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साइप्रस के ब्रिटिश एयरबेस पर ईरान के ड्रोन हमले का सच आया सामने, कौन रच रहा है ‘फॉल्स फ्लैग’ ऑपरेशंस की साजिश?

ब्रिटेन ने स्पष्ट किया कि यह ड्रोन सीधे ईरान से लॉन्च नहीं किया गया था। इस घटना के बाद क्षेत्र में सुरक्षा एजेंसियों ने जांच तेज कर दी है और एयर डिफेंस सिस्टम को अलर्ट मोड पर रखा गया है...

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📍नई दिल्ली | 5 Mar, 2026, 1:06 PM

US-Iran War: पश्चिमी एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने एक बड़ा खुलासा किया है। मंत्रालय के अनुसार साइप्रस में स्थित ब्रिटिश रॉयल एयर फोर्स के अक्रोटिरी एयरबेस को निशाना बनाकर एक ड्रोन भेजा गया था। शुरुआती जांच में यह ड्रोन ईरानी डिजाइन के शाहेद-टाइप ड्रोन जैसा बताया गया, लेकिन ब्रिटेन ने स्पष्ट किया कि यह ड्रोन सीधे ईरान से लॉन्च नहीं किया गया था। इस घटना के बाद क्षेत्र में सुरक्षा एजेंसियों ने जांच तेज कर दी है और एयर डिफेंस सिस्टम को अलर्ट मोड पर रखा गया है। इससे पहले सऊदी अरब में स्थित अरामको रिफइनरी को लेकर भी कुछ ऐसी ही बातें सामने आई थीं। (US-Iran War)

US-Iran War: ईरान से सीधे लॉन्च नहीं

ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने मध्य पूर्व में चल रहे अपने सैन्य अभियानों पर अपडेट जारी करते हुए इस घटना का उल्लेख किया। मंत्रालय के अनुसार यह ड्रोन 2 मार्च की आधी रात के आसपास अक्रोटिरी एयरबेस की दिशा में भेजा गया था। शुरुआती रिपोर्टों में कहा गया कि यह ड्रोन शाहेद-टाइप डिजाइन का हो सकता है। शाहेद सीरीज के ड्रोन आमतौर पर ईरान से जुड़े माने जाते हैं और कई क्षेत्रीय संघर्षों में इनका इस्तेमाल देखा गया है। हालांकि ब्रिटिश अधिकारियों ने जांच के बाद कहा कि यह ड्रोन ईरान से सीधे लॉन्च नहीं किया गया था। (US-Iran War)

अक्रोटिरी एयरबेस ब्रिटेन का एक महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाना

अक्रोटिरी एयरबेस साइप्रस द्वीप पर स्थित ब्रिटेन का एक महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाना है। इस बेस का इस्तेमाल रॉयल एयर फोर्स द्वारा मध्य पूर्व में निगरानी, एयर ऑपरेशन और अन्य सैन्य गतिविधियों के लिए किया जाता है। ब्रिटेन की सैन्य रणनीति में इस एयरबेस की अहम भूमिका मानी जाती है क्योंकि यह यूरोप और मध्य पूर्व के बीच रणनीतिक स्थिति में स्थित है। इसी कारण इस बेस को निशाना बनाए जाने की घटना को सुरक्षा के दृष्टिकोण से गंभीर माना गया।

ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि ड्रोन की पहचान और उसके लॉन्च स्थान को लेकर विस्तृत जांच की जा रही है। अधिकारियों ने यह भी बताया कि इस घटना में किसी प्रकार का बड़ा नुकसान नहीं हुआ और न ही किसी के घायल होने की सूचना है। हालांकि एहतियात के तौर पर एयरबेस और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत कर दिया गया है। (US-Iran War)

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इस घटना के बाद क्षेत्र में तैनात एयर डिफेंस सिस्टम को हाई अलर्ट पर रखा गया है। ब्रिटेन की सैन्य इकाइयों को निर्देश दिए गए हैं कि वे किसी भी संभावित खतरे के लिए तैयार रहें। सुरक्षा एजेंसियां यह भी जांच कर रही हैं कि ड्रोन किस दिशा से आया और उसके पीछे किस संगठन या समूह की भूमिका हो सकती है।

अक्रोटिरी एयरबेस का इतिहास भी काफी पुराना और रणनीतिक महत्व का रहा है। साइप्रस में ब्रिटेन के दो प्रमुख सैन्य क्षेत्र हैं, जिनमें अक्रोटिरी और डेकलिया शामिल हैं। इन बेसों का उपयोग लंबे समय से ब्रिटिश सैन्य अभियानों के लिए किया जाता रहा है। खास तौर पर मध्य पूर्व में होने वाली गतिविधियों पर नजर रखने के लिए अक्रोटिरी बेस महत्वपूर्ण माना जाता है। (US-Iran War)

अरामको पर हमला: ईरान का हाथ या ‘फॉल्स फ्लैग’?

2 मार्च को सऊदी अरब की रास तनुरा तेल रिफाइनरी पर ड्रोन हमला हुआ। यह दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा सुविधाओं में से एक मानी जाती है। इस हमले के बाद रिफाइनरी के कुछ हिस्सों में आग लग गई और वहां का ऑपरेशन अस्थायी रूप से रोकना पड़ा। सऊदी अधिकारियों ने बताया कि एयर डिफेंस सिस्टम ने दो ड्रोनों को रास्ते में ही मार गिराया था, लेकिन इसके बावजूद हमले से कुछ नुकसान हुआ।

कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में दावा किया गया कि इस हमले में इस्तेमाल किए गए ड्रोन ईरान से जुड़े हो सकते हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह हमला अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के ठिकानों पर किए गए हमलों के जवाब के रूप में किया गया हो सकता है। लेकिन अब इस मामले की भी कलई खुलती नजर आ रही है। (US-Iran War)

ईरान ने इन आरोपों को खारिज करते हुए उल्टा दावा किया कि यह हमला उसकी ओर से नहीं किया गया। ईरान का कहना है कि यह इजराइल की तथाकथित “फॉल्स फ्लैग” कार्रवाई हो सकती है। फॉल्स फ्लैग का मतलब ऐसी कार्रवाई से है जिसमें हमला कोई और करे, लेकिन जिम्मेदारी किसी दूसरे देश या संगठन पर डाल दी जाए। ईरान का आरोप है कि इजराइल इस तरह के हमलों के जरिए खाड़ी देशों को ईरान के खिलाफ युद्ध में शामिल करने की कोशिश कर रहा है।

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ईरानी मीडिया संगठन तस्नीम न्यूज एजेंसी ने भी इसी तरह का दावा किया। एजेंसी के मुताबिक, इजराइल नागरिक ठिकानों पर हो रहे हमलों से ध्यान हटाने के लिए ऐसी कार्रवाई कर सकता है। एजेंसी ने एक खुफिया सोर्स के हवाले से कहा कि ईरान ने पहले ही स्पष्ट किया है कि वह अमेरिका और इजराइल से जुड़े हितों को निशाना बना सकता है, लेकिन अरामको जैसी ऊर्जा सुविधाएं उसकी सूची में नहीं हैं। (US-Iran War)

क्या सऊदी ने हमले के लिए उकसाया था अमेरिका को?

ईरान पर किए गए हमलों से पहले एक दावा सामने आया कि सऊदी अरब ने अमेरिकी प्रशासन को ईरान पर हमला करने के लिए उकसाया था। यह चर्चा खास तौर पर जनवरी और फरवरी 2026 में आई कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के बाद तेज हुई। हालांकि सऊदी अरब ने इन दावों को पूरी तरह गलत बताया।

28 फरवरी को एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से कई निजी फोन कॉल किए थे। इन कॉल्स में कथित तौर पर ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का समर्थन किया गया था। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि इजराइल के साथ मिलकर अमेरिका को हमलों के लिए उकसाया गया। (US-Iran War)

इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि में सऊदी अरब और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव भी महत्वपूर्ण माना जाता है। दोनों देशों के संबंध कई वर्षों से तनावपूर्ण रहे हैं। 2019 में ईरान समर्थित हूतियों ने सऊदी अरब की अरामको रिफाइनरी पर हमला हुआ था, जिसके बाद सऊदी ने अमेरिका से सुरक्षा सहयोग की उम्मीद की थी। इसके बाद 2023 में चीन की मध्यस्थता से दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने की कोशिश हुई और एक समझौता भी हुआ। जनवरी 2026 में सऊदी अरब ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वह ईरान की संप्रभुता का सम्मान करता है और अमेरिका को अपने एयरस्पेस का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देगा।

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लेकिन जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की, तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया। इसी दौरान ईरान की ओर से कुछ जवाबी हमलों की खबरें भी सामने आईं, जिनमें ड्रोन हमले शामिल थे। इन घटनाओं ने क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति को और जटिल बना दिया। (US-Iran War)

इन सभी रिपोर्टों के बाद सऊदी अरब की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया भी आई। सऊदी विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह क्षेत्र में बढ़ते तनाव को लेकर चिंतित है और वह किसी युद्ध का हिस्सा बनने की योजना नहीं बना रहा है। मंत्रालय ने यह भी कहा कि ईरान द्वारा किए गए जवाबी हमलों की वह निंदा करता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसने किसी सैन्य कार्रवाई को बढ़ावा दिया था। (US-Iran War)

सऊदी के कुछ विशेषज्ञों और विश्लेषकों ने भी इन रिपोर्टों को खारिज किया। सऊदी राजनीतिक शोधकर्ता सलमान अल-अंसारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि मीडिया में आई रिपोर्टें पूरी तरह गलत हैं। उनका कहना था कि सऊदी अरब ने हमेशा क्षेत्र में तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान की बात की है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ रिपोर्टों का उद्देश्य सऊदी अरब को युद्ध में शामिल दिखाना था।

विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिमी एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण कई तरह के आरोप-प्रत्यारोप सामने आ रहे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ईरान खाड़ी देशों को निशाना बनाकर अमेरिका और इजराइल पर दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है। वहीं दूसरी तरफ कुछ स्रोत इजराइल को भी जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका दावा है कि इजरायल जानबूझ कर ईरान के पड़ोसी देशों पर हमला करके उन्हें ईरान के खिलाफ खड़ा करना चाहता है। (US-Iran War)

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    रक्षा समाचार न्यूज डेस्क भारत की अग्रणी हिंदी रक्षा समाचार टीम है, जो Indian Army, Navy, Air Force, DRDO, रक्षा उपकरण, युद्ध रणनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक खबरें पेश करती है। हम लाते हैं सटीक, सरल और अपडेटेड Defence News in Hindi। हमारा उद्देश्य है – "हर खबर, देश की रक्षा से जुड़ी।"

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