📍नई दिल्ली | 26 Feb, 2026, 5:58 PM
Rafale Source Code Explained: भारत और फ्रांस के बीच 114 राफेल फाइटर जेट की नई डील को लेकर चर्चा चल रही है। 114 अतिरिक्त राफेल जेट्स की खरीद को प्रारंभिक मंजूरी यानी एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी – एओएन दी जा चुकी है। यह डील करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की है। लेकिन इस बार मुद्दा सिर्फ फाइटर जेट खरीद का नहीं, बल्कि उसके “सोर्स कोड” को लेकर है। रिपोर्ट्स में कहा गया है कि फ्रांस राफेल के कुछ महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर का सोर्स कोड भारत को देने के लिए तैयार नहीं है। इसके बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या इससे भारत की ऑपरेशनल क्षमता पर असर पड़ेगा और क्या भारत अपनी स्वदेशी मिसाइलों जैसे अस्त्र और ब्रह्मोस एनजी को राफेल पर लगा पाएगा या नहीं।
यह पूरा मामला इसलिए भी अहम है 114 अतिरिक्त राफेल फाइटर जेट खरीद को अब तक की सबसे बड़ी डिफेंस डील कहा जा रहा है। इसके साथ ही नौसेना के लिए 26 राफेल-मरीन भी पहले ही तय किए जा चुके हैं। 114 राफेल में से 18 राफेल सीधे फ्रांस से फ्लाई अवे कंडीशन में 2030 तक आएंगे, जबकि बाकी बचे 90-96 राफेल मेक इन इंडिया के तहत भारत में असेंबल या निर्मित होंगे। भारत में बने राफेल की डिलीवरी 2031-2032 से शुरू हो सकती है। (Rafale Source Code Explained)
Rafale Source Code Explained: क्या होता है राफेल का सोर्स कोड
राफेल फाइटर जेट का सोर्स कोड उसके सॉफ्टवेयर सिस्टम का मूल हिस्सा होता है। यही सॉफ्टवेयर जेट के रडार, सेंसर, हथियार और मिशन कंप्यूटर को कंट्रोल करता है। आसान भाषा में समझें तो यह जेट का “दिमाग” होता है।
फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन और थेल्स ने इस सॉफ्टवेयर को कई सालों में डेवलप किया है। इसलिए इसे वे अपनी “प्रोप्राइटरी टेक्नोलॉजी” मानते हैं। इसी कारण फ्रांस किसी भी देश को पूरा सोर्स कोड देने से बचता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अगर पूरा सोर्स कोड नहीं मिलता है तो खरीदने वाला देश खुद से जेट के सॉफ्टवेयर में बदलाव नहीं कर सकता और उसे हर बदलाव के लिए निर्माता पर निर्भर रहना पड़ता है। जिसके लिए कंपनी अलग से रकम वसूलती है या कई बार इनकार भी कर देती है। (Rafale Source Code Explained)
क्या फ्रांस ने मना किया सोर्स कोड के लिए
सूत्रों के मुताबिक फ्रांस का कहना है कि राफेल के कोर सिस्टम जैसे SPECTRA इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट और मिशन सॉफ्टवेयर अत्यंत संवेदनशील हैं। इन्हें साझा करना राष्ट्रीय सुरक्षा और इंडस्ट्री के हितों के खिलाफ हो सकता है। बता दें कि दुनिया में कोई भी जेट बनाने वाली कंपनी सोर्स कोड मुहैया नहीं कराती है।
इसी वजह से फ्रांस केवल सीमित एक्सेस देने के पक्ष में है, जिसे API यानी एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि भारत को पूरा सोर्स कोड नहीं मिलेगा, लेकिन सिस्टम के साथ काम करने के लिए जरूरी इंटरफेस उपलब्ध कराया जाएगा। (Rafale Source Code Explained)
API मॉडल क्या है और कैसे काम करता है
API मॉडल को आसान भाषा में “प्लग एंड प्ले” सिस्टम कहा जा सकता है। इसमें जेट के मूल सॉफ्टवेयर को छुए बिना नए हथियार या सिस्टम को जोड़ा जा सकता है।
इस मॉडल में भारतीय इंजीनियर सीधे सॉफ्टवेयर को नहीं बदलते, बल्कि एक इंटरफेस के जरिए अपने सिस्टम को जोड़ते हैं। इससे सुरक्षा भी बनी रहती है और जरूरत के हिसाब से बदलाव भी संभव होता है।
सूत्रों का कहना है कि भारतीय इंजीनियरों को जरूरी इंटरफेस (डेटा लिंक, रडार कम्युनिकेशन, कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम) तक बिना कोर सॉफ्टवेयर को छेड़े नियंत्रित एक्सेस मिलेगा।
यूएई जैसे देश पहले ही इस मॉडल का इस्तेमाल कर रहे हैं और उन्होंने अपने हथियारों को राफेल के साथ जोड़ने में सफलता हासिल की है। (Rafale Source Code Explained)
क्या अस्त्र-रूद्रम मिसाइल राफेल पर लग सकेंगी?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत की स्वदेशी अस्त्र-रूद्रम मिसाइलें राफेल पर लगाई जा सकेंगी। इस पर रक्षा सूत्रों के अनुसार जवाब हां है। अस्त्र बियोंड-विजुअल-रेंज एयर टू एयर मिसाइल है।
भारत और फ्रांस के बीच चल रही बातचीत में यह तय किया जा रहा है कि भारत को अपने हथियार राफेल पर लगाने की अनुमति मिलेगी। इसके लिए API और सॉफ्टवेयर अपग्रेड का इस्तेमाल किया जाएगा।
राफेल पर अस्त्र मिसाइल लगाने की तैयारी पहले से ही चल रही है। भारतीय नौसेना के लिए जो 26 राफेल-मरीन विमान खरीदे जा रहे हैं, उनकी डील में ही अस्त्र एमके1 मिसाइल का इंटीग्रेशन शामिल किया गया है। इन विमानों की डिलीवरी साल 2028 से शुरू होने की योजना है। (Rafale Source Code Explained)
वहीं भारतीय वायुसेना के मौजूदा और आने वाले राफेल विमानों पर भी अस्त्र एमके1 और अस्त्र एमके2 दोनों मिसाइलों को लगाने की योजना है। इसके लिए 2028 से ट्रायल्स शुरू होंगे, जिनमें अलग-अलग चरण होंगे जैसे कैरिज टेस्ट, कैप्टिव टेस्ट, रिलीज और लाइव फायरिंग। इन सभी परीक्षणों के लिए एक राफेल विमान को खास तौर पर फ्लाइंग टेस्ट बेड के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा।
अस्त्र मिसाइल पहले ही सुखोई-30 एमकेआई और तेजस जैसे भारतीय फाइटर जेट्स पर सफलतापूर्वक लगाई जा चुकी है। उसी तकनीक और अनुभव का उपयोग अब राफेल पर भी किया जाएगा, जिससे इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाना आसान हो जाता है। (Rafale Source Code Explained)
इस प्रक्रिया में फ्रांसीसी कंपनियां भी शामिल होंगी, जो सॉफ्टवेयर को इस तरह अपडेट करेंगी कि राफेल के रडार और सिस्टम के साथ अस्त्र मिसाइल सही तरीके से काम कर सके।
राफेल के नए वर्जन और उनकी क्षमता
भारत के पास अभी राफेल का F3-R वर्जन है, जिसमें भारत-विशेष कई सुधार किए गए हैं। नए सौदे में जो 114 राफेल आने हैं, वे F4 स्टैंडर्ड के होंगे, जो पहले से ज्यादा आधुनिक माने जाते हैं।
इसके बाद इन्हें भविष्य में F5 स्टैंडर्ड तक अपग्रेड किया जा सकता है, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, नेटवर्क आधारित युद्ध और ड्रोन के साथ काम करने जैसी क्षमताएं शामिल होंगी।
इन नए विमानों में भारत की जरूरत के अनुसार कई बदलाव भी किए जाएंगे, जिनमें कम्युनिकेशन सिस्टम, डेटा लिंक और हथियार इंटीग्रेशन शामिल है। (Rafale Source Code Explained)
मेक इन इंडिया और इंडिजिनाइजेशन
इस डील का एक बड़ा हिस्सा “मेक इन इंडिया” से जुड़ा है। योजना के अनुसार 114 में से 18 विमान सीधे फ्रांस से आएंगे, जबकि बाकी 96 भारत में असेंबल किए जाएंगे।
शुरुआत में लगभग 30 प्रतिशत इंडिजिनस कंटेंट रहेगा, जिसे धीरे-धीरे बढ़ाकर 60 प्रतिशत तक ले जाने की योजना है। भारत चाहता है कि यह आंकड़ा 50 प्रतिशत से ज्यादा हो।
इसके लिए भारतीय कंपनियों की भागीदारी बढ़ाई जाएगी और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर भी जोर दिया जा रहा है। (Rafale Source Code Explained)
सॉफ्टवेयर और नेटवर्क वॉरफेयर की भूमिका
आज के समय में फाइटर जेट सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि सॉफ्टवेयर और डेटा नेटवर्क से भी ताकतवर बनते हैं। राफेल में सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो (SDR) जैसी तकनीक होती है, जिससे अलग-अलग प्लेटफॉर्म आपस में जुड़कर काम कर सकते हैं।
इससे रियल टाइम में जानकारी साझा होती है और कई प्लेटफॉर्म मिलकर एक ही लक्ष्य पर हमला कर सकते हैं। इसे नेट-सेंट्रिक वॉरफेयर कहा जाता है।
भारत चाहता है कि नए राफेल जेट भारतीय और विदेशी दोनों तरह के सिस्टम के साथ आसानी से जुड़ सकें, ताकि ऑपरेशन में तेजी और सटीकता बनी रहे। (Rafale Source Code Explained)
राफेल के अलावा भी, डीआरडीओ इसी तरह के स्वदेशी सॉफ्टवेयर सिस्टम डेवलप करने पर काम कर रहा है, ताकि भारत अपनी तकनीक पर ज्यादा नियंत्रण रख सके।
उदाहरण के तौर पर, हाल ही में लॉन्च किया गया इंडियन रेडियो सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर (IRSA) स्टैंडर्ड 1.0 इस तरह बनाया गया है कि भारत में बने सॉफ्टवेयर-डिफाइंड रेडियो अलग-अलग सैन्य प्लेटफॉर्म पर आसानी से एक साथ काम कर सकें।
इस तरीके से भारत महंगे विदेशी प्लेटफॉर्म को एक फिक्स सिस्टम की तरह नहीं, बल्कि एक फ्लेक्सिबल सिस्टम की तरह इस्तेमाल कर रहा है, जिसमें जरूरत के हिसाब से बदलाव किए जा सकते हैं। इससे आज के समय में, जहां सॉफ्टवेयर की तेजी और अपडेट बहुत अहम हो गए हैं, भारत अपनी सैन्य क्षमता को मजबूत बनाए रख सकता है। (Rafale Source Code Explained)
ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी जरूरत
मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह मुद्दा और ज्यादा चर्चा में आया। कुछ विशेषज्ञों का मानना था कि अगर भारत के पास पूरा सॉफ्टवेयर कंट्रोल होता तो वह तेजी से बदलाव कर सकता था।
हालांकि भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर इस तरह की किसी कमी को स्वीकार नहीं किया है। फिर भी, इस अनुभव के बाद भारत अब ज्यादा टेक्नोलॉजी कंट्रोल चाहता है। (Rafale Source Code Explained)
कई देशों के पास है राफेल
भारत लंबे समय से फ्रांस का बड़ा रक्षा साझेदार रहा है। कई देशों जैसे मिस्र, कतर और ग्रीस ने भी राफेल खरीदे हैं, लेकिन वे ज्यादातर फ्रांसीसी हथियारों पर निर्भर रहते हैं।
भारत की खासियत यह है कि वह अपने स्वदेशी हथियारों को इन प्लेटफॉर्म पर जोड़ना चाहता है। इसी वजह से सोर्स कोड और सॉफ्टवेयर एक्सेस का मुद्दा अहम हो गया है।
फ्रांस भी भारत के साथ सहयोग बढ़ाने के पक्ष में है, लेकिन वह अपनी कोर टेक्नोलॉजी को सुरक्षित रखना चाहता है। (Rafale Source Code Explained)


