📍नई दिल्ली | 31 Jul, 2025, 6:09 PM
Trump Threat India: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को एक बार फिर धमकी दी है। ट्रंप ने भारत पर रूस से हथियार और तेल खरीदने के लिए 25 प्रतिशत टैरिफ (आयात शुल्क) और पेनल्टी लगाने की चेतावनी दी है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर लिखा, “भारत हमेशा से अपने ज्यादातर हथियार रूस से खरीदता रहा है और रूस का सबसे बड़ा ऊर्जा खरीदार है। इसलिए, 1 अगस्त से भारत को 25 प्रतिशत टैरिफ के साथ-साथ पेनल्टी भी देनी होगा।” लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि भारत के लिए अपने मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर को रूस से अलग करना न तो आसान है और न ही व्यावहारिक।
ट्रंप की इस धमकी के बावजूद भारत के लिए रूस से अपने सैन्य उपकरणों का रिश्ता तोड़ना लगभग असंभव है। भारत की सेना का एक बड़ा हिस्सा रूसी हथियारों पर निर्भर है, और यह रिश्ता दशकों पुराना है, जो रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी पर टिका है।
Trump Threat India: ट्रंप की धमकी: टैरिफ और जुर्माना
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा: “भारत रूस से हथियारों और ऊर्जा का सबसे बड़ा खरीदार है… इसलिए 1 अगस्त 2025 से उस पर 25% टैरिफ और अतिरिक्त जुर्माना लगाया जाएगा।”
यह बयान उस समय आया है जब अमेरिका और यूरोपीय देश रूस-यूक्रेन युद्ध में रूस की आर्थिक मदद को लेकर भारत और चीन पर सवाल उठा रहे हैं।
भारत और रूस मिल कर बनाते हैं ब्रह्मोस
भारत की मिलिट्री ताकत का ज्यादातर हिस्सा रूस से खरीदे गए हथियारों पर टिका है। इसमें फाइटर जेट्स, टैंक, राइफलें, हेलीकॉप्टर और एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम शामिल हैं। इसके अलावा, भारत और रूस मिलकर ब्रह्मोस मिसाइल बनाते हैं, जिसने ऑपरेशन सिंदूर में अपनी ताकत दिखाई थी। यह मिसाइल की सटीकता और ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसने पाकिस्तान के सात एयरबेस को बुरी तरह से तबाह कर दिया था। और पाकिस्तान को कानोंकान खबर भी नहीं हो पई थी।
भारत की वायुसेना में सुखोई-30 एमकेआई जैसे लड़ाकू विमान, थलसेना में टी-90 टैंक, और नौसेना में कई जहाज और हेलीकॉप्टर रूसी मूल के हैं। जानकारों का अनुमान है कि भारत के मौजूदा सैन्य उपकरणों का 60 से 70 फीसदी हिस्सा रूस या पुराने सोवियत संघ से आता है। वहीं, यह निर्भरता केवल हथियारों तक सीमित नहीं है। बल्कि इनकी मेंटेनेंस, रिपेयर, और ओवरहॉलिंग की पूरी व्यवस्था भी रूसी तकनीक पर चलती है। भारत में कई कारखाने, जैसे चेन्नई के पास टी-90 टैंक बनाने वाली फैक्ट्री और लखनऊ के पास अमेठी में एके-203 राइफल बनाने वाली फैक्टरी सभी रूसी मदद से ही चल रहे हैं।
रूस देता है टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की सुविधा
रूस भारत की एक खास जरूरत को पूरा करता है, जो पश्चिमी देश नहीं करते। वह है टेक्नोलॉजी ट्रांसफर। रूस ने भारत को सिर्फ हथियार ही नहीं दिए, बल्कि उनकी टेक्नोलॉजी को भारत में बनाने की इजाजत भी दी। मिसाल के तौर पर, सुखोई-30 एमकेआई विमानों का ज्यादातर हिस्सा भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) बनाता है। ब्रह्मोस मिसाइल का उत्पादन भी भारत और रूस की साझेदारी का नतीजा है।
वहीं, अमेरिका के साथ भारत का रिश्ता ज्यादातर खरीद-बिक्री तक ही सीमित रहा है। पिछले डेढ़ दशक में भारत ने अमेरिका से करीब 20 अरब डॉलर के हथियार खरीदे। इनमें जनरल इलेक्ट्रिक एफ-404 इंजन, बोइंग पी8-आई निगरानी विमान, सी-17 और सी-130जे ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, और चिनूक, अपाचे, और एमएच-60आर अपाचे हेलीकॉप्टर शामिल हैं। लेकिन, अमेरिका ने इनमें से किसी भी बड़े हथियार की टेक्नोलॉजी भारत को नहीं दी है। जबकि यह भारत के लिए घाटे का सौदा है, क्योंकि स्वदेशी उत्पादन और आत्मनिर्भरता के लिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जरूरी है।
शीत युद्ध से शुरू हुआ था रिश्ता
भारत और रूस (या पुराने सोवियत संघ) का सैन्य सहयोग शीत युद्ध के समय से शुरू हुआ। उस वक्त पश्चिमी देश भारत जैसे “गुटनिरपेक्ष” देश को एडवांस हथियार देने से कतराते थे। सोवियत संघ ने भारत पर भरोसा जताया और हथियारों की सप्लाई शुरू की। सोवियत हथियार न सिर्फ अच्छे थे, बल्कि पश्चिमी हथियारों से सस्ते भी थे। यह सौदा भारत जैसे विकासशील देश के लिए बहुत मायने रखता था।
रूस ने भारत को लाइसेंस के तहत हथियार बनाने की अनुमति दी, जिसके चलते भारत में डिफेंस प्रोडक्शन शुरू हुआ। आज भारत में आज भी हजारों सैनिक और इंजीनियर हैं जिन्होंने रूसी सिस्टम्स पर ट्रेनिंग ली हुई है। जो हथियारों की मेंटेनेंस, रिपेयर, और ओवरहॉलिंग का काम देखते हैं। यह सिस्टम इतनी गहराई तक पैठ बना चुका है कि अब किसी और देश के हथियार को रूसी हथियारों से बदलना आसान नहीं है।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार खरीदार
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की रिपोर्ट्स के अनुसार 2010-2014 में भारत के कुल हथियार आयात का 72% रूस से था, जो 2015-2019 में घटकर 55% और 2020-2024 में 36% रह गया। इस दौरान भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक रहा।
2015-2019 में भारत के हथियार आयात में रूस का योगदान करीब 55% था, जिसमें सुखोई-30 एमकेआई विमान, टी-90 टैंक और ब्रह्मोस मिसाइल जैसे हथियार शामिल थे। 2020-2024 में यह हिस्सा 36% तक कम हुआ, क्योंकि भारत ने फ्रांस (28%) और इजराइल (34%) जैसे पश्चिमी देशों से आयात बढ़ाया। फिर भी, रूस भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बना रहा, जिसके पास भारत के लिए सबसे ज्यादा लंबित ऑर्डर थे।
रूस से आयात में कमी की वजह भारत का स्वदेशी हथियार उत्पादन बढ़ाना और पश्चिमी सप्लायर्स की ओर रुख करना है। हालांकि, रूसी हथियारों की कम लागत और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की सुविधा के चलते भारत की निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
भारत सरकार आत्मनिर्भर भारत के तहत स्वदेश में ही हथियार बनाने पर जोर दे रही है। तेजस लड़ाकू विमान, अर्जुन टैंक, और ध्रुव हेलीकॉप्टर जैसे प्रोजेक्ट इसकी मिसाल हैं। लेकिन, इनके पूरी तरह तैयार होने और पुराने रूसी हथियारों की जगह लेने में अभी वक्त लगेगा।
भारत का रूस से तेल आयात: सस्ता सौदा, बड़ी रणनीति
2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूस से तेल आयात में जबरदस्त इजाफा किया। पहले रूस भारत के तेल आयात का सिर्फ 0.2% हिस्सा था, लेकिन अब वह सबसे बड़ा सप्लायर है। वित्तीय वर्ष 2022 में भारत ने रूस से 2.1% तेल खरीदा, जिसका मूल्य 18,000 करोड़ रुपये था। 2024 तक यह हिस्सा 35.1% हो गया, और मूल्य 4,20,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गयाा। 2025 में आयात 35% रहा, जिसका अनुमानित मूल्य 3,70,000 करोड़ रुपये है। जुलाई 2024 में भारत ने 23,500 करोड़ रुपये का 19.4 मिलियन टन तेल आयात किया, जो कुल आयात का 40% था। अक्टूबर में यह 18,000 करोड़ रुपये (19%) रहा, जबकि नवंबर में 55% की गिरावट आई। मई 2025 में आयात 1.96 मिलियन बैरल प्रतिदिन और जून में 2.08-2.2 मिलियन बैरल तक पहुंचा, जो दो साल का उच्चतम स्तर था। 2020-2025 के बीच भारत ने रूस से तेल आयात 96% की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ाया, जिसमें 2024-2025 में 4,50,000 करोड़ रुपये के फॉसिल फ्यूल शामिल थे।
वहीं, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी कहते हैं कि रूस से तेल खरीदने से वैश्विक कीमतें $120-130 तक नहीं पहुंचीं। भारत ने मध्य पूर्व पर निर्भरता कम की, लेकिन ट्रंप की 25% टैरिफ और पेनल्टी लगाने की धमकी चुनौती है। रूस के शैडो टैंकर और भुगतान की जटिलताएं भी मुश्किलें बढ़ाती हैं। फिर भी, भारत ने अमेरिका, नाइजीरिया, और ब्राजील से आयात बढ़ाकर संतुलन बनाया। यह रणनीति भारत को आर्थिक और रणनीतिक लाभ दे रही है।
क्या होगा ट्रंप की धमकी का असर
ट्रंप की धमकी भारत के लिए नई चुनौती ला सकती है। अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगी अक्सर भारत और चीन पर रूस से तेल और हथियार खरीदने का आरोप लगाते हैं। उनका कहना है कि इससे रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध के लिए पैसा मिलता है। लेकिन, भारत ने हमेशा अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखा है। भारत न तो पूरी तरह पश्चिमी देशों पर निर्भर है, न ही रूस को छोड़ने को तैयार है। भारत के लिए रूस से तेल खरीदना आर्थिक रूप से फायदेमंद है, क्योंकि रूस सस्ता तेल देता है। इसी तरह, सैन्य उपकरणों के मामले में रूस की सस्ती और विश्वसनीय आपूर्ति भारत की रक्षा जरूरतों के लिए जरूरी है।
रणनीतिक और आर्थिक कारण
भारत और रूस का रिश्ता सिर्फ हथियारों का नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी का भी है। रूस भारत को न केवल हथियार देता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उसका साथ देता है। शीत युद्ध के बाद भी यह रिश्ता मजबूत रहा है। रूस से हथियार खरीदने की वजह से भारत को कई बार आलोचना का सामना भी करना पड़ता है। खासकर, यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों का दबाव बढ़ा है। लेकिन, भारत की भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति ऐसी है कि उसे अपनी रक्षा के लिए रूस जैसे भरोसेमंद साथी की जरूरत है। भारत की सीमाएं दो बड़े पड़ोसियों चीन और पाकिस्तान से लगती हैं, और इनके साथ तनाव हमेशा बना रहता है। ऐसे में, रूसी हथियार सबसे कारगर साबित होते हैं।
इसके अलावा, रूस से हथियारों की आपूर्ति में देरी या यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस की अपनी सीमाएं भी भारत के लिए चिंता का विषय हैं। फिर भी, भारत ने रूस के साथ अपने रिश्ते को बनाए रखा है, क्योंकि इसका कोई तुरंत विकल्प नहीं है।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स
साउथ एशिया एक्सपर्ट माइकल कुजेलमैन कहते हैं, “भारत का रूस और फ्रांस के साथ “नो-ड्रामा” रिश्ता है, जो अमेरिका के साथ अक्सर तनावपूर्ण रहता है। ट्रंप की व्यापार धमकियों के चलते भारत-अमेरिका रिश्तों पर सवाल उठे, खासकर जब ट्रंप ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत-पाकिस्तान तनाव में हस्तक्षेप किया। उनका मानना है कि भारत को रूस के साथ रिश्ता बनाए रखना चाहिए, क्योंकि वह भरोसेमंद है।”
आर्थिक हथियार की तरह इस्तेमाल
वहीं विदेश मामलों के जानकार, ब्रह्मा चेल्लानी भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं, वह कहते हैं, “ट्रंप की धमकियां दिखाती हैं कि अमेरिका रणनीतिक सुरक्षा में भरोसेमंद नहीं है। भारत को रूस के साथ सैन्य और तेल संबंध बनाए रखने चाहिए, क्योंकि यह दीर्घकालिक हितों के लिए जरूरी है।”
वह आगे कहते हैं, “पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत के सामानों पर 25% आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने और रूस से तेल खरीद जारी रखने पर सजा के तौर पर अतिरिक्त टैक्स लगाने के फैसले से दोनों देशों के पहले से ही कमजोर हो चुके रिश्तों में और तनाव ला सकता है। यह अमेरिका की ओर से “सेकेंडरी टैरिफ” (दूसरे देश से व्यापार पर तीसरे देश को दंड) का पहला इस्तेमाल है, जिससे पता लगता है कि ट्रंप इसे आर्थिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।”
वह कहते हैं, जब ट्रंप ने पहले भारत के ऑटो पार्ट्स, स्टील और एल्युमिनियम पर टैक्स लगाया था, तब भारत ने कोई कड़ा जवाब नहीं दिया। भारत ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) को जवाबी कदमों की सूचना जरूर दी थी, लेकिन बातचीत का रास्ता चुना। लेकिन अब अमेरिका लगातार भारत के विशाल और बढ़ते बाजार में पूरी पहुंच की मांग कर रहा है, जिससे द्विपक्षीय व्यापार समझौता लंबे समय से अटका हुआ है।
झूठ बोल रहे हैं ट्रंप
ब्रह्मा चेल्लानी का कहना है कि पिछले साल भारत और अमेरिका के बीच कुल व्यापार 130 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। इसके बावजूद ट्रंप का कहना है कि “हमने भारत के साथ वर्षों से ज्यादा व्यापार नहीं किया”, यह बयान न केवल झूठा है, बल्कि यह उनकी राजनीति में अतिशयोक्ति और भ्रम फैलाने की आदत को भी दिखाता है।
चीन के साथ उदार
चीन के साथ ट्रंप का रुख पूरी तरह बदलता रहा है। पहले जहां उन्होंने कड़ा रुख अपनाया था, वहीं अब बीजिंग में एक समझौते और राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात के लिए वह झुकाव दिखा रहे हैं। उन्होंने ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-टे पर भी दबाव डाला कि वह अपनी अमेरिका यात्रा को रद्द करें। आखिरकार, लाई ने अपनी पूरी लैटिन अमेरिका यात्रा ही रद्द कर दी।
यह कोई संयोग नहीं है कि अमेरिका के निशाने पर अब ब्राज़ील, भारत और दक्षिण अफ्रीका जैसे स्वतंत्र और उभरते लोकतांत्रिक देश हैं, जो ग्लोबल साउथ (दक्षिणी दुनिया) का प्रतिनिधित्व करते हैं। अमेरिका की “या तो हमारे साथ या हमारे खिलाफ” वाली सोच एक बार फिर उसकी विदेश नीति के केंद्र में आ रही है।
लेकिन ट्रंप का यह दबाव और धमकी का तरीका इन देशों पर काम करने वाला नहीं है। ये देश अपनी विदेश नीति और कारोबारी फैसले स्वतंत्र रूप से लेते हैं और किसी भी बड़े देश की धमकी से डरकर अपनी रणनीति नहीं बदलने वाले हैं।