📍तेहरान/वॉशिंगटन | 3 Mar, 2026, 12:31 PM
Iran Air Force Weakness: पश्चिमी एशिया में जारी ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष में एक बड़ी वजह सामने आ रही है, जिसकी वजह से ईरान एरियल वॉरफेयर यानी हवाई युद्ध में पिछड़ता दिखाई दे रहा है। इसका कारण ईरान की कमजोर एयरफोर्स और रूस से सुखोई-35 फाइटर जेट की खरीद में हुई देरी है। मौजूदा हालात में इजरायल की आधुनिक वायुसेना के सामने ईरान के पुराने लड़ाकू विमान टिक नहीं पा रहे हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान को पहले से ही यह एहसास था कि उसकी एयरफोर्स कमजोर हो रही है। इसी वजह से उसने रूस के साथ आधुनिक फाइटर जेट खरीदने की योजना बनाई थी। लेकिन यह डील समय पर पूरी नहीं हो सकी, जिसका असर अब सीधे जंग के मैदान में दिखाई दे रहा है। (Iran Air Force Weakness)
Iran Air Force Weakness: 2023 में हुई थी सुखोई-35 डील
जानकारी के अनुसार, ईरान और रूस के बीच सुखोई-35 फाइटर जेट की डील 2023 में फाइनल हुई थी। इस डील में करीब 48 से 50 जेट खरीदे जाने थे। जिनकी कुल कीमत अरबों डॉलर में थी। इस पैकेज में अटैक हेलिकॉप्टर और ट्रेनिंग एयरक्राफ्ट भी शामिल छे।
लेकिन, डिलीवरी की प्रक्रिया धीमी रही। कुछ रिपोर्ट्स में दो विमान मिलने की बात कही गई है, लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई। बाकी जेट्स की डिलीवरी 2026 से 2028 के बीच होनी थी।
रूस और यूक्रेन के बीच चल रही जंग, सप्लाई चेन की दिक्कतें और रूस की अपनी सैन्य जरूरतों के कारण इस डील में देरी हुई। इसी वजह से ईरान को समय पर आधुनिक फाइटर जेट नहीं मिल पाए।
प्रतिबंधों की वजह से हुई देरी
प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ने अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशे। अमेरिका और पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों के कारण ज्यादातर देश ईरान को सैन्य उपकरण बेचने से बचते रहे। ऐसे माहौल में रूस और चीन ही दो ऐसे देश रहे, जिन्होंने इन प्रतिबंधों के बावजूद ईरान के साथ रक्षा और ऊर्जा सहयोग जारी रखा। चीन जहां लगातार ईरान से बड़े पैमाने पर तेल खरीदता रहा, वहीं रूस ने हथियारों और सैन्य तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बनाए रखा।
जानकारी के अनुसार, रूस और ईरान के बीच नए जेनरेशन के लड़ाकू विमानों को लेकर बातचीत काफी पहले, करीब 2016 से ही शुरू हो गई थी। कई वर्षों तक चर्चा और तैयारी चलने के बाद आखिरकार 2023 में इस डील को अंतिम रूप दिया गया। इसी दौरान दोनों देशों के बीच एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी समझौते पर भी हस्ताक्षर किए गए, जिसमें सैन्य तकनीक, रक्षा सहयोग और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में साथ काम करने की सहमति बनी। (Iran Air Force Weakness)
इजरायल की मजबूत वायुसेना के सामने चुनौती
इजरायल की एयरफोर्स दुनिया की सबसे आधुनिक वायु सेनाओं में मानी जाती है। उसके पास F-15, F-16 और 5वीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर F-35 जैसे एडवांस्ड विमान मौजूद हैं।
इसके मुकाबले ईरान के पास जो फाइटर जेट हैं, उनमें से ज्यादातर 30 से 50 साल पुराने हैं। इनमें अमेरिकी एफ-4 फैंटम, एफ-14 टॉमकैट, एफ-5 टाइगर, रूसी मिग-29 और सुखोई-24 जैसे विमान शामिल हैं।
ईरान ने अपने स्तर पर कुछ स्वदेशी विमान भी बनाए हैं, जैसे हेसा कोवसार और सैकेह, लेकिन ये तकनीकी रूप से पुराने प्लेटफॉर्म पर आधारित हैं और आधुनिक युद्ध में इनकी भूमिका बेहद सीमित हैं। (Iran Air Force Weakness)
अगर समय पर मिल जाते सुखोई-35
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, अगर ईरान को समय पर सुखोई-35 मिल जाते, तो मौजूदा हालात कुछ अलग हो सकते थे। सुखोई-35 एक 4.5 जेनरेशन का आधुनिक लड़ाकू विमान है, जो लंबी दूरी तक हमला करने और दुश्मन के विमान को रोकने में सक्षम है।
सुखोई-35 एक अत्याधुनिक दो इंजन वाला लड़ाकू विमान है, जो भारी मात्रा में हथियार ले जाने की क्षमता रखता है। यह विमान करीब 8,000 किलोग्राम तक का पेलोड अपने साथ ले जा सकता है। इसमें 12 हार्ड प्वाइंट दिए गए हैं, जिन पर अलग-अलग तरह की मिसाइलें और बम लगाए जा सकते हैं। यह विमान जरूरत पड़ने पर न्यूक्लियर हथियार ले जाने में भी सक्षम माना जाता है।
यह विमान करीब 2.25 मैक की स्पीड से उड़ सकता है और एक बार में करीब 3,600 किलोमीटर तक उड़ान भर सकता है। इसकी कॉम्बैट रेंज लगभग 1,600 किलोमीटर है, यानी यह लंबी दूरी तक जाकर मिशन पूरा कर सकता है। यह विमान करीब 59,000 फीट की ऊंचाई तक आसानी से ऑपरेट कर सकता है।
इस फाइटर जेट की खासियत यह है कि इसमें कई तरह के हथियार एक साथ लगाए जा सकते हैं, जैसे एयर-टू-एयर मिसाइल, एयर-टू-सरफेस मिसाइल, एंटी-शिप मिसाइल, एंटी-रेडिएशन मिसाइल और अलग-अलग तरह के बम। इसके अलावा इसमें आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक काउंटर मेजर सिस्टम भी लगा होता है, जो दुश्मन के रडार और मिसाइल हमलों से बचाव में मदद करता है।
अगर ऐसे 20-30 विमान भी ईरान के पास होते, तो इजरायल के लिए ईरानी हवाई क्षेत्र में ऑपरेशन करना ज्यादा कठिन हो सकता था। (Iran Air Force Weakness)
ईरान की रणनीति में बदलाव
ईरान ने अपनी सैन्य रणनीति में लंबे समय तक मिसाइल, ड्रोन और बैलिस्टिक सिस्टम पर ज्यादा ध्यान दिया। उसने हाइपरसोनिक मिसाइल और लॉन्ग रेंज रॉकेट सिस्टम तैयार किए। ईरान का सोचना था कि उसकी सीमा कहीं से भी इजरायल या अमेरिका से नहीं लगती है और अमेरिका इतनी दूर से यहां आ कर जंग नहीं लड़ेगा। जिसके चलते कभी ईरान ने एयर डिफेंस सिस्टम या एयर सुपीरियरिटी पर फोकस ही नहीं किया।
लेकिन एयरफोर्स के आधुनिकीकरण पर उतना ध्यान नहीं दिया गया। इसका परिणाम अब सामने आ रहा है, जब हवाई युद्ध में ईरान को सीमित विकल्पों के साथ काम करना पड़ रहा है।
ईरान अब सीधे एयर-टू-एयर मुकाबले की बजाय ड्रोन और मिसाइल के जरिए जवाबी कार्रवाई कर रहा है। (Iran Air Force Weakness)
डील के बावजूद चुनौतियां बनी रहतीं
रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि अगर सुखोई-35 समय पर मिल भी जाते, तब भी उन्हें पूरी तरह ऑपरेशनल बनाने में समय लगता। पायलट ट्रेनिंग, सिस्टम इंटीग्रेशन और मेंटेनेंस में कई साल लग सकते हैं।
इसके अलावा, आधुनिक जंग में सिर्फ फाइटर जेट ही नहीं, बल्कि नेटवर्क, सैटेलाइट, इंटेलिजेंस और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। (Iran Air Force Weakness)
एयर डिफेंस सिस्टम भी कमजोर पड़ा
ईरान ने पिछले कुछ सालों में अपनी एयर डिफेंस क्षमता को मजबूत करने की कोशिश की थी। उसके पास रूसी एस-300 सिस्टम, घरेलू बावर-373 और अन्य मीडियम और शॉर्ट रेंज डिफेंस सिस्टम मौजूद थे।
लेकिन मौजूदा संघर्ष की शुरुआत में ही अमेरिका और इजरायल ने इन सिस्टम्स को निशाना बनाया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जंग के शुरुआती दिनों में ही बड़ी संख्या में रडार, मिसाइल लॉन्चर और कमांड सेंटर नष्ट कर दिए गए।
इसके बाद इजरायल और अमेरिका को ईरान के ऊपर एयर सुपीरियरिटी हासिल करने में आसानी हो गई। अब हालात यह हैं कि विदेशी फाइटर जेट और ड्रोन ईरानी हवाई क्षेत्र में अंदर तक जाकर ऑपरेशन कर रहे हैं। (Iran Air Force Weakness)
चीनी एचक्यू9बी हुआ फेल
एचक्यू9बी चीन का बनाया हुआ लंबी दूरी का सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम है, जिसे रूस के S-300 और अमेरिका के पैट्रियट सिस्टम जैसा माना जाता है। ईरान ने इसे हाल ही में हासिल किया था और इसे तेहरान, इस्फहान जैसे बड़े शहरों और न्यूक्लियर साइट्स की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया था। इसके बावजूद जब बड़े पैमाने पर हमले हुए, तो यह सिस्टम प्रभावी तरीके से काम नहीं कर पाया।
रिपोर्ट के अनुसार, इसे नतांज परमाणु केंद्र जैसे महत्वपूर्ण ठिकानों के आसपास तैनात किया गया था, लेकिन यह एफ-35 विमानों और ड्रोन के बड़े हमलों को रोकने में नाकाम रहा। विश्लेषकों का कहना है कि हमलों के बड़े पैमाने के कारण यह सिस्टम दबाव में आ गया। (Iran Air Force Weakness)
एचक्यू9बी एक समय में 100 लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है, लेकिन केवल 8-10 पर ही एक साथ हमला कर सकता है, और यह स्वॉर्म हमलों के आगे बिल्कुल फेल हो गया।
रिपोर्टस के मुताबिक अमेरिका और इजरायल ने एक साथ बहुत बड़ी संख्या में मिसाइल, ड्रोन और क्रूज मिसाइल्स का इस्तेमाल किया। इस तरह के हमलों को सैचुरेशन अटैक कहा जाता है, जिसमें एक ही समय में इतने ज्यादा टारगेट आते हैं कि कोई भी एयर डिफेंस सिस्टम उन्हें संभाल नहीं पाता। एचक्यू-9बी भी इसी वजह से ओवरलोड हो गया। इसके पास सीमित इंटरसेप्टर मिसाइलें थीं और रिएक्शन टाइम भी सीमित था, जिससे वह सभी खतरों को रोक नहीं सका। (Iran Air Force Weakness)
वहीं, इसका रडार सिस्टम स्टेल्थ एयरक्राफ्ट जैसे एफ-35 या बी-2 बॉम्बर्स को सही तरीके से पकड़ नहीं पाया। इसके अलावा, इसमें टारगेट को ट्रैक करने और बीच में अपडेट देने की क्षमता सीमित थी, जिससे तेजी से दिशा बदलने वाले टारगेट्स को मारना मुश्किल हो गया। भले ही यह सिस्टम कई टारगेट्स को ट्रैक कर सकता था, लेकिन एक साथ सीमित मिसाइल ही फायर कर सकता था, जिससे भारी हमलों के दौरान इसकी क्षमता जल्दी खत्म हो गई।
इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर भी एक अहम कारण रहा। अमेरिका और इजरायल ने एडवांस्ड जैमिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया, जिससे एचक्यू-9बी के रडार और कम्युनिकेशन सिस्टम प्रभावित हो गए। जब रडार सही से काम नहीं करता, तो एयर डिफेंस सिस्टम लगभग अंधा हो जाता है। इसी वजह से कई हमलों का समय पर पता नहीं चल पाया और इंटरसेप्शन नहीं हो सका।
रिपोर्ट्स के अनुसार, इसके अलावा ऑपरेशनल समस्याएं भी सामने आईं। ईरान की एयर डिफेंस व्यवस्था अलग-अलग सिस्टम्स का मिश्रण है, जिसमें रूसी, चीनी और घरेलू सिस्टम शामिल हैं। इन सभी को एक साथ ठीक तरह से जोड़ना आसान नहीं होता। इन सिस्टम्स के बीच तालमेल की कमी भी हमलों के दौरान दिखी। साथ ही, ऑपरेटर्स को इस सिस्टम की पूरी ट्रेनिंग नहीं मिली थी और प्रतिबंधों की वजह से मेंटेनेंस और स्पेयर पार्ट्स की भी कमी थी, जिससे इसकी कार्यक्षमता प्रभावित हुई। (Iran Air Force Weakness)
एक और बड़ी बात यह रही कि इससे पहले के संघर्षों में ईरान के कई एयर डिफेंस सिस्टम पहले ही नुकसान झेल चुके थे। जब 2026 में नए हमले हुए, तो ये सिस्टम पूरी तरह तैयार नहीं थे। कई जगह इन्हें जल्दी-जल्दी दोबारा तैनात किया गया, लेकिन उनका नेटवर्क मजबूत नहीं बन पाया। (Iran Air Force Weakness)
क्षेत्रीय असर और बढ़ता तनाव
ईरान और इजरायल के बीच यह संघर्ष पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है। इस जंग में आधुनिक तकनीक, इंटेलिजेंस और एयर पावर की भूमिका साफ तौर पर दिखाई दे रही है।
जहां एक तरफ इजरायल ने अपनी तकनीकी बढ़त का फायदा उठाया है, वहीं दूसरी तरफ ईरान को अपनी सैन्य रणनीति में बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। (Iran Air Force Weakness)
इंटेलिजेंस और टेक्नोलॉजी की भूमिका
इस संघर्ष ने यह भी दिखाया है कि आधुनिक युद्ध में सिर्फ हथियार ही नहीं, बल्कि इंटेलिजेंस और रियल टाइम जानकारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका और इजरायल ने सैटेलाइट, साइबर और ह्यूमन इंटेलिजेंस का इस्तेमाल कर ईरान के सिस्टम को कमजोर किया। इस वजह से ईरान की एयर डिफेंस और कमांड सिस्टम को जल्दी निशाना बनाया जा सका। (Iran Air Force Weakness)

