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Trump Pakistan Nuclear Bluff: ट्रंप हर बार फंस जाते हैं पाकिस्तान के परमाणु झांसे में, पीएम मोदी तो पहले ही कर चुके हैं बेनकाब

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कई बार यह दिखा दिया है कि पाकिस्तान का परमाणु खतरा असल में खोखली बयानबाजी है। भारत द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक 2016, बालाकोट एयरस्ट्राइक 2019 और ऑपरेशन सिंदूर 2025 के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि पाकिस्तान ने अपनी परमाणु चेतावनियों को आगे बढ़ाने का साहस नहीं दिखाया...

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📍नई दिल्ली | 4 Nov, 2025, 12:38 PM

Trump Pakistan Nuclear Bluff: अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सीबीएस (CBS) इंटरव्यू में किए गए दावों से फिर एक बार यह संकेत मिलता है कि वाशिंगटन अभी भी पाकिस्तान की परमाणु रणनीति से प्रभावित है। ट्रंप ने दावा किया कि भारत और पाकिस्तान मई 2025 में एक परमाणु युद्ध के बहुत करीब पहुंच गए थे और उन्होंने खुद हस्तक्षेप करके इसे टाल दिया था। उनका कहना था कि उन्होंने दोनों देशों को चेतावनी दी कि अगर वे तुरंत नहीं रुके तो अमेरिका उनके साथ व्यापार संबंधों को खत्म कर देगा।

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लेकिन इस दावे ने भारत और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं क्योंकि वे इसे पाकिस्तान के परमाणु ब्लैकमेल की रणनीति का हिस्सा मानते हैं। उनका कहना है कि ट्रंप ने उस रणनीति को वैधता दे दी है, जिसे भारत पहले ही कई बार उजागर कर चुका है।

Trump Pakistan Nuclear Bluff: क्या कहा ट्रंप ने इंटरव्यू में

इंटरव्यू दौरान ट्रंप ने एक कागज की शीट पढ़ते हुए अपनी उपलब्धियों का जिक्र किया, जिसमें पाकिस्तान और भारत को आठवां पॉइंट बताया। उन्होंने कहा, “मैंने आठ युद्धों को रोका। भारत और पाकिस्तान वाला तो ‘ब्यूटी’ था। वे न्यूक्लियर युद्ध के कगार पर थे। हवाई जहाजों को इधर-उधर गिराया जा रहा था। मैंने दोनों को फोन किया– नरेंद्र मोदी और शहबाज शरीफ को और कहा, ‘अगर आप नहीं रुके, तो अमेरिका के साथ कोई व्यापार नहीं होगा।'” ट्रंप ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शरीफ का हवाला देते हुए जोड़ा, “उन्होंने कहा कि अगर डोनाल्ड ट्रंप न शामिल होते, तो लाखों लोग मर चुके होते।”

ट्रंप ने दावा करते हुए कि रूस, चीन, उत्तर कोरिया और पाकिस्तान गुप्त रूप से अंडरग्राउंड परमाणु टेस्ट कर रहे हैं। “हम इकलौते देश हैं जो टेस्ट नहीं करते। पाकिस्तान टेस्ट कर रहा है, लेकिन कोई बात नहीं करता।”

Trump Pakistan Nuclear Bluff: पाकिस्तान की परमाणु ‘डर’ की रणनीति

लंबे समय से पाकिस्तान अपने परमाणु हथियारों की धमकी का इस्तेमाल राजनीतिक और रणनीतिक दबाव बनाने के लिए करता रहा है। इस रणनीति के तहत हर बार जब भारत सीमा क्षेत्र में कार्रवाई करता है, पाकिस्तान परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की चेतावनी देता है। इस तरह के बयान अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को समर्थन दिलाते हैं और अमेरिका जैसे देशों को दखल देने के लिए प्रेरित करते हैं।

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विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका इस तरह के परमाणु डराने वाले बयान से कई बार फंसा है और संतुलन बनाने की कोशिश में रहा है। वह भारत को नियंत्रित रखना चाहता है और पाकिस्तान को किसी बड़े संघर्ष में नहीं पड़ने देना चाहता है। ट्रंप का हालिया बयान उसी सोच को दर्शाता है जिसमें अमेरिका ने भारत को “आक्रामक” और पाकिस्तान को “संवेदनशील परमाणु शक्ति” बताया है।

पीएम मोदी ने पहले ही पाकिस्तानी ब्लफ को किया बेनकाब

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कई बार यह दिखा दिया है कि पाकिस्तान का परमाणु खतरा असल में खोखली बयानबाजी है। कारगिल युभारत द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक 2016, बालाकोट एयरस्ट्राइक 2019 और ऑपरेशन सिंदूर 2025 के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि पाकिस्तान ने अपनी परमाणु चेतावनियों को आगे बढ़ाने का साहस नहीं दिखाया। वहीं, भारत अब पाकिस्तान की “न्यूक्लियर ब्लैकमेल डिप्लोमेसी” से बाहर निकल चुका है।

इस तरह भारत ने यह संदेश दिया कि वह डर या धमकी के आधार पर पीछे नहीं हटेगा। इसके उलट, पाकिस्तान की रणनीति नियमित रूप से परमाणु हथियारों को राजनीतिक बयानबाजी के तौर पर इस्तेमाल करती आई है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद 12 मई को प्रधानमंत्री मोदी ने अपने राष्ट्रीय संबोधन में कहा था, “भारत किसी भी परमाणु ब्लैकमेल को बर्दाश्त नहीं करेगा। हम आतंकवाद और उसके संरक्षक पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई करते हुए किसी धमकी से नहीं डरेंगे।”

इसके बाद इसके बाद 15 अगस्त 2025 को लाल किला से स्वतंत्रता दिवस के भाषण में मोदी ने कहा, “भारत ने तय कर लिया है कि अब परमाणु धमकियों के आगे नहीं झुकेगा। हमारी सेनाओं ने आतंक के आकाओं को ऐसी सजा दी है जो वे कभी सोच भी नहीं सकते थे। खून और पानी साथ नहीं बह सकते।”

वहीं, 29 जुलाई को लोकसभा में प्रधानमंत्री ने फिर दोहराया, “पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान ने परमाणु धमकियां शुरू कीं, लेकिन अब कोई ब्लैकमेल काम नहीं करेगा। हम आतंक समर्थक सरकारों और उनके नेताओं में भेद नहीं करेंगे।”

Trump Pakistan Nuclear Bluff: आज भी पुरानी सोच में उलझा हुआ है अमेरिका

भारत ने हमेशा से स्पष्ट किया है कि वह सैन्य कार्रवाई पर भरोसा करता है और आतंकवाद तथा सीमावर्ती चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार है, अमेरिका की नीति आज भी पाकिस्तान की परमाणु रणनीति से प्रभावित नजर आती है। अमेरिकी रणनीति में अब भी यह धारणा है कि पाकिस्तान “एक अस्थिर परमाणु शक्ति” है और उसे संतुलित रखना दक्षिण एशिया की शांति के लिए जरूरी है।

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ट्रंप ने इस धारणा को अपने बयान में दोहराया, उन्होंने कहा कि अगर भारत और पाकिस्तान ने नियंत्रण नहीं किया तो अमेरिका को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। इस तरह का कथन यह संकेत देता है कि अमेरिका आज भी पाकिस्तान द्वारा पेश की जाने वाली परमाणु धमकी को गंभीरता से ले रहा है और उसकी नीति उसी जोखिम का सामना नहीं कर पा रही है जिसे भारत ने बेहतर तरह से मैनेज किया है।

भारत के रक्षा विश्लेषक एवं रणनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने ट्रंप के इस बयान को “राजनीतिक प्रदर्शन” कहा है। उनका मानना है कि अमेरिका बार-बार पाकिस्तान की परमाणु बयानबाजी में फंस जाता रहा है, जबकि भारत ने उस बयानबाजी को सफलता पूर्वक चुनौती दी है।

विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप का बयान न सिर्फ भारत के रणनीतिक दृष्टिकोण को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है बल्कि पाकिस्तान को राजनीतिक लाभ भी देता है क्योंकि वह फिर से अपनी परमाणु रणनीति को वैश्विक मंच पर हावी कर पाता है।

संयुक्त राष्ट्र समर्थित संस्था सीटीबी के रिकॉर्ड ट्रंप के इस दावे का समर्थन नहीं करते। सीटीबीटी की रिपोर्ट के अनुसार, 1996 में इस संधि के लागू होने के बाद से दुनिया में दस से भी कम आधिकारिक परमाणु परीक्षण हुए हैं। इनमें केवल उत्तर कोरिया को छोड़कर किसी अन्य देश रूस, चीन या पाकिस्तान ने कोई नया परीक्षण नहीं किया है।

सीटीबीटी का मुख्यालय वियना में है और यह संस्था दुनिया में परमाणु परीक्षणों की निगरानी के लिए बनाई गई है। इसका इंटरनेशनल मॉनिटरिंग सिस्टम दुनिया का सबसे एडवांस सिस्टम है। इस सिस्टम में 337 मॉनिटरिंग स्टेशन और 16 विशेष प्रयोगशालाएं शामिल हैं, जो धरती के हर कोने में स्थापित हैं। यह नेटवर्क परमाणु विस्फोटों के बेहद छोटे संकेतों को भी पकड़ सकता है।

कैसे काम करता है इंटरनेशनल मॉनिटरिंग सिस्टम

इंटरनेशनल मॉनिटरिंग सिस्टम में कई तकनीकी सेंसर और डिटेक्टर शामिल हैं। इसका एयर-टेस्टिंग स्टेशन, जो वातावरण में रेडियोएक्टिव तत्वों की मामूली मात्रा का पता लगाते हैं। जबकि अंडरवॉटर हाइड्रो-अकॉस्टिक स्टेशन, समुद्र के नीचे हुए विस्फोटों की ध्वनि तरंगें पकड़ते हैं। वहीं, इंफ्रासाउंड डिटेक्टर, जो वायुमंडल में हुए बड़े धमाकों की कम आवृत्ति वाली गूंज को भी रिकॉर्ड करते हैं। सीस्मोमीटर भूमिगत परमाणु परीक्षणों से उत्पन्न झटकों को मापते हैं। ये सभी उपकरण मिलकर धरती पर कहीं भी होने वाले परमाणु विस्फोटों के संकेत पहचान सकते हैं।

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हाल ही में प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार, जब किसी परमाणु विस्फोट के कंपन किसी भूकंप की तरंगों से मिल जाते हैं, तो उन्हें पहचानना कठिन हो जाता है। 1.7 टन के भूमिगत विस्फोट को 97 फीसदी सटीकता से पहचाना जा सकता है, लेकिन यदि यह किसी भूकंप की तरंगों के भीतर छिप जाए, तो सफलता दर घटकर 37 फीसदी रह जाती है।

इसके बावजूद, सीटीबीटी का कहना है कि उनका निगरानी सिस्टम इतना संवेदनशील है कि वह किसी भी “गंभीर” परमाणु विस्फोट को पहचान सकती है, और हाल के सालों में पाकिस्तान या चीन से कोई ऐसा संकेत नहीं मिला है।

चीन ने किया खंडन, पाकिस्तान खामोश

ट्रंप के दावे के बाद चीन ने तुरंत प्रतिक्रिया दी और इन आरोपों को बेसलेस और इररेस्पॉन्सिबल बताया। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा, “चीन ने हमेशा परमाणु परीक्षणों पर रोक का पालन किया है और वैश्विक प्रतिबंधों का सख्ती से समर्थन करता है।”

दूसरी ओर, पाकिस्तान ने इस पूरे विवाद पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। केवल विदेश मंत्रालय की  वेबसाइट पर एक बयान डाला है, “पाकिस्तान, भले ही व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि पर हस्ताक्षर करने वाला देश नहीं है, लेकिन वह इस संधि के उद्देश्यों और सिद्धांतों का समर्थन करता है। वह दक्षिण एशिया में स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। हमने परीक्षणों पर मोराटोरियम घोषित किया है और यह प्रतिबद्धता जारी रहेगी। हम क्षेत्र में परमाणु परीक्षण फिर से शुरू करने वाले पहले देश नहीं होंगे।”

हालांकि इस्लामाबाद की इस चुप्पी को लेकर रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान इस विषय पर सीधे जवाब देने से बच रहा है, क्योंकि उसके पास ऐसे परीक्षणों के किसी भी प्रमाण का अभाव है। इसलिए वह जानबूझ कर खामोश है क्योंकि उसके बोलते ही न्यूक्लियर ब्लफ वाला पिटारा खुल जाएगा।

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  • हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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