📍नई दिल्ली | 26 Dec, 2025, 8:41 PM
DAC meeting: देश की सुरक्षा से जुड़े बड़े फैसलों पर मुहर लगाने वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) की अहम बैठक शुक्रवार को नहीं हो सकी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में होने वाली यह इस साल की आखिरी बैठक थी। लेकिन अच्छी बात यह है कि बैठक को इसी साल के लिए टाल दिया गया है। माना जा रहा है कि बैठक अगले हफ्ते हो सकती है। इस बैठक में देश की तीनों सेनाओं को उन सभी हथियारों और उपकरणों पर मुहर लग सकती है जिसकी उन्हें बेहद सख्त जरूरत है।
DAC meeting: क्यों टल गई आज की डीएसी बैठक
डिफेंस सूत्रों के मुताबिक, आज डीएसी की बैठक की औपचारिक शुरुआत तो की गई थी, लेकिन काउंसिल के सभी सदस्य मौजूद नहीं थे। सूत्रों ने बताया कि भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह विदेश दौरे पर थे। वह मिस्र की यात्रा से लौट रहे थे। डीएसी में तीनों सेनाओं के प्रमुखों की मौजूदगी जरूरी होती है, क्योंकि फैसले सामूहिक सहमति से लिए जाते हैं। ऐसे में जब सभी सदस्य उपलब्ध नहीं हो पाए, तो बैठक का एजेंडा आगे नहीं बढ़ाया गया। (DAC meeting)
रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि उनकी गैरमौजूदगी में इतने बड़े और संवेदनशील रक्षा सौदों पर चर्चा करना सही नहीं माना गया। इसी वजह से बैठक को टालकर 29 दिसंबर की नई तारीख तय की गई है। यानी इसी साल में ही यह बैठक फिर से होगी।
हालांकि बैठक में रक्षा मंत्रालय ने इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट (ईपी) की अंतिम तारीख को भी बढ़ाकर 15 जनवरी कर दिया है। यह फैसला इसलिए अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसके जरिए सेना, नौसेना और वायुसेना को जरूरी हथियार और उपकरण जल्दी उपलब्ध कराए जाते हैं।
DAC meeting: क्यों बढ़ी इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट की डेडलाइन
डीएसी बैठक के टलने का सीधा असर इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट (ईपी) प्रक्रिया पर भी पड़ा है। पहले ईपी की अंतिम तारीख 19 नवंबर को खत्म हो चुकी थी। इसके बाद उम्मीद थी कि दिसंबर के आखिर तक पेंडिंग मामलों को निपटा लिया जाएगा। लेकिन चूंकि अब ईपी की समयसीमा को भी बढ़ाकर 15 जनवरी कर दिया गया है। तो उम्मीद है कि पेंडिंग मामलों को तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा।
DAC meeting: क्या है इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट, और यह कैसे करती है काम
जब देश की सीमाओं पर अचानक तनाव बढ़ता है, कोई बड़ा सैन्य ऑपरेशन होता है या युद्ध जैसे हालात बनते हैं, तब भारतीय सेना को इंतजार करने का वक्त नहीं होता। ऐसे समय में हथियार, गोला-बारूद, ड्रोन, मिसाइल, स्पेयर पार्ट्स और दूसरे जरूरी उपकरण तुरंत चाहिए होते हैं।
इसके लिए इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाताा है, जिसके तहत सेना लंबी खरीद प्रक्रिया में पड़े बिना तुरंत जरूरी हथियार, गोला-बारूद और उपकरण खरीद सकती हैं। इसका इस्तेमाल तब किया जाता है, जब अचानक हालात बिगड़ते हैं या किसी बड़े ऑपरेशन के बाद हथियारों की तुरंत जरूरत महसूस होती है।
आमतौर पर डिफेंस डील्स में डीएपी–2020 (डिफेंस एक्विजिशन प्रोसिजर) जैसी लंबी प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिसमें कई साल लग सकते हैं। लेकिन ईपी का मकसद सिर्फ एक होता है, कम से कम समय में सेना को जरूरत को पूरा करना।
‘ट्रांच’ में क्यों बांटा गया है ईपी को
अभी ईपी-6 चल रहा है, जिसकी डेडलाइन को बढ़ा कर 15 जनवरी 2026 कर दिया गया है। यानी इस तारीख तक सभी पेंडिंग कॉन्ट्रैक्ट्स को साइन करना होगा। इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट एक बार में नहीं, बल्कि चरणों में दी जाती है। इन्हें ईपी–1, ईपी–2, ईपी–3 जैसे नाम दिए जाते हैं। हर ट्रांच एक खास हालात के लिए होती है, जैसे सीमा पर तनाव, चीन के साथ टकराव या किसी बड़े आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन के बाद ईपी बनाई जाती है। हर ट्रांच में सरकार यह तय करती है कि कितने पैसे तक की खरीद होगी, कितने समय के लिए यह व्यवस्था लागू रहेगी और किन चीजों को प्राथमिकता दी जाएगी। (DAC meeting)
DAC meeting: क्या है पैसे का पूरा गणित?
ईपी के तहत हर एक कॉन्ट्रैक्ट की एक तय सीमा होती है। किसी भी एक सौदे की कीमत 300 करोड़ रुपये तक हो सकती है। यह सीमा हथियारों और उपकरणों, दोनों तरह की खरीद पर लागू होती है।
एक बार जरूरत तय हो जाने के बाद कॉन्ट्रैक्ट को 40 दिनों के अंदर फाइनल करना होता है। यही वजह है कि इसे फास्ट ट्रैक कहा जाता है। इसके बाद सप्लायर को 12 महीने, यानी एक साल के भीतर ऑर्डर की डिलीवरी करनी होती है।
अगर तय समय में डिलीवरी नहीं होती, तो अब सरकार उस कॉन्ट्रैक्ट को फोरक्लोज, यानी रद्द भी कर सकती है। हाल के समय में इस नियम को और सख्त किया गया है, ताकि कंपनियां देरी न करें।
हर ईपी ट्रांच का एक बजट फ्रेम होता है। ईपी–6 ट्रांच में कुल सीमा करीब 40 हजार करोड़ रुपये मानी गई है। यह पैसा एक ही सौदे में नहीं जाता, बल्कि कई छोटे–छोटे कॉन्ट्रैक्ट्स के जरिए खर्च होता है।
DAC meeting: स्वदेशी खरीद को क्यों मिलती है प्राथमिकता
ईपी में स्पष्ट नियम है कि जहां संभव हो, वहां भारतीय कंपनियों से ही खरीद की जाए। यानी इंडिजिनस सोर्स को पहली प्राथमिकता मिलती है। अगर किसी सिस्टम या हथियार के लिए आयात जरूरी हो, तो उसके लिए अलग से रक्षा मंत्रालय की मंजूरी लेनी पड़ती है। इसका मकसद सिर्फ तेजी नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा देना भी है।
कितने समय के लिए होती है ईपी
आमतौर पर एक ईपी ट्रांच 3 से 6 महीने या फिर एक साल के लिए लागू रहती है। लेकिन अगर बातचीत चल रही हो और सौदे अधूरे हों, तो इसकी अवधि बढ़ाई भी जा सकती है। जैसे हाल ही में ईपी की समयसीमा नवंबर 2025 में खत्म हो गई थी, लेकिन इसे बढ़ाकर 15 जनवरी 2026 कर दिया गया, ताकि चल रही नेगोशिएशंस पूरी की जा सकें। (DAC meeting)
ईपी में असली पावर है किसके पास
इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट की सबसे बड़ी ताकत तीनों सेनाओं के वाइस चीफ्स के पास होती है। सेना में यह पावर वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ के पास है। नौसेना में वाइस चीफ ऑफ नेवल स्टाफ यह अधिकार इस्तेमाल करते हैं। वायुसेना में यह जिम्मेदारी डिप्टी चीफ ऑफ एयर स्टाफ के पास होती है। यही अधिकारी ईपी के तहत कॉन्ट्रैक्ट को मंजूरी देते हैं और फाइनेंशियल पावर एक्सरसाइज करते हैं। इसमें हर कॉन्ट्रैक्ट 300 करोड़ रुपये तक का हो सकता है, और ये फास्ट-ट्रैक पर अप्रूव करते हैं। यानी 40 दिनों में कॉन्ट्रैक्ट फाइनल और 1 साल में ऑर्डर की डिलीवरी करनी होती है।
डिप्टी चीफ्स का रोल आमतौर पर सपोर्टिंग जैसे प्लानिंग या तकनीकी सलाह देना होता है। सामान्य रक्षा खरीद में उनके पास अलग वित्तीय अधिकार होते हैं, लेकिन ईपी में मुख्य फैसला वाइस चीफ ही लेते हैं।
क्या करता है सर्विसेज प्रॉक्योरमेंट बोर्ड
ईपी के मामलों में एक अहम भूमिका होती है सर्विसेज प्रॉक्योरमेंट बोर्ड, यानी एसपीबी की। यह बोर्ड हेडक्वार्टर इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के तहत काम करता है। एसपीबी की बैठकें चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ टू द चेयरमैन चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटी (CISC) की अध्यक्षता में होती हैं। एसपीबी एक जॉइंट बोर्ड है, जिसमें तीनों सर्विसेज (आर्मी, नेवी, एयर फोर्स) के थ्री-स्टार या टू-स्टार लेवल ऑफिसर्स (जैसे डायरेक्टर जनरल्स या संबंधित ब्रांच हेड्स) और अन्य संबंधित प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
एसपीबी यह तय करता है कि जो चीज खरीदी जा रही है, वह वाकई जरूरी है या नहीं। इसे ही एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी, यानी एओएन कहा जाता है। एओएन मिलने के बाद ही आगे खरीद की प्रक्रिया शुरू होती है। पहले यह काम एक अलग कमेटी करती थी, लेकिन अब एसपीबी के जरिए तीनों सेनाओं के बीच तालमेल सुनिश्चित किया जाता है। (DAC meeting)
DAC meeting: कैसे चलता है ईपी का पूरा प्रोसेस
सबसे पहले सेना, नौसेना या वायुसेना अपनी तत्काल जरूरत पहचानती है। इसके बाद मामला एसपीबी के पास जाता है, जहां से एओएन मिलती है। फिर डिफेंस फाइनेंस या इंटीग्रेटेड फाइनेंशियल एडवाइजर से सहमति ली जाती है।
इसके बाद सप्लायर से बातचीत होती है और वाइस चीफ की मंजूरी से कॉन्ट्रैक्ट साइन किया जाता है। यह सब काम 40 दिनों के भीतर पूरा करना होता है।
अगर कोई चीज विदेश से मंगानी हो, तो रक्षा मंत्रालय से विशेष अनुमति लेनी पड़ती है।
ईपी की पूरी ट्रांच को अंत में डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल, यानी डीएसी, से मंजूरी मिलती है, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री करते हैं।
कैपिटल और रेवेन्यू प्रॉक्यूरमेंट में फर्क
ईपी के तहत दो तरह की खरीद होती है। एक होती है कैपिटल प्रॉक्यूरमेंट, यानी नए हथियार और बड़े सिस्टम खरीदे जाते हैं। वहीं, दूसरी होती है रेवेन्यू प्रॉक्यूरमेंट, जिसमें गोला-बारूद, स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस से जुड़ी चीजें आती हैं। ईपी का फोकस दोनों में होता है, लेकिन असली मकसद होता है सेना की ऑपरेशनल रेडीनेस, यानी युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार रहना। (DAC meeting)
DAC meeting: क्यों जरूरी मानी जाती है ईपी
इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट की शुरुआत 2016 के उरी हमले के बाद हुई थी। इसके बाद गलवान घाटी में चीन के साथ तनाव के समय इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी ईपी की एक नई ट्रांच लाई गई।
इस व्यवस्था की वजह से सेना को वक्त पर जरूरी हथियार मिलते हैं और किसी भी आपात स्थिति में तैयारी में कमी नहीं रहती। हालांकि, इसके साथ यह भी साफ कर दिया गया है कि इंडस्ट्री को तय समय में सप्लाई करनी ही होगी, वरना कॉन्ट्रैक्ट रद्द हो सकता है।
पिछले कुछ सालों में भारत ने कई बार इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट का सहारा लिया है। ईपी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें न तो लंबा रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी किया जाता है और न ही ट्रायल जैसा लंबा प्रोसेस अपनाया जाता है। आमतौर पर एक डील की सीमा करीब 300 से 400 करोड़ रुपये तक होती है और हथियार छह महीने के भीतर सेना को मिल जाते हैं। सामान्य रक्षा सौदों में यही प्रक्रिया दो से तीन साल तक खिंच सकती है। (DAC meeting)
फास्ट ट्रैक परचेज का भी विकल्प
इसके अलावा डिफेंस इक्विपमेंट्स की तुरंत खरीद के लिए रक्षा मंत्रालय के पास एक और विकल्प होता है, जिसे फास्ट ट्रैक परचेज (एफटीपी) कहा जाता है। यह प्रक्रिया इमरजेंसी प्रॉक्यूरमेंट जैसी ही है, लेकिन इसमें हर सौदे की अधिकतम राशि की सीमा ज्यादा होती है। अगर ईपी की समयसीमा खत्म होने के बाद भी अगर कुछ सौदे अटके रहते हैं, तो उन्हें एफटीपी के तहत आगे बढ़ाया जाता है। (DAC meeting)
क्या है डीएसी और क्यों अहम है
डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल रक्षा मंत्रालय की सबसे हाई पर्चेज कमेटी होती है। इसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करते हैं। इसमें चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, तीनों सेनाओं के प्रमुख, रक्षा सचिव और डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) के चेयरमैन शामिल होते हैं।
डीएसी यह तय करती है कि सेना को किस तरह के हथियार और सिस्टम खरीदने हैं। एक बार डीएसी किसी प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे देती है, तभी आगे कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशन शुरू होते हैं। इसलिए डीएसी की मंजूरी को किसी भी रक्षा सौदे का पहला और सबसे अहम कदम माना जाता है। (DAC meeting)
DAC meeting: 29 दिसंबर की बैठक से क्या उम्मीदें
अब सभी की नजर 29 दिसंबर को होने वाली डीएसी बैठक पर टिकी है। माना जा रहा है कि यह साल 2025 की आखिरी डीएसी बैठक होगी और इसमें कई बड़े प्रस्तावों पर चर्चा हो सकती है। रक्षा मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में स्वदेशी रक्षा परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि सरकार की आत्मनिर्भर भारत नीति को आगे बढ़ाया जा सके। (DAC meeting)
संभावना है कि बैठक में भारतीय सेना के लिए बड़ी संख्या में लॉइटरिंग म्यूनिशन, ड्रोन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम पर फैसला लिया जा सकता है। इसके अलावा वायुसेना के लिए लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइल, जैसे एस्ट्रा मार्क-2, और कुछ विदेशी सिस्टम पर भी चर्चा होने की उम्मीद है।
MRSAM और टैंक प्रोजेक्ट भी एजेंडे में
डीएसी बैठक में भारतीय नौसेना के लिए मीडियम रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम (MRSAM) की खरीद का प्रस्ताव भी आ सकता है। इसका मकसद नौसेना के युद्धपोतों को हवाई खतरों से सुरक्षा देना है।
वहीं, भारतीय सेना अपने टी-90 टैंकों के स्वदेशी ओवरहॉल का प्रस्ताव भी रख सकती है। इसके तहत करीब 200 टैंकों को देश में ही आधुनिक बनाया जाएगा। इससे न सिर्फ विदेशी निर्भरता कम होगी, बल्कि घरेलू रक्षा उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा। (DAC meeting)
इस विदेशी सौदों पर भी हो सकती है चर्चा
हालांकि सरकार का जोर स्वदेशी प्रणालियों पर है, लेकिन कुछ विदेशी सौदों पर भी चर्चा हो सकती है। इनमें अमेरिका से एमक्यू-9बी सी गार्जियन ड्रोन को लीज पर लेने का प्रस्ताव शामिल है। भारत पहले ही 31 ऐसे ड्रोन खरीदने का करार कर चुका है, जो 2028 से भारत में आने शुरू होंगे।
इसके अलावा वायुसेना के लिए मिड-एयर रिफ्यूलर एयरक्राफ्ट और कुछ विशेष हथियार प्रणालियों पर भी फैसला लिया जा सकता है।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा वैश्विक हालात को देखते हुए रक्षा खरीद में देरी भारत के लिए ठीक नहीं है। सीमाओं पर चुनौतियां बनी हुई हैं और तकनीक तेजी से बदल रही है। ऐसे में जरूरी है कि लंबित सौदों को जल्द से जल्द अंतिम रूप दिया जाए। (DAC meeting)



