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Saturday, August 30, 2025
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Bactrian Camels: लद्दाख में सेना की मदद करेंगे ये खास ऊंट, हाई-एल्टीट्यूड इलाकों में इन साइलेंट वर्कहॉर्स से मिलेगी लास्ट माइल कनेक्टिविटी

लद्दाख में भारतीय सेना का ‘डबल-हंप्ड’ ऊंट लॉजिस्टिक्स मिशन में हुआ शामिल

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भारतीय सेना ने लगभग एक दशक तक चले परीक्षण और मूल्यांकन के बाद आखिरकार डबल-हंप्ड बैक्ट्रियन ऊंट (Bactrian Camel) को लद्दाख के दुर्गम और ऊंचाई वाले इलाकों में लॉजिस्टिक्स और पेट्रोलिंग के लिए औपचारिक रूप से शामिल कर लिया है। यह फैसला न केवल सेना के लॉजिस्टिक नेटवर्क में बदलाव लाएगा, बल्कि हाई-एल्टीट्यूड ऑपरेशन्स में एक नई क्षमता भी जोड़ेगा...
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📍नई दिल्ली/लेह | 6 Aug, 2025, 4:12 PM

Bactrian Camels: लद्दाख के कठिन और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में रसद पहुंचाने और पेट्रोलिंग के लिए भारतीय सेना ने लद्दाख के नुब्रा इलाके के विश्व प्रसिद्ध दो कूबड़ वाले बैक्ट्रियन ऊंटों को औपचारिक रूप से अपने सिस्टम में शामिल किया है। लगभग एक दशक तक चले ट्रायल्स के बाद सेना ने यह फैसला किया है। वहीं, इन ऊंटों की खूबी है कि ये ऊंट लद्दाख की परिस्थितियों के लिए अनुकूल हैं और ऊंचाई वाले इलाकों में बिना किसी परेशानी के काम कर सकते हैं। वहीं सेना के इस फैसले के बाद सेना के लॉजिस्टिक नेटवर्क में बढ़ोतरी होगी और हाई-एल्टीट्यूड ऑपरेशंस की क्षमता बढ़ेगी।

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Bactrian Camels: कैसे हुई शुरुआत?

साल 2016 में सेना ने को जरूरत महसूस हुई कि उन्हें एक ऐसा लॉजिस्टिक प्लेटफॉर्म चाहिए जो लद्दाख के ऊंचे और कठिन इलाकों में भारी सामान ढो सके, मौसम की चुनौतियों को झेल सके और सीमावर्ती चौकियों तक ‘लास्ट माइल’ डिलीवरी कर सके।

इसी के बाद डीआरडीओ की लद्दाख में लैब डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ हाई एल्टीट्यूड रिसर्च (DIHAR) ने रिमाउंट एंड वेटरिनरी कॉर्प्स (RVC) के साथ मिलकर एक रिसर्च प्रोजेक्ट शुरू किया। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य यह जाानना था कि क्या बैक्ट्रियन ऊंटों को ट्रेनिंग देकर ऊंचाई वाले इलाकों में सेना की ड्यूटी के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

Bactrian Camels: लद्दाख में रसद की चुनौतियां

लद्दाख की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। कई बार यहां की ऊंची चोटियों, ठंडे मौसम और दुर्गम इलाकों में सेना को रसद पहुंचाने के लिए कई दिक्कतों को सामना करना पड़ता है। पिछले कुछ दशकों में लद्दाख में सड़कों का एक व्यापक जाल बिछाया गया है, लेकिन दूरदराज के चौकियों तक “लास्ट-माइल कनेक्टिविटी” अभी भी कुली पोर्टर्स और खच्चरों पर निर्भर है।

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हाल के सालों में, सेना में ड्रोन और रोबो म्यूल्स का भी इस्तेमाल लॉजिस्टिक्स के लिए किया जा रहा है। लेकिन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कई बार विजिबिलिटी न होने से ड्रोन काम नहीं कर पाते। इसके अलावा, ड्रोन और रेडियो-कंट्रोल इक्विपमेंट्स दुश्मन के जवाबी हमलों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। इन समस्याओं को सुलझाने के लिए बैक्ट्रियन ऊंट अच्छा विकल्प हैं। सूत्रों ने बताया कि लद्दाख जैसे इलाकों में जहां सड़क नेटवर्क होने के बावजूद ‘लास्ट माइल’ चौकियों तक पहुंचना कठिन है, वहां बैक्ट्रियन ऊंट सेना के लिए एक साइलेंट वर्कहॉर्स बन सकते हैं।

Bactrian Camels की खूबियां

बैक्ट्रियन ऊंटों का वैज्ञानिक नाम कैमेलस बैक्ट्रियानस है। ये ऊंट मध्य एशिया का मूल निवासी है। ये ऊंट अपने दो कूबड़ों और छह फीट से कम ऊंचाई के लिए पहचाने जाते हैं। पुराने समय में ये ऊंट सिल्क रूट पर व्यापार के लिए महत्वपूर्ण साधन थे, जो मध्य एशिया को तिब्बत और भारत के लद्दाख से जोड़ता था। व्यापारिक मार्ग बंद होने के बाद कई ऊंटों को व्यापारियों ने लद्दाख के जंगलों में छोड़ दिया था। आज ये ऊंट विलुप्तप्राय प्रजाति (एंडेंजर्ड स्पीशीज) की सूची में हैं और लद्दाख में इनकी संख्या कुछ सौ तक सीमित है। वर्तमान में, ये मुख्य रूप से नुब्रा घाटी में पर्यटकों को सवारी (टूरिस्ट राइड्स) के लिए उपयोग किए जाते हैं।

बैक्ट्रियन ऊंटों की खासियत उनकी हाइपोक्सिया (कम ऑक्सीजन) और अत्यधिक ठंड में जीवित रहने की क्षमता है। ये ऊंट 150-200 किलोग्राम वजन को 14,000 फीट की ऊंचाई पर ऱबड़-खाबड़ रस्तों पर आसानी से ढो सकते हैं, जबकि म्यूल और पोनी केवल 60-80 किलोग्राम वजन ही ले जा सकते हैं। इतना ही नहीं, इन ऊंटों को कम भोजन और देखभाल की जरूरत होती है। वहीं, इनके साथ इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग का भी खतरा नहीं है।

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सेना में शामिल होने की प्रक्रिया

डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ हाई एल्टीट्यूड रिसर्च के अपने अनुसंधान के दौरान RVC के साथ मिल कर ऊंटों को कमांड एंड बिहेवियरल संबंधी ट्रेनिंग दी। उनका फिजिकल मेजरमेंट, एडॉप्टेशन फिजियोलॉजी और विभिन्न इलाकों व ऊंचाइयों पर भार ढोने की सहनशक्ति का अध्ययन किया गया। कुछ बैक्ट्रियन ऊंटों को सेना की यूनिट्स में भेजा गया, जहां उनका लोड कैरिंग ट्रायल हुआ, जिसमें अलग-अलग टेरेन पर वजन ढोने की क्षमता को जांचा गया। इसके अलावा उन्होंने पेट्रोलिंग, वजन ढोने और युद्ध के हालात जैसे टेस्ट (बैटल इनोकुलेशन टेस्ट्स) किए गए। इन परीक्षणों में यह देखा गया कि ये ऊंट बैटल कंडीशन ट्रेनिंग यानी गोलीबारी, धमाकों, धुएं और युद्ध जैसी की परिस्थितियों में कैसी प्रतिक्रिया करते हैं। वहीं, कुछ बैक्ट्रियन ऊंटों को ईस्टर्न लद्दाख में फॉरवर्ड लोकेशंस पर भी भेजा गया ताकि वास्तविक ऑपरेशनल कंडीशन्स में उनकी परफॉर्मेंस को परखा जा सके।

DIHAR के वैज्ञानिकों ने पाया कि ये ऊंट न केवल भारी वजन ढो सकते हैं, बल्कि युद्ध के माहौल में भी प्रशिक्षित होकर अच्छा प्रदर्शन करते हैं। इस सफलता के बाद, कुछ हफ्ते पहले DIHAR ने 14 प्रशिक्षित और तैनाती के लिए तैयार बैक्ट्रियन ऊंटों को सेना की 14 कोर यानी फायर एंड फ्यूरी को सौंपा। इसके साथ ही, ऊंटों की ट्रेनिंग और मैनेजमेंट के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर्स और हेल्थ रिकॉर्ड भी सौंपे। सेना का कहना है कि कम भोजन और कम देखभाल के चलते ये ऊंट सेना के लिए कॉस्ट-इफेक्टिव साबित हो सकते हैं।

रेगिस्तानी ऊंटों से ज्यादा बेहतर

DIHAR ने बैक्ट्रियन ऊंटों की क्षमताओं को बेहतर समझने के लिए राजस्थान से तीन रेगिस्तानी ऊंटों (सिंगल-हंप्ड कैमल्स) को लेह लाया गया। रेगिस्तानी ऊंटों का इस्तेमाल सीमा सुरक्षा बल (BSF) राजस्थान और गुजरात में किया जाता है। दोनों की तुलना में पाया गया कि बैक्ट्रियन ऊंट लद्दाख की ठंडी और कम ऑक्सीजन वाली परिस्थितियों में रेगिस्तानी ऊंटों की तुलना में कहीं बेहतर प्रदर्शन करते हैं। उनकी दो कूबड़ों में संचित वसा (फैट) उन्हें लंबे समय तक एनर्जी देती है, जिससे वे लद्दाख के लिए अधिक उपयुक्त हैं।

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ITBP की भी है तैयारी

सेना के अलावा, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) भी बैक्ट्रियन ऊंटों के इस्तेमाल का सोच रही है। लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर तनाव और रणनीतिक महत्व को देखते हुए, ये ऊंट सेना और ITBP के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। खास तौर पर उन इलाकों में जहां सड़कें नहीं पहुंचतीं या मौसम उपकरणों को प्रभावित करता है, वहां ये ऊंट महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

संरक्षण में मिलेगी मदद

लद्दाख में बैक्ट्रियन ऊंटों का इस्तेमाल फिलहाल अभी तक पर्यटन तक ही सीमित था। नुब्रा घाटी में पर्यटक इन ऊंटों पर सवारी का आनंद लेते हैं। वहीं, अगर सेना इनकाा इस्तेमाल करती है, तो इनके संरक्षण में भी मदद मिलेगी। करेगा, बल्कि इनकी उपयोगिता को एक नए स्तर पर ले जाएगा। यह कदम न केवल सैन्य रसद को मजबूत करेगा, बल्कि इस विलुप्तप्राय प्रजाति के प्रति जागरूकता भी बढ़ाएगा।

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हरेंद्र चौधरी
हरेंद्र चौधरीhttp://harendra@rakshasamachar.com
हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवादों, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं। 📍 Location: New Delhi, in 🎯 Area of Expertise: Defence, Diplomacy, National Security

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