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अमेरिका-ईरान युद्ध पर प्रोफेसर जियांग का बड़ा दावा, ‘यूएस को करना पड़ सकता है हार का सामना’

प्रोफेसर जियांग ने कहा कि अमेरिकी सैन्य रणनीति लंबे समय तक अत्याधुनिक तकनीक और महंगे हथियारों पर आधारित रही है। उनके अनुसार यह मॉडल शीत युद्ध के दौर में विकसित हुआ था...

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📍नई दिल्ली | 5 Mar, 2026, 11:38 AM

US-Iran War: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई विश्लेषण सामने आ रहे हैं। इसी बीच भू-राजनीति और इतिहास का अध्ययन करने वाले प्रोफेसर जियांग ने एक इंटरव्यू में दावा किया है कि मौजूदा संघर्ष अगर लंबे समय तक चलता है तो अमेरिका के लिए स्थिति मुश्किल हो सकती है।

प्रोफेसर जियांग अपनी ऑनलाइन रिसर्च और विश्लेषण के लिए जाने जाते हैं और वे “प्रिडिक्टिव हिस्ट्री” नाम के एक लोकप्रिय चैनल से जुड़े हैं। इस प्लेटफॉर्म पर वे गेम थ्योरी और ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर वैश्विक राजनीति और युद्ध से जुड़े संभावित घटनाक्रमों का अध्ययन करते हैं।

वे एक चीनी-कनाडाई शिक्षक, लेखक, इतिहासकार और भू-राजनीतिक विश्लेषक हैं, जो बीजिंग (चीन) में रहते और काम करते हैं। 2026 में चल रहे अमेरिका-इजराइल बनाम ईरान संघर्ष के समय भारत और दुनिया भर में उनके यूट्यूब लेक्चर्स और भविष्यवाणियां बहुत वायरल हो रही हैं।

इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा टकराव अब एक लंबे “एट्रिशन वॉर” यानी थकावट वाले युद्ध का रूप ले सकता है। इस तरह के युद्ध में दोनों पक्ष लंबे समय तक एक-दूसरे की सैन्य क्षमता, संसाधनों और आर्थिक ताकत को कमजोर करने की कोशिश करते हैं। (US-Iran War)

US-Iran War: 2024 में की थीं तीन बड़ी भविष्यवाणियां

प्रोफेसर जियांग ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2024 में तीन बड़ी भविष्यवाणियां की थीं। पहली भविष्यवाणी यह थी कि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी चुनाव जीत सकते हैं। दूसरी यह कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की संभावना बढ़ेगी।

उनकी तीसरी और सबसे बड़ी भविष्यवाणी यह थी कि अगर यह युद्ध होता है तो अमेरिका को इसमें गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात को देखकर उन्हें लगता है कि यह संघर्ष अब कई स्तरों पर फैल चुका है और इसमें सिर्फ सैन्य कार्रवाई ही नहीं बल्कि आर्थिक और रणनीतिक दबाव भी शामिल हैं। (US-Iran War)

ईरान की लंबी तैयारी का दावा

प्रोफेसर जियांग के अनुसार ईरान पिछले कई वर्षों से इस तरह के संभावित संघर्ष की तैयारी कर रहा था। उनका कहना है कि ईरान ने लगभग दो दशकों तक अपनी सैन्य रणनीति, मिसाइल क्षमता और क्षेत्रीय सहयोगियों के नेटवर्क को मजबूत किया है।

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उन्होंने दावा किया कि ईरान ने पहले भी कई छोटे संघर्षों और सैन्य घटनाओं के जरिए अमेरिका और इजरायल की सैन्य क्षमता का अध्ययन किया है। इससे उसे अपनी रणनीति तैयार करने में मदद मिली।

जियांग ने कहा कि ईरान इस संघर्ष को केवल सैन्य टकराव के रूप में नहीं देख रहा बल्कि इसे व्यापक आर्थिक और क्षेत्रीय संघर्ष के रूप में देख रहा है। (US-Iran War)

प्रॉक्सी नेटवर्क का इस्तेमाल

प्रोफेसर जियांग के मुताबिक ईरान क्षेत्र में मौजूद अपने सहयोगी संगठनों के जरिए भी रणनीति बना रहा है। उन्होंने कहा कि यमन के हूती समूह, लेबनान के हिज्बुल्लाह, फिलिस्तीन के हमास और इराक में मौजूद शिया मिलिशिया जैसे समूह इस पूरे समीकरण में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

उनका कहना है कि इन संगठनों के जरिए ईरान अमेरिका और उसके सहयोगी देशों पर अलग-अलग क्षेत्रों में दबाव बना सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के नेटवर्क के कारण युद्ध का दायरा एक ही क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता और कई जगहों पर तनाव बढ़ सकता है। (US-Iran War)

ऊर्जा और समुद्री मार्गों पर असर

प्रोफेसर जियांग ने अपने विश्लेषण में यह भी कहा कि मध्य पूर्व का संघर्ष केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं है। इसके असर एनर्जी सप्लाई और वैश्विक व्यापार पर भी पड़ सकते हैं।

उन्होंने बताया कि खाड़ी क्षेत्र के देश वैश्विक तेल बाजार में अहम भूमिका निभाते हैं और यहां के समुद्री रास्ते अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।

जियांग के अनुसार अगर इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार और ऊर्जा ढांचे पर असर पड़ सकता है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव देखने को मिल सकता है। (US-Iran War)

महंगे पड़े रहे मिसाइल और एयर डिफेंस

इंटरव्यू के दौरान उन्होंने युद्ध में इस्तेमाल हो रहे हथियारों की लागत पर भी चर्चा की। उनका कहना था कि कई मामलों में सस्ते ड्रोन या मिसाइलों को रोकने के लिए बहुत महंगे इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि कुछ स्थितियों में एक सस्ता ड्रोन या मिसाइल को गिराने के लिए कई इंटरसेप्टर मिसाइलें दागनी पड़ती हैं, जिनकी कीमत काफी अधिक होती है।

इस तरह के असंतुलन को उन्होंने युद्ध की लागत बढ़ाने वाला एक बड़ा कारक बताया। (US-Iran War)

प्रोफेसर जियांग ने कहा कि अमेरिकी सैन्य रणनीति लंबे समय तक अत्याधुनिक तकनीक और महंगे हथियारों पर आधारित रही है। उनके अनुसार यह मॉडल शीत युद्ध के दौर में विकसित हुआ था।

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उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध में कई बार कम लागत वाले हथियार और ड्रोन भी बड़ी भूमिका निभाने लगे हैं। इससे युद्ध के स्वरूप में बदलाव देखने को मिल रहा है। (US-Iran War)

ग्राउंड ऑपरेशन के बिना सरकार बदलना संभव नहीं

इंटरव्यू में यह सवाल भी उठाया गया कि क्या अमेरिका भविष्य में ईरान के खिलाफ जमीनी अभियान शुरू कर सकता है।

इस पर प्रोफेसर जियांग ने कहा कि केवल हवाई हमलों से किसी देश की सरकार को बदला नहीं जा सकता है। जो ऐसा सोचता है वह बड़ी भूल कर रहा है।

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह का निर्णय पूरी तरह राजनीतिक और सैन्य परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

इससे पहले ट्रंप ने 2 मार्च को न्यूयॉर्क पोस्ट को दिए इंटरव्यू में साफ कहा था कि वे अमेरिकी जमीनी सैनिकों (बूट्स ऑन द ग्राउंड) को ईरान भेजने से पीछे नहीं हटेंगे, अगर जरूरत पड़ी तो। उन्होंने कहा, “मुझे बूट्स ऑन द ग्राउंड से कोई डर नहीं है। हर राष्ट्रपति कहता है कि ‘कोई जमीनी सैनिक नहीं भेजेंगे’। मैं ऐसा नहीं कहता। मैं कहता हूं ‘शायद जरूरत नहीं पड़ेगी’, या ‘अगर जरूरी हुई तो’।” उन्होंने जोड़ा कि ऑपरेशन अभी हवाई और नौसेना से चल रहा है, लेकिन “जरूरत पड़ी तो” ग्राउंड ट्रूप्स भेज सकते हैं। (US-Iran War)

इराक से कुर्द लड़ाकों को ईरान भेजा

कुर्द लड़ाके ईरान की जमीन पर पहुंच चुके हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक इराक के हजारों कुर्द लड़ाके पश्चिमी ईरान में सीमा पार करके दाखिल हुए हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने भी इस बात की पुष्टि फॉक्स न्यूज से बातचीत में की है।

बताया जा रहा है कि इस हफ्ते डोनाल्ड ट्रंप ने खुद कुर्द नेताओं से फोन पर बात की थी। विशेषज्ञों का कहना है कि कुर्द क्षेत्रीय सरकार यानी केआरजी इतनी बड़ी संख्या में लड़ाकों को अंतरराष्ट्रीय सीमा पार नहीं करा सकती, जब तक उसे अमेरिका की लॉजिस्टिक सपोर्ट, हवाई समन्वय और इंटेलिजेंस सहायता न मिले। आधुनिक इतिहास में कुर्दों के लगभग हर सीमा पार सैन्य अभियान में इसी तरह का सहयोग देखा गया है।

हालांकि इस बीच व्हाइट हाउस ने तुरंत यह कह दिया कि अमेरिका ने कुर्द लड़ाकों को हथियार नहीं दिए हैं। वहीं दूसरी तरफ एक वरिष्ठ कुर्द अधिकारी ने मीडिया से कहा कि अभी तक कोई हमला शुरू नहीं हुआ है। (US-Iran War)

इन दोनों बयानों को साथ-साथ देखें तो स्थिति थोड़ी उलझी हुई नजर आती है, क्योंकि एक तरफ अमेरिकी अधिकारी इस गतिविधि की पुष्टि कर रहे हैं और दूसरी तरफ आधिकारिक तौर पर इससे दूरी बनाई जा रही है।

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दरअसल इस पूरे घटनाक्रम को कुछ विशेषज्ञ अलग तरीके से समझा रहे हैं। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने साफ कहा था कि अमेरिका ईरान में अपने सैनिक नहीं भेजेगा। ऐसे में प्रशासन को अगर जमीन पर किसी बल की जरूरत पड़े, तो वह ऐसा बल ढूंढेगा जो अमेरिकी न हो। (US-Iran War)

इराकी कुर्द लड़ाके इस भूमिका में फिट बैठते हैं। वे लंबे समय से ईरान समर्थित मिलिशिया के खिलाफ लड़ते रहे हैं और उनके अपने राजनीतिक और सुरक्षा कारण भी हैं। इसके अलावा वे संगठित हैं, युद्ध का अनुभव रखते हैं और पहले से ही ईरान की सीमा के करीब मौजूद हैं। इस नजरिए से देखा जाए तो यह “नो अमेरिकन बूट्स ऑन द ग्राउंड” वाले वादे का सीधा विरोधाभास नहीं माना जा रहा है। प्रशासन ने यह कहा था कि अमेरिकी सैनिक ईरान की जमीन पर नहीं होंगे। लेकिन कुर्द लड़ाकों के बारे में ऐसी कोई स्पष्ट बात नहीं कही गई थी।

अगर इन रिपोर्ट्स की पुष्टि होती है तो इसका मतलब यह होगा कि जंग की तस्वीर बदल सकती है। अभी तक इसे मुख्य रूप से हवाई हमलों और सीमित सैन्य कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन अगर जमीन पर लड़ाके सक्रिय हो जाते हैं, तो यह संघर्ष एक अलग स्तर का युद्ध बन सकता है। (US-Iran War)

ऐसी स्थिति में यह केवल कुछ हफ्तों का एयर कैंपेन नहीं रहेगा, बल्कि एक लंबा और जटिल जमीनी संघर्ष बन सकता है। यही वजह है कि कई विश्लेषक कह रहे हैं कि अगर यह घटनाक्रम सच साबित होता है, तो मध्य पूर्व का यह टकराव एक बिल्कुल नए चरण में प्रवेश कर सकता है।

प्रोफेसर जियांग ने यह भी कहा कि मध्य पूर्व की राजनीति में कई देशों के अपने-अपने हित होते हैं। उनके अनुसार खाड़ी क्षेत्र के देशों और इजरायल की सुरक्षा चिंताएं अलग-अलग हैं, जबकि ईरान की अपनी क्षेत्रीय रणनीति है। इस कारण क्षेत्रीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों का प्रभाव भी इस संघर्ष पर पड़ सकता है। (US-Iran War)

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