📍नई दिल्ली | 26 Mar, 2026, 9:28 PM
BrahMos Missile 800 km: भारतीय सेना अब अपनी स्ट्राइक क्षमता को और मजबूत करने के लिए 800 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक मार करने वाली ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों का बड़ा ऑर्डर देने की तैयारी कर रही है। अभी तक सेना के पास जो ब्रह्मोस मिसाइलें हैं, उनकी रेंज करीब 450 किलोमीटर तक है, लेकिन अब उसे और लंबी दूरी तक सटीक हमला करने की जरूरत महसूस हो रही है।
रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, इस प्रस्ताव पर जल्द ही एक उच्चस्तरीय बैठक में फैसला लिया जा सकता है। यह फैसला ऐसे समय में लिया जा रहा है जब दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे संघर्षों में जमकर लंबी दूरी की मिसाइलें इस्तेमाल की जा रहीं हैं।
BrahMos Missile 800 km: ब्रह्मोस मिसाइल क्यों खास है
ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, यानी यह आवाज की गति से कई गुना ज्यादा रफ्तार से उड़ती है। इसकी स्पीड इतनी ज्यादा होती है कि दुश्मन के पास इसे रोकने के लिए बहुत कम समय बचता है। यह मिसाइल जमीन से जमीन, जहाज से जहाज और हवा से जमीन तक अलग-अलग तरह के टारगेट पर हमला कर सकती है।
इस मिसाइल को भारत और रूस ने मिलकर डेवलप किया है। समय के साथ इसमें कई बदलाव किए गए हैं और अब इसके ज्यादातर हिस्से भारत में ही बनाए जा रहे हैं। यह मिसाइल बेहद सटीक मानी जाती है और अपने टारगेट को बहुत कम गलती के साथ भेद सकती है। (BrahMos Missile 800 km)
अब क्यों बढ़ाई जा रही है रेंज
सेना के पास पहले से मौजूद 450 किलोमीटर रेंज वाली मिसाइलें अपने काम में प्रभावी रही हैं, लेकिन अब बदलते युद्ध के तरीके को देखते हुए लंबी दूरी से हमला करने की जरूरत बढ़ गई है। 800 किलोमीटर से ज्यादा रेंज वाली मिसाइल का मतलब है कि सेना दुश्मन के अंदरूनी इलाकों तक बिना आगे बढ़े ही हमला कर सकती है।
इससे सैनिकों को सीमा के पास जाने की जरूरत कम होगी और दूर से ही अहम ठिकानों को निशाना बनाया जा सकेगा। लंबी दूरी की मिसाइलें खास तौर पर एयर बेस, कमांड सेंटर और लॉजिस्टिक हब जैसे टारगेट को नष्ट करने में इस्तेमाल होती हैं। (BrahMos Missile 800 km)
ऑपरेशन सिंदूर में दिखी ताकत
पिछले साल मई में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ब्रह्मोस मिसाइलों का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया गया था। इस ऑपरेशन में भारतीय सेना और वायुसेना ने मिलकर पाकिस्तान के कई एयर बेस और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। मिसाइलें बहुत कम समय में अपने टारगेट तक पहुंचीं और बड़े नुकसान का कारण बनीं। इस अनुभव के बाद सेना के अंदर यह भरोसा और मजबूत हुआ कि ब्रह्मोस जैसे हथियार भविष्य के युद्ध में बेहद अहम भूमिका निभा सकते हैं।
नई पीढ़ी के युद्ध की तैयारी
भारतीय सेना अब सिर्फ पारंपरिक हथियारों पर निर्भर नहीं रहना चाहती। बदलते समय के साथ सेना अपनी रणनीति में बड़े बदलाव कर रही है। अब फोकस ऐसे हथियारों पर है जो तेजी से, सटीक और दूर से हमला कर सकें।
इसी के तहत ड्रोन और मिसाइलों की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। सेना अपने अलग-अलग रेजिमेंट में खास ड्रोन यूनिट तैयार कर रही है। ये ड्रोन निगरानी के साथ-साथ हमले में भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
इसके साथ ही एक अलग मिसाइल फोर्स तैयार करने की भी योजना पर काम चल रहा है। इसका मकसद यह है कि जरूरत पड़ने पर बड़ी संख्या में मिसाइलों का इस्तेमाल किया जा सके। (BrahMos Missile 800 km)
सेना खुद भी बना रही है ड्रोन
सेना ने अपने वर्कशॉप में ड्रोन बनाना भी शुरू कर दिया है। इनका उत्पादन बड़े स्तर पर किया जा रहा है, ताकि बाहर पर निर्भरता कम की जा सके। छोटे और मध्यम आकार के ड्रोन अब सेना की रोजमर्रा की जरूरत का हिस्सा बन चुके हैं।
इन ड्रोन का इस्तेमाल सीमा पर निगरानी, दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और जरूरी जानकारी जुटाने के लिए किया जाता है। कई मामलों में इन्हें हमले के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है। (BrahMos Missile 800 km)
तीनों सेनाओं के पास है ब्रह्मोस
ब्रह्मोस मिसाइल सिर्फ सेना ही नहीं, बल्कि नौसेना और वायुसेना के पास भी मौजूद है। नौसेना इसे जहाजों से दागती है, जबकि वायुसेना इसे फाइटर विमान से लॉन्च करती है। सेना के पास इसका जमीन से दागने वाला वर्जन है। इस मिसाइल की खासियत यह है कि इसे अलग-अलग प्लेटफॉर्म से इस्तेमाल किया जा सकता है। यही वजह है कि यह तीनों सेनाओं के लिए एक अहम हथियार बन चुका है। (BrahMos Missile 800 km)
ब्रह्मोस का अगला वर्जन भी तैयार
ब्रह्मोस का एक नया और हल्का वर्जन भी तैयार किया जा रहा है, जिसे ब्रह्मोस नेक्स्ट जेनरेशन कहा जाता है। यह मौजूदा मिसाइल से छोटा और हल्का होगा, जिससे इसे ज्यादा तरह के फाइटर विमान में लगाया जा सकेगा। खासतौर पर स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान में इसे लगाने की योजना है। इससे वायुसेना की मारक क्षमता और बढ़ जाएगी और कम दूरी में ज्यादा मिसाइलें ले जाई जा सकेंगी।
ब्रह्मोस मिसाइल के उत्पादन में अब भारत की भूमिका पहले से ज्यादा बढ़ गई है। इसके कई हिस्से अब देश में ही बनाए जा रहे हैं। इससे उत्पादन तेज हुआ है और लागत भी कम हुई है। लखनऊ समेत कई जगहों पर इसके निर्माण और परीक्षण के लिए सुविधाएं तैयार की गई हैं। इससे सेना को समय पर मिसाइलें मिल पा रही हैं और जरूरत के हिसाब से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। (BrahMos Missile 800 km)

