📍नई दिल्ली | 31 Jan, 2026, 5:34 PM
Defence Budget Capital Expenditure 2026: देश का यूनियन बजट पेश होने में अब 18 घंटे से भी कम समय बचा है। आम तौर पर बजट को टैक्स, महंगाई और वेलफेयर स्कीम्स के नजरिये से देखा जाता है, लेकिन इस बार डिफेंस सेक्टर की निगाहें खास तौर पर बजट पर टिकी हुई हैं। वजह साफ है, सरकार के रिफॉर्म एजेंडा के अगले चरण में डिफेंस सेक्टर को एक बड़ी छलांग मिल सकती है।
सूत्रों के मुताबिक, रक्षा मंत्रालय वित्त वर्ष 2026-27 के लिए कैपिटल एक्सपेंडिचर यानी नए हथियारों, प्लेटफॉर्म्स और सिस्टम्स की खरीद के बजट में करीब 20 फीसदी बढ़ोतरी की मांग करने जा रहा है। अगर यह मांग मंजूर होती है, तो यह भारत के रक्षा आधुनिकीकरण के लिहाज से एक बड़ा कदम माना जाएगा। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)
Defence Budget Capital Expenditure 2026: कैपिटल बजट क्यों है इतना अहम
रक्षा बजट को आमतौर पर दो हिस्सों में बांटा जाता है, रेवेन्यू एक्सपेंडिचर और कैपिटल एक्सपेंडिचर। रेवेन्यू एक्सपेंडिचर में सैलरी, पेंशन, मौजूदा हथियारों की मेंटेनेंस और ऑपरेशनल खर्च शामिल होते हैं। यह हिस्सा हमेशा बड़ा रहता है और इससे बचना मुश्किल भी है।
वहीं कैपिटल एक्सपेंडिचर वह पैसा होता है, जिससे नए फाइटर एयरक्राफ्ट, टैंक, सबमरीन, मिसाइल सिस्टम और हाई-टेक इक्विपमेंट खरीदे जाते हैं। यही वह हिस्सा है, जो सेनाओं की भविष्य की ताकत तय करता है।
पिछले कुछ सालों में कुल रक्षा बजट में औसतन 8.5 से 11 फीसदी की बढ़ोतरी होती रही है, लेकिन इस बार खास जोर कैपिटल बजट पर है। रक्षा सचिव खुद सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि रक्षा मंत्रालय कैपिटल बजट में 20 फीसदी बढ़ोतरी की मांग करेगा। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)
एयर फोर्स की जरूरतों से बढ़ा दबाव
इस बढ़ोतरी के पीछे सबसे बड़ी वजह इंडियन एयर फोर्स की जरूरतें हैं। एयर फोर्स को अगले कुछ सालों में नए फाइटर एयरक्राफ्ट खरीदने हैं, ताकि स्क्वाड्रन स्ट्रेंथ को मजबूत किया जा सके। इसके अलावा, एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) प्रोजेक्ट और स्वदेशी जेट इंजन डेवलपमेंट के लिए शुरुआती भुगतान भी इसी बजट से होना है।
जेट इंजन को लेकर भारत दशकों से विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहा है। अब सरकार का फोकस सिर्फ बाहर से टेक्नोलॉजी लाकर जोड़ने पर नहीं, बल्कि इंडियन ओन्ड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी बनाने पर है। इसे अब “स्क्रूड्राइवर टेक्नोलॉजी” से आगे निकलकर टेक्नोलॉजिकल सॉवरेनटी की दिशा में कदम माना जा रहा है। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)
1.8 लाख करोड़ से 2.16 लाख करोड़ तक
पिछले वित्त वर्ष में कैपिटल बजट करीब 1.8 लाख करोड़ रुपये का था। अगर 20 फीसदी बढ़ोतरी होती है, तो यह आंकड़ा 2.16 लाख करोड़ रुपये से भी ऊपर पहुंच सकता है। खास बात यह है कि पिछले दो सालों की तरह इस बार भी लगभग 75 फीसदी कैपिटल बजट घरेलू उद्योग के लिए आरक्षित रहने की उम्मीद है।
इसका मतलब साफ है कि देश में बने हथियारों, सिस्टम्स और प्लेटफॉर्म्स को प्राथमिकता मिलेगी। इससे न सिर्फ सरकारी डिफेंस कंपनियों को फायदा होगा, बल्कि प्राइवेट सेक्टर और स्टार्ट-अप्स को भी बड़े ऑर्डर्स मिलने की संभावना बढ़ेगी। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)
डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल में बड़ा बदलाव
एक और अहम बदलाव पिछले साल देखने को मिला, जब डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल को 16 साल बाद अपडेट किया गया। इससे पहले यह मैनुअल 2009 में जारी हुआ था। नए मैनुअल के तहत अब रेवेन्यू प्रोक्योरमेंट का करीब 80 फीसदी हिस्सा इंडियन इंडस्ट्री, खासकर एमएसएमई सेक्टर, से लेने का टारगेट तय किया गया है।
इससे छोटे और मझोले डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स के लिए बाजार खुलने की उम्मीद है। ज्यादा ऑर्डर मिलने से न सिर्फ उनकी आमदनी बढ़ेगी, बल्कि वे नई टेक्नोलॉजी और रिसर्च में भी निवेश कर पाएंगे। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)
डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2026 से उम्मीदें
हालांकि डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर (डीएपी) का नया वर्जन 2025 में आना था, लेकिन अब इसके 2026 में आने की संभावना है। डीएपी 2026 से कई अहम बदलावों की उम्मीद की जा रही है।
बताया जा रहा है कि नए डीएपी में एक्विजिशन टाइमलाइन को छोटा किया जाएगा, ताकि हथियारों की खरीद में सालों की देरी न हो। इसके अलावा, इंडियन एमएसएमई कंपनियों के लिए बैंक गारंटी की शर्तें भी कुछ हद तक आसान की जा सकती हैं।
एक और बड़ा बदलाव स्पाइरल डेवलपमेंट मॉडल हो सकता है। इसके तहत सेनाएं पहले किसी सिस्टम की सीमित संख्या खरीदेंगी, फील्ड में उसका टेस्ट करेंगी और फिर चरणबद्ध तरीके से अपग्रेड के साथ बड़े ऑर्डर देंगी। इससे इंडस्ट्री और यूजर के बीच भरोसा बढ़ेगा। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)
इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट को स्थायी रूप
पिछले पांच सालों में सेनाओं ने कई बार इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट पावर्स का इस्तेमाल किया है, खासकर सीमाओं पर तनाव के दौरान। अब योजना है कि 300 करोड़ रुपये तक की इमरजेंसी खरीद की व्यवस्था को डीएपी में स्थायी रूप से शामिल किया जाए।
इससे जरूरत पड़ने पर सेनाएं बिना लंबी प्रक्रिया के तेजी से जरूरी उपकरण खरीद सकेंगी। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)
लीजिंग मॉडल को बढ़ावा
बजट और डीएपी में लीजिंग मॉडल को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। पिछले कुछ सालों से ड्रोन और हेलिकॉप्टर जैसे प्लेटफॉर्म्स को लीज पर लेने की व्यवस्था चल रही है। आने वाले समय में इसे और विस्तार दिया जा सकता है।
इसका फायदा यह है कि सेनाओं को तुरंत क्षमता मिल जाती है, जबकि सरकार पर एक साथ भारी खर्च का दबाव नहीं पड़ता। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)
एक्सपोर्ट और फॉरेन पॉलिसी का कनेक्शन
डिफेंस एक्सपोर्ट भी बजट का एक अहम पहलू है। सरकार का लक्ष्य है कि 2028-29 तक 50,000 करोड़ रुपये का डिफेंस एक्सपोर्ट किया जाए। ब्रह्मोस, आकाश और पिनाका जैसे सिस्टम्स पहले ही विदेशी बाजार में अपनी जगह बना रहे हैं।
डिफेंस एक्सपोर्ट न सिर्फ अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचाता है, बल्कि भारत की फॉरेन पॉलिसी और स्ट्रैटेजिक लीवरेज को भी मजबूती देता है। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)
बजट से क्या है उम्मीद
हालांकि बजट भाषण में इन सभी बातों का विस्तार से जिक्र होना जरूरी नहीं है, लेकिन माना जा रहा है कि बजट इन कदमों को फैसिलिटेट जरूर करेगा। रक्षा क्षेत्र में इंडस्ट्री, यूजर और अकादमिक संस्थानों के बीच बेहतर संवाद की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है।
अगर बजट में कैपिटल एक्सपेंडिचर को वह बढ़ावा मिलता है, जिसकी उम्मीद की जा रही है, तो आने वाले सालों में भारत का रक्षा इकोसिस्टम और ज्यादा मजबूत हो सकता है। यह संतुलन बनाना जरूरी है कि सेनाओं की आज की जरूरतें भी पूरी हों और भविष्य की तैयारी भी साथ-साथ चलती रहे। (Defence Budget Capital Expenditure 2026)


