📍नई दिल्ली/विशाखापत्तनम | 3 Apr, 2026, 1:33 PM
INS Aridaman: स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिदमन को आज औपचारिक तौर पर भारतीय नौसेना में शामिल हो गई, वहीं इसकी जिम्मेदारी अब स्ट्रेटेजिक फोर्सेस कमांड (SFC) के पास होगी। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मौजूद रहे। यह पनडुब्बी भारत की तीसरी स्वदेशी न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) है, जिसे लंबे समय से तैयार किया जा रहा था। इससे पहले आईएनएस अरिहंत और अरिघात को पहले ही स्ट्रेटेजिक फोर्सेस कमांड में शामिल किया जा चुका है। वहीं, चौथी एसएसबीएन आईएनएस अरिसुदन अभी कंस्ट्रक्शन स्टेज में है जिसे 2027 के आसपास शामिल किया जा सकता है।
INS Aridaman: कई महीनों तक चले सी-ट्रायल्स
आईएनएस अरिदमन को नौसेना में शामिल करने से पहले इसका लंबा सी ट्रायल चला। इसकी सी ट्रायल्स 2022 से दिसंबर 2025 तक चले। इस दौरान समुद्र में कई महीनों तक इसके अलग-अलग सिस्टम, इंजन और हथियारों की जांच की गई। सभी परीक्षण पूरे होने के बाद इसे अब ऑपरेशनल भूमिका के लिए तैयार माना गया है।
यह पनडुब्बी विशाखापत्तनम के सीक्रेट शिप बिल्डिंग सेंटर में तैयार की गई है। इसके निर्माण में निजी कंपनी एलएंडटी सहित कई भारतीय संस्थानों का योगदान रहा है। यह पनडुब्बी एडवांस्ड टेक्लोनॉजी वेसल (ATV) प्रोजेक्ट का हिस्सा है।
अरिहंत क्लास की तीसरी पनडुब्बी
आईएनएस अरिदमन, अरिहंत क्लास की तीसरी पनडुब्बी है। इससे पहले इसी श्रेणी की आईएनएस अरिहंत को साल 2016 में और आईएनएस अरिघात को 2024 में नौसेना में शामिल किया गया था।
इस नई पनडुब्बी का आकार पहले की पनडुब्बियों से बड़ा है और इसमें ज्यादा मिसाइलें ले जाने की क्षमता है। यही वजह है कि इसे तकनीकी रूप से पहले के मुकाबले ज्यादा सक्षम माना जा रहा है।
“Not words, but power — Aridhaman.” 🔥🇮🇳
In what is perhaps the clearest signal yet, Defence Minister Rajnath Singh has effectively confirmed the commissioning of INS Aridhaman (S4) at Visakhapatnam.
👉 Third submarine of the INS Arihant class submarine
👉 A nuclear-powered SSBN… pic.twitter.com/CB3ebcJdB1— Raksha Samachar | रक्षा समाचार 🇮🇳 (@RakshaSamachar) April 3, 2026
कैसे काम करती है यह परमाणु पनडुब्बी
इस पनडुब्बी में प्रोपल्शन के लिए 83 मेगावॉट का स्वदेशी प्रेसराइज्ड लाइट वॉटर रिएक्टर लगाया गया है, जिसे भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने डिजाइन किया है। इस वजह से यह पनडुब्बी लंबे समय तक बिना सतह पर आए गहरे समुद्र में रह सकती है और इसे स्नॉर्कलिंग की जरूरत नहीं पड़ती। जिससे इसकी आवाज बहुत कम रहती है और दुश्मन के लिए इसे पकड़ना मुश्किल हो जाता है।
इसकी स्टेल्थ क्षमता बढ़ाने के लिए एडवांस अकॉस्टिक डैम्पिंग, एनेकोइक टाइल्स और सेवन-ब्लेड प्रोपेलर का इस्तेमाल किया गया है। पानी के अंदर इसकी स्पीड करीब 24 नॉट तक पहुंच सकती है, जबकि सतह पर यह 12 से 15 नॉट की रफ्तार से चलती है। इस पनडुब्बी में लगभग 95 लोगों का क्रू तैनात रहता है और इसकी ऑपरेशनल अवधि लगभग अनलिमिटेड मानी जाती है, जो सिर्फ खाने-पीने की सप्लाई पर निर्भर करती है। इसमें 533 एमएम के छह टॉरपीडो ट्यूब भी लगे हैं, जिनसे टॉरपीडो, क्रूज मिसाइल और माइन दागे जा सकते हैं।
मिसाइल क्षमता में बड़ा बदलाव
आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात जहां करीब 6,000 टन की पनडुब्बियां हैं, वहीं नई आईएनएस अरिदमन उनसे बड़ी है और इसका वजन करीब 7,000 टन के आसपास है। इसकी लंबाई भी पहले से ज्यादा है, जो करीब 125 से 130 मीटर तक है।
आईएनएस अरिदमन की सबसे बड़ी खासियत इसकी मिसाइल क्षमता है। इसमें 8 वर्टिकल लॉन्च ट्यूब लगाए गए हैं, जबकि पहले की पनडुब्बियों में सिर्फ 4 ट्यूब होते थे। इसकी मदद से यह एक साथ ज्यादा मिसाइलें ले जा सकती है। एक मिशन में यह पनडुब्बी 24 K-15 सागरिका मिसाइलें ले जा सकती है, जिनकी मारक दूरी करीब 750 किलोमीटर है। इसके अलावा यह 8 K-4 मिसाइलें भी ले जा सकती है, जिनकी रेंज 3,500 किलोमीटर से ज्यादा है। आगे चलकर इसमें K-5 जैसी लंबी दूरी की मिसाइलें भी जोड़ी जा सकती हैं।
इस पनडुब्बी की एक खास बात यह है कि इसमें ऐसी तकनीक पर काम किया जा रहा है, जिसमें एक ही मिसाइल कई वारहेड ले जा सके। इससे दुश्मन के डिफेंस सिस्टम को चकमा देना आसान हो जाता है।
समुद्र से जवाबी हमला करने की क्षमता
यह पनडुब्बी भारत की न्यूक्लियर ट्रायड का अहम हिस्सा मानी जाती है। यानी जमीन, हवा और समुद्र तीनों जगह से जवाबी हमला करने की क्षमता। इन पनडुब्बी के शामिल होने के बाद इससे कंटीन्यूअस एट-सी डिटरेंस (एक पनडुब्बी हमेशा पेट्रोल पर) की दिशा में बड़ा कदम है।
यह पनडुब्बी हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की टाइप 094 और 096 एसएसबीएन पनडुब्बियों और पाकिस्तान की चीनी मूल की पनडुब्बियों से मुकाबला करेगी। इसकी शांत तरीके से काम करने की क्षमता और लंबी दूरी की मिसाइलें इसे और मजबूत बनाती हैं, जिससे दुश्मन की एंटी-सबमरीन वॉरफेयर सिस्टम के लिए इसे पकड़ना और रोकना काफी मुश्किल हो जाता है। समुद्र में तैनात रहने की वजह से यह दुश्मन के लिए ट्रैक करना बेहद मुश्किल होता है। अगर किसी संघर्ष की स्थिति बनती है, तो यह पनडुब्बी समुद्र के भीतर से जवाबी हमला कर सकती है।
स्ट्रेटेजिक फोर्सेज कमांड में तैनाती
नौसेना में शामिल होने के बाद आईएनएस अरिदमन को स्ट्रेटेजिक फोर्सेज कमांड के तहत रखा जाएगा। यह वही कमान है जो देश की परमाणु क्षमता से जुड़ी जिम्मेदारी संभालती है। इससे पहले आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात भी इसी कमान के तहत काम कर रही हैं।
क्या है स्ट्रेटेजिक फोर्सेस कमांड (SFC)
स्ट्रेटेजिक फोर्सेस कमांड यानी एसएफसी भारत की परमाणु ताकत को संभालने वाला मुख्य ऑपरेशनल संगठन है। इसे आसान भाषा में समझें तो यही वह कमान है जो देश के परमाणु हथियारों की देखरेख और जरूरत पड़ने पर उनके इस्तेमाल की जिम्मेदारी निभाती है। यह भारत के न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी का हिस्सा है, जो पूरे परमाणु सिस्टम को कंट्रोल करता है।
एसएफसी की स्थापना 4 जनवरी 2003 को की गई थी। उस समय केंद्र सरकार ने इसे औपचारिक रूप से शुरू किया था। इसका मुख्य काम है परमाणु हथियारों को सुरक्षित रखना, उनका रखरखाव करना और जरूरत पड़ने पर उनका सही तरीके से उपयोग सुनिश्चित करना।
यह एक ट्राई-सर्विस कमांड है, यानी इसमें थलसेना, वायुसेना और नौसेना तीनों के अधिकारी और संसाधन शामिल होते हैं। इसका प्रमुख एक तीन-स्टार अधिकारी होता है, जो बारी-बारी से तीनों सेनाओं से आता है।
एसएफसी तीनों तरह के परमाणु सिस्टम को संभालता है। जमीन से दागी जाने वाली मिसाइलें जैसे अग्नि और पृथ्वी सीरीज, हवा से छोड़े जाने वाले हथियार जो फाइटर जेट्स से ले जाए जाते हैं, और समुद्र से दागी जाने वाली मिसाइलें जो पनडुब्बियों से छोड़ी जाती हैं।
समुद्र में मौजूद न्यूक्लियर अटैक सबमरींस भी इसी कमान के तहत काम करती हैं। इनसे K-15 और K-4 जैसी मिसाइलें दागी जा सकती हैं। भारत के पास तीन तरीके से जवाबी हमला करने की क्षमता है, जिसे न्यूक्लियर ट्रायड कहा जाता है। इसमें जमीन, हवा और समुद्र तीनों शामिल हैं। इस पूरे सिस्टम का ऑपरेशनल कंट्रोल एसएफसी के पास होता है।
एसएफसी सीधे देश की शीर्ष कमान से निर्देश लेता है। यानी प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री के स्तर से आदेश आते हैं। सामान्य समय में परमाणु हथियार और मिसाइलें अलग-अलग रखी जाती हैं। जरूरत पड़ने पर इन्हें जोड़कर तैयार किया जाता है। एसएफसी समय-समय पर मिसाइलों के परीक्षण करता रहता है। इससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि सभी सिस्टम ठीक से काम कर रहे हैं और किसी भी स्थिति के लिए तैयार हैं।
यह कमान बहुत संवेदनशील और गोपनीय मानी जाती है। इसका काम देश की सुरक्षा से सीधे जुड़ा है। भारत की नीति के अनुसार पहले परमाणु हमला नहीं किया जाता, लेकिन अगर हमला होता है तो जवाब देने की पूरी तैयारी रखी जाती है। पनडुब्बियों की भूमिका इसमें खास होती है, क्योंकि वे समुद्र में छिपकर काम करती हैं और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई कर सकती हैं। इसी वजह से एसएफसी में समुद्री ताकत को बहुत अहम माना जाता है।

