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Operation Sindoor Cognitive Warfare: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान क्या था ‘अदृश्य युद्ध’? रक्षा मंत्री के बयान से खुला राज, क्या है “मास्किरोव्का” स्ट्रेटेजी?

रूस और चीन कॉग्निटिव वॉरफेयर में सबसे आगे माने जाते हैं। दोनों देश शांति के समय, संकट के समय और युद्ध के समय एक ही रणनीति पर काम करते हैं, दुश्मन की सोच को नियंत्रित करना...

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📍नई दिल्ली | 18 Dec, 2025, 9:24 PM

Operation Sindoor Cognitive Warfare: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को ‘एयर फोर्स कमांडर्स’ कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए बेहद अहम बात कही। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए कहा कि आम तौर पर दुश्मन के हमले के समय लोग डर जाते हैं, लेकिन जब पाकिस्तानी सेना ने भारत के ठिकानों पर हमला करने की कोशिश की, तो देश की जनता बिल्कुल शांत रही और अपने रोजमर्रा के कामों में लगी रही। दरअसल रक्षा मंत्री अप्रत्यक्ष रूप से इन्फॉरमेशन वॉरफेयर का जिक्र कर रहे थे। यानी कि उस दौरान पाकिस्तान की तरफ से भारतीय सेनाओं को लेकर तमाम तरह के झूठ फैलाए जा रहे तब भी भारत की जनता उन झूठों के फेर में नहीं पड़ी और भारतीय सुरक्षा बलों पर भरोसा जताते हुए शांत रही। यानी कि उन्होंने पाकिस्तान की तरफ से आ रही फेक न्यूज को नकार दिया था।

Operation Sindoor Cognitive Warfare: लगातार चेताते रहे हैं रक्षा मंत्री

हालांकि रक्षा मंत्री ने पहली बार ये बात नहीं बोली है। वे इससे पहले भी संकेतों के माध्यम से इस ‘अदृश्य’ युद्ध के बारे में जिक्र करते रहे हैं। सितंबर 2025 में कोलकाता में संयुक्त कमांडर्स सम्मेल में भी नराजनाथ सिंह ने कहा था कि पारंपरिक युद्ध से आगे बढ़कर इनफॉरमेशन वॉरफेयर, आइडियोलॉजिकल वॉरफेयर (जो कॉग्निटिव वॉरफेयर से जुड़ा है), पर्यावरणीय और जैविक युद्ध जैसे अपरंपरागत खतरों से निपटने के लिए सतर्क और तैयार रहने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि युद्ध का स्वरूप बदल रहा है, और ये “अदृश्य चुनौतियां” उतनी ही घातक हैं।

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इस साल जून में देहरादून में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने सूचना युद्ध को 21वीं सदी की बड़ी चुनौती बताया था। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान द्वारा फर्जी वीडियो, मनगढ़ंत खबरें और सोशल मीडिया पोस्ट से प्रोपगैंडा फैलाने का उदाहरण दिया था और लोगों से अपील की कि वे सामाजिक सैनिक बनें और जागरूकता फैलाकर इस युद्ध में योगदान दें। उन्होंने डेटा और सूचना को सबसे बड़ी ताकत व चुनौती बताया।

नवंबर के आखिर में हुए चाणक्य डिफेंस डायलॉग 2025 के समापन सत्र में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बहुत साफ शब्दों में कहा था कि आज की दुनिया में सूचना युद्ध एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। उन्होंने कहा कि भारत ऐसे पड़ोस में रहता है जहां खतरे कई तरह के हैं, जिनमें आतंकवाद, सीमा पार से चरमपंथ को मदद, हालात बदलने की कोशिशें, समुद्र में दबाव और अब सूचना युद्ध भी शामिल है। इन सब जटिल चुनौतियों से निपटने के लिए हमें हर समय सतर्क रहना होगा और अपना लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट रखना होगा। राजनाथ सिंह ने सूचना युद्ध को नई पीढ़ी के खतरनाक हथियार बताया, जिसमें साइबर हमले भी शामिल हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के अनिश्चित दौर में रक्षा क्षेत्र में सुधार कोई विकल्प नहीं, बल्कि जरूरी रणनीति है, ताकि हमारी सेनाएं इन अदृश्य खतरों, खासकर सूचना युद्ध, से मजबूती से मुकाबला कर सकें। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

Operation Sindoor Cognitive Warfare: क्या है कॉग्निटिव वॉरफेयर?

रक्षा मंत्री की बात बिल्कुल सही है। आज की दुनिया में युद्ध का मतलब सिर्फ टैंक, मिसाइल और सैनिकों की लड़ाई नहीं रह गया है। अब एक ऐसा युद्ध भी चल रहा है, जो न तो दिखाई देता है और न ही इसकी आवाज सुनाई देती है। इस युद्ध को कॉग्निटिव वॉरफेयर, यानी दिमाग और सोच का युद्ध कहा जाता है। यह लड़ाई सीधे इंसान के मन, सोच, भावनाओं और फैसलों को निशाना बनाती है। इसका मकसद किसी देश को हथियारों से हराना नहीं, बल्कि उसकी एकता, आत्मविश्वास और फैसला लेने की क्षमता को कमजोर करना होता है।

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फ्रांस की नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी और नाटो के शीर्ष सैन्य कमांडर एडमिरल पियरे वांदिये के अनुसार, कॉग्निटिव वॉरफेयर का सबसे बड़ा निशाना इंसानी दिमाग है। इसमें समाज को तोड़ना, लोगों के मन में शक पैदा करना और सरकार व संस्थानों पर भरोसा कम करना शामिल है। यह युद्ध शांति, संकट और खुले युद्ध की सीमाओं को मिटा देता है। कई बार लोग यह समझ भी नहीं पाते कि वे ऐसे किसी हमले का शिकार हो चुके हैं।

पारंपरिक सूचना युद्ध से कहीं आगे है कॉग्निटिव वॉरफेयर

कॉग्निटिव वॉरफेयर दरअसल पारंपरिक सूचना युद्ध से कहीं आगे की चीज है। पहले सूचना युद्ध में झूठी खबरें या प्रोपेगंडा तक सीमित रहती थी, लेकिन अब सीधे यह कोशिश की जाती है कि लोग क्या सोचें, कैसे सोचें और कब फैसला लें। अमेरिकी सैन्य रणनीतिकार जॉन बॉयड ने कहा था कि किसी भी दुश्मन को हराने के लिए उसके फैसले लेने की प्रक्रिया को भ्रमित कर देना काफी होता है। आज इसी सोच को हथियार बना लिया गया है। दुश्मन यह कोशिश करता है कि सामने वाला देश सही समय पर सही फैसला न ले पाए। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

दिमाग अब लक्ष्य भी है और हथियार भी

आज इंसान का दिमाग ही नया युद्धक्षेत्र बन चुका है। दिमाग अब लक्ष्य भी है और हथियार भी। यानी दुश्मन न केवल लोगों के दिमाग को निशाना बनाता है, बल्कि उन्हीं लोगों की भावनाओं और सोच का इस्तेमाल हथियार की तरह करता है। अगर किसी देश की सोच को पहले ही कमजोर कर दिया जाए, तो जमीन, हवा या समुद्र में लड़ाई की जरूरत ही नहीं पड़ती। यही वजह है कि यह युद्ध अक्सर “ग्रे जोन” में लड़ा जाता है, यानी उस स्तर पर जहां खुले युद्ध का ऐलान तो नहीं होता, लेकिन नुकसान लगातार होता रहता है।

Operation Sindoor Cognitive Warfare: रूस की “मास्किरोव्का” स्ट्रेटेजी

रूस और चीन कॉग्निटिव वॉरफेयर में सबसे आगे माने जाते हैं। दोनों देश शांति के समय, संकट के समय और युद्ध के समय एक ही रणनीति पर काम करते हैं, दुश्मन की सोच को नियंत्रित करना। वहीं पाकिस्तान भी तेजी से कॉग्निटिव वॉरफेयर की रणनीति पर काम कर रहा है।

रूस की रणनीति उसकी पुरानी सैन्य परंपराओं से निकली है। रूस लंबे समय से धोखे और भ्रम की नीति अपनाता रहा है, जिसे वह “मास्किरोव्का” कहता है। इसका मतलब होता है दुश्मन को गुमराह करना, ताकि वह गलत फैसले ले। 2014 में क्रीमिया पर कब्जे के दौरान रूस ने बिना वर्दी वाले सैनिक भेजे, और वह इससे लगातार इनकार करता रहा, साइबर हमले किए और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया। नतीजा यह हुआ कि यूक्रेन और पश्चिमी देश समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठा पाए।

“रिफ्लेक्सिव कंट्रोल” स्ट्रेटेजी भी यूज करता है रूस

वहीं, रूस एक और तकनीक का इस्तेमाल करता है, जिसे “रिफ्लेक्सिव कंट्रोल” कहा जाता है। इसमें दुश्मन को सीधे आदेश नहीं दिए जाते, बल्कि उसे ऐसी जानकारी दी जाती है कि वह खुद वही फैसला करे जो रूस चाहता है। इसमें दुश्मन की सोच, आदतें, कमजोरियां और मनोविज्ञान तक का अध्ययन किया जाता है। रूस इस तरह से लंबे समय तक माहौल बनाता है, ताकि बिना गोली चलाए ही रणनीतिक फायदा मिल जाए। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

आज इस रणनीति को साइबर हमलों, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और सोशल मीडिया प्रचार के साथ जोड़कर इस्तेमाल किया जाता है। इसका असर सेना के फैसलों से लेकर आम लोगों की राय तक पर पड़ता है। गलत जानकारी, फर्जी वीडियो और भ्रम फैलाकर पूरे सिस्टम को धीमा और कमजोर किया जाता है।

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Operation Sindoor Cognitive Warfare: चीन की “थ्री वारफेयर” स्ट्रेटेजी

वहीं, चीन की रणनीति थोड़ी अलग है, लेकिन लक्ष्य वही है। चीन अपनी प्राचीन रणनीतिक सोच से प्रेरित है, जहां कहा गया है कि सबसे बड़ी जीत वह होती है, जिसमें दुश्मन बिना लड़े हार मान ले। चीन की सेना “थ्री वारफेयर” की नीति पर काम करती है। इसमें मनोवैज्ञानिक युद्ध, जनमत को प्रभावित करना और कानून की अपनी तरह से व्याख्या करना शामिल है।

चीन सिर्फ सेना तक सीमित नहीं रहता। वह सरकार, मीडिया, तकनीक, शिक्षा और संस्कृति सभी को इस रणनीति में शामिल करता है। चीन के लिए यह पूरे समाज की कोशिश होती है। घरेलू स्तर पर वह लोगों की सोच को नियंत्रित करता है और बाहर की दुनिया में अपनी कहानी फैलाता है। अंतरराष्ट्रीय कानून को भी अपने पक्ष में दिखाने की कोशिश करता है। दक्षिण चीन सागर और ताइवान से जुड़े मामलों में चीन लगातार यह दिखाने की कोशिश करता है कि वही सही है, जबकि बाकी देशों को आक्रामक या अस्थिर बताया जाता है। यह सब कॉग्निटिव वॉरफेयर का हिस्सा है, जिसमें दुनिया की सोच को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की जाती है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

चीन अब नई तकनीक के जरिए इस युद्ध को और तेज कर रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बड़े डेटा, ड्रोन, ऑटोमेशन और यहां तक कि दिमाग से जुड़ी रिसर्च को भी वह युद्ध की तैयारी में शामिल कर रहा है। चीन मानता है कि भविष्य के युद्ध का स्वरूप दिमाग पर नियंत्रण का होगा। इसलिए वह इंसानी भावनाओं, सोच और व्यवहार को समझने और प्रभावित करने पर भारी निवेश कर रहा है।

पाकिस्तान की फिफ्थ जेनरेशन वॉरफेयर (5GW) स्ट्रेटेजी

पाकिस्तान भी भारत के खिलाफ कॉग्निटिव वॉरफेयर में काफी सक्रिय है। यह तरीका उसने अपनी पारंपरिक सैन्य कमजोरियों को छिपाने के लिए अपनाया है और इसे हाइब्रिड वॉरफेयर का अहम हिस्सा बना लिया है। पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेस पब्लिक रिलेशंस (ISPR) के डायरेक्टर जनरल लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी इनफॉरमेशन वॉरफेयर और कॉग्निटिव वॉरफेयर को फिफ्थ जेनरेशन वॉरफेयर (5GW) या हाइब्रिड वॉरफेयर का अहम हिस्सा बताते हैं।

पाकिस्तान की सेना की मीडिया इकाई ISPR इस पूरी रणनीति की रीढ़ है। ISPR और खुफिया एजेंसी आईएसआई मिलकर सोशल मीडिया पर झूठी खबरें, भ्रामक वीडियो, डीपफेक और बॉट नेटवर्क के जरिए भारत के खिलाफ लगातार नैरेटिव चलाते हैं। कश्मीर मुद्दे पर गलत जानकारियां फैलाना और भारतीय सेना की छवि खराब करना इसका प्रमुख उदाहरण है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी पाकिस्तान ने बड़े पैमाने पर फर्जी वीडियो और सोशल मीडिया प्रोपगैंडा का इस्तेमाल किया। कई रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि इस क्षेत्र में पाकिस्तान भारत से आगे है, क्योंकि उसका सिस्टम ज्यादा केंद्रीकृत और आक्रामक है। चीन से मिलने वाली तकनीकी और साइबर मदद ने उसकी इस क्षमता को और मजबूत किया है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

ग्रे जोन में कॉग्निटिव वॉरफेयर सबसे ज्यादा प्रभावी

कई सैन्य विशेषज्ञ मानते हैं कि आज दुनिया एक ऐसे दौर में पहुंच चुकी है, जहां शांति और युद्ध के बीच की रेखा लगभग मिट चुकी है। इसे ग्रे जोन कहा जाता है। इसी ग्रे जोन में कॉग्निटिव वॉरफेयर सबसे ज्यादा प्रभावी होती है। इसमें दुश्मन खुलकर युद्ध नहीं करता, बल्कि धीरे-धीरे समाज के भीतर अस्थिरता पैदा करता है। लोगों को यह एहसास भी नहीं होता कि वे किसी हमले का शिकार हो रहे हैं।

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सोशल मीडिया बना सबसे आसान हथियार

नई तकनीक ने इस युद्ध को और खतरनाक बना दिया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डीपफेक वीडियो, सोशल मीडिया बॉट्स और डेटा एनालिटिक्स की मदद से किसी भी देश के लोगों की भावनाओं को समझा और प्रभावित किया जा सकता है। अब फर्जी वीडियो, नकली भाषण और झूठी घटनाएं इतनी असली लगती हैं कि सच और झूठ में फर्क करना मुश्किल हो जाता है। सोशल मीडिया लोगों की भावनाओं को भड़काने का सबसे आसान हथियार बन गया है। गुस्सा, डर और नफरत सबसे जल्दी फैलती है, और दुश्मन इसी का फायदा उठाता है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

सेना पर भी पड़ता है असर

सेना के स्तर पर भी कॉग्निटिव वॉरफेयर का असर गंभीर होता है। अगर कमांडर तक गलत जानकारी पहुंचे, या फैसला लेने की प्रक्रिया को भ्रमित कर दिया जाए, तो पूरी सैन्य कार्रवाई प्रभावित हो सकती है। आधुनिक सेनाएं डेटा, नेटवर्क और तकनीक पर निर्भर हैं, और यही निर्भरता उन्हें इस तरह के हमलों के प्रति कमजोर भी बनाती है। अगर किसी देश की सेना की सोच और आत्मविश्वास को पहले ही कमजोर कर दिया जाए, तो असली युद्ध की जरूरत ही नहीं पड़ती। यही इस युद्ध की सबसे खतरनाक बात है।

भारत के लोकतांत्रिक होने का दुश्मन को फायदा

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए कॉग्निटिव वॉरफेयर एक बड़ी चुनौती है। इस तरह के हमलों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं, क्योंकि वहां सूचना की आजादी होती है। लोग सोशल मीडिया पर खुलकर अपनी राय रखते हैं, जो बाद में उनके खिलाफ इस्तेमाल की जा सकती है। झूठी खबरें तेजी से फैलती हैं और सच अक्सर पीछे छूट जाता है। इसका असर समाज की एकता और स्थिरता पर पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में फेक न्यूज़, सोशल मीडिया के जरिए फैलाए गए झूठ और संस्थानों के खिलाफ दुष्प्रचार के कई उदाहरण सामने आए हैं। यह सभी घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि भारत भी इस तरह के मानसिक युद्ध के दायरे में है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

भारत की मानसिक मजबूती अभी कायम

हाल के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह देखा गया कि कैसे तेज और सटीक सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ सूचना और नैरेटिव पर भी नियंत्रण रखा गया। रक्षा मंत्री ने जिस तरह जनता के शांत व्यवहार और सेना पर भरोसे की बात कही, वह इस बात का संकेत था कि भारत की मानसिक मजबूती अभी कायम है। यही मजबूती किसी भी देश की सबसे बड़ी ढाल होती है।

कॉग्निटिव वॉरफेयर से निपटने के लिए केवल तकनीकी उपाय काफी नहीं हैं। इसके लिए समाज को मानसिक रूप से मजबूत बनाना जरूरी है। लोगों को यह समझना होगा कि हर दिखाई देने वाली खबर सच नहीं होती। मीडिया लिटरेसी, संस्थानों पर भरोसा और सही समय पर सही जानकारी देना भी बेहद जरूरी है। (Operation Sindoor Cognitive Warfare)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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