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Fact Check: क्या IRIS Dena को डुबाने में भारत ने की अमेरिका की मदद? COMCASA-LEMOA पर क्यों उठे सवाल

भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ सालों में कई रक्षा समझौते हुए हैं। इनमें प्रमुख रूप से COMCASA (कम्युनिकेशंस कम्पैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) और LEMOA (लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट) शामिल हैं...

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📍नई दिल्ली | 9 Mar, 2026, 12:18 PM

IRIS Dena Fact Check: हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और स्ट्रेटेजिक एक्सपर्ट डॉ. ब्रह्मा चेल्लानी ने IRIS Dena के साथ हुए हादसे को लेकर एक अहम सवाल उठाया है। उनका कहना है कि क्या ईरानी युद्धपोत को निशाना बनाने के लिए खुफिया जानकारी साझा की गई? जिसके बाद सवाल उठाए जाने लगे कि क्या इस घटना में भारत की भी किसी तरह की भूमिका है, खासकर अमेरिका के साथ इंटेलिजेंस शेयरिंग करने को लेकर।

जिसके बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर बहस छिड़ गई। सोशल मीडिया पर कुछ एक्सपर्ट्स ने दावा किया कि भारत और अमेरिका के बीच मौजूद रक्षा समझौतों के तहत भारत की ओर से दी गई जानकारी का इस्तेमाल किया गया होगा।

हालांकि रक्षा मामलों के जानकारों और नौसेना से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस तरह की अटकलें वास्तविक सैन्य प्रक्रियाओं और अंतरराष्ट्रीय रक्षा समझौतों की सही समझ के बिना लगाई जा रही हैं। उनका कहना है कि भारत द्वारा अमेरिका को ऐसी कोई जानकारी देना, जिससे किसी ईरानी जहाज को निशाना बनाया जा सके, व्यावहारिक और रणनीतिक दोनों ही दृष्टि से असंभव है। (IRIS Dena Fact Check)

IRIS Dena Fact Check: क्या लिखा है डॉ. ब्रह्मा चेल्लानी ने

डॉ. ब्रह्मा चेल्लानी ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच दो महत्वपूर्ण रक्षा समझौते हैं COMCASA और LEMOA हैं। इन समझौतों के तहत दोनों देश समुद्री गतिविधियों से जुड़ी कुछ संवेदनशील जानकारी साझा करते हैं। अगर ऐसी साझा जानकारी का इस्तेमाल किसी अमेरिकी अटैक सबमरीन ने ईरानी फ्रिगेट को खोजने और डुबाने के लिए किया हो, तो यह भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी के लिए एक गंभीर सवाल खड़ा कर सकता है।

उन्होंने आगे लिखा कि IRIS Dena जैसे मौद्गे-क्लास फ्रिगेट की सैन्य क्षमता एक अमेरिकी न्यूक्लियर-पावर्ड अटैक सबमरीन के सामने बहुत कम होती है। तकनीकी रूप से देखें तो ऐसा जहाज अमेरिकी पनडुब्बी के मुकाबले टिक नहीं सकता। लेकिन इस पूरे मामले में असली मुद्दा ताकत का नहीं बल्कि परिस्थितियों का है। (IRIS Dena Fact Check)

डॉ. चेल्लानी के मुताबिक अगर यह सच है कि IRIS Dena पर उस समय बहुत कम हथियार या गोला-बारूद था, तो यह घटना सामान्य युद्ध कार्रवाई की बजाय एक योजनाबद्ध हमला लग सकती है। क्योंकि भारत द्वारा आयोजित MILAN-2026 नौसैनिक अभ्यास के दौरान जहाजों को एक तरह के “पीस प्रोटोकॉल” के तहत सीमित हथियारों के साथ भाग लेना होता है।

डॉ. चेल्लानी का कहना है कि यह दावा पूरी तरह असंभव भी नहीं लगता। आम तौर पर जब कई देशों की नौसेनाएं मिलकर कोई अभ्यास करती हैं, तो उस दौरान जहाज पूरी युद्ध तैयारी के साथ नहीं आते। ऐसे अभ्यासों का मकसद सहयोग और आपसी तालमेल बढ़ाना होता है, न कि वास्तविक युद्ध करना। (IRIS Dena Fact Check)

उन्होंने लिखा कि MILAN जैसे बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास में जब जहाज बंदरगाह पर खड़े होते हैं, जिसे “हार्बर फेज” कहा जाता है, तब उन्हें सुरक्षित स्थिति यानी “सेफ कॉन्फिगरेशन” में रखा जाता है। इस दौरान जहाजों पर सार्वजनिक दौरे, कूटनीतिक कार्यक्रम और फ्लीट रिव्यू जैसी गतिविधियां होती हैं, इसलिए हथियारों को सुरक्षित रखा जाता है और गोला-बारूद का इस्तेमाल नहीं होता।

इसके बाद जब अभ्यास का “सी फेज” होता है, तब कुछ ऑपरेशनल ड्रिल और लाइव-फायर अभ्यास किए जाते हैं। लेकिन उस समय भी जहाजों में केवल उतना ही गोला-बारूद रखा जाता है जितना उन विशेष अभ्यासों के लिए जरूरी होता है। डॉ. चेल्लानी के मुताबिक अगर IRIS Dena अभ्यास खत्म होने के बाद उसी सीमित कॉन्फिगरेशन में बंदरगाह से रवाना हुआ था, तो फिर हमलावर और लक्ष्य के बीच असमानता और भी स्पष्ट हो जाती है। (IRIS Dena Fact Check)

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एक तरफ एक ऐसा जहाज जो संभवतः हल्के हथियारों के साथ या शायद लगभग निहत्था था और एक नौसैनिक अभ्यास से लौट रहा था। वहीं, दूसरी तरफ दुनिया की सबसे एडवांस अंडरसी वॉरफेयर तकनीक से लैस अमेरिकी परमाणु पनडुब्बी थी। ऐसी स्थिति में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह वास्तव में एक सामान्य सैन्य टकराव था या फिर पहले से तय किया गया हमला। (IRIS Dena Fact Check)

क्या हैं COMCASA और LEMOA

भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ सालों में कई रक्षा समझौते हुए हैं। इनमें प्रमुख रूप से COMCASA (कम्युनिकेशंस कम्पैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) और LEMOA (लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट) शामिल हैं।

जिसके बाद कुछ लोगों ने यह मान लिया कि इन समझौतों के चलते भारत की ओर से मिलने वाली जानकारी सीधे अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में इस्तेमाल हो सकती है। (IRIS Dena Fact Check)

लेकिन सूत्र सोशल मीडिया पर चल रहे इन दावों को सिरे से नकारते हैं। उनका कहना है कि यह समझ पूरी तरह सही नहीं है। वह बताते हैं कि COMCASA का मुख्य उद्देश्य सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन सिस्टम को सक्षम बनाना है। इसका मतलब यह है कि दोनों देशों की सेनाएं संयुक्त अभ्यास, मानवीय मिशन या समुद्री सुरक्षा जैसे कार्यों के दौरान सुरक्षित कम्यूनिकेशन कर सकें। यह समझौता किसी देश को दूसरे देश को सीधे टार्गेटिंग इंटेलिजेंस देने की अनुमति नहीं देता।

इसी तरह LEMOA एक लॉजिस्टिक एग्रीमेंट है। इसके तहत दोनों देश एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं का इस्तेमाल ईंधन, मेंटेनेंस या सप्लाई के लिए कर सकते हैं। इसका कॉम्बैट आपरेशंस या इंटेलिजेंस शेयरिंग से कोई सीधा संबंध नहीं होता। सूत्रों का कहना है कि इन समझौतों को लेकर अक्सर सार्वजनिक चर्चा में गलत धारणाएं बन जाती हैं। (IRIS Dena Fact Check)

क्या करती है समुद्री निगरानी प्रणाली

भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने के लिए बड़े स्तर पर मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस सिस्टम डेवलप किया है। गुरुग्राम स्थित इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर – इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) इसी सिस्टम का हिस्सा है।

इस सेंटर में कई देशों के लायजन ऑफिसर मौजूद रहते हैं और यहां जहाजों की आवाजाही से जुड़ी जानकारी साझा की जाती है। यह जानकारी आम तौर पर व्हाइट शिपिंग डेटा यानी कमर्शियल जहाजों और समुद्री यातायात से संबंधित होती है।

इस तरह की जानकारी का इस्तेमाल समुद्री सुरक्षा, एंटी-पायरेसी ऑपरेशन और व्यापारिक जहाजों की निगरानी के लिए किया जाता है। लेकिन सूत्रों का कहना है कि यह सिस्टम किसी वॉरशिप पर हमला करने के लिए जरूरी रीयल-टाइम टार्गेटिंग डेटा नहीं देती। किसी पनडुब्बी से हमला करने के लिए टारगेट की बहुत सटीक स्थिति, गति और दिशा का पता होना जरूरी होता है। यह जानकारी आमतौर पर पनडुब्बी के अपने सेंसर और सैन्य निगरानी प्रणाली से मिलती है। (IRIS Dena Fact Check)

क्या है सबमरीन वॉरफेयर की असलियत

सूत्रों का कहना है कि इस पूरे मामले में एक और बड़ी गलतफहमी यह है कि किसी न्यूक्लियर-पावर्ड अटैक सबमरीन को किसी युद्धपोत को निशाना बनाने के लिए बाहरी सहायता जरूरी होती है। उनका कहना है कि दरअसल IRIS Dena जैसे जहाज एक सरफेस वॉरशिप होते हैं, जिनका वजन करीब 1500 टन होता है और जो खुले समुद्र में चलते हैं। जब कोई जहाज समुद्र में चलता है तो उसके इंजन, मशीनरी और पानी में बनने वाले प्रवाह से खास तरह की आवाजें पैदा होती हैं। इन्हें अकॉस्टिक सिग्नेचर कहा जाता है। आधुनिक पनडुब्बियों के सोनार सिस्टम इन आवाजों को काफी दूर से पहचान सकते हैं। (IRIS Dena Fact Check)

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एक न्यूक्लियर-पावर्ड अटैक सबमरीन खुद ही लक्ष्य को खोजने और ट्रैक करने की क्षमता रखती हैं। इन पनडुब्बियों में बेहद संवेदनशील पैसिव सोनार सिस्टम लगे होते हैं जो समुद्र में मौजूद जहाजों की आवाज और मशीनरी के कंपन को दूर से पहचान सकते हैं। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी स्टेल्थ क्षमता, लंबे समय तक पानी के नीचे रहने की क्षमता और एडवांस सेंसर सिस्टम होते हैं।

सूत्रों ने बताया कि पनडुब्बियों में लगे पैसिव सोनार सिस्टम आसपास के जहाजों की आवाज को पकड़ लेते हैं, लेकिन खुद कोई सिग्नल नहीं भेजते। इससे पनडुब्बी की स्थिति दुश्मन को पता नहीं चलती। इस तरह पनडुब्बी बिना सामने आए ही सतह पर चल रहे जहाजों को पहचान और ट्रैक कर सकती है। क्योंकि समुद्र में चलने वाला हर जहाज एक खास तरह की ध्वनि पैदा करता है। इंजन, प्रोपेलर और पानी के प्रवाह से बनने वाली आवाज को पनडुब्बी के सोनार सिस्टम पकड़ सकते हैं। (IRIS Dena Fact Check)

इसके अलावा आधुनिक मिलिटरी आपरेशंस में अक्सर सैटेलाइट निगरानी भी मदद करती है। सैटेलाइट पहले लक्ष्य की सामान्य लोकेशन का पता लगा सकते हैं और फिर यह जानकारी पनडुब्बी तक भेजी जा सकती है, जबकि पनडुब्बी समुद्र के भीतर ही रहती है। साथ ही, अमेरिका के पास दुनिया का सबसे बड़ा रीमोट सेंसिंग सैटेलाइट नेटवर्क भी है, जो समुद्री गतिविधियों पर नजर रखता है। इसलिए यह मानना कि अमेरिकी नौसेना को किसी वॉरशिप को निशाना बनाने के लिए किसी अन्य देश से जानकारी लेनी पड़ी होगी, यह जानकारी बिल्कुल गलत है।

उनका कहना है कि लगभग 1500 टन के आकार का एक फ्रिगेट जैसे IRIS Dena खुले समुद्र में पनडुब्बी के लिए एक स्पष्ट टारगेट हो सकता है। ऐसे में किसी तीसरे देश से मिली जानकारी की जरूरत नहीं होती। (IRIS Dena Fact Check)

बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास को लेकर हैं गलतफहमियां

सूत्रों का कहना है कि यह सोचना कि IRIS Dena संभवतः किसी “पीस प्रोटोकॉल” या “सेफ कॉन्फिगरेशन” में था क्योंकि उसने भारत में आयोजित बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास MILAN में हिस्सा लिया था। यह सोचना गलत है।

उनका कहना है कि MILAN जैसे बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास के दौरान कुछ सुरक्षा नियम जरूर लागू होते हैं, लेकिन उनका मतलब यह नहीं होता कि जहाज पूरी तरह हथियारों से खाली या निहत्थे होते हैं। जब ऐसे अभ्यासों का हार्बर फेज होता है, यानी जब जहाज बंदरगाह पर खड़े होते हैं, मेहमानों का स्वागत कर रहे होते हैं या सार्वजनिक दौरे कराए जा रहे होते हैं, तब सुरक्षा वजहों से कुछ वेपन सिस्टम को सुरक्षित स्थिति में रखा जाता है। इसी तरह लाइव-फायर अभ्यास के लिए इस्तेमाल होने वाला गोला-बारूद भी सख्त निगरानी में रखा जाता है और जरूरत के हिसाब से नियंत्रित किया जाता है। यह प्रक्रिया दुनिया की लगभग सभी नौसेनाओं में सामान्य रूप से अपनाई जाती है। (IRIS Dena Fact Check)

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लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि जहाज बंदरगाह से निकलने के बाद पूरी तरह निहत्था हो जाता है। जब कोई युद्धपोत बंदरगाह से निकलता है, तो वह बिना हथियारों के ही समुद्र में जाता है। हर युद्धपोत अपने डिजाइन के अनुसार अपने मूल हथियारों के साथ ही चलता है और वह हमेशा एक कॉम्बैट प्लेटफॉर्म बना रहता है।

भले ही अभ्यास के दौरान गोला-बारूद की मात्रा सीमित रखी जाए, लेकिन जहाज अपनी सैन्य क्षमता बनाए रखता है। इसके अलावा जब कोई जहाज अभ्यास क्षेत्र से निकलकर अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में पहुंच जाता है, तब उसकी ऑपरेशनल स्थिति उस देश की नौसेना तय करती है, जिससे वह जहाज संबंधित होता है। (IRIS Dena Fact Check)

भारत की क्या है रणनीतिक स्थिति

सूत्रों का कहना है कि भारत लंबे समय से हिंद महासागर क्षेत्र में संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करता आया है। भारत के ईरान, अमेरिका और कई अन्य देशों के साथ अलग-अलग रणनीतिक संबंध हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भारत किसी ऐसे जहाज के खिलाफ कार्रवाई में जानकारी देता जो भारतीय नौसेना के आमंत्रण पर किसी अभ्यास में शामिल हुआ था, तो यह कूटनीतिक भरोसे को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता था।

भारतीय नौसेना की पहचान एक पेशेवर और तटस्थ समुद्री शक्ति के रूप में रही है। भारत ने हमेशा हिंद महासागर को सहयोग और स्थिरता का क्षेत्र बनाए रखने की बात कही है।

इसी वजह से सूत्रों का मानना है कि भारत द्वारा किसी विदेशी युद्धपोत को निशाना बनाने में अप्रत्यक्ष मदद देने की बात पूरी तरह से बेबुनियाद है। (IRIS Dena Fact Check)

रक्षा साझेदारी और ऑपरेशनल कंट्रोल अलग चीजें

सूत्रों का कहना है कि अक्सर रक्षा साझेदारी को लेकर एक बड़ी गलतफहमी यह होती है कि लोग मान लेते हैं कि इससे एक देश दूसरे देश के मिलिटरी ऑपरेशंस को प्रभावित कर सकता है।

असल में ऐसा नहीं होता। रक्षा समझौते केवल तकनीकी सहयोग, ट्रेनिंग या लॉजिस्टिक मदद के लिए होते हैं। हर देश अपनी सैन्य जानकारी और सेंसर नेटवर्क पर पूरी तरह से कंट्रोल बनाए रखता है। भारत भी अपने सभी सैन्य सेंसर, सैटेलाइट और इंटेलिजेंस नेटवर्क पर पूरी तरह संप्रभु नियंत्रण रखता है। (IRIS Dena Fact Check)

जिम्मेदारी से करें सोशल मीडिया पर चर्चा

सूत्रों ने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह के संवेदनशील मामलों में सार्वजनिक चर्चा बेहद सावधानी के साथ होनी चाहिए। बिना ठोस प्रमाण के किसी देश को किसी सैन्य कार्रवाई से जोड़ देना कूटनीतिक तनाव बढ़ा सकता है।

उन्होंने कहा कि नेवल ऑपरेशंस और समुद्री युद्ध की प्रक्रियाएं बेहद जटिल होती हैं। इन्हें समझे बिना की गई टिप्पणियां अक्सर गलतफहमियां पैदा कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि खुफिया जानकारी साझा करने या किसी मिलिटरी ऑपरेशंस की जिम्मेदारी से जुड़े दावे बहुत सावधानी से किए जाने चाहिए और उन्हें पुख्ता तथ्यों के आधार पर ही रखा जाना चाहिए। (IRIS Dena Fact Check)

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  • हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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