📍नई दिल्ली | 30 Jan, 2026, 12:14 PM
India Germany Submarine Deal Project 75I: भारत सरकार और जर्मनी सरकार के बीच एक इंटर-गवर्नमेंटल एग्रीमेंट यानी आईजीए को अंतिम रूप दे दिया गया है, जिससे भारतीय नौसेना के लिए करीब 8 से 10 बिलियन डॉलर की सबमरीन डील का रास्ता साफ हो गया है। यह डील भारतीय नौसेना के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट 75I के तहत की जाएगी, जिसमें देश में ही छह नई पीढ़ी की डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक सबमरींस बनाई जाएंगी।
India Germany Submarine Deal Project 75I: क्या है प्रोजेक्ट 75I
प्रोजेक्ट 75I भारतीय नौसेना का सबसे अहम सबमरीन प्रोग्राम माना जाता है। इसका मकसद ऐसी छह अत्याधुनिक पारंपरिक यानी नॉन-न्यूक्लियर सबमरीन्स को शामिल करना है, जो लंबे समय तक पानी के नीचे रह सकें, बेहद कम आवाज करें और दुश्मन की पकड़ में आए बिना हमला करने में सक्षम हों।
इस प्रोजेक्ट की योजना 2000 के दशक में ही बन गई थी, लेकिन तकनीकी शर्तों, नीतिगत बदलावों और इंटरनेशनल साझेदारों के चयन में देरी के कारण यह सालों तक अटका रहा। अब जाकर यह प्रोजेक्ट निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। (India Germany Submarine Deal Project 75I)
भारत और जर्मनी की साझेदारी
इस डील में भारतीय पक्ष की ओर से मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) को चुना गया है। एमडीएल वही शिपयार्ड है, जिसने पहले कलवरी क्लास (स्कॉर्पीन) सबमरीन्स को भारत में बनाया था। जर्मनी की ओर से इस प्रोजेक्ट में थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (टीकेएमएस) भागीदार है।
टीकेएमएस दुनिया की सबसे अनुभवी सबमरीन डिजाइन कंपनियों में से एक मानी जाती है। भारत के लिए वह अपनी टाइप-214 एनजी सबमरीन का एडवांस्ड और बड़ा वर्जन ऑफर कर रही है, जो करीब 3000 टन क्लास की होगी। (India Germany Submarine Deal Project 75I)
कितनी बड़ी है यह डील
इस डील की अनुमानित कीमत 70 हजार से 72 हजार करोड़ रुपये बताई जा रही है, जबकि कुछ शुरुआती रिपोर्ट्स में इसका आंकड़ा 10 बिलियन डॉलर तक गया था। लागत बढ़ने की वजह इसमें शामिल हाई-एंड टेक्नोलॉजी, लंबी अवधि का सपोर्ट, ट्रेनिंग, लाइफ-साइकल मेंटेनेंस और भारत में पूरा इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम खड़ा करना है।
शुरुआती आरएफपी के समय इस प्रोजेक्ट की लागत करीब 40 हजार करोड़ रुपये मानी जा रही थी, लेकिन समय के साथ इसमें एडवांस्ड फीचर्स जुड़ते गए। (India Germany Submarine Deal Project 75I)
इंटर-गवर्नमेंटल एग्रीमेंट क्यों जरूरी था
यह डील सिर्फ एमडीएल और रक्षा मंत्रालय के बीच नहीं है। इसके पीछे भारत और जर्मनी सरकारों के बीच एक बड़ा आईजीए है। इस एग्रीमेंट के तहत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, एक्सपोर्ट क्लीयरेंस, लॉन्ग-टर्म सपोर्ट और प्रशासनिक गारंटी दी जाएगी।
यही वजह है कि जर्मनी के रक्षा मंत्री के मार्च 2026 के अंत तक भारत आने और इस डील पर अंतिम हस्ताक्षर होने की संभावना जताई जा रही है। (India Germany Submarine Deal Project 75I)
सबमरीन में खास एआईपी तकनीक
इन नई सबमरीन्स की सबसे बड़ी ताकत होगी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआईपी) सिस्टम। यह सिस्टम सबमरीन को बिना सतह पर आए दो से तीन हफ्ते तक पानी के नीचे रहने की क्षमता देता है।
पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन्स को बार-बार ऊपर आकर बैटरी चार्ज करनी पड़ती है, जिससे उनके पकड़े जाने का खतरा बढ़ जाता है। एआईपी सिस्टम इस कमजोरी को खत्म कर देता है और सबमरीन की स्टेल्थ कई गुना बढ़ जाती है।
जर्मनी का फ्यूल-सेल बेस्ड एआईपी सिस्टम दुनिया के सबसे भरोसेमंद सिस्टम्स में गिना जाता है।
ये सबमरीन्स मल्टी-रोल होंगी। यानी इन्हें दुश्मन के जहाजों पर हमला करने, दूसरी सबमरीन्स का शिकार करने, खुफिया जानकारी जुटाने और जरूरत पड़ने पर लैंड-अटैक मिशन के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकेगा।
इनमें एडवांस्ड टॉरपीडो, एंटी-शिप मिसाइल्स और आधुनिक सेंसर्स लगाए जाएंगे। सबमरीन की आवाज बेहद कम होगी, जिससे दुश्मन के सोनार के लिए इन्हें ट्रैक करना मुश्किल होगा। (India Germany Submarine Deal Project 75I)
भारत में ही बनेगी हर सबमरीन
प्रोजेक्ट 75I की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सभी छह सबमरीन्स भारत में ही बनाई जाएंगी। मझगांव डॉक में इनके लिए अलग से इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा।
इससे हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा और देश में सबमरीन निर्माण से जुड़ी सप्लाई चेन मजबूत होगी। छोटे-मझोले उद्योगों को भी इसमें काम मिलेगा। (India Germany Submarine Deal Project 75I)
डिलीवरी टाइमलाइन
डील साइन होने के बाद पहली सबमरीन के नौसेना में शामिल होने में करीब सात साल लगेंगे। यानी अगर मार्च 2026 में समझौता हो जाता है, तो पहली सबमरीन 2032-33 के आसपास सेवा में आएगी।
स्टील कटिंग का काम 2026 के अंत तक शुरू हो सकता है और 2031 तक ट्रायल्स पूरे किए जाएंगे। (India Germany Submarine Deal Project 75I)
भारतीय नौसेना को क्यों है इसकी सख्त जरूरत
भारतीय नौसेना इस समय अंडरवॉटर प्लेटफॉर्म्स की भारी कमी से जूझ रही है। किलो क्लास यानी सिंधु सीरीज की सबमरीन्स अपनी सर्विस साइकिल के अंतिम चरण में हैं और एक-एक कर रिटायर हो रही हैं।
पिछले 20 वर्षों में नौसेना को सिर्फ छह नई सबमरीन्स मिली हैं, जो कलवरी क्लास की हैं। वहीं चीन लगातार बड़ी संख्या में नई सबमरीन्स शामिल कर रहा है और पाकिस्तान भी अपनी अंडरवॉटर क्षमता बढ़ा रहा है। ऐसे में प्रोजेक्ट 75I भारतीय नौसेना के लिए लाइफलाइन साबित हो सकता है।
साथ ही, यह डील भारत और जर्मनी के रिश्तों को नई ऊंचाई देगी। यह दोनों देशों के बीच अब तक का सबसे बड़ा रक्षा सहयोग प्रोजेक्ट होगा। साथ ही, यह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों को संतुलित करने में भारत की मदद करेगा। (India Germany Submarine Deal Project 75I)


