📍मेरठ/नई दिल्ली | 15 Feb, 2026, 12:20 PM
Meerut Drone Airbase: रक्षा मंत्रालय ने मेरठ में देश का पहला डेडिकेटेड ड्रोन एयरबेस बनाने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। यह एयरबेस खास तौर पर ड्रोन और रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट यानी आरपीए के लिए तैयार किया जाएगा। इसका मकसद सेना की निगरानी और स्ट्राइक क्षमता को और मजबूत बनाना है। इस पूरे प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी रक्षा मंत्रालय के तहत काम काम करने वाले बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन यानी बीआरओ को दी गई है। (Meerut Drone Airbase)
Meerut Drone Airbase: 406 करोड़ रुपये की लागत
यह परियोजना करीब 406 करोड़ रुपये की लागत से तैयार होगी। मेरठ के किला रोड इलाके में लगभग 900 एकड़ जमीन पर यह बेस बनाया जाएगा। इसे आधुनिक सैन्य जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जा रहा है, ताकि हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस यानी HALE कैटेगरी के ड्रोन यहां से ऑपरेट किए जा सकें। ऐसे ड्रोन लंबी दूरी तक उड़ान भर सकते हैं और कई घंटों तक आसमान में रहकर निगरानी कर सकते हैं। (Meerut Drone Airbase)
2,110 मीटर लंबा और 45 मीटर चौड़ा रनवे
इस एयरबेस का सबसे अहम हिस्सा होगा 2,110 मीटर लंबा और 45 मीटर चौड़ा रनवे। यह रनवे सिर्फ ड्रोन के लिए ही नहीं, बल्कि ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट जैसे सी-295 और सी-130 जैसे विमानों के लिए भी इस्तेमाल होगा। रनवे पर आईसीएओ कैट-2 मानक की लाइटिंग और नेविगेशन सिस्टम लगाए जाएंगे, ताकि कम विजिबिलिटी यानी धुंध या खराब मौसम में भी सुरक्षित टेकऑफ और लैंडिंग हो सके। (Meerut Drone Airbase)
हर साल करीब 1,500 ड्रोन ऑपरेशन
बेस पर दो बड़े हैंगर बनाए जाएंगे, जिनका आकार 60 गुणा 50 मीटर होगा। इन हैंगरों में ड्रोन की मेंटेनेंस, मरम्मत और तेजी से तैनाती की सुविधा होगी। अनुमान है कि यह बेस हर साल करीब 1,500 ड्रोन ऑपरेशन संभाल सकेगा। यानी औसतन रोजाना चार ड्रोन उड़ानें यहां से ऑपरेट की जा सकेंगी। यह अनमैन्ड सिस्टम्स के लिए एक स्ट्रैटेजिक नर्व सेंटर बनेगा। (Meerut Drone Airbase)
क्यों किया ड्रोन बेस बनाने का फैसला
सूत्रों का कहना है कि यह फैसला अचानक नहीं लिया गया है। इसके पीछे ऑपरेशन सिंदूर को बड़ी वजह माना जा रहा है। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया था। उस दौरान ड्रोन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। ड्रोन ने सटीक हमलों (प्रिसिजन टारगेटिंग) और निगरानी (सर्विलांस) में अहम भूमिका निभाई। इस अनुभव से सेना को यह समझ आया कि भविष्य का युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं लड़ा जाएगा, बल्कि अनमैन्ड सिस्टम यानी बिना पायलट वाले प्लेटफॉर्म की भूमिका और बढ़ेगी। (Meerut Drone Airbase)
एक वरिष्ठ सेना अधिकारी के मुताबिक, पाकिस्तान और चीन की तरफ से ड्रोन से जुड़े खतरे लगातार बढ़ रहे हैं, ऐसे में भारत के लिए जरूरी हो गया है कि वह लंबे समय तक लगातार काम करने वाले यूएवी (बिना पायलट वाले विमान) ऑपरेशन नेटवर्क तैयार करे। अगर ड्रोन के लिए अलग से एक समर्पित बेस होगा, तो सैनिकों की ट्रेनिंग, ड्रोन की मेंटेनेंस और उन्हें जरूरत के समय तुरंत तैनात करना आसान हो जाएगा। उनका कहना है कि भविष्य का डिफेंस सिस्टम डेटा पर आधारित और बिना पायलट वाले सिस्टम पर टिक होगा। उनके अनुसार, ऐसी तैयारी से भारत की ताकत इतनी बढ़ेगी कि दुश्मन देशों के लिए यह बड़ी चिंता की वजह बन जाएगी।
वह कहते हैं, मॉडर्न वॉरफेयर में ड्रोन दुश्मन के इलाके में बिना सैनिकों को खतरे में डाले निगरानी कर सकते हैं। रीयल टाइम इंटेलिजेंस यानी तुरंत जानकारी उपलब्ध कराते हैं। लंबी दूरी तक उड़ान भर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर सटीक हमले (प्रिसिजन टारगेटिंग) भी कर सकते हैं। ऐसे में एक समर्पित ड्रोन एयरबेस की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। (Meerut Drone Airbase)
प्रोजेक्ट के लिए क्यों चुना मेरठ को
मेरठ को इस प्रोजेक्ट के लिए चुनने के पीछे कई रणनीतिक वजहें हैं। सबसे पहले इसकी भौगोलिक स्थिति की बात करें यह दिल्ली के करीब 70 किमी दूर है और उत्तर भारत के केंद्र में स्थित है। यहां से पश्चिमी सीमा यानी पाकिस्तान बॉर्डर और उत्तरी सीमा यानी चीन की ओर निगरानी करना आसान होगा। यह आतंकी घुसपैठ या सैन्य गतिविधियों को तुरंत डिटेक्ट करने में मदद करेगा। यहां से ड्रोन आसानी से पंजाब, राजस्थान और जम्मू क्षेत्र की ओर तैनात किए जा सकते हैं। उत्तरी सीमा की निगरानी के लिए भी यह बेहतरीन जगह है।
दूसरा कारण है यहां का मौजूदा मिलिटरी और लॉजिस्टिक इंफ्रास्ट्रक्चर है। मेरठ के पास हिंडन एयरबेस है, जो भारतीय वायुसेना का महत्वपूर्ण अड्डा है। इससे सपोर्ट और तालमेल आसान होगा। इसके अलावा उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर का हिस्सा होने के कारण यहां रक्षा से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा मिल रहा है। (Meerut Drone Airbase)
वहीं तीसरी सबसे बड़ी वजह है कि मेरठ में सेना का बड़ा ईएमई (इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स कोर) वर्कशॉप है। भारतीय सेना के ईएमई कोर के तहत देशभर में आठ आर्मी बेस वर्कशॉप हैं। इनमें से 515 आर्मी बेस वर्कशॉप का मुख्यालय मेरठ में है। इसके साथ 510 आर्मी बेस वर्कशॉप भी यहीं काम करती है। बेस वर्कशॉप ग्रुप का हेडक्वार्टर भी मेरठ में है, जो बाकी वर्कशॉप्स को कॉर्डिनेट करता है।
मेरठ की 510 बेस वर्कशॉप में एयर डिफेंस सिस्टम, गाइडेड मिसाइल, शिल्का और क्वाड्रेट जैसे हथियार सिस्टम, मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर और भारी सैन्य वाहनों की मरम्मत और ओवरहॉलिंग होती है। ईएमई का मुख्य काम इलेक्ट्रॉनिक और मैकेनिकल उपकरणों की मरम्मत, मेंटेनेंस और स्वदेशीकरण करना है। पिछले कुछ सालों में यहां यूएवी यानी बिना पायलट वाले विमानों के स्पेयर पार्ट्स भी बनाए और टेस्ट किए जा चुके हैं। हाल में आयोजित ड्रोन शक्ति (ईगल ऑन आर्म) के तहत ड्रोन की मरम्मत और सपोर्ट का पूरा सिस्टम ईएमई वर्कशॉप्स पर बेस्ड है, जिसमें मेरठ की भूमिका अहम है। (Meerut Drone Airbase)
85 महीने में पूरा होगा प्रोजेक्ट
इस प्रोजेक्ट की कुल अवधि 85 महीने तय की गई है। इसमें सात महीने प्री-अवार्ड प्लानिंग के लिए, 18 महीने कंस्ट्रक्शन कार्य के लिए और इसके बाद मेंटेनेंस व निगरानी की अवधि शामिल है। बीआरओ ने प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंसी के लिए ई-टेंडर भी जारी कर दिया है।
इस प्रोजेक्ट को बीआरओ के प्रोजेक्ट शिवालिक के चीफ इंजीनियर लीड करेंगे। एक बार पूरा होने पर, यह भारतीय सेना के लिए बॉर्डर रीजन पर निगरानी का हॉक आई बनेगा।
सूत्रों का कहना है कि यहां मौसम काफी सपोर्टिव है। अन्य जगहों जैसे जम्मू या लद्दाख की तुलना में, मेरठ कम रिस्की और स्केलेबल है। इसलिए यह जगह एक स्ट्रैटेजिक एविएशन हब बनाई जा सकती है, जो पूरे नॉर्थ इंडिया को कवर करेगी। (Meerut Drone Airbase)


