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स्वदेशी फाइटर जेट इंजन को लेकर बड़ी खबर! कावेरी की देरी से लिया सबक, अब देश में बनेगा जेट इंजन टेस्टिंग सेंटर

डीआरडीओ ने इसके लिए “नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स” बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके तहत गैस टरबाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट यानी जीटीआरई ने इंडस्ट्री से जानकारी मांगने के लिए आरएफआई यानी रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन जारी की है...

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📍नई दिल्ली | 20 Mar, 2026, 8:18 PM

National Aero Engine Test Complex: भारत अब जेट इंजन की टेस्टिंग को लेकर बड़ी छलांग लगाने की तैयारी में है। देश जल्द ही अपना पहला पूरी तरह इंटीग्रेटेड एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स बनाने जा रहा है। इस प्रोजेक्ट का मकसद यह है कि अब जेट इंजन की टेस्टिंग के लिए भारत को विदेशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

डीआरडीओ ने इसके लिए “नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स” बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके तहत गैस टरबाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट यानी जीटीआरई ने इंडस्ट्री से जानकारी मांगने के लिए आरएफआई यानी रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन जारी किया है। (National Aero Engine Test Complex)

National Aero Engine Test Complex: कहां बनेगा यह हाई-टेक कॉम्प्लेक्स

सूत्रों के अनुसार, यह टेस्ट कॉम्प्लेक्स कर्नाटक के चल्लाकेरे या फिर नागार्जुन सागर के आसपास बनाया जा सकता है। यह जगह इसलिए चुनी जा रही है क्योंकि यहां बड़े स्तर पर तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करना आसान है।

अब तक भारत को अपने जेट इंजन की कई अहम टेस्टिंग के लिए रूस जैसे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था। खासकर हाई अल्टीट्यूड यानी ऊंचाई पर इंजन की परफॉरमेंस जांचने के लिए भारत के पास खुद की सुविधा नहीं थी।

इस वजह से समय ज्यादा लगता था, खर्च बढ़ जाता था और कई बार प्रोजेक्ट में देरी भी हो जाती थी। कावेरी इंजन प्रोजेक्ट इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है, जिसमें टेस्टिंग के लिए विदेश जाना पड़ा और समयसीमा पर असर पड़ा। (National Aero Engine Test Complex)

कैसा होगा यह नया टेस्ट कॉम्प्लेक्स

यह कॉम्प्लेक्स पूरी तरह आधुनिक तकनीक से लैस होगा। इसमें जेट इंजन के हर हिस्से की टेस्टिंग के लिए अलग-अलग सुविधाएं होंगी। इसमें हाई अल्टीट्यूड टेस्ट सिस्टम होगा, जहां 10 से 15 किलोमीटर ऊंचाई जैसी स्थिति बनाई जा सकेगी।

इसके अलावा इसमें फैन, कंप्रेसर, कंबस्चर, टरबाइन और आफ्टरबर्नर जैसे सभी अहम हिस्सों की जांच के लिए अलग टेस्ट सेटअप होंगे। इससे इंजन के छोटे-छोटे पार्ट्स से लेकर पूरे इंजन तक की जांच एक ही जगह पर हो सकेगी। (National Aero Engine Test Complex)

टर्नकी आधार पर बनेगा पूरा सिस्टम

डीआरडीओ ने इस प्रोजेक्ट को टर्नकी आधार पर बनाने की योजना बनाई है। इसका मतलब है कि जो कंपनी इस प्रोजेक्ट को लेगी, वही डिजाइन से लेकर निर्माण और इंस्टॉलेशन तक की पूरी जिम्मेदारी निभाएगी। इसमें सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ एडवांस टेस्टिंग सिस्टम भी शामिल होंगे। देश और विदेश की कंपनियों को इसमें हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया गया है। (National Aero Engine Test Complex)

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किन कंपनियों को मौका मिलेगा

इस प्रोजेक्ट में देशी और विदेशी कंपनियां दोनों हिस्सा ले सकती हैं। इसमें ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स, टेस्ट फैसिलिटी बनाने वाली कंपनियां, जॉइंट वेंचर और इंडस्ट्री पार्टनर्स शामिल हो सकते हैं।

फ्रांस की कंपनी सफरान और रूस की कंपनियां इस सेक्टर में पहले से काम कर रही हैं, इसलिए उनके भी इस प्रोजेक्ट में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। इसमें जीटीआरई के साथ 110-120 किलो न्यूटन कैटेगरी के इंजन के लिए संभावित साझेदारी भी शामिल है। (National Aero Engine Test Complex)

कावेरी इंजन की कहानी – क्यों जरूरी है यह कॉम्प्लेक्स

कावेरी इंजन की शुरुआत साल 1989 में हुई थी, जब जीटीआरई ने इसे डेवलप करना शुरू किया। इसका मुख्य उद्देश्य था कि भारत अपने एलसीए तेजस फाइटर जेट के लिए खुद का इंजन तैयार कर सके। लेकिन कई सालों की मेहनत के बावजूद यह इंजन तय लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाया। यह करीब 72 से 81 किलो न्यूटन थ्रस्ट ही दे सका, जबकि तेजस को 83 से 85 किलो न्यूटन की जरूरत थी। इसकी सबसे बड़ी वजह रही हाई टेम्परेचर मटेरियल, जैसे सिंगल क्रिस्टल ब्लेड और सुपर अलॉय की कमी, साथ ही पर्याप्त टेस्टिंग सुविधाओं का न होना था।

इसी वजह से 2008 में डीआरडीओ ने तेजस प्रोजेक्ट से कावेरी इंजन को अलग कर दिया। हालांकि इसके बाद भी इस पर काम बंद नहीं हुआ। धीरे-धीरे इसमें सुधार किया गया और अब इसका ड्राई वर्जन, यानी बिना आफ्टरबर्नर वाला इंजन, करीब 48 से 52 किलो न्यूटन थ्रस्ट देने लगा है। इस वर्जन को अब डीआरडीओ के घातक यूसीएवी यानी स्टेल्थ ड्रोन में इस्तेमाल करने की योजना है। हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जीटीआरई में जाकर कावेरी इंजन के आफ्टरबर्नर का ट्रायल भी देखा था। (National Aero Engine Test Complex)

इसके साथ ही अब भारत एक और बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, जिसे एएचटीसीई कहा जाता है। इसका लक्ष्य 110 से 130 किलो न्यूटन थ्रस्ट वाला ताकतवर इंजन बनाना है। यह इंजन भारत के भविष्य के स्टेल्थ फाइटर जेट एएमसीए के लिए होगा। एएमसीए में दो इंजन लगाए जाएंगे, जिनकी कुल ताकत करीब 240 किलो न्यूटन होगी। अगर यह इंजन भारत खुद नहीं बना पाया, तो उसे विदेशी इंजनों जैसे जीई एफ414 या सफरान पर निर्भर रहना पड़ेगा। (National Aero Engine Test Complex)

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सबसे बड़ी समस्या अब तक टेस्टिंग की रही है। भारत में हाई अल्टीट्यूड यानी ऊंचाई पर इंजन की जांच करने के लिए जरूरी टेस्ट बेड नहीं है। इसी वजह से कावेरी इंजन के कई टेस्ट रूस के रूस के ग्रोमोव इंस्टीट्यूट और सीआईएएम संस्थानों में करवाने पड़े। वहां टेस्टिंग के लिए 9 से 10 महीने तक लंबा इंतजार करना पड़ता था। इसके अलावा यह प्रक्रिया काफी महंगी भी थी और संवेदनशील तकनीक विदेश भेजने का जोखिम भी बना रहता था।

यही वजह है कि अब नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स जैसे बड़े प्रोजेक्ट की जरूरत महसूस हुई है, ताकि भारत अपने इंजन की पूरी टेस्टिंग देश में ही कर सके और भविष्य के प्रोजेक्ट्स में देरी और निर्भरता दोनों कम हो सकें। (National Aero Engine Test Complex)

कितनी मुश्किल है टेस्टिंग?

जेट इंजन बनाना बेहद मुश्किल काम होता है। एक इंजन में करीब 25,000 छोटे-बड़े पार्ट्स होते हैं और हर पार्ट का सही तरीके से काम करना जरूरी होता है। इसके अंदर तापमान 1500 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। ऐसे माहौल में इंजन को सही तरीके से चलाना और उसकी जांच करना आसान नहीं होता।

जब इंजन को ऊंचाई पर उड़ान के लिए टेस्ट किया जाता है, तो वहां हवा बहुत पतली होती है। इससे इंजन की परफॉर्मेंस पर असर पड़ता है और उसकी क्षमता कम हो सकती है। इसके अलावा आफ्टरबर्नर में अतिरिक्त ताकत पाने के लिए ईंधन जलाया जाता है, जिससे ज्यादा थ्रस्ट मिलता है, लेकिन इस प्रक्रिया को कंट्रोल करना बहुत मुश्किल होता है। (National Aero Engine Test Complex)

दुनिया में ऐसे टेस्ट करने के लिए बहुत कम देशों के पास पूरी सुविधाएं हैं। अमेरिका में नासा और जीई के पास सबसे बड़े और आधुनिक टेस्ट कॉम्प्लेक्स हैं। रूस और फ्रांस के पास भी ऐसी सुविधाएं मौजूद हैं।

जीटीआरई में फिलहाल 130 किलो न्यूटन क्षमता वाला ट्विन इंजन टेस्ट बेड बनाया जा रहा है, लेकिन वह सिर्फ जमीन पर होने वाले टेस्ट के लिए है। वहीं नया नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स एक पूरा इंटीग्रेटेड सिस्टम होगा, जहां हर तरह की टेस्टिंग एक ही जगह पर की जा सकेगी।

नेशनल एरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स के बाद अगला कदम फ्लाइंग टेस्ट बेड होगा। वहीं भारतीय वायुसेना के आईएल-76 ट्रांसपोर्ट प्लेन इसे बनाने के लिए चुना जा सकता है। इससे उड़ान की टेस्टिंग भी देश में हो सकेगी। (National Aero Engine Test Complex)

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भविष्य के फाइटर जेट्स के लिए जरूरी कदम

यह टेस्ट कॉम्प्लेक्स केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह फ्यूचर के फाइटर जेट्स जैसे एएमसीए के लिए बेस तैयार करेगा। भारत एएमसीए जैसे एडवांस फाइटर जेट्स पर काम कर रहा है, जिसके लिए हाई पावर इंजन की जरूरत होगी।

अगर इंजन की टेस्टिंग देश में ही होगी, तो इन प्रोजेक्ट्स को रफ्तार मिलेगी और विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम होगी। (National Aero Engine Test Complex)

डीआरडीओ की तरफ से जारी की गई आरएफआई इस पूरे प्रोजेक्ट का पहला चरण है। इसके जरिए कंपनियों की क्षमता और तकनीकी योग्यता का आकलन किया जाएगा।

इसके बाद इस प्रोजेक्ट को डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल के पास भेजा जाएगा, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह करते हैं। वहां से मंजूरी मिलने के बाद आगे की प्रक्रिया शुरू होगी।

आरएफआई के जवाब जून के मध्य तक मांगे गए हैं। इसके बाद इंडस्ट्री के साथ चर्चा की जाएगी और प्रोजेक्ट की अंतिम रूपरेखा तय की जाएगी। (National Aero Engine Test Complex)

भारत के लिए क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट

आज के समय में जेट इंजन टेक्नोलॉजी किसी भी देश की सैन्य ताकत का अहम हिस्सा मानी जाती है। अगर किसी देश के पास अपनी इंजन टेस्टिंग सुविधा नहीं है, तो उसे हर बार विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है।

इस नए कॉम्प्लेक्स के बनने के बाद भारत इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकेगा। इससे समय, लागत और सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों का समाधान हो जाएगा।

यह प्रोजेक्ट भारत के “आत्मनिर्भर भारत” अभियान को भी मजबूती देगा। इससे देश की कंपनियों को नई तकनीक पर काम करने का मौका मिलेगा और रक्षा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। (National Aero Engine Test Complex)

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    हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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हरेंद्र चौधरी रक्षा पत्रकारिता (Defence Journalism) में सक्रिय हैं और RakshaSamachar.com से जुड़े हैं। वे लंबे समय से भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी रणनीतिक खबरों, रक्षा नीतियों और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को कवर कर रहे हैं। पत्रकारिता के अपने करियर में हरेंद्र ने संसद की गतिविधियों, सैन्य अभियानों, भारत-पाक और भारत-चीन सीमा विवाद, रक्षा खरीद और ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा परियोजनाओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं। वे रक्षा मामलों की गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।

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