📍नई दिल्ली | 1 Apr, 2026, 1:05 PM
Rafale Source Code India: भारतीय वायुसेना के लिए खरीदे जा रहे राफेल लड़ाकू विमानों को लेकर फ्रांस ने साफ कर दिया है कि वह भारत को राफेल फाइटर जेट के अहम सोर्स कोड तक पहुंच नहीं देगा। यह जानकारी फ्रांस के बिजनेस आउटलेट L’Essentiel de l’Éco ने अपनी एक रिपोर्ट में दी है।
रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस ने खास तौर पर तीन अहम सिस्टम्स के सोर्स कोड देने से इनकार किया है। इनमें राफेल का एडवांस एईएसए रडार, मिशन कंप्यूटर सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट शामिल हैं।
इन सिस्टम्स को किसी भी फाइटर जेट का “दिमाग” माना जाता है। यही सिस्टम तय करते हैं कि विमान कैसे दुश्मन को पहचानता है, कैसे प्रतिक्रिया देता है और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में खुद को कैसे सुरक्षित रखता है।
फ्रांस का कहना है कि ये तकनीक बेहद संवेदनशील है और इसे कई सालों की मेहनत से तैयार किया गया है, इसलिए इसे साझा नहीं किया जा सकता।
Rafale Source Code India: क्या होता है सोर्स कोड और क्यों है जरूरी
सोर्स कोड किसी भी सिस्टम का वह मूल सॉफ्टवेयर होता है, जिसके जरिए वह पूरे जहाज को कंट्रोल करता है। अगर किसी देश के पास इसका एक्सेस होता है, तो वह सिस्टम में अपनी जरूरत के हिसाब से बदलाव कर सकता है।
लेकिन अगर सोर्स कोड नहीं मिलता, तो हर बदलाव के लिए मूल निर्माता कंपनी या देश पर निर्भर रहना पड़ता है। राफेल के मामले में इसका मतलब यह होगा कि भारत को हर बड़े बदलाव के लिए फ्रांस की मंजूरी लेनी होगी।
स्वदेशी हथियार जोड़ने में आ सकती है दिक्कत
इस फैसले का असर भारत के अपने हथियार सिस्टम पर भी पड़ सकता है। भारत लंबे समय से अपने स्वदेशी हथियार जैसे अस्त्र मिसाइल या ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल को अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर जोड़ने की कोशिश कर रहा है।
लेकिन अगर राफेल के सॉफ्टवेयर पर पूरा कंट्रोल नहीं होगा, तो ऐसे हथियारों को सीधे जोड़ना आसान नहीं होगा। इसके लिए बार-बार फ्रांसीसी कंपनियों से अनुमति और तकनीकी सहयोग लेना पड़ेगा। (Rafale Source Code India)
बड़े राफेल सौदे पर भी असर
यह मुद्दा उस समय सामने आया है जब भारत 114 नए रफाल फाइटर जेट खरीदने की योजना पर काम कर रहा है। इस प्रोजेक्ट को मल्टी रोल फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोग्राम कहा जाता है।
इस संभावित डील की कीमत काफी बड़ी बताई जा रही है और इसमें राफेल भी एक प्रमुख विकल्प माना जा रहा है। लेकिन सोर्स कोड न मिलने की स्थिति में भारत के लिए परेशानी खड़ी हो सकती है।
2016 में भारत और फ्रांस के बीच 36 राफेल विमान का सौदा हुआ था। यह सौदा तत्काल जरूरतों को देखते हुए किया गया था। लेकिन इसमें भी सोर्स कोड एक्सेस का विकल्प शामिल नहीं था। यानी भारत को विमान तो मिले, लेकिन उसके सभी सिस्टम पर पूरा नियंत्रण नहीं मिला। (Rafale Source Code India)
ऑपरेशन के दौरान क्या असर पड़ सकता है
अगर किसी विमान के सॉफ्टवेयर पर पूरा कंट्रोल नहीं होता है, तो युद्ध के समय तेजी से बदलाव करना मुश्किल हो सकता है। खासकर इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर जैसे मामलों में, जहां हर सेकंड की अहमियत होती है।
रडार की सेटिंग बदलना, जामिंग सिस्टम को अपडेट करना या नए खतरे के हिसाब से प्रतिक्रिया देना, ये सभी काम सॉफ्टवेयर पर निर्भर होते हैं। ऐसे में बार-बार फ्रांस की मंजूरी लेने से समय लग सकता है।
हालांकि फ्रांस का यह रुख पूरी तरह अलग नहीं है। दुनिया के कई देश अपनी संवेदनशील तकनीक और सॉफ्टवेयर को साझा करने से बचते हैं। इसका मकसद अपनी तकनीकी बढ़त बनाए रखना और सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को कम करना होता है।
पूरा सोर्स कोड नहीं, API मॉडल की पेशकश
इससे पहले खबरें आई थीं कि फ्रांस की तरफ से एक बीच का रास्ता भी सामने आया है, जिसे एपीआई यानी एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस कहा जाता है। इस मॉडल में भारत को पूरा सोर्स कोड नहीं मिलेगा, लेकिन इतना एक्सेस दिया जाएगा कि वह अपने सिस्टम और हथियार जोड़ सके। इसे आसान भाषा में “प्लग एंड प्ले” तरीका कहा जा सकता है। इसमें जेट के असली सॉफ्टवेयर को छुए बिना नए हथियार या सिस्टम जोड़े जाते हैं। यानी भारत सीधे सॉफ्टवेयर में बदलाव नहीं करेगा, बल्कि एक इंटरफेस के जरिए काम करेगा। (Rafale Source Code India)
नेटवर्क वॉरफेयर है समय की जरूरत
राफेल जैसे आधुनिक विमान नेटवर्क आधारित युद्ध का हिस्सा होते हैं। इसमें अलग-अलग प्लेटफॉर्म आपस में जुड़कर काम करते हैं और रियल टाइम में जानकारी साझा करते हैं। इसे नेट-सेंट्रिक वारफेयर कहा जाता है। इसमें सॉफ्टवेयर और डेटा लिंक की भूमिका बहुत अहम होती है। भारत चाहता है कि उसके विमान भारतीय और विदेशी दोनों तरह के सिस्टम के साथ आसानी से काम कर सकें।
बता दें कि भारत और फ्रांस के बीच 114 राफेल फाइटर जेट की नई डील को लेकर चर्चा चल रही है। 114 अतिरिक्त राफेल जेट्स की खरीद को प्रारंभिक मंजूरी यानी एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी – एओएन दी जा चुकी है। यह डील करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की है। इसके साथ ही नौसेना के लिए 26 राफेल-मरीन भी पहले ही तय किए जा चुके हैं। 114 राफेल में से 18 राफेल सीधे फ्रांस से फ्लाई अवे कंडीशन में 2030 तक आएंगे, जबकि बाकी बचे 90-96 राफेल मेक इन इंडिया के तहत भारत में असेंबल या निर्मित होंगे। भारत में बने राफेल की डिलीवरी 2031-2032 से शुरू हो सकती है। (Rafale Source Code India)

