📍नई दिल्ली | 31 Mar, 2026, 11:53 AM
Naxalism End in India: भारत सरकार ने औपचारिक तौर पर यह घोषणा कर दी है कि देश में नक्सल समस्या यानी लेफ्ट विंग एक्स्ट्रीमिज्म (एलडब्ल्यूई) अब खत्म हो चुकी है। यह वही समस्या थी जिसने करीब पांच दशक तक देश के आदिवासी इलाकों, खासकर छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों को आतंक के साये में रखा था।
इस आंदोलन की शुरुआत साल 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से हुई थी, जहां जमीन और अधिकारों को लेकर एक किसान विद्रोह हुआ था। धीरे-धीरे यह आंदोलन एक बड़े सशस्त्र संघर्ष में बदल गया, जिसने देश के कई हिस्सों में हिंसा और अस्थिरता पैदा की।
लेकिन अब सरकार का कहना है कि यह समस्या केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई से नहीं, बल्कि विकास और जनकल्याण योजनाओं के जरिए धीरे-धीरे खत्म की गई है।
Naxalism End in India: सुरक्षा के साथ विकास पर भी बराबर ध्यान
सरकार ने 2014 के बाद अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया। पहले नक्सल समस्या को सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा माना जाता था, लेकिन बाद में इसे विकास की कमी से जुड़ी समस्या के रूप में भी देखा गया।
यही वजह रही कि सुरक्षा अभियान के साथ-साथ सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और बैंकिंग सेवाओं को तेजी से बढ़ाया गया। जिन इलाकों में पहले सरकारी पहुंच बेहद कम थी, वहां धीरे-धीरे प्रशासन की मौजूदगी बढ़ाई गई।
जंगलों तक पहुंची स्वास्थ्य सुविधाएं
छत्तीसगढ़ के सुकमा और बीजापुर जैसे इलाकों में लंबे समय तक स्वास्थ्य सुविधाएं लगभग न के बराबर थीं। लोगों को इलाज के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता था या फिर पारंपरिक तरीकों पर निर्भर रहना पड़ता था।
इस स्थिति को बदलने के लिए जगदलपुर में 240 बेड का सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल बनाया गया। इसके अलावा बीजापुर और सुकमा में फील्ड हॉस्पिटल तैयार किए गए, जिससे संघर्ष वाले इलाकों में ही इलाज की सुविधा मिल सके।
इनके साथ ही छह और फील्ड हॉस्पिटल को अपग्रेड किया गया। इसका असर यह हुआ कि 2017 के बाद से करीब 67,500 मरीजों का इलाज इन सुविधाओं के जरिए किया गया।
ग्रामीण स्तर पर भी स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत की गई। मितानिन प्रोग्राम के तहत 70,000 से ज्यादा हेल्थ वर्कर्स को तैयार किया गया, जिनमें ज्यादातर महिलाएं और आदिवासी समुदाय से थीं।
शहरी क्षेत्रों में महिला आरोग्य समितियों ने भोजन, सफाई और महिलाओं के खिलाफ हिंसा जैसे मुद्दों पर काम किया। 12,927 हेल्थ कैंप लगाए गए, जिसका फायदा 7.66 लाख से ज्यादा लोगों को मिला।
गांव-गांव तक पहुंचीं बैंकिंग सेवाएं
नक्सल प्रभावित इलाकों में बैंकिंग सेवाओं की कमी भी एक बड़ी समस्या थी। लोग कर्ज के लिए साहूकारों पर निर्भर रहते थे, जो उनका आर्थिक शोषण करते थे।
इस स्थिति को बदलने के लिए पोस्ट ऑफिस और बैंकिंग नेटवर्क का विस्तार किया गया। 6,025 नए पोस्ट ऑफिस खोले गए, जहां बैंकिंग सुविधाएं भी दी जाने लगीं।
इसके अलावा 1,804 बैंक ब्रांच और 1,321 एटीएम शुरू किए गए। सबसे अहम कदम था 75,000 बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट्स की नियुक्ति, जो गांव-गांव जाकर लोगों को बैंकिंग सेवाएं देने लगे। इससे लोगों को बचत, बीमा और सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे मिलने लगा। (Naxalism End in India)
शिक्षा ने बदली तस्वीर
नक्सल प्रभावित इलाकों में शिक्षा की कमी लंबे समय तक एक बड़ी समस्या रही। कई गांवों में स्कूल ही नहीं थे या बच्चों को पढ़ाई के लिए दूर जाना पड़ता था। 2014 के बाद इस दिशा में तेजी से काम किया गया। अब तक 9,303 नए स्कूल बनाए गए। आदिवासी बच्चों के लिए एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल शुरू किए गए, जिनमें से 179 स्कूल अब पूरी तरह से चालू हैं। यहां बच्चों को रहने और पढ़ने दोनों की सुविधा मिलती है।
इसके अलावा 11 केंद्रीय विद्यालय और 6 नवोदय विद्यालय भी शुरू किए गए, जिससे बेहतर शिक्षा की पहुंच बढ़ी।
अब जमीन पर दिखने लगीं सरकारी योजनाएं
पहले जिन इलाकों में सरकारी योजनाएं पहुंच ही नहीं पाती थीं, वहां अब तेजी से काम हुआ है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर पाने वाले लोगों की संख्या एक साल में काफी बढ़ी। 2024 में जहां 92,847 लोगों को घर मिले थे, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 2,54,045 हो गई।
मनरेगा में भी लोगों की भागीदारी बढ़ी। 2024 में 8.19 लाख लोग जुड़े थे, जो 2025 में बढ़कर 9.87 लाख हो गए। वहीं अब इन इलाकों में प्रशासन की सक्रिय भागीदारी भी बढ़ी है। (Naxalism End in India)
सड़क, मोबाइल और रेल से जुड़े इलाके
नक्सल प्रभावित इलाकों की सबसे बड़ी समस्या थी उनका अलग-थलग होना। इसे खत्म करने के लिए बड़े स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया गया। अब तक 17,500 किलोमीटर से ज्यादा सड़कें बनाई गईं। मोबाइल कनेक्टिविटी भी बढ़ाई गई। करीब 9,000 मोबाइल टावर लगाए गए, जिनमें से 2,343 को 4जी में अपग्रेड किया गया।
रेलवे कनेक्टिविटी भी धीरे-धीरे बढ़ाई जा रही है। दल्लीराजहरा से रावघाट तक 95 किलोमीटर रेल लाइन तैयार हो चुकी है। रावघाट से जगदलपुर तक 140 किलोमीटर का काम पूरा किया गया है। इसके अलावा दंतेवाड़ा से तेलंगाना के मुनुगुरु तक नई रेल लाइन के लिए सर्वे किया जा रहा है। (Naxalism End in India)
लोकतंत्र में बढ़ी भागीदारी
नक्सल प्रभावित इलाकों में पहले चुनावों का बहिष्कार आम बात थी। कई जगहों पर लोगों को वोट डालने से रोका जाता था। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। बस्तर में 2019 के मुकाबले 2024 में वोटिंग प्रतिशत बढ़ा है। इसी तरह कांकेर, राजनांदगांव और महासमुंद में भी मतदान में बढ़ोतरी दर्ज की गई।
बाल विवाह जैसे सामाजिक मुद्दों पर भी काम हुआ है। बालोद जिला पूरी तरह बाल विवाह मुक्त घोषित किया गया। वन अधिकार कानून के तहत आदिवासी परिवारों को जमीन के अधिकार दिए गए, जिससे उनकी भागीदारी और भरोसा बढ़ा। (Naxalism End in India)
दो मोर्चों पर साथ-साथ चला अभियान
इस पूरे बदलाव के पीछे एक बड़ी रणनीति रही, जिसमें सुरक्षा और विकास दोनों को साथ लेकर चला गया। एक तरफ सुरक्षा बलों ने जंगलों में ऑपरेशन चलाए, वहीं दूसरी तरफ गांवों में सड़क, स्कूल, अस्पताल और बैंकिंग जैसी सुविधाएं पहुंचाई गईं। धीरे-धीरे लोगों का भरोसा बढ़ा और सरकारी योजनाओं का असर जमीन पर दिखने लगा। देश के जिन इलाकों को कभी “रेड कॉरिडोर” कहा जाता था, वहां अब प्रशासन, विकास और लोकतंत्र की मौजूदगी साफ नजर आने लगी है। (Naxalism End in India)

