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MiG-21 Bison Retirement: संस्थानों में मिग-21 के लिए मची होड़, स्टेटिक डिस्प्ले की जबरदस्त मांग और 5-6 साल का इंतजार!

जल्द रिटायर होने जा रहे मिग-21 बाइसन को लेने के लिए मची होड़! स्टेटिक डिस्प्ले के लिए कई संस्थानों ने किया आवेदन, 5-6 साल का वेटिंग पीरियड, खर्च करने होंगे 5 से 6 लाख रुपये...

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📍नई दिल्ली | 12 Sep, 2025, 12:13 PM

MiG-21 Bison Retirement: भारतीय वायुसेना का पहला सुपरसोनिक लड़ाकू विमान मिग-21 बाइसन (MiG-21 Bison) अब इतिहास बनने जा रहा है। 62 साल की सेवा के बाद 26 सितंबर 2025 को चंडीगढ़ एयरबेस पर आयोजित विशेष समारोह में इन विमानों को औपचारिक रूप से रिटायर कर दिया जाएगा। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और एयरफोर्स के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहेंगे। आखिरी फ्लाइपास्ट में मिग-21 अपने पुराने अंदाज में उड़ान भरते दिखेंगे और उन्हें स्वदेशी तेजस फाइटर जेट एस्कॉर्ट करेंगे। इसके बाद भारतीय वायुसेना के बेड़े में मिग-21 का नाम हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो जाएगा।

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MiG-21 Bison Retirement: इस तरह होगी आखिरी उड़ान

समारोह के दौरान मिग-21 बाइसन पुराने अंदाज में बेस एयर डिफेंस सेंटर (BADC) कॉम्बैट ड्रिल करते दिखाई देंगे। इस ड्रिल में पायलट दिखाएंगे कि 60 साल पहले किस तरह एयरबेस की सुरक्षा के लिए मिग-21 को हवा में तैनात किया जाता था और रेडियो के जरिए उन्हें कंट्रोल किया जाता था। आखिरी फ्लाइपास्ट में मिग-21 बाइसन स्क्वॉड्रन को स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान एस्कॉर्ट करेंगे। जैसे ही यह फॉर्मेशन मुख्य मंच के सामने पहुंचेगी, मिग-21 विमान तेजी से ऊंचाई की ओर उड़ान भरेंगे और फिर आसमान में ओझल हो जाएंगे।

MiG-21 Bison Retirement: रिटायरमेंट के बाद क्या होगा?

सूत्रों ने रक्षा समाचार डॉट कॉम को बताया कि भारतीय वायुसेना ने तय किया है कि इन विमानों को स्मारक के रूप में देशभर में लगाया जाएगा। रिटायरमेंट के बाद कई सरकारी संस्थान, विश्वविद्यालय और स्कूल इन विमानों को स्टैटिक डिस्प्ले के तौर पर लगाने के लिए आवेदन कर चुके हैं। वहीं, सरकारी संस्थानों को विमान मुफ्त में दिए जाएंगे, जबकि निजी संस्थानों को इसके लिए लगभग 30 से 40 लाख रुपये खर्च करने होंगे। वहीं स्वायत्त संस्थानों के लिए यह रकम कम होगी।

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IAF MiG-21 Bison Retirement After 62 Years: Legacy, Last Flight and What Comes Next
Mig 21 at Kargil War Memorial (Photo: Raksha samachar)

MiG-21 Bison Retirement: 5-6 साल का इंतजार

सूत्रों ने यह भी बताया कि रिटायर हो जाने के बाद इन्हें देने के लिए कैटेगरी बनाई जााएगी। लेकिन इन जेट्स को पाने के लिए संस्थानों को 5-6 साल का इंतजार करना होगा, क्योंकि वेटिंग लिस्ट लंबी है। भारतीय वायुसेना सभी आवेदनों की स्क्रूटनी करेगी और प्राथमिकता के आधार पर जेट का आवंटन करेगी।

सूत्रों ने बताया कि कुछ जेट्स को भारतीय वायुसेना अपने म्यूजियम में भी रखेगी, जहां आम लोग इन्हें करीब से देख सकेंगे। इन विमानों का स्टैटिक डिस्प्ले युवाओं में साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथमेटिक्स (STEM) की पढ़ाई के प्रति उत्सुकता बढ़ाएगा और उन्हें मिलिट्री हिस्ट्री से जोड़ने का काम करेगा। बता दें कि मिग-21 सहित अन्य रिटायर्ड विमानों को पहले भी वायुसेना संग्रहालय (दिल्ली), एचएएल संग्रहालय (बेंगलुरु), और विभिन्न सैन्य अड्डों पर प्रदर्शित किया गया है। दिल्ली के पालम वायुसेना स्टेशन पर मिग-21 को भी प्रदर्शन के लिए रखा गया है।

MiG-21 Bison Retirement: मेंटेनेस करनी है जरूरी

सूत्रों का कहना है कि किसी भी संस्थान को जेट देने से पहले उसके सभी अहम पार्ट्स, जिसमें एवियोनिक्स, संवेदनशील उपकरण और इंजन जैसे जरूरी पार्ट्स को निकाल लिया जाएगा। संस्थानों को केवल एयरफ्रेम ही दिया जाएगा। साथ ही अच्छी कंडीशंस वाले जेट्स को ही आवंटित किया जाएगाा। वहीं सस्थानों को डिस्प्ले के लिए दिए जाने वाले गए मिग-21 का नियमित रखरखाव करना भी आवश्यक होगाा, जिसमें सफाई, पेंटिंग, और जंग-रोधी उपचार शामिल हैं।

MiG-21 Bison Retirement: अपनी मर्जी से नहीं कर सकते कोई कलर

वहीं, इसके लिए शहर की म्यूनिसिपिलिटी की परमिशन की भी जरूरी होती है, क्योंकि राष्ट्रीय धरोहर होने के नाते इसके रखरखाव की जिम्मेदारी भी उन्ही की होती है। वे उस संबंधित संस्थान के साथ इसके मेंटेनेंस में सहयोग करते हैं औऱ समय-समय पर जांच करते हैं। सूत्रों ने बताया कि भारतीय वायु सेना का रिपेयर एंड सॉल्वेज यूनिट (RSU) इसमें उनकी मदद करता है। इनके मेंटेनेंस के लिए पूरे डेकोरम का पालन करना होता है। वहीं, संस्थान इन्हें अपनी मर्जी से कोई भी कलर नहीं कर सकता है। बल्कि ऑरिजनल कलर और राष्ट्रीय झंडा बनाना जरूरी होता है।

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MiG-21 Bison Retirement: छह दशक तक की देश की सेवा

भारत-चीन युद्ध के बाद मिग-21 को 1963 में भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया था। यह भारत का पहला सुपरसोनिक फाइटर जेट था और जल्द ही इसे वायुसेना की रीढ़ माना जाने लगा। इसे सोवियत संघ के मिकोयान-गुरेविच डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया था और भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने लाइसेंस लेकर इसका निर्माण किया।

भारत ने 850 से अधिक मिग-21 विमान उड़ाए और इनकी 24 फाइटर स्क्वॉड्रन और 4 ट्रेनिंग यूनिट्स तैयार कीं। आने वाले वर्षों में भारत दुनिया का सबसे बड़ा मिग-21 ऑपरेटर बन गया।

MiG-21 Bison Retirement: बची हैं बस दो स्क्वॉड्रन

मिग-21 की आखिरी दो स्क्वॉड्रन नाल एयरबेस पर मौजूद हैं। इन्हें “नंबर प्लेटिंग” के जरिए फ्रीज कर दिया जाएगा और इन्हीं स्क्वॉड्रन नंबरों पर अब स्वदेशी तेजस मार्क-1A लड़ाकू विमान शामिल होंगे। नंबर 3 स्क्वॉड्रन “कोबरा” और नंबर 23 स्क्वॉड्रन “पैंथर्स” की लेगेसी अब तेजस के साथ जुड़ जाएगी। इन दोनों स्क्वॉड्रन में लगभग 27-28 मिग ही मौजूद हैं।

तेजस की पहली डिलीवरी भी इन्हीं स्क्वॉड्रन में होगी। दिलचस्प बात यह है कि मिग-21 बाइसन का पहला अपग्रेड भी नंबर 3 स्क्वॉड्रन में ही शामिल हुआ था और अब तेजस मार्क-1A भी वहीं से अपनी उड़ान शुरू करेगा।

26 सितंबर को चंडीगढ़ एयरबेस पर आयोजित समारोह में वायुसेना के सभी रिटायर्ड और मौजूदा पायलटों को आमंत्रित किया गया है, जिन्होंने मिग-21 उड़ाया है। आसमान में आकाश गंगा डिस्प्ले टीम का प्रदर्शन होगा और मिग-21 बाइसन का अंतिम फ्लाइपास्ट आयोजित किया जाएगा। इसके बाद स्क्वॉड्रन की चाबी रक्षा मंत्री को सौंपी जाएगी और औपचारिक रूप से मिग-21 वायुसेना से विदा लेगा।

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  • MiG-21 Bison Retirement: संस्थानों में मिग-21 के लिए मची होड़, स्टेटिक डिस्प्ले की जबरदस्त मांग और 5-6 साल का इंतजार!

    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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