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Indian Parliamentary Delegation: भारत 32 देशों में ही क्यों भेज रहा सभी दलों के सांसदों का प्रतिनिधिमंडल? इससे पीएम मोदी की ग्लोबल इमेज को होगा क्या फायदा?

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📍नई दिल्ली | 24 May, 2025, 3:52 PM

Indian Parliamentary Delegation: 22 अप्रैल को पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत ने पहले तो ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों ध्वस्त किया, उसके बाद पाकिस्तानी सेना की जवाबी कार्रवाई का भी मुंहतोड़ जवाब दिया। वहीं पाकिस्तान को डिप्लोमेटिक स्तर पर घेरने की तैयारी है। जिसके तहत भारत ने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक समर्थन जुटाने और आतंकवाद के प्रति अपनी जीरो टॉलरेंस नीति को मजबूत करने के लिए सात सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल 32 देशों की यात्रा पर भेजा है। इनमें से तीन प्रतिनिधिमंडल अपनी यात्रा शुरू भी कर चुके हैं। इस मुहिम में 59 सांसद शामिल हैं, जिनमें से 31 सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और 20 विपक्षी दलों से हैं। प्रत्येक प्रतिनिधिमंडल के साथ कम से कम एक पूर्व डिप्लोमेट भी शामिल है, जो डिप्लोमेटिक डायलॉग और स्ट्रेटेजिक कम्यूनिकेशन में मदद करेंगे।

Indian Parliamentary Delegation: बनाए सात प्रतिनिधिमंडल

इन सात प्रतिनिधिमंडलों का नेतृत्व देश के प्रमुख राजनेता कर रहे हैं। पहला समूह भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बैजयंत जय पांडा के नेतृत्व में है, जबकि दूसरा समूह बीजेपी के ही रविशंकर प्रसाद के नेतृत्व में काम करेगा। तीसरे समूह की कमान जनता दल (यूनाइटेड) के संजय झा संभाल रहे हैं, और चौथे समूह का नेतृत्व शिवसेना के श्रीकांत शिंदे करेंगे। पांचवें समूह की अगुवाई कांग्रेस सांसद शशि थरूर को सौंपी गई है, जबकि छठा समूह द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) की सांसद कनिमोई करुणानिधि के नेतृत्व में है। सातवें और अंतिम समूह का नेतृत्व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) की नेता सुप्रिया सुले कर रही हैं।

इन देशों की करेंगे यात्रा

यह कूटनीतिक अभियान भारत के लिए कई मायनों में अहम है। इसका मुख्य उद्देश्य लश्कर के मुखौटा संगठन द रजिस्टेंस फ्रंट यानी TRF को UNSC की 1267 सेंक्शन्स कमेटी के तहत आतंकवादी संगठन घोषित करवाना है। पहलगाम आतंकी हमले में 26 पर्यटक मारे गए थे, और पहले उसकी जिम्मेदारी TRF ने ली थी, लेकिन बाद में खुद पर एक साइबर अटैक की बात कह कर अपनी बात से पलट गया था।

ये प्रतिनिधिमंडल 32 देशों और क्षेत्रों की यात्रा करेंगे, जिनका चयन खास रणनीति के तहत किया गया है। मध्य पूर्व में सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और कतर जैसे देश शामिल हैं। यूरोप में यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, इटली, डेनमार्क, यूरोपीय संघ, स्पेन, ग्रीस, स्लोवेनिया और लातविया इस अभियान का हिस्सा हैं। एशिया में इंडोनेशिया, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, जापान और सिंगापुर जैसे देशों को चुना गया है। अफ्रीका से अल्जीरिया, लाइबेरिया, कांगो, सिएरा लियोन, इथियोपिया और दक्षिण अफ्रीका इस सूची में शामिल हैं। अमेरिका महाद्वीप से संयुक्त राज्य अमेरिका, पनामा, गुयाना, ब्राजील और कोलंबिया का चयन किया गया है। इसके अलावा, रूस भी इस सूची में शामिल है। इन देशों का चयन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये या तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के वर्तमान या भविष्य के सदस्य हैं या फिर भारत के प्रमुख रणनीतिक और व्यापारिक साझेदार हैं।

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क्या है पूर्व राजनयिकों की राय

इन देशों के चयन के रणनीतिक महत्व को लेकर पूर्व राजनयिक प्रभु दयाल (रिटायर्ड), “भारत 32 देशों में संसदीय प्रतिनिधिमंडल भेज रहा है। इसका कारण यह है कि ये सभी देश निर्णय लेने की प्रक्रिया में बहुत महत्वपूर्ण हैं। ये देश या तो वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के सदस्य हैं या अगले साल या 2027 में इसके सदस्य बनेंगे।” प्रभु दयाल इससे पहले संयुक्त राज्य अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र, पाकिस्तान, मिस्र और ईरान जैसे देशों में सेवाएं दे चुके हैं।

उन्होंने आगे कहा, “ये सभी देश इस साल, 2026 या 2027 में UNSC में डिसिजन मेकर के तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। आतंकवाद के मामले में इनका रुख हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये देश इस मुद्दे पर निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।”

चीन क्यों नहीं भेजा डेलीगेशन?

चीन UNSC का स्थायी सदस्य है, जबकि पाकिस्तान इसके 10 गैर-स्थायी सदस्यों में से एक है। फिर भी, भारत ने बीजिंग या इस्लामाबाद में कोई प्रतिनिधिमंडल नहीं भेजा। 25 अप्रैल को, पाकिस्तान और चीन ने UNSC पर दबाव बनाकर द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF) को प्रेस स्टेटमेंट से हटवाया, जबकि भारत ने इसका कड़ा विरोध किया था।

भारत TRF को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 सेंक्शन्स कमेटी के तहत आतंकवादी संगठन घोषित करवाने के लिए सक्रिय रूप से अभियान चला रहा है। इसके लिए भारत ने न्यूयॉर्क में एक टेक्निकल टीम भेजी थी, जो 1267 सेंक्शन्स कमेटी के मॉनिटरिंग टीम और संयुक्त राष्ट्र के सहयोगी देशों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र कार्यालय काउंटर-टेरेरिज्म (UNOCT) और काउंटर-टेरेरिज्म कमेटी एक्जीक्यूटिव डायरेक्टरेट (CTED) के साथ बैठकें कर चुकी है।

UNSC चीन और पाकिस्तान का विरोध

पूर्व राजनयिक अनिल त्रिगुणायत (रिटायर्ड) ने बताया कि UNSC में 15 सदस्य हैं, और भारत के प्रतिनिधिमंडल इनमें से चीन और पाकिस्तान को छोड़कर बाकी सभी देशों की यात्रा कर रहे हैं। उन्होंने बताया, “ये प्रतिनिधिमंडल उन देशों में जा रहे हैं, जो हमारे रणनीतिक और व्यापारिक साझेदार हैं। TRF को आतंकवादी संगठन घोषित करने का मामला संयुक्त राष्ट्र में जाएगा, जहां पाकिस्तान इसका विरोध करेगा और चीन तकनीकी रूप से इसे रोकने की कोशिश करेगा। ऐसे में यह भारत के लिए महत्वपूर्ण है कि इन देशों को अपने पक्ष में लाया जाए, ताकि पाकिस्तान का असली चेहरा सामने आए।”

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प्रभु दयाल ने आगे कहा, “पाकिस्तान से प्रायोजित आतंकवादी गतिविधियां हमारे लिए एक बड़ा मुद्दा बन रही हैं। हम इसे UNSC में मजबूती से उठाना चाहते हैं। इसलिए हम उन देशों तक पहुंच रहे हैं, जो या तो स्थायी सदस्य हैं या इस साल, अगले साल या 2027 में गैर-स्थायी सदस्य होंगे।” उन्होंने यह भी जोड़ा, “इस पहल का मुख्य उद्देश्य इन देशों को हमारी चिंताओं के प्रति जागरूक करना और आतंकवाद के मुद्दे पर निर्णय लेने में उन्हें अपने पक्ष में लाना है।”

UNSC के मौजूदा सदस्य

P5 देशों (अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम) के अलावा, UNSC के 10 नॉन परमानेंट मेंबर्स में अल्जीरिया, डेनमार्क, ग्रीस, गुयाना, पाकिस्तान, पनामा, दक्षिण कोरिया, सिएरा लियोन, स्लोवेनिया और सोमालिया शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 6 जून 2024 को हुए मतदान में 2026-2027 के लिए सुरक्षा परिषद के पांच नए गैर-स्थायी सदस्यों का चयन किया है। ये देश हैं- कनाडा, जर्मनी, थाईलैंड, उगांडा, और वेनेजुएला। इनका कार्यकाल 1 जनवरी 2026 से शुरू होकर 31 दिसंबर 2027 तक चलेगा।

सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं, जिनमें 5 स्थायी (चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन, और अमेरिका) और 10 गैर-स्थायी सदस्य शामिल हैं। गैर-स्थायी सदस्यों का चुनाव हर साल पांच सीटों के लिए होता है, ताकि दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व हो सके। इस बार कनाडा और जर्मनी पश्चिमी यूरोप और अन्य क्षेत्र से, थाईलैंड एशिया-प्रशांत से, उगांडा अफ्रीका से, और वेनेजुएला लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र से चुने गए हैं।

ये नए सदस्य अल्जीरिया, गुयाना, दक्षिण कोरिया, सिएरा लियोन, और स्लोवेनिया की जगह लेंगे, जिनका कार्यकाल 31 दिसंबर 2025 को खत्म होगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए अहम फैसले लेती है, और इन नए सदस्यों की भूमिका अगले दो सालों में महत्वपूर्ण होगी।

क्या यह कदम पीएम मोदी की छवि को और मजबूत करेगा?

सरकार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस अभियान का मकसद साफ है, पाकिस्तान के आतंकवाद प्रायोजन को वैश्विक मंच पर उजागर करना और TRF को UNSC की 1267 सेंक्शन्स कमेटी के तहत आतंकवादी संगठन घोषित करवाना। लेकिन इस अभियान का एक और बड़ी खूबी है, जो राजनीतिक और कूटनीतिक दोनों रूप से महत्वपूर्ण है। वह है विपक्षी नेताओं की भागीदारी।

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विपक्षी नेताओं का इस अभियान में शामिल होना भारत के आतंकवाद विरोधी रुख में एकता का प्रतीक है। शशि थरूर, कनिमोई करुणानिधि, और सुप्रिया सुले जैसे प्रमुख विपक्षी चेहरों का नेतृत्व वैश्विक समुदाय को यह संदेश देता है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत का राजनीतिक वर्ग एकजुट है। इससे न केवल भारत की कूटनीतिक ताकत बढ़ती है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस छवि को भी मजबूत करती है, जिसमें वे सभी दलों को साथ लेकर चलने वाले नेता के रूप में दिखते हैं।

सूत्रों के मुताबिक, इस अभियान से मोदी की छवि को कई तरह से फायदा हो सकता है। सबसे पहले, यह वैश्विक मंच पर भारत को एक मजबूत और एकजुट राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करता है, जहां सत्तारूढ़ और विपक्षी दल एक संवेदनशील मुद्दे पर कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। यह संदेश उन देशों के लिए खासा प्रभावी है, जो भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को महत्व देते हैं। दूसरा, यह मोदी की कूटनीतिक रणनीति को और मजबूत करता है, जिसमें वे न केवल भारत की आवाज को वैश्विक मंच पर बुलंद करते हैं, बल्कि विपक्ष को भी राष्ट्रीय हितों के लिए साथ लाते हैं।

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इसके अलावा, यह अभियान मोदी सरकार की आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस नीति को और मजबूत करता है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद विपक्षी नेताओं को इस अभियान में शामिल करना यह दर्शाता है कि भारत का यह कदम केवल एक सरकार का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का है। यह पूरी दुनिया को यह भरोसा होगा कि भारत आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई में पूरी तरह प्रतिबद्ध और एकजुट है।

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  • हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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