगर तकनीकी समस्या गंभीर नहीं पाई जाती है, तो हेलीकॉप्टरों को चरणबद्ध तरीके से उड़ानों के लिए मंजूरी दी जाएगी। लेकिन अगर समस्या बड़ी निकली, तो ALH हेलीकॉप्टरों को लंबे समय तक ग्राउंडेड रखा जा सकता है।

HAL और वायुसेना के लिए झटका, प्रचंड हेलीकॉप्टर में भी हो सकती है दिक्कत

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर स्वैशप्लेट में खराबी की पुष्टि होती है, तो यह लंबी समस्या साबित हो सकती है। इस खराबी का असर भारतीय वायुसेना के हल्के लड़ाकू हेलीकॉप्टर प्रचंड (LCH Prachand) पर भी पड़ सकता है, क्योंकि दोनों में एक ही ट्रांसमिशन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है।

भारतीय वायुसेना के पूर्व एयर वाइस मार्शल और सेंटर फॉर एयर पावर स्टडीज के पूर्व एडिशनल डायरेक्टर जनरल मनमोहन बहादुर ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए कहा कि, “अगर यह समस्या स्वैशप्लेट से जुड़ी हुई है, तो इसे जल्द से जल्द हल करना होगा, क्योंकि ALH और प्रचंड दोनों हमारे प्रमुख स्वदेशी रक्षा उत्पाद हैं। हमें इन्हें सुरक्षित और विश्वसनीय बनाना होगा।”

एयर मार्शल (सेवानिवृत्त) अनिल चोपड़ा, पूर्व निदेशक, सेंटर फॉर एयर पावर स्टडीज, के मुताबिक, “ALH को फिर से तभी उड़ाने की अनुमति दी जानी चाहिए, जब सभी सिक्योरिटी से जुड़े सभी मुद्दे पूरी तरह से हल हो जाएं। ट्रांसमिशन और कंट्रोल सिस्टम की किसी भी विफलता से बड़ी दुर्घटना हो सकती है। इसलिए, समस्या की जड़ तक पहुंचना और इसे ठीक करना बेहद जरूरी है।”

ALH हेलीकॉप्टरों के 20 सालों में पहली बार इतनी गंभीर समस्या

ALH ध्रुव हेलीकॉप्टर पिछले 20 सालों से भारतीय सेनाओं से जुड़े हैं और अब तक इतनी गंभीर तकनीकी समस्या कभी सामने नहीं आई थी। सेना के एक अधिकारी के अनुसार, “अगर यह समस्या क्वालिटी, इंस्पेक्शन और मेंटेनेंस से जुड़ी हुई है, तो इसे जल्द ठीक किया जा सकता है। लेकिन अगर यह डिजाइन संबंधी है, तो ALH हेलीकॉप्टरों को लंबे समय तक उड़ानों से बाहर रखा जा सकता है।”

ALH ध्रुव हेलीकॉप्टर की पिछले कुछ वर्षों में लगभग 15 दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। सितंबर 2024 में एक ALH हेलीकॉप्टर अरब सागर में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसमें दो पायलट और एक एयरक्रू डाइवर की मौत हो गई थी। उस समय भी कुछ समय के लिए ALH हेलीकॉप्टरों की उड़ानें रोकी गई थीं, लेकिन HAL, CEMILAC और तटरक्षक बल की सुरक्षा जांच के बाद इन्हें फिर से उड़ान भरने की अनुमति दे दी गई थी।

क्या ALH हेलीकॉप्टरों की सुरक्षा को लेकर आपके मन में सवाल हैं? हमें कमेंट में बताएं!

INS Aridhaman: भारत गुपचुप कर रहा इस खास पनडुब्बी का समुद्री ट्रायल! भारतीय नौसेना को जल्द मिलेगी तीसरी न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन

INS Aridhaman: Indian Navy Set to Get Third Nuclear Ballistic Missile Submarine Soon

INS Aridhaman: हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी और पाकिस्तान की नौसैनिक ताकत में इज़ाफ़े के बीच भारत अपनी समुद्री ताकत को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठा रहा है। भारतीय नौसेना इस साल अपनी तीसरी परमाणु शक्ति से लैस बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) INS अरिधमान (INS Aridhaman) को अपने बेड़े में शामिल करने जा रही है। यह कदम भारत की समुद्री रणनीति और परमाणु प्रतिरोधक क्षमता (Nuclear Deterrence) को और मज़बूत करेगा।

INS Aridhaman: Indian Navy Set to Get Third Nuclear Ballistic Missile Submarine Soon

INS Aridhaman: तीसरी न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी

INS अरिधमान, भारतीय नौसेना की तीसरी न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) होगी। यह सबमरीन पिछले तीन सालों से समुद्री परीक्षणों (Sea Trials) से गुजर रही थी और अब 2025 में इसे नौसेना में शामिल किए जाने की पूरी संभावना है।

भारत के पास पहले से ही दो INS अरिहंत और INS अरिघात SSBN पनडुब्बियां हैं। INS अरिधमान, इनसे अधिक अत्याधुनिक तकनीक, बड़े आकार और बेहतर मारक क्षमता से लैस होगी। बताया जा रहा है कि यह 7000 टन वजनी SSBN होगी, जो 8 K-4 बैलिस्टिक मिसाइलों को ले जाने में सक्षम होगी। K-4 मिसाइलें लगभग 3,500 किमी तक लक्ष्य को भेद सकती हैं, जिससे यह पनडुब्बी भारत की समुद्री परमाणु प्रतिरोधक रणनीति को और मज़बूत बनाएगी।

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फिलहाल भारत के पास दो INS अरिहंत और INS अरिघात सबमरीन

भारतीय नौसेना वर्तमान में INS अरिहंत (INS Arihant) और INS अरिघात (INS Arighat) को ऑपरेट कर रही है। वहीं, भविष्य में भारत नए और बड़े SSBN प्रोजेक्ट पर भी काम कर रहा है, जिसे S-5 क्लास परमाणु पनडुब्बी कहा जा रहा है। इस नई श्रेणी की पनडुब्बियां 12-16 बैलिस्टिक मिसाइलों को ले जाने में सक्षम होंगी, जिससे भारत की समुद्री परमाणु क्षमता और अधिक मज़बूत हो जाएगी।

चीन के पास 6 SSBN और 6 SSN

भारत का यह फैसला चीन और पाकिस्तान की बढ़ती नौसैनिक ताकत को देखते हुए लिया गया है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLA Navy) इस समय 6 SSBN, 6 न्यूक्लियर पावर्ड हमलावर पनडुब्बियां (SSN), और 48 पारंपरिक पनडुब्बियां ऑपरेट कर रही है। अनुमान है कि चीन का पनडुब्बी बेड़ा 2025 तक 65 और 2035 तक 80 पनडुब्बियों तक बढ़ सकता है।

वहीं, पाकिस्तान भी चीन के सहयोग से अपनी नौसैनिक ताकत को बढ़ाने में जुटा है। पाकिस्तान ने चीन से 8 Type-39 युआन क्लास अटैक पनडुब्बियों का ऑर्डर दिया है, जो एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक से लैस होंगी। पहली पनडुब्बी को अप्रैल 2024 में ट्रायल के लिए लॉन्च किया गया था। पाकिस्तान का लक्ष्य हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में शक्ति संतुलन बदलना है।

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INS Aridhaman की खूबियां

INS अरिधमान को भारत में स्वदेशी रूप से डिजाइन और डेवलप किया गया है। इसका डिज़ाइन भारतीय नौसेना, डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी (DAE), और भारत एटॉमिक रिसर्च सेंटर (BARC) द्वारा तैयार किया गया है।
इसमें 83 मेगावॉट (MW) के परमाणु रिएक्टर का इस्तेमाल किया गया है, जिसे पहले की पनडुब्बियों के ऑपरेशनल अनुभव के आधार पर और एडवांस  बनाया गया है। रिएक्टर डिजाइन में कुछ बदलाव किए गए हैं, जिससे इसकी सुरक्षा और रखरखाव में सुधार हुआ है।

INS अरिधमान का मुख्य हथियार K-4 बैलिस्टिक मिसाइलें होंगी, जिनकी 3500 किमी की मारक क्षमता होगी। यह पनडुब्बी कई लेटेस्ट तकनीकों और सेफ्टी फीचर्स से लैस होगी, जिससे भारतीय नौसेना को हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक बढ़त मिलेगी।

INS अरिधमान के शामिल होने के साथ ही, भारत अपने परमाणु पनडुब्बी बेड़े के विस्तार पर भी फोकस कर रहा है। फिलहाल, INS अरिहंत और INS अरिघाट के बाद INS अरिधमान तीसरी SSBN होगी।

भारत की पहली SSN 2036 तक

इसके अलावा, भारत की भविष्य में और परमाणु शक्ति से संचालित हमलावर पनडुब्बियां (SSN) बनाने की भी योजना है। हालांकि, पहली SSN 2036 और दूसरी 2038 तक आने की संभावना है। इन पनडुब्बियों में 12 से 16 न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल तैनात की जा सकेंगी, जिससे भारत की सामरिक परमाणु हमले की क्षमता (Strategic Nuclear Strike Capability) और मजबूत होगी।

नए स्कॉर्पीन और P-75I प्रोजेक्ट में तेजी

INS अरिधमान के अलावा, भारत अपनी पनडुब्बी निर्माण क्षमता को और मजबूत करने के लिए नए प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रहा है। भारतीय नौसेना ने 6 स्कॉर्पीन-क्लास पनडुब्बियों को शामिल कर लिया है, और फ्रांस के साथ मिलकर 3 और स्कॉर्पीन पनडुब्बियां बनाने की बातचीत जारी है।

इसके अलावा हाल ही में मझगांव डॉक लिमिटेड (MDL) और जर्मनी की Thyssenkrupp Marine Systems (TKMS) के साथ 6 एडवांस्ड AIP पनडुब्बियां बनाने की मंजूरी मिली है। इन पनडुब्बियों में एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक होगी, जिससे वे लगभग 3 हफ्ते तक पानी के नीचे रह सकेंगी।

हालांकि, P-75I प्रोजेक्ट की पहली पनडुब्बी अगले दशक में ही तैयार हो सकेगी, क्योंकि अभी इस प्रोजेक्ट पर तकनीकी और कॉमर्शियल बातचीत चल रही हैं।

भारत की “No First Use” पॉलिसी

भारत अपनी “No First Use” (NFU) न्यूक्लियर पॉलिसी पर चलते हुए “Credible Minimum Deterrence” को बनाए रखना चाहता है। इसका अर्थ यह है कि भारत पहले परमाणु हमला नहीं करेगा, लेकिन दूसरे हमले के लिए तैयार रहेगा। इसके लिए SSBN पनडुब्बियां सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, क्योंकि ये पानी के नीचे लंबे समय तक छिपी रह सकती हैं और किसी भी हमले के बाद जवाबी हमला कर सकती हैं।

INS अरिधमान का नौसेना में शामिल होना भारत के लिए समुद्री शक्ति का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर होगा। यह चीन और पाकिस्तान की बढ़ती नौसैनिक शक्ति के बीच भारत के परमाणु प्रतिरोध को मज़बूत करेगा।

INS अरिधमान के नौसेना में शामिल होने पर आपकी क्या राय है? हमें कमेंट में बताएं!