📍नई दिल्ली | 19 Mar, 2026, 6:13 PM
Saudi Arabia Iran Conflict: पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच ईरान ने इजरायल के साथ अपने उस पड़ोसियों पर भी जमकर मिसाइलों और ड्रोन से हमले किए, जिनकी सीमा ईरान से लगती थी। लेकिन इनमें से केवल पाकिस्तान ही अकेला एक ऐसा देश था, जिसकी सीमा ईरान से लगने के बावजूद ईरान ने उस पर कोई हमला नहीं किया। लेकिन अब पाकिस्तान का रोल नजर आने लगा है। सऊदी अरब और ईरान के बीच टकराव जिस तरह से अब और गंभीर होता नजर आ रहा है। और सऊदी अरब ने साफ तौर पर कहा है कि अगर ईरान की ओर से हमले नहीं रुके, तो वह सैन्य जवाब देने का अधिकार सुरक्षित रखता है। इस बयान के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है और खासकर पाकिस्तान को लेकर कई देशों की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। (Saudi Arabia Iran Conflict)
Saudi Arabia Iran Conflict: रियाद में हुई अरब और इस्लामी देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक
हाल ही में रियाद में ईरानी हमलों को लेकर अरब और इस्लामी देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई। इस बैठक में कतर, अजरबैजान, बहरीन, मिस्र, जॉर्डन, कुवैत, लेबनान, पाकिस्तान, सऊदी अरब, सीरिया, तुर्किये और संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्रियों ने हिस्सा लिया। मंत्रियों ने बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से ईरान के जानबूझकर किए गए हमलों की निंदा की, जिनमें रिहायशी इलाकों, सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर, जिसमें तेल की फैसिलिटी, डीसेलिनेशन प्लांट, एयरपोर्ट, रिहायशी इमारतें और डिप्लोमैटिक जगहों को निशाना बनाया गया। (Saudi Arabia Iran Conflict)
बैठक में मंत्रियों ने यूनाइटेड नेशंस चार्टर के आर्टिकल (51) के अनुसार देशों के खुद का बचाव करने के अधिकार पर भी जोर दिया। साथ ही मंत्रियों ने ईरान से तुरंत अपने हमले रोकने और तनाव को खत्म करने, इलाके में सुरक्षा और स्थिरता पाने और संकट को हल करने के तरीके के तौर पर डिप्लोमेसी को बढ़ावा देने के लिए सबसे पहले इंटरनेशनल कानून, इंटरनेशनल मानवीय कानून और अच्छे पड़ोसी के सिद्धांतों का सम्मान करने की जरूरत पर जोर दिया। (Saudi Arabia Iran Conflict)
रियाद बैठक के बाद सऊदी अरब का सख्त संदेश
इस बैठक के बाद सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान ने कहा कि वह इस तरह के हमलों को बर्दाश्त नहीं करेगा और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई करेगा। सऊदी विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि ईरान अपने पड़ोसियों पर दबाव बनाने के लिए हमले कर रहा है, लेकिन सऊदी अरब अब झुकने वाला नहीं है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो सैन्य कदम उठाए जा सकते हैं।
इसके अलावा, बैठक में यह भी कहा गया कि ईरान को अपने सहयोगी मिलिशिया ग्रुप्स को समर्थन देना बंद करना चाहिए। आरोप लगाया गया कि ईरान इन ग्रुप्स को फंडिंग, हथियार और ट्रेनिंग देकर क्षेत्र में अस्थिरता फैला रहा है। (Saudi Arabia Iran Conflict)
समुद्री सुरक्षा पर भी जताई चिंता
बैठक में समुद्री सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई गई। खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदब जैसे अहम समुद्री रास्तों को लेकर कहा गया कि इन्हें बंद करने या बाधित करने की कोई भी कोशिश वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सप्लाई के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।
पाकिस्तान की भूमिका पर बढ़ी चर्चा
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे ज्यादा चर्चा पाकिस्तान की भूमिका को लेकर हो रही है। दरअसल, पिछले साल सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट हुआ था। इस समझौते के तहत अगर किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे दोनों देशों पर हमला माना जाएगा।
इस नाटो स्टाइल समझौते में दोनों देश एक-दूसरे की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेते हैं। इस डिफेंस पैक्ट के बाद पाकिस्तान को मध्य पूर्व में एक तरह से “सिक्योरिटी गारंटर” यानी सुरक्षा देने वाला देश माना जाने लगा है और इससे अरब-इस्लामिक देशों के साथ उसके रणनीतिक रिश्ते और मजबूत हुए हैं। (Saudi Arabia Iran Conflict)
लेकिन अब हालात बदल गए हैं। जब ईरान ने सऊदी अरब में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए, तो इस समझौते की वजह से पाकिस्तान के सामने बड़ी कूटनीतिक मुश्किल खड़ी हो गई है।
इसका कारण यह है कि समझौते के मुताबिक अगर सऊदी अरब पर बड़ा हमला होता है, तो पाकिस्तान को उसका साथ देना पड़ सकता है, जबकि पाकिस्तान के ईरान के साथ भी संबंध हैं। (Saudi Arabia Iran Conflict)
रियाद बैठक में पाकिस्तान की मौजूदगी
रियाद में हुई बैठक में पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार भी मौजूद थे। उनकी मौजूदगी ने इन अटकलों को और तेज कर दिया है कि पाकिस्तान इस मामले में क्या रुख अपनाएगा।
हाल के दिनों में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच संपर्क भी बढ़ा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाल ही में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मुलाकात की थी। इसके अलावा पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने भी रियाद का दौरा किया था।
इन मुलाकातों को इस पूरे संकट से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि अभी तक पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर इस मामले में कोई स्पष्ट सैन्य रुख नहीं अपनाया है। (Saudi Arabia Iran Conflict)
म्यूचुअल डिफेंस समझौते का असर
जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान के लिए यह स्थिति काफी जटिल है। एक तरफ उसका सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता है, तो दूसरी तरफ उसके ईरान के साथ भी अच्छे संबंध हैं। पाकिस्तान में शिया समुदाय की बड़ी आबादी भी रहती है, ऐसे में किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करना उसके लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
इस बीच कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि अगर सऊदी अरब इस युद्ध में पूरी तरह शामिल होता है, तो वह अपने रक्षा समझौते को सक्रिय कर सकता है। ऐसे में पाकिस्तान की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाएगी।
कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि इस समझौते के तहत पाकिस्तान सऊदी अरब को सुरक्षा सहयोग दे सकता है। हालांकि इस तरह के दावों पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। (Saudi Arabia Iran Conflict)
हालांकि सऊदी अरब अब तक ईरान के साथ बातचीत करने के लिए पाकिस्तान पर भरोसा करता रहा है। इस महीने की शुरुआत में पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने बताया था कि उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से बातचीत के दौरान सऊदी अरब के साथ हुए रक्षा समझौते का मुद्दा उठाया था।
इशाक डार ने कहा कि “हमारा सऊदी अरब के साथ एक रक्षा समझौता है, और हमने यह बात ईरान को भी साफ तौर पर बता दी है।” इस पर ईरान की ओर से यह कहा गया कि सऊदी की जमीन का इस्तेमाल उनके खिलाफ हमले करने के लिए नहीं होना चाहिए, इस बारे में भरोसा दिया जाए। (Saudi Arabia Iran Conflict)
होर्मुज से आया पाकिस्तान का पहला जहाज
सऊदी अरब के साथ कूटनीतिक और रक्षा संबंधों के अलावा पाकिस्तान खाड़ी देशों पर तेल और गैस के लिए भी काफी हद तक निर्भर है।
इसी हफ्ते पाकिस्तान के झंडे वाला जहाज “कराची” (जिसे लोरेक्स भी कहा जाता है) होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाला पहला ऐसा जहाज बना, जो गैर-ईरानी कच्चा तेल लेकर जा रहा था। इस जहाज का ट्रैकिंग सिस्टम यानी ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम चालू था।
यह जहाज पाकिस्तान की सरकारी कंपनी नेशनल शिपिंग कॉरपोरेशन का है और इसमें जो तेल था, वह संयुक्त अरब अमीरात से आया था।
जानकारों का मानना है कि इस जहाज के सुरक्षित गुजरने के लिए पाकिस्तान ने संभवतः ईरान सरकार के साथ पहले से बातचीत की थी। (Saudi Arabia Iran Conflict)
तेल सप्लाई और वैश्विक असर
ईरान और सऊदी अरब के बीच बढ़ते तनाव का असर तेल सप्लाई पर भी पड़ रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है और यहां तनाव बढ़ने से बाजार पर असर दिख रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान के नियंत्रण का असर सऊदी अरब के तेल निर्यात पर भी पड़ा है।
हालांकि, सऊदी अरब ने खाड़ी क्षेत्र से अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का इस्तेमाल करके इस समस्या से बचने की कोशिश की है। इस पाइपलाइन के जरिए वह होर्मुज को बायपास करके रोज करीब 40 लाख बैरल (4 मिलियन बैरल प्रति दिन) कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच पा रहा है। जबकि युद्ध शुरू होने से पहले सऊदी अरब लगभग 70 लाख बैरल प्रति दिन (7 मिलियन bpd) तेल निर्यात करता था, जिसमें से बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते जाता था। (Saudi Arabia Iran Conflict)
अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीति पर जोर
बैठक में शामिल देशों ने अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवीय कानून के पालन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सभी देशों को एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए और किसी भी तरह की दखलअंदाजी से बचना चाहिए।
साथ ही यह भी कहा गया कि क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए कूटनीतिक प्रयास जरूरी हैं और सभी देश इस दिशा में सहयोग जारी रखेंगे। (Saudi Arabia Iran Conflict)


